इस अध्याय को पढ़ने के बाद आप हमारे जीवन की सामान्य समस्याओं के समाधान में मनोविज्ञान का उपयोग वैफसे किया जा सकता हैए यह समझ सवेंफगे, मानव तथा पयार्वरण के बीच के संबंध को समझ सवेंफगे, पयार्वरणी दबावकारकों का सामना करने में पयार्वरण - उन्मुख व्यवहार किस प्रकार सहायता करते हैं, इसका विश्लेषण कर सवेंफगे, सामाजिक समस्याओं के कारणों तथा परिणामों की व्याख्या मनोवैज्ञानिक दृष्िटकोण से कर सवेंफगे तथा निधर्नता, आक्रामकता तथा स्वास्थ्य जैसी समस्याओं के संभावित उपचारों के बारे में जान सवेंफगे। परिचय मानव - पयार्वरण संबंध मानव - पयार्वरण संबंध के विभ्िान्न दृष्िटकोण विश्नोइर् समुदाय तथा चिपको आंदोलन ;बाॅक्स 8ण्1द्ध मानव व्यवहार पर पयार्वरणी प्रभाव पयार्वरण पर मानव प्रभाव शोर प्रदूषण भीड़विषयवस्तु प्राकृतिक विपदाएँ पयार्वरण - उन्मुख व्यवहार को प्रोत्साहन मनोविज्ञान तथा सामाजिक सरोकार प्रमुख पदनिधर्नता तथा भेदभाव सारांशआक्रमण, हिंसा तथा शांति समीक्षात्मक प्रश्नमहात्मा गंाधी तथा अहिंसा - अहिंसा क्यों कारगर होती है? ;बाॅक्स 8ण्2द्ध परियोजना विचारस्वास्थ्य वेबलिंक्सव्यवहार पर टेलीविशन का समाघात शैक्ष्िाक संकेत पिछले दो अध्यायों में आपने सामाजिक व्यवहारों तथा समूहों से संबंिात वुफछ विषयों का अध्ययन किया। अब हम वुफछ ऐसे व्यापक सामाजिक सरोकारों पर विमशर् करेंगे, जो परस्पर संब( हैं तथा जिनमें मनोवैज्ञानिक पक्ष अंत£नहित होते हैं। इन मुद्दों ;समस्याओंद्ध को व्यक्ितगत के बजाय सामुदायिक स्तर पर समझना तथा उनका समाधान करना होगा। अब यह ज्ञात है कि पयार्वरण हमारे शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने के अतिरिक्त हमारी मनोवैज्ञानिक प्रियाओं तथा व्यवहारों को भी प्रभावित करता है। मानव भी अपने व्यवहारों के द्वारा पयार्वरण को प्र्रभावित करते हंै तथा इनमें से वुफछ प्र्रभाव दबाव उत्पन्न करने वाली पयार्वरणी दशाओं, जैसे - शोर, प्रदूषण तथा भीड़ में परिलक्ष्िात होते हैं। पिफर भी वुफछ पयार्वरणीदबावकारक, जैसे - प्राकृतिक विपदाएँ मानव नियंत्राण में नहीं होते हैं। क्षति पहँुचाने वाले विभ्िान्न पयार्वरणी प्रभावों को पयार्वरण - समथर्क व्यवहारों तथा पूवर् में की गइर् तैयारी के द्वारा कम किया जा सकता है। आप वुफछ सामाजिक समस्याओं, जैसे - आक्रमण और हिंसा, स्वास्थ्य तथा निधर्नता और भेदभाव के कारणों और परिणामों के बारे में पढ़ेंगे। आप एक झलक इसकी भी पाएँगे कि निधर्नता तथा वंचन किस प्र्रकार व्यक्ितयों को भेदभाव तथा सामाजिक अपवजर्न ;ेवबपंस मगबसनेपवदद्धसे उत्पीडि़त कर देते हैं। मानव सामथ्यर्, सामाजिक सामंजस्य और मानसिक स्वास्थ्य के विकास में निधर्नता और वंचन का पयार्वरण दूरगामी उलझनें ;जटिलताएँद्ध पैदा करता है। निधर्नता को कम करने के वुफछ उपाय भी वण्िार्त किए गए हैं। इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य के मनोवैज्ञानिक पक्ष तथा हिंसा एवं दूसरे प्रकार के व्यवहारों पर टेलीविशन देखने के समाघात की भी व्याख्या की गइर् है। यह अध्याय आपको यह समझने में मदद करेगा कि मनोवैज्ञानिक ज्ञान का व्यावहारिक अनुप्रयोग ऐसे पहलुओं, जैसे - पयार्वरण - उन्मुख व्यवहारों को बढ़ावादेना, हिंसा तथा भेदभाव को कम करना तथा सकारात्मक स्वास्थ्य संबंधी अभ्िावृिायों के उन्नयन में वैफसे किया जा सकता है। मानव - पयार्वरण संबंध कौशलों को विकसित करेंगे? लोग इन प्रश्नों के विभ्िान्नउत्तर दे सकते हैं।वुफछ क्षण निकाल कर इन प्रश्नों के उत्तर देने का प्रयास इन प्रश्नों के द्वारा जो एक सामान्य विचार प्रकट कीजिए कृ क्या एक वृक्ष आप का ‘सबसे अच्छा मित्रा’ होता है, वह यह है कि मानव व्यवहार तथा पयार्वरण हो सकता है? क्या अिाक गमर् मौसम में या अिाक के बीच का संबंध हमारे जीवन में एक महत्वपूणर् भूमिका भीड़ में लोग अिाक आक्रामक हो जाते हैं? यदि नदियों निभाता है। आजकल यह जागरूकता बढ़ रही है कि को पवित्रा कहा जाता है तो व्यक्ित उन्हें गंदा क्यों करते ऐसी पयार्वरणी समस्याएँ, जैसे - शोर, वायु, जल तथा हैं? किसी प्रावृफतिक विपदा, जैसे - भूवंफप या सुनामी अथवा भू - प्रदूषण और वूफड़े को निपटाने के असंतोषजनक उपायों किसी मानव - निमिर्त विपदा, जैसे - किसी कारखाना में विषैली का शारीरिक स्वास्थ्य पर क्षतिकर प्रभाव पड़ता है। ¯कतु गैस का रिसाव इत्यादि के अभ्िाघातज प्रभाव का उपचार यह तथ्य कम ज्ञात है कि उपरोक्त प्र्रकारों का प्र्रदूषण वैफसे किया जा सकता है? दो ऐसे बच्चों की तुलना एवं अन्य अदृश्य पयार्वरणी कारक मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य कीजिए जो भ्िान्न भौतिक पयार्वरणों में पलकर बड़े हुए तथा प्रकायो± को भी प्र्रभावित करते हैं। मनोविज्ञान की हैंμ एक वह जिसके पयार्वरण में रंगीन ख्िालौने, चित्रा एक शाखा जिसे पयार्वरणी मनोविज्ञान ;मदअपतवदउमदजंस एवं पुस्तवंेफ भरी हुइर् थीं और दूसरा वह जिसके पयार्वरण चेलबीवसवहलद्ध कहते हैं, अनेक ऐसे मनोवैज्ञानिक मुद्दों में केवल जीवन की मूल आवश्यकताओं की पूतिर् के का अध्ययन करता है जिनका संबंध व्यापक अथर् में ही समान थे। क्या दोनों बच्चे एक समान संज्ञानात्मक मानव - पयार्वरण अंतःियाओं से होता है। पयार्वरण ;00000000000द्ध शब्द, हमारे चारों ओर जो वुफछ है उसे संदभ्िार्त करता है, शाब्िदक रूप से हमारे चारों ओर भौतिक, सामाजिक, कायर् तथा सांस्वृफतिक पयार्वरण में जो सब वुफछ है वह इसमें निहित है। व्यापक रूप से, व्यक्ित के बाहर जो शक्ितयाँ हैं, जिनके प्रति व्यक्ित अनुिया करता है, वे सब इसमें निहित हैं। इस भाग में भौतिक पयार्वरण ही विवेचन का वेंफद्र¯बदु होगा। पारिस्िथतिकी ;0000000द्ध जीव तथा उसके पयार्वरण के बीच के संबंधों का अध्ययन है। मनोविज्ञान में पयार्वरण तथा मनुष्यों की परस्पर - निभर्रता पर पफोकस है क्योंकि पयार्वरण का अथर् उन मनुष्यों के आधार पर ही निकलता है जो उसमें रहते हैं। इस संदभर् में प्रावृफतिक पयार्वरण ;दंजनतंस मदअपतवदउमदजद्ध तथा निमिर्त पयार्वरण ;इनपसज मदअपतवदउमदजद्ध में भेद किया जा सकता है। जैसाकि नाम से ही स्पष्ट है, प्रवृफति का वह अंश जिसे मानव ने नहीं छुआ है, वह प्रावृफतिक पयार्वरण कहलाता है। जबकि दूसरी ओर, प्रावृफतिक पयार्वरण में जो वुफछ भी मानव द्वारा स£जत है, वहनिमिर्त पयार्वरण है। नगर, मकान, दफ्रतर, कारखाना, पुल, शाॅ¯पग माॅल, रेल पटरी, सड़वेंफ, बाँध, यहाँ तक किकृत्रिाम रूप से बनाए गए पावर्फ और झीलें भी निमिर्त पयार्वरण के वुफछ उदाहरण हैं जो यह प्रदश्िार्त करते हैं कि प्रवृफति की देन को मनुष्यों ने किस प्रकार परिवतिर्त कर दिया है। निमिर्त पयार्वरण के अंतगर्त साधारणतया पयार्वरणी अभ्िाकल्प ;मदअपतवदउमदजंस कमेपहदद्ध का संप्रत्यय भी आता है। ‘अभ्िाकल्प’ में वुफछ मनोवैज्ञानिक लक्षण होते हैं, जैसे - ऽ मानव मस्ितष्क की सजर्नात्मकता, जैसाकि वास्तुविदों, नगर योजनाकारों और सिविल अभ्िायंताओं के कायो± में अभ्िाव्यक्त होता है। ऽ प्रावृफतिक पयार्वरण पर मानव नियंत्राण के अथर् में, जैसाकि नदी के प्रावृफतिक बहाव को बाँध बना कर नियमित करने से प्रदश्िार्त होता है। ऽ निमिर्त पयार्वरण में सामाजिक अंतःिया के प्रकार पर प्रभाव। यह विश्िाष्टता, उदाहरण के लिए, काॅलोनी में घरों के बीच की दूरी में, एक घर में कक्षों कीअवस्िथति में या किसी दफ्रतर में औपचारिक तथा अनौपचारिक सभा के लिए कायर् करने की मेशों और वुफसिर्यों की व्यवस्था में प्रतिबिंबित होती है। मानव - पयार्वरण संबंध के विभ्िान्न दृष्िटकोण मानव - पयार्वरण संबंध पर अनेक दृष्िटकोण हैं जो मुख्यतः इस पर निभर्र हैं कि मनुष्य इस संबंध का प्रत्यक्षण किस प्रकार करते हैं। स्टोकोल्स ;ैजवावसेद्ध ;1990द्ध नामक एक मनोवैज्ञानिक ने तीन उपागमों का वणर्न किया है जो कि मानव - पयार्वरण संबंध का विवरण प्रस्तुत करते हैं। ;अद्ध अल्पतमवादी परिप्रेक्ष्य ;उपदपउंसपेज चमतेचमबजपअमद्ध का यह अभ्िाग्रह है कि भौतिक पयार्वरण मानव व्यवहार, स्वास्थ्य तथा वुफशल - क्षेम ;कल्याणद्ध पर न्यूनतम या नगण्य प्रभाव डालता है। भौतिक पयार्वरण तथा मनुष्य का अस्ितत्व समांतर घटक के रूप में होता है। ;बद्ध नैमििाक परिप्रेक्ष्य ;पदेजतनउमदजंस चमतेचमबजपअमद्ध प्रस्तावित करता है कि भौतिक पयार्वरण का अस्ितत्व ही प्रमुखतया मनुष्य के सुख एवं कल्याण के लिए है। पयार्वरण के उफपर मनुष्यके अिाकांश प्रभाव इसी नैमििाक परिप्रेक्ष्य को प्रति¯बबित करते हैं। ;सद्ध आध्यात्िमक परिप्रेक्ष्य ;ेचपतपजनंस चमतेचमबजपअमद्ध पयार्वरण को एक सम्मानयोग्य और मूल्यवान वस्तु के रूप में संदभ्िार्त करता है न कि एक समुपयोग करने योेग्य वस्तु के रूप में। इसमें निहित मान्यता है कि मनुष्य अपने तथा पयार्वरण के मध्य परस्पर - निभर्र संबंध को पहचानते हैं, अथार्त मनुष्य का भी तभी अस्ितत्व रहेगा और वे प्रसन्न रहेंगे जब पयार्वरण को स्वस्थ तथा प्रावृफतिक रखा जाएगा। पयार्वरण के विषय में पारंपरिक भारतीय दृष्िटकोण आध्यात्िमक परिप्रेक्ष्य को मान्यता देता है। हमारे देश में इस परिप्रेक्ष्य के कम से कम दो उदाहरण हैं जो किराजस्थान के विश्नोइर् समुदाय के रीति - रिवाज तथा उत्तराखंड क्षेत्रा के चिपको आंदोलन ;बाॅक्स 8.1 देखेंद्ध हैं। इसके विपरीत हमें ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जबकि लोगों ने पयार्वरण को क्षतिग्रस्त किया है जो कि नैमितिक परिप्रेक्ष्य का निषेधात्मक दृष्टांत या उदाहरण है। मानव व्यवहार पर पयार्वरणी प्रभाव मानव - पयार्वरण संबंध का गुणविवेचन करने के लिए यह समझना आवश्यक है कि ये दोनों एक - दूसरे को प्रभावित करते हैं तथा वे एक - दूसरे पर अपने अस्ितत्व तथा रख - रखाव के लिए निभर्र हैं। जब हम अपना ध्यान प्रावृफतिक पयार्वरण के प्रभाव को मानव पर वेंफित करते हैं तो हमें अनेक पयार्वरणी प्रभाव मिलते हैं जिनका विस्तार भौतिक प्रभाव, जैसे - जलवायु के अनुवूफल वस्त्रों को बदलना से लेकर तीव्र मनोवैज्ञानिक प्रभाव, जैसे - प्रावृफतिक विपदा के पश्चात गंभीर अवसाद का होना तक है। वुफछ प्रभाव जिन्हें मनोवैज्ञानिकों ने इंगित किया है, वे नीचे वण्िार्त हैं। ऽ प्रत्यक्षण पर पयार्वरणी प्रभाव - पयार्वरण के वुफछ पक्ष मानव प्रत्यक्षण को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, जैसाकि आपने कक्षा 11 में पढ़ा है, अप्रफीका की एक जनजाति समाज गोल वुफटियों ;झोपडि़योंद्ध में रहती है अथार्त ऐसे घरों में जिनमें कोणीय दीवारें नहीं हैं। वे ज्यामितिक भ्रम ;मूलर - लायर भ्रमद्ध में कम त्राुटि प्रदश्िार्त करते हैं, उन व्यक्ितयों वफी अपेक्षा जो नगरों में रहते हैं और जिनके मकानों में कोणीय दीवारें होती हैं। ऽ संवेगों पर पयार्वरणी प्रभाव - पयार्वरण का प्रभावहमारी सांवेगिक प्रतिियाओं पर भी पड़ता है। प्रकृति के प्रत्येक रूप का दशर्न चाहे वह शांत नदी का प्रवाह हो, एक मुस्वुफराता हुआ पूफल हो, या एक शांत पवर्त की चोटी हो, मन को एक ऐसी प्रसन्नता से भर देता है जिसकी तुलना किसी अन्य अनुभव से नहीं की जा सकती। प्रावृफतिक विपदाएँ, जैसे - बाढ़, सूखा, भू - स्खलन, भूवंफप चाहे पृथ्वी के उफपर हो या समुद्र के नीचे हो, वह व्यक्ित के संवेगों पर इस सीमा तक प्रभाव डाल सकते हैं कि वे गहन अवसाद और दुख, तथा पूणर् असहायता की भावना और अपने जीवन पर नियंत्राण के अभाव का अनुभव करते हैं। मानव संवेगों पर ऐसा प्रभाव एक अभ्िाघातज अनुभव है जो व्यक्ितयों के जीवन को सदा के लिए परिवतिर्त कर देता है तथा घटना के बीत जाने के बहुत समय बाद तक भी अभ्िाघातज उत्तर दबाव विकार ;चवेज.