lhgy209 Chapter-9 Page 1 अध्याय 9 'नियोजन' शब्द आपके लिए नया नहीं है क्योंकि यह हमारे दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाले शब्दों का एक अंग है। आपने इस शब्द का प्रयोग अपनी परीक्षा अथवा किसी पर्वतीय स्थल पर जाने के लिए की गई तैयारी के संदर्भ में किया होगा। इसमें सोच-विचार की प्रक्रिया, कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करना तथा उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु गतिविधियों का क्रियान्वयन सम्मिलित है। यद्यपि यह एक शब्द व्यापक है, परंतु इस अध्याय में इसका प्रयोग आर्थिक विकास की प्रक्रिया के संदर्भ में किया गया है। अतः उस तीर और तुक्का विधि से भिन्न है जिससे सुधार और भारत के संदर्भ में नियोजन और सततपोषणीय विकास भारत में नियोजन परिप्रेक्ष्य का अवलोकन भारत में केंद्रीकृत नियोजन है और नियोजन का कार्य भारत में योजना आयोग' को सौंपा गया है। यह एक वैधानिक संस्था है जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री हैं तथा इसके एक उपसभापति तथा सदस्य हैं। देश में नियोजन मुख्य रूप से पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से किया जाता है। | प्रथम पंचवर्षीय योजना 1951 में आरंभ हुई तथा यह 1951-52 से 1955-56 तक चली। द्वितीय तथा तृतीय पंचवर्षीय योजनाओं की समय अवधि क्रमशः 1956-57 से 1960-61 और 1961-62 से 1965-66 तक रही। 1960 के दशक के मध्य में लगातार दो सूखों (1965-66 और 1966-67) और 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के कारण 1966-67 और 1968-69 में ‘योजना अवकाश' लेना पड़ा। इस अवधि में वार्षिक योजनाएँ लागू रहीं जिन्हें ‘रोलिंग प्लान' भी कहा गया है। चतुर्थ पंचवर्षीय योजना 1969-70 में आरंभ हुई और 1973-74 तक चली। इसके बाद पाँचवीं पंचवर्षीय योजना आरंभ 1974-75 में आरंभ हुई परंतु तत्कालीन सरकार ने इसे एक वर्ष पहले अर्थात 1977-78 में ही समाप्त कर दिया। छठी पंचवर्षीय योजना 1980 में लागू हुई। सातवीं पंचवर्षीय योजना की अवधि 1985 से 1990 के बीच रही। एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता और उदारीकरण की नीति की शुरुआत के कारण आठवीं पंचवर्षीय योजना देरी से आरंभ हुई। इस योजना ने 1992 से 1997 के बीच की अवधि तय की। नौवीं पंचवर्षीय योजना 1997 से 2002 तक लागू रही। दसवीं पंचवर्षीय योजना 2002-2007 तक लागू रही ग्यारहवीं पंचवीर्षीय योजना का समय 2007-2012 तक रहा। 12 वीं पंचवर्षीय योजना 2012 से शुरु हुई है। तथा उस का मुख्य उपागम प्रपत्र तीव्रता के साथ और अधिक सम्मिलित तथा सतत वृद्धि है। Page 2 पुनर्निर्माण का कार्य किया जाता था। सामान्यतः नियोजन के दो और तमिलनाडु के नीलगिरी आदि को मिलाकर कुल 15 जिले उपगमन होते हैं: खंडीय (Sectoral) नियोजन और प्रादेशिक शामिल हैं। 