lhgy207 Chapter-7 Page 1 अध्याय 7 भारत, अपनी विविधतापूर्ण भूगर्भिक संरचना के कारण विविध प्रकार के खनिज संसाधनों से संपन्न है। भारी मात्रा में बहुमूल्य खनिज पूर्व-पुराजीवी काल या प्रीपैलाइजोइक ऐज में उद्भीत हैं। (संदर्भ-अध्याय-2 कक्षा 11 पाठ्य पुस्तक- 'भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत') और मुख्यतः प्रायद्वीपीय भारत की आग्नेय तथा कायांतरित चट्टानों से संबद्ध हैं। उत्तर भारत के विशाल जलोढ़ मैदानी भूभाग आर्थिक उपयोग के खनिजों से विहीन हैं। किसी भी देश के खनिज संसाधन औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक आधार प्रदान करते हैं। इस अध्याय में, हम देश में विभिन्न प्रकार के खनिजों एवं ऊर्जा के संसाधनों की उपलब्धता के बारे में चर्चा करेंगे। खनिज तथा ऊर्जा संसाधन एक खनिज निश्चित रासायनिक एवं भौतिक गुणधर्मों (विशिष्टताओं) के साथ कार्बनिक या अकार्बनिक उत्पत्ति का एक प्राकृतिक पदार्थ है। खनिज संसाधनों के प्रकार रासायनिक एवं भौतिक गुणधर्मों के आधार पर खनिजों को दो प्रमुख श्रेणियों- धात्विक (धातु) और अधात्विक (अधातु) में समूहित किया जा सकता है; जोकि निम्न प्रकार से भी वर्गीकृत किए जा सकते हैं- चित्र 7.1 : खनिजों का वर्गीकरण जैसा कि उपर्युक्त आरेख से स्पष्ट है, धातु के स्रोत धात्विक खनिज हैं। लौह अयस्क, ताँबा एवं सोना (स्वर्ण) Page 2 आदि से धातु उपलब्ध होते है और इन्हें धात्विक खनिज श्रेणी 97 प्रतिशत भाग दामोदर, सोन, महानदी और गोदावरी नदियों में रखा गया है। धात्विक खनिजों को लौह एवं अलौह धात्विक की घाटियों में पाया जाता है। पेट्रोलियम के आरक्षित भंडार श्रेणी में भी बाँटा गया है। लौह, जैसा कि आप जानते हैं, लोहा असम, गुजरात तथा मुंबई हाई अर्थात् अरब सागर के अपतटीय है। वे सभी प्रकार के खनिज, जिनमें लौह अंश समाहित होता क्षेत्र में पाए जाते हैं। नए आरक्षित क्षेत्र कृष्णा-गोदावरी तथा है जैसे कि लौह अयस्क वे लौह धात्विक होते हैं और जिन्हें कावेरी बेसिनों में पाए गए हैं। अधिकांश प्रमुख खनिज मंगलोर लौह अंश नहीं होता है, वे अलौह धात्विक खनिज में आते हैं से कानपुर को जोड़ने वाली (कल्पित) रेखा के पूर्व में पाए जैसे कि ताँबा, बॉक्साइट आदि। जाते हैं। भारत की प्रमुख खनिज पट्टियाँ हैं- अधात्विक खनिज या तो कार्बनिक उत्पत्ति के होते हैं। भारत में खनिज मुख्यतः तीन विस्तृत पट्टियों में सांद्रित हैं। जैसे कि जीवाश्म ईंधन, जिन्हें खनिज ईंधन के नाम से जानते कुछ कदाचनिक भंडार यत्र-तत्र एकाकी खंडों में भी पाए जाते हैं या वे पृथ्वी में दबे प्राणी एवं पादप जीवों से प्राप्त होते हैं हैं। ये पट्टियाँ हैं : जैसे कि कोयला और पेट्रोलियम आदि। अन्य प्रकार के अधात्विक खनिज अकार्बनिक उत्पत्ति के होते हैं जैसे अभ्रक, उत्तर-पूर्वी पठारी प्रदेश चूना-पत्थर तथा ग्रेफाइट आदि।। इस पट्टी के अंतर्गत छोटानागपुर (झारखंड), ओडिशा पठार, पं. खनिजों की कुछ निश्चित विशेषताएँ होती हैं। यह क्षेत्र बंगाल तथा छत्तीसगढ़ के कुछ भाग आते हैं। क्या आपने कभी में असमान रूप से वितरित होते हैं। खनिजों की गुणवत्ता और सोचा है कि प्रमुख लौह एवं इस्पात उद्योग इस क्षेत्र में क्यों मात्रा के बीच प्रतिलोमी संबंध पाया जाता है अर्थात् अधिक अवस्थित हैं? यहाँ पर विभिन्न प्रकार के खनिज उपलब्ध हैं जैसे गुणवत्ता वाले खनिज, कम गुणवत्ता वाले खनिजों की तुलना में कि लौह अयस्क, कोयला, मैंगनीज, बॉक्साइट व अभ्रक आदि। कम मात्रा में पाए जाते हैं। तीसरी प्रमुख विशेषता यह है कि ये सभी खनिज समय के साथ समाप्त हो जाते हैं। भूगर्भिक दृष्टि से इन्हें बनने में लंबा समय लगता है