16 जन्म: 15 प़्ाफरवरी, सन् 1917, अजमेर ;राजस्थानद्ध प्रमुख रचनाएँ: शदर् गुलाब ;उदूर् कहानी संग्रहद्ध सम्मान: सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार, उदूर् अकादेमी, उत्तर - प्रदेश, अख्िाल भारतीय लेख्िाका संघ अवाडर् निध्न: 18 दिसंबर, सन् 1979 हमारे दृढ़ संकल्प ही हमारी ताकत हैं, हमारा लिखना ही हमें ¯शदा रखता है। रिाया सज्जाद शहीर मूलतः उदूर् की कथाकार हैं। उन्होंने बी.ए. तक की श्िाक्षा घर पर रहकर ही प्राप्त की। विवाह के बाद उन्होंने इलाहाबाद से उदूर् में एम.ए. की परीक्षा उत्तीणर् की। सन् 1947 में वे अशमेर से लखनउफ आईं और वहाँ करामत हुसैन गल्सर् काॅलेज में पढ़ाने लगीं। सन् 1965 मंे उनकी नियुक्ित सोवियत सूचना विभाग में हुइर्। आधुनिक उदर्ू कथा - साहित्य में उनका महत्त्वपूणर् स्थान है। उन्होंने कहानी और उपन्यास दोनों लिखे हैं, उदूर् में बाल - साहित्य की रचना भी की है। मौलिक सजर्न के साथ - साथ उन्होंने कइर् अन्य भाषाओं से उदूर् में वुफछ पुस्तकों के अनुवाद भी किए हैं। रिाया जी की भाषा सहज, सरल और मुहावरेदार है। उनकी वुफछ कहानियाँ देवनागरी में भी लिप्यांतरित हो चुकी हैं। रिाया सज्जाद शहीर की कहानियों में सामाजिक सद्भाव, धामिर्क सहिष्णुता और आधुनिक संदभो± में बदलते हुए पारिवारिक मूल्यों को उभारने का सपफल प्रयास मिलता है। सामाजिक यथाथर् और मानवीय गुणों का सहज सामंजस्य उनकी कहानियों की विशेषता है। नमक उन सिख बीबी को देखकर सप्िाफया हैरान रह गइर् थी, किस़कदर वह उसकी माँ से मिलती थी। वही भारी भरकम जिस्म, छोटी - छोटी चमकदार आँखें, जिनमें नेकी, मुहब्बत और रहमदिली की रोशनी जगमगाया करती थी। चेहरा जैसे कोइर् खुली हुइर् किताब। वैसा ही सपेफद बारीक मलमल का दुप़‘ा जैसा उसकी अम्मा मुहरर्म में ओढ़ा करती थी। जब सप्िाफया ने कइर् बार उनकी तरप़्ाफ मुहब्बत से देखा़तो उन्होंने भी उसके बारे में घर की बहू से पूछा। उन्हें बताया गया कि ये मुसलमान हैं। कल ही सुबह लाहौर जा रही हैं अपने भाइयों से मिलने, जिन्हें इन्होंने कइर् साल से नहीं देखा। लाहौर का नाम सुनकर वे उठकर सप्ि़ाफया के पास आ बैठीं और उसे बताने लगीं कि उनका लाहौर कितना प्यारा शहर है। वहाँ के लोग वैफसे खूबसूरत होते हैं, उम्दा खाने और नप़्ाफीस कपड़ों के शौकीन, सैर - सपाटे के रसिया, ¯शदादिली की तसवीर। कीतर्न होता रहा। वे आहिस्ता - आहिस्ता बातें करती रहीं। सप्ि़ाफया ने दो - एक बार बीच में पूछा भी,फ्माता जी, आपको तो यहाँ आए बहुत साल हो गए होंगे।य् फ्हाँ बेटी! जब ¯हदुस्तान बना था तभी आए थे। वैसे तो अब यहाँ भी हमारी कोठी बन गइर् है। बिशनेस है, सब ठीक ही है, पर लाहौर बहुत याद आता है। हमारा वतन तो जी लाहौर ही है।