1981 में 'पिछड़े क्षेत्रों पर राष्ट्रीय समिति ने उन नियोजन। खंडीय नियोजन का अर्थ है- अर्थव्यवस्था के विभिन्न सभी पर्वतीय क्षेत्रों को पिछड़े पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल करने की सेक्टरों, जैसे- कृषि, सिंचाई, विनिर्माण, ऊर्जा, निर्माण, परिवहन, सिफ़ारिश की जिनकी ऊँचाई 600 मीटर से अधिक है और संचार, सामाजिक अवसंरचना और सेवाओं के विकास के लिए जिनमें जनजातीय उप-योजना लागू नहीं है। कार्यक्रम बनाना तथा उनको लागू करना।। पिछड़े क्षेत्रों के विकास के लिए बनी राष्ट्रीय समिति ने किसी भी देश में सभी क्षेत्रों में एक समान आर्थिक विकास निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखकर पहाड़ी क्षेत्रों में विकास नहीं हुआ है। कुछ क्षेत्र बहुत अधिक विकसित हैं तो कुछ पिछड़े के लिए सुझाव दिए : (1) सभी लोग लाभान्वित हों, केवल हुए हैं। विकास का यह असमान प्रतिरूप (Pattern) सुनिश्चित प्रभावशाली व्यक्ति ही नहीं; (2) स्थानीय संसाधनों और करता है कि नियोजक एक स्थानिक परिप्रेक्ष्य अपनाएँ तथा प्रतिभाओं का विकास; (3) जीविका निर्वाह अर्थव्यवस्था को विकास में प्रादेशिक असंतुलन कम करने के लिए योजना बनाएँ। निवेश-उन्मुखी बनाना; (4) अंतः प्रादेशिक व्यापार में पिछड़े इस प्रकार के नियोजन को प्रादेशिक नियोजन कहा जाता है। क्षेत्रों का शोषण न हो; (5) पिछड़े क्षेत्रों की बाज़ार व्यवस्था में सुधार करके श्रमिकों को लाभ पहुँचाना; (6) पारिस्थिकीय लक्ष्य क्षेत्र नियोजन संतुलन बनाए रखना।। जो क्षेत्र आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं उन क्षेत्रों में नियोजन पहाड़ी क्षेत्र के विकास की विस्तृत योजनाएँ इनके प्रक्रम को विशेष ध्यान देना चाहिए। जैसा कि आप जानते हैंस्थलाकृतिक, पारिस्थिकीय, सामाजिक तथा आर्थिक दशाओं कि एक क्षेत्र का आर्थिक विकास उसके संसाधनों पर आधारित को ध्यान में रखकर बनाई गई। ये कार्यक्रम पहाडी क्षेत्रों में होता है। लेकिन कभी-कभी संसाधनों से भरपूर क्षेत्र भी पिछडे बागवानी का विकास, रोपण कृषि, पशुपालन, मुर्गी पालन, रह जाते हैं। आर्थिक विकास के लिए संसाधनों के साथ-साथ वानिकी, लघु तथा ग्रामीण उद्योगों का विकास करने के लिए तकनीक और निवेश की आवश्यकता होती है। लगभग डेढ़ स्थानीय संसाधनों को उपयोग में लाने के उद्देश्य से बनाए गए। दशक के नियोजन अनुभवों से, यह महसूस किया गया है कि आर्थिक विकास में क्षेत्रीय असंतुलन प्रबलित हो रहा था। सूखा संभावी क्षेत्र विकास कार्यक्रम क्षेत्रीय एवं सामाजिक विषमताओं की प्रबलता को काबू में रखने इस कार्यक्रम की शुरुआत चौथी पंचवर्षीय योजना में हुई। इसका के क्रम में योजना आयोग ने लक्ष्य क्षेत्र' तथा 'लक्ष्य-समूह' उद्देश्य सूखा संभावी क्षेत्रों में लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाना योजना उपागमों को प्रस्तुत किया है। लक्ष्य क्षेत्रों की ओर इंगित और सूखे के प्रभाव को कम करने के लिए उत्पादन के साधनों कार्यक्रमों के कुछ उदाहरणों में कमान नियंत्रित क्षेत्र विकास को विकसित करना था। पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में इसके कार्यक्रम, सूखाग्रस्त क्षेत्र विकास कार्यक्रम पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्षेत्र को और विस्तृत किया गया। प्रारंभ में इस कार्यक्रम के कार्यक्रम हैं। इसके साथ ही लघु कृषक विकास संस्था अंतर्गत ऐसे सिविल निर्माण कार्यों पर बल दिया गया जिनमें (SFDA), सीमांत किसान विकास संस्था (MFDA) आदि अधिक श्रमिकों की आवश्यकता होती है। परंतु बाद में इसमें कुछ लक्ष्य समुह कार्यक्रम के उदाहरण हैं। सिंचाई परियोजनाओं, भूमि