पाठ परिचय 4 अपना मालवा खाउफ - उजाड़ सभ्यता मेंूप्रभाष जोशी का अपना मालवाμखाउफ - उजाडू़ सभ्यता में पाठ जनसत्ता, 1 अक्टूबर 2006 के कागद कारे स्तंभ से लिया गया है। इस पाठ में लेखक ने मालवा प्रदेश की मि‘ी, वषार्, नदियों की स्िथति, उद्गम एवं विस्तार तथा वहाँ के जनजीवन एवं संस्कृति को चित्रिात किया है। पहले के मालवा ‘मालव धरती गहन गंभीर, डग - डग रोटी पग - पग नीर’ की अब के मालवा ‘नदी नाले सूख गए, पग - पग नीर वाला मालवा सूखा हो गया’ से तुलना की है। जो मालवा अपनी सुख - समृि एवं संपन्नता के लिए विख्यात था वही अब खाऊ - उजाड़ू सभ्यता में पँफसकर उलझ गया है। यहखाऊ - उजाड़ू सभ्यता यूरोप और अमेरिका की देन है जिसके कारण विकास की औद्योगिक सभ्यता उजाड़ की अपसभ्यता बन गइर् है। इससे पूरी दुनिया प्रभावित हुइर् है, पयार्वरण बिगड़ा है। लेखक की पयार्वरण संबंधी ¯चता सिपर्फ मालवा तक सीमित न होकऱसावर्भौमिक हो गइर् है। अमेरिका की खाऊ - उजाड़ू जीवन प(ति ने दुनिया को इतना प्रभावित किया है कि हम अपनी जीवन प(ति, संस्कृति, सभ्यता तथा अपनी धरती को उजाड़ने में लगे हुए हैं। इस बहाने लेखक नेखाऊ - उजाड़ू जीवन प(ति के द्वारा पयार्वरणीय विनाश की पूरी तसवीर खींची है जिससे मालवा भी नहीं बच सका है। आधुनिक औद्योगिक विकास ने हमें अपनी जड़ - शमीन से अलग कर दिया है। सही मायनों में हम उजड़ रहे हैं। इस पाठ के माध्यम से लेखक ने पयार्वरणीय सरोकारों को आम जनता से जोड़ दिया है तथा पयार्वरण के प्रति लोगों को सचेत किया है। प्रभाष जोशी अपना मालवाखाऊ - उजाड़ू सभ्यता में उगते सूरज की निथरी कोमल धूप राजस्थान में रह गइर्। मालवा लगा तो आसमान बादलों से छाया हुआ था। काले भूरे बादल। थोड़ी देर में लगने लगा कि चैमासा अभी गया नहीं है। जहाँ - जहाँ भी पानी भरा हुआ रह सकता था लबालब भरा हुआ था, मटमैला बरसाती पानी। जितने भी छोटे - मोटे नदी - नाले दिखरहे थे, सब बह रहे थे। इससे श्यादा पानी अब यह धरती सोख के रख नहीं सकती थी। ऊपर से बादल कि कभी भी बरस सकते थे। नवरात्रिा की पहली सुबह थी। मालवा में घट - स्थापना की तैयारी। गोबर से घर - आँगन लीपने और मानाजी के ओटले को रंगोली से सजाने की सुबह। बहू - बेटियों के नहाने - धोने और सजकर त्योहार मनाने में लगने की घड़ी। लेकिन आसमान तो घउँफ - घउँफ कर रहा था। रास्ते में छोटे स्टेशनों पर महिलाओं की ही भीड़ थी। मैं, उजली - चटक धूप, लहलहाती ज्वारμबाजरे और सोयाबीन की पफसलें, पीले पूफलोंवाली पैफलती बेलें और दमकते घर - आँगन देखने आया था। लेकिन लग रहा था कि पानी तो गिर के रहेगा। ऐसा नहीं कि नवरात्रिा में पानी गिरते न देखा हो। क्वांर मालवा में मानसून के जाने का महीना होता है। कभी थोड़ा पहले भी चला जाता है। इस बार तो जाते हुए भी जमे रहने की धास दे रहा है। ंैनागदा स्टेशन पर मीणा जी बिना चीनी की चाय पिलाते हैं। सारे शरूरी समाचार भी देते हैं। गइर् रात क्वालालंपुर में भारत के हारने से दुःखी थे। पूछने पर ही मौसम और खेती पर आए, फ्हाँ, अबकी पानी भोत गिर्यो। किसान वैफ कि हमारी सोयाबीन की पफसल तो गली गइर्। पण अब गेहँू - चना अच्छा होयगा।