पाठ परिचय 3 बिस्कोहर की माटी प्रस्तुत पाठ बिस्कोहर की माटी विश्वनाथ त्रिापाठी की आत्मकथा नंगातलाइर् का गाँव का एक अंश है। आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया यह पाठ अपनी अभ्िाव्यंजना में अत्यंत रोचक और पठनीय है। लेखक ने उम्र के कइर् पड़ावपार करने के बाद अपने जीवन में माँ, गाँव और आसपास के प्राकृतिक परिवेश का वणर्न करते हुए ग्रामीण जीवन शैली, लोक कथाओं, लोक मान्यताओं को पाठक तक पहुँचाने की कोश्िाश की है।गाँव, शहर की तरह सुविधायुक्त नहीं होते, बल्िक प्रकृति पर अिाकनिभर्र रहते हैं। इस निभर्रता का दूसरा पक्ष प्राकृतिक सौंदयर् भी है जिसे लेखक़ने बड़े मनोयोग से जिया और प्रस्तुत किया है। एक तरपफ प्राकृतिक संपदा के रूप में अकाल के वक्त खाइर् जाने वाली कमल ककड़ी का वणर्न है तो दूसरी़ओर प्राकृतिक विपदा बाढ़ से बदहाल गाँव की तकलीपफों का िाक्र है। कमल, कोइयाँ, हर¯सगार के साथ - साथ तोरी, लौकी, ¯भडी, भटकटैया, इमली, कदंबआदि के पूफलों का वणर्न कर लेखक ने ग्रामीण प्राकृतिक सुषमा और संपदा को दिखाया है तो डोड़हा, मजगिदवा, धामिन, गोंहुअन, घोर कड़ाइच आदि साँपों, बिच्छुओं आदि के वणर्न द्वारा भयमिश्रित वातावरण का भी निमार्ण कियाहै। ग्रामीण जीवन में शहरी दवाइयों की जगह प्रकृति से प्राप्त पूफल, पिायों के प्रयोग भी आम हैं जिसे लेखक ने रेखांकित किया है। पूरी कथा के वेंफद्र में है बिस्कोहर जो लेखक का गाँव है और एक पात्रा ‘बिसनाथ’ जो लेखक स्वयं ;विश्वनाथद्ध है। गरमी, वषार् और शरद )तु में गाँव में होने वाली दिक्कतों का भी लेखक के मन पर प्रभाव पड़ा है जिसका उल्लेख इस रचना में भी दिखाइर् पड़ता है। दस वषर् की उम्र में करीब दस वषर् बड़ी स्त्राी को देखकर मन में उठे - बसे भावों, संवेगों के अमिट प्रभाव व उसकी मा£मक प्रस्तुति के बीच संवादों की यथावत् आंचलिक प्रस्तुति अनुभव की सत्यता और नैस£गकता की द्योतक है। पूरी रचना में लेखक ने अपने देखे - भोगेयथाथर् को प्राकृतिक सौंदयर् के साथ प्रस्तुत किया है। लेखक की शैली अपने आप में अनूठी और बिलवुफल नयी है। विश्वनाथ त्रिापाठी बिस्कोहर की माटी पूरब टोले के पोखर में कमल पूफलते। भोज मंे ¯हदुओं के यहाँ भोजन कमल - पत्रा पर परोसा जाता। कमल - पत्रा को पुरइन कहते। कमल वेेेफ नाल का भसीण कहत। आसपास कोइर् बड़ा कमल - तालाब थाμलेंवडी का ताल। अकाल पड़ने पर लोग उसमें से भसीण ;कमल - ककड़ीद्ध खोदकर बड़े - बड़े खाँचों में सर पर लादकर खाने के लिए ले जाते। कमल - ककड़ी को सामान्यतः अभी भी गाँव में नहीं खाया जाता। कमल का बीज कमल ग‘ा शरूर खाया जाता है। कमल से कहीं श्यादा बहार कोइयाँ की थी। कोइयाँ वही जलपुष्प