चित्रा4ण्2 1ण् साँची की एक झलकशाहजहाँ बेगम उन्नीसवीं सदी के यूरोपियों में साँची के स्तूप को लेकर काप़्ाफी दिलचस्पी थी। प्रफांसीसियों ने सबसे अच्छी हालत में बचे साँची के पूवीर् तोरणद्वार को प्रफांस के संग्रहालय में प्रद£शत करने के लिए शाहजहाँ बेगम से प्रफांस ले जाने की इजाज़़्ात माँगी। वुफछ समय के लिए अंग्रेजों ने भी ऐसी ही कोश्िाश की। सौभाग्यवश प्रफांसिसी और अंग्रेज़्ा दोनों ही बड़ी सावधनी से बनाइर् प्लास्टर प्रतिवृफतियों से संतुष्ट हो गए। इस प्रकार मूल वृफति भोपाल राज्य में अपनी जगह पर ही रही।भोपाल के शासकों, शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराध्िकारी सुल्तानजहाँ बेगम, ने इस प्राचीन स्थल के रख - रखाव के लिए ध्न का अनुदान दिया। आश्चयर् नहीं कि जाॅन माशर्ल ने साँची पर लिखे अपने महत्वपूणर् ग्रंथों को सुल्तानजहाँ को सम£पत किया। सुल्तानजहाँ बेगम ने वहाँ पर एक संग्रहालय और अतिथ्िाशाला बनाने के लिए अनुदान दिया। वहाँ रहते हुए ही जाॅन माशर्ल ने उपयुर्क्त पुस्तवेंफ लिखीं। इस पुस्तक के विभ्िान्न खंडों के प्रकाशन में भी सुल्तानजहाँ बेगम ने अनुदान दिया। इसलिए यदि यह स्तूप समूह बना रहा है तो इसके पीछे वुफछ विवेकपूणर् निणर्यों की बड़ी भूमिका है। शायद हम इस मामले में भी भाग्यशाली रहे हैं कि इस स्तूप पर किसी रेल ठेकेदार या निमार्ता की नज़्ार नहीं पड़ी। यह उन लोगों से भी बचा रहा जो ऐसी चीशों को यूरोप के संग्रहालयों में ले जाना चाहते थे। बौ( ध्मर् के इस महत्वपूणर् वेंफद्र की खोज से आरंभ्िाक बौ( ध्मर् के बारे में हमारी समझ में महत्वपूणर् बदलाव आए। आज यह जगह भारतीय पुरातात्िवक सवेर्क्षण के सपफल मरम्मत और संरक्षण का जीता जागता उदाहरण है। चित्रा4ण्3 साँची का महान स्तूप यदि आप दिल्ली से भोपाल की रेलयात्रा करेंगेतो आप एक पहाड़ी के ऊपर एक मुवुफट जैसे इस खूबसूरत स्तूप को देखेंगे। यदि आप गाडर् को सूचित करेंगे तो वह साँची के छोटे से स्टेशन पर दो मिनट के लिए गाड़ी को रोक देंगे - बस इतना समय कि आप गाड़ी से उतर जाएँ। पहाड़ी पर चढ़ते हुए आप पूरे स्तूप समूह को देख सकते हैं - एक विशाल गोलाध्र् ढाँचा और कइर् दूसरी इमारतें जिनमें पाँचवीं सदी में बना एक मंदिर भी शामिल है। ऽ चचार् कीजिएण्ण्ण् शाहजहाँ बेगम द्वारा किए गए वणर्न की तुलना चित्रा 3 से कीजिए। इनमें आप क्या समानताएँ और असमानताएँ पाते हैं? स्रोत1 आख्िार इस इमारत का क्या महत्त्व है? यह टीला क्यों बनाया गया और इसके अंदर क्या था? इसके चारों ओर पत्थर की रे¯लग क्यों बनाइर् गइर्? इस स्तूप - समूह को किसने बनवाया या इसके लिए ध्न किसने दिया? इसकी फ्खोजय् कब की गइर्? ग्रंथों, मू£तयों, स्थापत्य कला और अभ्िालेखों के अध्ययन के द्वारा हम इस रोचक इतिहास की खोज कर सकते हैं। आइए, हम प्रारंभ्िाक बौ( ध्मर् की पृष्ठभूमि के अन्वेषण से शुरुआत करते हैं। 2ण् पृष्ठभूमि यज्ञ और विवादइर्सा पूवर् प्रथम सहड्डाब्िद का काल विश्व इतिहास में एक महत्वपूणर् मोड़ माना जाता है। इस काल में इर्रान में जरथुस्त्रा जैसे ¯चतक, चीन में खुंगत्सी, यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु और भारत में महावीर, बु( और कइर् अन्य ¯चतकों का उद्भव हुआ। उन्होंने जीवन के रहस्यों को समझने का प्रयास किया। साथ - साथ वे इनसानों और विश्व व्यवस्था के बीच रिश्ते को समझने की कोश्िाश कर रहे थे। यही वह समय था जब गंगा घाटी में नए राज्य और शहर उभर रहे थे और सामाजिक एवं आ£थक जीवन में कइर् तरह के बदलाव आ रहे थे ;अध्याय 2 तथा 3द्ध। ये मनीषी इन बदलते हालात को भी समझने की कोश्िाश कर रहे थे। 2ण्1 यज्ञों की परंपरा ¯चतन, ध£मक विश्वास और व्यवहार की कइर् धराएँ प्राचीन युग से ही चली आ रही थीं। पूवर् वैदिक परंपरा जिसकी जानकारी हमें 1500 से 1000 इर्सा पूवर् में संकलित )ग्वेद से मिलती है, वैसी ही एक प्राचीन परंपरा थी। )ग्वेद अग्िन, इंद्र, सोम आदि कइर् देवताओं की स्तुति का संग्रह है। यज्ञों के समय इन स्रोतों का उच्चारण किया जाता था और लोग मवेशी, बेटे, स्वास्थ्य, लंबी आयु आदि के लिए प्राथर्ना करते थे। शुरू - शुरू में यज्ञ सामूहिक रूप से किए जाते थे। बाद में ;लगभग 1000 इर्सा पूवर् .500 इर्सा पूवर्द्ध वुफछ यज्ञ घरों के मालिकों द्वारा किए जाते थे। राजसूय और अश्वमेध् जैसे जटिल यज्ञ सरदार और राजा किया करते थे। इनके अनुष्ठान के लिए उन्हें ब्राह्मण पुरोहितों पर निभर्र रहना पड़ता था। 2ण्2 नए प्रश्न उपनिषदों ;छठी सदी इर्.पू. सेद्ध में पाइर् गइर् विचारधराओं से पता चलता है कि लोग जीवन का अथर्, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और पुनजर्न्म के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे। क्या पुनजर्न्म अतीत के कमो± के कारण होता था? ऐसे मुद्दों पर पुरशोर बहस होती थी। मनीषी परम यथाथर् की प्रवृफति को समझने और अभ्िाव्यक्त करने में लगे थे। वैदिक परंपरा से बाहर के वुफछ दाशर्निक यह सवाल उठा रहे थे किसत्य एक होता है या अनेक। लोग यज्ञों के महत्त्व के बारे में भी ¯चतन करने लगे। 2ण्3 वाद - विवाद और चचार्एँ समकालीन बौ( ग्रंथों में हमें 64 संप्रदायों या ¯चतन परंपराओं का उल्लेख मिलता है। इससे हमें जीवंत चचार्ओं और विवादों की एक झाँकी मिलती है। श्िाक्षक एक जगह से दूसरी जगह घूम - घूम कर अपने दशर्न या विश्व के विषय में अपनी समझ को लेकर एक - दूसरे से तथा सामान्य लोगों से तवर्फ - वितवर्फ करते थे। ये चचार्एँ वुफटागारशालाओं ;शब्दाथर् - नुकीली छत वाली झोपड़ीद्ध या ऐसे उपवनों में होती थीं जहाँ घुमक्कड़ मनीषी ठहरा करते थे। यदि एक श्िाक्षक अपने प्रतिद्वंद्वी को अपने तको± से समझा लेता था तो वह अपने अनुयायियों के साथ उसका श्िाष्य बन जाता था इसलिए किसी भी संप्रदाय के लिए समथर्न समय के साथ बढ़ता - घटता रहता था। इनमें से कइर् श्िाक्षक जिनमें महावीर और बु( शामिल हैं, वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाते थे। उन्होंने यह भी माना कि जीवन के दुःखों से मुक्ित का प्रयास हर व्यक्ित स्वयं कर सकता था। यह समझ ब्राह्मणवाद से बिलवुफल भ्िान्न थी। जैसा कि हमने देखा ब्राह्मणवाद यह मानता था कि किसी व्यक्ित का अस्ितत्व उसकी जाति और ¯लग से निधर्रित होता था। स्रोत 2 