अध्याय 3 मानव विकास साठ वषर् पूवर्, रेखा का जन्म उत्तराखण्ड के एक छोटे से किसान परिवार में हुआ था। जब उसके भाइर् स्वूफल जाते थे तो वह घर के कामकाज में अपनी माँ का हाथ बँटाती। उसने किसी प्रकार की श्िाक्षा ग्रहण नहीं की। विवाह के पफौरन बाद जब वह विधवा हुइर् तो वह अपने ससुराल पर निभर्र हो गइर्। वह आथ्िार्क दृष्िट से आत्मनिभर्र नहीं हो पाइर् और उसे उपेक्षा झेलनी पड़ी। उसके भाइर् ने दिल्ली की ओर उसके प्रवास में सहायता की। उसने पहली बार बस और रेलगाड़ी से यात्रा की और दिल्ली जैसे विशाल नगर को देखा। वुफछ दिनों बाद उसी नगर ने, जिसने अपनी इमारतों, सड़कों, उन्नति के अवसरों और सुविधाओं तथा सुख - साधनों द्वारा उसे आकष्िार्त किया था, उसका मोह भंग कर दिया है। नगर को अच्छी प्रकार देखने एवं समझने के बाद वह विरोधाभासों को समझने लगी, झुग्गी और गंदी बस्ितयों के गुच्छ, ट्रैप्िाफक जाम, भीड़, अपराध, निधर्नता, ट्रैपिफक लाइटों़पर छोटे - छोटे बच्चों का भीख माँगना, पुफटपाथ पर लोगों का सोना, प्रदूष्िात जल और वायु, विकास का दूसरा चेहरा उजागर करते हैं। वह सोचा करती थी क्या विकास और अल्प विकास में सहअस्ितत्व पाया जाता है? क्या विकास जनसंख्या के वुफछ खंडों को अन्य खंडों की अपेक्षा अिाक सहायता करता है? क्या विकास संपन्न और विपन्न पैदा करता है? आइए, इन विरोधाभासों का परीक्षण करें और परिघटनाओं को समझने का प्रयत्न करें। इस कहानी में उल्िलख्िात हमारे समय के सभी विरोधाभासोंमें से विकास सवार्िाक महत्त्वपूणर् है। अल्पाविा में वुफछ प्रदेशों और व्यक्ितयों के लिए किया गया विकास बड़े पैमाने पर पारिस्िथतिक निम्नीकरण के साथ अनेक लोगों के लिए गरीबी और वुफपोषण लाता है। क्या विकास वगर् - पक्षपाती है? प्रत्यक्ष रूप से ऐसा माना जाता है कि ‘विकास स्वतंत्राता है’, जिसका संबंध प्रायः आधुनिकीकरण, अवकाश, सुविधा और समृि से जुड़ा हुआ है। वतर्मान संदभर् में वंफप्यूटरीकरण, औद्योगीकरण, सक्षम परिवहन और संचार जाल बृहत् श्िाक्षा प्रणाली, उन्नत और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं, वैयक्ितक सुरक्षा इत्यादि को विकास का प्रतीक समझा जाता है। प्रत्येक व्यक्ित, समुदाय एवं सरकार अपने निष्पादन तथा विकास स्तर को इन वस्तुओं की उपलब्धता तथा गम्यता के संदभर् में मापते हैं। विंफतु यह विकास का आंश्िाक और एकतरप़्ाफा दृश्य हो सकता है। इसे प्रायः विकास का पश्िचम अथवा यूरोप - वेंफदि्रत विचार कहा जाता है। भारत जैसे उत्तर उपनिवेशी देश के लिए उपनिवेशवाद, सीमांतीकरण सामाजिक भेदभाव और प्रादेश्िाक असमता इत्यादि विकास का दूसरा चेहरा दशार्ते हैं। इस प्रकार, भारत के लिए विकास अवसरों के साथ - साथ उपेक्षाओं एवं वंचनाओं का मिला - जुला थैला है। यहाँ महानगरीय वेंफद्रों और अन्य विकसित अंतवेर्शों ;इनक्लेवद्ध जैसे वुफछ क्षेत्रा हैं जहाँ इनकी जनसंख्या के एक छोटे से खंड को आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। दूसरे छोर पर विशाल ग्रामीण क्षेत्रा और नगरीय क्षेत्रों की गंदी बस्ितयाँ हैं जिनमें पेयजल, श्िाक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी आधारभूत सुविधाएँ और अवसंरचना इनकी अिाकांश जनसंख्या के लिए उपलब्ध नहीं है। यदि हमारे समाज के विभ्िान्न वगो± के बीच विकास के अवसरों का वितरण देखा जाए तो स्िथति और अिाक चिंताजनक प्रतीत होती है। यह एक सुस्थापित तथ्य है कि अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, भूमिहीन वृफष्िा मशदूरों, गरीब किसानों और गंदी बस्ितयों में बड़ी संख्या में रहने वाले लोगों इत्यादि का बड़ा समूह सवार्िाक हाश्िाए पर है। स्त्राी जनसंख्या का बड़ा खंड इन सबमें से सबसे श्यादा कष्टभोगी है। यह भी समान रूप से सत्य है कि वषो± से हो रहे विकास के बाद भी सीमांत वगो± में से अिाकांश की सापेक्ष्िाक के साथ - साथ निरपेक्ष दशाएँ भी बदतर हुइर् हैं। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लोग पतित निधर्नता पूणर् और अवमानवीय दशाओं में जीने को विवश हैं। विकास का एक अन्य अंतर संबंिात पक्ष भी है जिसका निम्नतर मानवीय दशाओं से सीधा संबंध है। इसका संबंध पयार्वरणीय प्रदूषण से है जो पारिस्िथतिक संकट का कारक है। वायु, मृदा, जल और ध्वनि प्रदूषण न केवल ‘हमारे साझा संसाधनों की त्रासदी’ का कारण बने हैं अपितु हमारे समाज के अस्ितत्व के लिए भी खतरा बन गए हैं। परिणामस्वरूप, निधर्नों में सामथ्यर् के गिरावट के लिए तीन अंतस±बंिात प्रवि्रफयाएँ कायर्रत हैंμ ;कद्ध सामाजिक सामथ्यर् में कमी विस्थापन और दुबर्ल होते सामाजिक बंधनों के कारण ;खद्ध पयार्वरणीय सामथ्यर् में कभी प्रदूषण के कारण, और ;गद्ध व्यक्ितगत सामथ्यर् में कभी बढ़ती बीमारियों और दुघर्टनाओं के कारण।अंततः उनके जीवन की गुणवत्ता और मानव विकास पर इसका प्रतिवूफल प्रभाव पड़ता है। उपयुर्क्त अनुभवों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वतर्मान विकास सामाजिक अन्याय, प्रादेश्िाक असंतुलन और पयार्वरणीय निम्नीकरण के मुद्दों के साथ स्वयं को जोड़ नहीं पाया है। इसके विपरीत इसे व्यापक रूप से सामाजिकवितरक अन्यायों, जीवन की गुणवत्ता और मानव विकास में गिरावट, पारिस्िथतिक संकट और सामाजिक अशांति का कारण माना जा रहा है।क्या विकास इन संकटों की उत्पिा, प्रबलन और स्िथरीकरण करता है? इस प्रकार, यह सोचा गया कि मानव विकास के मुद्दे को विकास की प्रचलित पश्िचमी धारणा, जो मानव विकास, प्रादेश्िाक विषमता और पयार्वरणीय संकट सहित सभी रोगों का उपचार मानती है, के विपरीत अलग से उठाया जाए। पहले भी अनेक बार विकास को विवेचनात्मक ढंग से देखने के लिए सम्िमलित प्रयास किए गए। विंफतु इस दिशा में सवार्िाक व्यवस्िथत प्रयास 1990 इर्. में संयुक्त राष्ट्र विकास कायर्व्रफम ;न्छक्च्द्ध द्वारा प्रथम मानव विकास रिपोटर् का प्रकाशन है। तब से यह संस्था प्रतिवषर् विश्व मानव विकास रिपोटर् को प्रकाश्िात करती आ रही है। यह रिपोटर् न केवल मानव विकास को परिभाष्िात करती है व इसके सूचकों में संशोधन और परिवतर्न लाती है अपितु परिकलित स्कोरों के आधार पर विश्व के देशों का कोटि - व्रफम भी बनाती है। 1993 इर्. की मानव विकास रिपोटर् के अनुसार, फ्प्रगामी लोकतंत्राीकरण और बढ़ता मानव विकास क्या है? फ्मानव विकास, स्वस्थ्य भौतिक पयार्वरण से लेकर आथ्िार्क, सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्राता तक सभी प्रकार के मानव विकल्पों को सम्िमलित करते हुए लोगों के विकल्पों में विस्तार और उनके श्िाक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं तथा सशक्तीकरण के अवसरों में वृि की प्रवि्रफया है।य् इस प्रकार लोगों के विभ्िान्न प्रकार के विकल्पों की श्रेणी में विस्तार मानव विकास का सवार्िाक साथर्क पक्ष है। लोगों के विकल्पों में अनेक प्रकार के अन्य मुद्दे हो सकते हैं, विंफतु दीघर् और स्वस्थ जीवन जीना, श्िाक्ष्िात होना और राजनीतिक स्वतंत्राता, गारंटीवृफत मानवािाकारों और व्यक्ितगत आत्मसम्मान से युक्त श्िाष्ट जीवन स्तर के लिए आवश्यक संसाधनों तक पहुँच जैसे मानव विकास के वुफछ मुद्दों के साथ समझौता नहीं किया जा सकता। 24 भारत: लोग और अथर्व्यवस्था लोक सशक्तीकरण मानव विकास की न्यूनतम दशाएँ हैं।