य् पिफर पलकों से वुफछ सितारे टूटकर दूिाया आँचल में समा जाते हैं। बात आगे चल पड़ती, मगर घूम - पिफरकर पिफर उसी जगह पर आ जाती - - ‘साडा लाहौर’! कीतर्न कोइर् ग्यारह बजे खत्म हुआ। जब वे प्रसाद हाथ में लिए उठने लगीं और साप्ि़़ाफया के सलाम के जवाब में दुआएँ देती हुइर् रफखसत होने लगीं तब सप्िाफया ने धीमे से पूछा, फ्आप लाहौर से कोइर् सौगात मँगाना चाहें तो मुझे हुक्म दीजिए।य् वे दरवाशे से लगी खड़ी थीं। हिचकिचाकर बहुत ही आहिस्ता से बोलीं, फ्अगर ला सको तो थोड़ा - सा लाहौरी नमक लाना।य् पंद्रह दिन यों गुशरे कि पता ही नहीं चला। ज्िामखाना की शामें, दोस्तों की मुहब्बत, भाइयों की खातिरदारियाँ - उनका बस न चलता था कि बिछुड़ी हुइर् परदेसी बहिन के लिए क्या वुफछ न कर दें! दोस्तों, अशीशों की यह हालत कि कोइर् वुफछ लिए आ रहा है, कोइर् वुफछ। कहाँ रखें, वैफसे पैक करें, क्यों कर ले जाएँ - एक समस्या थी। सबसे बड़ी समस्या थी बादामी कागश की एक पुडि़या की जिसमें कोइर् सेर भर लाहौरी नमक था। सप्ि़़ाफया का भाइर् एक बहुत बड़ा पुलिस अपफसर था। उसने सोचा कि वह ठीक राय दे सकेगा। चुपके से पूछने लगी, फ्क्यों भैया, नमक ले जा सकते हैं?य् वह हैरान होकर बोला, फ्नमक? नमक तो नहीं ले जा सकते, गैरकानूनी है और... और नमक का आप क्या करेंगी? आप लोगों के हिस्से में तो हमसे बहुत श्यादा नमक आया है।य् वह झुँझला गइर्, फ्मैं हिस्से - बखरे की बात नहीं कर रही हूँ, आया होगा। मुझे तो लाहौर का नमक चाहिए, मेरी माँ ने यही मँगवाया है।य् भाइर् की समझ में वुफछ नहीं आया। माँ का क्यों िाक्र था, वे तो बँटवारे से पहले ही मर चुकी थीं। शरा नरमी से समझाने के अंदाश में बोला, फ्देख्िाए बाजी! आपको कस्टम से गुशरना है और अगर एक भी चीश ऐसी - वैसी निकल आइर् तो आपके सामान की ¯चदी - ¯चदी बिखेर देंगे कस्टमवाले। कानून जो...य् वह बिगड़कर बोलीं, फ्निकल आने का क्या मतलब, मैं क्या चोरी से ले जाउफँगी? छिपा के ले जाउफँगी? मैं तो दिखा के, जता के ले जाउफँगी?य् फ्भइर्, यह तो आप बहुत ही गलत बात करेंगी।... कानून...।य् फ्अरे, पिफर वही कानून - कानून कहे जाते हो! क्या सब कानून हुवूफमत के ही होते हैं, वुफछ मुहब्बत, मुरौवत, आदमियत, इंसानियत के नहीं होते? आख्िार कस्टमवाले भी इंसान होते हैं, कोइर् मशीन तो नहीं होते।य् फ्हाँ, वे मशीन तो नहीं होते, पर मैं आपको यकीन दिलाता हूँ वे शायर भी नहीं होते। उनको तो अपनी ड्यूटी करनी होती हैं।य् फ्अरे बाबा, तो मैं कब कह रही हूँ कि वह ड्यूटी न करें। एक तोहप़्ाफा है, वह भी चंद पैसों का, शौक से देख लें, कोइर् सोना - चाँदी नहीं, स्मगल की हुइर् चीश नहीं, ब्लैक मावेर्फट का माल नहीं।य् फ्अब आपसे कौन बहस करे। आप अदीब ठहरीं और सभी अदीबों का दिमाग थोड़ा - सा तो शरूर ही घूमा हुआ होता है। वैसे मैं आपको बताए देता हूँ कि आप ले नहीं जा पाएँगी और बदनामी मुफ्ऱत में हम सबकी भी होगी। आख्िार आप कस्टमवालों को कितना जानती हैं?