और आवश्यकता उन विशिष्ट प्रदेशों का पता करें, जहाँ इन खनिजों के समय इनका तुरंत पुनर्भरण नहीं किया जा सकता। अतः इन्हें का दोहन हो रहा है। संरक्षित किया जाना चाहिए और इनका दुरुपयोग नहीं होन चाहिए क्योंकि इन्हें दुबारा उत्पन्न नहीं किया जा सकता। " दक्षिण-पश्चिमी पठार प्रदेश यह पट्टी कर्नाटक, गोआ तथा संस्पर्शी तमिलनाडु उच्च भूमि और केरल पर विस्तृत है। यह पट्टी लौह धातुओं तथा बॉक्साइट खनिज के अन्वेषण में संलग्न अधिकरण में समृद्ध है। इसमें उच्च कोटि का लौह अयस्क, मैंगनीज़ तथा भारत में, खनिजों का व्यवस्थित सर्वेक्षण, पूर्वेक्षण चूना-पत्थर भी पाया जाता है। निवेली लिगनाइट को छोड़कर (Prospecting) तथा अन्वेषण के कार्य भारतीय इस क्षेत्र में कोयला निक्षेपों का अभाव है। भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI), तेल एवं प्राकृतिक गैस | इस पट्टी के खनिज निक्षेप उत्तर-पूर्वी पट्टी की भाँति आयोग (ONGC), खनिज अन्वेषण निगम लि. विविधता पूर्ण नहीं है। केरल में मोनाजाइट तथा थोरियम, और (MECL), राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (NMDC), बॉक्साइट क्ले के निक्षेप हैं। गोआ में लौह अयस्क निक्षेप पाए इंडियन ब्यूरो ऑफ माइंस (IBM), भारत गोल्डमाइंस लि. (BGML), राष्ट्रीय एल्यूमिनियम कं. लि. जाते हैं। (NALCO) और विभिन्न राज्यों के खदान एवं भूविज्ञान उत्तर-पश्चिमी प्रदेश विभाग करते हैं। यह पट्टी राजस्थान में अरावली और गुजरात के कुछ भाग पर विस्तृत है और यहाँ के खनिज धारवाड़ क्रम की शैलों से भारत में खनिजों का विरतण संबद्ध हैं। ताँबा, जिंक आदि प्रमुख खनिज है। राजस्थान बलुआ भारत में अधिकांश धात्विक खनिज प्रायद्वीपीय पठारी क्षेत्र की पत्थर, ग्रेनाइट, संगमरमर, जिप्सम जैसे भवन निर्माण के पत्थरों प्राचीन क्रिस्टलीय शैलों में पाए जाते हैं। कोयले का लगभग में समृद्ध हैं और यहाँ मुल्तानी मिट्टी के भी विस्तृत निक्षेप पाए खनिज तथा ऊर्जा संसाधन 73 Page 3 जाते हैं। डोलोमाइट तथा चूना पत्थर सीमेंट उद्योग के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराते हैं। गुजरात अपने पेट्रोलियम निक्षेपों के लिए जाना जाता है। आप जानते होंगे कि गुजरात व राजस्थान दोनों में नमक के समृद्ध स्रोत हैं। महात्मा गांधी द्वारा कब और क्यों दांडी मार्च आयोजित किया गया था? हिमालयी पट्टी एक अन्य खनिज पट्टी है जहाँ ताँबा, सीसा, जस्ता, कोबाल्ट तथा रंगरत्न पाया जाता है। ये पूर्वी और पश्चिमी दोनों भागों में पाए जाते हैं। असम घाटी में खनिज तेलों के निक्षेप हैं। इनके अतिरिक्त खनिज तेल संसाधन मुंबई के निकट अपतटीय क्षेत्र (मुंबई हाई) में भी पाए जाते है। आगे के पृष्ठों में, आप कुछ महत्वपूर्ण खनिजों के स्थानिक प्रारूपों के बारे में जानेंगे। लौह खनिज लौह अयस्क, मैंगनीज़ तथा क्रोमाइट आदि जैसे लौह खनिज क्या आप इसके कारण पता लगा सकते हैं? धातु आधारित उद्योगों के विकास के लिए एक सुदृढ़ आधार प्रदान करते हैं। लौह खनिजों के संचय एवं उत्पादन दोनों में ही लौह एवं इस्पात संयंत्र इनके आसपास ही स्थित हैं। नोआमंडी हमारे देश की स्थिति अच्छी है। और गुआ जैसी अधिकतर महत्वपूर्ण खदानें पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम जिलों में स्थित हैं। यह पट्टी और आगे दुर्ग, दांतेवाड़ा लौह अयस्क और बैलाडीला तक विस्तृत हैं। डल्ली तथा दुर्ग में राजहरा की भारत में लौह अयस्क के प्रचुर संसाधन हैं। यहाँ एशिया के खदानें देश की लौह अयस्क की महत्वपूर्ण खदानें हैं। कर्नाटक विशालतम लौह अयस्क आरक्षित हैं। हमारे देश में इस अयस्क में, लौह अयस्क के निक्षेप बल्लारि जिले के