वषर् वुफल जनसंख्या ;लाखों मेंद्ध औसत वाष्िार्क संवृि दर ;»द्ध दशकीयसंवृि दर ;»द्ध 1901 238 दृ दृ 1911 252 0ण्56 5ण्8 1921 251 .0ण्03 .0ण्3 1931 279 1ण्04 11ण्0 1941 319 1ण्33 14ण्2 1951 361 1ण्25 13ण्3 1961 439 1ण्96 21ण्6 1971 548 2ण्22 24ण्8 1981 683 2ण्20 24ण्7 1991 846 2ण्14 23ण्9 2001 1028 1ण्97 21ण्5 2011 1210 1ण्64 17ण्6 भारतीय समाज वषर् स्त्राी - पुरुष अनुपात ;सभी आयु वगो± मेंद्ध पिछले दशक की तुलना में अंतर बाल स्त्राी - पुरुष अनुपात ;0दृ6 वषर्द्ध पिछले दशक कीतुलना में अंतर 1901 972 दृ दृ दृ 1911 964 दृ8 दृ दृ 1921 955 दृ9 दृ दृ 1931 950 दृ5 दृ दृ 1941 945 दृ5 दृ दृ 1951 946 ़1 दृ दृ 1961 941 दृ5 976 दृ 1971 930 दृ11 964 दृ12 1981 934 ़4 962 दृ2 1991 927 दृ7 945 दृ17 2001 933 ़6 927 दृ18 2011 940 ़7 914 दृ13 टिप्पणी: स्त्राी - पुरुष अनुपात को प्रति 1000 पुरुषों के पीछे स्ित्रायों की संख्या के रूप मंे परिभाष्िात किया जाता है ड्डोत: 2011 की तदथर् जनगणना के आधर पर की प्रवृिा खासतौर पर चिंताजनक रही है, 1961 में स्त्राी - पुरुष अनुपात 941 था जो घटते हुए अब तक के सबसे नीचे स्तर 927 पर आ गया हालाँकि 2001 मंे उसमें पिफर मामूली सी बढ़ोतरी हुइर् है। अगर हम 2011 ;तदथर्द्ध की जनगणना का अनुमानित स्त्राी - पुरुष अनुपात को देखें तो यह थोड़ा बढ़कर 940 हो गया है। लेकिन जनसंाख्ियकीविदों, नीति - निमार्ताओं, सामाजिक कायर्कतार्ओं और इस विषय से जुड़े नागरिकों को वास्तव मंे जिस तथ्य ने डरा दिया है वह है बच्चों के लैंगिक यानी बाल स्त्राी - पुरुष अनुपात मंे एकाएक आइर् भारी गिरावट। आयु विशेष से संबंध्ित स्त्राी - पुरुष अनुपात का लेखा - जोखा रखने का काम 1961 में शुरू हुआ था। जैसाकि सारणी 3 मंे दशार्या गया है 0 - 6 आयु वगर् का स्त्राी - पुरुष अनुपात ;जिसे बाल स्त्राी - पुरुष अनुपात कहा जाता हैद्ध आमतौर पर सभी आयु वगो± के समग्र स्त्राी - पुरुष अनुपात से कापफी़ऊँचा रहता आया है लेकिन अब उसमंे बड़ी तेजी से गिरावट आ रही है। वस्तुतः 1991 से 2001 तक के दशक के आँकड़ों में यह असामान्यता दिखाइर् देती है कि समग्र स्त्राी - पुरुष अनुपात में जहाँ अब तक की सबसे अिाक 6 अंकों की बढ़ोेतरी ;निम्नतम 927 से 933द्ध दजर् हुइर् है लेकिन बाल स्त्राी - पुरुष अनुपात, 18 अंकों का गोता लगाकर 945 से घटकर 927 के स्तर पर आ गया है और इस प्रकार वह पहली बार समग्र स्त्राी - पुरुष अनुपात से नीचे चला गया है। सन् 2011 की जनगणना के अनुमानित आँकड़ों के अनुसार स्िथति और खराब हो गइर् और बाल स्त्राी - पुरुष अनुपात मात्रा 914 रह गया है। राज्य स्तरीय बाल स्त्राी - पुरुष अनुपात तो चिंता का और भी बड़ा कारण प्रस्तुत करते हैं। कम - से - कम छह राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों का बाल स्त्राी - पुरुष अनुपात प्रति 1,000 पुरुष के पीछे 900 स्ित्रायों से भी कम है। इस संबंध् में पंजाब की स्िथति सबसे खराब है क्यांेकि वहाँ का बाल स्त्राी - पुरुष अनुपात अविश्वसनीय रूप से 793 है ;यही एक ऐसा राज्य है जहाँ यह अनुपात 800 से नीचे हैद्ध। पंजाब के बाद हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली, गुजरात और हिमाचल प्रदेश आते हंै। जैसाकि चाटर् 6 मंे दिखाया गया है उत्तरांचल, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र सभी में यह अनुपात 925 से नीचे है जबकि मध्य प्रदेश, वषर् व्यक्ित पुरुष स्ित्रायाँ साक्षरता दर में स्त्राी - पुरुष के बीच का अंतर 1951 1961 1971 1981 1991 2001 2011 18ण्3 28ण्3 34ण्5 43ण्6 52ण्2 65ण्4 74ण्0 27ण्2 40ण्4 46ण्0 56ण्4 64ण्1 75ण्9 82ण्1 8ण्9 15ण्4 22ण्0 29ण्8 39ण्3 54ण्2 65ण्4 18ण्3 25ण्1 24ण्0 26ण्6 24ण्8 21ण्7 16ण्7 भारतीय समाज की जनसांख्ियकीय संरचना वषर् जनसंख्या ;दस लाख मेंद्ध वुफल जनसंख्या का प्रतिशत ग्रामीण नगरीय ग्रामीण नगरीय 1901 1911 1921 1931 1941 1951 1961 1971 1981 1991 2001 2011 213 226 223 246 275 299 360 439 524 629 743 833 26 26 28 33 44 62 79 109 159 218 286 377 89ण्2 89ण्7 88ण्8 88ण्0 86ण्1 82ण्7 82ण्0 80ण्1 76ण्7 74ण्3 72ण्2 68ण्8 10ण्8 10ण्3 11ण्2 12ण्0 13ण्9 17ण्3 18ण्0 19ण्9 23ण्3 25ण्7 27ण्8 31ण्2 ड्डोतः भारत की जनगणना 2011 ;तदथर्द्ध एक समय में वृफष्िा देश के समग्र आथ्िार्क उत्पादन में सबसे अध्िक योगदान देती थी लेकिन आज सकल घरेलू उत्पाद में उसका योगदान केवल एक - चौथाइर् रह गया है। यद्यपि हमारी अध्िकांश जनता ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और अपनी आजीविका वृफष्िा से ही चलाती है पर वह जो उत्पादन वफरते हैं उसका आपेक्ष्िाक आथ्िार्क मूल्य अत्यध्िक घट गया है। यहाँ तक की गाँवों में रहने वाले अिाक से अध्िक लोग अब शायद खेती या यहाँ तक की गाँव में काम नहीं करते हैं। ग्रामीण लोग परिवहन सेवा, व्यवसाय या श्िाल्प - निमार्ण जैसे खेती से अलग भ्िान्न ग्रामीण व्यवसायों को अध्िकाध्िक अपनाते जा रहेे हैं। यदि उनका गाँव किसी नगर के कापफी पास हो तो वे गाँव में रहते हुए भी काम करने के लिए रोशाना उस निकटतम़नगरीय वेंफद्र में जाते हैं। रेडियो, टेलीविशन, समाचारपत्रा जैसे जनसंपवर्र्फ एवं जनसंचार के साध्न अब ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगांे के समक्ष नगरीय जीवन शैली और उपभोग के स्वरूपों की तस्वीरें पेश कर रहे हैं। परिणामस्वरूप, दूरदराज के गाँवों में रहने वाले लोग नगरीय तड़़क - भड़क और सुख - सुविधओं से सुपरिचित हो जाते हैं उनमें भी वैसा ही उपभोगपूणर् जीवन जीने की लालसा उत्पन्न हो जाती है। जनसंक्रमण और जनसंचार के साध्न अब ग्रामीण तथा नगरीय इलाकों के बीच की खाइर् को पाटते जा रहे हैं। पहले भी, ग्रामीण इलाके बाशार की ताकतों की पहुँच से कभी भी अछूते नहीं रहे और आज तो स्िथति यह है कि वे उपभोक्ता बाशार के साथ बड़ी घन्िाष्ठता से जुड़ते जा रहे हैं ;बाशारों की सामाजिक भूमिका पर अध्याय 4 में चचार् की जाएगीद्ध।

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