उपनिषद की वुफछ पंक्ितयाँ यहाँ पर संस्वृफत भाषा में रचित लगभग छठी सदी इर्सा पूवर् के छांदोग्य उपनिषद से दो श्लोक दिए गए हैं: आत्मा की प्रवृफति मेरी यह आत्मा धन या यव या सरसों या बाजरे के बीज की गिरी से भी छोटी है। मन के अंदर छुपी मेरी यह आत्मा पृथ्वी से भी विशाल, क्ष्िातिज से भी विस्तृत, स्वगर् से भी बड़ी है और इन सभी लोकों से भी बड़ी है। सच्चा यज्ञ यह ;पवनद्ध जो बह रहा है, निश्चय ही एक यज्ञ है... बहते - बहते यह सबको पवित्रा करता हैऋ इसलिए यह वास्तव में यज्ञ है। स्रोत 3 नियतिवादी और भौतिकवादी Â क्या इन लोगों को नियतिवादी या भौतिकवादी कहना आपको उचित लगता है? यहाँ हम सुत्त पिटक से लिया गया दृष्टांत दे रहे हैं। इसमें मगध् के राजाअजातसत्तु और बु( के बीच बातचीत का वणर्न किया गया है। एक बार राजा अजातसत्तु बु( के पास गए और उन्होंने मक्खलि गोसाल नामक एक अन्य श्िाक्षक की बातें बताईं: फ्हालाँकि बुिमान लोग यह विश्वास करते हैं कि इस सद्गुण से... इस तपस्या से मैं कमर् प्राप्ित करूँगा... मूखर् उन्हीं कायो± को करके ध्ीरे - ध्ीरे कमर् मुक्ित की उम्मीद करेगा। दोनों में से कोइर् वुफछ नहीं कर सकता। सुख और दुख मानो पूवर् निधर्रित मात्रा में माप कर दिए गए हैं। इसे संसार में बदला नहीं जा सकता। इसे बढ़ाया या घटाया नहीं जा सकता। जैसे धगे का गोला पेंफक देने पर लुढ़कते - लुढ़कते अपनी पूरी लंबाइर् तक खुलता जाता है उसी तरह मूखर् और विद्वान दोनों ही पूवर् निधर्रित रास्ते से होते हुए दुःखों का निदान करेंगे।य् और अजीत केसवंफबलिन् नामक दाशर्निक ने यह उपदेश दिया: फ्हे राजन्! दान, यज्ञ या चढ़ावा जैसी कोइर् चीज़्ा नहीं होती... इस दुनिया या दूसरी दुनिया जैसी कोइर् चीज़्ा नहीं होती..मनुष्य चार तत्वों से बना होता है। जब वह मरता है तब मि‘ी वाला अंश पृथ्वी में, जल वाला हिस्सा जल में, गमीर् वाला अंश आग में, साँस का अंश वायु में वापिस मिल जाता है और उसकी इंदि्रयाँ अंतरिक्ष का हिस्सा बन जाती हैं..दान देने की बात मूखो± का सि(ांत है, खोखला झूठ है... मूखर् हो या विद्वान दोनों ही कट कर नष्ट हो जाते हैं। मृत्यु के बाद कोइर् नहीं बचता।य् प्रथम गद्यांश के उपदेशक आजीविक परंपरा के थे। उन्हें अक्सर नियतिवादी कहा जाता है - ऐसे लोग जो विश्वास करते थे कि सब वुफछ पूवर् निधर्रित है। द्वितीय गद्यांश के उपदेशक लोकायत परंपरा के थे जिन्हें सामान्यतः भौतिकवादी कहा जाता है। इन दाशर्निक परंपराओं के ग्रंथ नष्ट हो गए हैं। इसलिए हमें अन्य परंपराओं से ही उनके बारे में जानकारी मिलती है। ऽ चचार् कीजिएण्ण्ण् जब लिख्िात सामग्री उपलब्ध् न हो अथवा किन्हीं वजहों से बच न पाइर् हो तो ऐसी स्िथति में विचारों और मान्यताओं के इतिहास का पुन£नमार्ण करने में क्या समस्याएँ सामने आती हैं? 3ण् लौकिक सुखों से आगे महावीर का संदेश जैनों के मूल सि(ांत छठी सदी इर्सा पूवर् में वध्र्मान महावीर के जन्मसे पहले ही उत्तर भारत में प्रचलित थे। जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 श्िाक्षक हो चुके थे, उन्हें तीथ±कर कहा जाता है: यानी कि वे महापुरुष जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं। जैन दशर्न की सबसे महत्वपूणर् अवधरणा यह है कि संपूणर् विश्व प्राणवान है। यह माना जाता है कि पत्थर, चट्टðान और जल में भी जीवन होता है। जीवों के प्रति अ¯हसा - खासकर इनसानों, जानवरों, पेड़ - पौधों और कीड़े - मकोड़ों को न मारना जैन दशर्न का वेंफद्र ¯बदु है। वस्तुतः जैन अ¯हसा के सि(ांत ने संपूणर् भारतीय ¯चतन परंपरा को प्रभावित किया है। जैन मान्यता के अनुसार जन्म और पुनजर्न्म का चक्र कमर् के द्वारा निधार्रित होता है। कमर् के चक्र से मुक्ित के लिए त्याग और तपस्या की शरूरत होती है। यह संसार के त्याग से ही संभव हो पाता है। इसीलिए मुक्ित के लिए विहारों में निवास करना एक अनिवायर् नियम बन गया। जैन साध्ु और साध्वी पाँच व्रत करते थे: हत्या न करना, चोरी नहीं करना, झूठ न बोलना, ब्रह्मचयर् ;अमृषाद्ध और ध्न संग्रह न करना। महल के बाहर की दुनिया Â महारानी के द्वारा दिया गया कौन सा तवर्फ आपको सबसे श्यादा युक्ितयुक्त लगता है? जैसे बु( के उपदेशों को उनके श्िाष्यों ने संकलित किया वैसे ही महावीर के श्िाष्यों ने किया। अक्सर ये उपदेश कहानियों के रूप में प्रस्तुत किए जाते थे जो आम लोगों को आक£षत करते थे। यह उदाहरणउत्तराध्ययन सूत्रा नामक एक ग्रंथ से लिया गया है। इसमें कमलावती नामक एक महारानी अपने पति कोसंन्यास लेने के लिए समझा रही है: अगर संपूणर् विश्व और वहाँ के सभी खज़्ााने तुम्हारे हो जाएँ तब भी तुम्हें संतोष नहीं होगा, न ही यहसारा वुफछ तुम्हें बचा पाएगा। हे राजन्! जब तुम्हारी मृत्यु होगी और जब सारा ध्न पीछे छूट जाएगा तबसिपर्फ ध्मर् ही, और वुफछ भी नहीं, तुम्हारी रक्षा करेगा। जैसे एक चिडि़या ¯पजरे से नप़्ाफरत करती है वैसेही मैं इस संसार से नप़्ाफरत करती हूँ। मैं बाल - बच्चे को जन्म न देकर निष्काम भाव से, बिना लाभ कीकामना से और बिना द्वेष के एक साध्वी की तरह जीवन बिताऊँगी..जिन लोगों ने सुख का उपभोग करके उसे त्याग दिया है, वायु की तरह भ्रमण करते हंै, जहाँ मन करेस्वतंत्रा उड़ते हुए पक्ष्िायों की तरह जाते हैं..इस विशाल राज्य का परित्याग करो... इंदि्रय सुखों से नाता तोड़ो, निष्काम अपरिग्रही बनो, तत्पश्चाततेजमय हो घोर तपस्या करो.. 