पाठ परिचय2 आरोहण पवर्तारोहण अब पाठ्चयार् का अंश बन गया है। यह श्िाक्षा के पाठ्यक्रमों में स्थान पा चुका है। इसकी पढ़ाइर् - लिखाइर् कर लोग जीविकोपाजर्न से जुड़ रहे हैं। गरमियों के दिनों में स्वूफलों, कालेजों, विश्वविद्यालयों से लोग पवर्तारोहण के लिए पवर्तीय प्रदेशों की यात्रा करते हैं। प्रायः पवर्तीय प्रदेश के रहनेवाले ही इसके लिए कोच का काम करते हैं। वे बेहतर तरीके से गाइड कर सकते हैं क्योंकि पवर्तारोहण उनकी दिनचयार् है। पवर्तारोहण के क्षेत्रा में बछेंद्री पाल और संतोष यादव का नाम इतिहास में दजर् हो चुका है। ‘आरोहण’ कहानी में लेखक ने पवर्तारोहण की शरूरत और वतर्मान समय में उसवफी उपयोगिता को रेखांकित किया है। पवर्तीय प्रदेश के रहनेवालों केजीवन संघषर् तथा प्राकृतिक परिवेश से उनके संबंधों को चित्रिात किया है। किसतरह पवर्तीय प्रदेशों में प्राकृतिक आपदा, भूस्खलन, पत्थरों के ख्िासकने से पूरा जीवन तथा समाज नष्ट हो जाता है, आरोहण उसका जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है। आरोहण पहाड़ी लोगों की जीवनचयार् का भाग है, ¯कतु उन्हें आश्चयर् तब होता है जब यह पता चलता है कि वही आरोहण किसी को नौकरी भी दिला सकता है। इस कहानी के माध्यम से लेखक ने पवर्तीय प्रदेश की बारीकियों, उनके जीवन के सूक्ष्म अनुभवों, परंपराओं, रीति - रिवाजों, उनके संघषो±, यातनाओं को संजीदगी के साथ रचा है। मैदानी इलाकों की तुलना में पवर्तीय प्रदेशों की ¯शदगी कितनी कठिन, जटिल, दुखद और संघषर्मय होती है, उसका विशद विवरण यह कहानी प्रस्तुत करती है। संजीव की भाषा शैली रोचक है। आंचलिक शब्दों, वाक्यों और पवर्तीय प्रदेश की बोलियों के जो शब्द एवं मुहावरे इस पाठ में आए हैं वे कथानक को बाँधने में सपफल हुए हैं। पाठक का ध्यान भी उन्ही प्रसंगों की ओर बार - बार जाता है, जिनमें लोकभाषा प्रमुख है। कहानी में ये शब्द संरचनात्मक भूमिका में हैं, इनसे कहानी को पढ़ने - समझने में मदद मिलती है। गाँव की ओर उठ गइर्...पूरे ग्यारह साल बाद लौट रहा था वह अपने गाँव माही। एक अजीब किस्म की लाज, अपनत्व और झिझक उसे घेरने लगी थी। कोइर् उससे पूछे कि वह इत्ते साल कहाँ रहा या कि इत्ते सालों बाद लौटकर आया ही क्यों, तो वह क्या जवाब देगा! कोइर् खतों - किताबत भी नहीं। पता नहीं कौन कहाँ हो, कौन कहाँ! ग्यारह साल कम भी तो नहीं होते। एक दिक्कत और थी। ग्यारह साल बाद भी कोइर् मुकम्िमल सड़क न बन पाइर् थी माही के लिए। अकेले जाना होता, तो अपने गाँव के लिए क्या सड़क और क्या पगडंडी! मगर साथ कोइर् आरोहण ध्13 और हो तो सोचना पड़ता है कि अगला क्या सोचेगा! पिफर साथ वाला भी कोइर् ऐसा - वैसा नहीं, शेखर कपूर था। एक तो उसके गाॅड पफादर कपूर साहब का लड़का, दूसरे आइर्.ए.एस. टेªनी! अब़ऐसे खासमखास मेहमान को पैदल पाँव अपने गाँव लिवा जाना अपनी और अपने गाँव की तौहीन कराना ही तो हुआ न! शेखर अपने बाइनोक्यूलर से पहाड़ों और घाटियों को देखने में रमा हुआ था, मगर रूप...? आँखें बंद करके भी वह पंद्रह किलोमीटर और ग्यारह साल की दूरी से देख सकता था अपने गाँव को। यह दीगर बात थी कि उसके और माही के बीच अभी कइर् पहाड़, कइर् नदियाँ और कइर् घाटियाँ थीं। उसने अपने सामने किसी विशाल डायनासाॅर की तरह पसरे पहाड़ को देखा। पिफर उसके पीछे की शदर् परतों को, जिन पर बादल और धुंध की पफपूँफदियाँ जड़ी हुइर् थीं। उसके हिसाब से अभी वह छह हशार प़़्ाफीट की उँफचाइर् पर था और यहाँ से पंद्रह किलोमीटर चलकर दस हशार पफीट की उँफचाइर् पर पहुँचना था उसे। उसने कलाइर् पर बँधी अपनी इंपोटेर्ड घड़ी पर नशर गड़ाइर्। अभी सुबह के दस बजे थे। मगर पैदल चलना हो, तो शाम तो होनी ही होनी है। चाय का गिलास थामते हुए उसने आसपास एक उड़ती - सी नशर डाली और चायवाले से पूछा, फ्यहाँ कोइर् घोड़ा - वोड़ा नहीं मिलता क्या?य् फ्आप कने जाणा छावाँ ;आपको कहाँ जाना हैद्ध?य् फ्माही! सरगी से पहले का गाँव!य़्चायवाला अपना सिर खुजलाने लगा। पिफर जैसे खुद से दरियाफ्रत करने लगा, फ्“याँ से डाक बँगला और मशरूम सेंटर तक तो जाते हैं, लेकिन माही...!य् तभी जैसे वुफछ याद आया उसे। उसने आगे बढ़कर गुमसुम - से बैठे नौ - दस साल के एक लड़के को पुकारा, फ्ओय महीप - {! तूइर् वकी जाणा छू ;तू वहाँ जाएगाद्ध? अरे माही।य् लड़के ने, जो किसी बुशुगर् की तरह पत्थर की सीढि़यों पर अकेला बैठा हुआ था, अपनी उदासीन - सी गरदन पेफरी, मगर वुफछ बोला नहीं। उड़े हुए नीले रंग की पहाड़ी पतलून और सलेटी स्वेटर में समेटी अपनी तमाम गंभीरता के बावजूद अपने सुंदर गोरे चेहरे की मासूमियत को अभी झटक नहीं पाया था वह। फ्ये जा सकेगा भला?य् शेखर ने अपना संदेह प्रकट किया। फ्जाएगा साब! वैफसे नहीं जाएगा? यहाँ सवारियाँ मिलतीइर् कहाँ हंै! आप लोग चले गए, तो बैठ के मक्खीइर् तो मारणा है। घाट बटी झगड़ा करी के पइसा कमाणा के वास्तेइर् तो आइर् छों।य् चायवाले का अनुमान सही था। लड़का वहाँ से चुपचाप उठकर चला गया, मगर थोड़ी ही देर में दो घोड़ों के साथ चढ़ाइर् चढ़ता हुआ आता दिखा। मेहनताना चायवाले ने ही तय कर दिया थाμदो घोड़ों के सौ रुपये। 