विकास कार्यक्रमों, वनीकरण, चरागाह | आठवीं पंचवर्षीय योजना में पर्वतीय क्षेत्रों तथा उत्तर-पूर्वी विकास और आधारभूत ग्रामीण अवसंरचना जैसे विद्युत, सड़कों,, राज्यों, जनजातीय एवं पिछड़े क्षेत्रों में अवसंरचना को विकसित बाज़ार, ऋण सुविधाओं और सेवाओं पर जोर दिया। करने के लिए विशिष्ट क्षेत्र योजना को तैयार किया गया। पिछड़े क्षेत्रों के विकास की राष्ट्रीय समिति ने इस कार्यक्रम के क्रियान्वयन की समीक्षा की जिसमें यह पाया गया कि यह पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम कार्यक्रम मुख्यतः कृषि तथा इससे संबद्ध सेक्टरों के विकास तक पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रमों को पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में ही सीमित है और पर्यावरणीय संतुलन पुनःस्थापन पर इसमें प्रारंभ किया गया। और इसके अंतर्गत उत्तर प्रदेश के सारे पर्वतीय विशेष बल दिया गया। जनसंख्या वृद्धि के कारण लोग कृषि के जिले (वर्तमान उत्तराखण्ड), मिकिर पहाड़ी और असम की लिए सीमांत भूमि का उपयोग करने के लिए बाध्य हैं जिससे उत्तरी कछार की पहाड़ियाँ, पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग ज़िला पारिस्थितिकीय निम्नीकरण हो रहा है। अतः सूखा संभावी क्षेत्रों भारत के संदर्भ में नियोजन और सतपोषणीय विकास 105 Page 3 में वैकल्पिक रोजगार अवसर पैदा करने की आवश्यकता है। इन एक अलग पहचान है क्योंकि गद्दी लोग ऋतु-प्रवास करते हैं। क्षेत्रों का विकास करने की अन्य रणनीतियों में सूक्ष्म-स्तर पर तथा गद्दीयाली भाषा में बात करते हैं। समन्वित जल-संभर विकास कार्यक्रम अपनाना शामिल है। सूखा संभावी क्षेत्रों के विकास की रणनीति में जल, मिट्टी, पौधों, मानव यह क्षेत्र 32°11' उत्तर से 32°41' उत्तर अक्षांशों तथा तथा पशु जनसंख्या के बीच पारिस्थितिकीय संतुलन, पुनःस्थापन 76° 22' पूर्व से 76°53' पूर्व देशांतरों के बीच स्थित पर मुख्य रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए। है। यह प्रदेश लगभग 1,818 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला 1967 में योजना आयोग ने देश में 67 जिलों (पूर्ण या हुआ है और इसका अधिकतर भाग समुद्र तल से 1500 आंशिक) की पहचान सूखा संभावी जिलों के रूप में की। मीटर से 3700 मीटर की औसत ऊँचाई के बीच स्थित है। 1972 में सिंचाई आयोग ने 30 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र का मापदंड गद्दियों की आवास भूमि कहलाया जाने वाला यह क्षेत्र लेकर सूखा संभावी क्षेत्रों का परिसीमन किया। भारत में सूखा चारों दिशाओं में ऊँचे पर्वतों से घिरा हुआ है। इसके उत्तर में पीर पंजाल तथा दक्षिण में धौलाधार पर्वत श्रेणियाँ हैं। संभावी क्षेत्र मुख्यतः राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश, पूर्व में धौलाधार श्रेणी का फैलाव रोहतांग दर्रे के पास पीर महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र, आंध्र प्रदेश के रायलसीमा और पंजाल श्रेणी से मिलता है। इस क्षेत्र में रावी और इसकी तेलंगाना पठार, कर्नाटक पठार और तमिलनाडु की उच्च भूमि सहायक नदियाँ बुढील और टुडेन बहती हैं और गहरे तथा आंतरिक भाग के शुष्क और अर्ध-शुष्क भागों में फैले