संदूर-होसपेटे क्षेत्र के दो प्रमुख प्रकार- हेमेटाइट तथा मैग्नेटाइट पाए जाते हैं। में तथा चिकमगलूरु ज़िले की बाबा बूदन पहाड़ियों और कुद्रेमुख इसकी सर्वोत्तम गुणवत्ता के कारण इसकी विश्व-भर में भारी तथा शिवमोगा, चित्रदुर्ग और तुमकुरु जिलों के कुछ हिस्सों में माँग है। लौह-अयस्क की खदानें देश के उत्तर-पूर्वी पठार पाए जाते हैं। महाराष्ट्र के चंद्रपुर भंडारा और रत्नागिरि ज़िले, प्रदेश में कोयला क्षेत्रों के निकट स्थित हैं जो इसके लिए तेलंगाना के करीम नगर, वारंगल जिले, आंध्र प्रदेश के कुरूनूल, लाभप्रद है। कडप्पा तथा अनंतपुर ज़िले और तमिलनाडु राज्य के सेलम तथा हमारे देश में 2004-05 में लौह अयस्क के आरक्षित भंडार नीलगिरी ज़िले लौह अयस्क खनन के अन्य प्रदेश हैं। गोआ भी लगभग 200 करोड़ टन थे। लौह अयस्क के कुल आरक्षित लौह अयस्क महत्वपूर्ण उत्पादक के रूप में उभरा है। भंडारों का लगभग 95 प्रतिशत भाग ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, गोआ, आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु राज्यों में स्थित हैं। | मैंगनीज ओडिशा में लौह अयस्क सुंदरगढ़, मयूरभंज, झार स्थित पहाड़ी लौह अयस्क के प्रगलन के लिए मैंगनीज़ एक महत्वपूर्ण शृंखलाओं में पाया जाता है। यहाँ की महत्वपूर्ण खदानें- गुरुमहिसानी, कच्चा माल है और इसका उपयोग लौह-मिश्रातु, विनिर्माण सुलाएपत, बादामपहाड़ (मयूरभंज) किरुबुरू (केंदूझार) तथा में भी किया जाता है। मैंगनीज़ निक्षेप लगभग सभी भूगर्भिक बोनाई (सुंदरगढ़) हैं। झारखंड की ऐसी ही पहाड़ी श्रृंखलाओं में संरचनाओं में पाया जाता है हालाँकि; मुख्य रूप से यह कुछ सबसे पुरानी लौह अयस्क की खदानें हैं तथा अधिकतर धारवाड़ क्रम से संबद्ध है। 74 भारत : लोग और अर्थव्यवस्था Page 4 चित्र 7.2: भारत - धात्विक खनिज (लौह धातु) खनिज तथा ऊर्जा संसाधन 75 Page 5 ओडिशा मैंगनीज़ का अग्रणी उत्पादक है। ओडिशा की ताँबा मुख्य खदानें भारत की लौह अयस्क पट्टी के मध्य भाग में बिजली की मोटरें, ट्रांसफार्मर तथा जेनेरेटर्स आदि बनाने तथा विशेष रूप से बोनाई, केन्दुझर, सुंदरगढ़, गंगपुर, कोरापुट, विद्युत उद्योग के लिए ताँबा एक अपरिहार्य धातु है। यह एक कालाहांडी तथा बोलनगीर स्थित हैं। कर्नाटक एक अन्य मिश्रातु योग्य, आघातवर्थ्य तथा तन्य धातु हैं। आभूषणों को प्रमुख उत्पादक है तथा यहाँ की खदानें धारवाड़, बल्लारी, सुदृढ़ता प्रदान करने के इसे स्वर्ण के साथ भी मिलाया जाता है। बेलगावी, उत्तरी कनारा, चिकमगलूरु, शिवमोगा, चित्रदुर्ग ताँबा निक्षेप मुख्यतः झारखंड के सिंहभूमि जिले में, मध्य तथा तुमकुरु में स्थित हैं। महाराष्ट्र भी मैंगनीज़ का एक प्रदेश के बालाघाट तथा राजस्थान के झुंझुनु एवं अलवर जिलों महत्वपूर्ण उत्पादक हैं। यहाँ मैंगनीज़ का खनन नागपुर, में पाए जाते हैं। भंडारा तथा रत्नागिरी जिलों में होता है। इन खदानों के अलाभ ताँबा के गौण उत्पादक आंध्र प्रदेश गुंटूर ज़िले का ये हैं कि ये इस्पात संयंत्रों से दूर स्थित हैं। मध्य प्रदेश में अग्निगुंडाला, कर्नाटक के चित्रदुर्ग तथा हासन ज़िले और मैंगनीज़ की पट्टी बालाघाट, छिंदवाड़ा, निमाड, मांडला और तमिलनाडु का दक्षिण आरकाट ज़िला हैं। झाबुआ जिलों तक विस्तृत है। तेलंगाना, गोआ तथा झारखंड मैंगनीज़ के अन्य अधात्विक खनिज गौण उत्पादक हैं। भारत में उत्पादित अधात्विक खनिजों में अभ्रक महत्वपूर्ण है। स्थानीय खपत के लिए उत्पन्न किए जा रहे अन्य खनिज अलौह-खनिज चूनापत्थर, डोलोमाइट तथा फोस्फेट हैं। बॉक्साइट को छोड़कर अन्य सभी अलौह-खनिजों के संबंध अभ्रक में भारत एक स्थिति निम्न है। अभ्रक का उपयोग मुख्यतः विद्युत एवं