जतंनउंजपब ेजतमेे कपेवतकमतए च्ज्ैक्द्ध के रूप मे बना रहता है। ऽ व्यवसाय, जीवन शैली तथा अभ्िावृिायों पर पारिस्िथतिक प्रभाव - किसी क्षेत्रा का प्रावृफतिक पयार्वरणयह निधार्रित करता है कि उस क्षेत्रा के निवासी कृष्िा पर ;जैसे - मैदानों मेंद्ध या अन्य व्यवसायों, जैसे - श्िाकार तथा संग्रहण पर ;जैसे - वनों, पहाड़ों या रेगिस्तानी क्षेत्रों मेंद्ध या उद्योगों पर ;जैसे - उन क्षेत्रों में जोकृष्िा के लिए उपजाउफ नहीं हैंद्ध निभर्र रहते हैं। परंतु किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्रा के निवासियों के व्यवसायभी उनकी जीवन शैली और अभ्िावृिायों का निधार्रण करते हंै। किसी रेगिस्तान के निवासी के दैनिक कायर् की तुलना, किसी पहाड़ी क्षेत्रा के निवासी के दैनिक कायर् के साथ कीजिए तथा मैदानों में रहने वालों केसाथ भी कीजिए। यह देखा गया है कि एक कृषक समाज को अपने सदस्यों के सामूहिक प्रयासों पर निभर्रहोना पड़ता है। इसके पफलस्वरूप कृषक समाज केसदस्यों में सहयोगशीलता की अभ्िावृिा विकसित हो जाती है तथा वे समूह के हितों को व्यक्ित की इच्छाओं से अिाक महत्वपूणर् समझते हैं। वे अिाकतर प्रवृफति के निकट होते हैं और प्रावृफतिक घटनाओं, जैसे - मानसून पर अिाक निभर्र होते हुए ऐसी स्िथतियों का सामना करते हैं जहाँ प्रावृफतिक संसाधन, जैसे - पानीसीमित मात्रा में उपलब्ध होता है। इसलिए कृषक समाज के सदस्य अपने विश्वासों के प्रति अिाक भाग्यवादी हो जाते हैं। इसके विपरीत, औद्योगिक समाज के सदस्य मुक्त ¯चतन को अिाक मूल्यवान समझसकते हैं, प्रतियोगित्व की अभ्िावृिा विकसित कर सकते हैं तथा अपने साथ घटित होने वाली घटनाओं के संबंध में व्यक्ितगत नियंत्राण का विश्वास विकसित कर लेते हैं। पयार्वरण पर मानव प्रभाव मनुष्य भी अपनी शारीरिक आवश्यकताओं की पूतिर् के लिए और अन्य उद्देश्यों से भी प्रावृफतिक पयार्वरण के उफपर अपना प्रभाव डालते हैं। निमिर्त पयार्वरण के सारे उदाहरण पयार्वरण के उफपर मानव प्रभाव को अभ्िाव्यक्त करते हैं। उदाहरण के लिए, मानव ने जिसे हम ‘घर’ कहते हैं, उसका निमार्ण प्रावृफतिक पयार्वरण को परिवतिर्त करके ही किया जिससे कि उन्हें एक आश्रय मिल सके। मनुष्यों के इस प्रकार के वुफछ कायर् पयार्वरण को क्षति भी पहुँचा सकते हैं और अन्ततः स्वयं उन्हें भी अनेकानेक प्रकार से क्षति पहुँचा सकते हैं। उदाहरण के लिए, मनुष्य उपकरणों का उपयोग करते हैं, जैसे - रेिफजरेटर तथा वातानुवूफलन यंत्रा जो रासायनिक द्रव्य ;जैसे - सी.एपफ.सी. या क्लोरो - फ्रलोरो - काबर्नद्ध उत्पादित करते हैं, जो वायु को प्र्रदूष्िात करते हैं तथा अंततः ऐसे शारीरिक रोगों केलिए उत्तरदायी हो सकते हैं, जैसे - वैंफसर के वुफछ प्रकार। धूम्रपान के द्वारा हमारे आस - पास की वायु प्रदूष्िात होती है तथा प्लास्िटक एवं धातु से बनी वस्तुओं को जलाने से पयार्वरण पर घोर विपदाकारी प्रदूषण पैफलाने वाला प्रभाव होता है। वृक्षों के कटान या निवर्नीकरण के द्वारा काबर्न चक्र एवं जल चक्र में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है। इससे अंततः उस क्षेत्रा विशेष में वषार् के संरूप पर प्रभाव पड़ सकता है और भू - क्षरण तथा मरुस्थलीकरण में वृि हो सकती है। वे उद्योग जो निस्सारी का बहिवार्ह करते हैं तथा इस असंसािात गंदे पानी को नदियों में प्रवाहित करते हैं, इस प्रदूषण के भयावह भौतिक ;शारीरिकद्ध तथा मनोवैज्ञानिक परिणामों से तनिक भी चिंतित प्रतीत नहीं होते हैं। इन अनेक उदाहरणों में क्या मनोवैज्ञानिक संदेश हैं? संदेश यह हैं कि यद्यपि उपयुर्क्त अिाकांश प्रभाव भौतिक हैं ¯कतु मनुष्य ने उन्हें प्रावृफतिक पयार्वरण के उफपर अपने नियंत्राण तथा शक्ित को दशार्ने के लिए ही जनित किया है। इस बात मेंविरोधाभास है कि मानव अपने जीवन की गुणवत्ता को उन्नत बनाने के लिए ही टेक्नोलाॅजी का उपयोग कर प्रावृफतिक पयार्वरण को परिवतिर्त कर रहा है जबकि वास्तविकता यह हैकि वे संभवतः जीवन की गुणवत्ता को और खराब बना रहे हैं। शोर ;दवपेमद्ध, प्रदूषण ;चवससनजपवदद्ध, भीड़ ;बतवूकपदहद्ध तथा प्रावृफतिक विपदाएँ ;दंजनतंस कपेंजमतेद्ध ये सब पयार्वरणी दबावकारकों ;मदअपतवदउमदजंस ेजतमेेवतेद्ध के उदाहरण हैं। ये वे पयार्वरणी उद्दीपक या दशाएँ हैं जो मनुष्यों के प्रति दबाव उत्पन्न करते हैं। जैसा कि आप अध्याय 3 में पढ़ चुके हैं कि दबाव एक अिय मनोवैज्ञानिक स्िथति है जो व्यक्ित में तनाव तथा दु¯श्चता उत्पन्न करती है। अपितु, इन विभ्िान्न दबावकारकों के प्रति मानव प्रतिियाएँ भ्िान्न हो सकती हंै। वुफछ क्षतिकारक पयार्वरणी प्रभाव नीचे वण्िार्त हंैμ शोर कोइर् भी ध्वनि जो खीझ या चिड़चिड़ाहट उत्पन्न करे और अिय हो, उसे शोर कहते हैं। सामान्य अनुभव के आधार पर यह ज्ञात है कि विशेष रूप से दीघर्कालीन शोर कष्टप्रद होता है तथा व्यक्ित में अप्रीतिकर भावदशा उत्पन्न करता है। दीघर्काल तक शोर के समक्ष उद्भासन से सुनने की क्षमता में कमी आ सकती है। इसके अतिरिक्त शोर के समक्ष उद्भासन से मानसिक ियाओं पर निषेधात्मक प्रभाव पड़ता है क्योंकि इससे एकाग्रता कम हो जाती है। आप में से अनेकों ने यह अनुभव उस समय किया होगा जब आप परीक्षा के लिए पढ़ने का प्रयास कर रहे थे और पड़ोसी विवाह के अवसर पर शोर से संगीत बजा रहे थे। कायर् निष्पादन पर शोर के प्रभाव को उसकी तीन विशेषताएँ निधार्रित करती हैं, जिन्हें शोर की तीव्रता ;पदजमदेपजलद्ध, भविष्यकथनीयता ;चतमकपबजंइपसपजलद्ध तथा नियंत्राणीयता ;बवदजतवससंइपसपजलद्ध कहते हैं। मनुष्य पर शोर के प्रभावों पर किए गए क्रमब( शोध प्रदश्िार्त करते हैं कि - ऽ शोर चाहे तीव्र हो या ध्ीमा हो, वह समग्र निष्पादन को तब तक प्रभावित नहीं करता है जब तक कि संपादित किए जाने वाला कायर् सरल हो, जैसे - संख्याओं का योग। ऐसी स्िथतियों में व्यक्ित अनुवूफलन कर लेता है या शोर का ‘आदी’ हो जाता है। ऽ जिस कायर् का निष्पादन किया जा रहा है यदि वह अत्यंत रुचिकर होता है, तब भी शोर की उपस्िथति में निष्पादन प्रभावित नहीं होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कायर् की प्रवृफति व्यक्ित को पूरा ध्यान उसी में लगाने तथा शोर को अनसुना करने में सहायता करती है। यह भी एक प्रकार का अनुवूफलन हो सकता है। ऽ जब शोर वुफछ अंतराल के बाद आता है तथा उसके संबंध में भविष्यकथन नहीं किया जा सकता, तब वह निरंतर होने वाले शोर की अपेक्षा अिाक बाधाकारी प्रतीत होता है। ऽ जिस कायर् का निष्पादन किया जा रहा है, जब वह कठिन होता है या उस पर पूणर् एकाग्रता की आवश्यकता होती है, तब तीव्र, भविष्यकथन न करने योग्य तथा नियंत्रिात न किया जा सवफने वाला शोर निष्पादन स्तर को घटाता है। ऽ जब शोर को सहन करना या बंद कर देना व्यक्ित के नियंत्राण में होता है तब कायर् निष्पादन में त्राुटियों में कमी आती है। ऽ संवेगात्मक प्रभावों के संदभर् में, शोर यदि एक विशेष स्तर से अिाक हो तो उसके कारण चिड़चिड़ापन आता है तथा इससे नींद में गड़बड़ी भी उत्पन्न हो सकती है। यदि शोर पर नियंत्राण किया जा सकता हो या पिफर वह व्यक्ित के व्यवसाय के लिए आवश्यक हो तो इन प्रभावों में कमी आती है। अपितु, अनियंत्राणीय तथा ख्िाझाने वाले शोर के समक्ष निरंतर उद्भासन के कारण मानसिक स्वास्थ्य को भी क्षति पहुँच सकती है। उपयर्ुक्त प्रेक्षणों के आधार पर यह निष्कषर् निकाला जा सकता है कि शोर के दबावपूणर् प्रभाव केवल उसके तीव्र या मिम होने से ही निधार्रित नहीं होते बल्िक इससे भी निधार्रित होते हैं कि व्यक्ित उसके प्रति किस सीमा तक अनुवूफलनकरने में समथर् है, निष्पादन किए जाने वाले कायर् की प्रकृति क्या है तथा क्या शोर के संबंध में भविष्यकथन किया जा सकता है और क्या उसे नियंत्रिात किया जा सकता है? प्रदूषण पयार्वरणी प्रदूषण वायु, जल तथा भूमि प्रदूषण के रूप में हो सकता है। अवश्िाष्ट पदाथर् या वूफड़ा जो घरों या उद्योगों से आतेहैं वे वायु, जल तथा भूमि प्रदूषण के बड़े ड्डोत हैं। वैज्ञानिक इस तथ्य को भली - भाँति जानते हैं कि किसी भी प्रकार का प्रदूषण शारीरिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होता है। अपितु, वुफछ शोध अध्ययनों ने इन प्रदूषणों के प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष मनोवैज्ञानिक प्रभावों को प्रदश्िार्त किया है। यह समझना चाहिए कि सामान्यतः किसी भी प्रकार का पयार्वरणी प्रदूषण तंत्रिाका तंत्रा को प्रभावित कर सकता है क्योंकि विषैले द्रव्य/पदाथर् उस सीमा तक मनौवैज्ञानिक प्रियाओं को प्रभावित कर सकते हैं। प्रदूषण के प्रभाव का एक अन्य स्वरूप प्रदूषण के प्रति उन सांवेगिक प्रतिियाओं में दृष्िटगत होता है जो अस्वस्थता उत्पन्न करता है, जिसके परिणामस्वरूप कायर् - वुफशलता में कमी और कायर् में अभ्िारुचि कम हो जाती है तथा दु¯श्चता का स्तर बढ़ जाता है। प्रायः लोग ऐसे स्थानों पर कायर् करना और रहना पसंद नहीं करते जहाँ वूफड़ा पैफला रहता हो या निरंतर दुग±ध व्याप्त हो। इसी प्रकार से वायु में धूल के कणों या अन्य निंलबित कणों के कारण दम घुटने का आभास तथा श्वास लेने में कठिनाइर् हो सकती है, जिससे वास्तव में श्वसन - तंत्रा संबंिात विकार भी उत्पन्न हो सकते हैं। वे व्यक्ित जो इस प्रकार की अस्वस्थता का अनुभव करते हैं, अपने कायर् पर पूरा ध्यान नहीं दे पाते या प्रसन्न भावदशा में नहीं रह पाते। वायु प्रदूषण के विश्िाष्ट मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी वुफछ शोधकतार्ओं द्वारा बताए गए हैं। उदाहरण के लिए कोलकाता के एक क्षेत्रा में वायु प्रदूषण के प्रति, एक ऐसा समूह जो औद्योगिक क्षेत्रा के निकट रहता था तथा एक दूसरा समूह जो औद्योगिक क्षेत्रा से दूर आवासीय क्षेत्रा में रहता था, उनकी मनोवैज्ञानिक प्रतिियाओं की तुलना की गइर्। जो समूह औद्योगिक क्षेत्रा में रहता था उसने दूसरे समूह, जो औद्योगिक क्षेत्रा से दूर आवासीय क्षेत्रा में रहता था, की अपेक्षा अिाक तनाव तथा और दु¯श्चता का अनुभव करने की बात स्वीकार की। जमर्नी में किए गए एक अध्ययन में ऐसे प्रदूषणकारी तत्व, जैसे - वायु में सल्पफर डाइआॅक्साइड की उपस्िथति द्वारा किसी कायर् पर ध्यान को वेंफित करने की योग्यता में न्यूनता तथा निष्पादन - दक्षता का नीचे गिरना पाया गया। खतरनाक रासायनिक द्रव्यों के रिसाव के कारण होने वाले प्रदूषण द्वारा अन्य प्रकार की क्षतियाँ हो सकती हैं। दिसंबर 1984 में हुइर् भोपाल गैस त्रासदी, जिसमें अनेक जानें गईं, भी गैस अपने पीछे अनेक मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ गइर्। अनेक ऐसे व्यक्ित जिन्होंने विषैली गैस मिथाइल आइसो साइनेट ;एम.आइर्.सी., डप्ब्द्ध तथा अन्य द्रव्य सूँघ लिए थे, उनमें स्मृति, अवधन तथा जागरूकता संबंधी गड़बडि़याँ पाइर् गईं।