है जिसे वुफमुद कहते हैं। इसे कोका - बेली भी कहते हैं। शरद में जहाँ भी गइा और उसमें पानी होता है, कोइयाँ पूफल उठती हैं। रेलवे - लाइन के दोनों ओर प्रायः गइों में पानी भरा रहता है। आप उत्तर भारत में इसे प्रायः सवर्त्रा पाएँगे। बिसनाथ बहुत दिनों समझते थे कि कोइयाँ सिपर्फ हमारे यहाँ का पूफल है। एक बार वैष्णो देवी दशर्नाथर् गए। देखा यह पंजाब में़भी रेलवे - लाइन के दोनों तरपफ ख्िाला थाμअनवरत, निरंतर। शरद की चाँदनी में सरोवरों में चाँदनी़का प्रति¯बब और ख्िाली हुइर् कोइयाँ की पिायाँ एक हो जाती हैं। इसकी गंध को जो पसंद करता है वही जानता है कि वह क्या है! इन्हीं दिनों तालाबों में ¯सघाड़ा आता है। ¯सघाड़े के भी पूफल होते हैंμउजले और उनमें गंध भी होती है। बिसनाथ को ¯सघाड़े के पूफलों से भरे हुए तालाब से गंध के साथ एक हलकी सी आवाश भी सुनाइर् देती थी। वे घूम - घूमकर तालाबों से आती हुइर् वह गंधमिश्रित आवाश सुनते। ¯सघाड़ा जब बतिया ;छोटाद्ध दूिाया होता है तब उसमें वह गंध भी होती है। और शरद में ही हर¯सगार पूफलता है। पितर - पक्ख ;पितृपक्षद्ध में मालिन दाइर् घर के दरवाशे पर हर¯सगार की राश्िा रख जाती थीं। रख जाती थीं, तो खड़ी बोली हुइर्। गाँव की बोली में ‘वुफरइ जात रहीं।’ बहुत ढेर सारे पूफल मानो इकऋे ही अनायास उनसे गिर पड़ते थे। ‘वुफरइ देना’ है तो सकमर्क लेकिन सहजता अकमर्क की है। गाँव में ज्ञात - अज्ञात वनस्पतियों, जल के विविध रूपों और मि‘ी के अनेक वणो± - आकारों का एक ऐसा समस्त वातावरण था जो सजीव था। बिसनाथ आदि बच्चे उसे छूते, पहचानते, उससे बतियाते थे। सभी चीशें प्रत्येक चीश में थीं और प्रत्येक सबमें। आकाश भी अपने गाँव का ही एक टोला लगता। चंदा मामा थे। उसमें एक बुढि़या थी। जो बच्चों की दादी की सहेली थी। माँ आँचल में छिपाकर दूध पिलाती थी। बच्चे का माँ का दूध पीना सिपर्फ दूध पीना नहीं माँ से़बच्चे के सारे संबंधों का जीवन - चरित होता है। बच्चा सुबुकता है, रोता है, माँ को मारता है, माँ भी कभी - कभी मारती है, बच्चा चिपटा रहता है, माँ चिपटाए रहती है, बच्चा माँ के पेट का स्पशर्, गंध भोगता रहता है, पेट में अपनी जगह जैसे ढूँढ़ता रहता है। बिसनाथ ने एक बार शोर से काट लिया। माँ ने शोर से थप्पड़ मारा पिफर पास में बैठी नाउन से कहाμदाँत निकाले है, टीसत है। बच्चे दाँत निकालते हैं तब हर चीश को दाँत से यों ही काटते हैं, वही टीसना है। चाँदनी रात में खटिया पर लेटी माँ बच्चे को दूध पिला रही है। बच्चा दूध ही नहीं, चाँदनी भी पी रहा है, चाँदनी भी माँ जैसी ही पुलक - स्नेह - ममता दे रही है। माँ के अंक से लिपटकर माँ का दूध पीना, जड़ के चेतन होने यानी मानव - जन्म लेने की साथर्कता है। पशु - माताएँ भी यह सुख देती - पाती होंगी। और पक्षी - अंडज! यह बिसनाथ ने बहुत बाद में देखा - समझा। दिलशाद गाडर्न के डियर पावर्फ में तब बत्तखें होती थीं। बत्तख अंडा देने को होती तो पानी छोड़कर शमीन पर आ जाती। इसके लिए एक सुरक्ष्िात काँटेदार बाड़ा था। देखाμएक बत्तख कइर् अंडों को से रही है। पंख पुुफलाए उन्हें छिपाए हैμदुनियासे बचाए है। एक कौवा थोड़ी दूर ताक में। बत्तख की चोंच सख्त होती है। अंडों की खोल नाशुक। वुंडेफछ अबत्तख - माँ के डैनों से बाहर छिटक जाते। बत्तख उन्हें चोंच से इतनी सतवर्फता, कोमलता से डैनों के अंदर पिफर छुपा लेती थी कि बस आप देखते रहिए, वुफछ कह नहीं ेे ेसकतμइस‘सस, सारद’ भी नहीं बयान कर सकते। और माँ की निगाह कौवे की ताक पर भी थी। कभी - कभी वह अंडों को बड़ी सतवर्फता से उलटती - पलटती भी। किसने दी बिसनाथ की माँ और बत्तख की माँ को इतनी ममता? जैसे पानी बहता है, हवाचलती है, वैसे ही माँ में बच्चे की ममता - प्रकृति में ही सब वुफछ है। जड़ चेतन में रूपांतरित होकर क्या - क्या अंतरबाह्य गढ़ता है, लीलाचारी होता है! गुरुवर हशारीप्रसाद द्विवेदी प्रायः कहते हैंμ फ्क्या यह सब बिना किसी प्रयोजन के है? बिना किसी उद्देश्य के है?य् होगा कोइर् महान निहित उद्देश्य, प्रयोजन! लेकिन अभी तो ‘बुश - ब्लेयर’ ने इराक पफतह कियाहै। कहाँ माँ का बच्चे को दूध पिलाना कहाँ बत्तख का अंडा सेना! बिसनाथ पर अत्याचार हो गया। जब वह दूध पीनेवाले ही थे कि छोटा भाइर् आ गया। बिसनाथ दूध कटहा हो गए। उनका दूध कट गया। माँ के दूध पर छोटे भाइर् का कब्शा हो गया। छोटा भाइर् हुमक - हुमककर अम्माँ का दूध पीता और बिसनाथ गाय का बेस्वाद दूध। कसेरिन दाइर् पड़ोस में रहती थीं। बिसनाथ को उन्होंने ही पाला - पोसा। सूइर् की डोरी से बनी हुइर् कथरी सुजनी कहलाती है। सापफ - सफ्ऱ़पफाक सुजनी पर कसेरिन दाइर् के साथ लेटे तीन बरस के बिसनाथ चाँद को देखते रहते।़लगता है उसे हाथ से छू रहे हैं, उसे खा रहे हैं, उससे बातें कर रहे हैं। वह धुक - धुक करके चलता रहता। बादल में छिप जाता, पिफर उसमें से निकल आता। इमली के छतनार पेड़ के अंतरालों से छनकर चाँदनी के कितने टुकड़े बिखरते। शीशम की पुफनगी को चाँदनी वैफसे चूमती! पूफलों की बात हो रही थीμकमल, कोइयाँ, हर¯सगार की। लेकिन ये तो पूफल हैं और पूफल कहे जाते हैं। ऐसे कितने पूफल थे जिनकी चचार् पूफलों के रूप में नहीं होती, और हैं वे असली पूफलμतोरी, लौकी, ¯भडी, भटकटैया, इमली, अमरूद, कदंब, बैंगन, कोंहड़ा ;काशीपफलद्ध, शरीपफा, आम वेफ़बौर, कटहल, बेल ;बेला, चमेली, जूहीवाला बेला नहींद्ध, अरहर, उड़द, चना, मसूर, मटर के पूफल,सेमल