इलेक्ट्रोनिक्स उद्योगों में किया जाता है। इसे पतली चादरों में विघटित किया जा सकता बॉक्साइट है जो काफ़ी सख्त और सुनम्य होती है। भारत में अभ्रक मुख्यतः बॉक्साइट एक अयस्क है जिसका प्रयोग एल्यूमिनियम के झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना व राजस्थान में पाया जाता है। विनिर्माण में किया जाता है। बॉक्साइट मुख्यतः टरश्यरी इसके पश्चात् तमिलनाडु, पं. बंगाल और मध्य प्रदेश आते हैं। निक्षेपों में पाया जाता है और लैटराइट चट्टानों से संबद्ध है। झारखंड में उच्च गुणवत्ता वाला अभ्रक निचले हजारीबाग पठार यह विस्तृत रूप से प्रायद्वीपीय भारत के पठारी क्षेत्रों अथवा की 150 कि.मी. लंबी व 22 कि.मी. चौड़ी पट्टी में पाया जाता पर्वत श्रेणियों के साथ-साथ देश के तटीय भागों में भी पाया है। आंध्र प्रदेश में, नेल्लोर जिले में सर्वोत्तम प्रकार के अभ्रक का जाता है। उत्पादन किया जाता है। राजस्थान में अभ्रक की पट्टी लगभग | ओडिशा बॉक्साइट का सबसे बड़ा उत्पादक है। कालाहांडी 320 कि.मी. लंबाई में जयपुर से भीलवाड़ा और उदयपुर के तथा संभलपर अग्रणी उत्पादक हैं। दो अन्य क्षेत्र जो अपने आसपास विस्तृत है। कर्नाटक के मैसूर व हासन जिले, तमिलनाडु उत्पादन को बढ़ा रहे हैं वे बोलनगीर तथा कोरापुट हैं। । के कोयम्बटूर, तिरुचिरापल्ली, मदुरई तथा कन्याकुमारी जिले; झारखंड में लोहारडागा जिले की पैटलैंडस में इसके समृद्ध । । महाराष्ट्र के रत्नागिरी तथा पश्चिम बंगाल के पुरुलिया एवं निक्षेप हैं। गुजरात, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र अन्य बाँकुरा जिलों भी अभ्रक के निक्षेप पाए जाते हैं। प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। गुजरात के भावनगर और जामनगर ऊर्जा संसाधन में इसके प्रमुख निक्षेप हैं। छत्तीसगढ़ में बॉक्साइट निक्षेप ऊर्जा उत्पादन के लिए खनिज ईधन अनिवार्य हैं। ऊर्जा की अमरकंटक के पठार में पाए जाते हैं जबकि मध्य प्रदेश में आवश्यकता कषि, उद्योग, परिवहन तथा अर्थव्यवस्था के अन्य कटनी, जबलपुर तथा बालाघाट में बॉक्साइट के महत्वपूर्ण खंडों में होती है। कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस जैसे निक्षेप हैं। महाराष्ट्र में कोलाबा, थाणे, रत्नागिरी, सतारा, पुणे खनिज ईंधन (जो जीवाश्म ईंधन के रूप में जाने जाते हैं), तथा कोल्हापुर महत्वपूर्ण उत्पादक हैं। कर्नाटक, तमिलनाडु, परमाणु ऊर्जा, ऊर्जा के परंपरागत स्रोत हैं। ये परंपरागत स्रोत तथा गोआ बॉक्साइट के गौण उत्पादक हैं। समाप्य संसाधन हैं। 76 भारत के लोग और अर्थव्यवस्था Page 6 चित्र 7.3 : भारत - धात्विक खनिज (अलौह धातुएँ) खनिज तथा ऊर्जा संसाधन 77 Page 7 कोयला उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में कोयला महत्वपूर्ण खनिजों में से एक है जिसका मुख्य प्रयोग अवस्थित कोयला क्षेत्रों में है। ताप विद्युत उत्पादन तथा लौह अयस्क के प्रगलन के लिए भारत में सर्वाधिक महत्वपूर्ण गोंडवाना कोयला क्षेत्र दामोदर किया जाता है। कोयला मुख्य रूप से दो भूगर्भिक कालों की घाटी में स्थित है। ये झारखंड-बंगाल कोयला पट्टी में स्थित हैं। शैल क्रमों में पाया जाता है जिनके नाम हैं गोंडवाना और और इस प्रदेश के महत्वपूर्ण कोयला क्षेत्र रानीगंज, झरिया, टर्शियरी निक्षेप।। बोकारो गिरीडीह तथा करनपुरा (झारखंड) हैं। झरिया सबसे बड़ा भारत में कोयला निक्षेपों का लगभग 80 प्रतिशत भाग कोयला क्षेत्र है जिसके बाद रानीगंज आता है। कोयले से संबद्ध बिटुमिनियस प्रकार का तथा गैर कोककारी श्रेणी का है। अन्य नदी घाटियाँ गोदावरी, महानदी तथा सोन हैं। सर्वाधिक गोंडवाना कोयले के प्रमुख संसाधन