य् सार में उनने कहा और दुकान में लग गए। चाय और भजिया उनने अच्छा बनवा के दिया था। हम मियाँ - बीवी मशे में खाते - पीते उज्जैन पहुँच गए। रास्ते में श्िाप्रा मिली। मैया ऐसी भरपूर और बहती हुइर् तो बरसों में दिखी थी। गए महीने टीवी पर लाइन पढ़ी थी कि उज्जैन में श्िाप्रा का पानी घरों में घुस गया। भोपाल, इंदौर, धार, देवास सब में झड़ी लगी थी। सब जगह प़्ाफोन लगा के पूछा था। खतरा कहीं न था, लेकिन सब को पुराने दिन याद आ गए थे। अब मालवा में वैसा पानी नहीं गिरता जैसा गिरा करता था। इसलिए पहले का औसत पानी भी गिरे तो लोगों को लगता है कि श्यादा गिर गया। इस बार भी बरसात वही चालीस इंच गिरी है। कहींश्यादा है कहीं थोड़ी कम। लेकिन लोग टीवी की समझ में अिा की बोलने लगे हैं। उज्जैन से देवास होते हुए इंदौर जाना मालवा के आँगन में से निकलना है। क्वांर की धूप होती तो भरी - पूरी गदराइर् हरियाली से तबीयत झक हो जाती, लेकिन वुफएँ - बावड़ी और तालाब - तलैया के लबालब भरे, नदी - नालों को बहते और पफसलों को लहराते देखो तो क्या गशब की विपुलता की आश्वस्ित मिलती है! खूब मनाओ दसेरा - दिवाली। अबकी मालवो खूब पाक्यो हे। इंदौर उतरते ही गाड़ी में सामान रखते दव्वा को कहा कि अपने को सब नदियाँ, सारे तालाब, सारे ताल - तलैया और जलाशय देखने हैं। सब पहाड़ चढ़ने हैं। उसने मुसवुफराते हुए कहाμयहीं से? नी यार पेले माता बिठायंगा। माता तो बैठ गइर्, आरती भी हो गइर् ताउफजी, एक बजनेवाला है।बाद में पाया कि उमर भी अब सत्तर की हो जाएगी। पहाड़ चढ़े नहीं जाएँगे। नदी - नाले पार नहीं होंगे। सूखती सुनहरी घास बुलाएगी लेकिन उस पर लेटकर रड़का नहीं जा सकेगा। मन से तो किशोर हो सकते हो। शरीर पिफर वैसा पुफतीर्ला, लचीला और गवीर्ला नहीं हो सकता। उमर जो ले गइर् उसे ले जाने दो। उसका जो है, रखे। अपना जो है उसे जिएँ। इस त्रासदायी प्रतीति के बावजूद दो जगहों से नमर्दा देखी। ओंकारेश्वर में उस पार से। सामने सीमेंट वंफक्रीट का विशाल राक्षसी बाँध् उस पर बनाया जा रहा है। शायद इसीलिए वह चिढ़ती और तिनतिन - पिफनपिफन करती बह रही थी। मटमैली, कहीं छिछली अपने तल के पत्थर दिखाती, कहीं गहरी अथाह। वे बड़ी - बड़ी नावें वहाँ नहीं थीं। शायद पूर में बहने से बचाकर कहीं रख दी गइर् थीं। किनारों पर टूटे पत्थर पड़े थे। ज्योतिलि± ग का तीथर् धम वह नहीं लग रहा था। निमार्ण में लगी बड़ी - बड़ी मशीनें और गुरार्ते ट्रक थे। वहीं थोड़ी देर क्वांर की चिलचिलाती ध्ूप मिली, लेकिन नमर्दा के बार - बार पूर आने के निशान चारों तरपफ थे। बावजूद इतने बाँधें के नमर्दा में अब भी खूब पानी़और गति है। नेमावर के पास बजवाड़ा में नमर्दा शांत, गंभीर और भरी - पूरी थी। शाम हो जाने पर भी जैसे अपने अंदर के मंदे उजाले से गमक रही थी। चवथ का चाँद उस पर लटका हुआ था। मि‘ी की उँफची कगार पर पेड़ों के बीच बैठे हुए हम चुपचाप उसे प्रणाम कर रहे थे। भेन जी ने जैसे उसे सहलाते हुए कहाμथक गइर् है। देखना अब रात को बहेगी। रातभर हम उसके किनारे ही सोए। सबेरे उठकर पिफर जैसे उसके नमन में उसके किनारे बैठे। अब वह शांत बह रही थी। अपन घाट नीचे नमर्दा किनारे के लोग। भेन जी गंगा किनारे की। हम नदी को नदी नहीं माँ मानते हैं। नमर्दा मैया है। उससे हम बने हैं। उसके किनारे बैठना माँ की गोद में डूबना है। ओंकारेश्वर और नेमावर जाते हुए दोनों बार ¯वध्य के घाट उतरने पड़े। एक तरपफ सिमरोल का़घाट, दूसरी तरपफ बिजवाड़। दोनों में सागौन के जंगल। पत्ते खाँखरे होते हुए, पिफर भी पुफनगियों पऱपूफल के झल्ले। सिमरोल के बीच से चोरल खूब बहती हुइर् मिली। बिजवाड़ में हर नाला बह रहा था। हर पहाड़ी नदी की रपट पर पानी था। बचपन में पितृपक्ष और नवरात्रिा पर ऐसा ही पानी मिलता था। सारे नदी, नाले ऐसे ही कलमल करते जीवित हो उठते थे। पहाड़ों के सीने में कितने स्रोत हैं। सब बहें तो नीचे की काली मि‘ी खूब उमगकर पफल - पूफल और अन्न देती है। नेमावर के रास्ते पर ही केवड़ेश्वर है जहाँ से श्िाप्रा निकलती है। कालिदास की श्िाप्रा। बहुत बड़ी नदी नहीं है। लेकिन उज्जैन में महाकाल के पाँव पखारे तो पवित्रा हो गइर्। चंबल ¯वध्य के जानापाव पवर्त से निकली और निमाड़, मालवा, बुंदेलखंड, ग्वालियर होती हुइर् इटावा के पास जमना में मिली। चंबल को हमने घाटा बिलोद में देखा। कापफी पानी था। खूब बह रही थी। उसमें नहाते लड़वेफ़को गवर् था कि यहाँ छोटी दिखती हो तो क्या! हमारी चंबल से गंगा ही बस बड़ी है। आगे बहुतबड़ा बाँध है। खूब पानी है। इस बार गाँधी सागर के सब पफाटक खोलने पड़े। इत्ता पानी भरा। गंभीर इतनी बड़ी नहीं है। लेकिन हालोद के आगे यशवंत सागर को इस बार पिफर उसने इतना भर दिया कि पच्चीसों साइप़्ाफन चलाने पड़े। सड़सठ साल में तीसरी बार ऐसा हुआ। पावर्ती और काली¯सध ने पिफर रास्ता रोका। दो दिन उनके पुल पर से पानी बहता रहा। इस बार मालवा के पठार की सब नदियों में पूर आइर्। उसके पास से बहनेवाली नमर्दा में भी खूब पानी आया। बरसों बाद हशारों सालकी कहावत सच्ची हुइर्μमालव धरती गहन गंभीर, डग - डग रोटी, पग - पग नीर। दक्ष्िाण से उत्तर कीओर ढलानवाले इस पठार की सभी नदियों के दशर्न हुए। खूब पानी, खूब बहाव और खूब कृपा। नदी का सदानीरा रहना जीवन के स्रोत का सदा जीवित रहना है। नदियों के बाद नंबर था तालाबों का। हमारे आज के इंजीनियर समझते हैं कि वे पानी का प्रबंध जानते हैं और पहले शमाने के लोग वुफछ नहीं जानते थे क्योंकि ज्ञान तो पश्िचम के रिनेसां के बाद ही आया न! मालवा में विक्रमादित्य और भोज और मुंज रिनेसां के बहुत पहले हो गए। वे और मालवा के सब राजा जानते थे कि इस पठार पर पानी को रोक के रखना होगा। सबने तालाब बनवाए, बड़ी - बड़ी बावडि़याँ बनवाईं ताकि बरसात का पानी रुका रहे और धरती के गभर् के