से होड़ और उपनिवेश्िाक शक्ित की भेदमूलक नीति के कारण, इन निमार्ण वेंफद्रों का तेशी से विकास हुआ। उपनिवेशवाद के अंतिम चरणों में अंग्रशों ने चुने हुए क्षेत्रों में वुफछ उद्योगों को प्रोन्नत किया। इससे, देश में विभ्िान्न प्रकार के उद्योगों का बड़े पैमाने पर स्थानिक विस्तार हुआ। औद्योगिक नीति एक प्रजातांत्रिाक देश होने के कारण भारत का उद्देश्य संतुलित प्रादेश्िाक विकास के साथ आथ्िार्क संवृि लाना है। भ्िालाइर् और राउरकेला में लौह - स्पात उद्योग की स्थापना देश के पिछड़े जनजातीय क्षेत्रों के विकास के निणर्य पर आधारित थी। वतर्मान समय में भारत सरकार पिछड़े क्षेत्रों में स्थापित उद्योग - धंधों को अनेक प्रकार के प्रोत्साहन देती है। मुख्य उद्योग किसी भी देश के औद्योगिक विकास के लिए लौह - इस्पात उद्योग एक मूल आधार होता है। सूती वस्त्रा उद्योग हमारे परंपरागत उद्योगों में से एक है। चीनी उद्योग स्थानिक कच्चे माल पर आधारित है जो कि अंग्रेशों के समय में भी पफला पूफला। इनके अतिरिक्त इस अध्याय में वतर्मान में और भी आधुनिक उद्योग जैसे पेट्रोलियम रासायनिक उद्योग ;च्मजतवबीमउपबंस प्दकनेजतलद्ध और अवगम प्रौद्योगिकी उद्योग ;प्ज् प्दकनेजतलद्ध की भी विवेचना की जाएगी। लौह - इस्पात उद्योग लौह - इस्पात उद्योग के विकास ने भारत में तीव्र औद्योगिक विकास के दरवाशे खोल दिए। भारतीय उद्योग के लगभग सभी सेक्टर अपनी मूल आधारिक अवसंरचना के लिए मुख्य रूप से लोहा इस्पात उद्योग पर निभर्र करते हैं। क्या हम लोहे के उपयोग के बिना कृष्िा में होने वाले औशार बना सकते हैं? लौह इस्पात उद्योग के लिए लौह अयस्क और कोककारी कोयला के अतिरिक्त चूनापत्थर, डोलोमाइट, मैंगनीज और अग्िनसहमृिाका आदि कच्चे माल की भी आवश्यकता होती है। ये सभी कच्चे माल स्थूल ;भार ”ास वालेद्ध होते हैं। इसलिए लोहा - इस्पात उद्योग की सबसे अच्छी स्िथति कच्चे माल ड्डोतों के निकट होती है। भारत में छत्तीसगढ़, उत्तरी उड़ीसा, झारखंड और पश्िचमी पश्िचम बंगाल के भागों को समाविष्ट करते हुए एक अधर्चंद्राकार प्रदेश है जो कि उच्च कोटि के लौह अयस्क, अच्छे गुणवत्ता वाले कोककारी कोयला और अन्य संपूरकों से समृ( है। जिसके परिणामस्वरूप इस प्रदेश में लौह - इस्पात उद्योग प्रारंभ में ही स्थापित कर दिया गया था। भारतीय लौह - इस्पात उद्योग के अंतगर्त बड़े एकीकृत इस्पात कारखानों और छोटी इस्पात मिलें भी सम्िमलित हैं। इसके अंतगर्त द्वितीयक उत्पादक, ढलाइर् मिलें और आनुषंगिक उद्योग भी आते हैं। एकीकृत इस्पात कारखाने टाटा लौह - इस्पात वंफपनी ;ज्प्ैब्व्द्ध टाटा लौह - इस्पात मुंबइर् - कोलकाता रेलवे मागर् के बहुत निकट स्िथत है। यहाँ के इस्पात के नियार्त के लिए सबसे नशदीक ;लगभग 240 किलोमीटर दूरद्ध पत्तन कोलकाता है। संयंत्रा को पानी सुवणर् रेखा एवं खारकोइर् नदियों से, लोहा नोआमंडी और बादाम पहाड़ से, और कोयला जोड़ा खानों ;उड़ीसाद्ध से और कोवफकारी कोयला झरिया और पश्िचमी बोकारो कोयला क्षेत्रों से प्राप्त होता है। भारतीय लोहा और इस्पात वंफपनी ;प्प्ैब्व्द्ध भारतीय लोहा और इस्पात वंफपनी ने अपना पहला कारखाना हीरापुर में और दूसरा वुफल्टी में स्थापित किया। 