पुष्पी पादपों में लैंगिक प्रजनन द्रव्य में तैरती रहती है। यह तुवुर्फ आकृति, घने जीवद्रव्य और एक वेंफद्रक वाला है। 60 प्रतिशत से अध्िक आवृतबीजी पादपों के परागकण इस दो कोशीय चरण में झड़ते या संगलित होते हैं। शेष प्रजातियांे में जनन कोश्िाका सम - सूत्राी विभाजन द्वारा विभक्त होकर परागकण के झड़ने से पहले ;तीन - चरणीयद्ध दो नर युग्मकों को बनाते हैं। अनेक प्रजातियों के परागकण वुफछ लोगों में गंभीर एलजीर् एवं श्वसनी वेदना पैदा करते हैं जो कभी - कभी चिरकालिक श्वसन विकार कृ दमा, श्वसनी शोथ आदि के रूप में विकसित हो जाती है। यह बताया जा सकता है कि भारत में आयातित गेहँू के साथ आने वाली गाजर - घास या पाथेर्नियम की उपस्िथति सवर्व्यापक हो गइर् हैं, जो परागकण एलजीर् कारक है। परागकण पोषणों से भरपूर होते हैं। हाल के वषो± में आहार संपूरकों के रूप में पराग गोलियों ;टैबलेट्सद्ध के लेने का प्रचलन बढ़ा है। पश्िचमी देशों मेंऋ भारी मात्रा में पराग उत्पाद गोलियों एवं सीरप के रूप में बाजारों में उपलब्ध् हैं। पराग खपत का यह दावा है कि यह ख्िालाडि़यों एवं धावक अश्वों ;घोड़ोंद्ध की कायर्दक्षता में वृि करता है ;चित्रा 2.6द्ध। चित्रा 2ण्6 पोलन उत्पाद परागकण जब एक बार झड़ते हैं तो ये अपनी जीवनक्षमता ;अंवुफर क्षमताद्ध खोने से पहले वतिर्काग्र पर गिरते हैं जहाँ यदि आवश्यकता हुइर् तो निषेचन करते हैं। आपके विचार से परागकण मंे जीवन क्षमता कितने समय तक रहती है? कौन सा परागकण कितने समय तक जीवनक्षम रहता है, बहुत विविध्ताएँ पाइर् जाती हैं, बहुत हद तक यह विद्यमान तापमान एवं आद्रर्ता पर निभर्र करता है। वुफछ अनाजों जैसे धन एवं गेहूँ मेंऋ परागकण अपनी जीवन क्षमता बहुत जल्दी लगभग 30 मिनट में ही खो देते हैं जबकि गुलाबवत् ;रोजेसीद्ध लेग्यूमिनोसी तथा सोलैनेसी आदि वुफछ सदस्यों में परागकणों की जीवन क्षमता महीनों तक बनी रहती है। आपने शायद सुना हो कि कृत्रिाम गभार्धन के लिए मानव सहित बहुत से जानवरों के वीयर् / शुक्राणुओं का भंडारण किया जाता है। बहुत से प्रजाति के परागकणों को द्रव नाइट्रोजन ; - 1960ब्द्ध में कइर् वषो± तक भंडारित करना सम्भव है। इस प्रकार से भंडारित पराग का प्रयोग बीज भंडार ;बैंकद्ध की भाँति पराग भंडारों ;बैंकोंद्ध के रूप में पफसल प्रजनन कायर्क्रम में किया जा सकता है। जीव विज्ञान अंडप वतिर्काग्र हाइलम वतिर्का वतिर्काग्र पफनीकल बीजांड द्वार बीजांडद्वारी सिरा बाह्य आवरण अन्तः आवरण युक्तांडपी बीजांडकाय भ्रूण - कोष अंडाशय वैफलेजल सीरा यापुष्पासन निभागीय सिरा ;अद्ध ;बद्ध ;सद्ध ;दद्ध चित्रा 2ण्7 ;अद्ध गुड़हल के एक विच्छेदित पुष्प में स्त्राीकेसर का प्रदशर्न ;अन्यपुष्पीय अंग निकाले गएद्ध दशार्या गया है ;बद्ध पैपावर के बहुअंडपी, युक्तांडपी स्त्राीकेसर, ;सद्ध माइचेलिया के बहुअंडपी, वियुक्तांडपी स्त्राीकेसर ;दद्ध एक प्ररूपी प्रतीय बीजांड का चित्रात्मक दृश्य 2ण्2ण्2 स्त्राीकेसर, गुरूबीजाणुधनी ;बीजांडद्ध तथा भ्रूणकोश जायांग पुष्प के स्त्राी जनन अंग का प्रतिनिध्ित्व करता है। जायांग एक स्त्राीकेसर ;एकांडपीद्ध या बहु स्त्राीकेसर ;बहुअंडपीद्ध हो सकते हैं। जहाँ पर ये एक से अध्िक होते हैंऋ वहाँ स्त्राीकेसर आपस में संगलित ;युक्तांडपीद्ध हो सकते हैं ;चित्रा 2.7 बद्ध या पिफर वे आपस में स्वतंत्रा ;वियुक्तांडपीद्ध ;चित्रा 2.7 सद्ध। प्रत्येक स्त्राीकेसर में तीन भाग होते हैं ;चित्रा 2.7 अद्ध, वतिर्काग्र, वतिर्का, तथा अंडाशय। वतिर्काग्र, परागकणों के अवतरण मंच का काम करता है। वतिर्का एक दीघीर्कृत पतला ;इकहराद्ध भाग है जो वतिर्का के नीचे होता है। स्त्राीकेसर