पानी को जीवंत रख सवेंफ। हमारे आज के नियोजकों और इंजीनियरों ने तालाबों को गाद से भर जाने दिया और शमीन के पानी को पाताल से भी निकाल लिया। नदी - नाले सूख गए। पग - पग नीरवाला मालवा सूखा हो गया। लेकिन इस बार बिलावली भर गया है। पीपल्या पाला भर गया है। सिरपुर में लबालब पानी है और यशवंत सागर के सभी साइपफन तो चले ही थे, पिफर भी इंदौर की खान और सरस्वती़नदियों में उतना पानी नहीं है जितने में कभी मैं नहाया हूँ और नाव पर सैर की है। हाथीपाला का नाम इसलिए है कि कभी वहाँ की नदी को पार करने के लिए हाथी पर बैठना पड़ता था। चंद्रभागा पुल के नीचे उतना पानी रहा करता था जितना महाराष्ट्र की चंद्रभागा नदी में। इंदौर के बीच से निकलने और मिलनेवाली ये नदियाँ कभी उसे हरा - भरा और गुलशार रखती थीं। आज वे सड़े नालों में बदल दी गइर् हैं। श्िाप्रा, चंबल, गंभीर, पावर्ती, काली¯सध्, चोरल सबके यही हाल हो रहे हैं। ये सदानीरा नदियाँ अब मालवा के गालों के आँसू भी नहीं बहा सकतीं। चैमासे में चलती हैं। बाकी के महीनों में बस्ितयों के नालों का पानी ढोती हैं। नदियों ने सभ्यताओं को जन्म दिया। हमारी आज की सभ्यता इन नदियों को अपने गंदे पानी के नाले बना रही है। इस साल मालवा में सामान्य बारिश ;35 इंचद्ध से पाँच ही इंच श्यादा पानी गिरा है और इतने में ही नदी, नाले, तालाब, बावडि़याँ और वुफएँ चैतन्य हो गए हैं। अपने पहले अखबार ‘नयी दुनिया’ की लाइब्रेरी में अब भी पानी के सन् 1878 से रेकाडर् मौजूद हैं। 128 साल की यह जानकारी ही आँख खोलने के लिए कापफी है कि इनमें एक ही साल़था, 1899 का, जब मालवा में सिपर्फ 15.75 इंच पानी गिरा था। लोक में यही छप्पन का काल है।़लेकिन राजस्थान के ठेठ मारवाड़ से तब भी लोग यहीं आए थे और कहते हैं कि तब भी खाने और पीने को कापफी था। इन 128 सालों में एक ही साल अतिवृष्िट का था। सन् 1973 में 77 इंच़पानी गिरा था। तब भी यशवंत सागर, बिलावली, सिरपुर और पीपल्या पाला टूटकर बहे नहीं थे। 28 इंच से कम बारिश हो तो वह सूखे का साल होता है। लेकिन ऐसे साल श्यादा नहीं हैं। छप्पन के काल ने देशभर में हाय - हाय मचाइर् हो लेकिन मालवा में लोग न प्यासे मरे न भूखे क्योंकि उसके पहले के साल खूब पानी था और बाद के साल में भी। अपने नदी, नाले, तालाब सँभाल के रखो तो दुष्काल का साल मशे में निकल जाता है। लेकिन हम जिसे विकास की औद्योगिक सभ्यता कहते हैं वह उजाड़ की अपसभ्यता है। ‘नयी दुनिया’ की ही लाइब्रेरी में कमलेश सेन और अशोक जोशी ने धरती के वातावरण को गरम़करनेवाली इस खाऊ - उजाडू़ सभ्यता की जो कतरनें निकाल रखी हैं वे बताने को कापफी हैं कि मालव धरती गहन गंभीर क्यों नहीं है और क्यों यहाँ डग - डग रोटी और पग - पग नीर नहीं है। क्यों हमारे समुद्रों का पानी गरम हो रहा है? क्यों हमारी धरती के ध््रुवों पर जमी बरप़्ाफ पिघल रही है? क्यों हमारे मौसमों का चक्र बिगड़ रहा है? क्यों लद्दाख में बरपफ के बजाय पानी गिरा और क्यों बाड़मेर में गाँव डूब गए?