पं. बंगाल, झारखंड, महत्वपूर्ण कोयला खनन केंद्र मध्य प्रदेश में सिंगरौली (सिंगरौली सिंगरेनी में खननकर्मियों के बचाव हेतु चिड़िया सिंगरेनी कोलेरीज देश की अग्रणी कोयला उत्पादक कंपनी है जो अभी भी भूमिगत केनरी कोयला खदानों में जानलेवा कार्बनमोनो- आक्साड गैसों की उपस्थिति का पता लगाने हेतु चिड़िया का उपयोग करते हैं। यदि कोयला खदान के अंदर वायु में अत्यधिक विषाक्त कार्बन डाईऑक्साइड गैस की थोड़ी मात्रा भी उपलब्ध होती है तो खननकर्मी बेहोश हो जाते हैं और मर भी जाते हैं। यद्यपि खननकर्मी के बारे में मीठी-मीठी बातें करते हैं; तथापि उस नन्ही चिड़िया के लिए भूमि के नीचे का अनुभव बिल्कुल सुखद नहीं होता। जब इस पक्षी को कार्बन डाईऑक्साइड से युक्त खदानों में उतारा जाता है तो वह संकट के लक्षण प्रदर्शित करती है जैसे कि पंखों को फड़फड़ाना, जोर से चहचहाना और जीवन का अंत। यह प्रतिक्रिया तब भी होती है जब हवा में कार्बन डाईऑक्साइड की उपस्थिति 15 प्रतिशत होती है। यदि हवा में यह मात्रा 0.3 प्रतिशत की हो जाती है तो चिड़िया तुरंत ही संकट को प्रदर्शित करती है और दो या तीन मिनट में ही वह अपने टिकान से गिर पड़ती है। एक कोयला खनक के अनुसार इन पक्षियों का एक पिंजरा कार्बन डाईआक्साइड 0.15 प्रतिशत से अधिक मात्रा के लिए अच्छा संकेतक होता है। एक कंपनी द्वारा आरंभ किया गया दस्तेवाला कार्बन डाई आक्साइड की हवा में न्यूनतम 10 पी.पी.एम. मात्रा से उच्चतम 1000 पी.पी.एम. तक की संसूचना दे सकता है। लेकिन इस सबके बावजूद, खननकर्मी पक्षियों पर, जिन्होंने अपने सैकड़ों अग्रज खननकर्मियों की जाने बचाई अधिक विश्वास करते हैं। डेकन क्रोनिकल 26.08.06 चित्र 7.4 : नेवेली कोलफील्ड 78 भारत : लोग और अर्थव्यवस्था Page 8 चित्र 7.5 : भारत - परंपरागत ऊर्जा स्रोत खनिज तथा ऊर्जा संसाधन 79 Page 9 कोयला क्षेत्र का कुछ भाग उत्तर प्रदेश में भी आता है) छत्तीसगढ़ तेल उत्पादक क्षेत्र हैं। गुजरात में प्रमुख तेल क्षेत्र अंकलेश्वर, में कोरबा, ओडिशा में तलचर तथा रामपुर; महाराष्ट्र में चाँदा-वर्धा, कालोल, मेहसाणा, नवागाम, कोसांबा तथा लुनेज हैं। मुंबई हाई, काम्पटी और बांदेर तेलंगाना मे सिंगरेनी व आंध्र प्रदेश में पांडर हैं। जो मुंबई नगर से 160 कि.मी. दूर अपतटीय क्षेत्र में पड़ता है, को टर्शियरी कोयला असम अरुणाचल प्रदेश मेघालय तथा 1973 में खोजा गया था और वहाँ 1976 में उत्पादन प्रारंभ हो। नागालैंड में पाया जाता है। यह दरानगिरी चेरापंजी मेवलाग गया। तेल एवं प्राकृतिक गैस को पूर्वी तट पर कृष्णा-गोदावरी तथा लैंग्रिन (मेघालय). माकम जयपर तथा ऊपरी असम में तथा कावेरी के बेसिन में अन्वेषणात्मक कृपों में पाया गया है। नजीरा नामचिक-नाम्फक (अरुणाचल प्रदेश) तथा कालाकोट कूपों से निकाला गया तेल अपरिष्कृत तथा अनेक (जम्मू-कश्मीर) में निष्कर्षित किया जाता है। अशुद्धियों से परिपूर्ण होता है। इसे सीधे प्रयोग में नहीं लाया इसके अतिरिक्त भूरा कोयला या लिगनाइट तमिलनाडु जा सकता। इसे शोधित किए जाने की आवश्यकता होती है। के तटीय भागों पांडिचेरी, गजरात और जम्म एवं कश्मीर में भारत में दो प्रकार के तेल शोधन कारखाने हैं : (क) क्षेत्र भी पाया जाता है। आधारित (ख) बाजार आधारित। डिगबोई तेल शोधन कारखाना क्षेत्र आधारित तथा बरौनी बाज़ार आधारित तेल शोधन कारखाने पेट्रोलियम के उदाहरण हैं। कच्चा पेट्रोलियम द्रव और गैसीय अवस्था के हाइड्रोकार्बन से । भारत में 21 तेल शोधन कारखाने हैं (जून 2011) युक्त होता है तथा इसकी रासायनिक संरचना, रंगों और विशिष्ट (चित्र 7.6)। उन राज्यों की पहचान करें जहाँ वे अवस्थित हैं। घनत्व में भिन्नता पाई जाती है। यह