महाखड्चे का निर्माण करती हैं। ये नदियाँ इस पहाड़ी प्रदेश हुए हैं। पंजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान के सूखा को चार भूखंडों, होली, खणी, कुगती और दुण्डाह, में प्रभावित क्षेत्र सिंचाई के प्रसार के कारण सूखे से बच जाते हैं। विभाजित करती हैं। शरद् ऋतु में भरमौर में जमा देने वाली कड़ाके की सर्दी और बर्फ पड़ती है तथा जनवरी केस अध्ययन - भरमौर क्षेत्र में समन्वित जनजातीय में यहाँ औसत मासिक तापमान 4° सेल्सियस और जुलाई विकास कार्यक्रम । में 26° सेल्सियस रहता है। भरमौर जनजातीय क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले की दो तहसीलें, भरमौर और होली शामिल हैं। यह 21 नवंबर, 1975 भरमौर जनजातीय क्षेत्र में जलवायु कठोर है, आधारभूत से अधिसूचित जनजातीय क्षेत्र है। इस क्षेत्र में ‘गद्दी' जनजातीय संसाधन कम हैं और पर्यावरण भंगुर (fragile) है। इन कारकों समुदाय का आवास है। इस समुदाय की हिमालय क्षेत्र में अपनी ने इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और समाज को प्रभावित किया है। चित्र 9.1 * भरमौर संस्कृत शब्द ब्रह्मौर का अपभ्रंश है। इस पुस्तक में स्थानीय बोली की सुन्दरता को बनाए रखने के लिए भरमौर शब्द का प्रयोग किया गया है। 106 भारत : लोग और अर्थव्यवस्था Page 4 चित्र 9.2 2011 की जनगणना के अनुसार, भरमौर उपमंडल की जनसंख्या किया है और सामाजिक-आर्थिक विकास से वंचित रही है। 39,113 थी अर्थात् 21 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर। यह इनका आर्थिक आधार मुख्य रूप से कृषि और इससे संबद्ध हिमाचल प्रदेश के आर्थिक और सामाजिक रूप से सबसे क्रियाएँ जैसे भेड़ और बकरी पालन हैं। पिछड़े इलाकों में से एक है। ऐतिहासिक तौर पर, गद्दी भरमौर जनजातीय क्षेत्र में विकास की प्रक्रिया 1970 के जनजाति ने भौगोलिक और आर्थिक अलगाव का अनुभव दशक में शुरू हुई जब गद्दी लोगों को अनुसूचित जनजातियों भारत के संदर्भ में नियोजन और सततपोषणीय विकास 107 Page 5 में शामिल किया गया। 1974 में पाँचवीं पंचवर्षीय योजना के से होता है। मानव इतिहास के लंबे अंतराल में समाज और अंतर्गत जनजातीय उप-योजना प्रारंभ हुई और भरमौर को उसके जैव-भौतिक पर्यावरण की निरंतर अंत:क्रियाएँ समाज हिमाचल प्रदेश में पाँच में से एक समन्वित जनजातीय विकास की स्थिति का निर्धारण करती हैं। मानव और पर्यावरण परियोजना (आई.टी.डी.पी.) का दर्जा मिला। इस क्षेत्र विकास अंत:क्रिया की प्रक्रियाएँ इस बात पर निर्भर करती हैं कि समाज योजना का उद्देश्य गद्दियों के जीवन स्तर में सुधार करना और में किस प्रकार की प्रौद्योगिकी विकसित की है और किस भरमौर तथा हिमाचल प्रदेश के अन्य भागों के बीच में विकास प्रकार की संस्थाओं का पोषण किया है। प्रौद्योगिकी और के स्तर में अंतर को कम करना है। इस योजना के अंतर्गत संस्थाओं ने मानव-पर्यावरण अंत:क्रिया को गति प्रदान की है। परिवहन तथा संचार, कृषि और इससे संबंधित क्रियाओं तथा तो इससे पैदा हुए संवेग ने प्रौद्योगिकी का स्तर उँचा उठाया है। सामाजिक व सामुदायिक सेवाओं के विकास को सर्वाधिक और अनेक संस्थाओं का निर्माण और रूपांतरण किया है। अतः प्राथमिकता दी गई। विकास एक बहु-आयामी संकल्पना है और अर्थव्यवस्था, | इस