य् उसने गुस्से से जवाब दिया, फ्कस्टमवालों को जानें या न जानें, पर हम इंसानों को थोड़ा - सा शरूर जानते हैं। और रही दिमाग की बात सो अगर सभी लोगों का दिमाग हम अदीबों की तरह घूमा हुआ होता तो यह दुनिया वुफछ बेहतर ही जगह हो जाती, भैया।य् मारे गुस्से के उसकी आँखों से आँसू बहने लगे थे। उसका भाइर् सिर हिलाकर चुप हो गया। अगले रोश दो बजे दिन को उसे रवाना होना था। सुबह के लिए बहुत व्यस्त कायर्क्रम बन चुका था, इसलिए उसे सारी पैविंफग रात ही को करनी थी। कमरे का दरवाशा अंदर से बंद करके वह सामान बाँधने लगी। इधर - उधर पैफली हुईं चीशंे धीरे - धीरे सिमटकर सूटकेस और बिस्तरबंद में चली गईं। सिप़्ार्फ दो चीशें रह गईं। एक तो वह छोटी - सी टोकरी जिसमें कीनू थे, एक दोस्त का तोहपफा - संतरे और माल्टे को मिलाकर पैदा किया गया पफल, माल्टे़की तरह रंगीन और मीठा, संतरे की तरह नाशुक। और दूसरी थी वह नमक की पुडि़या। अब तक सप्िाफया का गुस्सा उतर चुका था। भावना के स्थान पर बुि धीरे - धीरे उस़पर हावी हो रही थी। नमक की पुडि़या ले तो जानी है, पर वैफसे? अच्छा, अगर इसे हाथ में ले लें और कस्टमवालों के सामने सबसे पहले इसी को रख दें? लेकिन अगर कस्टमवालों ने न जाने दिया! तो मशबूरी है, छोड़ देंगे। लेकिन पिफर उस वायदे का क्या होगा जो हमने अपनी माँ से किया था? हम अपने को सैयद कहते हैं। पिफर वायदा करके झुठलाने के क्या मायने? जान देकर भी वायदा पूरा करना होगा। मगर वैफसे? अच्छा, अगर इसे कीनुओं की टोकरी में सबसे नीचे रख लिया जाए तो इतने कीनुओं के ढेर में भला कौन इसे देखेगा? और अगर देख लिया? नहीं जी, पफलों की टोकरियाँ तो आते वक्त भी किसी की नहीं देखी जा रही थीं। उधर से केले, इधर से कीनू सब ही ला रहे थे, ले जा रहे थे। यही ठीक है, पिफर देखा जाएगा। उसने कीनू कालीन पर उलट दिए। टोकरी खाली की और नमक की पुडि़या उठाकर टोकरी की तह में रख दी। एक बार झाँककर उसने पुडि़या को देखा और उसे ऐसा महसूस हुआ मानो उसने अपनी किसी प्यारे को कब्र की गहराइर् में उतार दिया हो! वुफछ देर उकड़ँूबैठी वह पुडि़या को तकती रही और उन कहानियों को याद करती रही जिन्हें वह अपने बचपन में अम्मा से सुना करती थी, जिनमें शहजादा अपनी रान चीरकर हीरा छिपा लेता था और देवों, खौप़्ाफनाक भूतों तथा राक्षसों के सामने से होता हुआ सरहदों से गुशर जाता था। इस शमाने में ऐसी कोइर् तरकीब नहीं हो सकती थी वरना वह अपना दिल चीरकर उसमें यह नमक छिपा लेती। उसने एक आह भरी। पिफर वह कीनुओं को एक - एक करके टोकरी में रखने लगी, पुडि़या के इधर - उधर, आसपास और पिफर उफपर, यहाँ तक कि वह बिलवुफल छिप गइर्। आश्वस्त होकर उसने हाथ झाडे़, सूटकेस पलंग के नीचे ख्िासकाया, टोकरी उठाकर पलंग