मोटर-वाहनों, रेलवे तथा प्राकृतिक गैस वायुयानों के अंतर-दहन ईंधन के लिए ऊर्जा का एक अनिवार्य स्रोत है। इसके अनेक सह-उत्पाद पेटो-रसायन उद्योगों, जैसे कि गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (GAIL) की स्थापना उर्वरक, कृत्रिम रबर, कृत्रिम रेशे, दवाइयाँ, वैसलीन, स्नेहकों, 1984 में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम के रूप में प्राकृतिक गैस मोम, साबुन तथा अन्य सौंदर्य सामग्री में प्रक्रमित किए जाते हैं। के परिवहन एवं विपणन के लिए की गई थी। गैस को सभी रामानाथपुरम ( तमिलनाडु) में विशाल गैस भंडारों के संकेत समाचार पत्र 'द हिंदू', 05-09-06' की रिपोर्ट के अनुसार रामानाथपुरम जिले में तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग ने प्राकृतिक गैस भंडारों के संभावित क्षेत्र पाए हैं। यह सर्वेक्षण अभी प्रारंभिक अवस्था में हैं। गैस की सही मात्रा का पता सर्वेक्षण पूरा होने के बाद ही चल पाएगा। लेकिन अभी तक के परिणाम उत्साहवर्धक हैं। तेल क्षेत्रों में तेल के साथ प्राप्त किया जाता है। किंतु इसके प्रकनिष्ठ भंडार (Exclusive reserve) साथ तमिलनाडु के पूर्वी तट, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, त्रिपुरा, राजस्थान तथा गुजरात एवं महाराष्ट्र के अपतटीय कुओं में पाए गए हैं। अपनी दुर्लभता और विविध उपयोगों के लिए पेट्रोलियम को तरल सोना कहा जाता है। अपरिष्कृत पेट्रोलियम टरश्यरी युग की अवसादी शैलों में अपरंपरागत ऊर्जा स्रोत पाया जाता है। व्यवस्थित ढंग से तेल अन्वेषण और उत्पादन कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस तथा नाभिकीय ऊर्जा जैसे 1956 में तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग की स्थापना के बाद जीवाश्म ईंधन के स्रोत समाप्य कच्चे माल का प्रयोग करते हैं। प्रारंभ हुआ। तब तक असम में डिगबोई एकमात्र तेल उत्पादक सतत पोषणीय ऊर्जा के स्रोत के ही नवीकरण योग्य स्रोत हैं। क्षेत्र था, लेकिन 1956 के बाद परिदृश्य बदल गया। हाल ही के जैसे- सौर, पवन, जल, भूतापीय ऊर्जा तथा जैवभार (बायोमास)। वर्षों में देश के दूरतम पश्चिमी एवं पूर्वी तटों पर नए तेल निक्षेप यह ऊर्जा स्रोत अधिक समान रूप से वितरित तथा पाए गए हैं। असम में डिगबोई, नहारकटिया तथा मोरान महत्वपूर्ण पर्यावरण-अनुकूल हैं। अपरंपरागत स्रोत अधिक आरंभिक 80 भारत : लोग और अर्थव्यवस्था Page 10 चित्र 7.6 : भारत - तेल शोधन कारखाने खनिज तथा ऊर्जा संसाधन 81 Page 11 विश्व के विकसित देश गैर-परंपरागत ऊर्जा संसाधनों का उपयोग कैसे करते हैं? परिचर्चा कीजिए। लागत के बावजूद अधिक टिकाऊ, पारिस्थितिक-अनुकूल स्थापना के बाद हुई जिसे बाद में, 1967 में, भाभा परमाणु तथा सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराते हैं। अनुसंधान केंद्र के रूप में पुनः नामित किया गया। महत्वपूर्ण नाभिकीय ऊर्जा नाभिकीय ऊर्जा परियोजनाएँ- तारापुर (महाराष्ट्र), कोटा के पास रावतभाटा (राजस्थान), कलपक्कम (तमिलनाडु), नरोरा (उत्तर हाल के वर्षों में नाभिकीय ऊर्जा एक व्यवहार्य स्रोत के रूप । प्रदेश), कैगा (कर्नाटक) तथा काकरापाड़ा (गुजरात) हैं। में उभरा है। नाभिकीय ऊर्जा के उत्पादन में प्रयुक्त होने वाले महत्वपूर्ण खनिज यूरेनियम और थोरियम हैं। यूरेनियम निक्षेप सौर ऊर्जा धारवाड़ शैलों में पाए जाते हैं। भौगोलिक रूप से यूरेनियम । अयस्क सिंहभम ताँबा पट्टी के साथ अनेक स्थानों पर मिलते फोटोवोल्टाइक सेलों में विपाशित सूर्य की किरणों को ऊर्जा में हैं। यह राजस्थान के उदयपुर, अलवर, झुंझुनू ज़िलों, मध्य १ परिवर्तित किया जा सकता है जिसे सौर ऊर्जा के नाम से