1ण् ¯प्रसेप और पियदस्सी भारतीय अभ्िालेख विज्ञान में एक उल्लेखनीय प्रगति 1830 के दशक में हुइर्, जब इर्स्ट इंडिया वंफपनी के एक अध्िकारी जेम्स ¯प्रसेप ने ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का अथर् निकाला। इन लिपियों का उपयोग सबसे आरंभ्िाक अभ्िालेखों और सिक्कों में किया गया है। ¯प्रसेप को पता चला कि अध्िकांश अभ्िालेखों और सिक्कों पर पियदस्सी, यानी मनोहर मुखावृफति वाले राजा का नाम लिखा है। वुफछ अभ्िालेखों पर राजा का नाम असोक भी लिखा है। बौ( ग्रंथों के अनुसार असोक सवार्ध्िक प्रसि( शासकों में से एक था। इस शोध् से आरंभ्िाक भारत के राजनीतिक इतिहास के अध्ययन को नयी दिशा मिली, क्योंकि भारतीय और यूरोपीय विद्वानों ने उपमहाद्वीप पर शासन करने वाले प्रमुख राजवंशों की वंशावलियों की पुनरर्चना के लिए विभ्िान्न भाषाओं में लिखे अभ्िालेखों और गं्रथों का उपयोग किया। परिणामस्वरूप बीसवीं सदी के आरंभ्िाक दशकों तक उपमहाद्वीप के राजनीतिक इतिहास का एक सामान्य चित्रा तैयार हो गया। उसके बाद विद्वानों ने अपना ध्यान राजनीतिक इतिहास के संदभर् की ओर लगाया और यह छानबीन करने की कोश्िाश की कि क्या राजनीतिक परिवतर्नों और आ£थक तथा सामाजिक विकासों के बीच कोइर् संबंध् था। शीघ्र ही यह आभास हो गया कि इनमें संबंध् तो थे लेकिन संभवतः सीध्े संबंध् हमेशा नहीं थे। 2ण् प्रारंभ्िाक राज्य 2ण्1 सोलह महाजनपद आरंभ्िाक भारतीय इतिहास में छठी शताब्दी इर्.पू. को एक महत्वपूणर् परिवतर्नकारी काल माना जाता है। इस काल को प्रायः आरंभ्िाक राज्यों, नगरों, लोहे के बढ़ते प्रयोग और सिक्कों के विकास के साथ जोड़ा जाता है। इसी काल में बौ( तथा जैन सहित विभ्िान्न दाशर्निक विचारधाराओं का विकास हुआ। बौ( और जैन ध्मर् ;अध्याय 4द्ध के आरंभ्िाक ग्रंथों में महाजनपद नाम से सोलह राज्यों का उल्लेख मिलता है। यद्यपि महाजनपदों के नाम की सूची इन ग्रंथों में एकसमान नहीं है लेकिन वज्िज, मगध्, कोशल, वुफरु, पांचाल, गांधर और अवन्ित जैसे नाम प्रायः मिलते हैं। इससे यह स्पष्ट है कि उक्त महाजनपद सबसे महत्वपूणर् महाजनपदों में गिने जाते होंगे। अध्िकांश महाजनपदों पर राजा का शासन होता था लेकिन गण और संघ के नाम से प्रसि( राज्यों में कइर् लोगों का समूह शासन करता था, इस समूह का प्रत्येक व्यक्ित राजा कहलाता था। भगवान महावीर और भगवान बु( ;अध्याय 4द्ध इन्हीं गणों से संबंध्ित थे। वज्िज संघ की ही भाँति वुफछ राज्यों में भूमि सहित अनेक आ£थक स्रोतों पर राजा गण सामूहिक नियंत्राण रखते थे। यद्यपि स्रोतों के अभाव में इन राज्यों के इतिहास पूरी तरह लिखे नहीं जा सकते लेकिन ऐसे कइर् राज्य लगभग एक हशार साल तक बने रहे। प्रत्येक महाजनपद की एक राजधनी होती थी जिसे प्रायः किले से घेरा जाता था। किलेबंद राजधनियों के रख - रखाव और प्रारंभी सेनाओं अभ्िालेख अभ्िालेख उन्हें कहते हैं जो पत्थर, धातु या मिट्टðी के बतर्न जैसी कठोर सतह पर खुदे होते हैं। अभ्िालेखों में उन लोगों की उपलब्िध्याँ, ियाकलाप या विचार लिखे जाते हैं जो उन्हें बनवाते हैं। इनमें राजाओं के ियाकलाप तथा महिलाओं और पुरुषों द्वारा ध£मक संस्थाओं को दिए गए दान का ब्योरा होता है। यानी अभ्िालेख एक प्रकार से स्थायी प्रमाण होते हैं। कइर् अभ्िालेखों में इनके निमार्ण की तिथ्िा भी खुदी होती है जिन पर तिथ्िा नहीं मिलती है, उनका काल निधार्रण आमतौर पर पुरालिपि अथवा लेखन शैली के आधर पर कापफी सुस्पष्टता ़से किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, लगभग 250 इर्.पू. में अक्षर ‘अ’ इस प्रकार लिखा जाता था और 500 इर्. में यह इस प्रकार लिखा जाता था। प्राचीनतम अभ्िालेख प्रावृफत भाषाओं में लिखे जाते थे। प्रावृफत उन भाषाओं को कहा जाता था जो जनसामान्य कीभाषाएँ होती थीं। इस अध्याय में अजातसत्तु और असोक जैसे शासकों के नाम प्रावृफत भाषा में लिखे गए हैं, क्योंकि यह नाम प्रावृफत अभ्िालेखों से प्राप्त हुए हैं। आपको यहाँ तमिल, पालि और संस्वृफत जैसी भाषाओं के शब्द भी मिलेंगे, क्योंकि इन भाषाओं में भी अभ्िालेख मिलते हैं। यह संभव है कि लोग अन्य भाषाएँ भी बोलते थे लेकिन इनका उपयोग लेखन कायर् में नहीं किया जाता था। और नौकरशाही के लिए भारी आ£थक स्रोत की आवश्यकता होती थी। लगभग छठी शताब्दी इर्सा पूवर् से संस्वृफत में ब्राह्मणों ने ध्मर्शास्त्रा नामक ग्रंथों की रचना शुरू की। इनमें शासक सहित अन्य के लिए नियमों का निधर्रण किया गया और यह अपेक्षा की जाती थी कि शासक क्षत्रिाय वणर् से ही होंगे ;अध्याय 3 भी देख्िाएद्ध। शासकों का काम किसानों, व्यापारियों और श्िाल्पकारों से कर तथा भेंट वसूलना माना जाता था। क्या वनवासियों और चरवाहों से भी कर रूप में वुफछ लिया जाता था? हमेंइतना तो ज्ञात है कि संपिा जुटाने का एक वैध् उपाय पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण करके ध्न इकट्टòा करना भी माना जाता था। ध्ीरे - ध्ीरे वुफछ राज्यों ने अपनी स्थायी सेनाएँ और नौकरशाही तंत्रा तैयार कर लिए। बाकी राज्य अब भी सहायक - सेना पर निभर्र थे जिन्हें प्रायः वृफषक वगर् से नियुक्त किया जाता था। 2ण्2 सोलह महाजनपदों में प्रथम: मगध् छठी से चैथी शताब्दी इर्.पू. में मगध् ;आध्ुनिक बिहारद्ध सबसे शक्ितशाली महाजनपद बन गया। आध्ुनिक इतिहासकार इसके कइर् कारण बताते हैं। एक यह कि मगध् क्षेत्रा में खेती की उपज खास तौर पर अच्छी होती थी। दूसरे यह कि लोहे की खदानें ;आधुनिक झारखंड मेंद्ध भी आसानी से उपलब्ध् थीं जिससे उपकरण और हथ्िायार बनाना सरल होता था। जंगली क्षेत्रों में हाथी उपलब्ध् थे जो सेना के एक महत्वपूणर् अंग थे। साथ ही गंगा और इसकी उपनदियों से आवागमन सस्ता व सुलभ होता था। लेकिन आरंभ्िाक जैन औरबौ( लेखकों ने मगध् की महत्ता का कारण विभ्िान्न शासकों कीनीतियों को बताया है। इन लेखकों के अनुसार बिंबिसार, अजातसत्तुऔर महापद्मनंद जैसे प्रसि( राजा अत्यंत महत्त्वाकांक्षी शासक थे, और इनके मंत्राी उनकी नीतियाँ लागू करते थे। प्रारंभ में, राजगाह ;आध्ुनिक बिहार के राजगीर का प्रावृफत नामद्ध मगध् की राजधनी थी। यह रोचक बात है कि इस शब्द का अथर् है ‘राजाओं का घर’। पहाडि़यों के बीच बसा राजगाह एक किलेबंद शहर था। बाद में चैथी शताब्दी इर्.पू. में पाटलिपुत्रा को राजधनी बनाया गया, जिसे अब पटना कहा जाता है जिसकी गंगा के रास्ते आवागमन के मागर् पर महत्वपूणर् अवस्िथति थी। ऽ चचार् कीजिएण्ण्ण् मगध् की सत्ता के विकास के लिए आरंभ्िाक और आध्ुनिक लेखकों ने क्या - क्या व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं? ये एक - दूसरे से वैफसे भ्िान्न हैं। चित्रा 2ण्2 राजगीर के किले की दीवार Â इन दीवारों का निमार्ण क्यों किया गया? 