घर तथा दफ्रतर के पयार्वरण ;भीतरी पयार्वरणद्ध में भी हानिकारक वायु प्रदूषण हो सकता है। उदाहरण के लिए तंबावूफ पीने के धुएँ से होने वाले प्रदूषण यानी सिगरेट, सिगार या बीड़ी पीने से होने वाले प्रदूषण के कारण भी मनोवैज्ञानिक प्रभाव हो सकते हैं। ऐसे प्रभाव सिगरेट पीने वाले व्यक्ित के लिए अिाक होते हैं, तथापि जो इस तंबावूफ के धुआँ में श्वास लेता है ;निष्िक्रय ध्रूमपानद्ध, वह भी निषेधात्मक प्रभावों को भुगतता है। एक शोधकतार् ने पाया कि तंबावूफ का धुआँ श्वास के साथ भीतर खींचना व्यक्ित में आक्रामकता के स्तर को बढ़ा सकता है। प्रदूषणकारी द्रव्यों की जल तथा मृदा ;भूमिद्ध में उपस्िथति शारीरिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। इनमें से वुफछ रसायनों का खतरनाक मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी होता है। वुफछ विश्िाष्ट रसायनों, जैसे - सीसा की उपस्िथति मस्ितष्क के विकास को प्रभावित कर मानसिक मंदन का कारण बन सकती है। इस प्रकार के विषैले द्रव्य मानव को विभ्िान्न मागो± से प्रभावित कर सकते हैं, जैसे - पानी द्वारा या मृदा के द्वारा उन साग - सब्िजयों में सोख लिए जाते हैं जो प्रदूष्िात भूमि पर उगाइर् जाती हैं। विषाक्तता का दूसरा ड्डोत घरों तथा उद्योगों से निकलने वाले ऐसे अवश्िाष्ट पदाथर् या वूफड़ा - करकट हैं जो जैविक रूप से क्षरणशील नहीं होते। इस प्रकार के अवश्िाष्ट पदाथो± के सामान्य उदाहरण प्लास्िटक, टीन तथा धातु से बने पात्रा हैं। इस प्रकार के अवश्िाष्ट पदाथो± को नष्ट करने या जलाने के लिए विश्िाष्ट तकनीकों का उपयोग करना चाहिए तथा धुएँ को जनसाधारण के श्वसन िया में आने वाली वायु में नहीं छोड़ना चाहिए। सामान्यतः, ऐसे पयार्प्त प्रमाण हैं जो यह प्रदश्िार्त करते हैं कि वायु, जल तथा मृदा में विषैले रसायनों के हानिकारक प्रभाव न केवल सामान्य मनोवैज्ञानिक प्रकायो± पर पड़ते हैं बल्िक उनके कारण गंभीर मानसिक विकार भी उत्पन्न हो सकते हैं। अतः इसमें बिलवुफल संशय नहीं है कि प्रत्येक रूप में प्रदूषण को नियंत्रिात करने की आवश्यकता है। भीड़ हम में से अिाकांश भीड़ से परिचित हैं जो कि व्यक्ितयों के बड़े अनौपचारिक समूह होते हैं और जो अस्थायी रूप से किसी विश्िाष्ट लक्ष्य या उद्देश्य के बिना ही एक साथ एकत्रिात होते हैं। उदाहरण के लिए, जब कोइर् प्रसि( व्यक्ित अचानक सड़क पर दिखाइर् देता है तो वे लोग जो उस स्िथति में वहाँ पर उपस्िथत होते हैं, प्रायः केवल उस व्यक्ित को देखने के लिए ही एकत्रिात हो जाते है। ¯कतु भीड़ ;बतवूकपदहद्ध का भ्िान्न अथर् है। इसका संदभर् उस असुस्थता की भावना से है जिसका कारण यह है कि हमारे आस - पास बहुत अिाक व्यक्ित या वस्तुएँ होती हैं जिससे हमें भौतिक बंधन की अनुभूति होती है तथा कभी - कभी वैयक्ितक स्वतंत्राता में न्यूनता का अनुभव होता है। एक विश्िाष्ट क्षेत्रा या दिव्फ में बड़ी संख्या में व्यक्ितयों की उपस्िथति के प्रति व्यक्ित की प्रतििया ही भीड़ कहलाती है। जब यह संख्या एक निश्िचत स्तर से अिाक हो जाती है तब इसके कारण वह व्यक्ित जो इस स्िथति में पँफस गया है दबाव का अनुभव करता है। इस अथर् में भीड़ भी एक पयार्वरणी दबावकारक का उदाहरण है। भीड़ के अनुभव के निम्नलिख्िात लक्षण होते हैंμ ऽ असुस्थता की भावना, ऽ वैयक्ितक स्वतंत्राता में न्यूनता या कमी, ऽ व्यक्ित का अपने आस - पास के परिवेश के संबंध भीड़ के दबावपूणर् प्रभाव तभी पूणर्तः समझे जा सकते में निषेधात्मक दृष्िटकोण तथा हैं जब हम उसके परिणामों का अवलोकन करें। भीड़ ऽ सामाजिक अंतःिया पर नियंत्राण के अभाव की भावना। एवं अिाक घनत्व पर जो अनेक अध्ययन भारत तथा अन्य हमारे देश में अनेक मनोवैज्ञानिकों ने भीड़ के मनोवैज्ञानिक परिणामों का व्यवस्िथत अध्ययन कइर् भारतीय नगरों, जैसे - इलाहाबाद, अहमदाबाद, पुणे, वाराणसी तथा जयपुर एवं राजस्थान के वुफछ ग्रामीण क्षेत्रों में कियाहै। भीड़ के ऊपर इनमें से वुफछ शोध अन्वेषण मनोवैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में किए गए हैं ¯कतु उनसे अिाक अध्ययन सामान्य जीवन में सामने आने वाली परिस्िथतियों, जैसे - घर, दफ्रतर, यातायात, आॅटोरिक्शा जैसे सावर्जनिक परिवहन साधनों, सिनेमाघरों इत्यादि में किए गए हैं। हमारे देश की इतनी बड़ी जनसंख्या है कि यहाँ भीड़ अन्य कम जनसंख्या वाले देशों की तुलना में कहीं अिाक है। इस विशेषता ने वुफछ विदेशी मनोवैज्ञानिकों की भीड़ के मनोवैज्ञानिक प्रभावों का अध्ययन भारत में करने के लिए प्रेरित किया है। यह ज्ञातव्य है कि भीड़ की अनुभूति केवल बड़ी संख्या में जनसमुदाय मात्रा से अथवा केवल स्थानाभाव से नहीं होती। यह घनत्व ;कमदेपजलद्ध से संब( है अथार्त किसी उपलब्ध स्थान में व्यक्ितयों की संख्या। उदाहरण के लिए यदि किसी रेल के डिब्बे में चार व्यक्ितयों की सीट या स्थान पर पंद्रह व्यक्ित ध्क्कम - ध्क्का कर बैठने का प्रयास करें तो प्रत्येक व्यक्ित को भीड़ की अनुभूति होने की संभावना है। इन्हीं पंद्रह व्यक्ितयों को एक बड़े हाॅल में बैठा दीजिए तो किसी को भीड़ की अनुभूति नहीं होगी। कोइर् व्यक्ित यह प्रश्न उठा सकता है - क्या भीड़ का अनुभव सदैव अिाक घनत्व वाली स्िथतियों में ही होता है तथा क्या सभी व्यक्ित उसके निषेधात्मक प्रभाव समान सीमा तक ही अनुभव करते हैं? यदि आपने दोनों प्रश्नोंका उत्तर ‘नहीं’ दिया है तो आप सही हैं। जब हम किसी मेले या विवाह उत्सव में जाते हैं तो प्रायः भौतिक विन्यास में अिाक घनत्व होता है तथा हम उसी रूप में उसका आनंद लेते हैं। अंततः कोइर् मेला या विवाहोत्सव क्या होगा यदि वहाँ बहुत कम व्यक्ित हों? दूसरी ओर, यदि एक छोटे कक्ष का बहुत सारे व्यक्ित साझा उपयोग कर रहे हैं तो सबको ही परेशानी का अनुभव होता है। देशों में किए गए हैं उनके प्रभावों के वणर्न का सारांश नीचे दिया जा रहा है - ऽ भीड़ तथा अिाक घनत्व के परिणामस्वरूप अपसामान्य व्यवहार तथा आक्रामकता उत्पन्न हो सकते हैं। अनेक वषो± पूवर् चूहों पर किए गए एक शोध में यह परिलक्ष्िात हुआ था। इन प्राण्िायों को एक बाडे़ में रखा गया, प्रारंभ में यह कम संख्या में थे। इस बंद स्थान में जैसे - जैसे उनकी जनसंख्या बढ़ने लगी, उनमें आक्रामक तथा विचित्रा व्यवहार प्रकट होने लगे, जैसे - दूसरे चूहों की पूँछ काट लेना। यह आक्रामक व्यवहार इस सीमा तक बढ़ा कि अंततः ये प्राणी बड़ी संख्या में मर गए जिससे बाड़े में उनकी जनसंख्या पिफर कम हो गइर्। मनुष्यों में भी जनसंख्या वृि के साथ कभी - कभी ¯हसात्मक अपराधों में वृि पाइर् गइर् है। ऽ भीड़ के पफलस्वरूप उन कठिन कायो± का, जिनमें संज्ञानात्मक प्रियाएँ निहित होती हैं, निष्पादन निम्न स्तर का हो जाता है तथा स्मृति और संवेगात्मक दशा पर इसका प्रतिवूफल प्रभाव पड़ता है। ये निषेधात्मक प्रभाव उन व्यक्ितयों में अल्प मात्रा में परिलक्ष्िात होते हैं जो भीड़ वाले परिवेश के आदी होते हैं। ऽ वे बच्चे जो अत्यिाक भीड़ वाले घरों में बड़े होते हैं, वे निचले स्तर के शैक्ष्िाक निष्पादन प्रदश्िार्त करते हैं। यदि वे किसी कायर् पर असपफल होते हैं तो उन बच्चों की तुलना में जो कम भीड़ वाले घरों में बढ़तेहैं, उस कायर् पर निरंतर काम करते रहने की प्रवृिा भी उनमें दुबर्ल होती है। अपने माता - पिता के साथ वे अिाक द्वंद्व का अनुभव करते हैं तथा उन्हें अपने परिवार से भी कम सहायता प्राप्त होती है। ऽ सामाजिक अंतःिया की प्रकृति भी यह निधार्रित करती है कि व्यक्ित भीड़ के प्रति किस सीमा तक प्रतििया करेगा। उदाहरण के लिए यदि अंतःिया किसी आनंददायक सामाजिक अवसर पर होती है, जैसे - किसी प्रीतिभोज अथवा सावर्जनिक समारोह में, तब संभव है कि उसी भौतिक स्थान में बड़ी संख्या में अनेक लोगों की उपस्िथति कोइर् भी दबाव उत्पन्न न करे। बल्िक, इसके पफलस्वरूप सकारात्मक सांवेगिक प्रतिियाएँ हो सकती हैं। इसके साथ ही, भीड़ भी सामाजिक अंतःिया की प्रवृफति को प्रभावित करती है। ऽ व्यक्ित भीड़ के प्रति जो निषेधात्मक प्रभाव प्रदश्िार्त करते हैं, उसकी मात्रा में व्यक्ितगत भ्िान्नताएँ होती हैं तथाउनकी प्रतिियाओं की प्रकृति में भी भेद होता है। इन व्यक्ितगत भ्िान्नताओं को समझाने के लिए दो प्रकार की सहिष्णुता का उल्लेख किया जा सकता है अथार्त भीड़ सहिष्णुता ;बतवूकपदह जवसमतंदबमद्ध तथा प्रतिस्पधार् सहिष्णुता ;बवउचमजपजपवद जवसमतंदबमद्ध। भीड़ सहिष्णुता, अिाक घनत्व या भीड़ वाले पयार्वरण के साथ मानसिक रूप से संयोजन करने की योग्यता को संद£भत करती है, जैसेμ घर के भीतर भीड़ ;एक छोटे कमरे में बड़ी संख्या में लोगद्ध। जो लोग ऐसे पयार्वरण के आदी होते हैं जिसमें अनेक व्यक्ित उनके चारों ओर रहते ही हैं ;उदाहरण के लिए वे व्यक्ित जो एक बड़े परिवार में पलकर बड़े हो रहे हैं तथा परिवार एक छोटे मकान में रहता हैद्ध, वे उन लोगों की अपेक्षा जिन्हें अपने आस - पास केवल वुफछ ही व्यक्ितयों के रहने की आदत होती है, भीड़ सहिष्णुता अिाक विकसित कर लेते हैं। हमारे देश की जनसंख्या विशाल है तथा अनेक व्यक्ित बड़े परिवारों में परंतु छोटे मकानों में रहते हैं। इसके कारण यह प्रत्याशा होती है कि सामान्यतः भारतीयों में भीड़ सहिष्णुता कम जनसंख्या वाले देशों के वासियों की अपेक्षा अिाक होगी। प्रतिस्पधार् सहिष्णुता, वह योग्यता है जिसके द्वारा कोइर् व्यक्ित उस स्िथति को भी सह लेता है जिसमें उसे मूल संसाधनों यहाँ तक कि भौतिक स्थान के लिए भी अनेक व्यक्ितयों के साथ प्रतिस्पधार् ;प्रतियोगिताद्ध करनी पड़ती है। चूँकि भीड़ की स्िथति में संसाधनों के लिए अिाक प्रतिस्पधार् की संभावना होती है इसलिए उस स्िथति के प्रति प्रतििया भी संसाधनों के लिए प्रतिस्पधार् सहिष्णुता से प्रभावित होगी। ऽ सांस्वृफतिक विशेषताएँ यह निधार्रित कर सकती हैं कि एक विश्िाष्ट पयार्वरण आत्मनिष्ठ ;व्यक्ितपरकद्ध रूप में किस सीमा तक अिाक भीड़ या कम भीड़ वाला निणीर्त होगा। वे भीड़ के प्रति निषेधात्मक प्रतिियाओं की प्रवृफति तथा मात्रा को भी प्रभावित कर सकती है। उदाहरण के लिए जिन संस्कृतियों में जो व्यक्ितसे अिाक समूह या समष्िट के महत्त्व को रेखांकित करती हैं, उनमें व्यक्ित के परिवेश में अिाक व्यक्ितयों की उपस्िथति को अवांछनीय स्िथति नहीं माना जाताहै। दूसरी ओर, वे संस्कृतियाँ जो व्यक्ित को समूहया समष्िट से अिाक महत्त्व देती हैं, उनमें व्यक्ित के परिवेश में अनेक व्यक्ितयों की उपस्िथति उसके लिए असुविधाजनक होती है। परंतु, समग्र रूप से,चाहे संस्कृति में समूह को व्यक्ित से अिाक महत्त्व दिया जाता हो या इसके ठीक विपरीत, यह तो स्पष्टहै कि सभी संस्कृतियों में भीड़ को दबावपूणर् ही अनुभव किया जाता है। ऽ व्यक्ितगत स्थान ;चमतेवदंस ेचंबमद्ध या वह सुविधाजनक भौतिक स्थान जिसे व्यक्ित अपने आस - पास बनाए रखना चाहता है, अिाक घनत्व वाले पयार्वरण से प्रभावित होता है। भीड़ में व्यक्ितगत स्थान प्रतिबंिात हो जाता है तथा यह भी भीड़ के प्रति निषेधात्मक प्रतिियाओं का कारण हो सकता ह।ैहमें अनेक ऐसे उदाहरण प्राप्त होते हैं जिनमें लोग भौतिक पयार्वरण के प्रति व्यक्ितगत स्थान के संदभर् में प्रतििया करते हैं। सामाजिक स्िथतियों में मनुष्य जिन व्यक्ितयों के साथ अंतःिया कर रहा होता है उनके साथ एक विशेष भौतिक ;शारीरिकद्ध दूरी बनाए रखना चाहता है। इसे अंतवैर्यक्ितक भौतिक दूरी ;पदजमतचमतेवदंस चीलेपबंस कपेजंदबमद्धए कहते हैं। यह एक अिाक व्यापक व्यक्ितगत स्थान के संप्रत्यय का भाग है अथार्त वह भौतिक स्थान जिसे हम अपने आस - पास बनाए रखना चाहते हैंऋ जैसाकि पहले वणर्न किया जा चुका है, भीड़ के प्रति निषेधात्मक प्रतििया का एक कारण व्यक्ितगत स्थान में कमी है। लोगों,स्िथतियों, परिवेशों तथा संस्कृतियों में व्यक्ितगत स्थान में भ्िान्नताएँपाइर् जाती हैं। वुफछ औसत दूरियाँ विश्िाष्ट संस्कृतियों में प्रेक्ष्िात की गइर् हैं। स्िथति पर निभर्रता के आधार पर चार प्रकार वफी अंतवैर्यक्ितक भौतिक दूरियों को एडवडर् हाॅल ;म्कूंतक भ्ंससद्ध नामक मानवविज्ञानी ने बताया है - ऽ अंतरंग दूरी ;18 इंच तकद्ध .