क्षेत्र में जनजातीय समन्वित विकास उपयोजना का समाज तथा पर्यावरण में सकारात्मक व अनुक्रमीय परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान विद्यालयों, जन स्वास्थ्य सुविधाओं, द्योतक है। पेयजल, सड़कों, संचार और विद्युत के रूप में अवसंरचना विकास की संकल्पना गतिक है और इस संकल्पना का विकास है। परंतु होली और खणी क्षेत्रों में रावी नदी के साथ प्रादुर्भाव 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ है। द्वितीय विश्व बसे गाँव अवसंरचना विकास से सबसे अधिक लाभान्वित हुए युद्ध के उपरांत विकास की संकल्पना आर्थिक वृद्धि की पर्याय हैं। तुंदाह और कुगती क्षेत्रों के दूरदराज के गाँव अभी भी इस थी जिसे सकल राष्ट्रीय उत्पाद, प्रति व्यक्ति आय और प्रति विकास की परिधि से बाहर हैं। व्यक्ति उपभोग में समय के साथ बढ़ोतरी के रूप में मापा जाता जनजातीय समन्वित विकास उपयोजना लागू होने से हुए है। परंतु अधिक आर्थिक वृद्धि वाले देशों में भी असमान सामाजिक लाभों में साक्षरता दर में तेजी से वृद्धि, लिंग अनुपात वितरण के कारण गरीबी का स्तर बहुत तेजी से बढ़ा। अतः में सुधार और बाल-विवाह में कमी शामिल हैं। इस क्षेत्र में स्त्री 1970 के दशक में 'पुनर्वितरण के साथ वृद्धि' तथा 'वृद्धि और साक्षरता दर 1971 में 1.88 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में समानता' जैसे वाक्यांश विकास की परिभाषा में शामिल किए 65 प्रतिशत हो गई। स्त्री और पुरुष साक्षरता दर में अंतर अर्थात् गए। पुनर्वितरण और समानता के प्रश्नों से निपटते हुए यह साक्षरता में लिंग असमानता भी कम हुई है। गद्दियों की अनुभव हुआ कि विकास की संकल्पना को मात्र आर्थिक प्रक्षेत्र परंपरागत अर्थव्यवस्था जीवन निर्वाह कृषि व पशुचारण पर तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता। इसमें लोगों के कल्याण आधारित थी जिसमें खाद्यान्नों और पशुओं के उत्पादन पर बल और रहने के स्तर, जन स्वास्थ्य, शिक्षा, समान अवसर और दिया जाता था। परंतु 20वीं शताब्दी के अंतिम तीन दशकों के राजनीतिक तथा नागरिक अधिकारों से संबंधित मुद्दे भी सम्मिलित दौरान, भरमौर क्षेत्र में दालों और अन्य नकदी फ़सलों की खेती हैं। 1980 के दशक तक विकास एक बहु-आयामी संकल्पना में बढ़ोतरी हुई है। परंतु यहाँ खेती अभी भी परंपरागत तकनीकों के रूप में उभरा जिसमें समाज के सभी लोगों के लिए वृहद् से की जाती है। इस क्षेत्र को अर्थव्यवस्था में पशुचारण के स्तर पर सामाजिक एवं भौतिक कल्याण का समावेश है। घटते महत्व को इस बात से आँका जा सकता है कि आज कुल 1960 के दशक के अंत में पश्चिमी दुनिया में पर्यावरण पारिवारिक इकाइयों का दसवाँ भाग ही ऋतु प्रवास करता है। संबंधी मुद्दों पर बढ़ती जागरूकता की सामान्य वृद्धि के कारण परंतु गद्दी जनजाति आज भी बहुत गतिशील है क्योंकि इनकी सतत पोषणीय धारणा का विकास हुआ। इससे पर्यावरण पर एक बड़ी संख्या शरद् ऋतु में कृषि और मजदूरी करके औद्योगिक विकास के अनापेक्षित प्रभावों के विषय में लोगों की आजीविका कमाने के लिए कांगड़ा और आसपास के क्षेत्रों में चिंता प्रकट होती थी। 1968 में प्रकाशित एहलिच की पुस्तक प्रवास करती है। 