चित्रा3ण्2 समालोचनात्मक संस्करण के एक पृष्ठ का अंश बड़े मोटे अक्षरों में प्रकाश्िात अंश मुख्य पाठ का हिस्सा है। छोटा मुद्रण विभ्िान्न पांडुलिपियों में पाए गए पाठभेदों को दशार्ता है जिन्हें ध्यानपूवर्क तालिकाब( किया गया था। 1ण् महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण 1919 में प्रसि( संस्वृफत विद्वान वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में एकअत्यंत महत्त्वाकांक्षी परियोजना की शुरुआत हुइर्। अनेक विद्वानों ने मिलकर महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण तैयार करने का िाम्मा उठाया। इससे जुड़े क्या - क्या कायर् थे? आरंभ में देश के विभ्िान्न भागों से विभ्िान्न लिपियों में लिखी गइर् महाभारत की संस्वृफत पांडुलिपियों को एकत्रिात किया गया। परियोजना पर काम करने वाले विद्वानों ने सभी पांडुलिपियों में पाए जाने वाले श्लोकों की तुलना करने का एक तरीका ढूँढ़ निकाला। अंततः उन्होंने उन श्लोकों का चयन किया जो लगभग सभी पांडुलिपियों में पाए गए थे और उनका प्रकाशन 13ए000 पृष्ठों में पैफले अनेक ग्रंथ खंडों में किया। इस परियोजना को पूरा करने में सैंतालीस वषर् लगे। इस पूरी प्रिया में दो बातें विशेष रूप से उभर कर आईं: पहली, संस्वृफत के कइर् पाठों के अनेक अंशों में समानता थी। यह इस बात से ही स्पष्टहोता है कि समूचे उपमहाद्वीप में उत्तर में कश्मीर और नेपाल से लेकर दक्ष्िाण में केरल और तमिलनाडु तक सभी पांडुलिपियों में यह समानता देखने में आइर्। दूसरी बात जो स्पष्ट हुइर्, वह यह थी कि वुफछ शताब्िदयों के दौरान हुए महाभारत के प्रेषण में अनेक क्षेत्राीय प्रभेद भी उभर कर सामने आए। इन प्रभेदों का संकलन मुख्य पाठ की पादटिप्पण्िायों और परिश्िाष्टों के रूप में किया गया। 13ए000 पृष्ठों में से आध्े से भी अिाक इन प्रभेदों का ब्योरा देते हैं। एक तरह से देखा जाए तो ये प्रभेद उन गूढ़ प्रियाओं के द्योतक हंै जिन्होंने प्रभावशाली परंपराओं और लचीले स्थानीय विचार और आचरण के बीच संवाद कायम करके सामाजिक इतिहासों को रूप दिया था। यह संवाद द्वंद्व और मतैक्य दोनों को ही चित्रिात करते हैं। इन सभी प्रियाओं के बारे में हमारी समझ मुख्यतः उन गं्रथों पर आधारित है जो संस्वृफत में ब्राह्मणों द्वारा उन्हीं के लिए लिखे गए। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में इतिहासकारों ने पहली बार सामाजिक इतिहास के मुद्दों का अनुशीलन करते समय इन ग्रंथों को सतही तौर पर समझाμउनका विश्वास था कि इन ग्रंथों में जो वुफछ भी लिखा गया है वास्तव में उसी तरह से उसे व्यवहार में लाया जाता होगा। कालांतर में विद्वानों ने पालि, प्रावृफत और तमिल ग्रंथों के माध्यम से अन्य परंपराओं का अध्ययन किया। इन अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ कि आदशर्मूलक संस्वृफत ग्रंथ आमतौर से आध्िकारिक माने जाते थे, ¯कतु इन आदशो± को प्रश्नवाचक दृष्िट से भी देखा जाता था और यदा - कदा इनकी अवहेलना भी की जाती थी। जब हम इतिहासकारों द्वारा सामाजिक इतिहासों के पुन£नमार्ण की व्याख्या करते हैं तब हमें इस बात को ध्यान में रखना होगा। 2ण् बंध्ुता एवं विवाह अनेक नियम और व्यवहार की विभ्िान्नता 2ण्1 परिवारों के बारे में जानकारी हम बहुध पारिवारिक जीवन को सहज ही स्वीकार कर लेते हैं। ¯कतु आपने देखा होगा कि सभी परिवार एक जैसे नहीं होते: पारिवारिक जनों की गिनती, एक दूसरे से उनका रिश्ता और उनके ियाकलापों में भी भ्िान्नता होती है। कइर् बार एक ही परिवार के लोग भोजन और अन्य संसाध्नों का आपस में मिल - बाँटकर इस्तेमाल करते हैं, एक साथ रहते और काम करते हैं और अनुष्ठानों को साथ ही संपादित करते हैं। परिवार एक बड़े समूह का हिस्सा होते हैं जिन्हें हम संबंध्ी कहते हैं। तकनीकी भाषा का इस्तेमाल करें तो हम संबंध्ियों को जाति समूह कह सकते हंै। पारिवारिक रिश्ते ‘नैस£गक’ और रक्त संब( माने जाते हैं ¯कतु इन संबंधों की परिभाषा अलग - अलग तरीके से की जाती है। वुफछ समाजों में भाइर् - बहन ;चचेरे, मौसेरे आदिद्ध से खून का रिश्ता माना जाता है ¯कतु अन्य समाज ऐसा नहीं मानते। आरंभ्िाक समाजों के संदभर् में इतिहासकारों को विश्िाष्ट परिवारों के बारे में जानकारी आसानी से मिल जाती है ¯कतु सामान्य लोगों के पारिवारिक संबंधें को पुन£न£मत करना मुश्िकल हो जाता है। इतिहासकार परिवार और बंध्ुता संबंध्ी विचारों का भी विश्लेषण करते हैं। इनका अध्ययन इसलिए महत्वपूणर् है क्योंकि इससे लोगों की सोच का पता चलता है। संभवतः इन विचारों ने लोगों के ियाकलापों को प्रभावित किया होगा। इसी तरह व्यवहार ने विचारों पर भी असर डाला होगा। 2ण्2 पितृवंश्िाक व्यवस्था के आदशर् क्या हम उन ¯बदुओं को नि£दष्ट कर सकते हैं जब बंध्ुता के रिश्तों में परिवतर्न आया? एक स्तर पर महाभारत इसी की कहानी है। यह बांधवों के दो दलोंदृकौरव और पांडवदृके बीच भूमि और सत्ता को लेकर हुए संघषर् का चित्राण करती है। दोनों ही दल वुफरु वंश से संबंध्ित थे जिनका एक जनपद ;अध्याय 2 मानचित्रा 1द्ध पर शासन था। यह संघषर् एक यु( में परिणत हुआ जिसमें पांडव विजयी हुए। इनके उपरांत पितृवंश्िाकउत्तरािाकार को उद्घोष्िात किया गया। हालाँकि पितृवंश्िाकता महाकाव्य की रचना से पहले भी मौजूद थी, महाभारत की मुख्य कथावस्तु ने इस आदशर् को और सुदृढ़ किया। पितृवंश्िाकता में पुत्रा पिता की मृत्यु के बाद उनके संसाध्नों पर ;राजाओं के संदभर् में ¯सहासन भीद्ध अध्िकार जमा सकते थे। अध्िकतर राजवंश ;लगभग छठी शताब्दी इर्.पू. सेद्ध पितृवंश्िाकता प्रणाली का अनुसरण करते थे। हालाँकि इस प्रथा में विभ्िान्नता थी: मानचित्रा 1 हस्ितनापुर वुफरु पांचाल क्षेत्रा और निकटवतीर् स्थानवुफरु इंद्रप्रस्थ शाक्य शूरसेन कपिलवस्तुश्रावस्ती मल्ल लुंबिनीविराट मथुरा कोसल पावा मत्स्य वुफशीनगरअयोध्या वैशाली वत्स पाटलिपुत्रासारनाथवाराणसीकौशाम्बी बोध्गया उज्जयिनी रेखाचित्राअवन्ित पैमाना नहीं दिया गया है। कभी पुत्रा के न होने पर एक भाइर् दूसरे का उत्तराध्िकारी हो जाता था तो कभी बंध्ु - बांध्व ¯सहासन पर अपना अध्िकार जमाते थे। वुफछ विश्िाष्ट परिस्िथतियों में स्ित्रायाँ जैसे प्रभावती गुप्त ;अध्याय 2द्ध सत्ता का उपभोग करती थीं। पितृवंश्िाकता के प्रति झुकाव शासक परिवारों के लिए कोइर् अनूठी बात नहीं थी। )ग्वेद जैसे कमर्कांडीय ग्रंथ के मंत्रों से भी यह बात स्पष्ट होती है। यह संभव है कि ध्नी वगर् के पुरुष और ब्राह्मण भी ऐसा ही दृष्िटकोण रखते थे।स्रोत1 स्रोत 2 ‘उत्तम पुत्रों’ का प्रजनन  इस मंत्रा के संदभर् में, विवाह का वध्ू और वर के लिए क्या अभ्िाप्राय है? इसकी चचार् कीजिए। क्या ये अभ्िाप्राय समान हैं या पिफर इनमें भ्िान्नताएँ हैं? यहाँ )ग्वेद से एक मंत्रा का अंश उ(ृत है जो इस ग्रंथ में संभवतः लगभग 1000 इर्.पू. में जोड़ा गया था। विवाह संस्कार के दौरान यह मंत्रा पुरोहित द्वारा पढ़ा जाता था। आज भी अनेक ¯हदू विवाह संस्कारों में इसका प्रयोग होता है: मैं इसे यहाँ से मुक्त करता हूँ ¯कतु वहाँ से नहीं। मैंने इसे वहाँ मशबूती से स्थापित किया है जिससेइंद्र के अनुग्रह से इसके उत्तम पुत्रा हों और पति के प्रेम का सौभाग्य इसे प्राप्त हो। इंद्र शौयर्, यु( और वषार् के एक प्रमुख देवता थे। ‘यहाँ’ और ‘वहाँ’ से तात्पयर् पिता और पति के गृह से है। स्वजन के मध्य लड़ाइर् क्यों हुइर्? यह उ(रण संस्वृफत महाभारत के आदिपवर्न् ;प्रथम अध्यायद्ध से है और कौरव पांडव के बीच हुए संघषर् का चित्राण करता हैः कौरव...