के पूफल। कदम ;कदंबद्ध के पूफलों से पेड़ लदबदा जाता। कृष्ण जी उसी पर झूलते थेμ‘झूला पड़ा कदम की डाली,’ ‘नंदक नंद कदंबक तरुतर’। क्या कदंब और भी देशों मंे होता है? मुझे तो लगता है कदंब का दुनियाभर में एक ही पेड़ हैμबिस्कोहर के पच्छूँ टोला में ताल के पास। सरसों के पूफल का पीला सागर लहराता हुआ। खेतों में तेलμतेल की गंध, जैसे हवा उसमें अनेक रूपों में तैर रही हो। सरसों के अनवरत पूफल - खेत सौंदयर् को कितना पावन बना देते हैं। बिसनाथ के गाँव में एक पफल और बहुत इप़्ाफरात होता थाμउसे भरभंडा कहते थे, उसे ही शायद सत्यानाशी कहते हैं। नाम चाहे जैसा हो सुंदरता में उसका कोइर् जवाब नहीं। पूफल पीली तितली जैसा, आँखें आने पर माँ उसका दूध आँख में लगातीं और दूबों के अनेक वणीर् छोटे - छोटे पूफलμबचपन मंे इन सबको चखा है, सूँघा है, कानों में खोसा है। और देख्िाएμधान, गेहूँ, जौ के भी पूफल होते हैंμशीरे की शक्ल मेंμभु‘े का पूफल, धान के खेत और भु‘े की गंध जो नहीं जानता उसे क्या कौन समझाए! पूफल ख्िाले, ख्िाले पूफल धान पूफल, कोदो पूफल वुफटकी पूफल ख्िाले। पूफल ख्िाले, ख्िाले पूफल गोभी पूफल, परवल पूफल करेला, लौकी, खेक्सा मिचीर् पूफल ख्िाले। पूफल ख्िाले, ख्िाले पूफल खीरा पूफल, तोरइर् पूफल महुआ पूफल ख्िाले। ऐसी हो बारिश खूब पूफल ख्िालें। μ नवल शुक्ल घास पात से भरे मेड़ों पर, मैदानों में, तालाब के भीटों पर नाना प्रकार के साँप मिलते थे। साँप से डर तो लगता था लेकिन वे प्रायः मिलते - दिखते थे। डोंड़हा और मजगिदवा विषहीन थे। डोंड़हा को मारा नहीं जाता। उसे साँपों में वामन जाति का मानते थे। धामिन भी विषहीन है लेकिन वह लंबी होती है, मुँह से वुफश पकड़कर पूँछ से मार दे तो अंग सड़ जाए। सबसे खतरनाक गोंहुअन जिसे हमारे गाँव में ‘पेंफटारा’ कहते थे और उतना ही खतरनाक ‘घोर कड़ाइच’ जिसके काट लेने पर आदमी घोड़े की तरह हिनहिनाकर मरे। पिफर भटिहाμजिसके दो मुँह होते हैं। आम, पीपल, केवड़े की झाड़ी में रहनेवाले साँप बहुत खतरनाक। अजीब बात है साँपों से भय भी लगता था और हर जगह अवचेतन में डर से ही सही उनकी प्रतीक्षा भी करते थे। छोटे - छोटे पौधों के बीच में सरसराते हुए साँप को देखना भी भयानक रस हो सकता है। इसी तरह बिच्छू! साँप के काटे लोग बहुत कम बचते थे। बिच्छू काटने से ददर् बहुत होता था, कोइर् मरता नहीं था। पूफलों की गंधों से साँप, महामारी, देवी, चुड़ैल आदि का संबंध जोड़ाजाता था। गुड़हल का पूफल देवी का पूफल था। नीम के पूफल और पत्ते चेचक में रोगी के पास रख दिए जाते। पूफल बेर के भी होते हैं और उनकी गंध वन्य, मादक होती है। बसंत में पूफल आते हैं। बेर का पूफल सूँघकर बरेर् ततैया