3ण् एक आरंभ्िाक साम्राज्य मगध् के विकास के साथ - साथ मौयर् साम्राज्य का उदय हुआ। मौयर् साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त मौयर् ;लगभग 321 इर्.पू.द्ध का शासनपश्िचमोत्तर में अपफगानिस्तान और बलूचिस्तान तक पैफला था। उनके ़पौत्रा असोक ने जिन्हें आरंभ्िाक भारत का सवर्प्रसि( शासक माना जा सकता है, क¯लग ;आध्ुनिक उड़ीसाद्ध पर विजय प्राप्त की। 3ण्1 मौयर्वंश के बारे में जानकारी प्राप्त करना मौयर् साम्राज्य के इतिहास की रचना के लिए इतिहासकारों ने विभ्िान्न प्रकार के स्रोतों का उपयोग किया है। इनमें पुरातात्िवक प्रमाण भी शामिल हैं, विशेषतया मू£तकला। मौयर्कालीन इतिहास के पुन£नमार्ण हेतु समकालीन रचनाएँ भी मूल्यवान सि( हुइर् हैं, जैसे चंद्रगुप्त मौयर् के दरबार में आए यूनानी राजदूत मेगस्थनीश द्वारा लिखा गया विवरण। आज इसके वुफछ अंश ही उपलब्ध् हैं। एक और स्रोत जिसका उपयोग प्रायः किया जाता है, वह है अथर्शास्त्रा। संभवतः इसके वुफछ भागों की रचना कौटिल्य या चाणक्य ने की थी जो चंद्रगुप्त के मंत्राी थे। साथ ही मौयर् शासकों का उल्लेख परवतीर् जैन, बौ( और पौराण्िाक ग्रंथों तथा संस्वृफत वाघ्मय में भी मिलता है। यद्यपि उक्त साक्ष्य बड़े उपयोगी हैं लेकिन पत्थरों और स्तंभों पर मिले असोक के अभ्िालेख प्रायः सबसे मूल्यवान स्रोत माने जाते हैं। असोक वह पहला सम्राट था जिसने अपने अध्िकारियों और प्रजा के लिए संदेश प्रावृफतिक पत्थरों और पाॅलिश किए हुए स्तंभों पर लिखवाए थे। असोक ने अपने अभ्िालेखों के माध्यम से ध्म्म का प्रचार किया। इनमें बड़ों के प्रति आदर, संन्यासियों और ब्राह्मणों के प्रति उदारता, सेवकों और दासों के साथ उदार व्यवहार तथा दूसरे के ध्मो± और परंपराओं का आदर शामिल हैं। 3ण्2 साम्राज्य का प्रशासन मौयर् साम्राज्य के पाँच प्रमुख राजनीतिक वेंफद्र थे, राजधनी पाटलिपुत्रा और चार प्रांतीय वेंफद्रμतक्षश्िाला, उज्जयिनी, तोसलि और सुवणर्गिरि। इन सबका उल्लेख असोक के अभ्िालेखों मंे किया गया है। यदि हम इन अभ्िालेखों का परीक्षण करें तो पता चलता है कि आध्ुनिक पाकिस्तान के पश्िचमोत्तर सीमांत प्रांत से लेकर आंध््र प्रदेश, उड़ीसा और उत्तराखंड तक हर स्थान पर एक जैसे संदेश उत्कीणर् किए गए थे। क्या इतने Â ¯सह शीषर् को आज महत्वपूणर् क्यों माना विशाल साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था समान रही होगी? इतिहासकारजाता है? अब इस निष्कषर् पर पहुँचे हैं कि ऐसा संभव नहीं था। साम्राज्य में चित्रा2ण्3 ¯सह शीषर् मानचित्रा 2 असोक के अभ्िालेखों का वितरण मानसेहराशहबाशगढ़ीतक्षश्िाला वंफदहार कलसी टोपराबहपुर बैराट भाब्रू मेरठ गुजर निगालीसागर रुम्िमनदेइर् रामपुरवालौरिया नंदनगढ़लौरियाअरराज कौशाम्बी अहरौरा सारनाथ सहसरामपाटलिपुत्रा उज्जयिनी साँची गिरनार श्िाशुपालगढ़ अरब सागर सोपारा जौगड़ क¯लग सन्नति मास्की गावीमठ पाल्कीगुंडुज¯तग रामेश्वरसिद्दपुर ब्रह्मगिरिनित्तूरराजुलमंडगिरिउदेगोलाम बंगाल की खाड़ी ऽ महाश्िालालेख लघुश्िालालेख स्तंभ अभ्िालेख केरलपुत्रा चोल पांड्य रेखाचित्रा पैमाना नहीं दिया गया है। Â क्या यह भी संभव है कि जो क्षेत्रा शासकों के अध्ीन नहीं थे वहाँ भी उन्होंने अभ्िालेख उत्कीणर् करवाए ़शामिल क्षेत्रा बड़े विविध् और भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार के थे: कहाँअपफगानिस्तान होंगे?के पहाड़ी क्षेत्रा और कहाँ उड़ीसा के तटवतीर् क्षेत्रा। यह संभव है कि सबसे प्रबल प्रशासनिक नियंत्राण साम्राज्य की राजधनी तथा उसके आसपास के प्रांतीय वेंफद्रों पर रहा हो। इन वेंफद्रों का चयन बड़े ध्यान से किया गया। तक्षश्िाला और उज्जयिनी दोनों लंबी दूरी वाले महत्वपूणर् व्यापार मागर् पर स्िथत थे जबकि सुवणर्गिरि ;अथार्त् सोने के पहाड़द्ध कनार्टक में सोने की खदान के लिए उपयोगी था। स्रोत1 सम्राट के अध्िकारी क्या - क्या कायर् करते थे? मेगस्थनीश के विवरण का एक अंश दिया गया है। साम्राज्य के महान अिाकारियों में से वुफछ नदियों की देख - रेख और भूमि मापन का काम करते हैं जैसा कि मिस्र में होता था। वुफछ प्रमुख नहरों से उपनहरों के लिए छोड़े जाने वाले पानी के मुखद्वार का निरीक्षण करते हैं ताकि हर स्थान पर पानी की समान पू£त हो सके। यही अिाकारी श्िाकारियों का संचालन करते हैं और श्िाकारियों के वृफत्यों के आधर पर उन्हें इनाम या दंड देते हैं। वे कर वसूली करते हैं और भूमि से जुड़े सभी व्यवसायों का निरीक्षण करते हैं साथ ही लकड़हारों, बढ़इर्, लोहारों और खननकतार्ओं का भी निरीक्षण करते हैं। Â विभ्िान्न व्यावसायिक समूहों के निरीक्षण के लिए इन अध्िकारियों को क्यों नियुक्त किया जाता था? ऽ चचार् कीजिएण्ण्ण् मेगस्थनीश और अथर्शास्त्रा से उ(ृत अंशों को पुनः पढि़ए। मौयर् शासन के इतिहास लेखन में ये ग्रंथ कितने उपयोगी हैं? साम्राज्य के संचालन के लिए भूमि और नदियों दोनों मागो± से आवागमन बना रहना अत्यंत आवश्यक था। राजधनी से प्रांतों तक जाने में कइर् सप्ताह या महीनों का समय लगता होगा। इसका अथर् यह है कि यात्रिायों के लिए खान - पान की व्यवस्था और उनकी सुरक्षा भी करनी पड़ती होगी। यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि सेना सुरक्षा का एक प्रमुख माध्यम रही होगी। मेगस्थनीश ने सैनिक गतिविध्ियों के संचालन के लिए एक समिति और छः उपसमितियों का उल्लेख किया है। इनमें से एक का काम नौसेना का संचालन करना था, तो दूसरी यातायात और खान - पान का संचालन करती थी, तीसरी का काम पैदल सैनिकों का संचालन, चैथी का अश्वारोहियों, पाँचवीं का रथारोहियों तथा छठी का काम हाथ्िायों का संचालन करना था। दूसरी उपसमिति का दायित्व विभ्िान्न प्रकार का था: उपकरणों के ढोने के लिए बैलगाडि़यों की व्यवस्था, सैनिकों के लिए भोजन और जानवरों के लिए चारे की व्यवस्था करना तथा सैनिकों की देखभाल के लिए सेवकों और श्िाल्पकारों की नियुक्ित करना। असोक ने अपने साम्राज्य को अखंड बनाए रखने का प्रयास किया। ऐसा उन्होंने ध्म्म के प्रचार द्वारा भी किया। जैसा कि हमने अभी ऊपर पढ़ा, ध्म्म के सि(ांत बहुत ही साधरण और सावर्भौमिक थे। असोक के अनुसार ध्म्म के माध्यम से लोगों का जीवन इस संसार में और इसके बाद के संसार में अच्छा रहेगा। ध्म्म के प्रचार के लिए धम्म महामात्त नाम से विशेष अिाकारियों की नियुक्ित की गइर्। 