के सिरहाने रखी, और लेटकर दोहर ओढ़ ली। रात को तकरीबन डेढ़ बजे थे। माचर् की सुहानी हवा ख्िाड़की की जाली से आ रही थी। बाहर चाँदनी साप़्ाफ और ठंडी थी। ख्िाड़की के करीब लगा चंपा का एक घना दरख्त आरोह सामने की दीवार पर पिायों के अक्स लहका रहा था। कभी किसी तरप़्ाफ से किसी की दबी हुइर् खाँसी की आहट, दूर से किसी वुफत्ते के भौंकने या रोने की आवाश, चैकीदार की सीटी और पिफर सÂाटा! यह पाकिस्तान था। यहाँ उसके तीन सगे भाइर् थे, बेशुमार चाहनेवाले दोस्त थे, बाप की कब्र थी, नन्हे - नन्हे भतीजे - भतीजियाँ थीं जो उससे बड़ी मासूमियत से पूछते, ‘‘पूफप़्ाफीजान, आप ¯हदुस्तान में क्यों रहती हैं, जहाँ हम लोग नहीं आ सकते।’’ उन सबके और सप्ि़ाफया के बीच में एक सरहद थी और बहुत ही नोकदार लोहे की छड़ों का जंगला, जो कस्टम कहलाता था। कल वह लाहौर से चली जाएगी। हो सकता है, सालभर बाद पिफर आए। एक साल से पहले तो वह आ भी नहीं सकती थी और यह भी हो सकता था कि अब कभी न आ सके। उसकी आँखें आहिस्ता - आहिस्ता बंद होने लगीं। पिफर उसे एक सपेफद दुप़‘े का दूिाया आँचल लहराता दिखाइर् देने लगा, जिस पर यहाँ - वहाँ सितारे झिलमिला रहे थे - हमें वहाँ से आए तो बहुत दिन हो गए, यहाँ हमारी कोठी भी है, बिशनेस भी, हम यहाँ बस भी गए हैं, पर हमारा वतन तो जी लाहौर ही है। पिफर दिखा इकबाल का मकबरा, लाहौर का किला, किले के पीछे डूबते हुए सूरज की नारंगी किरणें, आसपास से पैफलता - उभरता अँधेरा, उस रंगीन अँधेरे में बहती हुइर् नरम हवा। उस हवा में रची हुइर् मौलसिरी की खुशबू और मकबरे की सीढि़यों पर बैठे हुए दो इंसान - सिर झुकाए चुपचाप, उदास, जैसे दो बेजान परछाइयाँ। फ्तो तुम कल चली जाओगी?य् फ्हाँ!य् फ्अब कब आओगी?य् फ्मालूम नहीं, शायद अगले साल। शायद कभी नहीं।य् अचानक उसकी आँखें खुल गईं। शायद उसने मकबरे की सीढि़यों के नीचे लगी दूब से एक पत्ती तोड़ी थी जिस पर ठंडी ओस जमनी शुरू हो गइर् थी। हुआ यह था कि नींद में करवट लेते हुए उसका हाथ कीनुओं से लबालब भरी टोकरी पर जा पड़ा था - रसीले, ठंडे कीनू जिनको देते वक्त उसके दोस्त ने कहा था, फ्यह ¯हदुस्तान - पाकिस्तान की एकता का मेवा है।य् सप्िाफया प़्ाफस्टर् क्लास के वे¯टग रूम में बैठी थी। देहली तक का किराया उसके भाइऱ्ने दिया था। वह हाथ में टिकट दबाए वेटिंग रूम के बाहर प्लेटपफामर् पर टहल रहा था। वह अंदर बैठी चाय की प्याली हाथ में लिए कीनुओं की टोकरी पर निगाहें जमाए यह सोच रही थी कि आसपास, इधर - उधर इतने लोग हैं, लेकिन सिप़्ार्फ वही जानती है कि टोकरी की तह में कीनुओं के नीचे नमक की पुडि़या है। जब उसका सामान कस्टम पर जाँच के लिए बाहर निकाला जाने लगा तो उसे एक झिरझिरी - सी आइर् और एकदम से उसने प़़्ौफसला किया कि मुहब्बत का यह तोहपफा चोरी से नहीं जाएगा, नमक कस्टमवालों