14 ध् अंतराल चल पड़े वेμएक घोड़े पर शेखर, दूसरे पर रूप। महीप शेखर वाले घोड़े के साथ आगे - आगे पैदल चल रहा था। पहले पहाड़ तक रास्ता ठीक - ठाक था, मगर उससे उतरते ही धूप का उजला चंदोव जहाँ - तहाँ दरकने लगा था। धूप की सुनहरी प‘ियों के बीच छाया की स्याह प‘ियाँ, मानो धारीदार खालोंवाला वह विशाल जानवर बैठकर पगुरा रहा था। पता नहीं, कौन किसका पैबंद था, उजाला अँधेरे का या अँधेरा उजाले का? चढ़ाइयाँ और ढलानें! बीच - बीच में जहाँ - तहाँ उगे छोटे - छोटे घरौंदे, जैसे मशरूम सेंटर केवुफवुफरमुत्तों की पफसल दूर तक छिटक गइर् हो। सामने के पहाड़ों पर बादलों के पँख लग गए थे, जो झर - झरकर उनके अगल - बगल उड़ रहे थे। नीचे घास, लताएँ और पेड़ों की कहीं पफीकी, तो कहीं चटक हरियाली समेटे पहाड़ कहीं कच्चे, कहीं पक्के! नीचे कोइर् नदी बह रही थी, शायद सूपिन! शाप की मारी अभागिन सूपिन! घाटी से किसी अदृश्य नारी - वंफठ का कोइर् गीत उमड़ रहा था, पतला ददीर्ला सुरμ फ्उँफची - नीची डांडियों मा, हे वुफहेड़ी ना लाग तूँμ{{{!य् वे पहाड़ के नीचे नदी के बगल के पथरीले रास्ते पर चले जा रहे थे। घोड़ों के खुरों सेखट - खट, खरर् - खरर् के अस्पुफट ताल के ऊपर पैफलता - सा वह गीत, जैसे कोइर् रंग पसर रहा हो धीरे - धीरे! फ्उँफचे - नीचे पाँखों मा, हे घसेरी ना जाय तूँ {{{?य् गीत जैसे जीवन और मृत्यु, इस लोक और उस लोक से परे किसी अलग ही अमूतर् लोक से उड़ रहा था। फ्उँफची - नीची डांडियों मा हे हिलांस ना बास तूँ {{{!य् फ्इसका मतलब क्या हुआ यार?य् शेखर ने पीछे मुड़कर रूप से सवाल किया। फ्मतलब? मतलब...वुफहरे से सवाल कर रही है, कोइर् घास गढ़नेवाली पहाड़ी लड़की कि ए वुफहरे, उँफची - नीची पहाडि़यों में तुम न लगो जाकर। इस पर वुफहरा घासवाली लड़की से कहता है कि उँफची - नीची पहाडि़यों में तू न जाया कर। इसी तरह वह हिलांस नाम के परिंदे को भी आगाह करता है कि उँफची - नीची पहाडि़यों में अपना बसेरा न बनाया करे।य् फ्मगर तेरी आवाश भरार् क्यों गइर् बताते - बताते?य् शेखर ने पीछे मुड़कर ताका। फ्यह एक ददर् की टेर है, शेखर साहब...! आपने वो गीत सुना होगा, बहोत पुराना गीत...छुप गया कोइर् रे दूर से पुकार के...य् आरोहण ध्15 फ्ददर् अनोखे हाय दे गया प्यार के!य् शेखर ने गीत पूरा किया। फ्हाँ! वही! ये ठीक है कि मैंने कोइर् बसेरा नहीं बनाया यहाँ, उड़ गया, मगर बाबा और भूप दादा ने तो...वुफहासे का होना क्या मायने रखता है इन पहाड़ों में, इसे तो कोइर् पहाड़ी ही समझ सकता है। रिश्ते तक धुँधला जाते हैं साहब। नेह के नाते तक नशर नहीं आते। पास में कोइर् अपना खड़ा है और उसे आप देख तक नहीं पाते, पहचान तक नहीं पाते।य् थोड़ी देर तक कोइर् वुफछ न बोला। सिवाय खुरों की आवाशों और गीत की धीमी पड़ती लय के, जिसकी हिलकोरों में अग - जग डूब - उतरा रहा था, सारी ध्वनियाँ सो गइर् थीं। वुफछ देर बाद अचानक चलते - चलते ठमक गया रूप, फ्यहीं इसी जगह मैंने धकेला था भूप दादा को।य् फ्धकेला था....? क्यों?य् शेखर भी रुक गया। फ्वो, मंै भाग गया था घर से देववंुफड। भूप दादा मुझे खोजते हुए आए और मैं पकड़ा गया। कहीं मैं पिफर भाग न जाउँफ, सो लौटते वक्त मेरी कलाइर् पकड़ रखी थी उन्होंने। उनसे छुटकारा पाने को मुझे वुफछ न सूझा, तो मैंने धक्का दे दिया उन्हेंμयहाँ, इसी जगह! वे सँभल न सके, पिफसल गए। मेरा हाथ उनके हाथ में था सो मैं भी ¯खच गया। इस ढलान पर हम दोनों ही लुढ़कने लगे। नीचे एक पेड़ था। अब नहीं है, उसने जैसे थाम लिया हम दोनों को। पेड़ के इस तरपफ भूप, उस तरप़़फ मैं, झूलने लगे हम दोनों, बीच में थे हमारे हाथ। बहो{{{त सख्त जान थे भूप दादा। बहो{{{ मशबूतपकड़ थी उनकी, मगर वे ऊपर से जितनी सख्त जान थे, अंदर से उतने ही नरम। उन्होंने समझा कि वे यूँ ही अपनी गप़्ाफलत से पिफसले थे, खुद को कसूरवार भी समझ रहे थे कि अगर उन्होंनेमेरा हाथ छोड़ रखा होता, तो शायद मैं गिरने से बच जाता। खैर, जैसे - तैसे हमें खींचकर ऊपर ले आए और हाथ छोड़ दिया। ‘ज्यादा चोट तो नहीं लगी, भुइला?’ उन्होंने अनुतप्त भाव से पूछा। वे खीझभरी हँसी हँस रहेथे और मेरे बदन को परख रहे थे। पत्ते निचोड़कर उन्होंने मेरी और अपनी खरोंचों पर लगाया। ये दाग अभी भी रह गए हैं।य् रूप ने बाँहों की ओर इशारा किया, फ्उन्होंने उस दिन से जो हाथ छोड़ा कि पिफर नहीं पकड़ा!य् महीप रुककर उन्हें देखता रहा, मगर उसने घोड़ों को हाँका नहीं। रूप ने खुद ही एड़ लगाइर्, तो चल पड़ा घोड़ा, फ्बाप रे, ओह वैफसे चढ़ी थी चढ़ाइर् हमने उस दिन, क्या बताएँ! पूरे आधे घंटेलग गए हमें ऊपर आने में।य् फ्अगर उस वक्त राॅक क्लाइं¯बग जानते होते, तो इतनी मुश्िकल न आती।य् बच्चे की तरह बोलउठा था शेखर। फ्वो सारी ट्रे¯नग तो आपके पापा की मेहरबानी है। मैं आज जितनी ऊँचाइर् तक जा सका हूँ, उस सबका...मगर उनसे मुलाकात तो इस वाकये के सालभर बाद हुइर्।य् 16 ध् अंतराल फ्अच्छा मान लो, आज तुम्हें इस पर चढ़ना होता, तो वैफसे चढ़ते?य् रूप ने एक उस्तादाना उड़ती हुइर् नशर से पीछे मुड़कर देखा, पिफर कहा, फ्पहले आप बताइए, देखें कितना जान पाए हैं आप!य् पवर्तारोहण का प्रसंग छिड़ जाने के बाद न रूप को बाकी किसी चीश की सुिा रह जाती थी, न शेखर को और यह आरोहण ही दोनों को एक सूत्रा में जोड़े हुए था। फ्मैं...?य् शेखर ने नीचे देखे बिना ही ‘उँफ{{{! उँफ{{{’ ‘हाँ’ करते हुए प्रश्िाक्षाथीर् की तरह सै(ांतिक बातों को याद किया, फ्सबसे पहले तो कोइर् दरार तलाशते पिफर राॅक पिटन लगाते।य् फ्यहाँ...? खैर, चलिए मान लिया, मगर अगर दरार न मिली, तो...?य् फ्तो डिªल करके लगाएँगे।य् बुशुगर् की तरह मुसकराया रूप, फ्खैर, आगे?य् फ्राॅक पिटन, पिफर ऐंकर, पिफर आगे - आगे डिसेंडर नो नो, रोप लैडरμरस्सी की सीढ़ी।य् फ्नो!