3ण्3 मौयर् साम्राज्य कितना महत्वपूणर् था? उन्नीसवीं सदी में जब इतिहासकारों ने भारत के आरंभ्िाक इतिहास की रचना करनी शुरू की तो मौयर् साम्राज्य को इतिहास का एक प्रमुख काल माना गया। इस समय भारत बि्रटिश साम्राज्य के अध्ीन एक औपनिवेश्िाक देश था। उन्नीसवीं और आरंभ्िाक बीसवीं सदी के भारतीय इतिहासकारों को प्राचीन भारत में एक ऐसे साम्राज्य की संभावना बहुत चुनौतीपूणर् तथा उत्साहवध्र्क लगी। साथ ही प्रस्तर मू£तयों सहित मौयर्कालीन सभी पुरातत्व एक अद्भुत कला के प्रमाण थे जो साम्राज्य की पहचान माने जाते हैं। इतिहासकारों को लगा कि अभ्िालेखों पर लिखे संदेश अन्य शासकों के अभ्िालेखों से भ्िान्न हैं। इसमें उन्हें यह लगा कि अन्य राजाओं की अपेक्षा असोक एक बहुत शक्ितशाली और परिश्रमी शासक थे। साथ ही वे बाद के उन राजाओं की अपेक्षा विनीत भी थे जो अपने नाम के साथ बड़ी - बड़ी उपाध्ियाँ जोड़ते थे। इसलिए इसमें कोइर् आश्चयर्जनक बात नहीं थी कि बीसवीं सदी के राष्ट्रवादी नेताओं ने भी असोक को प्रेरणा का स्रोत माना। पिफर भी, मौयर् साम्राज्य कितना महत्वपूणर् था? यह साम्राज्य मात्रा डेढ़ सौ साल तक ही चल पाया जिसे उपमहाद्वीप के इस लंबे इतिहास में बहुत बड़ा काल नहीं माना जा सकता। इसके अतिरिक्त यदि आप मानचित्रा 2 को देखें तो पता चलेगा कि मौयर् साम्राज्य उपमहाद्वीप के सभी क्षेत्रों में नहीं पैफल पाया था। यहाँ तक कि साम्राज्य की सीमा के अंतगर्त भी नियंत्राण एकसमान नहीं था। दूसरी शताब्दी इर्.पू. आते - आते उपमहाद्वीप के कइर् भागों में नए - नए शासक और रजवाड़े स्थापित होने लगे। 4ण् राजध्मर् के नवीन सि(ांत 4ण्1 दक्ष्िाण के राजा और सरदार उपमहाद्वीप के दक्कन और उससे दक्ष्िाण के क्षेत्रा में स्िथत तमिलकम ;अथार्त् तमिलनाडु एवं आंध््र प्रदेश और केरल के वुफछ हिस्सेद्ध में चोल, चेर और पाण्ड्य जैसी सरदारियों का उदय हुआ। ये राज्य बहुत ही समृ( और स्थायी सि( हुए। सरदार और सरदारी सरदार एक शक्ितशाली व्यक्ित होता है जिसका पद वंशानुगत भी हो सकता है और नहीं भी। उसके समथर्क उसके खानदान के लोग होते हैं। सरदार के कायो± में विशेष अनुष्ठान का संचालन, यु( के समय नेतृत्व करना और विवादों को सुलझाने में मध्यस्थता की भूमिका निभाना शामिल है। वह अपने अध्ीन लोगों से भेंट लेता है ;जबकि राजा कर वसूली करते हैंद्ध, और अपने समथर्कों में उस भेंट का वितरण करता है। सरदारी में सामान्यतया कोइर् स्थायी सेना या अध्िकारी नहीं होते हैं। हमें इन राज्यों के बारे में विभ्िान्न प्रकार के स्रोतों से जानकारी मिलती है। उदाहरण के तौर पर, प्राचीन तमिल संगम ग्रंथों में ऐसी कविताएँ हैं जो सरदारों का विवरण देती हैं कि उन्होंने अपने स्रोतों का संकलन और वितरण किस प्रकार से किया। कइर् सरदार और राजा लंबी दूरी के व्यापार द्वारा राजस्व जुटाते थे। इनमें मध्य और पश्िचम भारत के क्षेत्रों पर शासन करने वाले सातवाहन ;लगभग द्वितीय शताब्दी इर्.पू. से द्वितीय शताब्दी इर्. तकद्ध औरउपमहाद्वीप के पश्िचमोत्तर और पश्िचम में शासन करने वाले मध्य एश्िायाइर् मूल के शक शासक शामिल थे। उनके सामाजिक उद्गम के बारे में अध्िक जानकारी तो नहीं है, लेकिन जैसा कि हम सातवाहनशासकों के बारे में अध्याय तीन में पढ़ेंगे कि एक बार सत्ता में आने केबाद उन्होंने ऊँचे सामाजिक अस्ितत्व का दावा कइर् प्रकार से किया। स्रोत 2 अथर्शास्त्रा में सैनिक और प्रशासनिक संगठन के बारे में विस्तृत विवरण मिलते हैं। मिसाल के तौर पर हाथी को पकड़ने के उपाय के बारे में उसमें यह लिखा हैः हाथी वनों के संरक्षक हाथ्िायों को पालने वाले लोगों, हाथी के पैरों में जंशीर बाँध्ने वाले लोगों, सीमारक्षकों, वनवासियों और महावतों के साथ मिलकर पाँच से सात हथ्िानियों की मदद से, जंगली हाथ्िायों द्वारा गिराए गए मलमूत्रा को पहचानते हुए उन्हें पकड़ने का काम करते थे। यूनानी स्रोतों के अनुसार, मौयर् सम्राट के पास छः लाख पैदल सैनिक, तीस हशार घुड़सवार तथा नौ हशार हाथी थे। वुुफछ इतिहासकार इस विवरण को अतिशयोक्ितपूणर् मानते हैं। ऽ यदि यूनानी विवरण सही है, तो बताइए कि इतनी बड़ी सेना के भरण - पोषण के लिए मौयर् शासकों को किस तरह के संसाध्नों की शरूरत पड़ती होगी? स्रोत3 पाण्ड्य सरदारसेनगुत्तुवन की वनयात्रा यह तमिल महाकाव्य सिलप्पादिकारम् का एक अंश है: जब वह वन की यात्रा पर थे तो लोग नाचते - गाते हुए पहाड़ों से उतरे ठीक उसी तरह जैसे पराजित लोग विजयी का आदर करते हैं। वे अपने साथ उपहार लाए, जिनमें हाथी दाँत, सुगंध्ित लकड़ी, हिरणों के बाल से बने चँवर, मध्ु, चंदन, गेरू, सुरमा, हल्दी, इलायची, मिचर् आदि वस्तुएँ थीं। वे अपने साथ नारियल, आम, जड़ी - बूटी, पफल, प्याज, गन्ना, पूफल, सुपारी, केला, बाघों के बच्चे, शेर, हाथी, बंदर, भालू, हिरण, कस्तूरी मृग, लोमड़ी, मोर, जंगली मुगेर्, बोलने वाले तोते आदि भी लाए। Â लोग यह उपहार क्यों लाए? सरदार इन उपहारों का उपयोग किसलिए करते होंगे? 4ण्2 दैविक राजा राजाओं के लिए उच्च स्िथति प्राप्त करने का एक साध्न विभ्िान्नदेवी - देवताओं के साथ जुड़ना था। मध्य एश्िाया से लेकर पश्िचमोत्तर भारत तक शासन करने वाले वुफषाण शासकों ने ;लगभग प्रथम शताब्दी इर्.पू. से प्रथम शताब्दी इर्. तकद्ध इस उपाय का सबसे अच्छा उ(रण प्रस्तुत किया। वुफषाण इतिहास की रचना अभ्िालेखों और साहित्य परंपरा के माध्यम से की गइर् है। जिस प्रकार के राजध्मर् को वुफषाण शासकोंने प्रस्तुत करने की इच्छा की उसका सवोर्त्तम प्रमाण उनके सिक्कों और मू£तयों से प्राप्त होता है।उत्तर प्रदेश में मथुरा के पास माट के एक देवस्थान पर वुफषाण शासकों की विशालकाय मू£तयाँ लगाइर् गइर् थीं। अपफगानिस्तान के एक़देवस्थान पर भी इसी प्रकार की मू£तयाँ मिली हैं। वुफछ इतिहासकारों का मानना है कि इन मू£तयों के शरिए वुफषाण स्वयं को देवतुल्य प्रस्तुत करना चाहते थे। कइर् वुफषाण शासकों ने अपने नाम के आगे ‘देवपुत्रा’ की उपाध्ि भी लगाइर् थी। संभवतः वे उन चीनी शासकों से प्रेरित हुए होंगे, जो स्वयं को स्वगर्पुत्रा कहते थे। चैथी शताब्दी इर्. में गुप्त साम्राज्य सहित कइर् बड़े साम्राज्यों के साक्ष्य मिलते हैं। इनमें से कइर् साम्राज्य सामंतों पर निभर्र थे। अपना निवार्ह स्थानीय संसाध्नों द्वारा करते थे जिसमें भूमि पर नियंत्राण भी शामिल था। वे शासकों का आदर करते थे और उनकी सैनिक सहायता भी करते थे। जो सामंत शक्ितशाली होते थे वे राजा भी बन जाते थे और जो राजा दुबर्ल होते थे, वे बड़े शासकोें के अध्ीन हो जाते थे। गुप्त शासकों का इतिहास साहित्य, सिक्कों और अभ्िालेखों की सहायता से लिखा गया है। साथ ही कवियों