़क्यों यूरोप और अमेरिका में इतनी गरमी पड़ रही है? क्योंकि वातावरण को गरम करनेवाली काबर्न डाइआॅक्साइड गैसों ने मिलकर धरती के तापमान को तीन डिग्री सेल्िसयस बढ़ा दिया है। ये गैसें सबसे श्यादा अमेरिका और पिफर यूरोप के विकसित देशों से निकलती हैं। अमेरिका इन्हें रोकने को तैयार नहीं है। वह नहीं मानता कि धरती के वातावरण के गरम होने से सब गड़बड़ी हो रही है। अमेरिका कीघोषणा है कि वह अपनी खाऊ - उजाड़ू जीवन प(ति पर कोइर् समझौता नहीं करेगा। लेकिन हम अपने मालवा की गहन गंभीर और पग - पग नीर की डग - डग रोटी देनेवाली धरती को उजाड़ने में लगे हुए हैं। हम अपनी जीवन प(ति को क्या समझते हैं! प्रश्न - अभ्यास 1.मालवा में जब सब जगह बरसात की झड़ी लगी रहती है तब मालवा के जनजीवन पर इसका क्या असर पड़ता है? 2.अब मालवा में वैसा पानी नहीं गिरता जैसा गिरा करता था। उसके क्या कारण हैं? 3.हमारे आज के इंजीनियर ऐसा क्यों समझते हैं कि वे पानी का प्रबंध जानते हैं और पहले शमाने के लोग वुफछ नहीं जानते थे? 4.‘मालवा में विक्रमादित्य और भोज और मुंज रिनेसां के बहुत पहले हो गए।’ पानी के रखरखाव के लिए उन्होंने क्या प्रबंध किए? 5.‘हमारी आज की सभ्यता इन नदियों को अपने गंदे पानी के नाले बना रही है।’ क्यों और वैफसे? 6.लेखक को क्यों लगता है कि ‘हम जिसे विकास की औद्योगिक सभ्यता कहते हैं वह उजाड़ की अपसभ्यता है’? आप क्या मानते हैं? 7.धरती का वातावरण गरम क्यों हो रहा है? इसमें यूरोप और अमेरिका की क्या भूमिका है? टिप्पणी कीजिए। योग्यता - विस्तार 1.क्या आपको भी पयार्वरण की ¯चता है? अगर है तो किस प्रकार? अपने शब्दों में लिख्िाए। 2.विकास की औद्योगिक सभ्यता उजाड़ की अपसभ्यता है। खाऊ - उजाड़ू सभ्यता के संदभर् में हो रहे पयार्वरण के विनाश पर प्रकाश डालिए। 3.पयार्वरण को विनाश से बचाने के लिए आप क्या कर सकते हैं? उसे वैफसे बचाया जा सकता है? अपने विचार लिख्िाए। शब्दाथर् और टिप्पणी निथरी - पैफली, चमकीली चैमासा - बारिश के चार महीने ओटले - मुख्यद्वार घउँफ - घउँफ - बादलों के गरजने की आवाश पानी भोत गिरयो - पानी बहुत गिरा, बरसात बहुत हुइर् पफसल तो गली गइर् - पफसल पानी में डूब गइर् और सड़ - गल गइर् पण - परंतु उनने - उन्होंने अिा - बढ़ा - चढ़ाकर, अतिशयोक्ित में मालव धरती गहन गंभीर, - मालवा की धरती गहन गंभीर है जहाँ डगर - डगर पर रोटी डग - डग रोटी, पग - पग नीर और पग - पग पर पानी मिलता है। यानी मालवाकी धरती खूब समृ( है पश्िचम के रिनेसां - पश्िचम का पुनजार्गरण काल विपुलता की आश्वस्ित - संपन्नता, समृि का आश्वासन अबकी मालवो खूब पाक्यो है - अबकी मालवा खूब समृ( है। यानी इतनी बरसात हुइर्है कि पफसलें हरी - भरी हो गइर् हैं पेले माता बिठायंगा - पहले माता की मूतिर् स्थापित करूँगा रड़का - लुढ़का मंदे उजाले से गमक रही थी - हलके प्रकाश में सुगंिात हो रही थी चवथ का चाँद - चतुथीर् का चाँद छप्पन का काल - 1899 का भीषण अकाल दुष्काल का साल - बुरा समय, अकाल पूर - बाढ़ गाद - झाग, वूफड़ा - कचरा कलमल करना - सँकरे रास्ते से पानी बहने की आवाशलेखक परिचय प्रेमचंद का जन्म वाराणसी िाले के लमही ग्राम में हुआ था। उनका मूल नाम धनपतराय था। पे्रमचंद की प्रारंभ्िाक श्िाक्षा वाराणसी में हुइर्। मैटिªक के बाद वे अध्यापन करने लगे। स्वाध्याय के रूप में ही उन्होंने बी.