य् आिाकारिक भाव से रोक दिया रूप ने, फ्कोइर् भी चढ़ाइर् हो, प़्ाफस्टर् वाॅच, देन गाडेर्¯नगμचैरस या समतल बनाना, पिफर से देखना होगा कि पत्थर किस जाति का है, इग्िनयस है, ग्रेनाइट है, मेटामारप्िाफक है, सैंड स्टोन है या सिलिका, क्या है! वरना अव्वल तो सपोटर् नहीं बना़पाओगे, बन भी गया, तो प़् ्राफीरैपे¯लग नहीं होगी।य् शेखर ने रूप की परिपक्व बुि पर प्रशंसा में आँखें नचाईं, फ्यस, यस।य् दोनों आरोही अति उत्साह में थे। आरोहण के दुस्साहसिक अभ्िायानों पर बहस करते - करते उन्हें इतना भी भान न हुआ कि ढलान से उतरकर कब के वे बीच के मैदान में चले आए थे और अब वह मैदान भी दोनों ओर की पवर्त - शृंखलाओं के कसते चले जाने से संकरा होता चला आ रहा था। फ्अब तक आपके सामने इर्शी सवाल थे, अब वुफछ मुश्िकल सवाल। इस पहाड़ पर चढ़ना हो और इस पहाड़ से उस पहाड़ पर सीधे ऊपर ही ऊपर जाना हो, खयाल रहे, दोनों के बीच सूपिन हैμवैफसे करेंगे?य् रूप की अँगुली पहाड़ों की ओर उठ रही थी। फ्एक मिनट, मुझे उतर जाने दो।य् शेखर ने घोड़े से उतरकर पहाड़ों पर गरदन उठाइर्। एकपिरामिडनुमा था, एक तनिक फ्ऱलैट, जिसकी शृंखला दूर तक नशर आ रही थी। दोनों ही पर नीचे ़से कापफी ऊपर तक देवदार खड़े थे। जिन्हें मशाक - मशाक में वह ‘पहाड़ के रोएँ’ कहा करता था। रूप का इशारा शायद उसके कटे अंश की ओर से चढ़ने का था। लाइम - स्टोन के चक्कर में किसी ने उसके बीच का एक बड़ा भाग कटवा डाला था। फ्ये तो लाइम स्टोन है, सीकरी जीन?य् फ्बस?य् आरोहण ध्17 वे न आते तो मुझे...! जिस दिन भूप दादा न आते, आख्िार तक उसे खुश रखने की मेरी तमाम कोश्िाशें बेकार चली जातीं।य् रूप एक झेंप भरी हँसी हँसकर चुप हो गया। महीप ने कनख्िायों से रूप को देखा, पिफर घोड़ा पकड़कर चलने लगा। फ्तेरी इस लव स्टोरी में तो कोइर् दम नहीं, कोइर् और नहीं मिली क्या कभी?य् शेखर ने बुरा - सा मुँह बनाया। फ्मिली क्यों नहीं, उस दौरान कइयों से साबका पड़ा, कइयों का संग - साथ रहा, अब तो सब ब्याहकर अपने - अपने घर चली गइर् होंगी, बाल बच्चेदार हो गइर् होंगी, मगर शैला जैसी एक भी नहीं। एक वही तो थी, जो मुझ पर शासन करती थी। रुकिए, मैं आपको वो जगह दिखाता हूँ, जहाँ...य्, महीप मुड़कर रूप को देखने लगा, जैसे उसे बातों में रस मिल रहा हो। अचानक रूप को खटका हुआ, यह कहाँ आ गया वह! यहाँ तो झरने झर रहे हैं, चारागाह का नामोनिशान नहीं। बोला, फ्ए लड़के, तू हमें कहाँ लिवा जा रहा है?य् फ्माहीय्, महीप बोला। फ्मगर उस रास्ते में पहाड़ों के बगल में एक छोटा सा मैदान हुआ करता था। वहाँ भेड़ें चराने आते थे लोग।य् फ्पहाड़ के धँस में वो सब कब का दब - ढक गया साब!य् फ्लो शेखर साहब,य् पस्त हो गया रूप, फ्भूप दादा की और मेरी प्रेमिकाएँ, प्यार की निशानियाँ, वो मुकामात सब - के - सब दब - ढक गए भू - स्खलन में! अब तो नए रास्ते हैं और इन्हीं से होकर चलना है।य् फ्वुफछ भी हो, तुम्हारा इलाका है बड़ा खूबसूरतμस्वगर् जैसा!य् फ्हाँ, वो क्या कि पांडव इसी रास्ते गए थे स्वगर् को। इधर का सबसे आख्िारी गाँव सुरगी है, सुरगी यानी स्वगर्। उसके वुफछ आगे स्वगार्रोहिणी!य् फ्जब बरप़्ाफ पड़ती होगी, सारा इलाका बरपफ से ढक जाता होगा!य़्फ्जभी न लैंड स्लाइड हुआ।य् फ्वह बात नहीं, मैं तो इस लड़के के रोशगार के बारे में सोच रहा था। इतनी कच्ची उम्र, उस पर यह घोड़ेवाला धंधा, खतरनाक रास्ते। सोचो, हम जवान होकर भी घोड़े पर जा रहे हैं और यह पंद्रह किलोमीटर पैदल! पिफर इसे लौटना भी है पंद्रह किलोमीटर अभी।य् फ्पेट के लिए क्या - क्या नहीं करना पड़ता है!य् फ्वो तो हइर् है, वही मैं सोच रहा था कि बरपफ के दौरान क्या करता होगा यह।य़्फ्ये{{{! हिलांस की तरह जा छुपता होगा अपनी माँ की गोद में,य् अपनी बात के समथर्न में उसने लड़के को पुकारा, फ्ओह महीप{!य् आरोहण ध्19 फ्जी साब!य् फ्तेरे पाँव में ददर् होता होगा, आ जा, वुफछ देर तू घोड़े पर बैठ जा, हम पैदल चलते हैं।य् फ्नहीं साब लौटते बखत तो चढ़ के आनाइर् है।य् फ्ये हीरू - वीरू का संग - साथ कब से लिया तूने? किस गाँव का है?य् फ्इससे यह भी तो पूछो कि हीरू - वीरू के अलावा इसके घर परिवार में और कौन - कौन हैं?य् शेखर ने कहा। फ्साब, बात मत करो, रास्ता भौत इर् खराब है।य् कहकर महीप ने उनके सवालों पर विराम लगा दिया। उफपर से पत्थर गिरे हुए थे और वह आगे - आगे घोड़ों को पुचकारते, निदेर्श देते चल रहा था,जो उसके लिए इस समय उनके पफालतू सवालों से श्यादा महत्त्वपूणर् था। आगे एक झरना था और एक उजड़ी पनचक्की। जगह थोड़ी चैड़ी थी। पानी रास्ते को काटकर बह रहा था। घोड़ों ने मुँह लगा दिया, तो उन्हें उतरना पड़ा। महीप चुपचाप पानी पिलाता रहा हीरू - वीरू को। पिफर वह खुद पानी पीने लगा। फ्वो भी क्या संयोग था शेखर साहब,य् रूप जैसे अतीत में लौट आया था, फ्आपके पापा इधर टेª¯नग के लिए न आते, न रास्ता भटकते, न मेरी शरूरत होती। मैंने भी न वो चुस्ती दिखाइर् होती पहाड़ पार करने में, न वो खुश होकर अपने साथ मसूरी लिवा जाते। पिफर तो हम कपूर साहब के और मसूरी के ही होकर रह गए साहब। ग्यारह साल बीत गए, तब हम इसी लड़के की तरह हुआ करते थे।य् उसके मन में आया कि कपूर साहब की तरह इस लड़के को भी वापसी में साथ लिवाता जाए, तो वैफसा रहे, मगर यह लड़का एक ही घुन्ना है, वुफछ बोलता ही नहीं।फ्साब, इत्ती - इत्ती देर करोगे, तो हम लौटेंगे वैफसे?य् महीप ने उन्हें चेताया तो वे एक - एक कर पिफर सवार हुए घोड़ों पर। फ्मगर इस पहाड़ को हम पार कर पाते, तो दो किलोमीटर की दूरी और कम हो जाती।