जाना प्रदेश के दर्ग जिले, महाराष्ट्र के भंडारा जिले तथा हिमाचल जाता है। सौर ऊर्जा को काम में लाने के लिए जिन दो प्रक्रमों प्रदेश के कुल्लू जिले में भी पाया जाता है। थोरियम मुख्यतः को बहुत ही प्रभावी माना जाता है वे हैं फोटोवोल्टाइक और केरल के तटीय क्षेत्र की पुलिन बीच (beach) की बालू में सौर-तापीय प्रौद्योगिकी। अन्य सभी अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों मोनाजाइट एवं इल्मेनाइट से प्राप्त किया जाता है। विश्व के की अपेक्षा सौर-तापीय प्रौद्योगिकी अधिक लाभप्रद है। यह सबसे समृद्ध मोनाजाइट निक्षेप केरल के पालाक्काड तथा लागत प्रतिस्पर्धी, पर्यावरण अनुकूल तथा निर्माण में आसान है। कोलाम ज़िलों, आंध्र प्रदेश के विशाखापट्नम तथा ओडिशा में सौर ऊर्जा कोयला अथवा तेल आधारित संयंत्रों की अपेक्षा 7 महानदी के नदी डेल्टा में पाए जाते हैं। प्रतिशत अधिक और नाभिकीय ऊर्जा से 10 प्रतिशत अधिक परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना 1948 में की गई थी प्रभावी है। यह सामान्यतः हीटरों, फ़सल शुष्ककों (Crop और इस दिशा में प्रगति 1954 में ट्रांबे परमाणु ऊर्जा संस्थान की dryer), कुकर्स (Cookers) आदि जैसे उपकरणों में 82 भारत के लोग और अर्थव्यवस्था Page 12 अधिक प्रयोग की जाती है। भारत के पश्चिमी भागों गुजरात सकता है। इसके अलावा, गीज़र कूपों से निकलते गर्म पानी से व राजस्थान में सौर ऊर्जा के विकास की अधिक संभावनाएँ हैं। ताप ऊर्जा पैदा की जा सकती है। इसे लोकप्रिय रूप में भूतापी ऊर्जा के नाम से जानते हैं। इस ऊर्जा को अब एक प्रमुख ऊर्जा पवन ऊर्जा स्रोत के रूप में माना जा रहा है जिसे एक वैकल्पिक स्रोत के पवन ऊर्जा पूर्णरूपेण प्रदूषण मुक्त और ऊर्जा का असमाप्य रूप में विकसित किया जा सकता है। मध्यकाल से ही गर्म स्रोत है। प्रवाहित पवन से ऊर्जा को परिवर्तित करने की स्रोतों (झरनों) एवं गीजरों का उपयोग होता आ रहा है। भारत अभियांत्रिकी बिल्कुल सरल है। पवन की गतिज ऊर्जा को में, भूतापीय ऊर्जा संयंत्र हिमाचल प्रदेश के मनीकरण में टरबाइन के माध्यम से विद्युत-ऊर्जा में बदला जाता है। अधिकृत किया जा चुका है। सम्मार्गी पवनों व पछुवा पवनों जैसी स्थायी पवन प्रणालियाँ और मानसून पवनों को ऊर्जा के स्रोत के रूप में प्रयोग किया भूमिगत ताप के उपयोग का पहला सफल प्रयास गया है। इनके अलावा स्थानीय हवाओं, स्थलीय और जलीय (1890 में) बोयजे शहर, इडाहो (यू.एस.ए.) में हुआ था जहाँ आसपास के भवनों को ताप देने के लिए गरम पवनों को भी विद्युत पैदा करने के लिए प्रयुक्त किया जा जल के पाइपों का जाल तंत्र (नेटवर्क) बनाया गया था। सकता है। यह संयंत्र अभी भी काम कर रहा है। भारत ने पहले से ही पवन ऊर्जा का उत्पादन आरंभ कर दिया है। इसके पास एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है जिसमें 45 जैव-ऊर्जा मेगावाट की कुल क्षमता के लिए 250 वायुचालित टरबाइने । स्थापित की जानी हैं जो 12 अनुकुल स्थानों, विशेष रूप से जैव-ऊर्जा उस ऊर्जा को कहा जाता है जिसे जैविक उत्पादों सागरतटीय क्षेत्रों में लगाई जाएगी। गैर परंपरा ऊर्जा स्रोत से प्राप्त किया जाता है जिसमें कृषि अवशेष, नगरपालिका मंत्रालय, भारत के तेल के आयात बिल के भार को कम करने । । औद्योगिक तथा अन्य अपशिष्ट शामिल होते हैं। जैव-ऊर्जा, ऊर्जा परिवर्तन का एक संभावित स्रोत है। इसे विद्युत-ऊर्जा, के लिए, पवन ऊर्जा को विकसित कर रहा है। हमारे देश में ताप-ऊर्जा अथवा खाना पकाने के लिए गैस में परिवर्तित किया पवन ऊर्जा उत्पादन की संभावित क्षमता 50,000 मेगावाट की जा सकता है। यह अपशिष्ट एवं कूड़ा-कचरा प्रक्रमित करेगा