य् इसके अतिरिक्त यह, यह भी उल्लेख करता है कि फ्विकास लोगों को वंेफद्र में रखकर बुना जाना चाहिए न कि विकास को लोगों के बीच रखकरय् जैसा कि पहले होता था। आप ‘मानव भूगोल के मूलभूत सि(ांत’ नामक अपनी पाठ्यपुस्तक में इन संकल्पनाओं, सूचकों और मानव विकास के उपागमों तथा सूचकांक के परिकलन की वििायों का पहले ही अध्ययन कर चुके हैं। आइए, इस अध्याय में हम भारत पर इन संकल्पनाओं और सूचकों के अनुप्रयोज्यता को समझें। भारत में मानव विकास 109 करोड़ से अिाक जनसंख्या के साथ भारत मानव विकास सूचकांक के संदभर् में विश्व के 172 देशों में 127 के कोटि व्रफम पर है। भ्क्प् के संयुक्त मूल्य 0.602 के साथ भारत मध्यम मानव विकास दशार्ने वाले ;न्छक्च् 2005द्ध देशों की श्रेणी में आता है। ;तालिका में भारत की भ्क्प् के वुफछ अन्य देशों के साथ तुलना की गइर् है।द्ध तालिका 3.1: भारत और वुफछ अन्य देशों के मानव विकास सूचकांक मूल्य देश मानव विकास सूचकांक मूल्य देश मानव विकास सूचकांक मूल्य नावेर् 0ण्963 श्रीलंका 0ण्751 आस्टेªलिया 0ण्955 इर्रान 0ण्736 स्वीडन 0ण्949 इंडोनेश्िाया 0ण्697 स्िवटशरलैंड 0ण्947 मिस्र 0ण्659 स.रा. अमेरिका 0ण्944 भारत 0ण्602 जापान 0ण्943 म्यांमार 0ण्578 यूनाइटेड विंफगडम प्रफांस जमर्नी अजे±टीना 0ण्939 0ण्938 0ण्93 0ण्863 पाकिस्तान नेपाल बांग्लादेश 0ण्527 0ण्526 0ण्52 क्यूबा 0ण्817 केन्या 0ण्474 रूस 0ण्795 जाम्िबया 0ण्394 ब्राजील 0ण्792 चाड 0ण्341 थाइलैंड 0ण्778 नाइजर 0ण्281 स्रोत: यू.एन.डी.पी. मानव विकास रिपोटर् 2005, आॅक्सपफोडर् विश्वविद्यालय प्रेस, पृष्ठ 219 - 222 मानव विकास सूचकांक में निम्न स्कोर का होना गंभीर चिंता का विषय है, विंफतु उपागम और राज्यों/देशों के सूचकांक मूल्यों के परिकलन के लिए चुने गए सूचकों और उनके कोटिव्रफम निधार्रण पर वुफछ आपिायाँ उठाइर् गइर् हैं। उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद और नव - साम्राज्यवाद जैसे ऐतिहासिक कारकोंऋ मानवािाकार उल्लंघन, प्रजाति, धमर्, लिंग और जाति के आधार पर सामाजिक भेदभाव जैसे सामाजिक - सांस्वृफतिक कारकऋ अपराध, आतंकवाद और यु( जैसी सामाजिक समस्याएँ और राज्य की प्रवृफति, सरकार का स्वरूप ;लोकतंत्रा अथवा तानाशाहीद्ध, सशक्ितकरण का स्तर जैसे राजनीतिक कारकों के प्रति संवेदनशीलता का अभाव जैसे वुफछ कारक हैं जो मानव विकास की प्रवृफति के निधार्रण में निणार्यक भूमिका निभाते हैं। भारत तथा अन्य अनेक विकासशील देशों के संबंध में इन पक्षोंका विशेष महत्त्व है। यू.एन.डी.पी. द्वारा चुने गए सूचकों का प्रयोग करते हुए भारत के योजना आयोग ने भी भारत के लिए मानव विकास रिपोटर् तैयार की है। इसमें राज्यों और वेंफद्र - शासित प्रदेशों को विश्लेषण की इकाइर् के रूप में प्रयोग किया गया है। तदनंतर, िालों को विश्लेषण की इकाइर् मानते हुए प्रत्येक राज्य सरकार ने भी मानव विकास रिपोटर् तैयार करना आरंभ कर दिया। यद्यपि भारत के योजना आयोग ने अंतिम मानव विकास सूचकांक का परिकलन जिनके बारे में आप पहले ही अपनी पुस्तक मानव भूगोल के मूल सि(ांत में पढ़ चुके हैं। उन तीन सूचकों के आधार पर किया है, तथापि इस रिपोटर् में आथ्िार्क उपलब्िध, सामाजिक सशक्ितकरण, सामाजिक वितरण न्याय, अभ्िागम्यता, स्वास्थ्य और राज्य द्वारा चलाए जा रहे विभ्िान्न कल्याणकारीउपायों जैसे सूचकों की भी चचार् की गइर् है। वुफछ महत्त्वपूणर् सूचकों की निम्नलिख्िात पृष्ठों में विवेचना की गइर् है। आथ्िार्क उपलब्िधयों के सूचक समृ( संसाधन आधार और इन संसाधनों तक सभी, विशेष रूप से निधर्न, पद - दलित और हाश्िाए पर छोड़ दिए गए लोगों की पहुँच, उत्पादकता, कल्याण और मानव विकास की वंुफजी है। सकल घरेलू उत्पादन और इसकी प्रति व्यक्ित उपलब्धता को किसी देश के संसाधन आधार/अक्षयनििा का माप माना जाता है। भारत के लिए ऐसा आकलन किया गया है कि इसका सकल घरेलू उत्पाद ;प्रचलित कीमतों परद्ध 3200 करोड़ रु.