'द पापुलेशन बम' और 1972 में मीडोस और अन्य द्वारा लिखी गई पुस्तक 'द लिमिट टू ग्रोथ' के प्रकाशन ने इस विषय पर सतत पोषणीय विकास लोगों और विशेषकर पर्यावरणविदों की चिंता और भी गहरी कर साधारणतया 'विकास' शब्द से अभिप्राय समाज विशेष की दी। इस घटनाक्रम के परिपेक्ष्य में विकास के एक नए माडल स्थिति और उसके द्वारा अनुभव किए गए परिवर्तन की प्रक्रिया जिसे 'सतत पोषणीय विकास' कहा जाता है, की शुरुआत हुई। 108 भारत : लोग और अर्थव्यवस्था Page 6 चित्र 9.3 पर्यावरणीय मुद्दों पर विश्व समुदाय की बढ़ती चिंता को विकास आयोग' (WECD) की स्थापना की जिसके प्रमुख ध्यान में रखकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने 'विश्व पर्यावरण और नार्वे की प्रधान मंत्री गरो हरलेम ब्रटलैंड थीं। इस आयोग ने भारत के संदर्भ में नियोजन और सततपोषणीय विकास 109 Page 7 फैला हुआ है। इसमें स्थानांतरित बालू टिब्बों वाला मरुस्थल भी सम्मिलित है; जहाँ स्थानांतरी बालू टिब्बे पाए जाते हैं। और ग्रीष्म ऋतु में तापमान 50° सेल्सियस तक पहुँच जाता है। लिफ्ट नहर में ढाल के विपरीत प्रवाह के लिए जल को बार-बार मशीनों से ऊपर उठाया जाता है। इंदिरा गांधी नहर तंत्र में सभी लिफ्ट नहरें मुख्य नहर के बाएँ किनारे से निकलती हैं जबकि मुख्य नहर के दाएँ किनारे पर सभी नहरें प्रवाह प्रणाल हैं। चित्र 9.4 : इंदिरा गांधी नहर अपनी रिपोर्ट 'अवर कॉमन फ्यूचर' (जिसे ब्रेटलैंड रिपोर्ट भी कहते हैं) 1987 में प्रस्तुत की। WECD ने सतत पोषणीय विकास की सीधी-सरल और वृहद् स्तर पर प्रयुक्त परिभाषा प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट के अनुसार सतत पोषणीय विकास का अर्थ है- 'एक ऐसा विकास जिसमें भविष्य में आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकता पूर्ति को प्रभावित किए बिना वर्तमान पीढ़ी द्वारा अपनी आवश्यकता की पूर्ति करना।' चित्र 9.5 : इंदिरा गांधी नहर और उसके समीपस्थ क्षेत्र केस अध्ययन चरण-I के कमान क्षेत्र में सिंचाई की शुरुआत 1960 इंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र के दशक के आरंभ में हुई जबकि चरण-II कमान क्षेत्र में 1980 के दशक के मध्य में सिंचाई आरंभ हुई। नहर सिंचाई इंदिरा गांधी नहर, जिसे पहले राजस्थान नहर के नाम से जाना । ' के प्रसार ने इस शुष्क क्षेत्र की पारिस्थितिकी, अर्थव्यवस्था जाता था, भारत में सबसे बड़े नहर तंत्रों में से एक है। 1948 और समाज को रूपांततरित कर दिया है। इससे इस क्षेत्र को में कॅवर सेन द्वारा संकल्पित यह नहर परियोजना 31 मार्च, पर्यावरणीय परिस्थितियों पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों 1958 को प्रारंभ हुई। यह नहर पंजाब में हरिके बाँध से स प्रकार के प्रभाव पड़े हैं। लंबी अवधि तक मृदा नमी उपलब्ध निकलती है और राजस्थान के थार मरुस्थल (मरुस्थली) होने और कमान क्षेत्र विकास के तहत शरू किए गए पाकिस्तान सीमा के समानांतर 40 कि.