य् रूप ने शेखर से कहा। पिफर रूप ने जानना चाहा, फ्अब तो माही मुश्िकल से डेढ़ किलोमीटर होना चाहिए।य् फ्बस, उस डांडी ;पहाड़द्ध के पीछे।य् फ्तुमने बताया नहीं, तुम क्यों भाग आए थे अपने घर से?य् लड़के ने जैसे सुना ही नहीं। वह रास्ते में पड़े एक बड़े पत्थर को हटाने लगा था। पत्थर बड़ा था, लड़के की औकात से श्यादा, पिफर भी वह पिला पड़ा था। उसकी सहायता के लिए अभी वह नीचे उतरने ही वाला था कि लड़के ने पत्थर को नीचे धकेल दिया। वुफढ़ गया रूप, फ्अजीब होते हैं ये पहाड़ी लोग!य् रूप ने कहा, पिफर मन ही मन झेंप गया, वह भी तो पहाड़ी ही है। गाँव करीब आता जा रहा था। वषो± की बंद स्मृतियों के कपाट खुल रहे थेμएक ओर सूपिन, दूसरी ओर जंगल, पीछे हिमांग का उँफचा पहाड़, नीचे होंगे अपने खेत, अपना घर, अपने लोग, बाबा, 20 ध् अंतराल माँ, भूप दादा और लोग। कितनी दूर है केदार काँठा, कितनी दूर है दुयोर्धन जी का मंदिर। ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन...! बहुत पुराने लोगों में से किसी - किसी ने लाल पलटन के अंग्रेशों को देखा था, नयों ने नहीं। सो दो गोरे संभ्रांत अजनबियों के आगमन पर गाँव के वुफछ लोग अपने - अपने घरों से निकल आए थे। हालाँकि यह सितंबर का महीना था और दिन के अभी तीन ही बजे थेे, मगर यहाँ ठंड काप़फी थी और लोगों ने ठंड से बचने के लिए ‘चुस्ती’ या उफन का ‘लावा’ पहन रखा था। उनकी आँखों में भय, संशय और कौतूहल थे। रूप की नशरें इनमें से एक - एक चेहरे को टटोल रही थीं। लड़का एक सयाने सइर्स - सा अपनी थकान भूलकर अपने हीरू - वीरू की पीठ, पुऋों और टाँगों को थपथपा रहा था। रूप ने सौ का एक नोट निकाला और वुफछ सोचकर रख लिया और दस की गंी से बारह कड़क नोट निकालकर लड़के को थमाते हुए बोला, फ्देखो, तुम भी थके हो और तुम्हारे घोड़े भी। पिफर बच्चे हो, शाम होनेवाली है, रास्ता खतरनाक है। ऐसा करो, आज रात यहीं रुक जाओ, सुबह चले जाना।य् लड़के ने कोइर् प्रतिवि्रफया व्यक्त नहीं की, तो रूप ने उसे पूरे तौर पर आश्वस्त कर देना चाहा, फ्यहाँ मेरा घर है, तुम्हें कोइर् तकलीपफ न होगी।य़्लड़के ने पिफर भी कोइर् जवाब न दिया, बल्िक पीठ पेफरकर नोटों को गिनने में मशगूल रहा। उसकी इस धंधेबाश अदा पर रूप ने मुसवफराकर शेखर की ओर देखा, पिफर कदम - कदम चलकर एक बूढ़े के पास पहंुँचा। बूढ़ा चकमकाया हुआ - सा अपने पोपले मुँह और झुरिर्यों के दल - दल में डूबती आँखों पर हथेलियों से सूरज की ओट बनाकर उसे ही देखे जा रहा था, फ्कने जाणा छावाँ साब ;कहाँ जाना है साबद्ध?य् रूप ने बताया, फ्बाबा, यहाँ ग्यारह साल पहले कोइर् राम ¯सह हुआ करते थे...जिनके भूप ¯सह और रूप ¯सह दो बेटे थे। वो हिमांग पहाड़ के नीचे उनका घर है।य् बूढ़े के चेहरे पर अपरिचय की श्िाला हिलकर रह गइर्, मगर टली नही, तो रूप को जितनी भी गढ़वाली याद रह गइर् थी, उसे जोड़ने - सजाने लगा, फ्बाबा, यक भूप ¯सह, रूप ¯सह दुइ भाइर् होंदा छै?य् फ्हाँ,य् इस बार बूढ़े के होंठ हिले, फ्लेकिन रूप तो भौत पहली भागी गेइर् छाइ।य् फ्अगर मी बोलुलूं कि मी वुइर् रूप ¯सह छौं तो ;अगर मैं बोलूँ कि मैं वही रूप ¯सह हूँ, तोद्ध?य् फ्तू{{{! न आ{{प! मशाक करी छूँ साब?य् फ्तब तो इर् भी मजाक इर् छै जो आप दादा तिरलोक ¯सह जी छूं?य् रूप ने हँसते हुए आगे बढ़कर उनके पाँव छुए। बूढ़ा तिरलोक अभी भी इस आत्मीयता को पूरी तरह से आत्मसात् नहीं कर पा रहा था। किसी दूसरे आदमी ने ¯हदी में पूछा, फ्मगर, आप थे कहाँ इतने दिन?य् आरोहण ध्21 फ्पवर्तारोहण संस्थान।य् फ्वो क्या चीज च?य् तिरलोक ने जानना चाहा। फ्पहाड़ पर चढ़ना।य् फ्के वास्ताँ ;किसलिएद्ध?य् गड़बड़ा गया रूप उनकी इस जिरह पर, फ्बाबा, वो कोइर् छोटा - मोटा काम नईं। सरकार इसी के लिए चार हशार तनखा देती है हमें।य् फ्ल्या सुण ल्या एकइ बात।य् तिरलोक बूढ़े ने सबको सुनाकर कहा, फ्यह कहता है कि यक रूप ¯सह छै! चलो मान लिया, लेकिण पिफर बोलूँ छै कि सरकार याको सिपर्फ म्याल चढ़न वूँफ वास्ते चार हजार तणखा देवे छूँ। यक क्या बात हुइर्? वैफसी अहमक है यक सरकार भी!य् शेखर की उपस्िथति में अपनी ऐसी किरकिरी होते देख ख्िासिया गया रूप। फ्आप कभी नीचे नहीं गए न?य् फ्के वास्ताँ नीचे?य् फ्तभी!य् उसने बुरा - सा मुँह बनाया, फ्खैर, अभी आज्ञा दें। घर जाउँफ, बाद में मिलते हैं।य् फ्ग्यार...? फ्हाँ, घर।य् फ्ग्यार तो उफपर उड़ी के चली गेछू बेटा। वो{{{ उदिर।य् तिरलोक सीधे हिमांग पहाड़ पर टाँगना चाह रहे थे अपनी नशर, मगर बादलों के गाढ़े लिहापफ के चलते उसकी श्िानाख्त ओझल थी।़फ्और बाबा और माँ?य् फ्वो तो और भी उफपर!य् तिरलोक की अँगुली सीधे आसमान की ओर उठी हुइर् थी, फ्भौत साल पहले इर्।य् एकाएक जैसे सप़ेफद हो गया रंगीन स्व्रफीन। उदास हो गया रूप। शेखर ने उसके वंफधे पर सहानुभूति में हाथ रखा। वुफछ देर बाद रूप भरार्ए गले से डरते - डरते पूछने लगा, फ्भूप दादा तो हंै न?य् फ्भूप अ? रुको, बुलाते हैं। अरे भूप - अ - अ?य् बूढ़े तिरलोक की आवाश प्रतिध्वनि बनकर लौटती रही। जवाब में कहीं से कोइर् आवाश नहीं आइर्। रूप ने डरते - डरते शेखर की ओर देखा। उसे संदेह हो रहा था कि क्या वाकइर् भूप है या बूढ़ा तिरलोक उनकी आत्मा का आवाहन कर रहा हैै। फ्कितने लोग हैं वहाँ?य् शेखर ने पूछा। एक औरत ने बताया, फ्अरे वो हैं, उसकी घरवाली, एक लड़का है, लेकिन वो तो...य् आगे के शब्द रोक लिए थे उसने जबरन। फ्लड़का भी है?य् फ्लो! अरे वोइर् लिवा आया न घोड़े पर आपको।य् किसी लड़के ने बताया। 22 ध् अंतराल फ्वो{{{!