ध्ृतराष्ट्र के पुत्रा थे और पांडव उनके बांध्व जन थे। चूँकि धृतराष्ट्र नेत्राहीन थे अतः उनके अनुज पांडु हस्ितनापुर के ¯सहासन पर आसीन हुए... ¯कतु पांडु की असामयिक मृत्यु के बाद ध्ृतराष्ट्र राजा बने, क्योंकि सभी राजवुफमार अल्पवयस्क थे। जैसे - जैसे राजवुफमार बड़े हुए हस्ितनापुर के नागरिक पांडवों के प्रति अपनी अभ्िारुचि व्यक्त करने लगे क्योंकि वे कौरवों के मुकाबले अध्िक योग्य और सदाचारी थे। इस बात से कौरवों में ज्येष्ठ, दुयोर्ध्न को बहुत इर्ष्यार् हुइर्। वह अपने पिता के पास गया और बोला, फ्हे भूपति, अपूणर्ता के कारण आपको ¯सहासन पर बैठने का अध्िकार नहीं था हालाँकि यह आपको प्राप्त हो गया। यदि पांडव पांडु से यह विरासत प्राप्त करते हैं तो उनके बादउनके पुत्रा, पौत्रा और पिफर प्रपौत्रा इस पैतृक संपिा के अध्िकारी होजाएँगे और हम तथा हमारे पुत्रा इस राज्य के उत्तराध्िकार से बेदखल होकर संसार में क्षुद्र समझे जाएँगे।य् इस तरह के उ(रण अक्षरशः सत्य न भी हों तो भी वे इस बात का अनुमान करा देते हैं कि जिन लोगों ने यह ग्रंथ लिखा वे क्या सोचते थे। कभी - कभी, जैसे यहाँ, प्रकरणों में परस्पर विरोध्ी विचार मिलते हैं।  उ(रण पढि़ए और उन सारे मूल तत्वों की सूची तैयार कीजिए जिनका राजा बनने के लिए प्रस्ताव किया गया है। एक विशेष वुफल में जन्म लेना कितना महत्वपूणर् था? इनमें से कौन - सा मूल तत्व सही लगता है? क्या ऐसा कोइर् तत्व है जो आपको अनुचित लगता है? 2ण्3 विवाह के नियम जहाँ पितृवंश को आगे बढ़ाने के लिए पुत्रा महत्वपूणर् थे वहाँ इस व्यवस्था में पुत्रिायों को अलग तरह से देखा जाता था। पैतृक संसाध्नों पर उनका कोइर् अध्िकार नहीं था। अपने गोत्रा से बाहर उनका विवाह कर देना ही अपेक्ष्िात था। इस प्रथा को बहि£ववाह प(ति कहते हैं और इसका तात्पयर्यह था कि ऊँची प्रतिष्ठा वाले परिवारों की कम उम्र की कन्याओं और स्ित्रायों का जीवन बहुत सावधनी से नियमित किया जाता था जिससे ‘उचित’ समय और ‘उचित’ व्यक्ित से उनका विवाह किया जा सके। इसका प्रभाव यह हुआ कि कन्यादान अथार्त् विवाह में कन्या की भेंट को पिता का महत्वपूणर् ध£मक कतर्व्य माना गया। नए नगरों के उद्भव से ;अध्याय 2द्ध सामाजिक जीवन अध्िक जटिल हुआ। यहाँ पर निकट और दूर से आकर लोग मिलते थे और वस्तुओं की खरीद - पफरोख्त के साथ ही इस नगरीय परिवेश में विचारों़विवाह के प्रकार अंत£ववाह में वैवाहिक संबंध् समूह के मध्य ही होते हैं। यह समूह एक गोत्रावुफल अथवा एक जाति या पिफर एक हीस्थान पर बसने वालों का हो सकता है। बहि£ववाह गोत्रा से बाहर विवाह करनेको कहते हैं। बहुपत्नी प्रथा एक पुरुष की अनेकपत्िनयाँ होने की सामाजिक परिपाटी है। बहुपति प्रथा एक स्त्राी के अनेक पति होने की प(ति है। स्रोत3 यहाँ मनुस्मृति से पहली, चैथी, पाँचवीं और छठी विवाह प(ति का उ(रण दिया जा रहा है: पहली: कन्या का दान, बहुमूल्य वस्त्रों और अलंकारों से विभूष्िात कर उसे वेदज्ञ वर को दान दिया जाए जिसे पिता ने स्वयं आमंत्रिात किया हो। चैथी: पिता वर - वध्ू युगल को यह कहकर संबोध्ित करता है कि: फ्तुम साथ मिलकर अपने दायित्वों का पालन करो।य् तत्पश्चात वह वर का सम्मान कर उसे कन्या का दान करता है। पाँचवीं: वर को वध्ू की प्राप्ित तब होती है जब वह अपनी क्षमता व इच्छानुसार उसके बांध्वों को और स्वयं वध्ू को यथेष्ट ध्न प्रदान करता है। छठीं: स्त्राी और पुरुष के बीच अपनी इच्छा से संयोग... जिसकी उत्पिा काम से है.. इनमें से प्रत्येक विवाह प(ति के विषय में चचार् कीजिए कि विवाह का निणर्य किसके द्वारा लिया गया था: ;कद्धवध्ू ;खद्ध वर ;गद्धवध्ू का पिता ;घद्ध वर का पिता;घद्ध अन्य लोग भारतीय इतिहास के वुफछ विषय का भी आदान - प्रदान होता था। संभवतः इस वजह से आरंभ्िाक विश्वासोंऔर व्यवहारों ;देख्िाए अध्याय 4द्ध पर प्रश्नचिÉ लगाए गए। इस चुनौती के जवाब में ब्राह्मणों ने समाज के लिए विस्तृत आचार संहिताएँ तैयार कीं। ब्राह्मणों को इन आचार संहिताओं का विशेष पालन करना होता था ¯कतु बाकी समाज को भी इसका अनुसरण करना पड़ता था। लगभग 500 इर्.पू. से इन मानदंडों का संकलन ध्मर्सूत्रा व ध्मर्शास्त्रा नामक संस्वृफत ग्रंथों में किया गया। इसमें सबसे महत्वपूणर् मनुस्मृति थी जिसका संकलन लगभग 200 इर्.पू. से 200 इर्सवी के बीच हुआ। हालाँकि इन ग्रंथों के ब्राह्मण लेखकों का यह मानना था कि उनका दृष्िटकोण सावर्भौमिक है और उनके बनाए नियमों का सबके द्वारा पालन होना चाहिए, ¯कतु वास्तविक सामाजिक संबंध् कहीं अध्िक जटिल थे। इस बात को भी ध्यान में रखना शरूरी है कि उपमहाद्वीप में पैफली क्षेत्राीय विभ्िान्नता और संचार की बाधओं की वजह से भी ब्राह्मणों का प्रभाव सावर्भौमिक कदापि नहीं था। दिलचस्प बात यह है कि ध्मर्सूत्रा और ध्मर्शास्त्रा विवाह के आठप्रकारों को अपनी स्वीवृफति देते हैं। इनमें से पहले चार ‘उत्तम’ माने जाते थे और बाकियों को ¯नदित माना गया। संभव है कि ये विवाह प(तियाँ उन लोगों में प्रचलित थीं जो ब्राह्मणीय नियमों को अस्वीकार करते थे। 2ण्4 स्त्राी का गोत्रा एक ब्राह्मणीय प(ति जो लगभग 1000 इर्.पू. के बाद से प्रचलन में आइर्, वह लोगों ;खासतौर से ब्राह्मणोंद्ध को गोत्रों में वगीर्वृफत करने की थी। प्रत्येक गोत्रा एक वैदिक )ष्िा के नाम पर होता था। उस गोत्रा के सदस्य )ष्िा के वंशज माने जाते थे। गोत्रों के दो नियम महत्वपूणर् थे: विवाह के पश्चात स्ित्रायों को पिता के स्थान पर पति के गोत्रा का माना जाता था तथा एक ही गोत्रा के सदस्य आपस में विवाह संबंध् नहीं रख सकते थे। क्या इन नियमों का सामान्यतः अनुसरण होता था, इस बात को जानने के लिए हमें स्त्राी और पुरुष नामों का विश्लेषण करना पड़ेगा जो कभी - कभी गोत्रों के नाम से उ(ृत होते थे। हमें वुफछ नाम सातवाहनों जैसे प्रबल शासकों के वंश से मिलते हैं। इन राजाओं का पश्िचमी भारत और दक्कन के वुफछ भागों पर शासन था ;लगभग दूसरी शताब्दी इर्.पूसे दूसरी शताब्दी इर्सवी तकद्ध। सातवाहनों के कइर् अभ्िालेख प्राप्त हुए हैं जिनके आधर पर इतिहासकारों ने पारिवारिक और वैवाहिक रिश्तों का खाका तैयार किया है। स्रोत4 स्रोत5 माता की सलाह  क्या यह उ(रण आपको आरंभ्िाक भारतीय समाज में माँ को किस दृष्िट से देखा जाता था इसका जायशा देता है। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि जब कौरवों और पांडवों के बीच यु( अवश्यंभावीहो गया तो गांधरी ने अपने ज्येष्ठ पुत्रा दुयोर्ध्न से यु( न करने की विनती कीः शांति की संध्ि करके तुम अपने पिता, मेरा तथा अपने शुभेच्छुकों कासम्मान करोगे.... विवेकी पुरुष जो अपनी इंदि्रयों पर नियंत्राण रखता हैवही अपने राज्य की रखवाली करता है। लालच और क्रोध् आदमी कोलाभ से दूर खदेड़कर ले जाते हैंऋ इन दोनों शत्राुओं को पराजित कर राजासमस्त पृथ्वी को जीत सकता है... हे पुत्रा तुम विवेकी और वीर पांडवों केसाथ सानंद इस पृथ्वी का भोग करोगे... यु( में वुफछ भी शुभ नहींहोता, ना ध्मर् और अथर् की प्राप्ित होती है और ना ही प्रसन्नता कीऋ यु(के अंत में सपफलता मिले यह भी शरूरी नहीं... अपने मन को यु( मेंलिप्त मत करो..