ए. तक श्िाक्षा ग्रहण की। असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंनेसरकारी नौकरी से त्यागपत्रा दे दिया और पूरी तरह लेखन - कायर् के प्रति समपिर्त हो गए। प्रेमचंद ने अपने लेखन की शुरुआत पहले उदूर् में नवाबरायके नाम से की, बाद में ¯हदी में लिखने लगे। उन्होंने अपने साहित्य में किसानों, दलितों, नारियों की वेदना और वणर् - व्यवस्था की वुफरीतियों का मा£मक चित्राण किया है। वे साहित्य कोस्वांतःसुखाय न मानकर सामाजिक परिवतर्न का एक सशक्त माध्यम मानते थे। वे एक ऐसे साहित्यकार थे, जो समाज की वास्तविक स्िथति को पैनी दृष्िट से देखने की शक्ित रखते थे। उन्होंने समाज - सुधार और राष्ट्रीय - भावना से ओतप्रोत अनेकउपन्यासों एवं कहानियों की रचना की। कथा - संगठन, चरित्रा - चित्राण, कथोपकथन आदि की दृष्िट से उनकी रचनाएँ बेजोड़ हैं। उनकी भाषा सजीव, मुहावरेदार और बोलचाल के निकट है। ¯हदी भाषाको लोकपि्रय बनाने में उनका विशेष योगदान है। संस्कृत के प्रचलित शब्दों के साथ - साथ उदूर् की रवानी इसकी विशेषता है, जिसने ¯हदी कथा - भाषा को नया आयाम दिया।उनकी प्रमुख वृफतियाँ हैंμमानसरोवर ;आठ भागद्ध, गुप्तधन ;दो भागद्ध ;कहानी संग्रहद्धऋ निमर्ला, सेवासदन, पे्रमाश्रम, रंगभूमि, कमर्भूमि, गबन, गोदान ;उपन्यासद्धऋ कबर्ला, संग्राम, प्रेम की वेदी ;नाटकद्धऋ विविध प्रसंग ;तीन खंडों मंे, साहित्ियक औरराजनीतिक निबंधों का संग्रहद्धऋ वुफछ विचार ;साहित्ियक निबंधद्ध। उन्होंने माधुरी, हंस, मयार्दा, जागरण आदि पत्रिाकाओं का संपादन भी किया। संजीव का जन्म ग्राम बांगरकलाँ, िाला सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ। उन्होंने बी.एससी. तक श्िाक्षा प्राप्त की। समकालीन कहानी लेखन के क्षेत्रा में संजीव एक प्रमुख नाम हैं। उनकी कहानियाँ अिाकतर ‘हंस’ में प्रकाश्िात हुइर् हैं। उनके प्रमुख कहानी संग्रह हैंμतीस साल का सपफरनामा,़आप यहाँ हैं, भूमिका और अन्य कहानियाँ, दुनिया की सबसे हसीन औरत, प्रेत - मुक्ित आदि। इन्होंने एक किशोर - उपन्यास रानी की सराय लिखा। उनके वुफछ महत्त्वपूणर् उपन्यास हμंै किशनगढ़ का अहेरी, सवर्फस, जंगल जहाँ शुरू होता है, सावधान! नीचे आग है, धार, सूत्राधार आदि। संजीव की कहानियों और उपन्यासों में आंचलिक भाषा का प्रभाव दिखाइर् देता है। उनकी भाषा में एक ऐसी रवानगी है जो पाठक को बाँध्कर रखती है। शब्दों का सटीक प्रयोग संजीव की भाषा की अपनी पहचान है। संप्रति हंस पत्रिाका में कायर्कारी संपादक हैं। लेखक परिचय लेखक परिचय विश्वनाथ त्रिापाठी का जन्म बिस्कोहर गाँव, िाला बस्ती ;सि(ाथर्नगरद्ध, उत्तर प्रदेश में हुआ। उनकी प्रारंभ्िाक श्िाक्षा गाँव में हुइर्। तत्पश्चात् बलरामपुर कस्बे में आगे की श्िाक्षा प्राप्त की। उच्च श्िाक्षा के लिए वे पहले कानपुर और बाद में वाराणसी गए। उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से पीएच.