य् रूप ने मुड़कर देखा, महीप वहाँ नहीं था। काप़फी दूर पर एक घोड़े पर बैठा कोइर् नन्हा सवार दूसरे को हाँकते हुए ढलान में तेशी से उतर रहा था। उनकी आँखों में उसका अक्स छोटा होते - होते पहाड़ की ओट में तिरोहित हो गया, तो शेखर ने वंफधे उचकाए, फ्स्टेंªज!य् फ्भूप तो यक किसी से बात इर् नी करता। तू ऐसा कर, शाम होणे वाली है। देर न कर। जा चढ़ जा इस म्याल ;पहाड़द्ध पर।य् फ्इस पर...?य् वह वुफछ परेशान हुआ। फ्क्यों? अभी तो तू वैफ रहा था कि तूणे बड़े - बड़े पहाड़ चढ़े हैं और सरकार यक काम का वास्ताँ तुझे चार हजार तणखा देती है।य्फ्वो बात नहीं दादा जी, पहाड़ों पर तो हम पत्तरों, खूँटी, रस्सों, वुफल्हाड़ी और दूसरी चीशों के सहारे चढ़ते हैं। यहाँ तो साथ लाए नहीं।य्फ्ओ{{{!य् तिरलोक की आँखें झुरिर्यों के दलदल से उफपर उछल आईं, फ्इत्ता सारा इंतजाम होवे, तब तो तू चढ़ पावे म्याल पर!य् तिरलोक हँस पड़े, दूसरे बच्चे, बूढ़े भी। औरतों ने हँसते - हँसते मुँह पेफर लिए। फ्अरे, वो देख, भूप तो इधर इर् आ रहा है।य् किसी प्रौढ़ की आवाश आइर्, तो उस दिशा में सबकी नशर मुड़ गइर्। पहली नशर में वह पूरा का पूरा दिखा नहीं। पाँव किसी डिबके की ओट में थे, सिर किसी डाल की ओट में। सिप़र्फ उसके हाथ और बीच के अंश ही दिख रहे थे। पता नहीं, उसका मायावी कद अंदर शमीन में कितनी गहराइर् तक गया था और आसमानों में उफपर कितनी उँफचाइर् तक! धीरे - धीरे चलकर वह सामने आया, तो वह कतइर् असाधारण नहीं लगा। हालाँकि उसकी चुस्ती और स्वेटर - मप़फलर में दरमियाने कद की मामूली - सी शख्िसयत के बावजूूद उसका तिलिस्म अभी भी बरकरार था। गोरा - चि‘ा चित्तीदार चेहरा, मानो ग्रेनाइट पत्थर को तराशकर गढ़ा गया सख्त लंबोतरा चेहरा, उसकी अजीब - सी स्िथतप्रज्ञ आँखें मिम - मिम जलती हुईं, भौंहों पर कटे का निशान, वही है, बिलवुफल वही। ग्यारह सालों में और भी ठोस, और भी सख्त हो आए थे भूप दादा। फ्दादा!य् रूप जा झुका भूप के कदमों पर, फ्मैं रूप हूँ, तुम्हारा भगेड़ा भाइर्।य् भाइर् ने भाइर् को देखा। जाने क्या - क्या देखा, कहाँ - कहाँं तक देखा, पिफर देखते - देखते नशरों की बरप़्ाफ पिघलने लगी, फ्कब आया?य् फ्अभी।य् फ्अकेले?य् आरोहण ध्23 फ्नहीं, ये मेरे साथ हैंμकपूर साहब, जो मुझे लिवा गए थे, उनके लड़के शेखर साहब आइर्.ए.एस. की टेª¯नग ले रहे हैं मसूरी में।य् शेखर ने हाथ जोड़कर नमस्कार किया। भूप ने कोइर् उत्तर नहीं दिया। वहाँ तिरलोक दादा जी समेत गाँव के ढेर सारे लोग थे, मगर वह जैसे श्िालाओं के बीच खड़े हुए थे, उन्होंने किसी से कोइर् बात नहीं की, न किसी ने उनसे। फ्भुइला ;अनुजद्ध! चल ग्यार ;घरद्ध चल!य् कहकर उन्होंने दोनांे के बैग वंफधे पर डाल लिए और बिना उनकी सम्मति का इंतशार किए, बिना इधर - उधर नशर डाले वापस मुड़ गए। शेखर ने धीरे से रूप के कान में कहा, फ्गोया यह माही हमारा बेस वैंफप था और हिमांग हमारा डेस्टीनेशन।य् रूप ने होंठों पर अँगुली रखकर उसे चुहल करने से मना किया। उँफचे हिमांग की तलहटी में छोटे - से भूखंड पर बसा वह गाँव किसी आदम गाँव - सा लग रहा था। खं, झाड़ - झंखाड़, बगल में बहती सूपिन का शोर। बीच - बीच में बादल के टुकड़े आ - जा रहे थे, जिनसे आँख - मिचैली खेलता उनका वजूद पिफर से मायावी लगने लगा था। कभी - कभी तो भ्रम होता कि बादल तैर रहे हैं या वे। चढ़ाइर् शुरू हो गइर् थी। प्रायः खड़ी चढ़ाइर्। पहले तो पेड़ और पत्थरों के सहारे चढ़ते रहे वे, पिफररुक गए। फ्क्या हुआ? आगे नहीं चढ़ पा रहा है?य् भूप ने उफपर से पूछा, फ्बस, इत्ता भर पहाड़ीपन बचा रै ग्या इर्? है ना!य् पिफर से नीचे उसके पास आए। उन्होंने गले के मप़फलर की मशबूती परखी, पिफर उसे कमर में बाँधकर दोनों छोरों को दिखाते हुए कहा, फ्भुला, ले पकड़ इसको।य् पिफर उन्होंने शेखर की ओर देखा, जो और भी नीचे खड़े हाँपफ रहा था, फ्पहले इसे चढ़ा लें, पिफऱआपको...य् शेखर ने हामी भरी। अब भूप आगे - आगे चढ़ रहे थे, उनकी कमर में बँधे मप़फलर के छोर को पकड़े - पकड़े रूप पीछे - पीछे। बाप रे! बिना किसी आधुनिक उपकरण के, सिप़र्फ पेड़ों - पत्थरों के नाम मात्रा के सपोटर् पर शरीर का संतुलन बनाते हुए चढ़ना। बीच - बीच में रुककर हिदायत भी देते जाते थे, फ्देख, ए थइर् मजबूती से पकड़ी के राखी। इन न हवा कि गिर गैल सूपनि मा ;देख, इसे मशबूती से पकड़े रख, ऐसा न हो कि जा गिरे सूपिन मेंद्ध।य् भूप दादा साँप थे, छिपकली थे, बनमानुष थे या रोबोट थे? वह जिस धैयर्, आत्मविश्वास, ताकत और वुफशलता से माँसपेश्िायों और अंगों का नायाब उपयोग कर रहे थे, वह उसके लिए हैरत की चीश थी। पिफर अकेले का भार मात्रा होता, तो भी एक बात होती। वह तो खुद के साथ - साथ उसे भी खींचे लिए जा रहे थे। बारह वषर् पहले ठीक इसी तरह ढलान के उफपर ले आए थे उसे। घंटेभर लगे उफपर पहुँचने में। उन्होंने वहीं से किसी को आवाश दी, शायद उन लोगों के आने की सूचना। 