पाठ परिचय1 सूरदास की झोंपड़ी सूरदास की झोंपड़ी प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि का एक अंश है। एक दृष्िटहीन व्यक्ित जितना बेबस और लाचार जीवन जीने को अभ्िाशप्त होता है, सूरदास का चरित्रा ठीक इसके विपरीत है। सूरदास अपनी परिस्िथतियों से जितना दुखी व आहत है उससे कहीं अिाक आहत है भैरों और जगधर द्वारा किए जा रहे अपमान से, उनकी इर्ष्यार् से। भैरों की पत्नी सुभागी भैरों की मार के डर से सूरदास की झोंपड़ी में छिप जाती है और सुभागी को मारने भैरों सूरदास की झोंपड़ी में घुस जाता है, ¯कतु सूरदास के हस्तक्षेप से वह उसे मार नहीं पाता। इस घटना को लेकर पूरे मुहल्ले में सूरदास की बदनामी होती है। जगधर और भैरों तथा अन्य लोग उसके चरित्रा पर प्रश्न उठाते हैं। इस घटना से उसे इतनी आत्मग्लानि हुइर् कि वह पूफट - पूफटकर रोया। भैरों को उकसाने और भड़काने में जगधर की प्रमुख भूमिका रही। उसे इर्ष्यार् इस बात की थी कि सूरदास चैन से रहता है, खाता - पीता है, उसके चेहरे पर निराशा नहीं झलकती, जबकि जगधर को खाने - कमाने के लाले पड़े हुए हैं। भैरों की बहुरिया सुभागी पर जगधर नशर भी रखता था। सूरदास और सुभागी के संबंधों की चचार्र् पूरे मुहल्ले में इतनी हुइर् कि भैरों अपने अपमान और बदनामी का बदला लेने की सोच बैठा। उसने गाँठ बाँध ली कि जब तक सूरे को रुलाएगा, तड़पाएगा नहीं तब तक उसे चैन नहीं मिलेगा। उसे लगा समाज में इतनी बदनामी तो हो ही गइर्, भोज - भात बिरादरी को कहाँ से देगा? भैरों सूरदास पर नशर रखने लगा। अंततः उसके रुपयों की थैली उठा ले गया और सूरदास की झोंपड़ी में आग लगा दी। सूरदास के चरित्रा की विशेषता यह है कि झोंपड़ी के जला दिए जाने के बावजूद वह किसी से प्रतिशोध लेने में विश्वास नहीं करता बल्िक पुननिर्मार्ण में विश्वास करता है। इसीलिए वह मिठुआ के सवालμफ्जो कोइर् सौ लाखबार झोंपड़ी को आग लगा दे तोय् के जवाब में दृढ़ता के साथ उत्तर देता हैμ फ्तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगेय्। प्रेमचंद सूरदास की झोंपड़ी रात के दो बजे होंगे कि अकस्मात् सूरदास की झोंपड़ी से ज्वाला उठी। लोग अपने - अपने द्वारों पर सो रहे थे। निद्रावस्था में भी उपचेतना जागती रहती है। दम - के - दम में सैकड़ों आदमी जमा हो गए। आसमान पर लाली छाइर् हुइर् थी, ज्वालाएँ लपक - लपककर आकाश की ओर दौड़ने लगीं। कभी उनका आकार किसी मंदिर के स्वणर् - कलश का - सा हो जाता था, कभी वे वायु के झोंकों से यों वंफपित होने लगती थीं, मानो जल में चाँद का प्रति¯बब है। आग बुझाने का प्रयत्न किया जा रहा था पर झोंपड़े की आग, इर्ष्यार् की आग की भाँति कभी नहीं बुझती। कोइर् पानी ला रहा था, कोइर् यों ही शोर मचा रहा था ¯कतु अिाकांश लोग चुपचाप खडे़ नैराश्यपूणर् दृष्िट से अग्िनदाह को देख रहे थे, मानो किसी मित्रा की चिताग्िन है। 