द्वारा अपने राजा या स्वामी की प्रशंसा में लिखी प्रशस्ितयाँ भी उपयोगी रही हैं। यद्यपि इतिहासकार इन रचनाओं के आधर पर ऐतिहासिक तथ्य निकालने का प्रायः प्रयास चित्रा2ण्4 एक वुफषाण सिक्का अग्र भाग - कनिष्क पृष्ठ भाग - देवता करते हैं लेकिन उनके रचयिता तथ्यात्मक विवरण की अपेक्षा उन्हंे काव्यात्मक गं्रथ मानते थे। उदाहरण के तौर पर, इलाहाबाद स्तंभ चित्रा2ण्5अभ्िालेख के नाम से प्रसि( प्रयाग प्रशस्ित की रचना हरिषेण जो स्वयं बलुआ पत्थर से बनी वुफषाण राजा की एक मू£तगुप्त सम्राटों के संभवतः सबसे शक्ितशाली सम्राट समुद्रगुप्त के राजकवि थे, ने संस्वृफत में की थी। स्रोत 4 ऽ चचार् कीजिएण्ण्ण् राजाओं ने दिव्य स्िथति का दावा क्यों किया? स्रोत5 गुजरात की सुदशर्न झील मानचित्रा 2 में गिरनार ढूँढि़ए। सुदशर्न झील एक वृफत्रिाम जलाशय था। हमें इसका ज्ञान लगभग दूसरी शताब्दी इर्. के संस्वृफत के एक पाषाण अभ्िालेख से होता है। इस अभ्िालेख को शक शासक रुद्रदमन की उपलब्िध्यों का उल्लेख करने के लिए बनवाया गया था। इस अभ्िालेख में कहा गया है कि जलद्वारों और तटबंधें वाली इस झील का निमार्ण मौयर् काल में एक स्थानीय राज्यपाल द्वारा किया गया था। लेकिन एक भीषण तूपफान के कारण इसके तटबंध् टूट गए और सारा पानी बह गया। बताया जाता है कि तत्कालीन शासक रुद्रदमन ने इस झील की मरम्मत अपने खचेर् से करवाइर् थी, और इसके लिए अपनी प्रजा से कर भी नहीं लिया था। इसी पाषाण - खंड पर एक और अभ्िालेख ;लगभग पाँचवीं सदीद्ध है जिसमें कहा गया है कि गुप्त वंश के एक शासक ने एक बार पिफर इस झील की मरम्मत करवाइर् थी। Â शासकों ने सिंचाइर् के प्रबंध् क्यों किए? 5ण् बदलता हुआ देहात 5ण्1 जनता में राजा की छवि राजाओं के बारे में प्रजा क्या सोचती थी? स्वाभाविक है कि अभ्िालेखों से सभी जवाब नहीं मिलते हैं। वस्तुतः साधरण जनता द्वारा राजाओं के बारे में अपने विचारों और अनुभव के विवरण कम ही छोड़े गए हैं। पिफर भी इतिहासकारों ने इसका निराकरण करने का प्रयास किया है। उदाहरण के तौर पर, जातक और पंचतंत्रा जैसे ग्रंथों में व£णत कथाओं की समीक्षा करके इतिहासकारों ने पता लगाया है कि इनमें से अनेक कथाओं के स्रोत मौख्िाक किस्से - कहानियाँ हैं जिन्हें बाद में लिपिब( किया गया होगा। जातक कथाएँ पहली सहस्राब्िद इर्. के मध्य में पालि भाषा में लिखी गईं। गंदतिन्दु जातक नामक एक कहानी में बताया गया है कि एक वुुफटिल राजा की प्रजा किस प्रकार से दुखी रहती है। इन लोगों में वृ( महिलाएँ, पुरुष, किसान, पशुपालक, ग्रामीण बालक और यहाँ तक कि जानवर भी शामिल हैं। जब राजा अपनी पहचान बदल कर प्रजा के बीच में यह पता लगाने गया कि लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं तो एक - एक कर सबने अपने दुखों के लिए राजा को भला - बुरा कहा। उनकी श्िाकायत थी कि रात में डवैफत उन पर हमला करते हैं तो दिन में कर इकट्टòा करने वाले अध्िकारी। ऐसी परिस्िथति से बचने के लिए लोग अपने - अपने गाँव छोड़ कर जंगल में बस गए। जैसा कि इस कथा से पता चलता है कि राजा और प्रजा, विशेषकर ग्रामीण प्रजा, के बीच संबंध् तनावपूणर् रहते थे, क्योंकि शासक अपने राजकोष को भरने के लिए बड़े - बड़े कर की माँग करते थे जिससे किसान खासतौर पर त्रास्त रहते थे। इस जातक कथा से पता चलता है कि इस संकट से बचने का एक उपाय जंगल की ओर भाग जाना होता था। इसी बीच करों की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए किसानों ने उपज बढ़ाने के और उपाए ढूँढ़ने शुरू किए। 5ण्2 उपज बढ़ाने के तरीके उपज बढ़ाने का एक तरीका हल का प्रचलन था। जो छठी शताब्दी इर्पू. से ही गंगा और कावेरी की घाटियों के उवर्र कछारी क्षेत्रा में पैफल गया था। जिन क्षेत्रों में भारी वषार् होती थी वहाँ लोहे के पफाल वाले हलों के माध्यम से उवर्र भूमि की जुताइर् की जाने लगी। इसके अलावा गंगा की घाटी में धन की रोपाइर् की वजह से उपज में भारी वृि होने लगी। हालाँकि किसानों को इसके लिए कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ती थी। यद्यपि लोहे के पफाल वाले हल की वजह से पफसलों की उपज बढ़ने लगी लेकिन ऐसे हलों का उपयोग उपमहाद्वीप के वुुफछ ही हिस्से में सीमित था। पंजाब और राजस्थान जैसी अध्र्शुष्क शमीन वाले क्षेत्रों में लोहे के पफाल वाले हल का प्रयोग बीसवीं सदी में शुरू हुआ। जोकिसान उपमहाद्वीप के पूवोर्त्तर और मध्य पवर्तीय क्षेत्रों में रहते थे उन्होंने खेती के लिए वुफदाल का उपयोग किया, जो ऐसे इलाके के लिए कहीं अध्िक उपयोगी था। उपज बढ़ाने का एक और तरीका वुफओं, तालाबों और कहीं - कहीं नहरों के माध्यम से ¯सचाइर् करना था। व्यक्ितगत लोगों और वृफषक समुदायों ने मिलकर ¯सचाइर् के साध्न नि£मत किए। व्यक्ितगत तौर पर तालाबों, वुफओं और नहरों जैसे ¯सचाइर् साध्न नि£मत करने वाले लोग प्रायः राजा या प्रभावशाली लोग थे जिन्होंने अपने इन कामों का उल्लेख अभ्िालेखों में भी करवाया। 5ण्3 ग्रामीण समाज में विभ्िान्नताएँ यद्यपि खेती की इन नयी तकनीकों से उपज तो बढ़ी लेकिन इसके लाभ समान नहीं थे। इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि खेती से जुड़े लोगों में उत्तरोत्तर भेद बढ़ता जा रहा था। कहानियों में विशेषकर बौ( कथाओं में भूमिहीन खेतिहर श्रमिकों, छोटे किसानों और बड़े - बड़े शमींदारों का उल्लेख मिलता है। पालि भाषा में गहपति का प्रयोग छोटे किसानों और शमींदारों के लिए किया जाता था। बड़े - बड़े शमींदार और ग्राम प्रधन शक्ितशाली माने जाते थे जो प्रायः किसानों पर नियंत्राण रखते थे। ग्राम प्रधन का पद प्रायः वंशानुगत होता था। आरंभ्िाक तमिल संगम साहित्य में भी गाँवों में रहने वाले विभ्िान्न वगो± के लोगों का उल्लेख है, जैसे कि वेल्लालर या बड़े शमींदारऋ हलवाहा या उल्वर और दास अण्िामइर् । यह संभव है कि वगो± की यह विभ्िान्नता भूमि के स्वामित्व, श्रम और नयी प्रौद्योगिकी के उपयोग पर आधरित हो। ऐसी परिस्िथति में भूमि का स्वामित्व महत्वपूणर् हो गया जिसकी चचार् प्रायः विध्ि ग्रंथों में की जाती थी। गहपति गहपति घर का मुख्िाया होता था और घर में रहने वाली महिलाओं, बच्चों, नौकरों और दासों पर नियंत्राण करता था। घर से जुड़े भूमि, जानवर या अन्य सभी वस्तुओं का वह मालिक होता था। कभी - कभी इस शब्द का प्रयोग नगरों में रहने वाले संभ्रांत व्यक्ितयों और व्यापारियों के लिए भी होता था। स्रोत 6 सीमाओं का महत्त्व मनुस्मृति आरंभ्िाक भारत का सबसे प्रसि( विध्िग्रंथ है। इसे संस्वृफत भाषा में दूसरी शताब्दी इर्.