24 ध् अंतराल पिफर जवाब की प्रतीक्षा किए बगैर उसे हाँपफता हुआ छोड़कर शेखर को ले आने के लिए नीचे उतरने़लगे। देखते ही देखते हिमांग पर छाए बादलों में अदृश्य हो गए वो। उफपर रूप ने देखा कि पहाड़ की पीठ पर वुफछ दूर तक शमीन प्रायः समतल बनी हुइर् थी, जिसमें मकइर् की पफसल खड़ी हुइर् थी। क्षेत्रा के चारों ओर सेब और देवदार के पेड़ थे। सेब के पेड़ों में तो पफल भी लगे हुए थे। पेड़ श्यादा दिनों के नहीं थे, यह देखने से ही लग रहा था। उसने गौर किया, ऐसे ही पेड़ नीचे भी वुफछ दूर तक पैफलते चले गए थे। पूरे क्षेत्रा की परिव्रफमा करता हुआ वह आधी दूरी तक पहुँचा होगा कि उसे एक गुपफानुमा आश्रम दिखा। उसी के बगल में दो छानी ;छप्पर का झोंपड़ाद्ध भी। यही घर है शायद! एक छप्पर के नीचे एक औरत खड़ी थी, नाटी गोरी जवान चुस्त और लाल पुफल स्वेटर में। वह उसे हैरानी से घूर रही थी। उसने अनुमान लगाया कि़यह भाभी हो सकती है, मगर झिझकवश आगे बढ़ गया। आगे हिमांग के उफपरवाले अंश से कोइर् झरना झर रहा था, जो खेतों से गुशरते हुए सूपिन में गिरता था। हवा में बरपफीली शाम की ठंडक बढ़ गइर् और देखते - देखते कोहरा इतना घना हो गया कि़लगता था, पृथ्वी पर पहाड़ की इस पीठ को छोड़कर बाकी वुफछ भी नहीं, कहीं भी नहीं। शेखर को लेकर आ गए थे भूप। आते ही उन्होंने भाभी - देवर के बीच संवादहीनता की जड़ता को ताड़ लिया और बोले, फ्रूप{! तेरी बाभी ;भाभीद्ध।य् रूप ने आगे बढ़कर उस औरत के पाँव छुए। बूँदा - बाँदी शुरू हो गइर् थी। पति - पत्नी गृहस्थी के सामान को समेटने में लग गए। रूप और शेखर गुपफा में बिछे पटरों पर ही लेट गए। फ्रूप,य् शेखर ने पुकारा। फ्उँफ{{{य् फ्यार, इट वाॅश ए रेयर एक्सपीरिएंस।य् फ्हाँ!य् फ्वो महीप घोड़ेवाला लड़का तेरी इन्हीं भाभी श्री का लड़का है?य् फ्बताया तो यही गया।य् फ्उहूँ{{, मुझे लगता है, कहीं कोइर् गड़बड़ है।य् फ्हूँ{{{,य् नींद की झील में डूब गया रूप का जवाब। जाने कब तक सोते रहे वे। रात के किसी पहर जगाया था भूप ने, फ्लो, यकी खा लो, यकी पड़े रहो, भौत शोरों की बारिश है बाहर!य् सचमुच, बाहर वषार् कहर ढा रही थी। सुबह उठे, तो आसमान साप़फ था। पूरब की दो पहाडि़यों के बीच, धुंध के परदे के पीछे से किसी बच्चे की तरह झाँक रहा था लाल - लाल सूरज। धुंध अरुणाभ हो रही थी। धीरे - धीरे छँटी थी वुफछ धुंध! नीचे झाँकने पर माही के छोटे - छोटे घरौंदे अजीब - से लग रहे थे, भूरे पानी के गहरे तल में पड़ी मछलियों, सीप, घोंघे की तरह हलका सा आभास मात्रा हो रहा था इन सबका। आरोहण ध्25 फ्भाइर् से मिलकर वैफसा लगा, रूप?य् शेखर ने एकांत में पूछा। फ्भाइर्...? बस, थोड़ी - सी ही धुंध छँटी है अभी।य् फ्हूँ कहते हैं, लिओनादोर् द ¯वची ने पहाड़़ को देखकर कहा था कि मेरी मोनालिसा यहाँ है, मगर इसे पाने के लिए मुझे ढेरों पत्थर - मि‘ी के मलबे हटाने हैं। तुम्हारा भाइर् भी इस पहाड़ में है, मोनालिसा नहीं, साक्षात् श्िाव, मगर उस तक पहुँचने के लिए ढेरों मलबा हटाना पड़ेगा तुम्हें अभी।य् रूप वुफछ बोला नहीं, चुपचाप टहलता रहा। नाश्ते पर पहली बार सब साथ बैठे, आग के गिदर्। भुनी हुइर् मक्के की बाल और चाय। भाभी सेंक - सेंककर दिए जा रही थी। वे नमक - मिचर् के साथ चबाते जा रहे थे। फ्यहाँ इस पहाड़ पर वैफसे आना पड़ा दादा?य् मलबा हटाने की रूप की एक अदद कोश्िाश। फ्यहाँ...?य् भूप ने मक्के से हाथ को गरम करते हुए जैसे पीछे दूर तक देखा, फ्आज इतणे वषो± बाद यही पूछणे के लिए आया है?य् फ्मुझे और शमि±दा न करें।य् फ्तो सुण भुइला, तूने सिर पर पहाड़ टूटने की कहावत तो भौत सुणी होगी, सुणने में भौत भारी नहीं लगती, लेकिन इसकी सच्चाइर् तो वोइर् जाणे है, जिस पर सचमुच का पहाड़ टूटा हो।य् भाभी और भुने हुए भु‘े दे रही थीं। उन्होंने मना कर दिया, फ्तेरे जाणे के बाद अगले साल भौत बरपफ गिरी। ये हिमांग पहाड़ उसका बोझ न उठा सका, धसक गया और अपने तीस नाली खेत, मकान, माँ, बाबा, सब दब गए मलबे में। मैं ही किसी तरह बच गया, छानी पर था, इसलिए वहीं से तबाही देखी थी मैंणे लाचार, असहाय। तू होता, तो पहाड़ का मलबा क्या था, पहाड़ तक हटा लेते दोनों भाइर्, खेत भी खींचकर निकाल लेते, माँ - बाबा को भी, लेकिन नहीं हो सका, वही पहाड़ कबर बन गया सबका।य् भूप थोड़ी देर के लिए चुप हो गए। फ्तू तो पैले ही भाग चुका था मुझे अकेला छोड़कर। पिफर मैं भौत भटका, भौत छटपटाया, लेकिन कहीं सहारा न मिला। सहारा देता भी कौण? सबी अपणे - अपणे से - इर् तबाह। दस - दस किलोमीटर तक जगह - जगह धँसाव हुए थे। रास्ते बदल गए, नदियाँ बदल गईं। इतनी बड़ी तबाही हो चुकी थी और मैं ख्िासियाइर् आँखों से इस हिमांग को देखा करता, मौत की तरह पैफला हुआ म्याल!य् भाभी चाय दे गइर् थीं। दूध के अभाव में लाल चाय। भूप ने पहले गिलास की चाय में भाप से अपनी पनियाइर् आँखों को सेंका, पिफर गिलास को दोनों हाथों में दबा लिया। पता नहीं, किस आत्मीय उफष्मा की तलाश थी उन्हें। वे हैरान हो उनकी इस विचित्रा लीला को देख रहे थे। फ्तुझे बचपण में बाबा की सुनाइर् गइर् कहानी याद है?य् वे रूप की ओर मुखातिब हुए, तो उनकी आँखें वुफछ ज्यादा ही चटक हो आइर् थीं, फ्वो एक नन्ही चिडि़यावाली, जिसे गीध ने कहा था, ‘मैं तुझे खा जाउँफगा’ नहीं? खैर, मैं याद दिलाता हूँ। गीध के ऐसा कहने पर चिडि़या डर गइर्। पूछा, 26 ध् अंतराल ‘क्यों?’, गीध बोला, ‘इसलिए कि तू मुझसे उँफचा नहीं उड़ सकती।’ यह अजीब जबरदस्ती का तवर्फ था। नन्ही चिडि़या ने धीरज धरकर पूछा, ‘और अगर मैं तुझसे उँफचा उड़कर दिखा दूँ, तो?’ गीध उसके बचकाणेपन पर हँसा, ‘तो नहीं खाउँफगा’। पिफर तो दोणों में ठण गया मुकाबला। गीध के सामने भला उस नन्ही चिडि़या की क्या बिसात! लंबे - लंबे डैने पफहराए और उड़ गया उफपर, उफपर और - और उफपर। चिडि़या डर गइर्। पिफर भी उसने धीरज न छोड़ा। ऐसे भी मरणा है, वैसे भी, तो क्यों न मौत से दो - दो हाथ करके - इर् मरूँ । कम - से - कम मरणे का मलाल तो नहीं रहेगा। पिफर तो पूरी ताकत लगा दी उसने उड़ने में, लगा कि पराण ही निकल जावेंगे। जाण पे खेल गइर् चिडि़या और सारी ताकत लगाकर उड़कर जा बैठी गीध की पीठ पर। गीध अपणी बेहिसाब ताकत के गुरूर में उड़ता रहा, आकाश से भी उँफचा, लेकिन चिडि़या को अब कोइर् डर न था। वह हर हाल में उससे उँफचाइर् पर थी, मौत की पीठ पर ही जा बैठी थी जो।