3ण्1 जैन ध्मर् का विस्तार ध्ीरे - ध्ीरे जैन ध्मर् भारत के कइर् हिस्सों में पैफल गया। बौ(ों की तरह ही जैन विद्वानों ने प्रावृफत, संस्वृफत, तमिल जैसी अनेक भाषाओं में काप़्ाफी साहित्य का सृजन किया। सैकड़ों वषो± से इन ग्रंथों की पांडुलिपियाँ मंदिरों से जुड़े पुस्तकालयों में संरक्ष्िात हैं। ध£मक परंपराओं से जुड़ी हुइर् सबसे प्राचीन मू£तयों में जैन तीथ±करों के उपासकों द्वारा बनवाइर् गइर् मू£तयाँ भारतीय उपमहाद्वीप के कइर् हिस्सों में पाइर् गइर् हैं। ऽ चचार् कीजिएण्ण्ण् क्या बीसवीं सदी में अ¯हसा की कोइर् प्रासंगिकता है? चित्रा4ण्6 चैदहवीं सदी के जैन गं्रथ की पांडुलिपि का एक पन्ना के दौरान उनके संदेश पूरे उपमहाद्वीप में और उसके बाद मध्य एश्िाया होते हुए चीन, कोरिया और जापान, श्रीलंका से समुद्र पार कर म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेश्िाया तक पैफले। हम बु( की श्िाक्षाओं के बारे में वैफसे जानते हैं? इनकी पुनरर्चना का आधर था बौ( ग्रंथों का बहुत परिश्रम से संपादन, अनुवाद और विश्लेषण किया जाना। इतिहासकारों ने उनके जीवन के बारे में चरित लेखन से जानकारी इकट्टòी की। इनमें से कइर् ग्रंथ बु( के जीवन काल से लगभग सौ वषो± के बाद लिखे गए। इनमें इस महान ध्मोर्पदेशक की याद को बनाए रखने की कोश्िाश की गइर् थी। इन परंपराओं के अनुसार सि(ाथर् ;बु( के बचपन का नामद्ध शाक्य कबीले के सरदार के बेटे थे। जीवन के कटु यथाथो± से दूर उन्हें महल की चारदीवारी के अंदर सब सुखों के बीच बड़ा किया गया। एक दिन क्या आप इसकी लिपि को पहचान सकते हैं? उन्होंने अपने रथकार को उन्हें शहर घुमाने के लिए मना लिया। बाहरी दुनिया की उनकी पहली यात्रा काप़्ाफी पीड़ादायक रही। एक वृ( व्यक्ित को, एक बीमार को और एक लाश को देखकर उन्हें गहरा सदमा पहुँचा। उसी क्षण उन्हें यह अनुभूति हुइर् कि मनुष्य के शरीर का क्षय और अंत निश्िचत है। उन्होंने एक गृहत्याग किए संन्यासी को भी देखा उसे मानो बुढ़ापे, बीमारी और मृत्यु से कोइर् परेशानी नहीं थी और उसने शांति प्राप्त कर ली थी। सि(ाथर् ने निश्चय किया कि वे भी संन्यास का रास्ता अपनाएँगे। वुफछ समय के बाद महल त्याग कर वे अपने सत्य की खोज में निकल गए। सि(ाथर् ने साध्ना के कइर् मागो± का अन्वेषण किया। इनमें एक था चित्रा4ण्7 शरीर को अध्िक से अध्िक कष्ट देना जिसके चलते वे मरते - मरतेअमरावती ;गुंटूर िाला, आंध््र प्रदेशद्ध में लगभग बचे। इन अतिवादी तरीकों को त्यागकर, उन्होंने कइर् दिन तक ध्यान200 इर्सवी की एक मू£त जिसमें बु( को महल करते हुए अंततः ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद से उन्हें बु( अथवासे जाते हुए दिखाया गया है। ज्ञानी व्यक्ित के नाम से जाना गया है। बाकी जीवन उन्होंने ध्मर् या सम्यक जीवनयापन की श्िाक्षा दी। ऽ चचार् कीजिएण्ण्ण् यदि आप बु( के जीवन के बारे में नहीं जानते तो क्या आप मू£त को देखकर समझ पाते कि उसमें क्या दिखाया गया है? 5ण् बु( की श्िाक्षाएँ बु( की श्िाक्षाओं को सुत्त पिटक में दी गइर् कहानियों के आधर पर पुन£न£मत किया गया है। हालाँकि वुफछ कहानियों में उनकी अलौकिक शक्ितयों का वणर्न है, दूसरी कथाएँ दिखाती हैं कि अलौकिक शक्ितयों की बजाय बु( ने लोगों को विवेक और तवर्फ के आधर पर समझाने का प्रयास किया। उदाहरण के लिए, जब एक मरे हुए बच्चे की शोकमग्न माँ बु( के पास आइर् तो उन्होंने बच्चे को जीवित करने के बजाय उस महिला को मृत्यु के अवश्यंभावी होने की बात समझायी। ये कथाएँ आम जनता की भाषा में रची गइर् थीं जिससे इन्हें आसानी से समझा जा सकता था। बौ( दशर्न के अनुसार विश्व अनित्य है और लगातार बदल रहा है, यह आत्माविहीन ;आत्माद्ध है क्योंकि यहाँ वुफछ भी स्थायी या शाश्वत नहीं है। इस क्षणभंगुर दुनिया में दुख मनुष्य के जीवन का अंत£नहित तत्व है। घोर तपस्या और विषयासक्ित के बीच मध्यम मागर् अपनाकर मनुष्य दुनिया के दुखों से मुक्ित पा सकता है। बौ( ध्मर् की प्रारंभ्िाक परंपराओं में भगवान का होना या न होना अप्रासंगिक था। स्रोत 5 व्यवहार में बौ( ध्मर् सुत्त पिटक से लिए गए इस उ(रण में बु( सिगल नाम के एक अमीर गृहपति को सलाह दे रहे हैं: मालिक को अपने नौकरों और कमर्चारियों की पाँच तरह से देखभाल करनी चाहिए... उनकी क्षमता के अनुसार उन्हें काम देकर, उन्हें भोजन और मशदूरी देकर, बीमार पड़ने पर उनकी परिचयार् करके, उनके साथ सुस्वादु भोजन बाँटकर और समय - समय पर उन्हें छुट्टðी देकर..वुफल के लोगों को पाँच तरह से श्रमणों ;जिन्होंने सांसारिक जीवन को त्याग दिया हैद्ध और ब्राह्मणों की देखभाल करनी चाहिए... कमर्, वचन और मन से अनुराग द्वारा, उनके स्वागत में हमेशा घर खुले रखकर और उनकी दिन - प्रतिदिन की ज़्ारूरतों की पू£त करके। सिगल को माता - पिता, श्िाक्षक और पत्नी के साथ व्यवहार के लिए भी ऐसे ही उपदेश दिए गए हैं। Â आप सुझाव दीजिए कि माता - पिता, श्िाक्षकों और पत्नी के लिए किस तरह के निदेर्श दिए गए होंगे। ऽ चचार् कीजिएण्ण्ण् बु( द्वारा सिगल को दी गइर् सलाह की तुलना असोक द्वारा उसकी प्रजा ;अध्याय 2द्ध को दी गइर् सलाह से कीजिए। क्या आपको वुफछ समानताएँ और असमानताएँ नशर आती हैं? बु( मानते थे कि समाज का निमार्ण इनसानों ने किया था न कि इर्श्वर ने। इसीलिए उन्होंने राजाओं और गृहपतियों ;देखें अध्याय 2द्ध को दयावान और आचारवान होने की सलाह दी। ऐसा माना जाता था कि व्यक्ितगत प्रयास से सामाजिक परिवेश को बदला जा सकता था। बु( ने जन्म - मृत्यु के चक्र से मुक्ित, आत्म - ज्ञान और निवार्ण के लिए व्यक्ित - वेंफदि्रत हस्तक्षेप और सम्यक कमर् की कल्पना की। निवार्ण का मतलब था अहं और इच्छा का खत्म हो जाना जिससे गृहत्याग करने वालों के दुख के चक्र का अंत हो सकता था। बौ( परंपरा के अनुसार अपने श्िाष्यों के लिए उनका अंतिम निदेर्श था, फ्तुम सब अपने लिए खुद ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हें खुद ही अपनी मुक्ित का रास्ता ढूँढ़ना है।य् 6ण् बु( के अनुयायी ध्ीरे - ध्ीरे बु( के श्िाष्यों का दल तैयार हो गया, इसलिए उन्होंने संघ की स्थापना की, ऐसे भ्िाक्षुओं की एक संस्था जो ध्म्म के श्िाक्षक बन गए। ये श्रमण एक सादा जीवन बिताते थे। उनके पास जीवनयापन के लिए अत्यावश्यक चीजों के अलावा वुफछ नहीं होता था। जैसे कि दिन में एक़बार उपासकों से भोजन दान पाने के लिए वे एक कटोरा रखते थे। चूँकि वे दान पर निभर्र थे इसलिए उन्हें भ्िाक्खु कहा जाता था। शुरू - शुरू में सिप़्ार्फ पुरुष ही संघ में सम्िमलित हो सकते थे। बाद में महिलाओं को भी अनुमति मिली। बौ( गं्रथों के अनुसार बु( के पि्रय श्िाष्य आनंद ने बु( को समझाकर महिलाओं के संघ में आने की अनुमति प्राप्त की। बु( की उपमाता महाप्रजापति गोतमी संघ में आने वाली पहली भ्िाक्खुनी बनीं। कइर् स्ित्रायाँ जो संघ में आईं, वे ध्म्म की उपदेश्िाकाएँ बन गईं। आगे चलकर वे थेरी बनी जिसका मतलब है ऐसी महिलाएँ जिन्होंने निवार्ण प्राप्त कर लिया हो। बु( के अनुयायी कइर् सामाजिक वगो± से आए। इनमें राजा, धनवान, गृहपति और सामान्य जन कमर्कार, दास, श्िाल्पी, सभी शामिल थे। एक बार संघ में आ जाने पर