मी. की औसत दूरी पर वनीकरण और चरागाह विकास कार्यक्रमों से यहाँ भमि हरी- बहती है। इस नहर तंत्र की कुल नियोजित लंबाई 9060 कि. भरी हो गई है। इससे वाय अपरदन और नहरी तंत्र में बाल मी. है और यह 19.63 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य कमान क्षेत्र निक्षेप की प्रक्रियाएँ भी धीमी पड़ गई हैं। परंत सघन सिंचाई में सिंचाई की सुविधा प्रदान करेगी। कुल कमान क्षेत्र में से और जल के अत्यधिक प्रयोग से जल भराव और मृदा लवणता 70 प्रतिशत क्षेत्र प्रवाह नहर तंत्रों और शेष क्षेत्र लिफ्ट तंत्र की दोहरी पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो गई। द्वारा किया जाएगा। नहर का निर्माण कार्य दो चरणों में पूरा नहरी सिंचाई के प्रसार से इस प्रदेश की कषि अर्थव्यवस्था किया गया है। चरण-I का कमान क्षेत्र गंगानगर, हनुमानगढ़ प्रत्यक्ष रूप में रूपांतरित हो गई है। इस क्षेत्र में सफलतापूर्वक और बीकानेर जिले के उत्तरी भाग में पड़ता है। इस चरण के फ़सलें उगाने के लिए मृदा नमी सबसे महत्वपूर्ण सीमाकारी कमान क्षेत्र का भूतल थोड़ा ऊबड़-खाबड़ है और इसका कारक रहा है। परंतु नहरों द्वारा सिंचित क्षेत्र के विस्तार से बोये कृषि योग्य कमान क्षेत्र 5.53 लाख हेक्टेयर है। चरण-II का गये क्षेत्र में विस्तार हुआ है और फ़सलों की सघनता में वृद्धि कमान क्षेत्र बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, नागौर और हुई है। यहाँ की पारंपरिक फ़सलों, चना, बाजरा और ग्वार का चुरू ज़िलों में 14.10 लाख हेक्टेयर कृषियोग्य भूमि पर स्थान गेहूँ, कपास, मूंगफली और चावल ने ले लिया है। यह 110 भारत : लोग और अर्थव्यवस्था Page 8 सघन सिंचाई का परिणाम है। नि:संदेह, सघन सिंचाई से आरंभ हुए किसानों का बागाती कृषि के अंतर्गत खट्टे फलों की में कृषि और पशुधन उत्पादकता में अत्यधिक वृद्धि हुई। जल खेती करनी चाहिए। भराव और मृदा लवणता की समस्याएँ उत्पन्न हुईं और इस (iii) कमान क्षेत्र विकास कार्यक्रम जैसे नालों को पक्का प्रकार लंबी अवधि के दौरान कृषि की सतत पोषणता पर ही करना, भूमि विकास तथा समतलन और वारबंदी (ओसरा) प्रश्न उठ गए हैं। पद्धति (निकास के कमान क्षेत्र में नहर के जल का समान वितरण) प्रभावी रूप से कार्यान्वित की जाए सतत पोषणीय विकास को बढ़ावा देने वाले उपाय ताकि बहते जल की क्षति मार्ग में कम हो सके। बहुत से विद्वानों ने इंदिरा गांधी नहर परियोजना की (iv) इस प्रकार जलाक्रांत एवं लवण से प्रभावित भूमि का पारिस्थितिकीय पोषणता पर प्रश्न उठाए हैं। पिछले चार पुनरूद्धार किया जाएगा। दशक में, जिस तरह से इस क्षेत्र में विकास हुआ है और (v) वनीकरण, वृक्षों का रक्षण मेखला (shelterbelt) का इससे जिस तरह भौतिक पर्यावरण का निम्नीकरण हुआ है, निर्माण और चरागाह विकास। इस क्षेत्र, विशेषकर ने विद्वानों के इस दृष्टिकोण को काफ़ी हद तक सही चरण-2 के भंगुर पर्यावरण, में पारितंत्र-विकास (eco- ठहराया भी। यह एक मान्य तथ्य है कि इस कमान क्षेत्र में development) के लिए अति आवश्यक है। सतत पोषणीय विकास का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए मुख्य (vi) इस प्रदेश में सामाजिक सतत पोषणता का लक्ष्य तभी रूप से पारिस्थितिकीय सतत पोषणता पर बल देना होगा। हासिल किया जा सकता है यदि निर्धन आर्थिक स्थिति इसलिए, इस कमान क्षेत्र में सतत पोषणीय विकास को । वाले भूआवंटियों को कृषि के लिए पर्याप्त मात्रा में बढ़ावा देने वाले प्रस्तावित सात उपायों में से पाँच उपाय वित्तीय और संस्थागत सहायता उपलब्ध करवाई जाए। पारिस्थतिकीय संतुलन पुन:स्थापित करने पर बल