का डंक झड़ जाता है। तब उन्हें हाथ से पकड़ लेते, उन्हंे जेब में भर लेते। उनकी कमर मंे धागा बाँधकर लड़ाते। खूब गरमी चिलचिलाती पड़ती। घर में सबको सोुेे े, दता पाकर चपवफ सनिकल जातुपहरिया का नाच देखते। गरमी में कभी - कभी लू लगने की घटनाएँ सुनाइर् पड़तीं। माँ लू से बचने के लिए धोती या कमीश से गाँठ लगाकर प्याश बाँध देतीं। लू लगने की दवा थी कच्चे आम का पन्ना। भूनकर गुड़ या चीनी में उसका शरबत पीना, देह में लेपना, नहाना। कच्चे आम को भून या उबालकर उससे सिर धोते थे। कच्चे आमों के झौंर के झौंर पेड़ पर लगे देखना, कच्चे आम की हरी गंध, पकने से पहले ही जामुन खाना, तोड़नाμयह गरमी की बहार थी। कटहल गरमी का पफल और तरकारी भी है। वषार् ऐसे सीधे एकाएक नहीं आती थी। पहले बादल घ्िारतेμगड़गड़ाहट होती। पूरा आकाश बादलों से ऐसा घ्िार जाता कि दिन में रात हो जाती। ‘चढ़ा असाढ़ गगन घन गाजा, घन घमंड गरजतघन घोरा और वंफपित - जगम - नीड़ बिहंगम।’ वषार् ऐसी ट्टतु है जिसमें संगीत सबसे श्यादा होता है, तबला, मृदंग और सितार का। जोश ने लिखा हैμ‘बजा रहा है सितार पानी’ और वषार् ऐसे नहींμआती हुइर् दिखलाइर् पड़ती थी। मेरे घर की छत सेμजैसे घोड़ों की कतार दूर से दौड़ी हुइर् चली आ रही होμऔर पास, और पास अब नदी पर बरसा, अब डेगहर पर, अब बड़की बगिया पर, अब पड़ोस घर में टप टप टप, आँधी चले तो टीन छप्पर उड़े। कइर् दिन लगातार बरसे तो दीवार गिरे, घरधँसकेμबढि़या आवे। भीषण गरमी के बाद बरसात में पुलकित वुफत्ते, बकरी, मुगीर् - मुगेर्μभौं भौं, में में, चूँ चूँ करते मगन बेमतलब इधर - उधर भागें, थ्िारवेंफ। पहली वषार् में नहाने से दाद - खाज, पफोड़ा - पुँफसी ठीक हो जाते हैंμलेकिन मछलियाँ कभी - कभी उबस के माँजा ;पेफनद्ध लगने से भी मर जाती हैंμराजा दशरथ राम के बिरह में ऐसे व्यावुफल ‘माँजा मनहु मीन कहँ व्यापा।’ जोंक, वेंफचुआ, ग्वालिन - जुगनू, अगनिहवा, बोका, करकच्ची, गोंजर आदि, मच्छर, डाँसा आदि कीड़े - मकोड़ों की बहुतायतμभूमि जीव संवुफल रहे, ¯कतु नाना प्रकार के दूबों, वनस्पतियों की नव - हरित आभा की लहरों का क्या कहनाμधोए - धोए पातन की बात ही निराली है! पिफर गंदगी कीचड़, बदबू की लदर - पदर। बाढ़ आवे, सिवान - खेत - खलिहान पानी से भर जाए तो दिसा - मैदान की भारी तकलीपफ। जलावन की लकड़ी पहले न इक़ऋा कर ली तो गीली लकड़ी, गीले वंफडे से घर धुएँ से भर जाए। बरसात के बाद बिस्कोहर की धरती, सिवान, आकाश, दिशाएँ, तालाब, बूढ़ी राप्ती नदी निखर उठते थे। धान के पौधे झूमने लगते थे, भु‘े, चरी, सनइर् के पौधे, करेले, खीरे, कांकर, ¯भडी, तोरी के पौधे, पिफर लताएँ। शरद में पूफल - तालाब में शैवाल ;सेवारद्ध उसमंे