सभी को बराबर माना जाता था क्योंकि भ्िाक्खु और भ्िाक्खुनी बनने पर उन्हें अपनी पुरानी पहचान को त्याग देना पड़ता था। संघ की संचालन प(ति गणों और संघों की परंपरा पर आधारित थी। इसके तहत लोग बातचीत के माध्यम से एकमत होने की कोश्िाश करते थे। अगर यह संभव नहीं होता था तो मतदान द्वारा निणर्य लिया जाता था। स्रोत 6 थेरीगाथा Â बु( की कौन - सी श्िाक्षाएँ इस रचना में नज़्ार आती हैं? यह अनूठा बौ( ग्रंथ सुत्त पिटक का हिस्सा है। इसमें भ्िाक्खुनियों द्वारारचित छंदों का संकलन किया गया है। इससे महिलाओं के सामाजिकऔर आध्यात्िमक अनुभवों के बारे में अंतदृर्ष्िट मिलती है। पुन्ना नामकी एक दासी अपने मालिक के घर के लिए प्रतिदिन सुबह नदी कापानी लाने जाती थी। वहाँ वह हर दिन एक ब्राह्मण को स्नान कमर् करतेहुए देखती थी। एक दिन उसने ब्राह्मण से बात की। निम्नलिख्िातपद्य की रचना पुन्ना ने की थी जिसमें ब्राह्मण से उसकी बातचीत कावणर्न है: मैं जल ले जाने वाली हूँ: कितनी भी ठंड हो मुझे पानी में उतरना ही है सज़्ाा के डर सेया ऊँचे घरानों की स्ित्रायों के कटु वाक्यों के डर से। हे ब्राह्मण तुम्हें किसका डर है, जिससे तुम जल में उतरते हो ;जबकिद्ध तुम्हारे अंग ठंड से काँप रहे हैं? ब्राह्मण बोले: मैं बुराइर् को रोकने के लिए अच्छाइर् कर रहा हूँऋ बूढ़ा या बच्चा जिसने भी वुफछ बुरा किया हो जल में स्नान करके मुक्त हो जाता है। पुन्ना ने कहा: यह किसने कहा हैकि पानी में नहाने से बुराइर् से मुक्ित मिलती है?..वैसा हो तो सारे मेंढक और कछुए स्वगर् जाएँगेसाथ में पानी के साँप और मगरमच्छ भी!इसके बदले में वे कमर् न करें जिनका डरआपको पानी की ओर खींचता है। हे ब्राह्मण, अब तो रुक जाओ! अपने शरीर को ठंड से बचाओ.. चित्रा4ण्8 जल ले जाने वाली एक स्त्राी, मथुरा, लगभग तीसरी शताब्दी इर्स्रोत 7 बु( के जीवनकाल में और उनकी मृत्यु के बाद भी बौ( ध्मर् तेशी से पैफला। इसका कारण यह था कि लोग समकालीन ध£मक प्रथाओं से असंतुष्ट थे और उस युग में तेजी से हो रहे सामाजिक बदलावों ने उन्हें़उलझनों में बाँध् रखा था। बौ( श्िाक्षाओं में जन्म के आधर पर श्रेष्ठताकी बजाय जिस तरह अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्त्व दिया गया उससे महिलाएँ और पुरुष इस ध्मर् की तरप़्ाफ आक£षत हुए। खुद से छोटे और कमशोर लोगों की तरपफ मित्राता और करुणा के भाव को महत्त्व देने ़के आदशर् काप़्ाफी लोगों को भाए। ऽ चचार् कीजिएण्ण्ण् पुन्ना जैसी दासी संघ में क्यों जाना चाहती थी? 7ण् स्तूप हमने देखा कि बौ( आदशर् और व्यवहार ब्राह्मण, जैन तथा कइर् अन्य परंपराओं के साथ संवाद और तवर्फ - वितवर्फ की प्रिया से उभरे। इनमें से कइर् परंपराओं के विचार और आचार ग्रंथों में नहीं लिखे गए। इस तरह के मेलजोल को हम पवित्रा स्थलों के उभरने की प्रिया को देखकर भी समझ सकते हैं। बहुत प्राचीन काल से ही लोग वुफछ जगहों को पवित्रा मानते थे। अक्सर जहाँ खास वनस्पति होती थी, अनूठी च‘ानें थीं या विस्मयकारी प्रावृफतिक सौंदयर् था, वहाँ पवित्रा स्थल बन जाते थे। ऐसे वुफछ स्थलों पर एक छोटी - सी वेदी भी बनी रहती थीं जिन्हें कभी - कभी चैत्य कहा जाता था। बौ( साहित्य में कइर् चैत्यों की चचार् है। इसमें बु( के जीवन से जुड़ी जगहों का भी वणर्न हैμजहाँ वे जन्मे थे ;लुम्िबनीद्ध, जहाँ उन्होंने मानचित्रा 1 महत्वपूणर् बौ( स्थल लुम्िबनीश्रावस्ती वुफशीनगर सारनाथ बराबरबोध्गयाभरहुत नमर्दा साँची अजंतानासिक जुन्नारकालेर्अरब नागाजुर्नकोंडा अमरावतीसागर बंगाल की खाड़ी रेखाचित्रा पैमाना नहीं दिया गया है। स्रोत8 स्तूप क्यों बनाए जाते थे Â चित्रा 4ण्15 को देखकर क्या आप इनमें से वुफछ रीति - रिवाज़्ाों को पहचान सकते हैं? यह उ(रण महापरिनिब्बान सुत्त से लिया गया है जो सुत्त पिटक का हिस्सा है: परिनिवार्ण से पूवर् आनंद ने पूछाः भगवान हम तथागत ;बु( का दूसरा नामद्ध के अवशेषों का क्या करेंगे? बु( ने कहा, फ्तथागत के अवशेषों को विशेष आदर देकर खुद को मत रोको। ध्मोर्त्साही बनो, अपनी भलाइर् के लिए प्रयास करो।य् लेकिन विशेष आग्रह करने पर बु( बोले: फ्उन्हें तथागत के लिए चार महापथों के चैक पर थूप ;स्तूप का पालि रूपद्ध बनाना चाहिए। जो भी वहाँ धूप या माला चढ़ाएगा... या वहाँ सिर नवाएगा, या वहाँ पर हृदय में शांति लाएगा, उन सबके लिए वह चिर काल तक सुख और आनंद का कारण बनेगा।य् ज्ञान प्राप्त किया ;बोध्गयाद्ध, जहाँ उन्होंने प्रथम उपदेश दिया ;सारनाथद्ध और जहाँ उन्होंने निब्बान प्राप्त किया ;वुफशीनगरद्ध। ध्ीरे - ध्ीरे ये सारी जगहें पवित्रा स्थल बन गईं। हमें यह मालूम है कि बु( के समय से लगभग दो सौ वषो± बाद असोक ने लुम्िबनी की अपनी यात्रा की याद में एक स्तंभ बनवाया। 7ण्1 स्तूप क्यों बनाए जाते थे? ऐसी कइर् अन्य जगहें थीं जिन्हें पवित्रा माना जाता था। इन जगहों पर बु( से जुड़े वुफछ अवशेष जैसे उनकी अस्िथयाँ या उनके द्वारा प्रयुक्त सामान गाड़ दिए गए थे। इन टीलों को स्तूप कहते थे। स्तूप बनाने की परंपरा बु( से पहले की रही होगी, लेकिन वह बौ( ध्मर् से जुड़ गइर्। चूँकि उनमें ऐसे अवशेष रहते थे जिन्हें पवित्रा समझा जाता था, इसलिए समूचे स्तूप को ही बु( और बौ( ध्मर् के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठा मिली। अशोकावदान नामक एक बौ( ग्रंथ के अनुसार असोक ने बु( के अवशेषों के हिस्से हर महत्वपूणर् शहर में बाँट करउनके ऊपर स्तूप बनाने का आदेश दिया। इर्सा पूवर् दूसरी सदी तक भरहुत, साँची और सारनाथ जैसी जगहों पर ;मानचित्रा 1द्ध स्तूप बनाए जा चुके थे। 7ण्2 स्तूप वैफसे बनाए गए स्तूपों की वेदिकाओं और स्तंभों पर मिले अभ्िालेखों से इन्हें बनाने और सजाने के लिए दिए गए दान का पता चलता है। वुफछ दान राजाओं के द्वारा दिए गए थे ;जैसे सातवाहन वंश के राजाद्ध, तो वुफछ दान श्िाल्पकारों और व्यापारियों की श्रेण्िायों द्वारा दिए गए। उदाहरण के लिए, साँची के एक तोरणद्वार का हिस्सा हाथी दाँत का काम करने वाले श्िाल्पकारों के दान से बनाया गया था। सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों ने दान के अभ्िालेखों में अपना नाम बताया है। कभी - कभी वे अपने गाँव या शहर का नाम बताते हैं और कभी - कभी अपना पेशा और रिश्तेदारों के नाम भी बताते हैं। इन इमारतों को बनाने में भ्िाक्खुओं और भ्िाक्खुनियों ने भी दान दिया। 