था और इस प्रकार प्रचलित कीमतों पर प्रति व्यक्ित आय 20,813 रु. थी। प्रत्यक्ष रूप से आँकड़े एक प्रभावशाली निष्पादन का संकेत देते हैं विंफतु गरीबी, अवसर विहीनता, वुफपोषण, निरक्षरता, अनेक प्रकार के पूवार्ग्रह और इन सबसे बढ़कर सामाजिक वितरण, अन्याय और बड़े पैमाने की प्रादेश्िाक विषमताएँ इन सभी तथाकथ्िात आथ्िार्क उपलब्िधयों को झूठा साबित करती हैं। महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली जैसे वुफछ विकसित राज्य हैं जिनकी प्रति व्यक्ित प्रतिवषर् आय 4,000 रु;1980 - 81 की कीमतों पर आधारित आँकड़ेद्ध है लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, असम, जम्मू और कश्मीर इत्यादि जैसे बड़ी संख्या में गरीब राज्य भी हैं जिनकी प्रति व्यक्ित आय 2,000 रु. प्रतिवषर् से कम है। इन असमताओं के अनुरूप विकसित राज्यों का गरीब राज्यों की अपेक्षा उपभोग पर खचर् भी अिाक है। पंजाब, हरियाणा, केरल, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में इसका आकलन 690 रु. प्रति व्यक्ित प्रति माह सेअिाक और उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा और मध्य प्रदेश इत्यादि में 520 रु. प्रति व्यक्ित प्रति माह से कम किया गया था। ये भ्िान्नताएँ गरीबी, बेरोशगारी और अपूणर् रोशगारी जैसी गहरी पैठ वाली आथ्िार्क समस्याओं की ओर संकेत करती है। राज्यों की गरीबी के निपुंजिल ;कपेंहहतमहंजमकद्ध आँकड़े दशार्ते हैं कि उड़ीसा और बिहार जैसे राज्यों में उनकी 40 प्रतिशत से अिाक जनसंख्या गरीबी की रेखा से नीचे जी रही है। मध्य प्रदेश, सिक्िकम, असम, त्रिापुरा, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड राज्यों की 30 प्रतिशत से अिाक जनसंख्या गरीबी की रेखा के नीचे है। फ्गरीबी वंचित रहने की अवस्था है। निरपेक्ष रूप से यह व्यक्ित की सतत, स्वस्थ और यथोचित उत्पादक जीवन जीने के लिए आवश्यक शरूरतों को संतुष्ट न कर पाने की असमथर्ता को प्रति¯बबित करती है।य् श्िाक्ष्िात युवाओं के रोशगार की दर 25 प्रतिशत है। बिना रोशगार की आथ्िार्क वृि और अनियंत्रिात बेरोशगारी भारत मेंगरीबी के अिाक होने के महत्त्वपूणर् कारणों में से हैं। भारत में किस राज्य की जनसंख्या का उच्चतम अनुपात गरीबी रेखा के नीचे है? गरीबी रेखा के नीचे जनसंख्या के प्रतिशत के आधार पर राज्यों को आरोही व्रफम में व्यवस्िथत कीजिए। गरीबी रेखा के नीचे उच्च अनुपात वाले 10 राज्यों का चयन कीजिए और आँकड़ों को दंड आरेख द्वारा प्रदश्िार्त कीजिए।तालिका 3.2: भारत में गरीबी, 1999 - 2000 राज्य राज्यवार गरीबी रेखा के नीचे जनसंख्या का प्रतिशत आंध्र प्रदेश 15ण्77 अरुणाचल प्रदेश 33ण्47 असम 36ण्09 बिहार 42ण्60 गोआ 4ण्40 गुजरात 14ण्07 हरियाणा 8ण्47 हिमाचल प्रदेश 7ण्63 पश्िचम बंगाल 27ण्02 अंडमान और निकोबार 20ण्99 चंडीगढ़ 5ण्75 जम्मू और कश्मीर 3ण्48 कनार्टक 20ण्04 केरल 12ण्72 मध्य प्रदेश 37ण्43 महाराष्ट्र 25ण्02 मण्िापुर 28ण्54 मेघालय 33ण्87 मिशोरम 19ण्47 दादरा और नगर हवेली 17ण्14 दमन और दीव 4ण्44 दिल्ली 8ण्23 नागालैंड 32ण्67 उड़ीसा 47ण्15 पंजाब 6ण्16 राजस्थान 15ण्28 सिक्िकम 36ण्55 तमिलनाडु 21ण्12 त्रिापुरा 34ण्44 उत्तर प्रदेश 31ण्15 लक्षद्वीप 15ण्60 पुदुच्चेरी 21ण्67 भारत 26ण्10 स्रोत: भारत का योजना आयोग, ;2001द्ध: भारत राष्ट्रीय मानव विकास रिपोटर्, पृष्ठ 