पू. और दूसरी शताब्दी इर्. के बीच लिखा गया था। इस गं्रथ में राजा को यह सलाह दी गइर् है: चूँकि सीमाओं की अनभ्िाज्ञता के कारण विश्व में बार - बार विवाद पैदा होते हैं इसलिए उसे सीमाओं की पहचान के लिए गुप्त निशान शमीन में गाड़ कर रखने चाहिए जैसे कि पत्थर, हिóयाँ, गाय के बाल, भूसी, राख, खपटे, गाय के सूखे गोबर, ईंट, कोयला, वंफकड़ और रेत। उसे सीमाओं पर इसी प्रकार के और तत्व भूमि में छुपा कर गाड़ने चाहिए जो समय के साथ नष्ट न हों। Â क्या ये सीमा चिÉ विवाद के हल के लिए पयार्प्त रहे होंगे? स्रोत7 एक छोटे गाँव का जीवन Â इस अंश में वण्िार्त लोगों को व्यवसाय के आधर पर आप वैफसेवगीर्कृत करेंगे? हषर्चरित संस्कृत में लिखी गइर् कन्नौज ;मानचित्रा 3 देख्िाएद्ध के शासक हषर्वध्र्न की जीवनी है, इसके लेखक बाणभ‘ ;लगभग सातवीं शताब्दी इर्.द्ध हषर्वध्र्न के राजकवि थे। यह उस ग्रंथ का एक अंश है। इसमें ¯वध्य क्षेत्रा के जंगल के किनारे की एक बस्ती के जीवन का एक अतिविरल चित्राण किया गया हैः बस्ती के किनारे का अध्िकांश क्षेत्रा जंगल है और यहाँ धन की उपजवाली, खलिहान और उपजाऊ भूमि के हिस्सों को छोटे किसानों ने आपस में बाँट लिया है... यहाँ के अध्िकांश लोग वुफदाल का प्रयोग करते हंै..क्योंकि घास से भरी भूमि में हल चलाना मुश्िकल है। बहुत कम हिस्से साप़्ाफ हैं, जो हैं भी उसकी काली मिट्टðी काले लोहे जैसी सख्त है। यहाँ लोग पेड़ की छाल के गट्टòर लेकर चलते हैं... पूफलों से भरे अनगिनत बोरे... अलसी और सन, भारी भात्रा में शहद, मोरपंख, मोम, लकड़ी और घास के बोझ लेकर आते - जाते रहते हैं। ग्रामीण महिलाएँ रास्ते में बसे गाँवों में जाकर बेचने को तत्पर रहती हैं। उनके सिरों पर जंगल से एकत्रा किए गए पफलों की टोकरियाँ थीं। 5ण्4 भूमिदान और नए संभ्रात ग्रामीण इर्सवी की आरंभ्िाक शताब्िदयों से ही भूमिदान के प्रमाण मिलते हैं। इनमें से कइर् का उल्लेख अभ्िालेखों में मिलता है। इनमें से वुफछ अभ्िालेख पत्थरों पर लिखे गए थे लेकिन अध्िकांश ताम्र पत्रों पर खुदे होते थे जिन्हें संभवतः उन लोगों को प्रमाण रूप में दिया जाता था जो भूमिदान लेते थे। भूमिदान के जो प्रमाण मिले हैं वे साधरण तौर पर धमिर्कसंस्थाओं या ब्राह्मणों को दिए गए थे। अध्िकांश अभ्िालेख संस्कृत में थे।विशेषकर सातवीं शताब्दी के बाद के अभ्िालेखों के वुफछ अंश संस्कृत में हैं और वुफछ तमिल और तेलुगु जैसी स्थानीय भाषाओं में हैं। आइए एक ऐसे अभ्िालेख पर ध्यान से विचार करें। प्रभावती गुप्त आरंभ्िाक भारत के एक सबसे महत्वपूणर् शासक चंद्रगुप्त द्वितीय ;लगभग 375.415 इर्.पू.द्ध की पुत्राी थी। उसका विवाह दक्कन पठार के वाकाटक परिवार में हुआ था जो एक महत्वपूणर् शासकवंश था। संस्कृत ध्मर्शास्त्रों के अनुसार, महिलाओं को भूमि जैसी संपिा पर स्वतंत्रा अध्िकार नहीं था लेकिन एक अभ्िालेख से पता चलता है कि प्रभावती भूमि की स्वामी थी और उसने दान भी किया था। इसका एक कारण यह हो सकता है, क्योंकि वह एक रानी ;आरंभ्िाक भारतीय इतिहास की ज्ञात वुफछ रानियों में से एकद्ध थी और इसीलिए उनका यह उदाहरण एक विरला ही रहा हो। यह भी संभव है कि ध्मर्शास्त्रों को हर स्थान पर समान रूप से लागू नहीं किया जाता हो। अभ्िालेख से हमें ग्रामीण प्रजा का भी पता चलता है। इनमें ब्राह्मण, किसान तथा अन्य प्रकार के वगर् शामिल थे जो शासकों या उनके प्रतिनििायों को कइर् प्रकार की वस्तुएँ प्रदान करते थे। अभ्िालेख के अनुसार इन लोगों को गाँव के नए प्रधन की आज्ञाओं का पालन करना पड़ता था और संभवतः अपने भुगतान उसे ही देने पड़ते थे। इस प्रकार भूमिदान अभ्िालेख देश के कइर् हिस्सों में प्राप्त हुए हैं। क्षेत्रों में दान में दी गइर् भूमि की माप में अंतर है: कहीं - कहीं छोटे - छोटे टुकड़े, तो कहीं कहीं बड़े - बड़े क्षेत्रा दान में दिए गए हैं। साथ ही भूमिदान में दान प्राप्त करने वाले लोगों के अध्िकारों में भी क्षेत्राीय परिवतर्न मिलते हैं। इतिहासकारों में भूमिदान का प्रभाव एक गमर् वाद - विवाद का विषय बना हुआ है। वुफछ इतिहासकारों का मानना है कि भूमिदान शासकवंश द्वारा कृष्िा को नए क्षेत्रों में प्रोत्साहित करने की एक रणनीति थी, जबकि वुफछ का कहना है कि भूमिदान से दुबर्ल होते राजनीतिक प्रभुत्व का संकेत मिलता है अथार्त् राजा का शासन सामंतों पर दुबर्ल होने लगा तो उन्होंने भूमिदान के माध्यम से अपने समथर्क जुटाने प्रारंभ कर दिए।उनका यह भी मानना है कि राजा स्वयं को उत्कृष्ट स्तर के मानव के रूप में प्रदश्िार्त करना चाहते थे ;जैसा कि हमने पिछले अंश में देखा हैद्ध। उनका नियंत्राण ढीला होता जा रहा था इसलिए वे अपनी शक्ित का आडंबर प्रस्तुत करना चाहते थे। स्रोत 8 प्रभावती गुप्त और दंगुन गाँव प्रभावती गुप्त ने अपने अभ्िालेख में यह कहा हैः प्रभावती ग्राम वुफटुंबिनों ;गाँव के गृहस्थ और वृफषकद्ध, ब्राह्मणों,और दंगुन गाँव के अन्य वासियों को आदेश देती है ३ श्आपको ज्ञात हो कि कातिर्क शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथ्िा कोधमिर्क पुण्य प्राप्ित के लिए इस ग्राम को जल अपर्ण के साथआचायर् चनालस्वामी को दान किया गया है। आपको इनके सभीआदेशों का पालन करना चाहिए। एक अग्रहार के लिए उपयुक्त निम्नलिख्िात रियायतों का निदेर्शभी देती हूँ। इस गाँव में पुलिस या सैनिक प्रवेश नहीं करेंगे। दौरेपर आने वाले शासकीय अध्िकारियों को यह गाँव घास देने औरआसन में प्रयुक्त होने वाली जानवरों की खाल और कोयला देनेके दायित्व से मुक्त है। साथ ही वे मदिरा खरीदने और नमक हेतुखुदाइर् करने के राजसी अध्िकार को कायार्न्िवत किए जाने से मुक्तहैं। इस गाँव को खनिज - पदाथर् और खदिर वृक्ष के उत्पाद देने सेभी छूट है। पूफल और दूध् देने से भी छूट है। इस गाँव का दानइसके भीतर की संपिा और बड़े - छोटे सभी करों सहित किया गया है।य् इस राज्यादेश को 13वें राज्य वषर् में लिखा गया है और इसे चक्रदास ने उत्कीणर् किया है। Â इस गाँव में कौन - कौन सी वस्तुएँ पैदा की जाती थीं? भूमिदान के प्रचलन से राज्य तथा किसानों के बीच संबंध् की झाँकी मिलती है। लेकिन वुफछ लोग ऐसे भी थे जिन पर अध्िकारियों या सामंतों का नियंत्राण नहीं थाः जैसे कि पशुपालक, संग्राहक, श्िाकारी, मछुआरे,श्िाल्पकार ;घुमक्कड़ तथा लगभग एक ही स्थान पर रहने वालेद्ध और जगह - जगह घूम कर खेती करने वाले लोग। सामान्यतः ऐसे लोग अपने जीवन और आदान - प्रदान के विवरण नहीं रखते थे। 6ण् नगर एवं व्यापार 6ण्1 नए नगर आइए उन नगरों की बात करें जिनका विकास लगभग छठी शताब्दी इर्.पू.