दुयोर्ध्न ने माँ की सलाह नहीं मानी, वह यु( में लड़ा और हार गया। वुफछ सातवाहन राजा बहुपत्नी प्रथा ;अथार्त् एक से अध्िक पत्नीद्ध को मानने वाले थे। सातवाहन राजाओं से विवाह करने वाली रानियों के नामों का विश्लेषण इस तथ्य की ओर इंगित करता है कि उनके नाम गौतम तथा वसिष्ठ गोत्रों से उद्भूत थे जो उनके पिता के गोत्रा थे। इससे प्रतीत होता है कि विवाह के बाद भी अपने पति वुफल के गोत्रा को ग्रहण करने की अपेक्षा, जैसा ब्राह्मणीय व्यवस्था में अपेक्ष्िात था, उन्होंने पिता का गोत्रा नाम ही कायम रखा। यह भी पता चलता है कि वुफछ रानियाँ एक ही गोत्रा से थीं। यह तथ्य बहि£ववाह प(ति के नियमों के विरु( था। वस्तुतः यह उदाहरण एक वैकल्िपक प्रथा अंत£ववाह प(ति अथार्त् बंध्ुओं में विवाह संबंध् को दशार्ता है जिसका प्रचलन दक्ष्िाण भारत के कइर् समुदायों में ;भीद्ध है। बांध्वों ;ममेरे, चचेरे इत्यादि भाइर् - बहनद्ध के साथ जोड़े गए विवाह संबंधें की वजह से एक सुगठित समुदाय उभर पाता था। संभवतः उपमहाद्वीप के और भागों में अन्य विविध्ताएँ भी मौजूद थीं ¯कतु उनके विश्िाष्ट ब्योरों को पुन£न£मत करना संभव नहीं हो पाया है। 2ण्5 क्या माताएँ महत्वपूणर् थीं? हमने पढ़ा कि सातवाहन राजाओं को उनके मातृनाम ;माता के नाम सेउद्भूतद्ध से चिित किया जाता था। इससे यह प्रतीत होता है कि माताएँ महत्वपूणर् थीं ¯कतु किसी भी निष्कषर् पर पहुँचने से पहले हमें बहुत सावधनी बरतनी होगी। सातवाहन राजाओं के संदभर् में हमें यह ज्ञात हैकि ¯सहासन का उत्तराध्िकार पितृवंश्िाक होता था। ऽ चचार् कीजिएण्ण्ण् आजकल बच्चों का नामकरण किस भाँति चित्रा 3ण्4 एक यु( का दृश्यहोता है? क्या ये नाम इस अंश में व£णत यह महाभारत के दृश्यों के सबसे प्राचीन मू£त चित्राणों में से एक है। यह मिट्टðी कीनामों से मिलते - जुलते हैं अथवा भ्िान्न हैं? मू£त अहिच्छत्रा ;उत्तर प्रदेशद्ध के एक मंदिर की दीवार पर उत्कीणर् है जो लगभग पाँचवीं शताब्दी इर्सवी की है। 3ण् सामाजिक विषमताएँ वणर् व्यवस्था के दायरे में और उससे परे संभवतः आप ‘जाति’ शब्द से परिचित होंगे जो एक सोपानात्मक सामाजिक वगीर्करण को दशार्ता है। ध्मर्सूत्रों और ध्मर्शास्त्रों में एक आदशर् व्यवस्था का उल्लेख किया गया था। ब्राह्मणों का यह मानना था कि यह व्यवस्था जिसमें स्वयं उन्हें पहला दशार् प्राप्त है, एक दैवीय दौे सबसे निचले स्तर पर रखा जाता था।व्यवस्था है। शू्रंे आर ‘अस्पश्याृ’ कांे इस व्यवस्था में दशार् संभवतः जन्म के अनुसार निधर्रित माना जाता था। 3ण्1 ‘उचित’ जीविका ध्मर्सूत्रों और ध्मर्शास्त्रों में चारों वगो± के लिए आदशर् ‘जीविका’ से जुड़े कइर् नियम मिलते हैं। ब्राह्मणों का कायर् अध्ययन, वेदों की श्िाक्षा, यज्ञ करना और करवाना था तथा उनका काम दान देना और लेना था। क्षत्रिायों का कमर् यु( करना, लोगों को सुरक्षा प्रदान करना, न्याय करना, वेद पढ़ना, यज्ञ करवाना और दान - दक्ष्िाणा देना था। अंतिम तीन कायर् वैश्यों के लिए भी थे साथ ही उनसे वृफष्िा, गौ - पालन और व्यापार का कमर् भी अपेक्ष्िात था। शूद्रों के लिए मात्रा एक ही जीविका थीμतीनों ‘उच्च’ वणो± की सेवा करना। इन नियमों का पालन करवाने के लिए ब्राह्मणों ने दो - तीन नीतियाँ अपनाईं। एक, जैसा कि हमने अभी पढ़ा, यह बताया गया कि वणर्व्यवस्था की उत्पिा एक दैवीय व्यवस्था है। दूसरा, वे शासकों को यह उपदेश देते थे कि वे इस व्यवस्था के नियमों का अपने राज्यों में अनुसरण करें। तीसरे, उन्होंने लोगों को यह विश्वास दिलाने का प्रयत्न किया कि उनकी प्रतिष्ठा जन्म पर आधरित है। ¯कतु ऐसा करना आसान बात नहीं थी। अतः इन मानदंडों को बहुध महाभारत जैसे अनेक गं्रथों में व£णत कहानियों के द्वारा बल प्रदान किया जाता था। स्रोत 6 अपनी मान्यता को प्रमाण्िात करने के लिए ब्राह्मण बहुध )ग्वेद के पुरुषसूक्त मंत्रा को उ(ृत करते थे जो आदि मानव पुरुष की बलि का चित्राण करता है। जगत के सभी तत्व जिनमें चारों वणर् शामिल हैं, इसी पुरुष के शरीर से उपजे थे। ब्राह्मण उसका मुँह था, उसकी भुजाओं से क्षत्रिाय नि£मत हुआ। वैश्य उसकी जंघा थी, उसके पैरसे शूद्र की उत्पिा हुइर्।  आपको क्या लगता है कि ब्राह्मण इस सूक्त को बहुध क्यों उ(ृत करते थे? स्रोत 7 ‘उचित’ सामाजिक कतर्व्य महाभारत के आदिपवर्न् से एक कहानी उ(ृत है: एक बार ब्राह्मण द्रोण के पास, जो वुफरु वंश के राजवुफमारों को धनु£वद्या की श्िाक्षा देते थे, एकलव्य नामक वनवासी निषाद ;श्िाकारी समुदायद्ध आया। द्रोण ने जो ध्मर् समझते थे, उसे श्िाष्य के रूप में स्वीकार करने से मना कर दिया। एकलव्य ने वन में लौट कर मिट्टðी से द्रोण की प्रतिमा बनाइर् तथा उसे अपना गुरु मान कर वह स्वयं ही तीर चलाने का अभ्यास करने लगा। समय के साथ वह तीर चलानेमें सि(हस्त हो गया। एक दिन वुफरु राजवुफमार अपने वुफत्ते के साथजंगल में श्िाकार करते हुए एकलव्य के समीप पहुँच गए। वुफत्ता काले मृग की चमड़ी के वस्त्रा में लिपटे निषाद को देखकर भौंकने लगा। क्रोध्ित होकर एकलव्य ने एक साथ सात तीर चलाकर उसका मुँह बंदकर दिया। जब वह वुफत्ता लौटा तो पांडव तीरंदाशी का यह अद्भुत दृश्य देखकर आश्चयर्चकित हो गए। उन्होंने एकलव्य को तलाशा, उसने स्वयं को द्रोण का श्िाष्य बताया। द्रोण ने अपने पि्रय श्िाष्य अजुर्न से एक बार यह कहा था कि वह उनके सभी श्िाष्यों में अद्वितीय तीरंदाश बनेगा। अजुर्न ने द्रोण को उनका यह प्रण याद दिलाया। द्रोण एकलव्य के पास गए जिसने उन्हें अपना गुरु मानकर प्रणाम किया। तब द्रोण ने गुरु दक्ष्िाणा के रूप में एकलव्य से उसके दाहिने हाथ का अँगूठा माँग लिया। एकलव्य ने प़्ाफौरन गुरु को अपना अँगूठा काट कर दे दिया। अब एकलव्य तीर चलाने में उतना तेश नहीं रहा। इस तरह द्रोण ने अजुर्न को दिए वचन को निभाया: कोइर् भी अजुर्न से बेहतर ध्नुधर्री नहीं रहा।  इस कहानी के द्वारा निषादों को कौन - सा संदेश दिया जा रहा था? क्षत्रिायों को इससे क्या संदेश मिला होगा? क्या आपको लगता है कि एक ब्राह्मण के रूप में द्रोण ध्मर्सूत्रा का अनुसरण कर रहे थे जब वे ध्नु£वद्या की श्िाक्षा दे रहे थे? 