166 26 भारत: लोग और अथर्व्यवस्था स्वस्थ जीवन के सूचक रोग और पीड़ा से मुक्त जीवन और यथोचित दीघार्यु एक स्वस्थजीवन के सूचक हैं। श्िाशु मत्यर्ता और माताओं में प्रजननोत्तर मृत्युदर को घटाने के उद्देश्य से पूवर् और प्रसवोत्तर स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता, वृ(ों के लिए स्वास्थ्य सेवाएँ, पयार्प्त पोषण और व्यक्ितयों की सुरक्षा एक स्वस्थ और लंबे जीवन के वुफछमहत्त्वपूणर् माप हैं। वुफछ स्वास्थ्य सूचकों के क्षेत्रा में भारत में सराहनीय कायर् हुए हंै, जैसे मृत्यु दर का 1951 में 25.1 प्रतिशत से घटकर 1999 में 8.1 प्रति हशार होना और इसी अविा में श्िाशु मत्यर्ता का 148 प्रति हशार से 70 प्रति हशार होना। इसी प्रकार 1951 से 1999 की अविा में जन्म के समय जीवन प्रत्याशा में पुरुषों के लिए 37.1 वषर् से 62.3 वषर् तथा स्ित्रायों के लिए 36.2 वषर् से 65.3 वषर् की वृि करने में भी सपफलतामिली। यद्यपि ये महत्त्वपूणर् उपलब्िधयाँ हैं, पिफर भी बहुत वुफछ करना बाकी है। इसी प्रकार, इसी अविा के दौरान भारत ने जन्म दर को 40.8 से 26.1 तक नीचे लाकर अच्छा कायर् किया है, विंफतु यह जन्म दर अभी भी अनेक विकसित देशों की तुलना में कापफी उफँची है।़¯लग विश्िाष्ट और ग्रामीण व नगरीय स्वास्थ्य सूचकों के संदभर् में देखने पर स्िथति और चिंताजनक प्रतीत होती है। भारत में स्त्राी लिंगानुपात घट रहा है। भारत की जनगणना ;2001द्ध के निष्कषर्, विशेष रूप से 0 - 6 आयु वगर् के बच्चों के लिंग अनुपात के संबंध में, बहुत ही अवांछनीय हैं। रिपोटर् के अन्यमहत्त्वपूणर् लक्षण ये हैं कि यदि केरल को अपवाद मान लिया जाए तो सभी राज्यों में बच्चों का लिंग अनुपात घटा है और पंजाब और हरियाणा जैसे विकसित राज्यों में यह सबसे अिाक चिंताजनक है जहाँ यह लिंगानुपात प्रति हशार बालकों की तुलना में 800 बालिकाओं से भी नीचे है।इसके लिए कौन - कौनसे कारक उत्तरदायी हैं? क्या यह सामाजिक दृष्िटकोण है अथवा लिंग - निधार्रण की वैज्ञानिक वििायाँ? सामाजिक सशक्ितकरण के सूचक ‘विकास मुक्ित है।’ भूख, गरीबी, दासता, बँधुआकरण, अज्ञानता, निरक्षरता और किसी की अन्य प्रकार की प्रबलता से मुक्ित मानव विकास की वंुफजी है। वास्तविक अथो± में मुक्ित तभी संभव है जब लोग समाज में अपने सामथ्यो± और विकल्पों के प्रयोग के लिए सशक्त हों और प्रतिभागिता करें। समाज और पयार्वरण के बारे में ज्ञान तक पहुँच ही मुक्ित का मूलाधार है। ज्ञान और मुक्ित का रास्ता साक्षरता से होकर जाता है। तालिका 3.3: भारत μ साक्षरता दर 2001 राज्य वुफल साक्षरता स्त्राी साक्षरता अंडमान और निकोबार 81ण्18 75ण्29 आंध्र प्रदेश 61ण्11 51ण्17 अरुणाचल प्रदेश 54ण्74 44ण्24 असम 64ण्28 56ण्03 बिहार 47ण्53 33ण्57 चंडीगढ़ 85ण्65 76ण्65 छत्तीसगढ़ 65ण्18 52ण्40 दादरा और नगर हवेली 60ण्03 42ण्99 दमन और दीव 81ण्09 70ण्37 दिल्ली 81ण्82 75ण्00 गोआ 82ण्32 75ण्51 गुजरात 69ण्97 58ण्60 हरियाणा 68ण्59 56ण्31 हिमाचल प्रदेश 77ण्13 68ण्08 जम्मू और कश्मीर 54ण्46 41ण्82 झारखंड 54ण्13 39ण्38 कनार्टक 67ण्04 57ण्45 केरल 90ण्92 87ण्86 लक्षद्वीप 87ण्52 81ण्56 मध्य प्रदेश 64ण्11 50ण्28 महाराष्ट्र 77ण्27 67ण्51 मण्िापुर 68ण्87 59ण्70 मेघालय 63ण्31 60ण्41 मिशोरम 88ण्49 86ण्13 नागालैंड 67ण्11 61ण्92 उड़ीसा 63ण्61 50ण्97 पांडिचेरी 81ण्49 74ण्13 पंजाब 69ण्95 63ण्55 राजस्थान 61ण्03 44ण्34 सिक्िकम 69ण्68 61ण्46 तमिलनाडु 73ण्47 64ण्55 त्रिापुरा 73ण्66 65ण्41 उत्तर प्रदेश 57ण्36 42ण्98 उत्तरांचल 72ण्28 60ण्26 पश्िचम बंगाल 69ण्22 60ण्22 भारत 65ण्38 54ण्16 स्रोत: भारत की जनगणना, 2001: अनन्ितम जनसंख्या तालिका, सीरीज - 1, पृष्ठ 142 राष्ट्रीय औसत से अिाक साक्षरता दर वाले राज्यों को अवरोही व्रफम में व्यवस्िथत करके उन्हें दंड आरेख द्वारा प्रदश्िार्त कीजिए। केरल, मिशोरम, लक्षद्वीप और गोआ की साक्षरता दरें अन्य राज्यों की तुलना में उफँची क्यों हैं? क्या साक्षरता मानव विकास के स्तर को परिलक्ष्िात करती है? वाद - विवाद कीजिए। भारत में साक्षरों का प्रतिशत दशार्ती तालिका 3.3 वुफछ रोचक विशेषताओं को उजागर करती हैμ ऽ भारत में वुफल साक्षरता लगभग 65.4 प्रतिशत है जबकि स्त्राी साक्षरता 54.16 प्रतिशत है। ऽ दक्ष्िाण भारत के अिाकांश राज्यों में वुफल साक्षरता और महिला साक्षरता राष्ट्रीय औसत से उफँची है। ऽ भारत के राज्यों में साक्षरता दर में व्यापक प्रादेश्िाक असमानता पाइर् जाती है। यहाँ बिहार जैसे राज्य भी हैं जहाँ बहुत कम ;47.53 प्रतिशतद्ध साक्षरता है और केरल और मिशोरम जैसे राज्य भी हैं जिनमें साक्षरता दर व्रफमशः 90.92 प्रतिशत और 88.49 प्रतिशत है। स्थानिक भ्िान्नताओं के अतिरिक्त ग्रामीण क्षेत्रों और स्ित्रायों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, वृफष्िा मशदूरों इत्यादि जैसे हमारे समाज में सीमांत वगो± में साक्षरता का प्रतिशत बहुत कम है। यहाँ पर उल्लेखनीय है कि यद्यपि सीमांत वगो± में साक्षरों का प्रतिशत सुधरा है तथापि धनी और सीमांत वगो± की जनसंख्या के बीच अंतर समय के साथ बढ़ा है। भारत में मानव विकास सूचकांक उपयुर्क्त महत्त्वपूणर् सूचकों की पृष्ठभूमि में योजना आयोग ने राज्यों और वेंफद्र - शासित प्रदशों को विश्लेषण की इकाइर् मानते हुए मानव विकास सूचकांक का परिकलन किया है। भारत को मध्यम मानव विकास दशार्ने वाले देशों में रखा गया है। विश्व के 172 देशों में इसका 127वाँ स्थान है। भारत के विभ्िान्न राज्यों में ;तालिका 3.4द्ध, 0.638 संयुक्त सूचकांक मूल्य के साथ केरल कोटिव्रफम मंे सवोर्च्च है। इसके बाद पंजाब ;0.537द्ध, तमिलनाडु ;0.531द्ध, महाराष्ट्र ;0.523द्ध और हरियाणा ;0.509द्ध आते हैं। अपेक्षा के अनुरूप बिहार;0.367द्ध, असम ;0.386द्ध, उत्तर प्रदेश ;0.388द्ध, मध्य 28 भारत: लोग और अथर्व्यवस्था आंध्र प्रदेश 0ण्416 असम 0ण्386 बिहार 0ण्367 गुजरात 0ण्479 हरियाणा 0ण्509 कनार्टक 0ण्478 केरल 0ण्638 मध्य प्रदेश 0ण्394 महाराष्ट्र 0ण्523 उड़ीसा 0ण्404 पंजाब 0ण्537 राजस्थान 0ण्424 तमिलनाडु 0ण्531 उत्तर प्रदेश 0ण्388 पश्िचम बंगाल 0ण्472 स्रोत: भारत का योजना आयोग ;2001द्ध: भारत राष्ट्रीय मानव विकास रिपोटर् 2001, पृष्ठ 25 प्रदेश ;0.394द्ध और उड़ीसा ;0.404द्ध जैसे राज्य देश के 15 प्रमुख राज्यों में सबसे नीचे हैं। ऐसी हालातों के लिए अनेक सामाजिक - राजनीतिक,आथ्िार्क और ऐतिहासिक कारण उत्तरदायी हैं। केरल के मानव विकास सूचकांक का उच्चतम मूल्य इसके द्वारा 2001 में शत - प्रतिशत के आसपास ;90.92 प्रतिशतद्ध साक्षरता दर को प्राप्त करने के लिए किए गए प्रभावी कायर्शीलता के कारण है। एकअलग दृश्य में बिहार, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, असम और उत्तर प्रदेश जैसे निम्न साक्षरता वाले राज्य हैं। उदाहरणतः बिहार में इसी वषर् ;2001द्ध में वुफल साक्षरता दर बहुत निम्न ;60.32 प्रतिशतद्ध थी। उच्चतर वुफल साक्षरता दशार्ने वाले राज्यों में पुरुष और स्त्राी साक्षरता के बीच कम अंतर पाया गया है। केरल में यह अंतर 6.34 प्रतिशत है जबकि बिहार में यह 26.75 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में 25.95 प्रतिशत है। शैक्ष्िाक उपलब्िधयों के अतिरिक्त आथ्िार्क विकास भी मानव