मंेऽ चचार् कीजिएण्ण्ण् यह पता कीजिए कि क्या आपके राज्य में हल से खेती, सिंचाइर्, तथा धन की रोपाइर् की जाती है? और अगर नहीं तो क्या कोइर् वैकल्िपक व्यवस्थाएँ हैं। उपमहाद्वीप के विभ्िान्न क्षेत्रों में हुआ। जैसा कि हमने पढ़ा है, इनमें सेअध्िकांश नगर महाजनपदों की राजधनियाँ थे। प्रायः सभी नगर संचारमागो± के किनारे बसे थे। पाटलिपुत्रा जैसे वुफछ नगर नदीमागर् के किनारेबसे थे। उज्जयिनी जैसे अन्य नगर भूतल मागो± के किनारे थे। इसकेअलावा पुहार जैसे नगर समुद्रतट पर थे, जहाँ से समुद्री मागर् प्रारंभ हुए।मथुरा जैसे अनेक शहर व्यावसायिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविध्ि यों के जीवंत वेंफद्र थे। 6ण्2 नगरीय जनसंख्या: संभ्रांत वगर् और श्िाल्पकार हमने पढ़ा है कि शासक वगर् और राजा किलेबंद नगरों में रहते थे। यद्यपि इनमें से अध्िकांश स्थलों पर व्यापक रूप से खुदाइर् करना संभव नहीं है, क्योंकि आज भी इन क्षेत्रों में लोग रहते हैं ;हड़प्पा शहरों से भ्िान्नद्ध। लेकिन पिफर भी यहाँ से विभ्िान्न प्रकार के पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। इनमेंउत्कृष्ट श्रेणी के मिट्टðी के कटोरे और थालियाँ मिली हैं जिन परचमकदार कलइर् चढ़ी है। इन्हें उत्तरी वृफष्ण मा£जत पात्रा कहा जाता है। संभवतः इनका उपयोग अमीर लोग किया करते होंगे। साथ ही सोने चांस्य, तउपकरण, हथ्िायार, बतर्न, सीप और पक्की मिट्टðी मिली हैं। द्वितीय शताब्दी इर्. आते - आते हमें कइर् नगरों में छोटे दानात्मक अभ्िालेख प्राप्त होते हैं। इनमें दाता के नाम के साथ - साथ प्रायः उसके व्यवसाय का भी उल्लेख होता है। इनमें नगरों में रहने वाले धेबी, चित्रा2ण्6 एक प्रतिमा की भेंट यह मथुरा से मिली एक मू£त का भाग है। इस परप्राकृत में अभ्िालेख है जिसमें कहा गया है कि एक स्वणर्कार ध्मर्क की पत्नी नागपिया ने इसे एक धामिर्क स्थल में स्थापित किया था। बुनकर, लिपिक, बढ़ाइर्, वुफम्हार, स्वणर्कार, लौहकार, अध्िकारी, धमिर्क गुरु, व्यापारी और राजाओं के बारे में विवरण लिखे होते हैं। कभी - कभी उत्पादकों और व्यापारियों के संघ का भी उल्लेख मिलता है जिन्हें श्रेणी कहा गया है। ये श्रेण्िायाँ संभवतः पहले कच्चे माल को खरीदती थींऋ पिफर उनसे सामान तैयार कर बाशार में बेच देती थीं। यह संभव है कि श्िाल्पकारों ने नगर में रहने वाले संभ्रांत लोगों की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए कइर् प्रकार के लौह उपकरणों का प्रयोग किया हो। 6ण्3 उपमहाद्वीप और उसके बाहर का व्यापार छठी शताब्दी इर्.पू. से ही उपमहाद्वीप में नदी मागो± और भूमागो± का मानो जाल बिछ गया था और कइर् दिशाओं में पैफल गया था। मध्य एश्िाया और उससे भी आगे तक भू - मागर् थे। समुद्रतट पर बने कइर् बंदरगाहों से स्रोत9 मालाबार तट ;आध्ुनिक केरलद्ध यह एक यूनानी समुद्र यात्राी द्वारा रचित पेरिप्लस आॅप़्ाफ एरीथ्िा्रयन सी का एक अंश ;लगभग प्रथम शताब्दी इर्.द्ध है। भारी मात्रा में काली मिचर् और दाल चीनी खरीदने के लिए बाशार वाले नगरों में वे ;विदेशी व्यापारीद्ध जहाश भेजते हैं। एक तो यहाँ भारी मात्रा में सिक्कों, पुखराज, सुरमा, मूँगे, कच्चे शीशे, ताँबे, टिन और सीसे का आयात किया जाता है... इन बाशारों के आसपास भारी मात्रा में उत्पन्न काली मिचर् का नियार्त किया जाता है..इसके अलावा, उच्च कोटि के मोतियों, हाथी दाँत, रेशमी वस्त्रा विभ्िान्न प्रकार के पारदशीर् पत्थरों, हीरों और काले नग और कछुए की खोपड़ी का भारी मात्रा में आयात होता है। तमिलनाडु के कोडुमनाल में बहुमूल्य और कम मूल्यवान पत्थरों से बनाए जाने वाले मूँगों के उद्योग के पुरातात्िवक साक्ष्य मिले हैं। यह संभव है कि पेरिप्लस में वण्िार्त पत्थरों को इन्हीं तटवतीर् बंदरगाहरों तक स्थानीय व्यापारी लाए होंगे। Â लेखक ने यह सूची क्यों तैयार की थी? ़जलमागर् अरब सागर से होते हुए, उत्तरी अपफीका, पश्िचम एश्िाया तक पैफल गयाऋ और बंगाल की खाड़ी से यह मागर् चीन और दक्ष्िाणपूवर् एश्िाया तक पैफल गया था। शासकों ने प्रायः इन मागो± पर नियंत्राण करने की कोश्िाश की और संभवतः वे इन मागो± पर व्यापारियों की सुरक्षा के बदले उनसे ध्न लेते थे। इन मागो± पर चलने वाले व्यापारियों में पैदल पेफरी लगाने वाले व्यापारी तथा बैलगाड़ी और घोड़े - खच्चरों जैसे जानवरों के दल के साथ चलने वाले व्यापारी होते थे। साथ ही समुद्री मागर् से भी लोग यात्रा करते थे जो खतरनाक तो थी, लेकिन बहुत लाभदायक भी होती थी। तमिल भाषा में मसत्थुवन और प्राकृत में सत्थवाह और सेट्टीòके नाम से प्रसि( सपफल व्यापारी बड़े धनी हो जाते थे। नमक, अनाज, कपड़ा, धतु और उससे नि£मत उत्पाद, पत्थर, लकड़ी, जड़ी - बूटी जैसे अनेक प्रकार के सामान एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाए जाते थे। रोमन साम्राज्य में काली मिचर्, जैसे मसालों तथा कपड़ों व जड़ी - बूटियों की भारी माँग थी। इन सभी वस्तुओं को अरब सागर के रास्ते भूमध्य क्षेत्रा तक पहुँचाया जाता था। 6ण्4 सिक्के और राजा व्यापार के लिए सिक्के के प्रचलन से विनिमय वुफछ हद तक आसान हो गया था। चाँदी और ताँबे के आहत सिक्के ;छठी शताब्दी इर्.पू.द्ध सबसे पहले ढाले गए और प्रयोग में आए। पूरे उपमहाद्वीप में खुदाइर् के दौरान इस प्रकार के सिक्के मिले हैं। मुद्राशास्ित्रायों ने इनका और अन्य सिक्कों का अध्ययन करके उनके वाण्िाज्ियक प्रयोग के संभावित क्षेत्रों का पता लगाया है। आहत सिक्के पर बने प्रतीकों को उन विशेष मौयर् वंश जैसे राजवंशों के प्रतीकों से मिलाकर पहचान करने की कोश्िाश की गइर् तो पता चला कि इन सिक्कों को राजाओं ने जारी किया था। यह भी संभव है कि व्यापारियों, ध्नपतियों और नागरिकों ने इस प्रकार के वुफछ सिक्के जारी किए हों। शासकों की प्रतिमा और नाम के साथ सबसे पहले सिक्के ¯हद - यूनानी शासकों ने जारी किए थे जिन्होंने द्वितीय शताब्दी इर्.पू. मेंउपमहाद्वीप के पूवोर्त्तर क्षेत्रा पर नियंत्राण स्थापित किया था। सोने के सिक्के सबसे पहले प्रथम शताब्दी इर्सवी में वुफषाण राजाओं ने जारी किए थे। इनके आकार और वशन तत्कालीन रोमन सम्राटों तथा इर्रान के पा£थयन शासकों द्वारा जारी सिक्कों के बिलवुफल समान थे।उत्तर और मध्य भारत के कइर् पुरास्थलों पर ऐसे सिक्के मिले हैं। सोने के सिक्कों के व्यापक प्रयोग से संकेत मिलता है कि बहुमूल्य वस्तुओं और भारी मात्रा में वस्तुओं का विनिमय किया जाता था। इसके अलावा, दक्ष्िाण भारत के अनेक पुरास्थलों से बड़ी संख्या में रोमन सिक्के मिले हैं जिनसे यह स्पष्ट है कि व्यापारिक तंत्रा राजनीतिक सीमाओं से बँधा नहीं थाऋ क्योंकि दक्ष्िाण भारत रोमन साम्राज्य के अंतगर्त न होते हुए भी व्यापारिक दृष्िट से रोमन साम्राज्य से संबंध्ित था। पंजाब और हरियाणा जैसे क्षेत्रों के यौधेय ;प्रथम शताब्दी इर्.