7ण्3 स्तूप की संरचना स्तूप ;संस्वृफत अथर् टीलाद्ध का जन्म एक गोलाध्र् लिए हुए मिट्टðी के टीले से हुआ जिसे बाद में अंड कहा गया। ध्ीरे - ध्ीरे इसकी संरचना ज्यादा जटिल हो गइर् जिसमें कइर् चैकोर और गोल आकारों का संतुलऩबनाया गया। अंड के ऊपर एक ह£मका होती थी। यह छज्जे जैसा ढाँचा देवताओं के घर का प्रतीक था। ह£मका से एक मस्तूल निकलता था जिसे यष्िट कहते थे जिस पर अक्सर एक छत्राी लगी होती थी। टीले के चारों ओर एक वेदिका होती थी जो पवित्रा स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करती थी। साँची और भरहुत के प्रारंभ्िाक स्तूप बिना अलंकरण के हैं सिवाए इसके कि उनमें पत्थर की वेदिकाएँ और तोरणद्वार हैं। ये पत्थर की वेदिकाएँ किसी बाँस के या काठ के घेरे के समान थीं और चारों दिशाओं में खड़े तोरणद्वार पर खूब नक्काशी की गइर् थी। उपासक पूवीर् तोरणद्वार से प्रवेश करके टीले को दाईं तरप़फ रखते हुए दक्ष्िाणावतर् परिक्रमा करते थे, मानो वे आकाश में सूयर् के पथ का अनुकरण कर रहे हों। बाद में स्तूप के टीले पर भी अलंकरण और नक्काशी की जाने लगी। अमरावती और पेशावर ;पाकिस्तानद्ध में शाह जी की ढेरी में स्तूपों में ताख और मू£तयाँ उत्कीणर् करने की कला के काप़्ाफी उदाहरण मिलते हैं। चित्रा4ण्9 साँची का एक दानात्मक अभ्िालेख ऐसे सैकड़ों अभ्िालेख भरहुत और अमरावती में भी मिले हैं। ऽ चचार् कीजिएण्ण्ण् साँची के महास्तूप के मापचित्रा ;चित्रा 4ण्10 कद्ध और छायाचित्रा ;चित्रा 4ण्3द्ध में क्या समानताएँ और पफवर्फ हैं?़चित्रा4ण्11 साँची का पूवीर् तोरणद्वार सजीव मू£तयों को देख्िाए। 8ण् स्तूपों की ‘खोज’ अमरावती और साँची की नियति जैसा कि हमने देखा हर स्तूप का अपना इतिहास है। वुफछ इतिहास हमें बताते हैं कि वे वैफसे बने। साथ - साथ इनकी खोज का भी इतिहास है। अब हम इनकी खोज के इतिहास पर एक नजर डालें।़1796 में एक स्थानीय राजा को जो मंदिर बनाना चाहते थे, अचानक अमरावती के स्तूप के अवशेष मिल गए। उन्होंने उसके पत्थरों के इस्तेमाल करने का निश्चय किया। उन्हें ऐसा लगा कि इस छोटी सी पहाड़ी में संभवतः कोइर् खज़़़्ााना छुपा हो। वुफछ वषो± के बाद काॅलिन मेवेंफजी नामक एक अंग्रेज अध्िकारी इस इलाके से गुशरे ;अध्याय 7 भी देख्िाएद्ध। हालाँकि उन्होंने कइर् मू£तयाँ पाईं और उनका विस्तृत चित्रांकन भी किया, लेकिन उनकी रिपोटे± कभी छपी नहीं। 1854 में गुंटूर ;आंध््र प्रदेशद्ध के कमिश्नर ने अमरावती की यात्रा की। उन्होंने कइर् मू£तयाँ और उत्कीणर् पत्थर जमा किए और वे उन्हें मद्रास ले गए। ;इन्हें उनके नाम पर एलियट संगमरमर के नाम से जाना जाता हैद्ध। उन्होंने पश्िचमी तोरणद्वार को भी खोज निकाला और इस निष्कषर् पर पहुँचे कि अमरावती का स्तूप बौ(ों का सबसे विशाल और शानदार स्तूप था। 1850 के दशक में अमरावती के उत्कीणर् पत्थर अलग - अलग जगहों पर ले जाए जा रहे थे। वुफछ पत्थर कलकत्ता में एश्िायाटिक सोसायटी आॅपफ बंगाल पहँुचे,़तो वुफछ मद्रास में इंडिया आॅपिफस। वुफछ पत्थर लंदन तक पहुँच गए। कइर् अंग्रेश अध्िकारियों के बागों में अमरावती की मू£तयाँ पाना कोइर् असामान्य बात नहीं थी। वस्तुतः इस इलाके का हर नया अध्िकारी यह कहकर वुफछ मू£तयाँ उठा ले जाता था कि उसके पहले के अध्िकारियों ने भी ऐसा किया। पुरातत्ववेत्ता एच.एच. कोल उन मुट्टòी भर लोगों में एक थे जो अलग सोचते थे। उन्होंने लिखा फ्इस देश की प्राचीन कलावृफतियों की लूट होने देना मुझे आत्मघाती और असमथर्नीय नीति लगती है।य् वे मानते थे कि संग्रहालयों में मू£तयों की प्लास्टर प्रतिवृफतियाँ रखी जानी चाहिए जबकि असली वृफतियाँ खोज की जगह पर ही रखी जानी चाहिए। दुभार्ग्य से कोल अिाकारियों को अमरावती पर इस बात के लिए राशी नहीं कर पाए। लेकिन खोज की जगह पर ही संरक्षण की बात को साँची के लिए मान लिया गया। साँची क्यों बच गया जबकि अमरावती नष्ट हो गया? शायद अमरावती की खोज थोड़ी पहले हो गइर् थी। तब तक विद्वान इस बातके महत्त्व को नहीं समझ पाए थे कि किसी पुरातात्िवक अवशेष को उठाकर ले जाने की बजाय खोज की जगह पर ही संरक्ष्िात करना कितना महत्वपूणर् था। 1818 में जब साँची की खोज हुइर्, इसके तीन तोरणद्वार तब भी खड़े थे। चैथा वहीं पर गिरा हुआ था और टीला भी अच्छी हालत में था। तब भी यह सुझाव आया कि तोरणद्वारों को पेरिस या लंदन भेज दिया जाए। अंततः कइर् कारणों से साँची का स्तूप वहीं बना रहा और आज भी बना हुआ है जबकि अमरावती का महाचैत्य अब सिपर्फ एक छोटा सा टीला है जिसका सारा गौरव नष्ट हो चुका है। 9ण् मू£तकला हमने अभी - अभी पढ़ा है कि किस तरह से स्तूपों से मू£तयों को यूरोप ले जाया गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जिन लोगों ने मू£तयों को देखा उन्हें ये ख़ूबसूरत और मूल्यवान लगीं। इसलिए वे उन्हें अपने लिए रखना चाहते थे। आइए, हम इन मू£तयों को ध्यान से देखें। 9ण्1 पत्थर में गढ़ी कथाएँ आपने ऐसे घुमक्कड़ कथावाचकों को देखा होगा जो अपने साथ कपड़ों या कागज़्ा पर बने चित्रों ;चारणचित्राद्ध को लेकर घूमते हैं। जब वे कहानी कहते हैं तब वे इन चित्रों को दिखाते हैं। चित्रा 4ण्13 देख्िाए। पहली बार देखने पर तो इस मू£तकला अंश में पूफस की झोंपड़ी और पेड़ों वाले ग्रामीण दृश्य का चित्राण दिखता है। परंतु वे कला इतिहासकार जिन्होंने साँची की इस मू£तकला का गहराइर् से अध्ययन किया है, इसे वेसान्तर जातक से लिया गया एक दृश्य बताते हैं। यह कहानी एक ऐसे दानी राजवुफमार के बारे में है जिसने अपना सब वुफछ एक ब्राह्मण को सौंप दिया और स्वयं अपनी पत्नी और बच्चों के ऽ चचार् कीजिएण्ण्ण् खंड एक को दुबारा पढि़ए। कारण बताइए कि साँची क्यों बच गया। चित्रा4ण्12 तोरण का एक हिस्सा क्या आपको ऐसा लगता है कि साँची के तक्षक पटचित्रा को खुलते हुए दशार्ना चाह रहे थे? चित्रा4ण्13 उत्तरी तोरणद्वार का एक हिस्सा चित्रा4ण्14 ;नीचे दाईं ओरद्ध बोध्ि वृक्ष की पूजा चित्रा में वृक्ष, आसन और उसके चारों ओर जन - समुदाय के चित्राण पर ध्यान दीजिए। चित्रा4ण्15 ;नीचे मध्य मेंद्ध स्तूप की पूजा चित्रा4ण्16 ;नीचे बाईं ओरद्ध ध्मर्चक्र प्रवतर्न साथ जंगल में रहने चला गया। जैसा कि इस उदाहरण से स्पष्ट है अक्सर इतिहासकार किसी मू£तकला की व्याख्या लिख्िात साक्ष्यों के साथ तुलना के द्वारा करते हैं। 