है जिसमें से एक-चौथाई ऊजों को आसानी से काम में लाया एवं ऊर्जा भी पैदा करेगा। यह विकासशील देशों के ग्रामीण जा सकता है। पवन ऊर्जा के लिए राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र क्षेत्रों के आर्थिक जीवन को भी बेहतर बनाएगा तथा पर्यावरण तथा कर्नाटक में अनुकूल परिस्थितियाँ विद्यमान हैं। प्रदूषण घटाएगा, उनकी आत्मनिर्भरता बढ़ाएगा तथा जलाऊ लकड़ी पर दबाव कम करेगा। नगरपालिका कचरे को ऊर्जा में ज्वारीय तथा तरंग ऊर्जा बदलने वाली ऐसी ही एक परियोजना नई दिल्ली के ओखला महासागरीय धाराएँ ऊर्जा का अपरिमित भंडार-गृह है। सत्रहवीं में स्थित है। एवं अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभ से ही अविरल ज्वारीय तरंगों । । खनिज संसाधनों का संरक्षण और महासागरीय धाराओं से अधिक ऊर्जा तंत्र बनाने के निरंतर । प्रयास जारी हैं। भारत के पश्चिमी तट पर वृहत ज्वारीय तरंगें । ॐ सतत पोषणीय विकास की चुनौती के लिए आर्थिक विकास | की चाह का पर्यावरणीय मुद्दों से समन्वय आवश्यक है। उत्पन्न होती हैं। यद्यपि भारत के पास तटों के साथ ज्वारीय । संसाधन उपयोग के परंपरागत तरीकों के परिणामस्वरूप बड़ी ऊर्जा विकसित करने की व्यापक संभावनाएँ हैं, परंतु अभी तक मात्रा में अपशिष्ट के साथ-साथ अन्य पर्यावरणीय समस्याएँ इनका उपयोग नहीं किया गया है। भी पैदा होती हैं। अतएव, सतत पोषणीय विकास भावी पीढियों के लिए संसाधनों के संरक्षण का आह्वान करता है। संसाधनों भूतापीय ऊर्जा का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए ऊर्जा के जब पृथ्वी के गर्भ से मैग्मा निकलता है तो अत्यधिक ऊष्मा वैकल्पिक स्रोतों, जैसे- सौर ऊर्जा, पवन, तरंग, भूतापीय आदि निर्मुक्त होती है। इस ताप ऊर्जा को सफलतापूर्वक काम में ऊर्जा के असमाप्य स्रोत हैं। धात्विक खनिजों के मामले में, लाया जा सकता है और इसे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जा छाजन धातुओं का उपयोग, धातुओं का पुनर्चक्रण संभव करेगा। खनिज तथा ऊर्जा संसाधन 83 Page 13 ताँबा, सीसा और जस्ते जैसी धातुओं में जिनमें भारत के भंडार उनकी खपत को घटा सकता है। सामरिक और अत्यल्प खनिजों अपर्याप्त हैं, छाजन (स्क्रैप) का प्रयोग विशेष रूप से सार्थक के निर्यात को भी घटाना चाहिए ताकि वर्तमान आरक्षित भंडारों है। अत्यल्प धातुओं के लिए प्रतिस्थापनों का उपयोग भी का लंबे समय तक प्रयोग किया जा सके। अभ्यास नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए। | (i) निम्नलिखित में से किस राज्य में प्रमुख तेल क्षेत्र स्थित हैं? (क) असम (ग) राजस्थान (ख) बिहार (घ) तमिलनाडु (ii) निम्नलिखित में से किस स्थान पर पहला परमाणु ऊर्जा स्टेशन स्थापित किया गया था? (क) कलपक्कम | (ग) राणाप्रताप सागर (ख) नरोरा (घ) तारापुर (iii) निम्नलिखित में कौन-सा खनिज 'भूरा हीरा' के नाम से जाना जाता है? | (क) लौह (ग) मैंगनीज (ख) लिगनाइट (घ) अभ्रक (iv) निम्नलिखित में कौन-सा ऊर्जा का अनवीकरणीय स्रोत है? (क) जल (ग) ताप (ख) सौर (घ) पवन 2. निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें। (i) भारत में अभ्रक के वितरण का विवरण दें।। (ii) नाभिकीय ऊर्जा क्या है? भारत के प्रमुख नाभिकीय ऊर्जा केंद्रों के नाम लिखें। (iii) अलौह धातुओं के नाम बताएँ। उनके स्थानिक वितरण की विवेचना करें। (iv) ऊर्जा के अपारंपरिक स्रोत कौन-से हैं? 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दें। (i) भारत के पेट्रोलियम संसाधनों पर विस्तृत टिप्पणी लिखें। | (ii) भारत में जल विद्युत पर एक निबंध लिखें। 84 भारत : लोग और अर्थव्यवस्था

RELOAD if chapter isn't visible.