3ण्2 अक्षत्रिाय राजा शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिाय राजा हो सकते थे। ¯कतु अनेकमहत्वपूणर् राजवंशों की उत्पिा अन्य वणो± से भी हुइर् थी। मौयर् वंश जिसने एक विशाल साम्राज्य पर शासन किया, के उद्भव पर गमर्जोशी से बहस होती रही है। बाद के बौ( ग्रंथों में यह इंगित किया गया है कि वे क्षत्रिाय थे ¯कतु ब्राह्मणीय शास्त्रा उन्हें ‘निम्न’ वुफल का मानते हैं। शुंगऔर कण्व जो मौयो± के उत्तराध्िकारी थे, ब्राह्मण थे। वस्तुतः राजनीतिकसत्ता का उपभोग हर वह व्यक्ित कर सकता था जो समथर्न और संसाधन जुटा सवेेफ। राजत्व क्षत्रिाय वुफल में जन्म लेने पर शायद ही निभर्र करता था। अन्य शासकों को, जैसे शक जो मध्य एश्िाया से भारत आए, ब्राह्मण मलेच्छ, बबर्र अथवा अन्यदेशीय मानते थे। ¯कतु संस्वृफत के संभवतः आरंभ्िाक अभ्िालेखों में से एक में प्रसि( शक राजा रुद्रदामन ;लगभग दूसरी शताब्दी इर्सवीद्ध द्वारा सुदशर्न सरोवर के जीणोर्(ार ;अध्याय 2द्ध का वणर्न मिलता है। इससे यह ज्ञात होता है कि शक्ितशाली मलेच्छ संस्वृफतीय परिपाटी से अवगत थे। एक और दिलचस्प बात यह है कि सातवाहन वुफल के सबसेप्रसि( शासक गोतमी - पुत्त सिरी - सातकनि ने स्वयं को अनूठा ब्राह्मण और साथ ही क्षत्रिायों के दपर् का हनन करने वाला बताया था। उसने यह भी दावा किया कि चार वणो± के बीच विवाह संबंध् होने पर उसने रोक लगाइर्। ¯कतु पिफर भी रुद्रदामन के परिवार से उसने विवाह संबंध् स्थापित किए। जैसा आप इस उदाहरण में देख सकते हैं, जाति प्रथा के भीतर आत्मसात होना बहुध एक जटिल सामाजिक प्रिया थी। सातवाहन स्वयं को ब्राह्मण वणर् का बताते थे जबकि ब्राह्मणीय शास्त्रा के अनुसार राजा को क्षत्रिाय होना चाहिए। वे चतुवर्णीर् व्यवस्था की मयार्दा बनाए रखने का दावा करते थे ¯कतु साथ ही उन लोगों से वैवाहिक संबंध् भी स्थापित करते थे जो इस वणर् व्यवस्था से ही बाहर थे और जैसा हमने देखा वह अंत£ववाह प(ति का पालन करते थे न कि बहि£ववाह प्रणाली का जो ब्राह्मणीय गं्रथों में प्रस्तावित है। 3ण्3 जाति और सामाजिक गतिशीलता ये जटिलताएँ समाज के वगीर्करण के लिए शास्त्रों में प्रयुक्त एक और शब्द जाति से भी स्पष्ट होती हैं। ब्राह्मणीय सि(ांत में वणर् की तरह जाति भी जन्म पर आधरित थी। ¯कतु वणर् जहाँ मात्रा चार थे वहीं जातियों की कोइर् निश्िचत संख्या नहीं थी। वस्तुतः जहाँ कहीं भी ब्राह्मणीय व्यवस्था का नए समुदायों से आमना - सामना हुआ - उदाहरणतः जंगल में रहने वाले निषाद या पिफर व्यावसायिक वगर् जैसे सुवणर्कार, जिन्हें चार वणो± वाली व्यवस्था में समाहित करना संभव नहीं था, उनका जाति में वगीर्करण कर दिया गया। वे जातियाँ जो एक ही जीविका अथवा व्यवसाय से जुड़ी थीं उन्हें कभी - कभी श्रेण्िायों में भी संगठित किया जाता था। हालाँकि इन समुदायों के इतिहास का लेखा - जोखा हमें कम ही प्राप्त होता है, ¯कतु वुफछ अपवाद हैं जैसे कि मंदसौर ;मध्य प्रदेशद्ध से मिला अभ्िालेख ;लगभग पाँचवीं शताब्दी इर्सवीद्ध। इसमें रेशम के बुनकरों की एक श्रेणी का वणर्न मिलता है जो मूलतः लाट ;गुजरातद्ध प्रदेश के निवासी थे और वहाँ से मंदसौर चले गए थे, जिसे उस समय दशपुर के नाम से जाना जाता था। यह कठिन यात्रा उन्होंने अपने बच्चों और बांधवों शक शासक को चित्रिात करता चाँदी का सिक्का, लगभग चैथी शताब्दी इर्सवी  क्या आपको लगता है कि रेशम के बुनकर उस जीविका का पालन कर रहे थे जो उनके लिए शास्त्रों ने तय की थी? के साथ संपन्न की। उन्होंने वहाँ के राजा की महानता के बारे में सुना था अतः वे उसके राज्य में बसना चाहते थे। यह अभ्िालेख जटिल सामाजिक प्रियाओं की झलक देता है तथा श्रेण्िायों के स्वरूप के विषय में अंतदृर्ष्िट प्रदान करता है। हालाँकि श्रेणी की सदस्यता श्िाल्प में विशेषज्ञता पर निभर्र थी। वुफछ सदस्य अन्य जीविका भी अपना लेते थे। इस अभ्िालेख से यह भी ज्ञात होता है कि सदस्य एक व्यवसाय के अतिरिक्त और चीशों में भी सहभागी होते थे। सामूहिक रूप से उन्होंने श्िाल्पकमर् से अ£जत ध्न को सूयर् देवता के सम्मान में मंदिर बनवाने पर खचर् किया। स्रोत 8 रेशम बुनकरों ने क्या किया? निम्नलिख्िात अंश संस्वृफत के एक अभ्िालेख से उ(ृत है: वुफछ लोगों को संगीत से अत्यंत प्रेम है जो कानों को पि्रय होता हैऋअन्य को गवर् है सैकड़ों उत्तम जीवनियों ;के रचयिता होनेद्ध का, इसतरह वे अनेक कथाओं से परिचित हैं। ;अन्यद्ध विनीत भाव से उत्तम ध£मक व्याख्यानों में तल्लीन हैं... वुफछ लोग अपने ध£मक अनुष्ठानों में श्रेष्ठ हैंऋ इसी तरह अपने पर निग्रह रखने वाले ;वैदिकद्ध खगोल शास्त्रा में पारंगत हैं। अन्य जन यु( करने में शूरवीर, शत्राुओं का अनिष्ट करते हैं। 3ण्4 चार वणो± के परे: एकीकरण उपमहाद्वीप में पाइर् जाने वाली विविध्ताओं की वजह से यहाँ हमेशा से ऐसे समुदाय रहे हैं जिन पर ब्राह्मणीय विचारों का कोइर् प्रभाव नहीं पड़ा है। संस्वृफत साहित्य में जब ऐसे समुदायों का उल्लेख आता है तो उन्हें कइर् बार विचित्रा, असभ्य और पशुवत चित्रिात किया जाता है। ऐसे वुफछ उदाहरण वन प्रांतर में बसने वाले लोगों के हैं जिनके लिए श्िाकार और वंफद - मूल संग्रह करना जीवन - निवार्ह का महत्वपूणर् साधन था। निषाद वगर् जिससे एकलव्य जुड़ा माना जाता था, इसी का उदाहरण है। यायावर पशुपालकों के समुदाय को भी शंका की दृष्िट से देखा जाता था क्योंकि उन्हें आसानी से बसे हुए वृफष्िाक£मयों के साँचे के अनुरूप नहीं ढाला जा सकता था। यदा - कदा उन लोगों को जो असंस्वृफत भाषी थे, उन्हें मलेच्छ कहकर हेय दृष्िट से देखा जाता था। ¯कतु इन लोगों के बीच विचारों और मतों का आदान - प्रदान होता था। उनके संबंधों के स्वरूप के बारे में हमें महाभारत की कथाओं से ज्ञात होता है। स्रोत 9 यह सारांश महाभारत के आदिपवर्न् से उ(ृत कहानी का है: पांडव गहन वन में चले गए थे। थक कर वे सो गएऋ केवल द्वितीयपांडव भीम जो अपने बल के लिए प्रसि( थे, रखवाली करते रहे। एकनरभक्षी राक्षस को पांडवों की मानुष गंध् ने विचलित किया और उसनेअपनी बहन हिडिम्बा को उन्हें पकड़कर लाने के लिए भेजा। हिडिम्बाभीम को देखकर मोहित हो गइर्ं और एक सुंदर स्त्राी के वेष में उसनेभीम से विवाह का प्रस्ताव किया, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया।इस बीच राक्षस वहाँ आ गया और उसने भीम को मल्ल यु( के लिएललकारा। भीम ने उसकी चुनौती को स्वीकार किया और उसका वध्कर दिया। शोर सुनकर अन्य पांडव जाग गए। हिडिम्बा ने उन्हें अपनापरिचय दिया और भीम के प्रति अपने प्रेम से उन्हें अवगत कराया। वहवुंफती से बोली: फ्हे उत्तम देवी, मैंने मित्रा, बांध्व और अपने ध्मर्का भी परित्याग कर दिया है और आपके बाघ सदृश पुत्रा का अपनेपति के रूप में चयन किया है... चाहे आप मुझे मूखर् समझंे अथवाअपनी सम£पत दासी, वृफपया मुझे अपने साथ लें तथा आपका पुत्रा मेरापति हो।य् अंततः युध्िष्िठर इस शतर् पर इस विवाह के लिए तैयार हो गए किभीम दिनभर हिडिम्बा के साथ रहकर रात्रिा में उनके पास आ जाएँगे।यह दंपति दिन भर सभी लोकों की सैर करते। समय आने पर हिडिम्बाने एक राक्षस पुत्रा को जन्म दिया जिसका नाम घटोत्कच रखा।तत्पश्चात माँ और पुत्रा पांडवों को छोड़कर वन में चले गए ¯कतुघटोत्कच ने यह प्रण किया कि जब भी पांडवों को उसकी शरूरतहोगी वह उपस्िथत हो जाएगा। वुफछ इतिहासकारों का यह मत है कि राक्षस उन लोगों को कहा जाताथा जिनके आचार - व्यवहार उन मानदंडों से भ्िान्न थे जिनका चित्राणब्राह्मणीय ग्रंथों में हुआ था। 3ण्5 चार वणो± के परे: अध्ीनता और संघषर् ब्राह्मण वुफछ लोगों को वणर् व्यवस्था वाली सामाजिक प्रणाली के बाहर मानते थे। साथ ही उन्होंने समाज के वुफछ वगो± को ‘अस्पृश्य’ घोष्िात कर सामाजिक वैषम्य को और अध्िक प्रखर बनाया। ब्राह्मणों का यह मानना था कि वुफछ कमर्, खासतौर से वे जो अनुष्ठानों के संपादन से जुड़े थे, पुनीत और ‘पवित्रा’ थे, अतः अपने को पवित्रा मानने वाले लोग अस्पृश्यों  इस सारांश में उन व्यवहारों को नि£दष्ट कीजिए जो अब्राह्मणीय प्रतीत होते हंै। से भोजन नहीं स्वीकार करते थे। पवित्राता के इस पहलू के ठीक विपरीत वुफछ कायर् ऐसे थे जिन्हें खासतौर से ‘दूष्िात’ माना जाता था। शवों की अंत्येष्िट और मृत पशुओं को छूने वालों को चाण्डाल कहा जाता था। उन्हें वणर् व्यवस्था वाले समाज में सबसे निम्न कोटि में रखा जाता था।