के आधर पर उभरा ;पूफलाद्ध हुआ भाग अंडाशय होता है। अंडाशय के अंदर एक गभार्शयी गुहा ;कोष्ठकद्ध होती है। गभार्शयी गुहा के अंदर की ओर अपरा ;नाड़द्ध स्िथत होती है। आप कक्षा 11 में पढ़ी हुइर् अपरा की परिभाषा एवं प्रकारों का स्मरण करें। अपरा से उत्पन्न होने वाली दीघर् बीजाणुधनी सामान्यतः बीजांड कहलाती है। एक अंडाशय में बीजांडों की संख्या एक ;गेहूँ, धन, आमद्ध से लेकर अनेक ;पपीता, तरबूज तथा आकिर्डद्ध तक हो सकती है। गुरूबीजाणुधनी ;बीजांडद्ध कृ आइए एक प्ररूपी आवृत्तबीजी बीजांड की ;चित्रा 2.7 दद्ध संरचना से परिचित होवें। बीजांड एक छोटी सी संरचना है जो एक वृंत या डंठल, जिसे बीजांडवृंत कहते हैं, द्वारा अपरा से जुड़ी होती है। बीजंाड की काया जीव विज्ञान उन्मील परागणी पुष्प सुनिश्िचत रूप से ;यहाँ तक कि परागण की अनुपस्िथत मेंद्ध बीज पैदा करते हैं। क्या आप सोचते हैं कि अनुन्मील्य पौधें को इससे पफायदे हैं या हानि? क्यों? ;खद्ध सजातपुष्पी परागण कृ एक ही पादप के एक पुष्प के परागकणों का दूसरे पुष्प के वतिर्काग्रों तक का स्थानांतरण है। यद्यपि सजातपुष्पी परागण ियात्मक रूप से पर परागण है जिसमें एक कारक ;एजेंटद्ध सम्िमलित होता है। सजातपुष्पी परागण लगभग स्वयुग्मन जैसा ही हैऋ क्योंकि इसमें परागकण उसी पादप से आते हैं। ;गद्ध परनिषेचनकृ इसमें भ्िान्न पादपों के पराग कोश से भ्िान्न पादपों के वतिर्काग्र तक परागकणों का स्थानांतरण होता है ;चित्रा 2.9 बद्ध। मात्रा यह ही केवल एक प्रकार का परागण है, जिसमें परागण के समय आनुवंश्िाकतः भ्िान्न प्रकार के परागकणों का आगमन होता है। परागण के अभ्िाकमर्क या कारक कृ पौध्े परागण के कारक या अभ्िाकमर्क के रूप में दो अजीवीय ;वायु एवं जलद्ध तथा एक जीवीय ;प्राण्िाद्ध कारक ;एजेंटद्ध का उपयोग कर लक्ष्य प्राप्त करते हैं। अध्िकतर पौध्े परागण के लिए जीवीय कारकों का उपयोग करते हैं। बहुत कम चित्रा 2ण्10 वायु परागित पादप संघनित पुष्पक्रम तथा स्पष्ट पौध्े अजीवीय कारकों का उपयोग करते हैं। वायु तथा जल अनावृत पुंकेसर को दशार्ते हुए। दोनों ही कारकों में परागकण का वतिर्काग्र के संपकर् में आना महज संयोगात्मक घटना है। इस प्रकार की अनिश्िचतता तथा परागकणों के ”ास से जुड़े ‘तथ्यों’ की क्षतिपूतिर् हेतु पौध्े, बीजांडों की तुलना में, असंख्य मात्रा में परागकण उत्पन्न करते हंै। अजीवीय परागण में वायु द्वारा परागण सवार्ध्िक सामान्य परागण है। इसके साथ ही वायु परागण हेतु हल्के तथा चिपचिपाहट रहित परागकणों की जरूरत होती है ताकि वे हवा के झोकों के साथ संचारित हो सवेंफ। वे अक्सर बेहतर अनावृत पुंकेसर से युक्त होते हैं ;ताकि वे आसानी से हवा के बहाव में प्रसारित हो सवेंफद्ध तथा वृहद एवं प्रायः पिच्छ वतिर्काग्र युक्त होते हैं ताकि आसानी से वायु के उड़ते परागणों को आब( किया जा सके ;चित्रा 2.10द्ध वायु परागित पुष्पों में प्रायः प्रत्येक अंडाशय में एक अकेला बीजांड तथा एक पुष्प क्रम में असंख्य पुष्प गुच्छ होतेे हैं। इसका एक जाना - पहचाना उदाहरण भुट्टा ;कोनर्वैफवद्ध हैं कृ आप जो पुंफदने ;टैसेलद्ध देखते हैं वे वुफछ और नहीं, बल्िक वतिर्काग्र और वतिर्का है जो हवा में झूमते हैं ताकि परागकणों को आसानी से पकड़ सवेंफ। घासों में वायु परागण सवर्था सामान्य है। पुष्पीपादपों में पानी द्वारा परागण कापफी दुलर्भ है। यह लगभग 30 वंशों तक सीमित है, वह भी अध्िकतर एकबीजपत्राी पौधें में। इसके विपरीत, आप स्मरण करें कि निम्नपादप समूह जैसे कृ एलगी, ब्रायोपफाइट्स तथा टेरिडोप़्ाफाइट्स आदि के नर युग्मकों वेफ़

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