नीला जलμआकाश का प्रति¯बबμनीले जल के कारण तालाब का जल अगाध लगता। स्नान करने से आत्मीय शीतलता और विशु(ता की अनुभूतिμतालाबों का नीला प्रसन्न जलμबिसनाथ को लगता अभी इसमें से कोइर् देवी - देवता प्रकट होगा। खेतों में पानी देने के लिए छोटी - छोटी नालियाँ बनाइर् जातीं, उसे ‘बरहा’ कहते थे, उसमें से जल सुरीला शब्द करता हुआ, शाही शान से बहता जैसे चाँदी की धारा रेंग रही हो, उस पर सूयर् की किरणें पड़तीं। ़जाड़े की धूप और चैत की चाँदनी में श्यादा पफवर्फ नहीं होता। बरसात की भीगी चाँदनी चमकती तो नहीं लेकिन मधुर और शोभा के भार से दबी श्यादा होती है। वैसे ही बिस्कोहर की वह औरत। पहली बार उसे बढ़नी में एक रिश्तेदार के यहाँ देखा। बिसनाथ की उमर उससे काप़्ाफी कम हैμताज्जुब नहीं दस बरस कम हो, बिसनाथ दस से श्यादा के नहीं थे। देखा तो लगा चाँदनी रात में, बरसात की चाँदनी रात में जूही की खुशबू आ रही है। बिस्कोहर में उन दिनों बिसनाथ संतोषी भइया के घर बहुत जाते थे। उनके आँगन में जूही लगी थी। उसकी खुशबू प्राणों में बसी रहती थी। यों भी चाँदनी में सप़्ोफद पूफल ऐसे लगते हैं मानो पेड़ों, लताओं पर चाँदनी ही पूफल के रूप में दिखाइर् पड़ रही हो। चाँदनी भीप्रकृति, पूफल भी प्रकृति और खुशबू भी प्रकृति। वह औरत बिसनाथ को औरत के रूप में नहीं, जूहीकी लता बन गइर् चाँदनी के रूप में लगी, जिसके पूफलों की खुशबू आ रही थी। प्रकृति सजीव नारी बन गइर् थी और बिसनाथ उसमें आकाश, चाँदनी, सुगंिा सब देख रहे थे। वह बहुत दूर की चीश इतने नशदीक आ गइर् थी। सौंदयर् क्या होता है, तदाकार परिणति क्या होती है? जीवन की साथर्कता क्या होती हैऋ यह सब बाद में सुना, समझा, सीखा सब उसी के संदभर् में। वह नारी मिली भीμबिसनाथ आजीवन उससे शरमाते रहे। उसकी शादी बिस्कोहर में ही हुइर्। कइर् बार मिलने के बाद बहुत हिम्मत बाँधने के बाद उस नारी से अपनी भावना व्यक्त करने के लिए कहा, फ्जे तुम्हैं पाइ जाइ ते जरूरै बौराय जाइय्μजो तुम्हें पा जाएगा वह शरूर ही पागल हो जाएगा। फ्जाइ देव बिसनाथ बाबू, उनसे तौ हमार कब्बों ठीक से भेंटौ नाहीं भइर्।य् बिसनाथ मान ही नहीं सकते कि बिस्कोहर से अच्छा कोइर् गाँव हो सकता है और बिस्कोहर से श्यादा सुंदर कहीं की औरत हो सकती है। बिसनाथ को अपनी माँ के पेट का रंग हल्दी मिलाकर बनाइर् गइर् पूड़ी का रंग लगताμगंध दूध की। पिता के वुफतेर् को शरूर सूँघते। उसमें पसीने की बू बहुत अच्छी लगती। नारी शरीर से उन्हें बिस्कोहर की ही पफसलों, वनस्पतियों की उत्कट गंध आती है। तालाब की चिकनी मि‘ी की गंध गेहूँ, भु‘ा, खीरा की गंध या पुआल की होती है...। पूफले हुए नीम की गंध को नारी - शरीर या शृंगार से