देते हैं। (vii) मात्र कृषि और पशुपालन के विकास से इस क्षेत्रों में (i) पहली और सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है जल प्रबंधन । आर्थिक सतत पोषणीय विकास की अवधारणा को नीति का कठोरता से कार्यान्वयन करना। इस नहर साकार नहीं किया जा सकता। कृषि और इससे संबंधित परियोजना के चरण-1 में कमान क्षेत्र में फ़सल रक्षण क्रियाकलापों को अर्थव्यवस्था के अन्य सेक्टरों के साथ सिंचाई और चरण-2 में फ़सल उगाने और चरागाह विकसित करना पड़ेगा। इनसे इस क्षेत्र में आर्थिक विकास के लिए विस्तारित सिंचाई का प्रावधान है। विविधीकरण होगा तथा मूल आबादी गाँवों, कृषि-सेवा (ii) इस क्षेत्र के शस्य प्रतिरूप में सामान्यतः जल सघन केंद्रों (सुविधा गाँवों) और विपणन केंद्रों (मंडी कस्बों) फ़सलों को नहीं बोया जाना चाहिए। इसका पालन करते के बीच प्रकार्यात्मक संबंध स्थापित होगा। भारत के संदर्भ में नियोजन और सततपोषणीय विकास 111 Page 9 अभ्यास 1, नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए। (i) प्रदेशीय नियोजन का संबंध है- (क) आर्थिक व्यवस्था के विभिन्न सेक्टरों का विकास (ग) परिवहन जल तंत्र में क्षेत्रीय अंतर (ख) क्षेत्र विशेष के विकास का उपागम (घ) ग्रामीण क्षेत्रों का विकास (ii) आई.टी.डी.पी. निम्नलिखित में से किस संदर्भ में वर्णित है? (क) समन्वित पर्यटन विकास प्रोग्राम (ग) समन्वित जनजातीय विकास प्रोग्राम (ख) समन्वित यात्रा विकास प्रोग्राम (घ) समन्वित परिवहन विकास प्रोग्राम (iii) इंदिरा गाँधी नहर कमान क्षेत्र में सतत पोषणीय विकास के लिए इनमें से कौन-सा सबसे महत्वपूर्ण कारक है? (क) कृषि विकास (ग) परिवहन विकास (ख) पारितंत्र-विकास (घ) भूमि उपनिवेशन 2. निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें। (i) भरमौर जनजातीय क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास कार्यक्रम के सामाजिक लाभ क्या हैं? (ii) सतत पोषणीय विकास की संकल्पना को परिभाषित करें। (iii) इंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र का सिंचाई पर क्या सकारात्मक प्रभाव पड़ा? 3. निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 150 शब्दों में दें। (i) सूखा संभावी क्षेत्र कार्यक्रम पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें। यह कार्यक्रम देश में शुष्क भूमि कृषि विकास में कैसे सहायक है? (ii) इंदिरा गाँधी नहर कमान क्षेत्र में सतत पोषणीय विकास को बढ़ावा देने के लिए उपाय सुझाएँ। (i) (ii) अपने क्षेत्र में कार्यान्वित किए जा रहे क्षेत्र विकास कार्यक्रमों के बारे में पता लगाएँ। इन कार्यक्रमों का आपके आसपास समाज और अर्थव्यवस्था पर हुए प्रभाव का विश्लेषण करें। आप अपना क्षेत्र चुनें अथवा एक ऐसे क्षेत्र की पहचान करें जहाँ बहुत गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक आर्थिक समस्याएँ हैं। इस क्षेत्र के संसाधनों का अनुमान लगाएँ और उनकी एक सूची तैयार करें। जैसा कि इंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र के लिए किया गया है, इस क्षेत्र में सतत पोषणीय विकास को बढ़ावा देने वाले उपाय सुझाएँ। 112 भारत : लोग और अर्थव्यवस्था

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