2 ध् अंतराल सहसा सूरदास दौड़ा हुआ आया और चुपचाप ज्वाला के प्रकाश में खड़ा हो गया। बजरंगी ने पूछाμयह वैफसे लगी सूरे, चूल्हे में तो आग नहीं छोड़ दी थी? सूरदासμझोंपड़े में जाने का कोइर् रास्ता ही नहीं है? बजरंगी μ अब तो अंदर - बाहर सब एक हो गया है। दीवारें जल रही हैं। सूरदासμकिसी तरह नहीं जा सकता? बजरंगी μ वैफसे जाओगे? देखते नहीं हो, यहाँ तक लपटें आ रही हैं! जगधरμसूरे, क्या आज चूल्हा ठंडा नहीं किया था? नायकरामμचूल्हा ठंडा किया होता, तो दुश्मनों का कलेजा वैफसे ठंडा होता। जगधरμपंडाजी, मेरा लड़का काम न आए, अगर मुझे वुफछ भी मालूम हो। तुम मुझ पर नाहक सुभा करते हो। नायकरामμमैं जानता हँ जिसने लगाइर् है। बिगाड़ न दूँ, तो कहना।ूठावुफरदीन μ तुम क्या बिगाड़ोगे, भगवान आप ही बिगाड़ देंगे। इसी तरह जब मेरे घर में चोरी हुइर् थी, तो सब स्वाहा हो गया। जगधरμजिसके मन में इतनी खुटाइर् हो, भगवान उसका सत्यानाश कर दें। सूरदासμअब तो लपट नहीं आती। बजरंगी μ हाँ, पूफस जल गया, अब धरन जल रही है। सूरदासμअब तो अंदर जा सकता हूँ? नायकरामμअंदर तो जा सकते होऋ पर बाहर नहीं निकल सकते। अब चलो आराम से सो रहो जो होना था, हो गया। पछताने से क्या होगा? सूरदासμहाँ, सो रहूँगा, जल्दी क्या है! थोड़ी देर में रही - सही आग भी बुझ गइर्। वुफशल यह हुइर् कि और किसी के घर में आग न लगी। सब लोग इस दुघर्टना पर आलोचनाएँ करते हुए विदा हुए। सन्नाटा छा गया। ¯कतु सूरदास अब भी वहीं बैठा हुआ था। उसे झोंपड़े के जल जाने का दुःख न था, बरतन आदि के जल जाने का भी दुःख न थाऋ दुःख था उस पोटली का, जो उसकी उम्र भर की कमाइर् थी, जो उसके जीवन की सारी आशाओं का आधार थी, जो उसकी सारी यातनाओं और रचनाओं का निष्कषर् थी। इस छोटी सी पोटली में उसका, उसके पितरों का और उसके नामलेवा का उ(ार संचित था। यही उसके लोक और परलोक, उसकी दीन - दुनिया का आशा - दीपक थी। उसने सोचाμपोटली के साथ रुपये थोड़े ही जल गए होंगे? अगर रुपये पिघल भी गए होंगे, तो चाँदी कहाँ जाएगी? क्या जानता था किआज यह विपिा आनेवाली है, नहीं तो यहीं न सोता! पहले तो कोइर् झोंपड़ी के पास आता ही न और अगर आग लगाता भी, तो पोटली को पहले ही निकाल लेता। सच तो यों है कि मुझे यहाँ रुपये रखने ही न चाहिए थे। पर रखता कहाँ? मुहल्ले में ऐसा कौन है, जिसे रखने को देता? हाय! पूरेपाँच सौ रुपये थे, वुफछ पैसे ऊपर हो गए थे। क्या इसी दिन के लिए पैसे - पैसे