यह वह दूरी है जो आप तब बनाकर रखते हैं जब आप किसी से निजी बातचीत करते हैं या किसी घनिष्ठ मित्रा या संबंधी के साथ अंतःिया करते हैं। ऽ व्यक्ितगत दूरी ;18 इंच से 4 पुफटद्ध - यह वह दूरी है जो आप तब बनाकर रखते हैं जब आप किसी घनिष्ठ मित्रा या संबंध्ी के साथ एवैफक अंतःिया करते हैं या पिफर कायर् स्थान अथवा दूसरे सामाजिक स्िथति में किसी ऐसे व्यक्ित से अकेले में बात करते हैं जो आप का बहुत अंतरंग नहीं है। ऽ सामाजिक दूरी ;4 इंच से 10 पुफटद्ध - यह वह दूरी है जो आप उन अंतःियाओं में बनाते हैं जो औपचारिक होते हैं, अंतरंग नहीं। ऽ सावर्जनिक दूरी ;10 पफीट से अनंत तकद्ध - यह वह दूरी है जो आप औपचारिक स्िथति में, जहाँ बड़ी संख्या में लोग उपस्िथत हों बनाकर रखते हैं। उदाहरण के लिए किसी सावर्जनिक वक्ता से श्रोताओं की या कक्षा में अध्यापक की दूरी होती है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि ये दूरियाँ स्वेच्छा से बनाकर रखी जाती हैं तथा ये अंतःिया में लिप्त व्यक्ितयों की सुविधा को ध्यान में रखकर बनाइर् जाती हैं। तथापि,जब स्थान की कमी होती है तो व्यक्ित परस्पर अपेक्षाकृत छोटी भौतिक दूरियों को बलात् ही ;बाध्य होकरद्ध अपनातेहैं ;उदाहरण के लिए लिफ्रट में या रेलगाड़ी के डिब्बे में जहाँ बहुत अिाक व्यक्ित होते हैंद्ध। ऐसे जकड़े हुए स्थानों में व्यक्ित को भीड़ की अनुभूति होने की प्रबल संभावना होती है, यद्यपि वस्तुनिष्ठ रूप में व्यक्ितयों की संख्या बहुत अिाक नहीं है। संक्षेप में, व्यक्ित भौतिक पयार्वरण के एक अंश के रूप में उपलब्ध स्थान के प्रति व्यवहार करते हैं। जब आवागमन की स्वतंत्राता, वैयक्ितक स्वतंत्राता का बोध् तथा व्यक्ितगत स्थान की आवश्यकता सामान्य रूप से बने नहीं रह पाते हैं, तब व्यक्ित को दबाव का अनुभव होता है तथा वह निषेधात्मक प्रतििया देता है - वह खराब भावदशा में रहता है या आक्रामकता प्रदश्िार्त करता है तथा जितनी शीघ्रता से संभव हो उस स्िथति से बाहर निकलने का प्रयास करता है। व्यक्ितगत स्थान का संप्रत्यय निम्नलिख्िात कारणों से महत्वपूणर् है। पहला, यह भीड़ के निषेधात्मक प्रभावों को एक पयार्वरणी दबावकारक के रूप में समझाता है। दूसरा, यह हमें सामाजिक संबंधों के बारे में बताता है। उदाहरण के लिए, दो व्यक्ित यदि एक - दूसरे के काप़्ाफी निकट खड़े या बैठे हों तो उनका प्रत्यक्षण मित्रा या संबंधी के रूप में होता है। जब आप विद्यालय के पुस्तकालय में जाते हैं और यदि आपका मित्रा जिस मेश पर बैठा है उसके निकट का स्थान खाली है तो आप उसके निकट के स्थान पर ही बैठते हैं। ¯कतु यदि उस मेश पर कोइर् अपरिचित व्यक्ित बैठा है और उसके निकट स्थान खाली है तो इस बात की संभावना कम है कि आप उस व्यक्ित के निकट के स्थान पर बैठेंगे। तीसरा, हमें वुफछ सीमा तक यह ज्ञात होता है कि भौतिक स्थान को किस प्रकार परिवतिर्त किया जा सकता है जिससे कि सामाजिक स्िथतियों में दबाव अथवा असुविधा में कमी की जा सके अथवा सामाजिक अंतःिया को अिाक आनंददायक तथा उपयोगी बनाया जा सके। यहाँ वुफछ सरल उदाहरण दिए जा रहे हैं। मान लीजिए कि आपके विद्यालय के कमर्चारियों को निणर्य करना है कि वुफसिर्यों को वैफसे व्यवस्िथत किया जाए जब कि ;कद्ध विद्यालय में कोइर् सामाजिक अवसर, जैसे - कोइर् सांस्कृतिक कायर्क्रम है, ;खद्ध अभ्िाभावकों तथा अध्यापकों के बीच बैठक है तथा ;गद्ध विद्याथ्िार्यों और अध्यापकों को संबोिात करने के लिए कोइर् अतिथ्िा वक्ता आ रहे हैं। क्या तीनों परिस्िथतियों में वुफसिर्यों की व्यवस्था एक जैसी होनी चाहिए? यदि आप ियाकलाप 8ण्1 का संचालन करेंगे तो आपको और भी यह ज्ञात हो सकेगा कि भीड़ रहित स्िथतियों में व्यक्ित किस प्रकार की बैठने की व्यवस्थाओं को चुनते हंै। प्राकृतिक विपदाएँ शोर, अनेक प्रकार के प्रदूषण तथा भीड़ ऐसे पयार्वरणी दबावकारक हैं जो मानव व्यवहार के परिणाम हैं। इनकेविपरीत, प्राकृतिक विपदाएँ ऐसे दबावपूणर् अनुभव हैं जोकि प्रकृति के प्रकोप के परिणाम हैं अथार्त जो प्राकृतिक पयार्वरण में अस्तव्यस्तता के परिणामस्वरूप उत्पन्न होतेहैं। प्राकृतिक विपदाओं के सामान्य उदाहरण भूकंप, सुनामी, बाढ़, तूप़्ाफान तथा ज्वालामुखीय उद्गार हैं। अन्य विपदाओं के भी उदाहरण मिलते हैं, जैसे - यु(, औद्योगिक दुघर्टनाएँ ;जैसेμ औद्योगिक कारखानों में विषैली गैस अथवा रेडियो - सिय तत्वों का रिसावद्ध अथवा महामारी ;उदाहरण के लिए, प्लेग जिसने 1994 में हमारे देश के अनेक क्षेत्रों में तबाही मचाइर् थीद्ध। ¯कतु, यु( तथा महामारी मानव द्वारा रचित घटनाएँ हैं, यद्यपि उनके प्रभाव भी उतने हीगंभीर हो सकते हैं जैसे कि प्राकृतिक विपदाओं के। इन घटनाओं को ‘विपदा’ इसलिए कहते हैं क्योंकि इन्हें रोका नहीं जा सकता, प्रायः ये बिना किसी चेतावनी के आतीहैं तथा मानव जीवन एवं संपिा को इनसे अत्यिाक क्षति पहँुचती है। दुखद यह है कि ये मनोवैज्ञानिक विकार,जिसे अभ्िाघातज उत्तर दबाव विकार कहते हैं, का भी कारण बनते हैं। विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी अब पयार्प्त रूप से विकसित हो चुके हैं जिससे मानव को इन घटनाओंकी भविष्यवाणी करना संभव हो गया है। पिफर भी प्राकृतिक विपदाओं के मनोवैज्ञानिक प्रभावों को समझने तथा उनके प्रतिकार के उपाय ढूँढ़ने की आवश्यकता है। प्राकृतिक विपदाओं के प्रभाव क्या हैं? पहला, उनके पश्चात सामान्य जन निधर्नता की चपेट में आ जाते हैं, बेघर तथा संसाधन रहित हो जाते हैं और अक्सर इसके साथ - साथ जिन सब वस्तुओं पर उनका स्वामित्व था, वहसब भी क्षतिग्रस्त तथा नष्ट हो जाती हैं। दूसरा, धन - संपिा तथा ियजनों के अचानक लुप्त या खो जाने से व्यक्ित स्तब्ध तथा भौचक हो जाते हैं। यह सब एक गहन मनोवैज्ञानिकविकार को उत्पन्न करने के लिए पयार्प्त होता है। प्राकृतिक विपदाएँ अभ्िाघातज अनुभव ;जतंनउंजपब मगचमतपमदबमेद्ध होते हैं, अथार्त विपदा के पश्चात जीवित व्यक्ितयों के लिए सांवेगिक रूप से आहत करने वाले तथा स्तब्ध कर देनेवाले होते हैं। अभ्िाघातज उत्तर दबाव विकार ;पी.टी.एस.डी.द्ध एक गंभीर मनोवैज्ञानिक समस्या है जो अभ्िाघातज घटनाओं,जैसे - प्राकृतिक विपदाओं के कारण उत्पन्न होती है। इस विकार के निम्नलिख्िात लक्षण हैंμ ऽ किसी विपदा के प्रति तात्कालिक प्रतििया सामान्यतः अनभ्िाविन्यास ;आत्म - विस्मृतिद्ध की होती है। सामान्य जन को यह समझने में वुफछ समय लगता है कि इस विपदा का पूरा अथर् क्या है तथा इसने उनके जीवन में क्या कर दिया है। कभी - कभी वे स्वयं अपने से यह स्वीकार नहीं करते कि उनके साथ कोइर् भयंकर घटना घटी है। इन तात्कालिक प्रतिियाओं के पश्चात शारीरिक प्रतिियाएँ होती हैं। ऽ शारीरिक प्रतिक्रयाएँ - जैसे, बिना कायर् किए भी शारीरिक परिश्रंाति, निद्रा में कठिनाइर्, भोजन के संरूप में परिवतर्न, हृदयगति और रक्तचाप में वृि तथा एकाएक चैंक पड़ना पीडि़त व्यक्ितयों में सरलता से दृष्िटगत होते हैं। ऽ सांवेगिक प्रतिियाएँ, जैसे - शोक एवं भय, चिड़चिड़ापन, क्रोध ;फ्यह मेरे ही साथ क्यों घटित हुआ?य्द्ध असहायता की भावना, निराशा ;फ्इस घटना का निवारण करने के लिए मैं वुफछ न कर सका/सकीय्द्ध अवसाद, कभी - कभी पूणर् संवेग - शून्यता ;सुन्नताद्ध, अपराध - भावना कि व्यक्ित स्वंय जीवित है जबकि परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो गइर्, स्वयं अपने को दोना ेष दतथा जीवन के नेमी ियाकलापों ;तवनजपदम ंबजपअपजपमेद्ध में भी अभ्िारुचि का अभाव। ऽ संज्ञानात्मक प्रतिक्रयाएँ, जैसे - आवुफलता, एकाग्रता में कठिनाइर्, अवधान विस्तृति में कमी, संभ्रम, स्मृतिलोप या ऐसी सुस्पष्ट स्मृतियाँ जो वांछित नहीं है ;अथवा, घटना का दुःस्वप्नद्ध। ऽ सामाजिक प्रतिियाएँ, जैसे - दूसरों से विनिवतर्न ;ूपजीकतंूंसद्ध, दूसरों के साथ द्वंद्व, ियजनों के साथ भी अक्सर विवाद और अस्वीवृफत महसूस करना या अलग - थलग पड़ जाना। यह आश्चयर्जनक है किअक्सर वुफछ उत्तरजीवी, दबाव के प्रति प्रबल सांवेगिक प्रतिियाओं के मध्य में भी, वास्तव में स्वस्थ होने की प्रिया में दूसरों के लिए सहायक होते हैं। इन अनुभवों का सामना करने के बाद भी जीवित बच जाने तथा अपना अस्ितत्व बचाए रखने से ये व्यक्ित जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्िटकोण विकसितकर लेते हैं तथा तदनुभूति के द्वारा, इस अभ्िावृिाको दूसरे उत्तरजीवियों में विकसित कराने में समथर् हो जाते हैं। ये प्रतिियाएँ दीघर्काल तक चलती रह सकती हैं, यहाँ तक कि वुफछ दशाओं में तो जीवनपय±त भी चलती हैं। ¯कतु उपयुक्त परामशर् तथा मनोरोग - उपचार के द्वारा पी.टी.एस.डी. में सुधार कम से कम इस सीमा तक किया जा सकता है कि पीडि़त व्यक्ितयों को अभ्िाप्रेरित किया जा सके एवं उनकी सहायता की जा सके ताकि वे नए जीवन का प्रारंभ कर सवेंफ। निधर्न व्यक्ित, वे महिलाएँजिनके संबंधी हताहत हो गए हैं तथा प्राकृतिक विपदाओंके उत्तरजीवी अनाथ बच्चों को विशेष उपचार एवं देखभाल की आवश्यकता होती है। जैसा कि अन्य पयार्वरणीदबावकारकों के विषय में सत्य है, प्राकृतिक विपदाओं के प्रति भी लोग भ्िान्न स्तर की तीव्रता वाली प्रतिियाएँ करते हैं। सामान्यतः प्रतििया की तीव्रता निम्नलिख्िात तत्वों से प्रभावित होती हैμ ऽ विपदा की तीव्रता तथा उसके द्वारा की गइर् क्षति ;संपिा एवं जीवन दोनों के संबंध् मेंद्ध, ऽ व्यक्ित की सामना करने की सामान्य योग्यता तथा ऽ विपदा के पूवर् अन्य दबावपूणर् अनुभव। उदाहरण के लिए, जिन व्यक्ितयों ने पहले भी दबावपूणर् स्िथतियों का अनुभव किया है उन्हें पिफर एक और कठिन और दबावपूणर् स्िथति से निपटने में अिाक कठिनाइर् हो सकती है। यद्यपि हम जानते हैं कि अिाकांश प्राकृतिक विपदाओं की केवल सीमित स्तर तक ही भविष्यवाणी की जा सकती है ¯कतु उनके विध्वंशक परिणामों को कम करने हेतु कइर् प्रकार की तैयारी की जा सकती है, जैसेμ ;कद्ध चेतावनी, ;खद्ध सुरक्षा उपायों के द्वारा जो घटना के तुरंत बाद किए जा सवेंफ तथा ;गद्ध मनोवैज्ञानिक विकारों के उपचार द्वारा। ये उपाय प्रायः सामुदायिक स्तर पर किए जाते हैं तथा निम्नलिख्िात हैंμ ऽ चेतावनी - यदि आप पिछले वुुफछ समय से रेडियो सुनते रहे हैं तो आपने ऐसे विज्ञापनों को सुना होगाजिनमें यह बताया जाता है कि लोगों को यदि प्राकृतिक विपदाओं, जैसेμ बाढ़ की संभावना हो तो क्या करना उचित है। जब तूपफान या समुद्र में ज्वार का भविष्यकथऩकिया जाता है तब मछुआरों को समुद्र में न जाने के सुझाव दिए जाते हैं। ऽ सुरक्षा उपाय - यह दुभार्ग्यपूणर् है कि वुफछ प्राकृतिक विपदाओं, जैसेμ भूवंफप में यदि भविष्यवाणी कर भी दी जाए तब भी घटनाएँ इतनी आकस्िमक होती हैं कि लोगों को चेतावनी देना तथा उन्हें मानसिक रूप से तैयार करना संभव नहीं हो पाता है। इसलिए पहले से ही वुफछ संकेत ;सुझावद्ध इस संबंध में दे दिए जाते हैं कि यदि भूवंफप आ जाए तो क्या किया जाना चाहिए। ऽ मनोवैज्ञानिक विकारों का उपचार - इसके अंतगर्त स्वावलंबन उपागम तथा व्यावसायिक उपचार दोनों ही निहित होते हैं। अक्सर सवर्प्रथम लोगों को भौतिक सहायता, जैसे - भोजन, वस्त्रा, औषिा तथा उपचार,शरण या आश्रय तथा वित्तीय सहायता इत्यादि प्रदान करना आवश्यक होता है। वैयक्ितक तथा समूह परामशर् इसके बाद अगला सोपान है। इसके अनेकप्रकार हो सकते हैं, जैसेμ उत्तरजीवियों को अपने अनुभव तथा सांवेगिक दशाओं का वणर्न करने के लिए प्रोत्साहित करना तथा उनके सांवेगिक घावों को भरने के लिए समय प्रदान करना। वुफछ विशेषज्ञों जो पी.टी.एस.डी. का उपचार करते हैं, के अनुसारएक प्रमुख अभ्िावृिा जिसे उत्तरजीवियों में विकसित करने की आवश्यकता होती है, वह है आत्म - सक्षमता ;ेमस.िमपििबंबलद्ध अथार्त यह विश्वास कि फ्मैं यह कर सकता/सकती हँूय् या फ्मैं इस दशा से सपफलतापूवर्क बाहर निकल सकता/सकती हँूय्। जिन व्यक्ितयों में तीव्र दबाव प्रतिियाएँ परिलक्ष्िात होती हैं उन्हें मनोरोग - उपचार की आवश्यकता हो सकती है। अंत में, पुनःस्थापन या पुनवार्स अथार्त कोइर् रोजगार तथा धीरे - धीरे सामान्य दिनचयार् पर वापस लौटना होता है। किसी समयउत्तरजीवियों तथा पीडि़तों की अनुवतीर् जाँच की भी आवश्यकता यह ज्ञात करने के लिए होती है कि अभ्िाघातज अनुभव से वे पयार्प्त स्वास्थ्य लाभ कर चुके हैं अथवा नहीं। यह ध्यान देने योग्य है कि यद्यपि शोर, वायु तथा जल के कारण प्रदूषण तो व्याप्त हैं ही ¯कतु वुफछ उपाय पयार्वरण - उन्मुख व्यवहार को प्रोत्साहन पयार्वरण - उन्मुख व्यवहार ;चतव.