द्ध कबायली गणराज्यों ने भी सिक्के जारी किए थे। पुराविदों को यौधेय शासकों द्वारा जारी ताँबे के सिक्के हशारों की संख्या में मिले हैं जिनसे यौध्ेयों की व्यापार में रुचि और सहभागिता परिलक्ष्िात होती है। सोने के सबसे भव्य सिक्कों में से वुफछ गुप्त शासकों ने जारी किए।इनके आरंभ्िाक सिक्कों में प्रयुक्त सोना अति उत्तम था। इन सिक्कों के माध्यम से दूर देशों से व्यापार - विनिमय करने में आसानी होती थी जिससे शासकों को भी लाभ होता था। छठी शताब्दी इर्. से सोने के सिक्के मिलने कम हो गए। क्या इससे यह संकेत मिलता है कि उस काल में वुफछ आथ्िार्क संकट पैदा हो गया था? इतिहासकारों में इसे लेकर मतभेद है। वुफछ का कहना है कि रोमन साम्राज्य के पतन के बाद दूरवतीर् व्यापार में कमी आइर् जिससे उन राज्यों, समुदायों और क्षेत्रों की संपन्नता पर असर पड़ा जिन्हें दूरवतीर् व्यापार से लाभ मिलता था। अन्य का कहना है, कि इस काल में नए नगरों और व्यापार के नवीन तंत्रों का उदय होने लगा था। उनका यह भी कहना है कि यद्यपि इस काल के सोने के सिक्कों का मिलना तो कम हो गया लेकिन अभ्िालेखों और ग्रंथों में सिक्के का उल्लेख होता रहा है। क्या इसका अथर् यह हो सकता है कि सिक्के इसलिए कम मिलते हैं क्योंकि वे प्रचलन में थे और उनका किसी ने संग्रह करके नहीं रखा था। 7ण् मूल बातें अभ्िालेखों का अथर् वैफसे निकाला जाता है? अभी तक हम अन्य बातों के अलावा अभ्िालेखों के अंशों के बारे में अध्ययन कर रहे थे। लेकिन इतिहासकारों को यह वैफसे ज्ञात होता है कि अभ्िालेखों पर क्या लिखा है? चित्रा 2ण्9 एक गुप्त सिक्का मुद्राशास्त्रा सिक्कों का अध्ययन है। इसके साथ ही उन पर पाए जाने वाले चित्रा, लिपि आदि तथा उनकी धतुओं का विश्लेषण और जिन संदभो± में इन सिक्के को पाया गया है, उनका अध्ययन भी मुद्राशास्त्रा के अंतगर्त आता है। चित्रा 2ण्7 आहत शब्द से ही स्पष्ट है कि इन सिक्कों पर प्रतीकों को आहत कर उन्हें बनाया जाता था ऽ चचार् कीजिएण्ण्ण् व्यापार में विनिमय के लिए क्या - क्या प्रयोग होता था? उल्िलख्िात स्रोतों से किस प्रकार के विनिमय का पता चलता है। क्या वुफछ विनिमय ऐसे भी हैं जिनका ज्ञान स्रोतों से नहीं हो पाता है? चित्रा2ण्11 असोक के समय की ब्राह्मी व उसके समानाथीर् देवनागरी अक्षर Â क्या वुफछ देवनागरी अक्षर ब्राह्मी से मिलते - जुलते हैं? क्या वुफछ भ्िान्न भी हैं? 7ण्1 ब्राह्मी लिपि का अध्ययन आध्ुनिक भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त लगभग सभी लिपियों का मूल ब्राह्मी लिपि है। ब्राह्मी लिपि का प्रयोग असोक के अभ्िालेखों में किया गया है। अट्टòारहवीं सदी से यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय पंडितों की सहायता से आध्ुनिक बंगाली और देवनागरी लिपि में कइर् पांडुलिपियों का अध्ययन शुरू किया और उनके अक्षरों की प्राचीन अक्षरों के नमूनों से तुलना शुरू की। आरंभ्िाक अभ्िालेखों का अध्ययन करने वाले विद्वानों ने कइर् बार यहअनुमान लगाया कि ये संस्कृत में लिखे हैं जबकि प्राचीनतम अभ्िालेखवस्तुतः प्राकृत में थे। पिफर कइर् दशकों बाद अभ्िालेख वैज्ञानिकों के अथक परिश्रम के बाद जेम्स पि्रंसेप ने असोककालीन ब्राह्मी लिपि का 1838 इर्. में अथर् निकाल लिया। 7ण्2 खरोष्ठी लिपि को वैफसे पढ़ा गया?पश्िचमोत्तर के अभ्िालेखों में प्रयुक्त खरोष्ठी लिपि के पढ़े जाने की कहानी अलग है। इस क्षेत्रा में शासन करने वाले ¯हद - यूनानी राजाओं ;लगभग द्वितीय - प्रथम शताब्दी इर्.पू.द्ध द्वारा बनवाए गए सिक्कों से जानकारी हासिल करने में आसानी हुइर् है। इन सिक्कों में राजाओं के नाम यूनानी और खरोष्ठी में लिखे गए हंै। यूनानी भाषा पढ़ने वाले यूरोपीय विद्वानों ने अक्षरों का मेल किया। उदाहरण के तौर पर, दोनों लिपियों में अपोलोडोटस का नाम लिखने में एक ही प्रतीक, मान लीजिए ‘अ’ प्रयुक्त किया गया। चूँकि पि्रंसेप ने खरोष्ठी में लिखेे अभ्िालेखों की भाषा की पहचान प्राकृत के रूप में की थी इसलिए लंबे अभ्िालेखों को पढ़ना सरल हो गया। 7ण्3 अभ्िालेखों से प्राप्त ऐतिहासिक साक्ष्य इतिहासकारों एवं अभ्िालेखशास्ित्रायों के काम करने के तरीकों का पता लगाने के लिए आइए असोक के दो अभ्िालेखों को ध्यान से पढ़ें। ध्यान देने योग्य बात है कि अभ्िालेख ;स्रोत 10द्ध में शासक असोक का नाम नहीं लिखा है। उसमें असोक द्वारा अपनाइर् गइर् उपाध्ियों का प्रयोग किया गया हैऋ जैसे कि देवानांपिय अथार्त् देवताओं का पि्रय और ‘पियदस्सी’ यानी ‘देखने में सुन्दर’। असोक नाम अन्य अभ्िालेखों में मिलता है जिसमें उनकी उपाध्ियाँ भी लिखी हैं। इन अभ्िालेखों का परीक्षण करने के बाद अभ्िालेखशास्ित्रायों ने पता लगाया कि उनके विषय, शैली, भाषा और पुरालिपिविज्ञान सबमंे समानता है, अतः वे इस निष्कषर् पर पहुँचे कि इन अभ्िालेखों को एक ही शासक ने बनवाया था। आपने यह भी देखा होगा कि असोक ने अपने अभ्िालेखों में कहा है कि उनसे पहले के शासकों ने रिपोटर् एकत्रा करने की व्यवस्था नहीं की थी। यदि असोक से पहले के उपमहाद्वीपीय इतिहास पर विचार करंे तो क्या आपको लगता है कि असोक का यह वक्तव्य सही है? इतिहासकारों को बार - बार अभ्िालेखों में लिखे कथनों का परीक्षण करना पड़ता है ताकि यह पता चल सके जो उनमें लिखा है, वह सत्य है, संभव है या पिफर अतिशयोक्ितपूणर् है। क्या आपने ध्यान दिया कि वुफछ शब्द ब्रैकेट में लिखे हैं? अभ्िालेख शास्त्राी प्रायः वाक्यों के अथर् स्पष्ट करने के लिए ऐसा करते हैं। यह बड़े ध्यान से करना पड़ता है जिससे कि लेखक का मूल अथर् बदल न जाए। इतिहासकारों को और भी परीक्षण करने पड़ते हैं। यदि राजा के आदेश यातायात मागो± के किनारे और नगरों के पास प्रावृफतिक पत्थरों पर उत्कीणर् थे, तो क्या वहाँ से आने - जाने वाले लोग उन्हें पढ़ने के लिए उस स्थान पर रुकते थे? अध्िकांश लोग प्रायः पढ़े - लिखे नहीं थे। क्या स्रोत 10 राजा के आदेश राजन् देवानांपिय पियदस्सी यह कहते हैंः अतीत में मसलों को निपटाने और नियमित रूप से सूचना एकत्रा करने की व्यवस्थएँ नहीं थीं। लेकिन मैंने निम्नलिख्िात ;व्यवस्थाद्ध की हैं। लोगों के समाचार हम तक पतिवेदक सदैव पहुँचाएँ। चाहे मैं कहीं भी हूँ, खाना खा रहा हूँ, अन्तःपुर में हूँ विश्राम कक्ष में हूँ, गोशाले में हूँ, या पिफर पालकी में मुझे ले जाया जा रहा हो अथवा