बटोर रहा था? सूरदास की झोंपड़ीध्3 खा लिया होता, तो वुफछ तस्कीन होती। क्या सोचता था और क्या हुआ! गया जाकर पितरों को ¯पडा देने का इरादा किया था। अब उनसे वैफसे गला छूटेगा? सोचता था, कहीं मिठुआ की सगाइर् ठहर जाए, तो कर डालूँ। बहू घर में आ जाए, तो एक रोटी खाने को मिले! अपने हाथों ठोंक - ठोंककर खाते एक जुग बीत गया। बड़ी भूल हुइर्। चाहिए था कि जैसे - जैसे हाथ में रुपये आते, एक - एक काम पूरा करता जाता। बहुत पाँव पैफलाने का यही पफल है! उस समय तक राख ठंडी हो चुकी थी। सूरदास अटकल से द्वार की ओर झोंपड़े में घुसाऋ परदो - तीन पग के बाद एकाएक पाँव भूबल में पड़ गया। ऊपर राख थी, लेकिन नीचे आग। तुरंत पाँव खींच लिया और अपनी लकड़ी से राख को उलटने - पलटने लगा, जिससे नीचे की आग भी जल्दराख हो जाए। आध घंटे में उसने सारी राख नीचे से ऊपर कर दी, और तब पिफर डरते - डरते राख में पैर रखा। राख गरम थी, पर असह्य न थी। उसने उसी जगह की सीध में राख को टटोलना शुरू किया, जहाँ छप्पर में पोटली रखी थी। उसका दिल धड़क रहा था। उसे विश्वास था कि रुपये मिलें या न मिलें, पर चाँदी तो कहीं गइर् ही नहीं। सहसा वह उछल पड़ा, कोइर् भारी चीश हाथ लगी। उठा लियाऋ पर टटोलकर देखा, तो मालूम हुआ ईंट का टुकड़ा है। पिफर टटोलने लगा, जैसे कोइर् आदमी पानी में मछलियाँ टटोले। कोइर् चीश हाथ न लगी। तब तो उसने नैराश्य की उतावली और अधीरता के साथ सारी राख छान डाली। एक - एक मुऋी राख हाथ में लेकर देखी। लोटा मिला, तवा मिला, ¯कतु पोटली न मिली। उसका वह पैर, जो अब तक सीढ़ी पर था, पिफसल गया और अब वह अथाह गहराइर् में जा पड़ा। उसके मुख से सहसा एक चीख निकल आइर्। वह वहीं राख पर बैठ गया और बिलख - बिलखकर रोने लगा। यह पूफस की राख न थी, उसकी अभ्िालाषाओं की राख थी। अपनी बेबसी का इतना दुःख उसे कभी न हुआ था। तड़का हो गया, सूरदास अब राख के ढेर को बटोरकर एक जगह कर रहा था। आशा से श्यादा दीघर्जीवी और कोइर् वस्तु नहीं होती। उसी समय जगधर आकर बोलाμसूरे, सच कहना, तुम्हें मुझ पर तो सुभा नहीं है?सूरे को सुभा तो था, पर उसने इसे छिपाकर कहाμतुम्हारे ऊपर क्यों सुभा करूँ गा? तुमसे मेरी कौन सी अदावत थी? जगधर μ मुहल्लेवाले तुम्हें भड़काएँगे, पर मैं भगवान से कहता हूँ , मैं इस बारे में वुफछ नहीं जानता। सूरदास μ अब तो जो वुफछ होना था, हो चुका। कौन जाने, किसी ने लगा दी या किसी की चिलम से उड़कर लग गइर्? यह भी तो हो सकता है कि चूल्हे में आग रह गइर् हो। बिना जाने - बूझे किस पर सुभा करूँ ? जगधर μ इसी से तुम्हें चिता दिया कि कहीं सुभे में मैं भी न मारा जाउँफ। सूरदास μ तुम्हारी तरपफ से मेरा दिल सापफ है। 