को दिखाएगी वह। उसने जल्दी से पुडि़या निकाली और हैंडबैग में रख ली, जिसमें उसका पैसों का पसर् और पासपोटर् आदि थे। जब सामान कस्टम से होकर रेल की तरप़़़्ाफ बढ़ी। श्यादातर मेशेंाफ चला तो वह एक कस्टम अपफसर की तरप्खाली हो चुकी थीं। एक - दो पर इक्का - दुक्का सामान रखा था। वहीं एक साहब खड़े थे - लंबा कद, दुबला - पतला जिस्म, ख्िाचड़ी बाल, आँखों पर ऐनक। वे कस्टम अप़्ाफसर की वदीर् पहने तो थे मगर उन पर वह वुफछ जँच नहीं रही थी। सप्ि़ाफया वुफछ हिचकिचाकर बोली, फ्मैं आपसे वुफछ पूछना चाहती हूँ।य् उन्होंने नशर भरकर उसे गौर से देखा। बोले, फ्प़्ाफरमाइए।य् उनके लहजे ने सप्िाफया की हिम्मत बढ़ा दी, फ्आप...आप कहाँ के रहने वाले हैं?य़्उन्होंने वुफछ हैरान होकर उसे पिफर गौर से देखा, फ्मेरा वतन देहली है, आप भी तो हमारी ही तरपफ की मालूम होती हैं, अपने अजीशों से मिलने आइर् होंगी।य़्फ्जी हाँ। मैं लखनउफ की हूँ। अपने भाइयों से मिलने आइर् थी। वे लोग इधर आ गए हैं। आपको...आपको भी तो शायद इधर आए - ?य् फ्जी, जब पाकिस्तान बना था तभी आए थे, मगर हमारा वतन तो देहली ही है।य् सप्िाफया ने हैंडबैग मेश पर रख दिया और नमक की पुडि़या निकालकर उनके सामने़रख दी और पिफर आहिस्ता - आहिस्ता रफक - रफक कर उनको सब वुफछ बता दिया। उन्होंने पुडि़या को धीरे से अपनी तरपफ सरकाना शुरू किया। जब सप्ि़ाफया की बात़खत्म हो गइर् तब उन्होंने पुडि़या को दोनों हाथों में उठाया, अच्छी तरह लपेटा और खुद सप्िाफया के बैग में रख दिया। बैग सप्ि़़ाफया को देते हुए बोले, फ्मुहब्बत तो कस्टम से इस तरह गुशर जाती है कि कानून हैरान रह जाता है।य् वह चलने लगी तो वे भी खड़े हो गए और कहने लगे, फ्जामा मस्िजद की सीढि़यों को मेरा सलाम कहिएगा और उन खातून को यह नमक देते वक्त मेरी तरप़्ाफ से कहिएगा कि लाहौर अभी तक उनका वतन है और देहली मेरा, तो बाकी सब रफ्रता - रफ्रता ठीक हो जाएगा।य् ाफामर् पर आ गइर् और वे वहीं खड़े रहे। प्लेटपफामर् पर उसके बहुत - से दोस्त, भाइर् रिश्तेदार थे, हसरत भरी नशरों, बहते हुए आँसुओं, ठंडी साँसों और भ्िाचे हुए होठों को बीच में से काटती हुइर् रेल सरहद की तरपफ बढ़ी। अटारी में पाकिस्तानी पुलिस उतरी, ¯हदुस्तानी पुलिस सवार हुइर्। वुफछ समझ में नहीं आता था कि कहाँ से लाहौर खत्म हुआ और किस जगह से अमृतसर शुरू हो गया। एक सप्ि़ाफया कस्टम के जंगले से निकलकर दूसरे प्लेटप़्आरोह शमीन थी, एक शबान थी, एक - सी सूरतें और लिबास, एक - सा लबोलहजा, और अंदाश थे, गालियाँ भी एक ही - सी थीं जिनसे दोनों बड़े प्यार से एक - दूसरे को नवाश रहे थे। बस मुश्िकल सिप़्ार्फ इतनी थी कि भरी हुइर् बंदूवेंफ दोनों के हाथों में थीं। अमृतसर में कस्टम वाले प़्ाफस्टर् क्लास वालों के सामान की जाँच उनके डिब्बे के सामने ही कर रहे थे। सप्ि़़ाफया का सारा सामान देखा जा चुका तो वह उन नौजवान कस्टम अपफसर की ओर बढ़ी जो बातचीत और सूरत से बंगाली लगते थे, फ्देख्िाए, मेरे पास नमक है, थोड़ा - सा।