कभी नहीं जोड़ सकते। वह गंध मादक, गंभीर और असीमित की ओर ले जानेवाली होती है। संगीत, गंध, बच्चेμबिसनाथ के लिए सबसे बड़े सेतु हैं काल, इतिहास को पार करने के। बड़े गुलाम अली खाँ साहब ने एक पहाड़ी ठुमरी गाइर् हैμअब तो आओ साजनμसुनें अकेले में या याद करें इस ठुमरी को तो रुलाइर् आती है और वही औरत इसमें व्यावुफल नशर आती है। अप्राप्ित की कितनी और वैफसी प्राप्ितयाँ होती हैं! वह सपेफद रंग की साड़ी पहने रहती है। घने काले केश सँवारे हुए हैं। आँखों में़पता नहीं वैफसी आद्रर् व्यथा है। वह सिपर्फ इंतशार करती है। संगीत, नृत्य, मूतिर्, कविता, स्थापत्य,़चित्रा गरज कि हर कला रूप के आस्वाद में वह मौजूद है। बिसनाथ के लिए हर दुःख - सुख से जोड़ने की सेतु है। इस स्मृति के साथ मृत्यु का बोध अजीब तौर पर जुड़ा हुआ है। ‘नंगातलाइर् का गाँव’ आत्मकथा का अंश प्रश्न - अभ्यास 1.कोइयाँ किसे कहते हैं? उसकी विशेषताएँ बताइए। 2.‘बच्चे का माँ का दूध पीना सिपर्फ दूध पीना नहीं, माँ से बच्चे के सारे संबंधों का जीवन - चरित होता़है’μटिप्पणी कीजिए। 3.बिसनाथ पर क्या अत्याचार हो गया? 4.गरमी और लू से बचने के उपायों का विवरण दीजिए। क्या आप भी उन उपायों से परिचित हैं? 5.लेखक बिसनाथ ने किन आधारों पर अपनी माँ की तुलना बत्तख से की है? 6.बिस्कोहर में हुइर् बरसात का जो वणर्न बिसनाथ ने किया है उसे अपने शब्दों में लिख्िाए। 7.‘पूफल केवल गंध ही नहीं देते दवा भी करते हैं’, वैफसे? 8.‘प्रकृति सजीव नारी बन गइर्’μइस कथन के संदभर् में लेखक की प्रकृति, नारी और सौंदयर् संबंधी मान्यताएँ स्पष्ट कीजिए। 9.ऐसी कौन सी स्मृति है जिसके साथ लेखक को मृत्यु का बोध अजीब तौर से जुड़ा मिलता है? योग्यता - विस्तार 1.पाठ में आए पूफलों के नाम, साँपों के नाम छाँटिए और उनके रूप, रंग, विशेषताओं के बारे में लिख्िाए। 2.इस पाठ से गाँव के बारे में आपको क्या - क्या जानकारियाँ मिलीं? लिख्िाए। 3.वतर्मान समय - समाज में माताएँ नवजात श्िाशु को दूध नहीं पिलाना चाहतीं। आपके विचार से माँ और बच्चे पर इसका क्या प्रभाव पड़ रहा है? शब्दाथर् और टिप्पणी भसीण - कमलनाल, कमल का तना वुफमुद - जलपुष्प, वुफइयाँ, कोकाबेली ¯सघाड़ा - जलपफल, वफाँटेदार पफल जो पानी में होता है बतिया - पफल का अविकसित रूप प्रयोजन - उद्देश्य कथरी - बिछौना साप़्ाफ - सफ्रप़्ाफाक - साप़्ाफ और स्वच्छ इप़्ाफरात - अिाकता भीटों - टीले, ढूह बरहा - खेतों की ¯सचाइर् के लिए बनाइर् गइर् नाली सुबुकना - धीमे स्वर में रोना आँख आना - गरमियों के मौसम में आँख का रोग होना थ्िारकना - नाचना अगाध - भरपूर आद्रर् - नमी

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