4 ध् अंतराल जगधर को भैरों की बातों से अब यह विश्वास हो गया कि यह उसी की शरारत है। उसने सूरदास को रुलाने की बात कही थी। उस धमकी को इस तरह पूरा किया। वह वहाँ से सीधे भैरों के पास गया। वह चुपचाप बैठा नारियल का हुक्का पी रहा था, पर मुख से ¯चता और घबराहट झलक रही थी। जगधर को देखते ही बोलाμवुफछ सुनाऋ लोग क्या बातचीत कर रहे हैं?जगधर μ सब लोग तुम्हारे ऊपर सुभा करते हैं। नायकराम की धमकी तो तुमने अपने कानों से सुनी। भैरों μ यहाँ ऐसी धमकियों की परवा नहीं है। सबूत क्या है कि मैंने लगाइर्? जगधरμसच कहो, तुम्हीं ने लगाइर्? भैरों μ हाँ, चुपके से एक दियासलाइर् लगा दी। जगधरμमैं वुफछ - वुफछ पहले ही समझ गया था पर यह तुमने बुरा किया। झोंपड़ी जलाने से क्या मिला? दो - चार दिन में पिफर दूसरी झोंपड़ी तैयार हो जाएगी। भैरों μ वुफछ हो, दिल की आग तो ठंडी हो गइर्! यह देखो! यह कहकर उसने एक थैली दिखाइर्, जिसका रंग ध्ुएँ से काला हो गया था। जगधर ने उत्सुक होकर पूछाμइसमें क्या है? अरे! इसमें तो रुपये भरे हुए हैं। भैरों μ यह सुभागी को बहका ले जाने का जरीबाना है। जगधरμसच बताओ, ये रुपये कहाँ मिले? भैरों μ उसी झोंपड़े में। बड़े जतन से धरन की आड़ में रखे हुए थे। पाजी रोज राहगीरों कोठग - ठगकर पैसे लाता था और इसी थैली में रखता था। मैंने गिने हैं। पाँच सौ से ऊपर हैं। न जाने वैफसे इतने रुपये जमा हो गए। बच्चू को इन्हीं रुपयों की गरमी थी। अब गरमी निकल गइर्। अब देखूँ किस बल पर उछलते हैं। बिरादरी को भोज - भात देने का सामान हो गया। नहीं तो इस बखत रुपये कहाँ मिलते? आजकल तो देखते ही हो, बल्लमटेरों के मारे बिकरी कितनी मंदी है। जगधरμमेरीतोसलाह है कि रुपये उसे लौटा दो। बड़ी मसक्कत की कमाइर् है। हजम न होगी। जगधर दिल का खोटा आदमी नहीं थाऋ पर इस समय उसने यह सलाह उसे नेकनीयती से नहीं, हसद से दी थी। उसे यह असह्य था कि भैरों के हाथ इतने रुपये लग जाएँ। भैरों आधे रुपये उसे देता, तो शायद उसे तस्कीन हो जाती पर भैरों से यह आशा न की जा सकती थी। बेपरवाही से बोलाμमुझे अच्छी तरह हजम हो जाएगी। हाथ में आए हुए रुपये को नहीं लौटा सकता। उसने तो भीख माँगकर ही जमा किए हैं, गेहूँ तो नहीं तौला था। जगधरμपुलिस सब खा जाएगी। भैरों μ सूरे पुलिस में न जाएगा। रो - धोकर चुप हो जाएगा। जगधरμगरीब की हाय बड़ी जानलेवा होती है। सूरदास की झोंपड़ीध्5 भैरों μवह गरीब है! अंधा होने से ही गरीब हो गया? जो आदमी दूसरों की औरतों पर डोरे डाले, जिसके पास सैकड़ों रुपये जमा हों, जो दूसरों को रुपये उधार देता हो, वह गरीब है? गरीब जो कहो, तो हम - तुम हैं। घर में ढूँढ़ आओ, एक पूरा