1937 में भारतीय लोहा और इस्पात वंफपनी ;प्प्ैब्व्द्ध के साहचयर् से बंगाल स्टील कापोर्रेशन की स्थापना की गइर्, बनर्पुर ;पश्िचम बंगालद्ध में लोहा और इस्पात के उत्पादन की दूसरी इकाइर् की स्थापना की गइर्। ‘इंडियन आयरन स्टील वंफपनी’ के अिाकार क्षेत्रा में आने वाले तीनों संयंत्रा दामोदर घाटी कोयला क्षेत्रों ;रानीगंज, झरिया और रामगढ़द्ध के निकट कोलकाता - आसनसोल रेल मागर् पर स्िथत हैं। लौह अयस्क ¯सहभूमि ;झारखंडद्ध से आता है। जल दामोदर नदी की सहायक नदी बराकार से प्राप्त किया जाता है। दुभार्ग्य से, 1972 - 73 में भारतीय लोहा और इस्पात कारखानें से इस्पात उत्पादन बहुत कम हो गया और संयंत्रा सरकार द्वारा अिाग्रहित कर लिया गया। विश्वेश्वरैया आयरन एंड स्टील वक्सर् ;टप्ैॅद्ध तीसरा एकीकृत इस्पात संयंत्रा - विश्वेश्वरैया आयरन एंड स्टील वक्सर् - जो प्रारंभ में मैसूर लोहा और इस्पात वक्सर् के नाम से जाना जाता था, बाबाबूदन की पहाडि़यों के केमान गुंडी के लौह - अयस्क क्षेत्रों के निकट स्िथत है। चूना पत्थर और मैंगनीज भी आसपास के क्षेत्रों में उपलब्ध है। लेकिन इस प्रदेश में कोयला नहीं मिलता। प्रारंभ में पास के जंगलों से प्राप्त निमार्ण उद्योग 87 कपास उत्पादक क्षेत्रों में हुआ है, जहाँ देवनगरी, हुब्बलि, बल्लारि, मैसूरु और बेंगलूरु महत्वपूणर् वेंफद्र हैं। सूती वस्त्रा उद्योग कपास उत्पादक तेलंगाना प्रदेश में स्िथत है। वहाँ अिाकांश कताइर् मिलें हैं जो सूत का उत्पादन करती हैं। हैदराबाद, सिकंदराबाद और वारंगल महत्वपूणर् वेंफद्र हैं। उत्तर प्रदेश में कानपुर सबसे बड़ा वेंफद्र है। मोदीनगर, हाथरस, सहारनपुर, आगरा और लखनउफ वुफछ अन्य महत्वपूणर् वेंफद्र हैं। पश्िचम बंगाल में, सूती मिलें हुगली प्रदेश में स्िथत हैं। हावड़ा, सीरामपुर, कोलकाता और श्यामनगर महत्वपूणर् वेंफद्र हैं। स्वतंत्राता प्राप्ित के पश्चात् से सूती कपड़े के उत्पादन में लगभग 5 गुनी वृि हुइर् है। सूती कपड़े को सिंथेटिक कपड़ों से प्रतिस्पधार् का सामना करना पड़ रहा है। भारत में सूती वस्त्रा उद्योग की और कौन - सी अन्य समस्याएँ हैं? चीनी उद्योग चीनी उद्योग देश का दूसरा सबसे अिाक महत्वपूणर् कृष्िा - आधारित उद्योग है। भारत विश्व में गन्ना और चीनी दोनों का सबसे बड़ा उत्पादक देश है और यह विश्व के कुल चीनी उत्पादन का लगभग 8 प्रतिशत उत्पादन करता है। इसके अतिरिक्त गन्ने से खांडसारी और गुड़ भी तैयार किए जाते हंै। यह उद्योग 4 लाख से अिाक लोगों को प्रत्यक्ष रूप से और एक बड़ी संख्या में किसानों को अप्रत्यक्ष रूप से रोज़गार प्रदान करता है। कच्चे माल के मौसमी होने के कारण, चीनी उद्योग एक मौसमी उद्योग है। आधुनिक आधार पर उद्योग का विकास 1903 में प्रारंभ हुआ जब बिहार में एक चीनी मिल की स्थापना की गइर्। इसके बाद, बिहार और उत्तर प्रदेश के दूसरे भागों में चीनी मिलें खोली गईं। 