य् पिफर उसने हैंडबैग खोला और वह पुडि़या उनकी तरपफ बढ़ाते हुए, अटकते, झिझकते,़हिचकिचाते हुए उनको सब - वुफछ कह सुनाया। उन्होंने सिर झुका लिया था, सुनते रहे, बीच - बीच में सिर उठाते, गौर से उसे देखते, पिफर सुनने लगते। बात पूरी हो गइर् तो उन्होंने एक बार पिफर सप्ि़ाफया को उफपर से नीचे तक देखा, धीरे से बोले, फ्इधर आइए शरा!य् चलते - चलते उन्होंने एक - दूसरे से कहा, फ्इनके सामान का ध्यान रख्िाएगा।य् प्लेटपफामर् के सिरे पर एक कमरा था। वे उसके अंदर घुसे। सप्ि़ाफया दाख्िाल होते़हिचकिचाइर्। वे मुसकराकर बोले, फ्आइए, आइए न!य् जेब से रूमाल निकालकर उन्होंने वुफसीर् को झाड़ा और बोले, फ्बैठिए।य् सप्ि़़ाफया ने पुडि़या और बैग को मेज पर रख दिया। बाहर की तरपफ झाँककर उन्होंने एक पुलिस वाले को इशारा किया। सप्ि़ाफया के पैर तले की शमीन ख्िासकने लगी - अब क्या होगा! फ्दो चाय लाओ, अच्छी वाली।य् पुलिसवाला सप्िाफया को घूरता हुआ चला गया।़पिफर उन्होंने मेश की दराश खींची और उसमें अंदर दूर तक हाथ डालकर एक किताब निकाली। किताब को सप्ि़़ाफया के सामने रखकर उन्होंने पहला सपफा खोल दिया। बाईं ओर नशरफल इस्लाम की तसवीर थी और टाइटल वाले सप़्ोफ पर अंग्रेशी के वुफछ धुँधले शब्द थे - फ्शमसुलइसलाम की तरप़्ाफ से सुनील दास गुप्त को प्यार के साथ, ढाका 1946य् फ्तो आप क्या इर्स्ट बंगाल के हैं?य् फ्हाँ, मेरा वतन ढाका है।य् उन्होंने बड़े पफख़्र से जवाब दिया। फ्तो आप यहाँ कब आए?य् फ्जब डिवीशन हुआ तभी आए, मगर हमारा वतन ढाका है, मैं तो कोइर् बारह - तेरह साल का था। पर नशरफल और टैगोर को तो हम लोग बचपन से पढ़ते थे। जिस दिन हम रात यहाँ आ रहे थे उसके ठीक एक वषर् पहले मेरे सबसे पुराने, सबसे प्यारे, बचपन के दोस्त ने मुझे यह किताब दी थी। उस दिन मेरी सालगिरह थी - पिफर हम कलकत्ता रहे, पढ़े, नौकरी भी मिल गइर्, पर हम वतन आते - जाते थे।य् फ्वतन?य् सप्ि़ाफया ने शरा हैरान होकर पूछा। फ्मैंने आपसे कहा न कि मेरा वतन ढाका है।य् - उन्होंने शरा बुरा मानकर कहा। फ्हाँ - हाँ, ठीक है। ठीक है।य् सप्ि़ाफया जल्दी से बोली। फ्तो पहले तो बस इधर ही कस्टम था, अब उधर भी वुफछ गोलमाल हो गया है।य् उन्होंने चाय की प्याली सप्ि़़ाफया की तरपफ ख्िासकाइर् और खुद एक बड़ा - सा घूँट भरकर बोले, फ्वैसे तो डाभ कलकत्ता में भी होता है जैसे नमक यहाँ भी होता है, पर हमारे यहाँ के डाभ की क्या बात है! हमारी शमीन, हमारे पानी का मशा ही वुफछ और है!