रुपया न निकलेगा। ऐसे पापियों को गरीब नहीं कहते। अब भी मेरे दिल का काँटा नहीं निकला। जब तक उसे रोते न देखूँगा, यह काँटा न निकलेगा। जिसने मेरी आबरू बिगाड़ दी, उसके साथ जो चाहे करूँ, मुझे पाप नहीं लग सकता। जगधर का मन आज खोंचा लेकर गलियों का चक्कर लगाने में न लगा। छाती पर साँप लोट रहा थाμइसे दम - के - दम में इतने रुपये मिल गए, अब मौज उड़ाएगा। तकदीर इस तरह खुलती है। यहाँ कभी पड़ा हुआ पैसा भी न मिला। पाप - पुन्न की कोइर् बात नहीं। मैं ही कौन दिनभर पुन्न किया करता हूँ? दमड़ी - छदाम - कौडि़यों के लिए टेनी मारता हूँ! बाट खोटे रखता हूँ, तेल की मिठाइर् को घी की कहकर बेचता हूँ। इर्मान गँवाने पर भी वुफछ नहीं लगता। जानता हूँ, यह बुरा काम है पर बाल - बच्चों को पालना भी तो शरूरी है। इसने इर्मान खोया, तो वुफछ लेकर खोया, गुनाह बेलज्जत नहीं रहा। अब दो - तीन दुकानों का और ठेका ले लेगा। ऐसा ही कोइर् माल मेरे हाथ भी पड़ जाता, तो ¯जदगानी सुपफल हो जाती। जगधर के मन में इर्ष्यार् का अंवुफर जमा। वह भैरों के घर से लौटा तो देखा कि सूरदास राख को बटोरकर उसे आटे की भाँति गूँथ रहा है। सारा शरीर भस्म से ढका हुआ है और पसीने की धरें निकल रही हैं। बोलाμसूरे, क्या ढूँढ़ते हो? सूरदास μ वुफछ नहीं। यहाँ रखा ही क्या था! यही लोटा - तवा देख रहा था। जगधर μ और वह थैली किसकी है, जो भैरों के पास है? सूरदास चैंका। क्या इसीलिए भैरों आया था? जरूर यही बात है। घर में आग लगाने के पहले रुपये निकाल लिए होंगे। लेकिन अंधे भ्िाखारी के लिए दरिद्रता इतनी लज्जा की बात नहीं है, जितना धन। सूरदास जगधर से अपनी आ£थक हानि को गुप्त रखना चाहता था। वह गया जाकर ¯पडदान करना चाहता था, मिठुआ का ब्याह करना चाहता था, वुफआँ बनवाना चाहता था, ¯कतु इस ढंग से कि लोगों को आश्चयर् हो कि इसके पास रुपये कहाँ से आए, लोग यही समझें कि भगवान दीनजनों की सहायता करते हैं। भ्िाखारियों के लिए धन - संचय पाप - संचय से कम अपमान की बात नहीं है। बोलाμमेरे पास थैली - वैली कहाँ? होगी किसी की। थैली होती, तो भीख माँगता?जगधर μ मुझसे उड़ते हो? भैरों मुझसे स्वयं कह रहा था कि झोंपड़े में धरन के ऊपर यह थैली मिली। पाँच सौ रुपये से वुफछ बेसी हैं। सूरदासμवह तुमसे हँसी करता होगा। साढ़े पाँच रुपये तो कभी जुड़े ही नहीं, साढ़े पाँच सौ कहाँ से आते! 