मदअपतवदउमदजंस इमींअपवनतद्ध के अंतगर्त वे दोनों प्रकार के व्यवहार आते हैं जिनका उद्देश्य पयार्वरण का समस्याओं से संरक्षण करना है तथा स्वस्थ पयार्वरण को उन्नत करना है। प्रदूषण से पयार्वरण का संरक्षण करने के लिए वुफछ प्रोत्साहक ियाएँ निम्नलिख्िात हैं कृ ऽ वायु प्रदूषण को कम किया जा सकता है, वाहनों को अच्छी हालत में रखने से अथवा ईंधन रहित वाहन चलाने से और धूम्रपान की आदत छोड़ने से। ऽ शोर के प्रदूषण में कमी लाइर् जा सकती है, यह सुनिश्िचत करके कि शोर का प्रबलता - स्तर मिम हो। उदाहरण के लिए सड़क पर अनावश्यक हाॅनर् बजाने को कम कर अथवा ऐसे नियमों का निमार्ण कर जो शोर वाले संगीत को वुफछ विशेष समय पर प्रतिबंिात कर सवेंफ। ऽ वूफड़ा - करकट से निपटने का उपयुक्त प्रबंधन, उदाहरण के लिए जैविक रूप से नष्ट होने वाले तथा जैविक रूप से नष्ट नहीं होने वाले अवश्िाष्ट वूफड़े को पृथक कर या रसोइर्घर की अवश्िाष्ट सामग्री से खाद बना कर। इस प्रकार के उपायों का उपयोग घर तथा सावर्जनिक स्थानों पर किया जाना चाहिए। औद्योगिक तथा अस्पताल की अवश्िाष्ट सामगि्रयों के प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। ऽ वृक्षारोपण करना तथा उनकी देखभाल की व्यवस्था, यह ध्यान में रखकर करने की आवश्यकता है कि ऐसे पौधे और वृक्ष नहीं लगाने चाहिए जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हों। ऽ प्लास्िटक के उपयोग का किसी भी रूप में निषेध करना, इस प्रकार ऐसी विषैली अवश्िाष्ट सामगि्रयों को कम करना जिनसे जल, वायु तथा मृदा का प्रदूषण होता है। ऽ उपभोक्ता वस्तुओं का वेष्टन या पैकेज जैविक रूप से नष्ट नहीं होने वाले पदाथो± में कम बनाना। ऽ ऐसे निमार्ण संबंधी नियमों को बनाना ;विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों मेंद्ध जो इष्टतम पयार्वरणी अभ्िाकल्प का उल्लंघन न करने दें। मनोविज्ञान तथा सामाजिक सरोकार यदि आप किसी से हमारे समाज के समक्ष प्रमुख समस्याओं को सूचीब( करने को कहें, तो आप काप़्ाफी सीमा तक निश्िचत रूप से कह सकते हैं कि अन्य समस्याओं के साथ - साथ दो समस्याओं का उल्लेख अवश्य होगाμ निधर्नता तथा हिंसा। इन दोनों गोचरों वफा लोगों के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष प्रभाव पड़ता है। यह ज्ञातव्य है कि निधर्नता केवल आथ्िार्क समस्या नहीं है तथा हिंसा का तात्पयर् केवल कानून को तोड़ने से नहीं है। इन समस्याओं का समाधान करने के लिए यह आवश्यक है कि इनके मनोवैज्ञानिक कारणों का परीक्षण किया जाए। मनोवैज्ञानिकों ने इन प्रश्नों का सिय अन्वेषण किया है तथा इन गोचरों के कारणों तथा परिणामों पर अपना ध्यान वेंफित किया है। इनमें से प्रत्येक सामाजिक सरोकार का विवेचन नीचे दिया गया ह।ैनिधर्नता तथा भेदभाव इस बात पर सवर् सहमति है कि निधर्नता हमारे समाज के लिए एक अभ्िाशाप है और जितनी शीघ्रता से हम इसका निराकरण कर सवेंफ, समाज के लिए उतना ही भला होगा। वुफछ विशेषज्ञ निधर्नता ;चवअमतजलद्ध को प्रमुखतः आथ्िार्क अथर् में ही परिभाष्िात करते हैं तथा उसका मापन आय, पोषण ;प्रति व्यक्ित दैनिक वैफलोरी अंतरग्रहणद्ध तथा जीवन की मूल आवश्यकताओं, जैसे - भोजन, वस्त्रा तथा शरणस्थान ;मकानद्ध पर कितनी धनराश्िा व्यय की जा रही है, के आधार पर ही करते हैं। वुफछ अन्य संकेतकों जैसे - शारीरिक स्वास्थ्य तथा साक्षरता का भी उपयोग किया जाता है। वुफछ संदभो± में ऐसी मापों का उपयोग अभी भी प्रचिलित है। पिफर भी सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक दृष्िटकोण से आथ्िार्क तथा अन्य भौतिक पक्ष निधर्नता की कहानी के एक बहुत छोटे - से अंश का ही वणर्न करते हैं। समाज - मनोवैज्ञानिक दृष्िटकोण से निधर्नता की सवर्मान्य परिभाषा है कि यह एक ऐसी दशा है जिसमें जीवन में आवश्यक वस्तुओं का अभाव होता है तथा इसका संदभर् समाज मेंधन अथवा संपिा वफा असमान वितरण होता है। वुफछ लेखक उपरोक्त परिभाषा में यह भी जोड़ते हैं कि वंचन ;कमचतपअंजपवदद्ध तथा सामाजिक असुविधा ;ेवबपंस कपेंकअंदजंहमद्ध निधर्नता के अन्य लक्षण हैं। वंचन तथा निधर्नता के बीच एक विभेद यह है कि वंचन उस दशा को संद£भत करता है जिसमें व्यक्ित अनुभव करता है कि उसने कोइर् मूल्यवान वस्तु खो दी है तथा उसे वह प्राप्त नहीं हो रही है जिसके लिए वह योग्य या सुपात्रा है। जबकि निधर्नता का अथर् ऐसे संसाधनों की वास्तविक कमी है जो जीविका के लिए आवश्यक हैं तथा इसलिए उसे वुफछ सीमा तक वस्तुनिष्ठ रूप में परिभाष्िात किया जा सकता है। वंचन में अिाक महत्वपूणर् यह होता है कि व्यक्ित ऐसा प्रत्यक्षण करता है अथवा सोचता है कि उसे जो वुफछ उपलब्ध है वह उससे बहुत कम है जो उसको उपलब्ध होना चाहिए। अतः कोइर् निधर्न व्यक्ित वंचन का अनुभव कर सकता है ¯कतु वंचन का अनुभव करने के लिए निधर्नता कोइर् आवश्यक दशा नहीं है। निधर्न व्यक्ितयों की दशा और भी बुरी हो जाती है यदि वे निधर्नता के साथ वंचन का भी अनुभव करते हैं। वास्तविकता तो यह है कि प्रायः निधर्न व्यक्ित वंचन का भी अनुभव करते हैं। निधर्नता तथा वंचन दोनों का ही संबंध सामाजिक असुविधा से है अथार्त वह स्िथति जिसके कारण समाज के वुफछ वगो± को उन सुविधाओं का उपयोग नहीं करने दिया जाता है जो कि समाज के शेष वगो± के व्यक्ित करते हैं। समाज के इन वगो± वफी संवृि के लिए सामाजिक असुविधा एक बाधा का कायर् करती है। हमारे समाज में जाति व्यवस्था बहुत सीमा तक सामाजिक असुविधा का ड्डोत रही है किंतु जाति का ध्यान किए बिना भी निधर्नता ने सामाजिक असुविधा उत्पन्न करने में बड़ी भूमिका निभाइर् है। इसके अतिरिक्त, जाति तथा निधर्नता के कारण सामाजिक असुविधा द्वारा सामाजिक भेदभाव या विभेदन ;ेवबपंस कपेबतपउपदंजपवदद्ध की समस्या उत्पन्न हुइर् है। अध्याय 6 तथा 7 के अध्ययन से आपको याद होगा कि भेदभाव प्रायः पूवार्ग्रह से संबंिात होते हैं। निधर्नता के संदभर् में भेदभाव का अथर् उन व्यवहारों से है जिनके द्वारा निधर्न तथा धनी के बीच विभेद किया जाता है जिससे धनीतथा सुविधासंपÂ व्यक्ितयों का निधर्न तथा सुविधावंचित व्यक्ितयों की अपेक्षा अिाक पक्षपात किया जाता है। यह विभेद सामाजिक अंतःिया, श्िाक्षा तथा रोशगार के क्षेत्रों में देखी जा सकती है। इस प्रकार, निधर्न या सुविधावंचित व्यक्ितयों में क्षमता होते हुए भी उन्हें उन अवसरों से दूर रखा जाता है जो समाज के बाकी लोगों को उपलब्ध होते हैं। निधर्नों के बच्चों को अच्छे विद्यालयों में अध्ययन करने या अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं का उपयोग करने तथा रोशगार के अवसर नहीं मिलते हैं। सामाजिक असुविधा तथा भेदभाव के कारण निधर्न अपनी सामाजिक - आथ्िार्क दशा को अपने प्रयासों से उन्नत करने में बािात हो जाते हैं और इस प्रकार निधर्न और भी निधर्न होते जाते हैं। संक्षेप में, निधर्नता तथा भेदभाव इस प्रकार से संब( हैं कि भेदभाव निधर्नता का कारण तथा परिणाम दोनों ही हो जाता है। यह सुस्पष्ट है कि निधर्नता या जाति के आधार पर भेदभाव सामाजिक रूप से अन्यायपूणर् है तथा उसे हटाना ही होगा। निधर्नता को हर समाज समाप्त करना चाहता है। इस दिशा में अग्रसर होने के लिए निधर्नता तथा वंचन की मनोवैज्ञानिक विमाओं तथा उनके मुख्य कारणों को जानना आवश्यक है। निधर्नता तथा वंचन की मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ तथा उनके प्रभाव निधर्नता तथा वंचन हमारे समाज की सुस्पष्ट समस्याओं में से हैं। भारतीय समाज - विज्ञानियों ने जिनमें समाजशास्त्राी, मनोवैज्ञानिक तथा अथर्शास्त्राी सभी शामिल हैं, समाज केनिधर्न एवं वंचित वगो± के ऊपर सुव्यवस्िथत शोधकायर् किए हैं। उनके निष्कषर् तथा प्रेक्षण यह प्रदश्िार्त करते हैं कि निधर्नता तथा वंचन के प्रतिवूफल प्रभाव अभ्िाप्रेरणा, व्यक्ितत्व, सामाजिक व्यवहार, संज्ञानात्मक प्रियाओं तथा मानसिक स्वास्थ्य पर परिलक्ष्िात होते हैं। ऽ अभ्िाप्रेरणा के संबंध में पाया गया है कि निधर्न व्यक्ितयों में निम्न आकांक्षा स्तर और दुबर्ल उपलब्िध अभ्िाप्रेरणा तथा निभर्रता की प्रबल आवश्यकता परिलक्ष्िात होती हैं। वे अपनी सपफलताओं की व्याख्या भाग्य के आधार पर करते हैं न कि योग्यता तथा कठिन परिश्रम के आधार पर। सामान्यतः उनका यह विश्वास होता है कि उनके बाहर जो घटक हैं वे उनके जीवन की घटनाओं को नियंत्रिात करते हैं, उनके भीतर के घटक नहीं। ऽ जहाँ तक व्यक्ितत्व का संबंध है निधर्न एवं वंचित व्यक्ितयों में आत्म - सम्मान का निम्न स्तर और दुश्िंचता तथा अंतमर्ुखता का उच्च स्तर पाया जाता है। वे मनोविज्ञान भविष्योन्मुखता की तुलना में आसÂ वतर्मान के ही विचारों में खोए रहते हैं। वे बड़े ¯कतु सुदूर पुरस्कारों की तुलना में छोटे ¯कतु तात्कालिक पुरस्कारों को अिाक वरीयता देते हैं क्योंकि उनके प्रत्यक्षण के अनुसार भविष्य बहुत ही अनिश्िचत है। वे निराशा, शक्ितहीनता और अनुभूत अन्याय के बोध के साथ जीते हैं तथा अपनी अनन्यता के खो जाने का अनुभव करते हैं। ऽ सामाजिक व्यवहार के संदभर् में निधर्न तथा वंचित वगर् समाज के शेष वगो± के प्रति अमषर् या विद्वेष की अभ्िावृिा रखते हैं। ऽ संज्ञानात्मक प्रकायो± पर दीघर्कालीन वंचन के प्रभाव के संबंध में यह पाया गया है कि निम्न की अपेक्षा उच्च वंचन स्तर के पीडि़त व्यक्ितयों में ऐसे कृत्यों ;जैसे - वगीर्करण, शब्िदक तवर्फ, काल प्रत्यक्षण तथा चित्रा गहनता प्रत्यक्षणद्ध पर बौिक ियाएँ तथा निष्पादन निम्न स्तर के होते हैं। यह भी स्पष्ट हो चुका है कि वंचन का प्रभाव इसलिए होता है क्योंकि जिस परिवेश में बच्चे पल कर बड़े होते हैं - चाहे वह साधनसंपन्न हों या वंफगाल, वह उनके संज्ञानात्मक विकास को प्रभावित करता है तथा यह उनके संज्ञानात्मककृत्य निष्पादन में परिलक्ष्िात होता है। ऽ जहाँ तक मानसिक स्वास्थ्य का संबंध है, मानसिक विकारों तथा निधर्नता या वंचन में ऐसा संबंध है जिसपर प्रश्नचिÉ भी नहीं लगाया जा सकता। निधर्न व्यक्ितयों में वुफछ विश्िाष्ट मानसिक रोगों से पीडि़त होने की संभावना, धनी व्यक्ितयों की अपेक्षा, संभवतः इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि वे मूल आवश्यकताओं के विषय में निरंतर ¯चतित रहते हैं, असुरक्षा की भावना अथवा चिकित्सा - सुविधाओं, विशेष रूप से मानसिक रोगों के लिए, की अनुपलब्धता से ग्रस्त रहते हैं। वस्तुतः यह सुझाव भी दिया है कि अवसाद प्रमुखतया निधर्न व्यक्ितयों का ही मानसिक विकार है। इसके अतिरिक्त, निधर्न व्यक्ित निराशा - भावना तथा अनन्यता के खो जाने का भी ऐसे अनुभव करते हैं जैसे कि वे समाज के अंग ही नहीं हैं। इसके परिणामस्वरूप वे संवेगात्मक तथा समायोजन संबंधी समस्याओं से भी पीडि़त होते हैं। निधर्नता के प्रमुख कारण कभी - कभी निधर्नता प्राकृतिक विपदाओं, जैसे - भूवंफप, बाढ़ तथा तूप़ फान अथवा मानव - निमिर्त विपदाओं, जैसे - विषैली गैस के रिसाव के कारण होती है। जब ऐसी घटनाएँमरुस्थलद्ध तथा जहाँ की जलवायु भीषण होती हैघटित होती हैं तो व्यक्ितयों की समस्त धन - संपिा एकाएक ;जैसे - अत्यिाक सदीर् या गमीर्द्ध प्रायः निधर्नता के नष्ट हो जाती हैं तथा उन्हें निधर्नता का सामना करना श्िाकार हो जाते हैं। यह कारक मानव द्वारा नियंत्रिात पड़ता है। इसी प्रकार जब निधर्न व्यक्ितयों की एक पीढ़ी नहीं किया जा सकता है। पिफर भी इन क्षेत्रों के निवासियों अपनी निधर्नता का उन्मूलन करने में असमथर् रहती है तब उनकी अगली पीढ़ी भी निधर्नता में ही जीवित रहतीहै। इन कारणों के अतिरिक्त निधर्नता के लिए उत्तरदायी अन्य कारकों का वणर्न नीचे किया गया है। ¯कतु इनकारकों के महत्त्व के संबंध में वुफछ मतभेद हैंμ ऽ निधर्न स्वयं अपनी निधर्नता के लिए उत्तरदायी होते हैं। इस मत के अनुसार, निधर्न व्यक्ितयों में योग्यता तथा अभ्िाप्रेरणा दोनों की कमी होती है जिसके कारण वे प्रयास करके उपलब्ध अवसरों का लाभ नहीं उठा पाते। सामान्यतः निधर्न व्यक्ितयों के विषय में यह मतनिषेधात्मक है तथा उनकी स्िथति को उत्तम बनाने में तनिक भी सहायता नहीं करता है। ऽ निधर्नता का कारण कोइर् व्यक्ित नहीं अपितु एक विश्वास व्यवस्था, जीवन शैली तथा वे मूल्य हैं जिनके साथ वह पल कर बड़ा हुआ है। यह विश्वास व्यवस्था, जिसे ‘निधर्नता की संस्कृति’ ;बनसजनतम व िचवअमतजलद्ध कहा जाता है, व्यक्ित को यह मनवा या स्वीकार करवा देती है कि वह तो निधर्न ही रहेगा/रहेगी तथा यह विश्वास एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होता रहता है। ऽ आथ्िार्क, सामाजिक तथा राजनीतिक कारक मिलकर निधर्नता का कारण बनते हैं। भेदभाव के कारण समाज के वुफछ वगो± को जीविका वफी मूल आवश्यकताओं की पूतिर् करने के अवसर भी नहीं दिए जाते। आथ्िार्क व्यवस्था को सामाजिक तथा राजनीतिक शोषण के द्वारा वैषम्यपूणर् ;असंगतद्ध