1950 - 51 में 139 कारखानें प्रचालन में थे 2010 - 11 में चीनी मिलों की संख्या बढ़कर 662 हो गयी। उद्योग की अवस्िथति गन्ना एक भार - ”ास वाली प़्ाफसल है। चीनी और गन्ने का अनुपात 9 प्रतिशत से 12 प्रतिशत के बीच होता है जो इसकी गुणवत्ता पर निभर्र करता है। खेतों में काटकर एकत्रिात करने से लेकर ढुलाइर् की अविा तक इसमें सुक्रोज की मात्रा सूखती रहती है। गन्ने को खेत से काटने के 24 घंटे के अदरंही पेरा जाय तो अिाक चीनी की मात्रा प्राप्त होती है। अतः इस प्रदेश के अिाकांश कारखाने गन्ना उत्पादक क्षेत्रों के निकट ही स्िथत हैं। महाराष्ट्र देश में अग्रणी चीनी उत्पादक राज्य के रूप में विकसित हुआ और देश में कुल चीनी उत्पादन के एक - तिहाइर् से अिाक भाग का उत्पादन करता है। राज्य में 119 चीनी मिलें हैं जो एक सँकरी प‘ी के रूप में उत्तर में मनमाड से लेकर दक्ष्िाण में कोल्हापुर तक विस्तृत हैं। इनमें से 87 मिलें सहकारी सेक्टर में हैं। चीनी उत्पादन में उत्तर प्रदेश का द्वितीय स्थान है। चीनी उद्योग दो पेटियों - गंगा - यमुना दोआब और तराइर् प्रदेश में वेंफदि्रत है। गंगा - यमुना दोआब में सहारनपुर, मुजफ्रपफरनगर, मेरठ, गािायाबाद, बागपत और बुलंदशहर मुख्य चीनी उत्पादक िाले हैं, जबकि तराइर् प्रदेश के मुख्य चीनी उत्पादक िाले लखीमपुर खीरी, बस्ती, गोंडा, गोरखपुर, बहराइच हैं। तमिलनाडु में, चीनी मिलें कोयंबटूर, वेलौर, तिरुवनमलाइर्, विल्लुपुरम और तिरुचिरापल्ली िालों में स्िथत हैं। कनार्टक में बेलगावि, बेल्लारि, माण्डया, श्िावमोगा, विजयपुर और चित्रादुगर् मुख्य चीनी उत्पादक िाले हैं। यहाँ चीनी उद्योग आंध््र प्रदेश के तटीय जिलों में पूवीर् गोदावरी, पश्िचमी गोदावरी, विशाखापट्नम और तेलंगाना के निजामाबाद िाले और मेडक िाले में वितरित है। बिहार, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और गुजरात अन्य चीनी उत्पादक राज्य हैं। बिहार मंे सारन, चंपारन, मुजफ्रपफरपुर, सीवान, दरभंगा और गया ;मानचित्राद्ध मुख्य गन्ना उत्पादक िाले हैं। पंजाब का सापेक्ष्िाक महत्व कम हो गया है, यद्यपि गुरदासपुर, जलंधर, संगरूर, पटियाला एवं अमृतसर अब भी प्रमुख चीनी उत्पादक हैं। हरियाणा में चीनी मिलें यमुनानगर, रोहतक, हिसार और पफरीदाबाद िालों में स्िथत हैं। गुजरात में चीनी उद्योग तुलनात्मक रूप से नया है। यहाँ, चीनी मिलें सूरत, जूनागढ़, राजकोट, अमरेली, वालसद और भावनगर िालों के गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में स्िथत हैं। पेट्रो - रसायन उद्योग उद्योगों का यह वगर् भारत में तेशी से विकसित हो रहा है। उद्योगों की इस श्रेणी के अंतगर्त कइर् प्रकार के उत्पाद आते हैं। 