6 ध् अंतराल इतने में सुभागी वहाँ आ पहुँची। रातभर मंदिर के पिछवाड़े अमरूद के बाग में छिपी बैठी थी। वह जानती थी, आग भैरों ने लगाइर् है। भैरों ने उस पर जो कलंक लगाया था, उसकी उसे विशेष ¯चता न थी क्योंकि वह जानती थी किसी को इस पर विश्वास न आएगा। लेकिन मेरे कारण सूरदास का यों सवर्नाश हो जाए, इसका उसे बड़ा दुःख था। वह इस समय उसको तस्कीन देने आइर् थी। जगधर को वहाँ खड़े देखा, तो झिझकी। भय हुआ, कहीं यह मुझे पकड़ न ले। जगधर को वह भैरों ही का दूसरा अवतार समझती थी। उसने प्रण कर लिया था कि अब भैरों के घर न जाउँफगी, अलग रहूँगी और मेहनत - मजूरी करके जीवन का निवार्ह करूँ गी। यहाँ कौन लड़के रो रहे हैं, एक मेरा ही पेट उसे भारी है न? अब अकेले ठोंके और खाए, और बुढि़या के चरण धो - धोकर पिए, मुझसे तो यह नहीं हो सकता। इतने दिन हुए, इसने कभी अपने मन से धेले का सेंदुर भी न दिया होगा, तो मैं क्यों उसके लिए मरूँ? वह पीछे लौटना ही चाहती थी कि जगधर ने पुकाराμसुभागी, कहाँ जाती है? देखी अपने खसम की करतूत, बेचारे सूरदास को कहीं का न रखा। सुभागी ने समझा, मुझे झाँसा दे रहा है। मेरे पेट की थाह लेने के लिए यह जाल पेंफका है। व्यंग्य से बोलीμउसके गुरु तो तुम्हीं हो, तुम्हीं ने मंत्रा दिया होगा। जगधर μ हाँ, यही मेरा काम है, चोरी - डाका न सिखाउँफ, तो रोटियाँ क्योंकर चलें...! जब तक समझता था, भला आदमी है, साथ बैठता था, हँसता - बोलता था, लेकिन आज से कभी उसके पास बैठते देखा, तो कान पकड़ लेना। जो आदमी दूसरों के घर में आग लगाए, गरीबों के रुपये चुरा ले जाए, वह अगर मेरा बेटा भी हो तो उसकी सूरत न देखूँ। सूरदास ने न जाने कितने जतन से पाँच सौ रुपये बटोरे थे। वह सब उड़ा ले गया। कहता हूँ, लौटा दो, तो लड़ने पर तैयार होता है। सूरदासμ पिफर वही रट लगाए जाते हो। कह दिया कि मेरे पास रुपये नहीं थे, कहीं और जगह से मार लाया होगा, मेरे पास पाँच सौ रुपये होते, तो चैन की बंसी न बजाता, दूसरों के सामने हाथ क्यों पसारता? जगधर μ सूरे, अगर तुम भरी गंगा में कहो कि मेरे रुपये नहीं हैं, तो मैं न मानूँगा। मैंने अपनी आँखों से वह थैली देखी है। भैरों ने अपने मुँह से कहा कि यह थैली झोंपडे़ में धरन के उफपर मिली। तुम्हारी बात वैफसे मान लूँ? सुभागी μ तुमने थैली देखी है? जगधरμहाँ, देखी नहीं तो क्या झूठ बोल रहा हूँ? सुभागी μ सूरदास, सच - सच बता दो, रुपये तुम्हारे हैं! सूरदास μ पागलहो गइर्हैक्या? इनकी बातोंमेंआ जातीहै!भलामेरेपास रुपयेकहाँ से आते? जगधरμइनसे पूछ, रुपये न थे, तो इस घड़ी राख बटोरकर क्या ढूँढ़ रहे थे? सूरदास की झोंपड़ीध्7 सुभागी ने सूरदास के चेहरे की तरप़्ाफ अन्वेषण की दृष्िट से देखा। उसकी उस बीमार की - सी दशा थी, जो अपने पि्रयजनों की तस्कीन के लिए अपनी असह्य वेदना को छिपाने का असपफल प्रयत्न कर रहा हो। जगधर के निकट आकर बोलीμरुपये जरूर थे, इसका चेहरा कहे देता है। जगधर μ मैंने थैली अपनी आँखों