वाटिका में हूँ। मैं लोगों के विषयों का निराकरण हर स्थल पर करूँगा। Â अभ्िालेखशास्ित्रायों ने पतिवेदक शब्द का अथर् संवाददाता बताया है। आध्ुनिक संवाददाता की तुलना में पतिवेदक के दायित्व कितने भ्िान्न रहे होंगे? चित्रा2ण्12 ¯हद - यूनानी शासक मेनाण्डर का एक सिक्का स्रोत11 ऽ चचार् कीजिएण्ण्ण् मानचित्रा 2 देख्िाए और असोक के अभ्िालेख के प्राप्ित स्थान की चचार् कीजिए। क्या उनमें कोइर् एक - सा प्रारूप दिखता है? पाटलिपुत्रा में प्रयुक्त प्राकृत उपमहाद्वीप में सभी स्थानों पर लोग समझतेथे? क्या राजा के आदेशों का पालन किया जाता था? इन प्रश्नों के उत्तर पाना सदैव आसान नहीं हैं। इनमें से वुफछ समस्याओं के प्रमाण हमें असोक के अभ्िालेख में मिलते हैं ;स्रोत 11द्ध जिसकी व्याख्या प्रायः असोक की वेदना के प्रतिबिंब के रूप में की जाती है। साथ ही यह यु( के प्रति उनकीमनोवृिा में परिवतर्न को भी दशार्ता है। जैसा कि हम आगे पढ़ेंगे, यदि हम अभ्िालेख के शाब्िदक अथर् के परे समझने का प्रयास करते हैं तो परिस्िथति और भी जटिल हो जाती है। यद्यपि असोक के अभ्िालेख आध्ुनिक उड़ीसा से प्राप्त हुए हैं लेकिन उनकी वेदना को परिलक्ष्िात करने वाला अभ्िालेख वहाँ नहीं मिला है अथार्त् यह अभ्िालेख उस क्षेत्रा में नहीं उपलब्ध् है जिस पर विजय प्राप्त की गइर् थी। इसका हम क्या अथर् लगाएँ? क्या राजा की नव विजय की वेदना उस क्षेत्रा के लिए इतनी ददर्नाक थी कि राजा इस मुद्दे पर वुफछ कह न सका। 8ण् अभ्िालेख साक्ष्य की सीमा अब आपको यह पता चल गया होगा कि अभ्िालेखों से प्राप्त जानकारी की भी सीमा होती है। कभी - कभी इसकी तकनीकी सीमा होती हैः अक्षरों को हलके ढंग से उत्कीणर् किया जाता है जिन्हें पढ़ पाना मुश्िकल होता है। साथ ही, अभ्िालेख नष्ट भी हो सकते हैं जिनसे अक्षर लुप्त हो जाते हैं। इसके अलावा अभ्िालेखों के शब्दों के वास्तविक अथर् के बारे में पूणर् रूप से ज्ञान हो पाना सदैव सरल नहीं होता क्योंकि वुफछ अथर् किसी विशेष स्थान या समय से संबंध्ित होते हैं। यदि आप अभ्िालेख के शोध्पत्रों को पढ़ें ;इसमें से वुफछ का उल्लेख काल रेखा 2 में किया गया हैद्ध तो आप पाएँगे कि विद्वान इनके पढ़ने की वैकल्िपक विध्ियों पर चचार् करते रहते हैं। यद्यपि कइर् हशार अभ्िालेख प्राप्त हुए हैं लेकिन सभी के अथर् नहीं निकाले जा सके हैं या प्रकाश्िात किए गए हैं या उनके अनुवाद किए गए हैं। इनके अतिरिक्त और अनेक अभ्िालेख रहे होंगे जो कालांतर में सुरक्ष्िात नहीं बचे हैं। इसलिए जो अभ्िालेख अभी उपलब्ध् हंै, वह संभवतः वुफल अभ्िालेखों के अंश मात्रा हैं। इसके अतिरिक्त एक और मौलिक समस्या है। यह शरूरी नहीं है कि जिसे हम आज राजनीतिक और आथ्िार्क रूप से महत्वपूणर् मानते हैं उन्हें अभ्िालेखों में अंकित किया ही गया हो। उदाहरण के तौर पर, खेती की दैनिक प्रियाएँ और रोशमरार् की ¯शदगी के सुख - दुख का उल्लेख अभ्िालेखों में नहीं मिलता है क्योंकि प्रायः अभ्िालेख बड़े और विशेष अवसरों का वणर्न करते हैं। इसके अलावा अभ्िालेख हमेशा उन्हीं व्यक्ितयों के विचार व्यक्त करते हैं जो उन्हें बनवाते थे। इसलिए इन अभ्िालेखों में व्यक्त विचारों की समीक्षा अन्य विचारों के परिप्रेक्ष्य में करनी होगी ताकि अपने अतीत का बेहतर ज्ञान हो सके। अथार्त् राजनीतिक और आथ्िार्क इतिहास का पूणर् ज्ञान मात्रा अभ्िालेख शास्त्रा से ही नहीं मिलता है। साथ ही इतिहासकार प्रायः प्राचीन और अवार्चीन दोनों प्रकार के प्रमाणों पर आशंका व्यक्त करते हैं। उन्नीसवीं सदी के आख्िारी दशकों में और बीसवीं सदी के प्रारंभ में इतिहासकार प्रमुख रूप से राजाओं के इतिहास में रुचि रखते थे। बीसवीं सदी के मध्य से आथ्िार्क परिवतर्न, विभ्िान्न सामाजिक समुदायों के उदय के विषय में महत्वपूणर् बन गए। हाल के दशकों में ऐसे समुदायों के प्रति इतिहासकारों की रुचि बढ़ी है जो सामाजिक हाश्िाए पर रहे हैं। इससे संभवतः प्राचीन स्रोतों पर पुनविर्चार किया जाएगा और विश्लेषण की नयी विध्ियाँ विकसित हांेगी। चित्रा2ण्13 कनार्टक से प्राप्त एक ताम्रपत्रा लेखऋ लगभग छठी शताब्दी इर्1ण् आरंभ्िाक ऐतिहासिक नगरों में श्िाल्पकला के उत्पादन के प्रमाणों की चचार् कीजिए। हड़प्पा के नगरों के प्रमाण से ये प्रमाण कितने भ्िान्न हैं? 2ण् महाजनपदों के विश्िाष्ट अभ्िालक्षणों का वणर्न कीजिए। 3ण् सामान्य लोगों के जीवन का पुन£नमार्ण इतिहासकार वैफसे करते हैं? 4ण् पांड्य सरदार ;स्रोत 3द्ध को दी जाने वाली वस्तुओं की तुलना दंगुन गाँव ;स्रोत 8द्ध की वस्तुओं से कीजिए। आपको क्या समानताएँ और असमानताएँ दिखाइर् देती हैं? 5ण् अभ्िालेखशास्ित्रायों की वुफछ समस्याओं की सूची बनाइए। 6ण् मौयर् प्रशासन के प्रमुख अभ्िालक्षणों की चचार् कीजिए। असोक के अभ्िालेखों में इनमें से कौन - कौन से तत्वों के प्रमाण मिलते हैं? 7ण् यह बीसवीं शताब्दी के एक सुविख्यात अभ्िालेखशास्त्राी, डी.सी. सरकारका वक्तव्य हैः भारतीयों के जीवन, संस्कृति, और गतिविध्ियों का ऐसा कोइर् पक्ष नहीं है जिसका प्रतिबिंब अभ्िालेखों में नहीं हैः चचार् कीजिए। 8ण् उत्तर - मौयर् काल में विकसित राजत्व के विचारों की चचार् कीजिए। 9ण् वण्िार्त काल में कृष्िा के तौर - तरीकों में किस हद तक परिवतर्न हुए? 10ण् मानचित्रा 1 और 2 की तुलना कीजिए और उन महाजनपदों की सूची बनाइए जो मौयर् साम्राज्य में शामिल रहे होंगे। क्या इस क्षेत्रा में असोक के कोइर् अभ्िालेख मिले हैं? 11ण् एक महीने के अखबार एकत्रिात कीजिए। सरकारी अध्िकारियों द्वारा सावर्जनिक कायो± के बारे में दिए गए वक्तव्यों को काटकर एकत्रिात कीजिए। समीक्षा कीजिए कि इन परियोजनाओं के लिए आवश्यक संसाध्नों के बारे में खबरों में क्या लिखा है। संसाध्नों को किस प्रकार से एकत्रा किया जाता है और परियोजनाओं का उद्देश्य क्या है। इन वक्तव्यों को कौन जारी करता है और उन्हें क्यों और वैफसे प्रसारित किया जाता है? इस अध्याय में चचिर्त अभ्िालेखों के साक्ष्यों से इनकी तुलना कीजिए। आप इनमें क्या समानताएँ और असमानताएँ पाते हैं? 12ण् आज प्रचलित पाँच विभ्िान्न नोटों और सिक्कों को इकट्टòा कीजिए। इनके दोनों ओर आप जो देखते हैं उनका वणर्न कीजिए। इन पर बने चित्रों, लिपियों और भाषाओं, माप, आकार या अन्य समानताओं और असमानताओं के बारे में एक रिपोटर् तैयार कीजिए। इस अध्याय में दश्िार्त सिक्कों मेंप्रयुक्त सामगि्रयों, तकनीकों, प्रतीकों, उनके महत्त्व और सिक्कों के संभावित कायर् की चचार् करते हुए इनकी तुलना कीजिए।

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