वे लोग जो स्वयं को सामाजिक क्रम में सबसे ऊपर मानते थे, इन चाण्डालों का स्पशर्, यहाँ तक कि उन्हें देखना भी, अपवित्राकारी मानते थे। मनुस्मृति में चाण्डालों के ‘कतर्व्यों’ की सूची मिलती है। उन्हें गाँव के बाहर रहना होता था। वे पेंफके हुए बतर्नों का इस्तेमाल करते थे, मरे हुए लोगों के वस्त्रा तथा लोहे के आभूषण पहनते थे। रात्रिा में वे गाँव औरचित्रा3ण्6 नगरों में चल - पिफर नहीं सकते थे। संबंध्ियों से विहीन मृतकों की उन्हेंएक भ्िाक्षु का चित्राण, पत्थर की मू£त ;गांधरद्ध अंत्येष्िट करनी पड़ती थी तथा वध्िक के रूप में भी कायर् करना होतालगभग तीसरी शताब्दी इर्सवी था। चीन से आए बौ( भ्िाक्षु पफा - श्िाएन ;लगभग पाँचवीं शताब्दी इर्सवीद्ध का कहना है कि अस्पृश्यों को सड़क पर चलते हुए करताल बजाकर अपने होने की सूचना देनी पड़ती थी जिससे अन्य जन उन्हें देखने के दोष से बच जाएँ। एक और चीनी तीथर्यात्राी श्वैन - त्सांग ;लगभग सातवीं शताब्दी इर्सवीद्ध कहता है कि वध्िक और सप़्ाफाइर् करने वालों को नगर से बाहर रहना पड़ता था। अब्राह्मणीय ग्रंथों में चित्रिात चाण्डालों के जीवन का विश्लेषण करके इतिहासकारों ने यह जानने का प्रयास किया है कि क्या चाण्डालों ने शास्त्रों में निधर्रित अपने हीन जीवन को स्वीकार कर लिया था? यदा - कदा इन ग्रंथों के चित्राण और ब्राह्मणीय ग्रंथ में हुए चित्राण में समानता है परंतु कभी - कभी हमें एक भ्िान्न सामाजिक वास्तविकता का भी संकेत मिलता है। स्रोत 10 ऽ चचार् कीजिएण्ण्ण् इस प्रकरण में कौन से स्रोत हैं जिनसे यह ज्ञात होता है कि लोग ब्राह्मणों द्वारा बताइर् गइर् जीविका का अनुसरण करते थे? कौन से स्रोत हैं जिनसे अलग संभावनाओं की जानकारी मिलती है? स्रोत 11 द्रौपदी के प्रश्न ऐसा माना जाता है कि द्रौपदी ने युध्िष्िठर से यह प्रश्न किया था कि वह उसे दाँवपर लगाने से पहले स्वयं को हार बैठे थेअथवा नहीं। इस प्रश्न के उत्तर में दोभ्िान्न मतों को प्रस्तुत किया गया। प्रथम तो यह कि यदि युध्िष्िठर नेस्वयं को हार जाने के पश्चात द्रौपदी कोदाँव पर लगाया तो यह अनुचित नहींक्यांेकि पत्नी पर पति का नियंत्राण सदैवरहता है। दूसरा यह कि एक दासत्व स्वीकारकरने वाला पुरुष ;जैसे उस क्षण युिाष्िठरथेद्ध किसी और को दाँव पर नहींलगा सकता। इन मुद्दों का कोइर् निष्कषर् नहीं निकलाऔर अंततः ध्ृतराष्ट्र ने सभी पांडवों औरद्रौपदी को उनकी निजी स्वतंत्राता पुनःलौटा दी।  क्या आपको ऐसा लगता है कि यह प्रकरण इस बात की ओर इंगित करता है कि पत्िनयों कोपतियों की निजी संपिा माना जाए? 4ण् जन्म के परे संसाध्न और प्रतिष्ठा यदि आप अध्याय 2 में व£णत आ£थक संबंधें पर विचार करें तो देखेंगे कि दास, भूमिहीन खेतिहर मशदूर, श्िाकारी, मछुआरे, पशुपालक, किसान, ग्राममुख्िाया, श्िाल्पकार, वण्िाक और राजा सभी का उपमहाद्वीप के विभ्िान्न हिस्सों में सामाजिक अभ्िानायक के रूप में उद्भव हुआ। उनके सामाजिक स्थान इस बात पर निभर्र करते थे कि आ£थक संसाध्नों पर उनका कितना नियंत्राण है। अब हम विशेष संदभो± में इस बात का परीक्षण करेंगे कि संसाध्नों पर नियंत्राण के क्या सामाजिक आशय थे। 4ण्1 संपिा पर स्त्राी और पुरुष के भ्िान्न अध्िकार अब हम महाभारत के एक महत्वपूणर् प्रकरण पर विचार करेंगे। कौरव और पांडव के बीच लंबे समय से चली आ रही प्रतिस्पधर् के पफलस्वरूप दुयोर्ध्न ने युध्िष्िठर को द्यूत क्रीड़ा के लिए आमंत्रिात किया। युध्िष्िठर अपने प्रतिद्वंद्वी द्वारा धेखा दिए जाने के कारण इस द्यूत मेंस्वणर्, हस्ित, रथ, दास, सेना, कोष, राज्य तथा अपनी प्रजा की संपिा, अनुजों और पिफर स्वयं को भी दाँव पर लगा कर गँवा बैठे। इसके उपरांत उन्होंने पांडवों की सहपत्नी द्रौपदी को भी दाँव पर लगाया और उसे भी हार गए।संपिा के स्वामित्व के मुद्दे जो इन कहानियों में व£णत हैं, ध्मर्सूत्रा और ध्मर्शास्त्रों में भी उठाए गए हैं। मनुस्मृति के अनुसार पैतृक शायदाद का माता - पिता की मृत्यु के बाद सभी पुत्रों में समान रूप से बँटवारा किया जाना चाहिए ¯कतु ज्येष्ठ पुत्रा विशेष भाग का अध्िकारी था। स्ित्रायाँ इस पैतृक संसाध्न में हिस्सेदारी की माँग नहीं कर सकती थीं। ¯कतु विवाह के समय मिले उपहारों पर स्ित्रायों का स्वामित्व माना जाता था और इसे स्त्राीध्न ;अथार्त् स्त्राी का ध्नद्ध की संज्ञा दी जाती थी।इस संपिा को उनकी संतान विरासत के रूप में प्राप्त कर सकती थी और इस पर उनके पति का कोइर् अध्िकार नहीं होता था। ¯कतु मनुस्मृतिस्ित्रायों को पति की आज्ञा के विरु( पारिवारिक संपिा अथवा स्वयं अपने बहुमूल्य ध्न के गुप्त संचय के विरु( भी चेतावनी देती है। आपने एक ध्नाढ्य वाकाटक महिषी प्रभावती गुप्त ;अध्याय 2द्ध के बारे में पढ़ा है। ¯कतु अध्िकतर साक्ष्यदृअभ्िालेखीय व साहित्ियकदृइस बात की ओर इशारा करते हैं कि यद्यपि उच्च वगर् की महिलाएँ संसाधनों पर अपनी पैठ रखती थीं, सामान्यतः भूमि, पशु और ध्न पर पुरुषों का ही नियंत्राण था। दूसरे शब्दों में, स्त्राी और पुरुष के बीच सामाजिक हैसियत की भ्िान्नता संसाध्नों पर उनके नियंत्राण की भ्िान्नता की वजह से अिाक प्रखर हुइर्। स्रोत 12 4ण्2 वणर् और संपिा के अध्िकारब्राह्मणीय ग्रंथों के अनुसार संपिा पर अध्िकार का एक और आधर ;लैंगिक आधर के अतिरिक्तद्ध वणर् था। जैसा हमने पहले पढ़ा है कि शूद्रों के लिए एकमात्रा ‘जीविका’ ऐसी सेवा थी जिसमें हमेशा उनकी इच्छा शामिल नहीं होती थी। हालाँकि तीन उच्च वणो± के पुरुषों के लिए विभ्िान्न जीविकाओं की संभावना रहती थी। यदि इन सब विधनों को वास्तव में कायार्न्िवत किया जाता तो ब्राह्मण और क्षत्रिाय सबसे ध्नी व्यक्ित होते। यह तथ्य वुफछ हद तक सामाजिक वास्तविकता से मेल खाता था। साहित्ियक परंपरा में पुरोहितों और राजाओं का वणर्न मिलता है जिसमें राजा अध्िकतर ध्नी चित्रिात होते हैंऋ पुरोहित भी सामान्यतः धनी दशार्ए जाते हैं। हालाँकि यदा - कदा निध्र्न ब्राह्मण का भी चित्राण मिलता है। एक और स्तर पर, जहाँ समाज के ब्राह्मणीय दृष्िटकोण को धमर्सूत्रा और ध्मर्शास्त्रा में संहिताब( किया जा रहा था अन्य परंपराओं ने वणर् व्यवस्था की आलोचना प्रस्तुत की। इनमें से सवर्विदित आलोचनाएँ प्रारंभ्िाक बौ( ध्मर् में ;लगभग छठी शताब्दी इर्.पू. से, अध्याय 4द्ध विकसित हुईं। बौ(ों ने इस बात को अंगीकार किया कि समाज में विषमता मौजूद थी ¯कतु यह भेद न तो नैस£गक थे और न ही स्थायी। बौ(ों ने जन्म के आधर पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया। स्रोत 13 एक ध्नाढ्य शूद्र यह कहानी पालि भाषा के बौ( ग्रंथ मज्िझमनिकाय से है जो एक राजाअवन्ितपुत्रा और बु( के अनुयायी कच्चन के बीच हुए संवाद का हिस्साहै। यद्यपि यह कहानी अक्षरशः सत्य नहीं थी तथापि यह बौ(ों के वणर्संबंध्ी रवैये को दशार्ती है। अवन्ितपुत्रा ने कच्चन से पूछा कि ब्राह्मणों के इस मत के बारे मेंउनकी क्या राय है, कि वे सवर्श्रेष्ठ हैं और अन्य जातियाँ निम्न कोटिकी हैंऋ ब्राह्मण का वणर् शुभ्र है और अन्य जातियाँ काली हैंऋ केवलब्राह्मण पवित्रा हंै अन्य नहींऋ ब्राह्मण ब्रह्मा के पुत्रा हैं, ब्रह्मा के मुख सेजन्मे हैं, उनसे ही रचित हैं तथा ब्रह्मा के वंशज हैं। कच्चन ने उत्तर दियाः फ्क्या यदि शूद्र ध्नी होता... दूसरा शूद्र..