से देखी है। सभ्ुाागी μ अब चाहे वह मुझे मारे या निकाले पर रहूँगी उसी के घर। कहाँ - कहाँ थैली को छिपाएगा? कभी तो मेरे हाथ लगेगी। मेरे ही कारण इस पर यह बिपत पड़ी है। मैंने ही उजाड़ा है, मैं ही बसाउँफगी। जब तक इसके रुपये न दिला दूँगी, मुझे चैन न आएगी। यह कहकर वह सूरदास से बोलीμतो अब रहोगे कहाँ? सूरदास ने यह बात न सुनी। वह सोच रहा थाμरुपये मैंने ही तो कमाए थे, क्या पिफर नहीं कमा सकता? यही न होगा, जो काम इस साल होता, वह वुफछ दिनों के बाद होगा। मेरे रुपये थे ही नहीं, शायद उस जन्म में मैंने भैरों के रुपये चुराए होंगे। यह उसी का दंड मिला है। मगर बेचारी सुभागी का अब क्या हाल होगा? भैरों उसे अपने घर में कभी न रखेगा। बिचारी कहाँ मारी - मारी पिफरेगी! यह कलंक भी मेरे सिर लगना था। कहीं का न हुआ। धन गया, घर गया, आबरू गइर्ऋ शमीन बच रही है, यह भी न जाने, जाएगी या बचेगी। अंधापन ही क्या थोड़ी बिपत थी कि नित ही एक - न - एक चपत पड़ती रहती है। जिसके जी में आता है, चार खोटी - खरी सुना देता है। इन दुःखजनक विचारों से ममार्हत - सा होकर वह रोने लगा। सुभागी जगधर के साथ भैरों के घर की ओर चली जा रही थी और यहाँ सूरदास अकेला बैठा हुआ रो रहा था। सहसा वह चैंक पड़ा। किसी ओर से आवाश आइर्μतुम खेल में रोते हो! मिठुआ घीसू के घर से रोता चला आता था, शायद घीसू ने मारा था। इस पर घीसू उसे चिढ़ा रहा थाμखेल में रोते हो! सूरदास कहाँ तो नैराश्य, ग्लानि, ¯चता और क्षोभ के अपार जल में गोते खा रहा था, कहाँ यह चेतावनी सुनते ही उसे ऐसा मालूम हुआ, किसी ने उसका हाथ पकड़कर किनारे पर खड़ा कर दिया। वाह! मैं तो खेल में रोता हूँ। कितनी बुरी बात है! लड़के भी खेल में रोना बुरा समझते हैं, रोनेवाले को चिढ़ाते हैं, और मैं खेल में रोता हूँ। सच्चे ख्िालाड़ी कभी रोते नहीं, बाशी - पर - बाशी हारते हैं, चोट - पर - चोट खाते हैं, धक्के - पर - धक्के सहते हैं पर मैदान में डटे रहते हैं, उनकी त्योरियों पर बल नहीं पड़ते। हिम्मत उनका साथ नहीं छोड़ती, दिल पर मालिन्य के छींटे भी नहीं आते, न किसी से जलते हैं, न चिढ़ते हैं। खेल में रोना वैफसा? खेल हँसने के लिए, दिल बहलाने के लिए है, रोने के लिए नहीं। सूरदास उठ खड़ा हुआ, और विजय - गवर् की तरंग में राख के ढेर को दोनों हाथों से उड़ाने लगा। 