तरह से विकसित किया जाता है जिससे कि निधर्न इस दौड़ से बाहर हो जाते हैं। ये सारे कारक सामाजिक असुविधा के संप्रत्यय में समाहित किए जा सकते हैं जिसके कारण निधर्न सामाजिक अन्याय, वंचन, भेदभाव तथा अपवजर्न का अनुभव करते हैं। ऽ वह भौगोलिक क्षेत्रा, व्यक्ित जिसके निवासी हों, उसे निधर्नता का एक महत्वपूणर् कारण माना जाता है। उदाहरण के लिए वे व्यक्ित जो ऐसे क्षेत्रों में रहतेहैं जिनमें प्राकृतिक संसाधनों का अभाव होता है ;जैसे - की सहायता के लिए प्रयास अवश्य किए जा सकते हैं ताकि वे जीविका के वैकल्िपक उपाय खोज सवेंफ तथा उन्हें उनकी श्िाक्षा एवं रोशगार हेतु विशेष सुविधाएँ उपलब्ध कराइर् जा सवेंफ। ऽ निधर्नता चक्र ;चवअमतजल बलबसमद्ध भी निधर्नता का एक अन्य महत्वपूणर् कारण है जो यह व्याख्या करता है कि निधर्नता उन्हीं वगो± में ही क्यों निरंतर बनी रहती है। निधर्नता ही निधर्नता की जननी भी है। निम्न आय तथा संसाधनों के अभाव से प्रारंभ कर निधर्न व्यक्ित निम्न स्तर के पोषण तथा स्वास्थ्य, श्िाक्षा के अभाव तथा कौशलों के अभाव से पीडि़त होते हैं। इनके कारण उनके रोशगार पाने के अवसर भी कम हो जाते हैं जो पुनः उनवफी निम्न आय स्िथति तथा निम्न स्तर के स्वास्थ्य एवं पोषण स्िथति को सतत रूप से बनाए रखते हैं। इनके परिणामस्वरूप निम्न अभ्िाप्रेरणा स्तर स्िथति को और भी खराब कर देता हैऋ यह चक्र पुनः प्रारंभ होता है और चलता रहता है। इस प्रकार निधर्नता चक्र में उपयुर्क्त विभ्िान्न कारकों की अंतःियाएँ सन्िनहित होेती हैं तथा इसके परिणामस्वरूप वैयक्ितक अभ्िाप्रेरणा, आशा तथा नियंत्राण - भावना में न्यूनता आती है। निधर्नता एवं वंचन से संब( समस्याओं से निपटने का मागर् केवल सियता एवं पुरजोर तरीके से उनको दूर करने अथवा कम करने के उपाय करना ही है। इस संबंध में वुफछ उपायों का वणर्न नीचे किया गया है। निधर्नता उपशमन के उपाय निधर्नता एवं उसके निषेधात्मक परिणामों को उपशमित अथवा कम करने के लिए सरकार तथा अन्य समूहों द्वारा अनेक कायर् किए जा रहे हैं। ऽ निधर्नता चक्र को तोड़ना तथा निधर्न व्यक्ितयों को आत्मनिभर्र बनाने हेतु सहायता करनाμप्रारंभ में निधर्नव्यक्ितयों को वित्तीय सहायता, चिकित्सापरक एवं अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराना आवश्यक हो सकता है। यह ध्यान रखने की आवश्यकता होती है कि निधर्न व्यक्ित इस वित्तीय एवं अन्य प्रकार की सहायताओं और ड्डोतों पर अपनी जीविका के लिए निभर्र न हो जाए।ँऽ ऐसे संदभो± का निमार्ण जो निधर्न व्यक्ितयों को उनकी निधर्नता के लिए दोषी ठहराने के बजाय उन्हें उत्तरदायित्व सिखाए - इस उपाय के द्वारा उन्हें आशा, नियंत्राण एवं अनन्यता की भावनाओं को दोबारा अनुभव करने में सहायता मिलेगी। ऽ सामाजिक न्याय के सि(ांतों का पालन करते हुए शैक्ष्िाक एवं रोशगार के अवसर उपलब्ध कराना - इस उपाय के द्वारा निधर्न व्यक्ितयों को अपनी योग्यताओं तथा कौशलों को पहचानने में सहायता मिलेगी जिससे वे समाज के अन्य वगो± के समकक्ष आने में समथर् हो सवेंफ। यह वुंफठा को कम करके अपराध एवं हिंसा को भी कम करने में सहायक होगा तथा निधर्न व्यक्ितयों को अवैध् साध्नों के बजाय, वैध् साध्नों से जीविकोपाजर्न करने हेतु प्रोत्साहित करेगा। ऽ उन्नत मानसिक स्वास्थ्य हेतु उपाय निधर्नता न्यूनीकरण के अनेक उपाय उनके शारीरिक स्वास्थ्य को तो सुधारने में सहायता करते हैं ¯कतु उनके मानसिक स्वास्थ्य की समस्या का समाधान प्रभावी ढ़ंग से करना पिफर भी आवश्यक होता है। यह आशा की जा सकती है कि इस समस्या के प्रति जागरूकता के द्वारा निधर्नता के इस पक्ष पर अिाक ध्यान देना संभव हो सकेगा। ऽ निधर्न व्यक्ितयों को सशक्त करने के उपाय उपयुर्क्त उपायों के द्वारा निधर्न व्यक्ियों को अिाक सशक्त बनाना चाहिए जिससे वे स्वतंत्रा रूप से तथा गरिमा के साथ अपना जीवन - निवार्ह करने में समथर् हो सवफ तथा सरकार ेंअथवा अन्य समूहों की सहायता पर निभर्र नहीं रहें। ‘अन्त्योदय’ के संप्रत्यय या समाज में ‘अंतिम व्यक्ित’ का उत्थान, अथार्त अत्यंत निधर्न अथवा अत्यंत सुविधावंचित व्यक्ित, ने निधर्न व्यक्ितयों के एक बड़े वगर् को उनवफीपूवर् आथ्िार्क स्िथति से ऊपर उठाने में सहायता की है। ‘अन्त्योदय’ के कायर्क्रमों में स्वास्थ्य सुविधओं, पोषण, श्िाक्षा तथा रोशगार के लिए प्रश्िाक्षणμ उन सभी क्षेत्रों जिनमें निधर्न व्यक्ितयों को सहायता की आवश्यकता होती है - का प्रावधान किया गया है। ऐसे अनेक कायर्क्रम नगरों वफी अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में अिाक सिय हैं क्योंकि ग्रामीण निधर्न व्यक्ितयों में नगरीय निधर्नों की अपेक्षा सुविधाओं मनोविज्ञान का और भी अिाक अभाव है। इसके अतिरिक्त निधर्न व्यक्ितयों को अपना छोटे पैमाने का व्यवसाय प्रारंभ करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता है। इन व्यवसायों के लिए प्रारंभ्िाक पूँजी की व्यवस्था छोटा कशर् या सूक्ष्म )ण द्वारा की जाती है। यह सुविधा बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक की योजना के समान ह।ैसंविधान के 73वें संशोधन के अनुपालन में विवेंफित योजनाओं तथा लोक सहभागिता के द्वारा व्यक्ितयों को अिाक सशक्त करना है। ‘ऐव्फशॅन एड्’ ;।बजपवद।पकद्ध जो कि एक अंतरार्ष्ट्रीय समूह है, निधर्नों के हित के लिए सम£पत या प्रतिब( है। उसका लक्ष्य निधर्नों को उनके अिाकारों के प्रति अिाक संवेदनशील बनाना, समानता तथा न्याय के प्रति जागरूक करना तथा उनके लिए पयार्प्त पोषण, स्वास्थ्य तथा श्िाक्षा एवं रोशगार की सुविधओं को सुनिश्िचत करना है। इस संगठन की भारतीय शाखा हमारे देश में निधर्नता उपशमन के प्रयास में कायर्रत है। इन उपायों के अल्प समय में कोइर् जादुइर् प्रभाव तो अपेक्ष्िात नहीं हैं ¯कतु यदि निधर्नता उपशमन के लिए ये प्रयास सही भावना एवं सही दिशा में सतत चलते रहें तो हमें इनके सकारात्मक परिणाम बहुत शीघ्र ही देखने को मिल सकते हैं। आक्रमण, हिंसा तथा शांति आक्रामकता तथा हिंसा आधुनिक समाज की प्रमुख समस्याओं में से हैं तथा उनके अंतगर्त विभ्िान्न प्रकार के व्यवहार आते हैंμ श्िाक्षा संस्थाओं में नए विद्याथ्िार्यों की प्रताड़ना ;रै¯गगद्ध से लेकर बच्चों से दुव्यर्वहार, घरेलू हिंसा, हत्या तथा बलात्कार, दंगे तथा आतंकवादी हमले। आक्रमण ;ंहहतमेेपवदद्ध पद का उपयोग मनोवैज्ञानिक ऐसे किसी भी व्यवहार को इंगित करने के लिए करते हैं जो किसी व्यक्ित/व्यक्ितयों के द्वारा किसी अन्य व्यक्ित/व्यक्ितयों को हानि पहुँचाने के आशय से किया जाता है। इसे वास्तविक ियाओं अथवा कटु वचनों या आलोचना द्वारा अथवा यहाँ तक कि दूसरों के प्रति शत्राुतापूणर् भावनाओं द्वारा भी प्रदश्िार्त किया जा सकता है। दूसरे व्यक्ित या वस्तु के प्रति बलपूवर्क ध्वंसात्मक या विनाशकारी व्यवहार को हिंसा ;अपवसमदबमद्ध कहा जाता है। वुफछ मनोवैज्ञानिक आक्रमण तथा ¯हसा में इस आधार पर भेद करते हैं कि आक्रमण में दूसरे व्यक्ित को हानि या चोट पहुँचाने के आशय से व्यवहार किया जाता है जबकि ¯हसा में यह आशय हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है। उदाहरण के लिए, किसी दंगे में बस अथवा दूसरी सावर्जनिकसंपिा को जलाना हिंसा और आक्रमण दोनों ही कहलाते हैं ¯कतु, मान लीजिए आप किसी व्यक्ित को अपनी मोटरसाइकिल को उग्रता के साथ ठोकर मारते हुए देखते हैं। इस व्यवहार के पीछे उस व्यक्ित का आशय केवल मोटरसाइकिल को प्रारंभ करना हो सकता है इसलिए यह व्यवहार आक्रमण नहीं कहा जाएगा। इसके विपरीत, व्यक्ित यही उग्र व्यवहार मोटरसाइकिल को क्षतिग्रस्त करने के लिए भी कर सकता है क्यांेकि वह उस व्यक्ित ;मोटरसाइकिल का मालिकद्ध को नापसंद करता है। इसे आक्रामक व्यवहार कहा जाएगा क्योंकि यहाँ आशय था, क्षति पहुँचाना।नैमििाक आक्रमण ;पदेजतनउमदजंस ंहहतमेेपवदद्ध तथा शत्राुतापणूर् आक्रमण ;ीवेजपसम ंहहतमेेपवदद्ध में भी भेद किया जाता है। जब किसी लक्ष्य या वस्तु को प्राप्त करने के लिए आक्रमण किया जाता है तो उसे नैमििाक आक्रमण कहते हैं। उदाहरण के लिए एक दबंग छात्रा विद्यालय में नए विद्याथीर् को इसलिए चपत लगाता है जिससे कि वह उसकी चाॅकलेट ले सके। शत्राुतापण्ूार् आक्रमण वह कहलाता है जिसमें लक्ष्य ;पीडि़तद्ध के प्रति क्रोध की अभ्िाव्यक्ित होती है और उसे हानि पहुँचाने के आशय से किया जाता है, जबकि हो सकता है कि आक्रामक का आशय पीडि़त व्यक्ित से वुफछ भी प्राप्त करना न हो। उदाहरण के लिए, समुेर्दाय वफ किसी व्यक्ित की एक अपराधी इसलिए पिटाइकर देता है क्योंकि उसने पुलिस के समक्ष अपराधी का नाम लिया। आक्रमण के कारण समाज मनोवैज्ञानिकों ने आक्रमण के मुद्दे पर कइर् वषो± से अन्वेषण किया है तथा वे आक्रमण के कारणों के संबंध में निम्नलिख्िात मत व्यक्त करते हैं। 1ण् सहज प्रवृिा μ आक्रामकता मानव में ;जैसा कि यह पशुओं में होता हैद्ध सहज ;अंतजार्तद्ध होती है। जैविकरूप से यह सहज प्रवृिा आत्मरक्षा हेतु हो सकती है। 2ण् शरीरियात्मक तंत्रा μ शरीरियात्मक तंत्रा अप्रत्यक्ष रूप से आक्रामकता जनित कर सकते हैं, विशेष रूप से मस्ितष्क के वुफछ ऐसे भागों को सिय करके जिनकी संवेगात्मक अनुभव में भूमिका होती है। शरीरियात्मक भाव प्रबोधन की एक सामान्य स्िथति या सियण की भावना प्रायः आक्रमण के रूप में अभ्िाव्यक्त हो सकती है। भाव प्रबोधन के कइर् कारण हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, जैसे इस अध्याय में पहले वण्िार्त किया जा चुका है, भीड़ के कारण भी आक्रमण हो सकता है, विशेष रूप से गमर् तथा आद्रर् मौसम में। 3ण् बाल - पोषण μ किसी बच्चे का पालन जिस तरह से किया जाता है वह प्रायः उसकी आक्रामकता को प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए वे बच्चे जिनके माता - पिता शारीरिक दंड का उपयोग करते हैं, उन बच्चों की अपेक्षा जिनके माता - पिता अन्य अनुशासनिक, तकनीकों का उपयोग करते हैं, अिाक आक्रामक बन जाते हैं। ऐसा संभवतः इसलिए होता है कि माता - पिता ने आक्रामक व्यवहार का एक आदशर् उपस्िथत किया है, जिसका बच्चा अनुकरण करता है। यह इसलिए भी हो सकता है कि शारीरिक दंड बच्चे को क्रोिात तथा अप्रसन्न बना देता है और पिफर बच्चा जैसे - जैसे बड़ा होता है वह इस क्रोध को आक्रामक व्यवहार के द्वारा अभ्िाव्यक्त करता है। 4ण् वुंफठाμ आक्रमण वुंफठा की अभ्िाव्यक्ित तथा परिणाम हो सकते हैं, अथार्त वह संवेगात्मक स्िथति जो तब उत्पन्न होती है जब व्यक्ित को किसी लक्ष्य तक पहुँचने में बािात किया जाता है अथवा किसी ऐसी वस्तु जिसे वह पाना चाहता है, उसको प्राप्त करने से उसे रोका जाता है। व्यक्ित किसी लक्ष्य के बहुत निकट होते हुए भी उसे प्राप्त करने से वंचित रह सकता है। यह पाया गया है कि वुंफठित स्िथतियों में जो व्यक्ित होते हैं, वे आक्रामक व्यवहार उन लोगों की अपेक्षा अिाक प्रद£शत करते हैं जो वुंफठित नहीं होते। वुंफठा के प्रभाव की जाँच करने के लिए किए गए एक प्रयोग में बच्चों को वुफछ आकषर्क ख्िालौनों, जिन्हें वे पारदशीर् पदेर् ;स्क्रीनद्ध के पीछे से देख सकते थे, को लेने से रोका गया। इसके परिणामस्वरूप ये बच्चे, उन बच्चों की अपेक्षा, जिन्हें ख्िालौने उपलब्ध थे, खेल में अिाक विध्वंसक या विनाशकारी पाए गए। एक अमरीकी मनोवैज्ञानिक जिनका नाम जाॅन डोलाॅडर् ;श्रवीद क्वससंतकद्ध था, ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर वुंफठा - आक्रामकता सि(ांत ;तिनेजतंजपवद.