अथवा क्षत्रिाय या पिफर ब्राह्मण अथवा वैश्य... उससे विनीत स्वर मेंबात करता?य् अवन्ितपुत्रा ने प्रत्युत्तर में कहा कि यदि शूद्र के पास ध्न अथवाअनाज, स्वणर् या पिफर रजत होती वह दूसरे शूद्र को अपने आज्ञाकारीसेवक के रूप में प्राप्त कर सकता था, जो उससे पहले उठे औरउसके बाद विश्राम करेऋ जो उसकी आज्ञा का पालन करे, विनीतवचन बोलेऋ अथवा वह क्षत्रिाय, ब्राह्मण या पिफर वैश्य को भीआज्ञावाही सेवक बना सकता था। कच्चन ने पूछा, फ्यदि ऐसा है, तो क्या पिफर यह चारांे वणर् एकदमसमान नहीं हैं?य् अवन्ितपुत्रा ने यह स्वीकार किया कि इस आधर पर चारों वणो± में कोइर् भेद नहीं है।  अवन्ितपुत्रा के पहले वक्तव्य को दुबारा पढि़ए। इसमें कौन से विचार ऐसे हैं जो ब्राह्मणीय ग्रंथों/परंपराओं से लिए गए हैं? क्या आप इनमें से किसी विचार के स्रोत की पहचान कर सकते हैं? इस ग्रंथ के अनुसार सामाजिक असमानता के लिए क्या स्पष्टीकरण दिया जा सकता है? 4ण्3 एक वैकल्िपक सामाजिक रूपरेखा: संपिा में भागीदारी अभी तक हम उन परिस्िथतियों का परीक्षण करते रहे हैं जहाँ लोगअपनी संपिा के आधर पर सामाजिक प्रतिष्ठा का दावा करते थे, या पिफर उन्हें वह स्िथति प्रदान की जाती थी। ¯कतु समाज में अन्य संभावनाएँ भी थीं। वह स्िथति जहाँ दानशील आदमी का सम्मान कियाजाता था तथा वृफपण व्यक्ित अथवा वह जो स्वयं अपने लिए संपिा संग्रह करता था, घृणा का पात्रा होता था। प्राचीन तमिलकम् एक ऐसा ही क्षेत्रा था जहाँ उपरोक्त आदशो± को संजोया जाता था। जैसा हमने पहले पढ़ा ;अध्याय 2द्ध, इस क्षेत्रा में 2000 वषर् पहले अनेक सरदारियाँ थीं। यह सरदार अपनी प्रशंसा गाने वाले चारण और कवियों के आश्रयदाता होते थे। तमिल भाषा के संगम साहित्ियक संग्रह में सामाजिक और आ£थक संबंधों का अच्छा चित्राण है जो इस ओर इंगित करता है कि हालाँकि धनी और निध्र्न के बीच विषमताएँ थीं, जिन लोगों का संसाधनों पर नियंत्राण था उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि वे मिल - बाँट कर उसका उपयोग करेंगे। स्रोत 14 5ण् सामाजिक विषमताओं की व्याख्या एक सामाजिक अनुबंध् बौ(ों ने समाज में पैफली विषमताओं के संदभर् में एक अलग अवधरणा प्रस्तुत की। साथ ही समाज में पैफले अंत£वरोधें को नियमित करने के लिए जिन संस्थानों की आवश्यकता थी, उस पर भी अपना दृष्िटकोण सामने रखा। सुत्तपिटक नामक ग्रंथ में एक मिथक व£णत है जो यह बताता है कि प्रारंभ में मानव पूणर्तया विकसित नहीं थे। वनस्पति जगत भी अविकसित था। सभी जीव शांति के एक निबार्ध् लोक में रहते थे और प्रवृफति से उतना ही ग्रहण करते थे जितनी एक समय के भोजन की आवश्यकता होती है। ¯कतु यह व्यवस्था क्रमशः पतनशील हुइर्। मनुष्य अध्िकाध्िक लालची, प्रति¯हसक और कपटी हो गए। इस स्िथति में उन्होंने विचार किया किः फ्क्या हम एक ऐसे मनुष्य का चयन करें जो उचित बात पर क्रोध्ित हो, जिसकी प्रताड़ना की जानी चाहिए उसको प्रताडि़त करे और जिसे निष्कासित किया जाना हो उसे निष्कासित करे? बदले में हम उसे चावल का अंश देंगे... सब लोगांे द्वारा चुने जाने के कारण उसेमहासम्मत्त की उपाध्ि प्राप्त होगी।य् इससे यह ज्ञात होता है कि राजा का पद लोगों द्वारा चुने जाने पर निभर्र करता था। ‘कर’ वह मूल्य था जो लोग राजा की इस सेवा के बदले उसे देते थे। यह मिथक इस बात को भी दशार्ता है कि आ£थक और सामाजिक संबंधें को बनाने में मानवीय कमर् का बड़ा हाथ था। इसके वुफछ और आशय भी हैं। उदाहरणतः यदि मनुष्य स्वयं एक प्रणाली को बनाए रखने के लिए िाम्मेदार थे तो भविष्य में उसमें परिवतर्न भी ला सकते थे। 6ण् साहित्ियक स्रोतों का इस्तेमाल इतिहासकार और महाभारत यदि आप इस अध्याय के स्रोतों की ओर गौर करें तो आप पाएँगे कि इतिहासकार किसी ग्रंथ का विश्लेषण करते समय अनेक पहलुओं पर विचार करते हैं तथा इस बात का परीक्षण करते हैं कि ग्रंथ किस भाषा में लिखा गया: पालि, प्रावृफत अथवा तमिल, जो आम लोगों द्वारा बोली जाती थी अथवा संस्वृफत जो विश्िाष्ट रूप से पुरोहितों और खास वगर् द्वारा प्रयोग में लाइर् जाती थी। इतिहासकार गं्रथ के प्रकार पर भी ध्यान देते हैं। क्या यह ग्रंथ ‘मंत्रा’ थे जो अनुष्ठानकतार्ओं द्वारा पढ़े और उच्चरित किए जाते थे अथवा ये ‘कथा’ गं्रथ थे जिन्हें लोग पढ़ और सुन सकते थे तथा दिलचस्प होने पर जिन्हें दुबारा सुनाया जा सकता था? इसके अलावा इतिहासकार लेखक;कोंद्ध के बारे में भी जानने का प्रयास करते हैं जिनके दृष्िटकोण और विचारों ने ग्रंथों को रूप दिया। इन ग्रंथों के श्रोताओं का भी इतिहासकार परीक्षण करते हैं क्योंकि लेखकों ने अपनी रचना करते समय श्रोताओं की अभ्िारुचि पर ध्यान दिया होगा। इतिहासकार ग्रंथ के संभावित संकलन/रचना काल और उसकी रचनाभूमि का भी विश्लेषण करते हैं। इन सब मुद्दों का जायशा लेने के बाद ही इतिहासकार किसी भी ग्रंथ की विषयवस्तु का इतिहास के पुन£नमार्ण के लिए इस्तेमाल करते हैं। महाभारत जैसे विशाल और जटिल गं्रथ के संदभर् में, आप कल्पना कर सकते हैं कि यह कायर् कितना कठिन होगा। 6ण्1 भाषा एवं विषयवस्तु अब हम ग्रंथ की भाषा की ओर देखते हैं। महाभारत का जो पाठ हम इस्तेमाल कर रहे हैं वह संस्वृफत में है ;यद्यपि अन्य भाषाओं में भी इसके संस्करण मिलते हैंद्ध। ¯कतु महाभारत में प्रयुक्त संस्वृफत वेदों अथवा प्रशस्ितयों ;अध्याय 2 में च£चतद्ध की संस्वृफत से कहीं अिाक सरल है। अतः यह संभव है कि इस ग्रंथ को व्यापक स्तर पर समझा जाता था। इतिहासकार इस ग्रंथ की विषयवस्तु को दो मुख्य शीषर्कोंμआख्यान तथा उपदेशात्मक - के अंतगर्त रखते हैं। आख्यान में कहानियों का संग्रह है और उपदेशात्मक भाग में सामाजिक आचार - विचार के मानदंडों का चित्राण है। ¯कतु यह विभाजन पूरी तरह अपने में एकांकी नहीं है - उपदेशात्मक अंशों में भी कहानियाँ होती हैं और बहुधा आख्यानों में समाज के लिए एक सबक निहित रहता है। अध्िकतर इतिहासकार इस बात पर एकमत हैं कि महाभारत वस्तुतः एक भाग में नाटकीय कथानक था जिसमें उपदेशात्मक अंश बाद में जोड़े गए। उपदेशात्मक शब्द का तात्पयर् है निदेर्श अथवा श्िाक्षा देना। चित्रा3ण्8 श्रीवृफष्ण अजुर्न को उपदेश देते हुए महाभारत का सबसे महत्वपूणर् उपदेशात्मक अंश भगवद्गीता है जहाँ वुफरुक्षेत्रा की यु(भूमि में श्रीवृफष्ण अजुर्न को उपदेश देते हैं। इस दृश्य को चित्रों और मू£तकला में कइर् बार दशार्या गया है। इस चित्रा का काल अठारहवीं शताब्दी है। चित्रा3ण्9 लिपिक श्रीगणेश परंपरा के अनुसार व्यास ने इस ग्रंथ को श्रीगणेश को लिखवाया। यह चित्रा महाभारत के पफारसी अनुवाद ;लगभग 1740.50द्ध से लिया गया है। भारतीय इतिहास के वुफछ विषय आरंभ्िाक संस्वृफत परंपरा में महाभारत को ‘इतिहास’ की श्रेणी में रखा गया है। इस शब्द का अथर् है: ‘ऐसा ही था।’ क्या महाभारत में, सचमुच में हुए किसी यु( का स्मरण किया जा रहा था? इस बारे में हम निश्िचत रूप से वुफछ नहीं कह सकते। वुफछ इतिहासकारों का मानना है कि स्वजनों के बीच हुए यु( की स्मृति ही महाभारत का मुख्य कथानक है। अन्य इस बात की ओर इंगित करते हैं कि हमें यु( की पुष्िट किसी और साक्ष्य से नहीं होती। 