9ण्2 उपासना के प्रतीक बौ( मू£तकला को समझने के लिए कला इतिहासकारों को बु( के चरित लेखन के बारे में समझ बनानी पड़ी। बौ(चरित लेखन के अनुसार एक वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए बु( को ज्ञान प्राप्ित हुइर्। कइर् प्रारंभ्िाक मू£तकारों ने बु( को मानव रूप में न दिखाकर उनकी उपस्िथति प्रतीकों के माध्यम से दशार्ने का प्रयास किया। उदाहरणतः, रिक्त स्थान ;चित्रा 4ण्14द्ध बु( के ध्यान की दशा तथा स्तूप ;चित्रा 4ण्15द्ध महापरिनिब्बान के प्रतीक बन गए। चक्र का भी प्रतीक के रूप में प्रायः इस्तेमाल किया गया ;चित्रा 4ण्16द्ध। यह बु( द्वारा सारनाथ में दिए गए पहले उपदेश का प्रतीक था। जैसा कि स्पष्ट है ऐसी मू£तकला को अक्षरशः नहीं समझा जा सकता है। उदाहरणतः, पेड़ का तात्पयर् केवल एक पेड़ नहीं था वरन् वह बु( के जीवन की एक घटना का प्रतीक था। ऐसे प्रतीकों को समझने के लिए यह शरूरी है कि इतिहासकार कलावृफतियों के निमार्ताओं की परंपराओं को जानें। 9ण्3 लोक परंपराएँ साँची में उत्की£णत बहुत सी अन्य मू£तयाँ शायद बौ( मत से सीध्ी जुड़ी नहीं थीं। इनमें वुफछ सुंदर स्ित्रायाँ भी मू£तयों में उत्की£णत हैं जो तोरणद्वार के किनारे एक पेड़ पकड़ कर झूलती हुइर् ;चित्रा 4ण्17द्ध दिखती हैं। शुरू - शुरू में विद्वान इस मू£त के महत्त्व के बारे में थोड़े असमंजस में थे। इस मू£त का त्याग और तपस्या से कोइर् रिश्ता नज़्ार नहीं आता था लेकिन साहित्ियक परंपराओं के अध्ययन से वे समझ पाए कि यह संस्वृफत भाषा में व£णत शालभंजिका की मू£त है। लोक परंपरा में यह माना जाता था कि इस स्त्राी द्वारा छुए जाने से वृक्षों में पूफल ख्िाल उठते थे और पफल होने लगते थे। ऐसा लगता है कि यह एक शुभ प्रतीक माना जाता था और इस कारण स्तूप के अलंकरण में प्रयुक्त हुआ। शालभंजिका की मू£त से पता चलता है कि जो लोग बौ( ध्मर् में आए उन्होंने बु( - पूवर् और बौ( ध्मर् से इतर दूसरे विश्वासों, प्रथाओं और धारणाओं से बौ( धमर् को समृ( किया। साँची की मू£तयों में पाए गए कइर् प्रतीक या चिÉ निश्चय ही इन्हीं परंपराओं से उभरे थे। उदाहरण के लिए, जानवरों के वुफछ बहुत ख़ूबसूरत उत्कीणर्न यहाँ पर पाए गए हैं। इन जानवरों में हाथी, घोड़े, बंदर और गाय - बैल शामिल हैं। हालाँकि साँची में जातकों से ली गइर् जानवरों की कइर् कहानियाँ हैं, ऐसा लगता है कि यहाँ पर लोगों को आक£षत करने के लिए जानवरों का उत्कीणर्न किया गया था। साथ ही जानवरों को मनुष्यों के गुणों के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। उदाहरण के लिए, हाथी शक्ित और ज्ञान के प्रतीक माने जाते थे। इन प्रतीकों में कमल दल और हाथ्िायों के बीच एक चित्रा4ण्17 तोरणद्वार पर एक स्त्राी चित्रा4ण्19 गजलक्ष्मी है कि इन उत्की£णत मू£तयों को देखने वाले उपासक इसे माया और गजलक्ष्मी दोनांे से जोड़ते थे। कइर् स्तंभों पर दिखाए गए सपो± को भी देख्िाए ;चित्रा 4ण्21द्ध। यह प्रतीक भी ऐसी लोक परंपराओं से लिया गया प्रतीत होता है जिनका ग्रंथों में हमेशा िाक्र नहीं होता था। दिलचस्प बात यह है कि कला पर लिखने वाले आधुनिक इतिहासकारों में एक शुरुआती इतिहासकार जेम्स पफगुर्सन ने साँची को वृक्ष और सपर् पूजा का वेंफद्र माना था। वे बौ( साहित्य से अनभ्िाज्ञ थे। तब तक ज़्यादातर बौ( ग्रंथों का अनुवाद नहीं हुआ था। इसलिए उन्होंने सिप़्ार्फ उत्की£णत मू£तयों का अध्ययन करके अपने निष्कषर् निकाले थे। 10ण् नयी ध£मक परंपराएँ 10ण्1 महायान बौ( मत का विकास इर्सा की प्रथम सदी के बाद बौ( अवधरणाओं और व्यवहार में बदलाव नशर आते हैं। प्रारंभ्िाक बौ( मत में निब्बान के लिएव्यक्ितगत प्रयास को विशेष महत्त्व दिया गया था। बु( को भी एक मनुष्य समझा जाता था जिन्होंने व्यक्ितगत प्रयास से प्रबोध्न और निब्बान प्राप्त किया। परंतु ध्ीरे - ध्ीरे एक मुक्ितदाता की कल्पना उभरने लगी। यह विश्वास किया जाने लगा कि वे मुक्ित दिलवासकते थे। साथ - साथ बोध्िसत्त की अवधरणा भी उभरने लगी।बोध्िसत्तों को परम करुणामय जीव माना गया जो अपने सत्कायो± से पुण्य कमाते थे। लेकिन वे इस पुण्य का प्रयोग दुनिया को दुखों में छोड़ देने के लिए और निब्बान प्राप्ित के लिए नहीं करते थे।बल्िक वे इससे दूसरों की सहायता करते थे। बु( और बोध्िसत्तों की मू£तयों की पूजा इस परंपरा का एक महत्वपूणर् अंग बन गइर्। ¯चतन की इस नयी परंपरा को महायान के नाम से जाना गया। जिन लोगों ने इन विश्वासों को अपनाया उन्होंने पुरानी परंपरा को हीनयान नाम से संबोध्ित किया। ऽ चचार् कीजिएण्ण्ण् मू£तकला के लिए हिóयों, मिट्टðी और धातुओं का भी इस्तेमाल होता है। इनके विषय में पता कीजिए। चित्रा4ण्22 पहली सदी की बु( मू£त, मथुरा हीनयान या थेरवाद? महायान के अनुयायी दूसरी बौ( परंपराओं के समथर्कों को हीनयान के अनुयायी कहते थे। लेकिन, पुरातन परंपरा के अनुयायी खुद को थेरवादी कहते थे। इसका मतलब है वे लोग जिन्होंने पुराने, प्रतिष्िठत श्िाक्षकों ;जिन्हें थेर कहते थेद्ध के बताए रास्ते पर चलने वाले। चित्रा4ण्23 विष्णु का वराह अवतार जिसमें उन्हें पृथ्वी देवी को बचाते हुए दिखाया गया है। ;लगभग छठी सदी, एहोल, कनार्टकद्ध 10ण्2 पौराण्िाक ¯हदू ध्मर् का उदय मुक्ितदाता की कल्पना सिपर्फ बौ( ध्मर् तक सीमित नहीं थी। हम पाते हैं कि इसी तरह के विश्वास एक अलग ढंग से उन परंपराओं मेें भी विकसित हो रहे थे जिन्हें आज ¯हदू ध्मर् के नाम से जाना जाता है। इसमें वैष्णव ;वह ¯हदू परंपरा जिसमें विष्णु को सबसे महत्वपूणर् देवता माना जाता हैद्ध और शैव ;वह संकल्पना जिसमें श्िाव परमेश्वर हैद्ध परंपराएँशामिल हैं। इनके अंतगर्त एक विशेष देवता की पूजा को खास महत्त्व दिया जाता था। इस प्रकार की आराध्ना में उपासना और इर्श्वर के बीच का रिश्ता प्रेम और समपर्ण का रिश्ता माना जाता था। इसे भक्ित कहते हैं। वैष्णववाद में कइर् अवतारों के इदर् - गिदर् पूजा प(तियाँ विकसित हुईं। इस परंपरा के अंदर दस अवतारों की कल्पना है। यह माना जाता था कि पापियों के बढ़ते प्रभाव के चलते जब दुनिया में अव्यवस्था और नाश की स्िथति आ जाती थी तब विश्व की रक्षा के लिए भगवान अलग - अलग रूपों में अवतार लेते