विकास सूचकांक पर साथर्क प्रभाव डालता है। आथ्िार्क दृष्िट से विकसित महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पंजाब एवं हरियाणा जैसे राज्यों के मानव विकास सूचकांक का मूल्य असम, बिहार, मध्य प्रदेश इत्यादि राज्यों की तुलना में उफँचा है। उपनिवेश काल में विकसित प्रादेश्िाक विवृफतियाँ और सामाजिक विषमताएँ अब भी भारत की अथर्व्यवस्था, राजतंत्राऔर समाज में महत्त्वपूणर् भूमिका निभा रही हैं। सामाजिक वितरण न्याय के अपने मुख्य ध्येय के साथ भारत सरकार ने नियोजित विकास के माध्यम से संतुलित विकास के सांस्िथतिकरण के लिए सम्िमलित प्रयास किए हैं। इसने अिाकांश क्षेत्रों मेंमहत्त्वपूणर् उपलब्िधयाँ प्राप्त की हैं विंफतु ये वांछित स्तर से अभी भी बहुत नीचे हैं। जनसंख्या, पयार्वरण और विकास विकास सामान्य रूप से और मानव विकास विशेष रूप से सामाजिक विज्ञानों में प्रयुक्त होने वाली एक जटिल संकल्पना है। यह जटिल है क्योंकि युगों से यही सोचा जा रहा है कि विकास एक मूलभूत संकल्पना है और यदि एक बार इसे प्राप्त कर लिया गया तो यह समाज की सभी सामाजिक, सांस्वृफतिक और पयार्वरणीय समस्याओं का निदान हो जाएगा। यद्यपिविकास ने मानव जीवन की गुणवत्ता में अनेक प्रकार सेमहत्त्वपूणर् सुधार किया है विंफतु प्रादेश्िाक विषमताएँ, सामाजिक असमानताएँ, भेदभाव, वंचना, लोगों का विस्थापन, मानवािाकारों पर आघात और मानवीय मूल्यों का विनाश तथा पयार्वरणीय निम्नीकरण भी बढ़ा है। संब( मुद्दों की गंभीरता और संवेदनशीलता को भाँपते हुए संयुक्त राष्ट्र विकास कायर्व्रफम ने अपनी 1993 की मानव विकास रिपोटर् में विकास की अवधारणा में अभ्िाभूत वुफछ स्पष्ट पक्षपातों और पूवार्ग्रहों को संशोिात करने का प्रयत्न किया है। लोगों की प्रतिभागिता और उनकी सुरक्षा 1993 की मानव विकास रिपोटर् के प्रमुख मुद्दे थे। इसमें मानव विकास की न्यूनतम दशाओं के रूप में उत्तरोत्तर लोकतंत्राीकरण और लोगों के बढ़ते सशक्तीकरण पर बल दिया गया था। रिपोटर् ने शांति और मानव विकास लाने में नागरिक समाजों की बहुत बड़ी सकारात्मक भूमिका को भी स्वीकार किया। नागरिक समाजों को विकसित देशों द्वारा प्रतिरक्षा खचो± में कटौती, सशस्त्रा बलों के अपरियोजन, प्रतिरक्षा से आधारभूत वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन की ओर संव्रफमण और विशेष रूप से निशस्त्राीकरण तथा नाभ्िाकीय यु(ास्त्रों की संख्या घटाने के लिए जनमत तैयार करने की दिशा में कायर् करना चाहिए। एक नाभ्िाकीय - वृफत विश्व में शांति और कल्याण दो प्रमुख वैश्िवक ¯चताएँ हैं। इस उपागम के दूसरे छोर पर नव - माल्थस वादियों, पयार्वरणविदों और आमूलवादी पारिस्िथतिकविदों द्वारा व्यक्तविचार हैं। उनका विश्वास है कि एक प्रसन्नचित्त एवं शांत सामाजिक जीवन के लिए जनसंख्या और संसाधनों के बीच उचित संतुलन एक आवश्यक दशा है। इन विचारकों के अनुसार जनसंख्या और संसाधनों के बीच का अंतर 18वीं शताब्दी के बाद बढ़ा है। विगत 300 वषो± में विश्व के संसाधनों में बहुत थोड़ी वृि हुइर् है जबकि मानव जनसंख्या में विपुल वृि हुइर् है। विकास ने केवल विश्व के सीमित संसाधनों के बहुविध प्रयोगों को बढ़ाने में योगदान दिया है जबकि इन संसाधनों की माँग में अतिशय वृि हुइर् है। इस प्रकार विकास के किसी भी वि्रफयाकलाप के समक्ष परम कायर् जनसंख्या और संसाधनों के बीच समता बनाए रखना है। सर राबटर् माल्थस मानव जनसंख्या की तुलना में संसाधनों के अभाव के विषय में चिंता व्यक्त करने वाले पहले विद्वान थे। प्रत्यक्ष रूप से यह विचार तवर्फसंगत और विश्वासप्रद लगता है परंतु यदि विवेचनात्मक ढंग से देखा जाए तो इसमें वुफछ अंतनिर्हित दोष हैं जैसे कि संसाधन एक तटस्थ वगर् ;ब्ंजमवहतलद्ध नहीं है।