6ण्2 लेखक ;एक या कइर्द्ध और तिथ्िायाँयह गं्रथ किसने लिखा? इस प्रश्न के कइर् उत्तर हैं। संभवतः मूल कथा के रचयिता भाट सारथी थे जिन्हें ‘सूत’ कहा जाता था। ये क्षत्रिाय यो(ाओं के साथ यु(क्षेत्रा में जाते थे और उनकी विजय व उपलब्िध्यों के बारे में कविताएँ लिखते थे। इन रचनाओं का प्रेषण मौख्िाक रूप में हुआ। पाँचवीं शताब्दी इर्.पू. से ब्राह्मणों ने इस कथा परंपरा पर अपना अध्िकार कर लिया और इसे लिखा। यह वह काल था जब वुफरु और पांचाल जिनके इदर् - गिदर् महाभारत की कथा घूमती है, मात्रा सरदारी से राजतंत्रा के रूप में उभर रहे थे। क्या नए राजा अपने इतिहास को अध्िक नियमित रूप से लिखना चाहते थे? यह भी संभव है कि नए राज्यों की स्थापना के समय होने वाली उथल - पुथल के कारण पुराने सामाजिक मूल्यों के स्थान पर नवीन मानदंडों की स्थापना हुइर् जिनका इस कहानी के वुफछ भागों में वणर्न मिलता है। लगभग 200 इर्.पू. से 200 इर्सवी के बीच हम इस ग्रंथ के रचनाकाल का एक और चरण देखते हैं। यह वह समय था जब विष्णु देवता की आराध्ना प्रभावी हो रही थी, तथा श्रीवृफष्ण को जो इस महाकाव्य के महत्वपूणर् नायकों में से हैं, उन्हें विष्णु का रूप बताया जा रहा था। कालांतर में लगभग 200.400 इर्सवी के बीच मनुस्मृति से मिलते - जुलते बृहत उपदेशात्मक प्रकरण महाभारत में जोड़े गए। इन सब परिवध्र्नों के कारण यह ग्रंथ जो अपने प्रारंभ्िाक रूप में संभवतः 10ए000 श्लोकों से भी कम रहा होगा, बढ़ कर एक लाख श्लोकों वाला हो गया। साहित्ियक परंपरा में इस बृहत रचना के रचयिता )ष्िा व्यास माने जाते हैं। 6ण्3 सदृशता की खोज महाभारत में अन्य किसी भी प्रमुख महाकाव्य की भाँति यु(ों, वनों, राजमहलों और बस्ितयों का अत्यंत जीवंत चित्राण है। 1951.52 में पुरातत्ववेत्ता बी.बी. लाल ने मेरठ िाले ;उ.प्र.द्ध के हस्ितनापुर नामक एक गाँव में उत्खनन किया। क्या यह गाँव महाकाव्य में व£णत हस्ितनापुर था? हालाँकि नामों की समानता मात्रा एक संयोग हो सकताहै ¯कतु गंगा के ऊपरी दोआब वाले क्षेत्रा में इस पुरास्थल का होना जहाँ वुफरु राज्य भी स्िथत था, इस ओर इंगित करता है कि यह पुरास्थल वुफरुओं की राजधानी हस्ितनापुर हो सकती थी जिसका उल्लेख महाभारत में आता है। बी.बी. लाल को यहाँ आबादी के पाँच स्तरों के साक्ष्य मिले थे जिनमें से दूसरा और तीसरा स्तर हमारे विश्लेषण के लिए महत्वपूणर् है। दूसरे स्तर ;लगभग बारहवीं से सातवीं शताब्दी इर्.पू.द्ध पर मिलने वाले घरों के बारे में लाल कहते हैं: फ्जिस सीमित क्षेत्रा का उत्खनन हुआ वहाँ से आवास गृहों की कोइर् निश्िचत परियोजना नहीं मिलती ¯कतु मि‘ी की बनी दीवारें और कच्ची मि‘ी की ईंटें अवश्य मिलती हैं। सरवंफडे की छाप वाले मि‘ी के पलस्तर की खोज इस बात की ओर इशारा करती है कि वुफछ घरों की दीवारें सरवंफडों की बनी थीं जिन पर मिट्टðी का पलस्तर चढ़ा दिया जाता था।य् तीसरे स्तर ;लगभग छठी से तीसरी शताब्दी इर्.पू.द्ध के लिए लाल कहते हैंः फ्तृतीय काल के घर कच्ची और वुफछ पक्की ईंटों के बने हुए थे। इनमें शोषक - घट और ईंटों के नाले गंदे पानी के निकास के लिए इस्तेमाल किए जाते थे, तथा वलय - वूफपों का इस्तेमाल, वुफओं और मल की निकासी वाले गतो±, दोनों ही रूपों में किया जाता था।य् स्रोत 15 हस्ितनापुर महाभारत के आदिपवर्न् में इस नगर का चित्राण इस प्रकार मिलता है: यह नगर जो समुद्र की भाँति भरा हुआ था, जो सैकड़ों प्रासादों से संवुफलित था। इसके ¯सहद्वार, तोरण और वंफगूरे सघन बादलों की तरह घुमड़ रहे थे। यह इंद्र की नगरी के समान शोभायमान था।  क्या आपको लगता है कि लाल की खोज और महाकाव्य में व£णत हस्ितनापुर में समानता है। चित्रा3ण्10 हस्ितनापुर में उत्खनित एक दीवार का अंश क्या नगर का यह चित्राण महाकाव्य के मुख्य कथानक में बाद में ;इर्सा पूवर् छठी शताब्दी के पश्चातद्ध जोड़ दिया गया जब इस क्षेत्रा में नगरों का विकास हुआ? अथवा यह मात्रा कवियों की कल्पना की उड़ान थी जिसकी अन्य किसी भी साक्ष्य के साथ तुलना कर उसे प्रमाण्िात नहीं किया जा सकता। एक और उदाहरण पर गौर कीजिए। महाभारत की सबसे चुनौतीपूणर् उपकथा द्रौपदी से पांडवों के विवाह की है। यह बहुपति विवाह का उदाहरण है जो महाभारत की कथा का अभ्िान्न अंग है। यदि हम महाकाव्य के इस अंश का विश्लेषण करें तो यह विदित होता है कि लेखक;कोंद्ध ने विभ्िान्न तरीकों से इसका स्पष्टीकरण देने का प्रयास किया है। स्रोत 16 द्रौपदी का विवाह पांचाल नरेश द्रुपद ने एक स्वयंवर का आयोजन किया जिसमें यह शतर् रखी गइर् कि ध्नुष की चाप चढ़ा कर निशाने पर तीर मारा जाएऋ विजेता उनकी पुत्राी द्रौपदी से विवाह करने के लिए चुना जाएगा। अजुर्न ने यह प्रतियोगिता जीती और द्रौपदी ने उसे वरमाला पहनाइर्। पांडव उसे लेकर अपनी माता वुंफती के पास गए जिन्होंने बिना देखे ही उन्हें लाइर् गइर् वस्तु को आपस में बाँट लेने को कहा। जब वुंफती ने द्रौपदी को देखा तो उन्हंे अपनी भूल का एहसास हुआ, ¯कतु उनकी आज्ञा की अवहेलना नहीं की जा सकती थी। बहुत सोच - विचार के बाद युध्िष्िठर ने यह निणर्य लिया कि द्रौपदी उन पाँचों की पत्नी होगी। जब द्रुपद को यह बताया गया तो उन्होंने इसका विरोध् किया। ¯कतु )ष्िा व्यास ने उन्हें इस तथ्य से अवगत कराया कि पांडव वास्तव में इंद्र के अवतार थे और उनकी पत्नी ने ही द्रौपदी के रूप में जन्म लिया था। अतः नियति ने ही उन सबका साथ निश्िचत कर दिया था। व्यास ने यह भी बताया कि एक बार युवा स्त्राी ने पति प्राप्ित के लिए श्िाव की आराध्ना की और उत्साह के अतिरेक में एक के बजाय पाँच बार पति प्राप्ित का वर माँग लिया। इसी स्त्राी ने द्रौपदी के रूप में जन्म लिया तथा श्िाव ने उसकी प्राथर्ना को परिपूणर् किया है। इन कहानियों से संतुष्ट होकर द्रुपद ने इस विवाह को अपनी सहमति प्रदान की।  आपको क्यों लगता है कि लेखक;कोंद्ध ने एक ही प्रकरण के लिए तीन स्पष्टीकरण प्रस्तुत किए? वतर्मान इतिहासकारों का यह सुझाव है कि लेखक;कोंद्ध द्वारा बहुपति विवाह संबंध् का चित्राण इस बात की ओर इंगित करता है कि संभवतः यह प्रथा शासकों के विश्िाष्ट वगर् में किसी काल में मौजूद थी। ¯कतु साथ ही इस प्रकरण के विभ्िान्न स्पष्टीकरण इस बात को भी व्यंजित करते हैं कि समय के साथ बहुपति प्रथा उन ब्राह्मणों में अमान्य हो गइर् जिन्होंने कइर् शताब्िदयों के दौरान इस ग्रंथ को पुन£न£मत किया। वुफछ इतिहासकार इस तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि यद्यपि ब्राह्मणों की दृष्िट में बहुपति प्रथा अमान्य और अवांछित थी, यह हिमालय क्षेत्रा में प्रचलन में थी ;और आज भी हैद्ध। यह भी कहा जाता है कि यु( के समय स्ित्रायों की कमी के कारण बहुपति प्रथा को अपनाया गया। दूसरे शब्दों में कहें तो संकट की स्िथति में इसे अपनाया गया। वुफछ आरंभ्िाक स्रोत इस तथ्य की पुष्िट करते हैं कि बहुपति प्रथा न तो एकमात्रा विवाह प(ति थी और न ही यह सबसे अध्िक प्रचलित थी। पिफर क्यों इस ग्रंथ के रचनाकार;रोंद्ध ने इस प्रथा को महाभारत के प्रमुख पात्रों के साथ अभ्िान्न रूप से जोड़कर देखा? हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि सृजनात्मक साहित्य की अपनी कथा संबंधी शरूरतें होती हैं जो हमेशा समाज में मौजूद वास्तविकताओं को नहीं दशार्तीं। 