थे। संभवतः अलग - अलग अवतार देश के भ्िान्न - भ्िान्न हिस्सों में लोकपि्रय थे। इन सब स्थानीय देवताओं को विष्णु का रूप मान लेना एकीवृफत ध£मक परंपरा के निमार्ण का एक महत्वपूणर् तरीका था। कइर् अवतारों को मू£तयों के रूप में दिखाया गया है। दूसरे देवताओं की भी मू£तयाँ बनीं। श्िाव को उनके प्रतीक ¯लग के रूप में बनाया जाता था। लेकिन उन्हें कइर् बार मनुष्य के रूप में भी दिखाया गया है। ये सारे चित्राण देवताओं से जुड़ी हुइर् मिश्रित अवधरणाओं पर आधरित थे। उनकी खूबियों और प्रतीकों को उनके श्िारोवस्त्रा, आभूषण, आयुधें ;हथ्िायार और हाथ में धरण किए गए अन्य शुभ अस्त्राद्ध और बैठने की शैली से इंगित किया जाता था। इन मू£तयों के अंकन का मतलब समझने के लिए इतिहासकारों को इनसे जुड़ी हुइर् कहानियों से परिचित होना पड़ता है। कइर् कहानियाँ प्रथम सहस्राब्िद के मध्य से ब्राह्मणों द्वारा रचित पुराणों में पाइर् जाती हैं। इनमें बहुत से किस्से ऐसे हैं जो सैकड़ों वषर् पहले रचने के बाद सुने - सुनाए जाते रहे थे। इनमें देवी - देवताओं की भी कहानियाँ हैं। सामान्यतः इन्हें संस्वृफत श्लोकों में लिखा गया था। इन्हें ऊँची आवाश में पढ़ा जाता था जिसे कोइर् भी सुन सकता था। महिलाएँ और शूद्र जिन्हें वैदिक साहित्य पढ़ने - सुनने की अनुमति नहीं थी, पुराणों को सुन सकते थे। पुराणों की श्यादातर कहानियाँ लोगों के आपसी मेल - मिलाप से विकसित हुईं। पुजारी, व्यापारी और सामान्य स्त्राी - पुरुष एक से दूसरी जगह आते - जाते हुए अपने विश्वासों और अवधरणाओं का आदान - प्रदान करते थे। उदाहरण के लिए, हम यह जानते हैं कि वासुदेव - वृफष्ण मथुरा इलाके के महत्वपूणर् देवता थे। कइर् शताब्िदयों के दौरान उनकी पूजा देश के दूसरे इलाकों में भी पैफल गइर्। 10ण्3 मंदिरों का बनाया जाना जिस समय साँची जैसी जगहों में स्तूप अपने विकसित रूप में आ गए थे उसी समय देवी - देवताओं की मू£तयों को रखने के लिए सबसे पहले मंदिर भी बनाए गए। शुरू के मंदिर एक चैकोर कमरे के रूप में थे जिन्हें गभर्गृह कहा जाता था। इनमें एक दरवाशा होता था जिससे उपासक मू£त की पूजा करने के लिए भीतर प्रविष्ट हो सकता था। ध्ीरे - ध्ीरे गभर्गृह के ऊपर एक ऊँचा ढाँचा बनाया जाने लगा जिसे श्िाखर कहा चित्रा4ण्24 महाबलीपुरम् ;तमिलनाडुद्ध में दुगार् की एक मू£त ;छठी सदीद्ध Â कलाकारों ने किस प्रकार गति को दिखाने की कोश्िाश की है? इस मू£त में बताइर् कहानी के बारे में जानकारी इकट्टòी कीजिए। चित्रा4ण्25 एक मंदिर, देवगढ़ ;उत्तर प्रदेशद्ध, पाँचवीं सदी Â गभर्गृह के प्रवेशद्वार और श्िाखर के अवशेषों को पहचानें। जाता था। मंदिर की दीवारों पर अक्सर भ्िािा चित्रा उत्कीणर् किए जाते थे। बाद के युगों में मंदिरों के स्थापत्य का कापफी विकास हुआ। अब़मंदिरों के साथ विशाल सभास्थल, ऊँची दीवारें और तोरण भी जुड़ गए। जल आपू£त ;देख्िाए अध्याय 7द्ध का इंतशाम भी किया जाने लगा। शुरू - शुरू के मंदिरों की एक खास बात यह थी कि इनमें से वुफछ पहाडि़यों को काट कर खोखला करके वृफत्रिाम गुपफाओं के रूप में बनाए गए थे। वृफत्रिाम गुपफाएँ बनाने की परंपरा कापफी पुरानी थी ;चित्रा़4ण्27द्ध। चित्रा4ण्26 शेषनाग पर आराम करते विष्णु की मू£त, देवगढ़;उत्तर प्रदेशद्ध, पाँचवीं सदी सबसे प्राचीन वृफत्रिाम गुपफाएँ इर्सा पूवर् तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए बनाइर् गइर् थीं। यह परंपरा अलग - अलग चरणों में विकसित होती रही। इसका सबसे विकसित रूप हमें आठवीं सदी के वैफलाशनाथ ;श्िाव का एक नामद्ध के मंदिर में नशर आता है जिसमें पूरी पहाड़ी काटकर उसे मंदिर का रूप दे दिया गया था। एक ताम्रपत्रा अभ्िालेख एलोरा के प्रमुख तक्षक द्वारा इसका निमार्ण समाप्त करने के बाद उसके आश्चयर् को व्यक्त करता है फ्हे भगवान यह मैंने वैफसे बनाया!य् 11ण् क्या हम सब वुफछ देख - समझ सकते हैं? अब तक आपको हमारे अतीत की समृ( दृश्य परंपराओं की एक झलक मिल चुकी है। ये परंपराएँ ईंट और पत्थर से नि£मत स्थापत्य कला, मू£त कला और चित्राकला के रूप में हमारे सामने आईं हैं। हमने पाया कि समय के बहाव में बहुत वुफछ नष्ट हो गया है। लेकिन जो बचा है और संरक्ष्िात है वह हमें इन भव्य कलावृफतियों के निमार्ताओं - कलाकारों, मू£तकारों, राजगीरों और वास्तुकारों की दृष्िट से परिचित कराता है। लेकिन क्या हम उनके संदेश को बिना दुविध के अपने - आप समझ सकते हैं? क्या हम कभी यह पूरी तरह से समझ पाएँगे कि जो लोग इनप्रतिवृफतियों को देखते और पूजते थे उनके लिए इनका क्या महत्त्व था? 11ण्1 अनजाने को समझने की कोश्िाश यह स्मरणीय है कि यूरोप के विद्वानों ने उन्नीसवीं सदी में जबदेवी - देवताओं की मू£तयाँ देखीं तो वे उनकी पृष्ठभूमि और महत्त्व को नहीं समझ पाए। कइर् सिरों, हाथों वाली या मनुष्य और जानवर के रूपों चित्रा4ण्27 बराबर ;बिहारद्ध की गुपफाएँ, लगभग तीसरी सदी इर्सा पूवर् चित्रा4ण्28 वैफलाशनाथ मंदिर, एलोरा ;महाराष्ट्रद्ध यह सारा ढाँचा एक च‘ान को काटकर तैयार किया गया है। को मिलाकर बनाइर् गइर् मू£तयाँ उन्हें विवृफत लगती थीं और कइर् बार वे घृणा से भर जाते थे। इन शुरू - शुरू के विद्वानों ने ऐसी अजीबोगरीब मू£तयों की समझ बनाने के लिए उनकी तुलना एक ऐसी परंपरा से की जिससे वे परिचित थे। यह थी प्राचीन यूनान की कला परंपरा। हालाँकि वे प्रारंभ्िाक भारतीय मू£तकला को यूनान की कला से निम्नस्तर का मानते थे, बु( और बोध्िसत्त की मू£तयों की खोज से वे काप़्ाफी उत्साहित हुए। ऐसा इसलिए हुआ कि ये मू£तयाँ यूनानी प्रतिमानों से प्रभावित थीं। ये मू£तयाँ श्यादातर तक्षश्िालाऔर पेशावर जैसे उत्तर - पश्िचम के नगरों में मिली थीं। इन इलाकों में इर्सा से दो सौ साल पहले भारतीय - यूनानी शासकों ने राज्य बनाए थे। ये मू£तयाँ यूनानी मू£तयों से काप़्ाफी मिलती - जुलती थीं। चूँकि ये विद्वान यूनानी परंपरा से परिचित थे, इसलिए उन्होंने इन्हें भारतीय मू£त कला का सवर्श्रेष्ठ नमूना माना। परिणामतः इन विद्वानों ने इस कला को समझने के लिए एक तरीका अपनाया जो हम सब अक्सर अपनाते हैं - परिचित चीशों के आधर पर अपरिचित चीशों को समझने का पैमाना तैयार करना। 11ण्2 यदि लिख्िात और दृश्य का मेल न हो..