ंहहतमेेपवद जीमवतलद्ध का परीक्षण करने के लिए विशेष रूप से शोध अध्ययन किया। इस सि(ांत के अनुसार वुंफठा के कारण आक्रामक व्यवहार उत्पन्न होते हैं। जैसा प्रत्याश्िात था वुंफठित व्यक्ितयों ने अवंुफठित व्यक्ितयों की अपेक्षा अिाक आक्रामकता प्रदश्िार्त की। इसके अतिरिक्त यह आक्रामकता प्रायः दुबर्ल व्यक्ित, जो आक्रमण का प्रतिकार करने में असमथर् थे या जिसके प्रतिकार करने की संभावना नहीं थी, के प्रति अिाक प्रदश्िार्त की गइर्। इस गोचर को विस्थापन ;कपेचसंबमउमदजद्ध कहा जाता है। प्रायः यह देखने में आता है कि समाज में किसी बहुसंख्यक समूह के सदस्य किसी अल्पसंख्यक समूह के सदस्यों के प्रति पूवार्ग्रह रख ;अध्याय 6 देखेंद्ध सकते हैं तथा अल्पसंख्यक समूह के सदस्यों के प्रति आक्रामक व्यवहार प्रदश्िार्त कर सकते हैं, जैसे - अपमानजनक भाषा का उपयोग अथवा अल्पसंख्यक समूह के सदस्य पर शारीरिक प्रहार करना। यह विस्थापित आक्रमण वुंफठा द्वारा उत्पन्न हो सकता है। बाद में, जैसे - जैसे आक्रमण के कारणों के संबंध में अिाक जानकारियाँ एकत्रिात की गईं, यह स्पष्ट हो गया कि वंुफठा आक्रमण का एकमात्रा कारण या मुख्य कारण भी नहीं है। प्रेक्षणों में पाया गया है कि ;कद्ध वुंफठित होने के कारण कोइर् व्यक्ित अनिवायर् रूप से आक्रामक नहीं हो जाता तथा ;खद्ध अनेक स्िथतिपरक कारक आक्रामक व्यवहार को प्रेरित कर सकते हैं। इन स्िथतिपरक कारकों में से वुफछ नीचे वण्िार्त हैं। ऽ अिागम μ मनुष्यों में आक्रमण प्रमुखतया अिागमका परिणाम होता है, न कि केवल सहज प्रवृिा की अभ्िाव्यक्ित। आक्रामकता का अिागम एक से अिाक तरीकों द्वारा घटित हो सकता है। वुफछ व्यक्ित आक्रामकता इसलिए सीख सकते हैं क्योंकि उन्होंने पाया है कि ऐसा करना एक प्रकार का पुरस्कार है ;उदाहरण के लिए शत्राुतापूणर् आक्रमण के द्वारा आक्रामक व्यक्ित को वह प्राप्त हो जाता है जो वह चाहता हद्ध। ैयह प्रत्यक्ष प्रबलन द्वारा अिागम का एक उदाहरण है। व्यक्ित दूसरों के आक्रामक व्यवहार का प्रेक्षण करते हुए भी आक्रमण करना सीखता है। यह माॅड¯लग या प्रतिरूपण ;उवकमससपदहद्ध के द्वारा अिागम का एक उदाहरण है। ऽ आक्रामक माॅडल का प्रेक्षण μ एलबटर् बंदूरा ;।सइमतज ठंदकनतंद्ध एवं उनके सहयोगियों तथा अन्य मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए अनेवफ शोध् अध्ययन आक्रामकता के अिागम में माॅडल की भूमिका को प्रदश्िार्त करते हैं। यदि कोइर् बच्चा टेलीविशन पर आक्रमण तथा ¯हसा देखता है तो वह उस व्यवहार का अनुकरण करना प्रारंभ कर सकता है। इस बात में तनिक भी संदेह नहीं है कि टेलीविशन तथा सिनेमा के माध्यम से दिखाइर् जाने वाली हिंसा एवं आक्रामकता का दशर्कों, विशेष रूप से बच्चों पर, प्रबल प्रभाव पड़ता है। ¯कतु प्रश्न यह है कि क्या केवल टेलीविशन पर हिंसा देखने मात्रा से व्यक्ित आक्रामक बन जाता है? या वुफछ अन्य स्िथतिपरक कारक हैं जो उसके आक्रामक व्यवहार को प्रकट करने में सहायक होतेहैं? इस प्रश्न का उत्तर विश्िाष्ट स्िथतिपरक कारकों के संबंध में प्राप्त करके दिया जा सकता है। ऽ दूसरों द्वारा क्रोध - उत्तेजक ियाएँ μ यदि कोइर् व्यक्ित एक हिंसा प्रदश्िार्त करने वाला सिनेमा देखता है तथा इसके पश्चात उसे किसी अन्य व्यक्ित द्वारा क्रोध दिलाया जाता है ;उदाहरण के लिए उसका अपमान कर या उसे धमकी देकर, शारीरिक आक्रमण द्वारा या बेइर्मानी द्वाराद्ध तो उस व्यक्ित में आक्रामक व्यवहार प्रदश्िार्त करने की संभावना बढ़ जाती है, इसकी तुलना में कि यदि उसे क्रोिात नहीं किया गया हो। जिन अध्ययनों के द्वारा वंुफठा - आक्रामकता सि(ांत का परीक्षण कियागया था उनमें व्यक्ित को उत्तेजित कर क्रोध दिलाना वंुफठा उत्पन्न करने का एक तरीका था। ऽ आक्रमण के शस्त्रों ;हथ्िायारोंद्ध की उपलब्धता μ वुफछ शोधकतार्ओं ने पाया है कि हिंसा को देखने के पश्चात प्रेक्षक में आक्रामकता की अध्िक संभावना उसी दशा में होती है जब वह आक्रमण के शस्त्रा, जैसे - डंडा, पिस्तौल या चावूफ आसानी से उपलब्ध हों। ऽ व्यक्ितत्व - कारक μ व्यक्ितयों से अंतःिया करते समय हम देखते हैं कि उनमें से वुफछ स्वाभाविक रूप से ही अिाक ‘क्रोधी ;गमर् - मिजाजद्ध’ होते हैं तथा अन्य लोगों की अपेक्षा अिाक आक्रामकता प्रद£शत करते हैं। अतः हम यह निष्कषर् निकाल सकते हैं कि आक्रामकता एक वैयक्ितक गुण है। यह पाया गया है कि वे व्यक्ित जिनमें निम्नस्तरीय आत्म - सम्मान होता है तथा जो असुरक्ष्िात महसूस करते हैं, वे अपने अहं को प्रबल दिखाने के लिए आक्रामक व्यवहार कर सकते हैं। इसी प्रकार वे व्यक्ित जिनमें अत्यंत उच्चस्तरीय आत्म - सम्मान होता है वे भी आक्रामकता इसलिए प्रदश्िार्त कर सकते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि दूसरे लोग उन्हें उस उच्च ‘स्तर’ पर नहीं रखते जिस पर उन्होंने स्वयं को रखा हुआ है। ऽ सांस्कृतिक कारक μ जिस संस्कृति में व्यक्ित पल कर बड़ा होता है वह अपने सदस्यों को आक्रामक व्यवहार सिखा सकती है अथवा नहीं। ऐसा वह आक्रामक व्यवहारों की प्रशंसा द्वारा तथा उन्हें प्रोत्साहन कर सकती है अथवा ऐसे व्यवहारों को हतोत्साहित करके उनकी आलोचना कर सकती है। वुफछ जनजातीय समुदाय रूप से शांतििय हैं जबकि वुफछ अन्य आक्रामकता कोअपनी उत्तरजीविता के लिए आवश्यक समझते ह।ैंआक्रामकता तथा हिंसा को कम करना - वुफछ उक्ितयाँ यह जानते हुए कि आक्रमकता के एक से अिाक कारण हो सकते हैं, क्या समाज में आक्रामकता तथा ¯हसा को कम करने के लिए वुफछ किया जा सकता है? आक्रमकता तथा हिंसा को कम करने के लिए वुफछ उपायों का वणर्न आगे किया गया है। किसी समाज अथवा पयार्वरण को ऐसा बनाना जिसमें वुंफठित स्िथति न हो, यह कोइर् सरल कायर् नहीं है। तथापि, आक्रामकता के अिागम को बढ़ती हुइर् आक्रामकता की सामान्य समस्या के प्रति उपयुक्तअभ्िावृिा विकसित कर कम किया जा सकता ह।ैऽ माता - पिता तथा श्िाक्षकों को विशेष रूप से सतवर्फ रहने की आवश्यकता है कि वे आक्रामकता को किसी भीरूप में प्रोत्साहित या पुरस्कृत न करें। अनुशासित करने के लिए दंड के उपयोग को भी परिव£तत करना होगा। ऽ आक्रामक माॅडलों के व्यवहारों का प्रेक्षण करने तथा उनका अनुकरण करने के लिए अवसरों को कम करने की आवश्यकता है। आक्रमण को वीरोचित व्यवहार के रूप में प्रस्तुत करने को विशेष रूप से परिहार करने की आवश्यकता है क्योंकि इससे प्रेक्षण द्वारा अिागम करने के लिए उपयुक्त परिस्िथति का निमार्ण होता है। ऽ निधर्नता तथा सामाजिक अन्याय आक्रमण के प्रमुख कारण हो सकते हैं क्योंकि वे समाज के वुफछ वगो± में वुंफठा उत्पन्न कर सकते हैं। सामाजिक न्याय तथा समानता को समाज में परिपालन करने से वुंफठा के स्तर को कम करनेतथा उसके द्वारा आक्रामक प्रवृिायों को नियंत्रिात करने में कम से कम वुफछ सीमा तक सपफलता मिल सकती है। ऽ इन उक्ितयों के अतिरिक्त सामाजिक या सामुदायिक स्तर पर यह आवश्यक है कि शांति के प्रति सकारात्मकअभ्िावृिा का विकास किया जाए। हमें न केवल आक्रामकता को कम करने की आवश्यकता है बल्िक इसकी भी आवश्यकता है कि हम सिय रूप से शांति विकसित करें एवं उसे बनाए रखें। हमारे अपनेसांस्कृतिक मूल्य सदा शांतिपूणर् तथा सांमजस्यपूणर् सह - अस्ितत्व को अिाक महत्त्व देते हैं। हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने विश्व को शांति का एक नया दृष्िटकोण जो कि केवल आक्रमण का अभाव नहीं था, यह अहिंसा ;दवद.अपवसमदबमद्ध का विचार था, जिस पर उन्होंने स्वयं जीवन भर अभ्यास किया ;बाॅक्स 8ण्2 देखेंद्ध। स्वास्थ्य परंपरागत संस्कृतियाँ, जैसे - चीनी, भारतीय तथा लेटिन अमरीकी हैं जो विश्वास करती हैं कि विभ्िान्न शारीरिक तत्वों के सांमजस्यपूणर् संतुलन के परिणामस्वरूप ही अच्छा स्वास्थ्य होता है तथा इस संतुलन के लोप या अभाव से ही रोगउत्पन्न होता है। इसके विपरीत, पाश्चात्य संस्कृतियों में स्वास्थ्य को पूणर्रूप से कायर् करने वाले यंत्रा ;मशीनद्ध के परिणामस्वरूप समझा जाता है जिसमें किसी भी प्रकार काअवरोध न हो। विभ्िान्न संस्कृतियों में जो भ्िान्न आयु£वज्ञान प(ति विकसित हुइर् हैं वे इन्हीं माॅोंडल पर आधारित हैं। आप एक अन्य तथ्य जानना चाह सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रस्तुत विश्व स्वास्थ्य रिपोटर् में पाया गया हैकि विकासशील देशों, जैसे - एश्िाया, अÚीका तथा लेटिन अमरीका में अिाक लोग संक्रामक या संचारी रोगों, जैसे - एच.आइर्.वी./एड्स, तपे ंक्रमण तथा दिक, मलेरिया, श्वसन - सआधुनिक समय में स्वास्थ्य तथा वुफशल - क्षेम ;कल्याणद्ध के विषय में हमारी समझ में बहुत परिवतर्न आया है। अब यह स्वीकार किया जाने लगा है कि अनेक स्वास्थ्य संबंधी परिणाम केवल रोग के प्रकायर् ही नहीं है बल्िक हमारे सोचने तथा व्यवहार करने के ढंग के भी परिणाम हैं। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन ;ॅभ्व्द्ध द्वारा दी गइर् ‘स्वास्थ्य’ की परिभाषा में भी परिलक्ष्िात होता हैै जिसके अंतगर्त स्वास्थ्य के जैविक, मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक पक्ष अंत£नहित हैं। यह परिभाषा न केवल स्वास्थ्य के शारीरिक बल्िक मानसिक तथा आध्यात्िमक पक्षों पर भी प्रकाश डालती है। इस खंड में हम केवल शारीरिक स्वास्थ्य पर ही ध्यान देंगे क्योंकि पिछले अध्यायों में आप मानसिक स्वास्थ्य के संबंध में पहले ही पढ़ चुके हैं। स्वास्थ्य तथा रोग दोनों में मात्रात्मक संबंध है। कोइर् व्यक्ित किसी शारीरिक रूप से अशक्तकारी रोग से ग्रस्त होैु ़सकता ह ¯कतदूसरी दृष्िट से कापफी स्वस्थ हो सकता है। आप बाबा आमटे तथा स्टीपेफन हाॅविंफस के नाम का पुनः स्मरण कीजिए, ये दोनों ही अपंगकारी रोगों से ग्रस्त हैं ¯कतु उन्होंने अपने क्षेत्रों में महत्वपूणर् योगदान दिया ह।ैहम यह भी देखते हैं कि विभ्िान्न संस्कृतियों में लोगों की सोच इस संबंध में भ्िान्न होती है कि लोग बीमार कब तथा क्यों हो जाते हैं और इस प्रकार उनके माॅडल भी अलग - अलग होते हैं जो वे रोगों की रोकथाम ;निवारणद्ध तथा स्वास्थ्य संवधर्न के लिए उपयोग में लाते हैं। अनेक पोषण - हीनता के कारण मरते हैं। विकसित देशों में प्रमुख कारण विभ्िान्न हृद्वाहिका रोग, वैंफसर तथा मनोरोग - विकार ह। ये अंतर इन संस्कृतियों वफी आथ्िार्क आंैैर सामाजिक संरचनाओं तथा उनकी मनोवैज्ञानिक विशेषताओं के आधार पर समझाए जा सकते हैं। वैयक्ितक स्तर पर मनोवैज्ञानिक अनेक प्रकार के कारकोंको इंगित करते हैं, जैसे - स्वास्थ्य संबंधी संज्ञान जिनमें अभ्िावृिायाँ तथा विश्वास भी अंत£नहित हंै, व्यवहार तथा सामाजिक कारक जो शारीरिक वुफशल - क्षेम या रोग से संब( होते हैं। ;कद्ध संज्ञान दृ आपने देखा होगा कि वैफसे वुफछ व्यक्ित यदि इस प्रकार के लक्षणों से ग्रस्त हों, जैसे - मिचली, जुकाम, अतिसार, चेचक इत्यादि, तो वे दूसरों की अपेक्षा चिकित्सक से जल्दी सहायता माँगते हैं। सहायता माँगने में ये विभ्िान्नताएँ रोग, उसकी तीव्रता तथा रोग के कारणों से संबंिात मानसिक प्रतिनिधानों में लोगों द्वारा किए गए अंतरों के कारण होती हैं। संभव है कि कोइर् व्यक्ित जुकाम के लिए चिकित्सक से कोइर् सहायता न माँगे, यदि वह यह कारण आरोपित करता हो कि दही खाने से जुकाम हो गया या वुफष्ठ रोग अथवा चेचक को भी यदि वह इर्श्वर का प्रकोप समझता हो तो वह चिकित्सक से सहायता नहीं माँग सकता है। रोग के संबंध में जागरूकता या जानकारी का स्तरऋ यह विश्वास कि वह क्यों उत्पन्न होता हैऋ तथा इस व्यथा से छुटकारा पाने या स्वास्थ्य संवधर्न के संभावित उपाय सहायता प्राप्त करने के व्यवहारों और साथ ही चिकित्सक के द्वारा बताए गए पथ्यापथ्य - नियमों के पालन को प्रभावित करता है। एक अन्य कारक जो चिकित्सक से हमारी सहायता प्राप्त करने के व्यवहार को प्रभावित करता है, वह है पीड़ा की अनुभूति जो व्यक्ितत्व, दु¯श्चता तथा सामाजिक मानकों का प्रकायर् होती है। ;खद्ध व्यवहार μ मनोवैज्ञानिकों ने प्रबल साक्ष्य प्राप्त किए हैं जो यह प्रदश्िार्त करते हैं कि हमारे व्यवहार तथा जीवन शैली हमारे स्वास्थ्य को अत्यिाक प्रभावित करते हैं। लोग ऐसे व्यवहारपरक जोख्िाम उठाने, जैसे - धूम्रपान या तंबावूफ का उपयोग, मद्य तथा मादक द्रव्य का दुरुपयोग, असुरक्ष्िात काम - व्यवहार, आहार तथा शारीरिक व्यायाम इत्यादि में अत्यिाक भ्िान्नताएँ प्रद£शत करते हैं। अब यह स्वीकार किया जा चुका है कि ऐसे व्यवहार काॅरोनरि हृदय रोग ;बवतवदंतल ीमंतज कपेमंेमए ब्भ्क्द्ध, वैंफसर और एच.