1960 में जैव रसायनों की माँग इतनी तेशी से बढ़ी कि इसको पूरा करना कठिन हो गया। उस समय पेट्रोल परिशोधन उद्योग का तेशी से विस्तार हुआ। अपरिष्कृत पेट्रोल से कइर् 94 भारत: लोग और अथर्व्यवस्था प्रकार की वस्तुएँ तैयार की जाती हैं जो अनेक नए उद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराती हैं, इन्हें सामूहिक रूप से पेट्रो - रसायन उद्योग के नाम से जाना जाता है। उद्योगों के इस वगर् को चार उपवगो± में विभाजित किया गया है - ;1द्ध पाॅलीमर ;च्वसलउमतेद्धए ;2द्ध कृत्रिाम रेशे, ;3द्ध इलैस्टोमसर्, ;4द्ध पृष्ठ संियक ;ैनतंिबंदज प्दजमतउमकपंजमद्ध। मुंबइर् शैल - रसायन उद्योगों का कंेद्र है। पटाखों के उद्योग औरैया ;उत्तर प्रदेशद्ध, जामनगर, गांध्ीनगर और हजीरा ;गुजरातद्ध, नागोथाने, रत्नागिरि महाराष्ट्र, हल्िदया ;पश्िचम बंगालद्ध और विशाखापट्नम ;आंध्र प्रदेशद्ध में भी स्िथत हैं। रासायनिक और पेट्रो - रासायनिक विभाग के प्रशासनिक नियंत्राण में पेट्रो - रसायन सेक्टर के अंतगर्त तीन संस्थाएँ कायर् कर रही हैं। पहली, भारतीय पेट्रो - रासायनिक कापोर्रेशन लिमिटेड ;प्च्ब्स्द्ध सावर्जनिक सेक्टर में आती है। यह विभ्िान्न प्रकार के पेट्रो - रसायनों, जैसे - पाॅलीमर, रेशों और रेशों से बने संियक ;प्दजमतउमकपंजमद्ध का निमार्ण और वितरण करता है। दूसरा पेट्रोपिफल्स कोआॅपरेटिव लिमिटेड है जो भारत सरकार एवं बुनकरों की सहकारी संस्थाओं का संयुक्त प्रयास है। यह पाॅलिस्टर तंतु सूत और नाइलोन चिप्स का उत्पादन गुजरात स्िथत वडोदरा एवं नलधारी संयंत्रों में करता है। तीसरा, सेंट्रल इंस्िटट्यूट आॅपफ प्लास्िटक इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलाॅजी ;ब्प्च्म्ज्द्ध है जो पेट्रोकेमिकल उद्योग में प्रश्िाक्षण प्रदान करता है। सावर्जनिक सेक्टर में 1961 में स्थापित द नेशनल आगेर्निक केमिकल्स इंªडस्टीज लिमिटेड ;छव्ब्प्स्द्ध नेपफथा पर आधारित मंुबइर् का पहला रासायनिक उद्योग था। इसके बाद अन्य कइर् वंफपनियां बन गईं। मुंबइर्, बरौनी, मेटूर पिम्परी और रिशरा में स्िथत संयंुत्रा प्लास्िटक की वस्तुओं के मख्य उत्पादक हैं। लगभग 75 प्रतिशत इकाइयाँ लघु पैमाने के सेक्टर में हैं। यह उद्योग पुनःचवि्रफत ;तमबलबसमकद्ध प्लास्िटक का भी प्रयोग करता है जो पूरे उत्पादन का लगभग 30 प्रतिशत है। संश्िलष्ट तंतु ;ेलदजीमजपब पिइतमद्ध का अपने मशबूती, टिकाउफपन, प्रक्षालनता, धोने पर न सिवुफड़ने के गुणों के कारण इसका व्यापक रूप से प्रयोग कपड़ा बनाने के लिए किया जाता है। नायलान तथा पाॅलिस्टर धागा बनाने के संयंत्रा कोटा, पिंपरी, मुंबइर्, मोदी नगर, पुणे, उज्जैन, नागपुर एवं उधना में लगाये गए हैं। कोटा और वडोदरा में ऐवि्रफलिक कपड़े बनाए जाते हैं। यद्यपि प्लास्िटक हमारे दैनिक जीवन के उपयोग के लिए एक अपृथक्करणीय वस्तु बन चुकी है और हमारे रहन - सहन की प(ति को प्रभावित करती हैं परंतु जैव - निम्नीकरण का गुण न होने के कारण यह हमारे पयार्वरण के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। इसीलिए भारत के विभ्िान्न राज्यों में प्लास्िटक के उपयोग को हतोत्साहित किया जा रहा है। क्या आप जानते हैं कि प्लास्िटक किस प्रकार हमारे पयार्वरण को हानि पहुँचाता हैं? निमार्ण उद्योग 95

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