य् उठते वक्त उन्होंने पुडि़या सप्ि़ाफया के बैग में रख दी और खुद उस बैग को उठाकर आगे - आगे चलने लगेऋ सप्ि़ाफया ने उनके पीछे चलना शुरू किया। जब सप्ि़ाफया अमृतसर के पुल पर चढ़ रही थी तब पुल की सबसे निचली सीढ़ी के पास वे सिर झुकाए चुपचाप खड़े थे। सप्िाफया सोचती जा रही थी किसका वतन कहाँ है - वह़जो कस्टम के इस तरप़्ाफ है या उस तरपफ!़अभ्यास पाठ के साथ 1.सप्ि़ाफया के भाइर् ने नमक की पुडि़या ले जाने से क्यों मना कर दिया? 2.नमक की पुडि़या ले जाने के संबंध में सप्ि़ाफया के मन में क्या द्वंद्व था? 3.जब सप्ि़ाफसर निचली सीढ़ी के पास सिर झुकाएाफया अमृतसर पुल पर चढ़ रही थी तो कस्टम आॅप्ि़चुपचाप क्यों खड़े थे? 4.लाहौर अभी तक उनका वतन है और देहली मेरा या मेरा वतन ढाका है जैसे उद्गार किस सामाजिक यथाथर् का संकेत करते हैं। 5.नमक ले जाने के बारे में सप्ि़ाफया के मन में उठे द्वंद्वों के आधार पर उसकी चारित्रिाक विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए। 6.मानचित्रा पर एक लकीर खींच देने भर से शमीन और जनता बँट नहीं जाती है - उचित तको± व उदाहरणों के शरिये इसकी पुष्िट करें। 7.नमक कहानी में भारत व पाक की जनता के आरोपित भेदभावों के बीच मुहब्बत का नमकीन स्वाद घुला हुआ है, वैफसे? आरोह क्यों कहा गया? 1 क्या सब कानून हुवूफमत के ही होते हैं, वुफछ मुहब्बत, मुरौवत, आदमियत, इंसानियत के नहीं होते? 2 भावना के स्थान पर बुि धीरे - धीरे उस पर हावी हो रही थी। 3 मुहब्बत तो कस्टम से इस तरह गुशर जाती है कि कानून हैरान रह जाता है। 4 हमारी शमीन हमारे पानी का मशा ही वुफछ और है! समझाइए तो शरा 1.पिफर पलकों से वुफछ सितारे टूटकर दूिाया आँचल में समा जाते हैं। 2.किसका वतन कहाँ है - वह जो कस्टम के इस तरप़्ाफ है या उस तरप़्ाफ। पाठ के आसपास ‘नमक’ कहानी में ¯हदुस्तान - पाकिस्तान में रहने वाले लोगों की भावनाओं, संवेदनाओं को उभारा गया है। वतर्मान संदभर् में इन संवेदनाओं की स्िथति को तवर्फ सहित स्पष्ट कीजिए। 2.सप्िाफया की मनःस्िथति को कहानी में एक विश्िाष्ट संदभर् में अलग तरह से स्पष्ट किया गया है।़अगर आप सप्िाफया की जगह होते/होतीं तो क्या आपकी मनःस्िथति भी वैसी ही होती? स्पष्ट़कीजिए। 3.भारत - पाकिस्तान के आपसी संबंधों को सुधारने के लिए दोनों सरकारें प्रयासरत हैं। व्यक्ितगत तौर पर आप इसमें क्या योगदान दे सकते/सकती हैं? 4.लेख्िाका ने विभाजन से उपजी विस्थापन की समस्या का चित्राण करते हुए सप्िाफया व सिख बीबी़के माध्यम से यह भी परोक्ष रूप से संकेत किया है कि इसमें भी विवाह की रीति के कारण स्त्राी सबसे अिाक विस्थापित है। क्या आप इससे सहमत हैं? 5.