य् कहानी खत्म कर अपने सामने के मंशर को देखने लगे भूप। उन्होंने बीड़ी सुलगा ली। दो - एक कश खींचे, पिफर बोले, फ्तो भुइला, इसी तरह मैं भी आ बैठा मौत की इस पीठ पर, उसी की, जिसने मेरा सब वुफछ निगल लिया था। धीरे - धीरे मलबा हटाता रहा यहाँ का। थोड़ी - बहुत खेती शुरू करी। अकेला - अकेला लगा, तो एक औरत ले आया नीचे से।य् फ्कौन, शैला...?य् रूप चैकन्ना हो उठा सहसा। फ्हाँ, अभी तक तुझे याद है?य् इस बार भूप के चैंकने की बारी थी। एक क्षण को वह तराशाहुआ चित्तीदार चेहरा स्िनग्ध होता - सा लगा। पिफर उस पर एक नामालूम - सी धुंध छा गइर्। फ्शैला के आने से खेती पैफल गइर्। बरपफ जमी न रहे, सो हमने खेतों को ढलवाँ बणाया, मगर एक मुसीबत, पाणी कहाँ से आए! एक दिन पाणी की खोज में हम चढ़ गए इस हिमांग के साबुत उँफचे हिस्से पर। वहाँ हमने देखा कि एक झरणा यँू ही उस तरपफ सूपिन में गिर रहा था। उसे मोड़ लेने से पाणी की समस्या हल हो सकती थी, मगर बीच में उँफचा था याणी के पहाड़ काटणा था। हमने क्वार के दिन चुने, जब रातों को बरपफ जमने लगती थी, दिन को पिघलने लगती थी, मगर थोड़ी - थोड़ी। याणी इतना भी नहीं कि धार तेज हो, इतना भी नहीं की बरपफ जमकर सख्त हो जाए। बड़ी मेहनत की हम दोणों ने, मगर झरने को मोड़कर लाने में सपफल हो ही गए आख्िार।य् फ्जाड़े में तो जम जाता होगा, पिफर बरपफ से ढक जाता होगा यह सब?य् शेखर ने पूछा।़फ्अभी इर् जम गया जी।य् भूप ने कहा, फ्लेकिण गरमी पाएगा, तो पिघल जाएगा।य् फ्ये पेड़ लगा रखे हैं न। कापफी लकड़ी जमा कर लेते हैं। चैबीसों घंटे आग जलती रहती है। बरपफ से आग को भ्िाड़ा देते हैं।य् फ्मगर भाभी गइर् कहाँ, मेरा मतलब शैला भाभी...य् फ्वो इर् तो बता रहा था कि तेरी बाभी के आणे से खेती का काम वैफसे बढ़ता गया। काम हम दोनों के बूते का न था। पिफर उसको बच्चा भी होनेवाला था, तो हम ले आए दूसरी औरत...ए तेरी आरोहण ध्27 दूसरी बाभी। शैला से एक बेटा हुआ महीप। पिफर एक दिन, महीप अभी नौ साल का इर् था कि उसकी माँ को जाणे क्या सूझा कि एक दिन हयांइर् से वूफद गइर् सूपिण माँ।य् स्तब्ध रह गए रूप और शेखर। सिप़्ार्फ झरने के गिरने के शोर को छोड़कर कोइर् आवाश नहीं थी कहीं। एक गहरी साँस लेकर बोेले भूप, फ्तब से...बेटा जो नीचे उतरा, तो पिफर उफपर नहीं आया, मैंने लाख मणाया, पिफर भी...कल भी उसे आया देखकर इर् नीचे उतरा था। उसके पीछे - पीछे दूर तक गया, मगर। उसने सुणकर भी नहीं सुणा, देखकर भी नहीं देखा, लौट गया घोड़ी को भगाते हुए। मुझी को गुनाहगार समझता है अपनी माँ की मौत के लिए।य् फ्चाह!य् भूप की दूसरी पत्नी ने शायद विषयांतर करना चाहा। फ्अरे, रहणे दे। ये साहब लोग हुए न, काली चाह नहीं पसंद करते।य् फ्आप एक भेड़़ या बकरी तो रख ही सकते थे, उन्हें चढ़ने - चढ़ाने में मुश्िकल भी नहीं आती, दूध भी मिल जाता।य् फ्पाली थी न।य् फ्दिख तो नहीं रही।य् धुंध काप़्ाफी वुफछ छँट चुकी थी...। अब समझ में आया कि भूप दादा ने कल क्यों बात नहीं की माहीवालों से। रात की बारिश से भीगी सलेटी मि‘ी पर सुबह की आलोक - छाया में चलते हुए नीचे पसरी घाटी को दूर - दूर तक देख रहे थे वे। उनके पीछे हिमांग का बाकी साबुत पहाड़ था, जिससे नीचे उतरता झरना हिमायित होकर चाँदी की राह - सा चमक रहा था। इतनी उँफचाइर् पर और इतनी ठंड में उसका जम जाना लािामी था। वे हिम के पिघलने का इंतशार कर रहे थे और रूप और शेखर उनके अंदर के हिम के पिघलने का इंतशार। आख्िार दोनों ही पिघले। फ्तू गया। तेरे पीछे माँ गइर्। बाबा गए। पिफर शैला गइर्। सबसे आख्िार में महीप भी चला गया हमेंछोड़कर।य् वे रुक - रुककर बोलते हैं, फ्तू कहेगा, चढ़सिपर्फ मंै रहा था, बाकी उतर रहे थेऋ मैं कहता नहीं, अपणे - अपणे हिस्से की चढ़ाइर् तो सभी चढ़ रहे थे। चढ़ने का सबका अपणा - अपणा तरीका है।य् थोड़ी देर तक हिम के पिघलने को वे यंँू ही देखते रहे। पिफर पफावड़ा उठाकर किनारे के कटाव को ठीक करने चल पड़े। इस समय वे अकेले थे। उनका यह रूप उन दोनों में दहशत भी भर रहा था, सम्मोहित भी कर रहा था। फ्उपफ! कितने अकेले लग रहे हैं भूप दादा इस वक्त!य् रूप ने धीरे से कहा।़फ्उँफचाइयाँ तनहा भी तो करती हैं,य् शेखर ने कहा। कटाव की मरम्मत कर आग के पास पिफर लौट आए थे भूप। 28 ध् अंतराल फ्भूप ¯सह, एक बात पूछूँ?य् शेखर ने उन्हें देखते हुए कहा। फ्पूछो।य् फ्आप पहाड़ हैं या पहाड़ पर चढ़नेवाले?य् फ्हम...? आपको क्या लगता है?य् फ्दोनों ही।य् हँस पड़े भूप। शायद पहली बार! बोले, फ्हम कहांँ के पहाड़ हुए भुला, हम तो चढ़नेवाले इर्र् हुए।य् फ्दादा!य् रूप का गला भर आया, फ्बहोत दुख झेले आपने, बहो{{त। दुखों का पहाड़ लेकर चढ़ते रहे पहाड़ पर। अब बस करो। मैं तुम्हारा छोटा भाइर् तुम्हें अपने साथ लिवा जाना चाहता हूँ। मुझे सरकार की ओर से पक्का क्वाटर्र मिला हुआ है। जितनी तनख्वाह मिलती है, उसमें आराम से रह लेंगे हम सभी।य् भूप गंभीर हो गए। न ‘हाँ’ कहा, न ‘ना’। फ्एक बार चलकर देख तो आइए कि आपका भुइला वैफसे रहता है।य् भूप पिफर भी नि£वकार बने रहे, तो शेखर ने कहा, फ्भूप भैया, मेरे पापा कहा करते थे कि क्लाइंबर, माने चढ़नेवाले को अपनी सारी ताकत एक ही चढ़ाइर् में खत्म नहीं कर देनी चाहिए, वुफछ ताकत बचा के रखनी चाहिए, आनेवाली चढ़ाइयों के लिए भी...