7ण् एक गतिशील ग्रंथ महाभारत का विकास संस्वृफत के पाठ के साथ ही समाप्त नहीं हो गया। शताब्िदयों से इस महाकाव्य के अनेक पाठान्तर भ्िान्न - भ्िान्न भाषाओं में लिखे गए। ये सब उस संवाद को दशार्ते थे जो इनके लेखकों, अन्य लोगों और समुदायों के बीच कायम हुए। अनेक कहानियाँ जिनका उद्भव एक क्षेत्रा विशेष में हुआ और जिनका खास लोगों के बीच प्रसार हुआ, वे सब इस महाकाव्य में समाहित कर ली गईं। साथ ही इस महाकाव्य की मुख्य कथा की अनेक पुनव्यार्ख्याएँ की गईं। इसके प्रसंगों को मू£तकला और चित्रों में भी दशार्या गया। इस महाकाव्य ने नाटकों और नृत्य कलाओं के लिए भी विषय - वस्तु प्रदान की। इस महाकाव्य की पुनव्यार्ख्याओं में मुख्य कथावस्तु को बहुत ही सृजनात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। हम ऐसे ही एक उदाहरण का उल्लेख करते हैं। महाभारत के एक प्रसंग का रूपांतरण समसामयिक बांग्ला लेख्िाका महाश्वेता देवी ने किया है, जो शोषण के विरु( अपनी आवाश उठाने के लिए प्रसि( हैं। इस उदाहरण में उन्होंने महाभारत की ऽ चचार् कीजिएण्ण्ण् इस अध्याय में महाभारत से उ(ृत अंशों को एक बार पिफर पढि़ए। इनमें से प्रत्येक के विषय में यह चचार् कीजिए कि क्या वे वास्तव में सत्य थे। ये उ(रण हमें महाकाव्य के रचयिताओं, पाठकों या पिफर श्रोताओें के विषय में क्या बताते हैं? मुख्य कथावस्तु के लिए अन्य विकल्प खोजे हैं और उन प्रश्नों की ओर ध्यान खींचा है जिन पर संस्वृफत पाठ पूणर्तया मूक है। संस्वृफत पाठ में दुयोर्ध्न द्वारा पांडवों को छल से लाक्षागृह में जलाकर मार देने का उल्लेख आता है। ¯कतु पहले से मिली चेतावनी के कारण पांडव उस गृह में सुरंग खोदकर भाग निकलते हैं। उस समय वुंफती एक भोज का आयोजन करती है जिसमें ब्राह्मण आमंत्रिात होते हैं, ¯कतु एक निषादी भी अपने पाँच पुत्रों के साथ उसमें आती है। खा - पीकर वे गहरी नींद में सो जाते हैं और पांडवों द्वारा लगाइर् गइर् आग में वे उसी लाक्षागृह में भस्म हो जाते हैं। जब उस निषादी और उसके पुत्रों के जले शव मिलते हैं तो लोग यह सोचते हैं कि पांडवों की मृत्यु हो गइर् है। अपनी लघु कथा जिसका शीषर्क फ्वुंफती ओ निषादीय् है, महाश्वेता देवी ने कथानक का प्रारंभ वहाँ से किया है जहाँ महाभारत के इस प्रसंग का अंत होता है। उन्होंने अपनी कहानी का संयोजन एक वनप्रांतर में किया है जहाँ महाभारत के यु( के बाद वुुंफती रहने लगती हैं। वुंफती के पास अब अपने अतीत के विषय में सोचने का समय है। पृथ्वी जो प्रवृफति की प्रतीक है उससे बातें करते हुए वह अपनी त्राुटियों को अंगीकार करती हैं। प्रतिदिन वह निषादों को देखती हैं जो वन में लकड़ी, शहद, वंफदमूल आदि एकत्रिात करने आते हैं। एक निषादी बहुध वुंफती को पृथ्वी से बात करते हुए सुनती है। एक दिन वातावरण में वुफछ थाऋ जानवर जंगल छोड़कर भाग रहे थे। वुंफती ने देखा कि निषादी उन्हें ताक रही है, जब उसने यह पूछा कि क्या उन्हें लाक्षागृह की याद है, तो वुंफती सकपका गइर्। उन्हें याद था। क्या उन्हें एक वृ(ा निषादी और उसके पाँच पुत्रा याद थे? और इसकी स्मृति थी कि वुंफती ने उन्हें मदिरा पिलाइर् थी, इतनी कि वे सब बेसुध् हो गए थे जबकि वह स्वयं अपने पुत्रों के संग बचकर निकल गइर् थीं। वुंुफती ने पूछा क्या तुम वहनिषादी हो? उसने उत्तर दिया कि मरी हुइर् निषादी उसकी सास थी। साथ ही वह बोली कि अपने अतीत पर विचार करते समय तुम्हें एक बार भी उन छः निदोर्ष लोगों की याद नहीं आइर् जिन्हें प्राणों से हाथ धेना पड़ा था, क्योंकि तुम अपनी और अपने पुत्रों की जान बचाना चाहती थीं। जिस समय वे दोनों बातंे कर रही थीं आग की लपटें करीब आ रही थीं। निषादी तो अपने प्राण बचाकर निकल गइर् किन्तु वुंफती जहाँ खड़ी थी वहीं रह गइर्। 1ण् 2ण् 3ण् 4ण् 5ण् स्पष्ट कीजिए कि विश्िाष्ट परिवारों में पितृवंश्िाकता क्यों महत्वपूणर् रही होगी? क्या आरंभ्िाक राज्यों में शासक निश्िचत रूप से क्षत्रिाय ही होते थे? चचार् कीजिए। द्रोण, हिडिम्बा और मातंग की कथाओं में ध्मर् के मानदंडों की तुलना कीजिए व उनके अंतर को भी स्पष्ट कीजिए। किन मायनों में सामाजिक अनुबंध् की बौ( अवधरणा समाज के उस ब्राह्मणीय दृष्िटकोण से भ्िान्न थी जो ‘पुरुषसूक्त’ पर आधारित था। निम्नलिख्िात अवतरण महाभारत से है जिसमें ज्येष्ठ पांडव युध्िष्िठर दूत संजय को संबोध्ित कर रहे हैं: संजय ध्ृतराष्ट्र गृह के सभी ब्राह्मणों और मुख्य पुरोहित को मेरा विनीत अभ्िावादन दीजिएगा। मैं गुरु द्रोण के सामने नतमस्तक होता हूँ... मैं वृफपाचायर् के चरण स्पशर् करता हूँ... ;औरद्ध वुफरु वंश के प्रधन भीष्म के। मैं वृ( राजा ;ध्ृतराष्ट्रद्ध को नमन करता हूँ। मैं उनके पुत्रा दुयोर्ध्न और उनके अनुजों के स्वास्थ्य के बारे में पूछता हूँ तथा उनको शुभकामनाएँ देता हूँ... मैं उन सब युवा वुफरु यो(ाओं का अभ्िानंदन करता हूँ जो हमारे भाइर्, पुत्रा और पौत्रा हैं... सवोर्परि मैं उन महामति विदुर को ;जिनका जन्म दासी से हुआ हैद्ध नमस्कार करता हूँ जो हमारे पिता और माता के सदृश हैं... मैं उन सभी वृ(ा स्ित्रायों को प्रणाम करता हूँ जो हमारी माताओं के रूप में जानी जाती हैं। जो हमारी पत्िनयाँ हैं उनसे यह कहिएगा कि, फ्मैं आशा करता हूँ कि वे सुरक्ष्िातहैंय्... मेरी ओर से उन वुफलवध्ुओं का जो उत्तम परिवारों में जन्मी हैं और बच्चों की माताएँ हैं, अभ्िानंदन कीजिएगा तथा हमारी पुत्रिायों का आ¯लगन कीजिएगा... सुंदर, सुगंध्ित, सुवेश्िात गण्िाकाओं को शुभकामनाएँ दीजिएगा। दासियों और उनकी संतानों तथा वृ(, विकलांग और असहाय जनों को भी मेरी ओर से नमस्कार कीजिएगा..इस सूची को बनाने के आधरों की पहचान कीजिए - उम्र, ¯लग, भेद व बंध्ुत्व के संदभर् में। क्या कोइर् अन्य आधर भी हंै? प्रत्येक श्रेणी के लिए स्पष्ट कीजिए कि सूची में उन्हें एक विशेष स्थान पर क्यों रखा गया है? 6ण् भारतीय साहित्य के प्रसि( इतिहासकार मौरिस ¯वटरविट्श ने महाभारत के बारे में लिखा था किः फ्चूँकि महाभारत संपूणर् साहित्य का प्रतिनिध्ित्व करता है... बहुत सारी और अनेक प्रकार की चीशें इसमें निहित हैं... ;वहद्ध भारतीयों की आत्मा की अगाध् गहराइर् को एक अंतदृर्ष्िट प्रदान करता है।य् चचार् कीजिए। 7ण् क्या यह संभव है कि महाभारत का एक ही रचयिता था? चचार् कीजिए। 8ण् आरंभ्िाक समाज में स्त्राी - पुरुष के संबंधें की विषमताएँ कितनीमहत्वपूणर् रही होंगी? कारण सहित उत्तर दीजिए। 9ण् उन साक्ष्यों की चचार् कीजिए जो यह दशार्ते हैं कि बंध्ुत्व और विवाह संबंध्ी ब्राह्मणीय नियमों का सवर्त्रा अनुसरण नहीं होता था। 10ण् इस अध्याय के मानचित्रा की अध्याय 2 के मानचित्रा 1 से तुलना कीजिए। वुफरु - पांचाल क्षेत्रा के पास स्िथत महाजनपदांे और नगरों की सूची बनाइए। 11ण् अन्य भाषाओं में महाभारत की पुनव्यार्ख्या के बारे में जानिए। इस अध्याय में व£णत महाभारत के किन्हीं दो प्रसंगों का इन भ्िान्न भाषा वाले ग्रंथों में किस तरह निरूपण हुआ है उनकी चचार् कीजिए। जोभी समानता और विभ्िान्नता आप इन वृत्तांत में देखते हैं उन्हें स्पष्ट कीजिए। 12ण् कल्पना कीजिए कि आप एक लेखक हैं और एकलव्य की कथा को अपने दृष्िटकोण से लिख्िाए।

RELOAD if chapter isn't visible.