विभाजन के अनेक स्वरूपों में बँटी जनता को मिलाने की अनेक भूमियाँ हो सकती हैं - रक्त संबंध, विज्ञान, साहित्य व कला। इनमें से कौन सबसे ताकतवर है और क्यों? आपकी राय मान लीजिए आप अपने मित्रा के पास विदेश जा रहे/रही हैं। आप सौगात के तौर पर भारत की कौन - सी चीश ले जाना पसंद करेंगे/करंेगी और क्यों? भाषा की बात 1 नीचे दिए गए वाक्यों को ध्यान से पढि़ए - ;कद्ध हमारा वतन तो जी लाहौर ही है। ;खद्ध क्या सब कानून हुवूफमत के ही होते हैं? सामान्यतः ‘ही’ निपात का प्रयोग किसी बात पर बल देने के लिए किया जाता है। उफपर दिए गए दोनों वाक्यों में ‘ही’ के प्रयोग से अथर् में क्या परिवतर्न आया है? स्पष्ट कीजिए। ‘ही’ का प्रयोग करते हुए दोनों तरह के अथर् वाले पाँच - पाँच वाक्य बनाइए। 2 नीचे दिए गए शब्दों के ¯हदी रूप लिख्िाए - मुरौवत, आदमियत, अदीब, साडा, मायने, सरहद, अक्स, लबोलहजा, नपफीस 3 पंद्रह दिन यों गुशरे कि पता ही नहीं चला - वाक्य को ध्यान से पढि़ए और इसी प्रकार के ;यों, कि, ही से युक्त पाँच वाक्य बनाइए।द्ध सृजन के क्षण ‘नमक’ कहानी को लेखक ने अपने नशरिये से अन्य पुरफष शैली में लिखा है। आप सप्ि़ाफया की नशर से/ उत्तम पुरफष शैली में इस कहानी को अपने शब्दों में कहें। इन्हें भी जानें 1 मुहरर्म - इस्लाम ध्मर् के अनुसार साल का पहला महीना, जिसकी दसवीं तारीख को इमाम हुसैन शहीद हुए। 2 सैयद - मुसलमानों के चैथे खलीप़्ाफा अली के वंशजों को सैयद कहा जाता है। 3 इकबाल - सारे जहाँ से अच्छा के गीतकार 4 नशरफल इस्लाम - बांग्ला के क्रांतिकारी कवि 5 शमसुल इस्लाम - बांग्ला देश के प्रसि( कवि 6बनाइए किन्हीं दो ;प्ि़लिए वुफछ नामाफल्म और रचनाद्ध की विशेषता को लिख्िाए। आपकी सुविधा के ़इस कहानी को पढ़ते हुए कइर् प्िाफल्म, कइर् रचनाएँ, कइर् गाने आपके शेहन में आए होंगे। उनकी सूची दिए जा रहे हैं। पिफल्में रचनाएँ 1947 अथर् तमस ;उपन्यास - भीष्म साहनीद्ध मम्मो टोबाटेक सिंह ;कहानी - मंटोद्ध आरोह टेªन टु पाकिस्तान गदर ¯शदगीनामा ;उपन्यास - वृफष्णा सोबतीद्ध ¯पजर ;उपन्यास - अमृता प्रीतमद्ध खामोश पानी हिना वीर शारा झूठा सच ;उपन्यास - यशपालद्ध मलबे का मालिक ;कहानी - मोहन राकेशद्ध पेशावर एक्सपे्रस ;कहानी - कृश्न चंदर द्ध 7. सरहद और मशहब के संदभर् में इसे देखें - तू ¯हदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा। मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया, हमने उसे ¯हदू या मुसलमान बनाया। वुफदरत ने तो बख्शी थी हमें एक ही धरती, हमने कहीं भारत कहीं, इर्रान बनाया।।’ जो तोड़ दे हर बंद वो तूप़्ाफान बनेगा। इंसान की औलाद है इंसान बनेगा। - प्ि़ाफल्मः ध्ूल का पूफल, गीतकारः साहिर लुध्ियानवी शब्द - छवि उम्दा - अच्छा नपफीस़- सुरफचिपूणर् रफखसत - विदा साडा - हमारा हिस्से - बखरे - बँटवारा मुरौवत - संकोच अदीब - साहित्यकार लबोलहजा - बोलचाल का तरीका नवाश - सम्मानित करना सौगात - भेंट अजीश - पि्रय बाजी - दीदी दोहर - कपड़े को दोहरा कर सिली गइर् चादर, लिहाप़्ाफ

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