य् फ्आइर्.एस. साहब, वो आपके बाबा का तरीका होगा, शौकिया चढ़नेवालों का तरीका। मेरे बाबा का तरीका तो वोइर् हैμगीध और नन्हीं चिडि़यावाला, जहाँ ¯जदगी और मौत में जंग छिड़ी हो, वहाँ...य्, बैलों की डकार में अधूरा रह गया वाक्य। फ्ओह, इन बंदों को तो मैं भूल इर् गया आज,य् भूप वफो जैसे उनकी सुिा अब आइर् हो, पिफर शोर से बोले, फ्सुण लिया, सुण लिया।य् रूप और शेखर ने एक - दूसरे की ओर हैरान होनेवाली नशरों से देखा, फ्तो बैल भी हैं यहाँ! मगर ये आए वैफसे?य् बैलों को बाहर धूप में निकालकर बाँधा भूप ने। छोटे नाटे, पर पुष्ट बैल। उनकी पत्नी ने भोजन बनाना छोड़कर हाथ में घास लाकर डाल दिया उनके सामने। फ्भूप भैया, ये बैल वैफसे आए यहाँ?य् शेखर ने पूछा। फ्वैफसे आए...? आप इर् बताओ जी। सुना, बड़ा ‘मंैड’ ;माइंडद्ध रखते हैं आइर्.एस. वाले।य् शेखर वुफछ इस कदर पराभूत था कि भवुफआ गया। फ्अजी, वंफधे पर ढो के ले आए इन्हें, और वैफसे!य् भूप ने कहा। आरोहण ध्29 फ्वंफधे पर?..इन्हें?य् फ्क्यों? मैं अपनी दो औरतों को कंधे पर लाद के ला सकता हूँ, आप दोणों को ला सकता हूँ, इन्हें नी ला सकता? अजी देखो, इत्ते बड़े बैल तो चढ़ नी सकते न! सो नीचे से एक छोटा बछड़ा ले आए पहले, पिफर दूसरा। पिफर वे हयांइर् पलकर बैल बने।य् फ्लेकिन ये नीचे वैफसे उतरेंगे?य् भूप ने कोइर् जवाब न दिया। हँसुए से मकइर् की डंठलों को काटते रहे। फ्ये पहाड़ कभी भी धँस सकता है।य् फ्मालूम है।य् उनका यह छोटा सा वाक्य बेहद ठंडा था। बहुत देर तक मंडराता रहा उसका आतंक। फ्यह तो सरासर खुदकशी है।य् फ्तुम वैफते हो, खुदकशी है, मैं वैफता बचने का मुकाम।य् फ्दादा, इन्हें देखकर आपका अकेलापन और गहरा गया हमारे सामने। आप समझते क्यों नहीं कि आपने औरों से खुद को काट लिया है।य् रूप की आवाश भरार् रही थी। फ्मैंने...? ना! पिछले साल गरमियों में नीचे आग लगी। इसी झरने को मोड़कर बुझाइर् थी हमने आग। अभी कल ही नीचे नहीं गया था?य् फ्मगर आपने किसी से बात तो नहीं की न?य् फ्नी की। दुःख था, लेकिन देवता जानते हैं, जो कभी उनका बुरा सोचा हो मण में। “याँ, जहाँ हूँ, बुरा सोचूँगा भी वैफसे? मुझे तो सबी पर दया आती है “याँ से नीचे देखणे पर।य् फ्मगर यहाँ आप अकेले हैं।य् फ्कौण वैफता है, अकेला हूँ? “याँ माँ है, बाबा हैं, शैला हैμसोये पड़े हैं सब। “याँ महीप है, बल्द हैं, मेरी घरवाली है, मौत के मुँह से निकाले गए खेत हैं, पेड़ हैं, झरणा है। इन पहाड़ों में मेरे पुरखों, मेरे प्यारों की आत्मा भटकती रहती है। मैं उनसे बात करता हूंँ।य् फ्दादा! ये सब देख - देखकर, सुन - सुनकर मेरा कलेजा मुँह को आ रहा है। अभी से भी बची - खुची ¯शदगी के साथ इंसाप़्ाफ किया जा सकता है।य् भूप ने अपनी भीगी पलवेंफ उफपर उठाईं, तो वे अंदर जल रही थीं, फ्भौत इंसापफ किया तुम सबी ने मेरे साथ - भौत। अब मापफ करो भुइला। मेरी खुद्दारी को बखस दो। अब तो ¯जदा रहणे तक न इर् बल्द उतर सकदिन, न हम!य् 30 ध् अंतराल प्रश्न - अभ्यास 1.यूँ तो प्रायः लोग घर छोड़कर कहीं न कहीं जाते हैं, परदेश जाते हैं ¯कतु घर लौटते समय रूप ¯सह को एक अजीब किस्म की लाज, अपनत्व और झिझक क्यों घेरने लगी? 2.पत्थर की जाति से लेखक का क्या आशय है? उसके विभ्िान्न प्रकारों के बारे में लिख्िाए। 3.महीप अपने विषय में बात पूछे जाने पर उसे टाल क्यों देता था? 4.बूढ़े तिरलोक ¯सह को पहाड़ पर चढ़ना जैसी नौकरी की बात सुनकर अजीब क्यों लगा? 5.रूप ¯सह पहाड़ पर चढ़ना सीखने के बावजूद भूप ¯सह के सामने बौना क्यों पड़ गया था? 6.शैला और भूप ने मिलकर किस तरह पहाड़ पर अपनी मेहनत से नयी ¯शदगी की कहानी लिखी? 7.सैलानी ;शेखर और रूप ¯सहद्ध घोड़े पर चलते हुए उस लड़के के रोशगार के बारे में सोच रहे थे जिसने उनको घोड़े पर सवार कर रखा था और स्वयं पैदल चल रहा था। क्या आप भी बाल मशदूरों के बारे में सोचते हैं? 8.पहाड़ों की चढ़ाइर् में भूप दादा का कोइर् जवाब नहीं! उनके चरित्रा की विशेषताएँ बताइए। 9.इस कहानी को पढ़कर आपके मन में पहाड़ों पर स्त्राी की स्िथति की क्या छवि बनती है? उस पर अपने विचार व्यक्त कीजिए। योग्यता - विस्तार 1.‘पहाड़ों में जीवन अत्यंत कठिन होता है।’ पाठ के आधार पर उक्त विषय पर एक निबंध लिख्िाए। 2.पवर्तारोहण की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए। 3.पवर्तारोहण पवर्तीय प्रदेशों की दिनचयार् है, वही दिनचयार् आज जीविका का माध्यम बन गइर् है। उसके गुण - दोष का विवेचन कीजिए। शब्दाथर् और टिप्पणी खतो - किताबत - पत्रा - व्यवहार मुकम्िमल - स्थायी खासमखास - अतिविश्िाष्ट, अंतरंग तौहीन - बेइश्शती शदर् - पीला पड़ना आरोहण ध्31 इंपोटेर्ड - आयातित दरियाफ्ऱत - जानकारी प्राप्त करना, पता लगाना “याँ - यहाँ घाट बटी - पहाड़ के पार जाने का रास्ता चंदोव - शामियाना, चादर दरकना - पफटना पगुराना - जुगाली करना पैबंद - थेगली सूपिन - नदी का नाम अस्पुफट - अस्पष्ट वुफहेड़ी - वुफहरा घसेरी - घासवाली डांडियाँ - पहाडि़याँ हिलांस - एक पक्षी का नाम ना बास - न बसना गप़्ाफलत - गलतप़्ाफहमी, असावधानी अनुतप्त - पछतावे से भरी राॅक पिटन - च‘ान में गड्ढा करना डिªल - खोदना लैंड स्लाइड - भू - स्खलन संभ्रांत - वुफलीन, खानदानी, रइर्स मशगूल - व्यस्त, लगा हुआ श्िानाख्त - पहचान शख्िसयत - व्यक्ितत्व तिलस्म - जादू वजूद - अस्ितत्व हिलकोरे - स्वर लहरी 32 ध् अंतराल

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