एक और समस्या पर नशर डालिए। हमने पाया कि किसीमू£त का महत्त्व और संदभर् समझने के लिए कला के इतिहासकार अक्सर लिख्िात ग्रंथों से जानकारी इकट्टòी करते हैं। भारतीय मू£तयों की यूनानी मू£तयों से तुलना कर निष्कषर् निकालने की अपेक्षा यह निश्चय ही श्यादा बेहतर तरीका है। लेकिन यह बहुत आसान नहीं। इसका सबसे दिलचस्प उदाहरण है महाबलीपुरम ;तमिलनाडुद्ध में एक विशाल चट्टाðन पर उत्कीणर् मू£तयाँ। निश्चय ही चित्रा 4ण्30 में किसी कथा का सजीव चित्राण किया गया है। लेकिन यह कौन - सी कथा है? कला इतिहासकारों ने पुराणों के साहित्य में इस कथा को पहचानने के लिए काप़्ाफी खोजबीन की है। लेकिन उनमें काप़्ाफी चित्रा4ण्29 गांधर का एक बोध्िसत्त उनके कपड़ों और केश विन्यास पर ध्यान दीजिए। मतभेद हैं। वुफछ का मानना है कि इसमें गंगा नदी के स्वगर् से अवतरण का चित्राण है। चट्टðान की सतह के मध्य प्रावृफतिक दरार शायद नदी को दिखा रही है। यह कथा महाकाव्यों और पुराणों में व£णत है। दूसरे विद्वान मानते हैं कि यहाँ पर दिव्यास्त्रा प्राप्त करने के लिए महाभारत में दी गइर् अजुर्न की तपस्या को दिखाया गया है। वे मू£तयों के बीच एक साध्ु कोवेंफद्र में रखे जाने की बात को महत्त्व देते हैं। अंततः हमें यह याद रखना चाहिए कि बहुत से रीति - रिवाज, ध£मक विश्वास और व्यवहार इमारतों, मू£तयों या चित्राकला के द्वारा स्थायी दृश्य माध्यमों के रूप में दशर् नहीं किए गए। इनमें दिन - प्रतिदिन और विश्िाष्ट अवसरों के रीति - रिवाज शामिल हैं। कइर् लोगों और समुदायों को चिरस्थायी विवरण रखने की शरूरत महसूस नहीं हुइर् हो। संभव है कि ध£मक गतिविध्ियों और दाशर्निक मान्यताओं की उनकी सिय परंपरा रही हो। वस्तुतः हमने इस अध्याय में जिन शानदार उदाहरणों को चुनाहै वे एक विशाल ज्ञान राश्िा की मात्रा ऊपरी परत हैं। ऽ चचार् कीजिएण्ण्ण् आपने कोइर् भी ध£मक अनुष्ठान देखा हो तो उसका वणर्न कीजिए। क्या इसे किसी रूप में हमेशा के लिए दशर् किया जाता है? चित्रा 4ण्30 महाबलीपुरम् की एक मू£त 1ण् क्या उपनिषदों के दाशर्निकों के विचार नियतिवादियों और भौतिकवादियों से भ्िान्न थे? अपने जवाब के पक्ष में तवर्फ दीजिए। 2ण् जैन ध्मर् की महत्वपूणर् श्िाक्षाओं को संक्षेप में लिख्िाए। 3ण् साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका की चचार् कीजिए। 4ण् निम्नलिख्िात संक्ष्िाप्त अभ्िालेख को पढि़ए और जवाब दीजिए: महाराजा हुविष्क ;एक वुफषाण शासकद्ध के तैंतीसवें साल में गमर् मौसम के पहले महीने के आठवें दिन त्रिापिटक जानने वाले भ्िाक्खु बल की श्िाष्या, त्रिापिटक जानने वाली बु(मिता के बहन की बेटी भ्िाक्खुनी ध्नवती ने अपने माता - पिता के साथ मध्ुवनक मेंबोिासत्त की मू£त स्थापित की। ;कद्ध ध्नवती ने अपने अभ्िालेख की तारीख वैफसे निश्िचत की? ;खद्ध आपके अनुसार उन्होंने बोध्िसत्त की मू£त क्यों स्थापित की? ;गद्ध वे अपने किन रिश्तेदारों का नाम लेती हैं? ;घद्ध वे कौन - से बौ( ग्रंथों को जानती थीं? ;ड.द्ध उन्होंने ये पाठ किससे सीखे थे? 5ण् आपके अनुसार स्त्राी - पुरुष संघ में क्यों जाते थे? 6ण् साँची की मू£तकला को समझने में बौ( साहित्य के ज्ञान से कहाँ तक सहायता मिलती है? 7ण् चित्रा 4ण्32 और 4ण्33 में साँची से लिए गए दो परिदृश्य दिए गए हैं। आपको इनमें क्या नशर आता है? वास्तुकला, पेड़ - पौध्े, और जानवरों को ध्यान से देखकर तथा लोगों के काम - ध्ंधें को पहचान कर यह बताइए कि इनमें से कौन से ग्रामीण और कौन से शहरी परिदृश्य हैं? 8ण् वैष्णववाद और शैववाद के उदय से जुड़ी वास्तुकला और मू£तकला के विकास की चचार् कीजिए। 9ण् स्तूप क्यों और वैफसे बनाए जाते थे? चचार् कीजिए। 10ण् विश्व के रेखांकित मानचित्रा पर उन इलाकों पर निशान लगाइए जहाँ बौ( ध्मर् का प्रसार हुआ। उपमहाद्वीप से इन इलाकों को जोड़ने वाले जल और स्थल मागो± को दिखाइए। 11ण् इस अध्याय में च£चत ध£मक परंपराओं में से क्या कोइर् परंपरा आपके अड़ोस - पड़ोस में मानी जाती है? आज किन ध£मक गं्रथों का प्रयोग किया जाता है? उन्हें वैफसे संरक्ष्िात और संप्रेष्िात किया जाता है? क्या पूजा में मू£तयों का प्रयोग होता है? यदि हाँ तो क्या ये मू£तयाँ इस अध्याय में लिखी गइर् मू£तयों से मिलती - जुलती हैं या अलग हैं? ध£मक वृफत्यों के लिए प्रयुक्त इमारतों की तुलना प्रारंभ्िाक स्तूपों और मंदिरों से कीजिए। 12ण् इस अध्याय में व£णत ध£मक परंपराओं से जुड़े अलग - अलग काल और इलाकों की कम से कम पाँच मू£तयों और चित्रों की तसवीरें इकट्टòी कीजिए। उनके शीषर्क हटाकर प्रत्येक तसवीर दो लोगों को दिखाइए और उन्हें इसके बारे में बताने को कहिए। उनके वणर्नों की तुलना करते हुए अपनी खोज की रिपोटर् लिख्िाए। चित्रा4ण्31 साँची की एक मू£त चित्रों हेतु श्रेय विषय 1 चित्रा 1ण्1ए 1ण्2ए 1ण्3ए 1ण्4ए 1ण्5ए 1ण्6ए 1ण्8ए 1ण्11ए 1ण्12ए 1ण्13ए 1ण्14ए 1ण्15ए 1ण्16ए 1ण्20ए 1ण्22ए 1ण्23ए 1ण्26ए 1ण्28ए 1ण्29ए चित्रा 1ण्30 अभ्यास कायर् भारतीय पुरातात्िवक सवेर्क्षण तथा भारतीय संग्रहालय, नयी दिल्ली चित्रा 1ण्7ए 1ण्9ए 1ण्10ए 1ण्17ए 1ण्18ए 1ण्19ए 1ण्21ए 1ण्24रू प्रोप़्ोफसर ग्रेगोरी एल. पोशेल चित्रा 1ण्27रू सांस्वृफतिक स्रोत एवं प्रश्िाक्षण वेंफद्र, नयी दिल्ली विषय 2 चित्रा 2ण्1रू अमेरिकन इंस्टीट्यूट आॅपफ इंडियन स्टडीश, गुड़गाँव़चित्रा 2ण्2ए 2ण्6रू भारतीय पुरातात्िवक सवेर्क्षण चित्रा 2ण्3ए 2ण्5ए 2ण्10रू सांस्वृफतिक स्रोत एवं प्रश्िाक्षण वेंफद्र, नयी दिल्ली चित्रा 2ण्4ए 2ण्7ए 2ण्9ए 2ण्12ए 2ण्13रू भारतीय संग्रहालय, नयी दिल्ली चित्रा 2ण्8रू वाइकीपीडिया विषय 3 चित्रा 3ण्1ए 3ण्10रू भारतीय पुरातात्िवक सवेर्क्षण चित्रा 3ण्3ए 3ण्4ए 3ण्5ए 3ण्6ए 3ण्7ए 3ण्8ए 3ण्9रू भारतीय संग्रहालय, नयी दिल्ली विषय 4 चित्रा 4ण्1ए 4ण्5ए 4ण्8ए 4ण्9ए 4ण्12ए 4ण्13ए 4ण्14ए 4ण्15ए 4ण्16ए 4ण्17ए 4ण्18ए 4ण्19ए 4ण्21ए 4ण्22ए 4ण्23ए 4ण्24ए 4ण्25ए 4ण्26ए 4ण्27ए 4ण्29ए 4ण्31ए चित्रा 4ण्32 और 33 अभ्यास कायर् में अमेरिकन इंस्टीट्यूट आॅप़्ाफ इंडियन स्टडीश, गुड़गाँव चित्रा 4ण्2रू वाइकीपीडिया चित्रा 4ण्3ए 4ण्11ए 4ण्28ए 4ण्30रू सांस्वृफतिक स्रोत एवं प्रश्िाक्षण वेंफद्र, नयी दिल्ली चित्रा 4ण्4ए 4ण्6ए 4ण्7ए 4ण्20रू भारतीय संग्रहालय, नयी दिल्ली

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