आइर्.वी./एड्स से तथा अनेक अन्य रोगों से संब( होते हैं। एक नइर् विद्याशाखा, जिसे व्यवहार आयु£वज्ञान ;ठमींअपवनत डमकपबपदमद्ध कहते हैं प्रकट हुइर् है, जो रोग से जनित दबाव को उपशमित करने हेतु व्यवहार में परिष्करण या परिवतर्न पर बल देती है। ;गद्ध सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारक - अब ऐसे शोध कायो± की संख्या में निरंतर वृि हो रही है जो यह प्रदश्िार्तकरते हैं कि सामाजिक तथा सांस्कृतिक विभेद हमारी शरीरियात्मक अनुियाओं को प्रभावित कर सकते हैं तथावे सभी संस्कृतियों में एक समान नहीं होते। उदाहरण के लिए, अमषर् तथा क्रोध एवं सी.एच.डी. में संबंध सभीसंस्कृतियों में एक समान नहीं हैं ;उदाहरण के लिए, भारततथा चीन मेंद्ध। यद्यपि संस्कृति तथा शरीरियात्मक अनुियाओं में अंतःिया पर और अिाक साक्ष्यों कीआवश्यकता है, ¯कतु सामाजिक तथा सांस्कृतिक मानक जो भूमिकाओं और ¯लगों से जुड़े हैं, वे हमारे स्वास्थ्य व्यवहारों को बहुत अिाक प्रभावित करते हैं। भारतीय समाज में महिलाओं के लिए चिकित्सा सलाह कइर् कारणों से देर में उपलब्ध हो पाती है - उन्हें कम मूल्यवान समझा जाता है, या इस विश्वास के कारण कि वे अिाक हष्टपुष्ट या दृढ़ होती हैं या रोग के साथ शमर् के संब( होने के कारण। व्यवहार पर टेलीविशन का समाघात इसमें कोइर् संदेह नहीं कि टेलीविशन प्रौद्योगिकीय प्रगति का एक उपयोगी उत्पाद है। ¯कतु उसके मानव पर मनोवैज्ञानिक समाघात के संबंध में दोनों सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव पाए गए हैं। अनेक शोध अध्ययनों में टेलीविशन देखने की संज्ञानात्मक प्रियाओं तथा सामाजिक व्यवहारों पर प्रभाव का अध्ययन किया गया है, विशेष रूप से पाश्चात्यसंस्कृतियों में। उनके निष्कषर् मिश्रित ;मिले - जुलेद्ध प्रभाव दिखाते हैं। अध्िकांश अध्ययन बच्चों पर किए गए हैं क्योंकि ऐसा समझा जाता है कि वे वयस्कों की अपेक्षा टेलीविशन के समाघात के प्रति अिाक संवेदनशील या असुरक्ष्िात हैं। पहला, टेलीविजन बड़ी मात्रा में सूचनाएँ और मनोरंजन को आकषर्क रूप में प्रस्तुत करता है तथा यह दृश्य माध्यम है, अतः यह अनुदेश देने का एक प्रभावी माध्यम बन गया। इसके साथ ही क्योंकि कायर्क्रम आकषर्क होते हैं, इसलिए बच्चे उन्हें देखने में बहुत अिाक समय व्यतीत करते हैं। इसके कारण उनके पठन - लेखन ;पढ़ने - लिखनेद्ध की आदत तथा घर के बाहर की गतिविध्ियों, जैसे - खेलने में कमी आती है। दूसरा, टेलीविशन देखने से बच्चों की एक लक्ष्य पर ध्यान वंेफित करने की योग्यता, उनकी सजर्नात्मकता तथा समझने की क्षमता तथा उनकी सामाजिक अंतःियाएँ भी प्रभावित हो सकती हैं। एक ओर, वुफछ श्रेष्ठ कायर्क्रमसकारात्मक अंतवैर्यक्ितक अभ्िावृिायों पर बल देते हैं तथा उपयोगी तथ्यात्मक सूचनाएँ उपलब्ध कराते हैं जो बच्चों को वुफछ वस्तुओं को अभ्िाकल्िपत तथा निमिर्त करने में सहायता करते हैं। दूसरी ओर, ये कायर्क्रम कम उम्र केदशर्कों का विकषर्ण या चित्त - अस्िथर कर एक लक्ष्य पर ध्यान वेंफित करने की उनकी योग्यता में व्यवधान उत्पन्न कर सकते हैं। तीसरा, लगभग चालीस वषर् पूवर् अमरीका तथा कनाडा में एक गंभीर वाद - विवाद इस विषय पर उठा कि टेलीविशन देखने का दशर्कों, विशेषकर बच्चों, की आक्रामकता तथाहिंसात्मक प्रवृिा पर क्या प्रभाव पड़ता है। जैसा कि पहले आक्रामक व्यवहारों के संदभर् में बताया जा चुका है, शोध के परिणामों ने यह प्रदश्िार्त किया कि टेलीविशन पर हिंसा को देखना वस्तुतः दशर्कों में अिाक आक्रामकता से संब( था। यदि दशर्क बच्चे थे तो जो वुफछ वे देखते थे उसकाअनुकरण करने की उनमें प्रवृिा थी ¯कतु उनमें ऐसे व्यवहारों के परिणामों को समझने की परिपक्वता नहीं थी। तथापि, वुफछ अन्य शोध अध्ययनों में यह रेखांकित किया गया के विज्ञापन प्रसारित किए जाते हैं तथा किसी दशर्क के लिए कि केवल टेलीविशन पर हिंसा देखने मात्रा से बच्चे अिाक उनके प्रभाव में आ जाना कापफी स्वाभाविक प्रिया है।़आक्रामक नहीं हो जाते हैं। स्िथति में अन्य कारकों की इन परिणामों की चाहे वैफसे भी व्याख्या की जाए, उपस्िथति भी आवश्यक है। वुफछ अन्य शोध - निष्कषर् यह इस बात के लिए पयार्प्त प्रमाण हैं जो असीमित टेलीविशन भी प्रदश्िार्त करते हैं कि हिंसा को देखने से दशर्कों मेंदेखने के प्रति चेतावनी देते हैं।वस्तुतः सहज आक्रामक प्रवृिायों में कमी आ सकती है - जो वुफछ भीतर रुका हुआ है उसे निकास या निगर्म का मागर् मिल जाता है, इस प्रकार तंत्रा सापफ हो जाता है, जैसेकि एक बंद निकास - नल की सपफाइर् की जा रही हो। यह प्रिया वैफथा£सस ;बंजींतेपेद्ध कहलाती है। चैथा, वयस्कों तथा बच्चों के संबंध् में यह कहा जाताहै कि एक उपभोक्तावादी अभ्िावृिा ;प्रवृिाद्ध विकसित हो रही है और यह टेलीविशन देखने के कारण है। बहुत से उत्पादों प्रमुख पद आक्रमण, वायु प्रदूषण, संक्रामक या संचारी रोग, प्रतिस्पधार् सहिष्णुता, भीड़ सहिष्णुता, भीड़, विपदा, विस्थापन, पारिस्िथतिकी, पयार्वरण,पयार्वरणी मनोविज्ञान, नैमििाक परिप्रेक्ष्य, माॅड¯लग या प्रतिरूपण, शोर, शांति, व्यक्ितगत स्थान, भौतिक पयार्वरण, अभ्िाघातज उत्तर दबाव विकार, निधर्नता उपशमन, निधर्नता, पयार्वरण - उन्मुख व्यवहार, आत्म - सक्षमता, सामाजिक पयार्वरण, आध्यात्िमक परिप्रेक्ष्य, संव्यहार उपागम। ऽ हम बढ़ती जनसंख्या, त्वरित औद्योगीकरण तथा मानव उपभोग की आवश्यकताओं की पूतिर् हेतु अपने भौतिक पयार्वरण से पुनरुज्जीवित होने वाले तथा पुनरुज्जीवित न होने वाले संसाधनों का उपयोग कर लेते हैं। अवांछनीय मानव ियाओं ने पयार्वरण की दशाओं को परिवतिर्त कर दिया है जिनके कारण प्रदूषण, शोर, भीड़ की समस्याएँखड़ी हो गइर् हैं तथा प्राकृतिक विपदाओं का प्रकटीकरण प्रबल हो गया है। ऽ पयार्वरणी संकट तथा उनके समाधानों को संव्यवहार तथा पांरपरिक भारतीय उपागमों द्वारा समझा जा सकता है। ऽ प्रदूषण हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य तथा मनोवैज्ञानिक प्रियाओं पर प्रतिवूफल प्रभाव डालता है। ऽ शोर भी हमारे चिंतन, स्मृति तथा अिागम पर प्रतिवूफल प्रभाव डालता है। तीव्र उच्च ध्वनि स्तर हमारी सुनने की क्षमता को स्थायी क्षति पहुँचा सकता है तथा हृदयगति, रक्तचाप और पेशी - तनाव बढ़ा सकता है। ऽ भीड़ पयार्प्त स्थान न होने की मनोवैज्ञानिक अनुभूति है। भीड़ संज्ञानात्मक निष्पादन, अंतवैर्यक्ितक संबंधों तथा शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर निषेधात्मक प्रभाव डालती है। ऽ प्राकृतिक विपदा किसी समाज के सामान्य जनजीवन में व्यवधान डालती है तथा क्षति, विनाश और मानव पीड़ाका कारण बन जाती है। विपदा के पश्चात अभ्िाघातज उत्तर दबाव विकार अत्यंत सामान्य लक्षण है। विपदा प्रभावित व्यक्ितयों को परामशर् देकर तथा सामूहिक कायो± को करने के अवसर बढ़ाकर इस दबाव को कम किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, व्यक्ितयों तथा समुदायों में ऐसी संभावित विपदाओं के प्रति शीघ्र एवं प्रभावी प्रतििया करने हेतु पूवर् तैयारी विपदा के प्रतिवूफल प्रभाव को कम कर सकती है। ऽ पयार्वरण - उन्मुख व्यवहारों के अंतगर्त वे व्यवहार जिनका उद्देश्य पयार्वरण का समस्याओं से संरक्षण है तथा जो स्वस्थ पयार्वरण को उन्नत करते हैं, दोनों ही निहित हैं। ऽ समाज के एक बड़े वगर् को प्रभावित करने वाली समस्याओं के कारण सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक सरोकार उत्पन्न होते हैं। ऽ निम्न आथ्िार्क स्िथति ;स्तरद्ध निधर्नता का कारण है। इसका संबंध वंचन तथा असुविध से है। इसके कारण संज्ञानात्मक निष्पादन, व्यक्ितत्व तथा सामाजिक व्यवहार पर निषेधात्मक प्रभाव पड़ता है। निधर्न व्यक्ितयों के आथ्िार्क तथा सामाजिक सशक्तीकरण हेतु अनेक कायर्क्रम लागू किए जा रहे हैं। ऽ आक्रमण तथा हिंसा आधुनिक समाज की प्रमुख समस्याओं में से हैं। आक्रामकता के अिागम को बढ़ती हुइर्आक्रामकता की सामान्य समस्या के प्रति उपयुक्त अभ्िावृिा के विकास द्वारा कम किया जा सकता है। ऽ स्वास्थ्य, पूणर् शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक वुफशल - क्षेम या कल्याण की स्िथति है। राष्ट्र के समक्ष संक्रामक रोगों, जैसे - अतिसार, तपेदिक तथा एच.आइर्.वी./एड्स तथा असंक्रामक रोगों, जैसे - अल्परक्तता, वैंफसर, मधुमेह तथा दबाव - संब( विकारों में कमी लाने की चुनौती है। सकारात्मक जीवन शैली वाली आदतों के द्वारा सकारात्मक संवेगों तथा शारीरिक स्वस्थता को उन्नत किया जा सकता है तथा स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में कमी लाइर् जा सकती है। ऽ टेलीविशन देखने के पफलस्वरूप मानव व्यवहार पर सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों प्रभाव प्रेक्ष्िात किए गए हैं। अिाकांश शोध अध्ययन बच्चों पर किए गए हैं क्योंकि उनको वयस्कों की अपेक्षा टेलीविशन के समाघात के प्रति अिाक संवेदनशील या असुरक्ष्िात प्रत्यक्ष्िात किया जाता है। आप ‘पयार्वरण’ पद से क्या समझते हैं? मानव - पयार्वरण संबंध को समझने के लिए विभ्िान्न परिप्रेक्ष्यों की व्याख्या कीजिए। फ्मानव पयार्वरण को प्रभावित करते हैं तथा उससे प्रभावित होते हैंय्। इस कथन की व्याख्या उदाहरणों की सहायता से कीजिए। 3ण् शोर क्या है? मानव व्यवहार पर शोर के प्रभाव का विवेचन कीजिए। 4ण् भीड़ के प्रमुख लक्षण क्या हैं? भीड़ के प्रमुख मनोवैज्ञानिक परिणामों की व्याख्या कीजिए। 5ण् मानव के लिए ‘व्यक्ितगत स्थान’ का संप्रत्यय क्यों महत्वपूणर् है? अपने उत्तर को एक उदाहरण की सहायता से उचित सि( कीजिए। 6ण् ‘विपदा’ पद से आप क्या समझते हैं? अभ्िाघातज उत्तर दबाव विकार के लक्षणों को सूचीब( कीजिए। उसका उपचार वैफसे किया जा सकता है? 7ण् पयार्वरण - उन्मुख व्यवहार क्या है? प्रदूषण से पयार्वरण का संरक्षण वैफसे किया जा सकता है? वुफछ सुझाव दीजिए। 8ण् ‘निधर्नता’ ‘भेदभाव’ से वैफसे संबंिात है? निधर्नता तथा वंचन के मुख्य मनोवैज्ञानिक प्रभावों की व्याख्या कीजिए। 9ण् ‘नैमििाक आक्रमण’ तथा ‘शत्राुतापूणर् आक्रमण’ में अंतर कीजिए। आक्रामकता तथा हिंसा को कम करने हेतु वुफछ युक्ितयों का सुझाव दीजिए। 10ण् मानव व्यवहार पर टेलीविशन देखने के मनोवैज्ञानिक समाघात का विवेचन कीजिए। उसके प्रतिवूफल परिणामों को वैफसे कम किया जा सकता है? व्याख्या कीजिए। वेब¯लक्स ीजजचरूध्ध्सपइतंतलण्जीपदाुनमेजण्वतहध्25009ध्बंनेमेध्बंनेमेण्बलबसमण्ीजउस ीजजचरूध्ध्ूूूण्दमूेण्बवतदमससण्मकनध्ब्ीतवदपबसमध्99ध्2ण्18ण्99ध्बतवूकपदहण्ीजउस ीजजचरूध्ध्ूूूण्ीमसचहनपकमण्वतहध्उमदजंसध्चेलबीवसवहपबंसऋजतंनउंण्ीजउ ीजजचरूध्ध्रवंददमबंदजवतण्बवउध्उवदजतमंसचंचऋपिदण्ीजउ शैक्ष्िाक संकेत 1ण् वास्तविक जीवन के उदाहरण देकर शोर, प्रदूषण,भीड़ तथा प्राकृतिक विपदाओं के मानव व्यवहार पर मनोवैज्ञानिक प्रभावों के विषय में विद्या£थयों के मत ज्ञात किए जा सकते हैं। 2ण् पयार्वरण - उन्मुख व्यवहार के उन्नयन के विषय में विवेचन करते समय विद्याथ्िार्यों को, सरकार तथा पयार्वरण के क्षेत्रा में कायर् कर रहे गैर - सरकारी संगठनों द्वारा ली गइर् विभ्िान्न पहल - शक्ितयों के संबंध में विचार करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता ह।ै3ण् इस अध्याय वफी विषयवस्तु का संचालन करते समय अध्यापक कथानक पर प्रश्न पूछने, कहानियों, उपाख्यानों, खेलों, प्रयोगों, परिचचार्, कथोपकथन, उदाहरणों, सादृश्य, भूमिका निवार्ह इत्यादि उक्ितयों का उपयोग शांति - संबंिात मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए कर सकते हैं। 4ण् मनोविज्ञान तथा सामाजिक सरोकार के विषय पर जानकारी देते समय अध्यापक केवल सूचनाएँ देने के स्थान पर वादविवाद तथा परिचचार् का उपयोग कर सकते हैं। अिागम के प्रति यह उपागम विद्या£थयों को सामाजिक वास्तविकताओं के प्रति जीवंत बनाएगा।

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