8 ध् अंतराल आवेग में हम उिष्ट स्थान से आगे निकल जाते हैं। वह संयम कहाँ है, जो शत्राु पर विजय पाने के बाद तलवार को म्यान में कर ले? एक क्षण में मिठुआ, घीसू और मुहल्ले के बीसों लड़के आकर इस भस्म - स्तूप के चारों ओर जमा हो गए और मारे प्रश्नों के सूरदास को परेशान कर दिया। उसे राख पेंफकते देखकर सबों को खेल हाथ आया। राख की वषार् होने लगी। दम - के - दम में सारी राख बिखर गइर्, भूमि पर केवल काला निशान रह गया। सूरदास की झोंपड़ीध्9 मिठुआ ने पूछाμदादा, अब हम रहेंगे कहाँ? सूरदास μ दूसरा घर बनाएँगे। मिठुआμऔर कोइर् पिफर आग लगा दे? सूरदास μ तो पिफर बनाएँगे। मिठुआμऔर पिफर लगा दे? सूरदास μ तो हम भी पिफर बनाएँगे। मिठुआμऔर कोइर् हजार बार लगा दे? सूरदास μ तो हम हजार बार बनाएँगे। बालकों को संख्याओं से विशेष रुचि होती है। मिठुआ ने पिफर पूछाμऔर जो कोइर् सौ लाख बार लगा दे?सूरदास ने उसी बालोचित सरलता से उत्तर दियाμतो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे। ˆ‘रंगभूमि’ उपन्यास का अंश प्रश्न - अभ्यास 1.‘चूल्हा ठंडा किया होता, तो दुश्मनों का कलेजा वैफसे ठंडा होता?’ नायकराम के इस कथन में निहित भाव को स्पष्ट कीजिए। 2.भैरों ने सूरदास की झोपड़ी क्यों जलाइर्? 3.‘यह पूफस की राख न थी, उसकी अभ्िालाषाओं की राख थी।’ संदभर् सहित विवेचन कीजिए। 4.जगधर के मन में किस तरह का इर्ष्यार् - भाव जगा और क्यों? 5.सूरदास जगधर से अपनी आ£थक हानि को गुप्त क्यों रखना चाहता था? 6.‘सूरदास उठ खड़ा हुआ और विजय - गवर् की तरंग में राख के ढेर को दोनों हाथों से उड़ाने लगा।’ इस कथन के संदभर् में सूरदास की मनोदशा का वणर्न कीजिए। 7.‘तो हम सौ लाख बार बनाएँगे’ इस कथन के संदभर् में सूरदास के चरित्रा का विवेचन कीजिए। 10 ध् अंतराल योग्यता - विस्तार 1.इस पाठ का नाट्य रूपांतर कर उसकी प्रस्तुति कीजिए। 2.प्रेमचंद के उपन्यास ‘रंगभूमि’ का संक्ष्िाप्त संस्करण पढि़ए। शब्दाथर् और टिप्पणी उपचेतना - नींद में जागते रहने का अहसास अग्िनदाह - आग की लपटें, आग का दहन चिताग्िन - चिता में लगी अग्िन खुटाइर् - खोट तस्कीन - तसल्ली, दिलासा भूबल - उफपर राख नीचे आग अदावत - दुश्मनी जरीबाना - जुमार्ना, दंड नाहक - बेमतलब, अकारण रुपयों की गरमी - धन का घमंड बल्लमटेर - लुटेरे, गुंडे - बदमाश मसक्कत - मशक्कत, मेहनत, परिश्रम हसद - इर्ष्यार्, डाह छाती पर साँप लोटना - इर्ष्यार् करना टेनी मारना - कम तौलना बाट खोटे रखना - तौल सही नहीं रखना इर्मान गँवाना - बेइर्मानी करना गुनाह बेलज्जत नहीं रहना - बिना किसी लाभ के गुनाह नहीं करना झिझकी - संकोच किया झाँसा देना - भ्रमित करना पेट की थाह लेना - अंदर की बात जानना इर्मान बेचना - विवशता के कारण झूठा या गलत आचरण करना गोते खाना - इधर - उधर डूबना - उतराना विजय - गवर् की तरंग - विजय की खुशी, खुशी की उमंग में उिष्ट - निश्िचत, निधार्रित सूरदास की झोंपड़ी ध्11

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