डी. की उपािा प्राप्त की। शुरू में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कालेज में अध्यापन कायर् किया और पिफर दिल्ली विश्वविद्यालय के मुख्य परिसर में अध्यापन कायर् से जुड़े रहे। यहीं सेसेवानिवृत्त होकर स्वतंत्रा लेखन कर रहे है। उनकी रचनाओं में प्रारंभ्िाक अवधी, ¯हदी आलोचना, ¯हदी साहित्य का संक्ष्िाप्त इतिहास, लोकवादी तुलसीदास, मीरा का काव्य, देश के इस दौर में, वुफछ कहानियाँμवुफछ विचार प्रमुख आलोचना और इतिहास संबंध्ी ग्रंथ हैं। पेड़ का हाथ, जैसा कह सका प्रमुख कविता - संग्रह हैं। उन्होंने आरंभ में आचायर् हजारी प्रसाद द्विवेदी के साथ अद्दहमाण ;अब्दुल रहमानद्ध के अपंभ्रश काव्य संदेश रासक का संपादन किया तथा कविताएँ 1963, कविताएँ 1964, कविताएँ 1965 अजित वुफमार के साथ व ¯हदी के प्रहरी रामविलास शमार् अरुण प्रकाश के साथ संपादित की। हाल ही में उनकी एक और पुस्तक व्योमकेश दरवेश प्रकाश्िात हुइर् है जो हिंदी के सुप्रसि( आलोचक एवं साहित्यकार आचायर् हजारी प्रसाद द्विवेदी पर वेंफदि्रत है। उनको गोवुफलचंद्र शुक्ल आलोचना पुरस्कार, डाॅरामविलास शमार् सम्मान, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, ¯हदी अकादमी, दिल्ली के साहित्यकार सम्मान आदि से सम्मानित किया गया। में की और उनसे पत्राकारिता के संस्कार लिए। इंडियन एक्सप्रेस के अहमदाबाद, चंडीगढ़ संस्करणों का संपादन, प्रजापति का संपादन और सवोर्दय संदेश में संपादन सहयोग किया। 1983 में उनके संपादन में जनसत्ता अखबार निकला जिसने ¯हदी पत्राकारिता को नयी उँफचाइयाँ दीं। गांधी, विनोबा और जयप्रकाश के आदशो± में यकीन रखने वाले प्रभाष जी ने जनसत्ता को सामाजिक सरोकारों से जोड़ा। वे जनसत्ता में नियमित स्तंभ भी लिखा करते थे। कागद कारे नाम से उनके लेखों का संग्रह प्रकाश्िात है। सन् 2005 में जनसत्ता में लिखे लेखों, संपादकीयों का चयन ¯हदू होने का धमर् शीषर्क से प्रकाश्िात हुए हैं। प्रभाष जी में मालवा की मिट्टी के संस्कार गहरे तक बसे थे और वे इसी से ताकत पाते थे। देशज भाषा के शब्दों को मुख्यधारा में लाकर उन्होंने ¯हदी पत्राकारिता को एक नया तेवर दिया और उसे अनुवाद की वृफत्रिाम भाषा की जगह बोलचाल की भाषा के करीब लाने का प्रयास किया। प्रभाष जी ने पत्राकारिता में खेल, सिनेमा, संगीत, साहित्य जैसे गैर पारंपरिक विषयों पर गंभीर लेखन की नींव डाली। वि्रफकेट, टेनिस हो या वुफमार गंधवर् का गायन, इन विषयों पर उनका लेखन ममर्स्पशीर् है। लेखक परिचय टिप्पणी टिप्पणी

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