संसाधनों की उपलब्धता का होना इतना महत्त्वपूणर् नहीं है जितना कि उनका सामाजिक वितरण। संसाधन हर जगह असमान रूप से वितरित हैं। समृ( देशों और लोगों की संसाधनों के विशाल भंडारों तक ‘पहुँच’ है जबकि निधर्नों के संसाधन सिवुफड़ते जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त शक्ितशाली लोगों द्वारा अिाक से अिाक संसाधनों पर नियंत्राण करने के लिए किए गए अनंत प्रयत्नों और उनका अपनी असाधारण विशेषता को प्रदश्िार्त करने के लिए प्रयोग करना ही जनसंख्या संसाधनों और विकास के बीच संघषर् और अंतविर्रोधों का प्रमुख कारण हैं। भारतीय संस्वृफति और सभ्यता लंबे समय से ही जनसंख्या, संसाधनों और विकास के प्रति संवेदनशील रही हैं। यह कहनागलत नहीं होगा कि प्राचीन गं्रथ मूलतः प्रवृफति के तत्त्वों के बीच संतुलन और समरसता के प्रति¯चतित थे। महात्मा गांधी ने अभ्िानव समय में ही दोनों के बीच संतुलन और समरसता के प्रबलन को प्रेष्िात किया है। गांधी जी हो रहे विकास, विशेष रूप से इसमें जिस प्रकार औद्योगीकरण द्वारा नैतिकता, आध्यात्िमकता, स्वावलंबन, अ¯हसा और पारस्परिक सहयोग और पयार्वरण के ”ास का सांस्िथतीकरण ;पदेजपजनजपवदंसपेमकद्ध किया गया है, के प्रति आशंकित थे। उनके विचार में व्यक्ितगत मितव्ययता, सामाजिक धन की न्यासधारिता और अहिंसा एक व्यक्ित और एक राष्ट्र के जीवन में उच्चतर लक्ष्य प्राप्त करने की वुंफजी है। उनके विचार क्लब आॅपफ रोम की रिपोटर् ‘लिमिट्स टू ग्रोथ’ ;1972द्ध,़शूमाकर की पुस्तक ‘स्माल इश ब्यूटीपुफल’ ;1974द्ध ब्रंुडलैंडकमीशन की रिपोटर् ‘आॅवर कामन फ्रयूचर’ ;1987द्ध और अंत में ‘एजेंडा - 21 रिपोटर् आॅप़्ेंाफ द रियो कान्पफरस’ ;1993द्ध में भी प्रतिध्वनित हुए हैं। अभ्यास 1ण् नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए। ;पद्ध मानव विकास सूचकांक ;2005द्ध के संदभर् में विश्व के देशों में भारत की निम्नलिख्िात में से कौन - सीकोटि थी? ;कद्ध 126 ;गद्ध 128 ;खद्ध 127 ;घद्ध 129 30 भारत: लोग और अथर्व्यवस्था ;पपद्ध मानव विकास सूचकांक में भारत के निम्नलिख्िात राज्यों से किस एक की कोटि उच्चतम है? ;कद्ध तमिलनाडु ;गद्ध केरल ;खद्ध पंजाब ;घद्ध हरियाणा ;पपपद्ध भारत के निम्नलिख्िात राज्यों में से किस एक में स्त्राी साक्षरता निम्नतम है? ;कद्ध जम्मू और कश्मीर ;गद्ध झारखंड ;खद्ध अरुणाचल प्रदेश ;घद्ध बिहार ;पअद्ध भारत के निम्नलिख्िात राज्यों में से किस एक में 0 - 6 आयु वगर् के बच्चों में लिंग अनुपात निम्नतम है? ;कद्ध गुजरात ;गद्ध पंजाब ;खद्ध हरियाणा ;घद्ध हिमाचल प्रदेश ;अद्ध भारत के निम्नलिख्िात वेंफद्र - शासित प्रदेशों में से किस एक की साक्षरता दर उच्चतम है? ;कद्ध लक्षद्वीप ;गद्ध दमन और दीव ;खद्ध चंडीगढ़ ;घद्ध अंडमान और निकोबार द्वीप 2ण् निम्नलिख्िात प्रश्नों का उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें। ;पद्ध मानव विकास को परिभाष्िात कीजिए। ;पपद्ध उत्तरी भारत के अिाकांश राज्यों में मानव विकास के निम्न स्तरों के दो कारण बताइए। ;पपपद्ध भारत के बच्चों में घटते लिंगानुपात के दो कारण बताइए। 3ण् निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दें। ;पद्ध भारत में 2001 के स्त्राी साक्षरता के स्थानिक प्रारूपों की विवेचना कीजिए और इसके लिए उत्तरदायी कारणों को समझाइए। ;पपद्ध भारत के 15 प्रमुख राज्यों में मानव विकास के स्तरों में किन कारकों ने स्थानिक भ्िान्नता उत्पन्न की है?

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