विष्णु खरे 15 जन्म: सन् 1940, ¯छदवाड़ा ;मध्य प्रदेशद्ध प्रमुख रचनाएँ: एक गैर रूमानी समय में, खुद अपनी आँख से, सबकी आवाश के पदेर् में, पिछला बाकी ;कविता - संग्रहद्धऋ आलोचना की पहली किताब ;आलोचनाद्धऋ सिनेमा पढ़ने के तरीके ;सिने आलोचनाद्धऋ मरफ प्रदेश और अन्य कविताएँ ;टीएस. इलियटद्ध, यह चावूफ समय ;अॅ¯तला योझेपफद्ध, कालेवाला ;पिफनलैंड का राष्ट्रकाव्यद्ध;अनुवादद्ध प्रमुख पुरस्कार: रघुवीर सहाय सम्मान, ¯हदी अकादमी ;दिल्लीद्ध का सम्मान, श्िाखर सम्मान, मैथ्िालीशरण गुप्त सम्मान, पिफनलैंड का राष्ट्रीय सम्मान नाइट आॅपफ दि आॅडर्र आॅप़्ाफ दि़व्हाइट रोश हर कलावृफति जितनी वह पढ़ी जाती है, सुनाइर् या दिखाइर् देती है ़उससे कहीं श्यादा होती है और प्िाफल्म को लेकर शायद यह वुफछ अिाक सत्य है। समकालीन ¯हदी कविता और आलोचना में विष्णु खरे एक विश्िाष्ट हस्ताक्षर हैं। उन्होंने ¯हदी जगत को अत्यंत गहरी विचारपरक कविताएँ दी हैं, तो साथ ही बेबाक आलोचनात्मक लेख भी दिए हैं। विश्व साहित्य का गहन अध्ययन उनके रचनात्मक और आलोचनात्मक लेखन में पूरी रंगत के साथ दिखलाइर् पड़ता है। विश्व सिनेमा के भी वे गहरे जानकार हैं और पिछले कइर् वषो± से लगातार सिनेमा की विधा पर गंभीर लेखन करते रहे हैं। 1971 - 73 के अपने विदेश - प्रवास के दरम्यान उन्होंने तत्कालीन चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग के प्रतिष्िठत प्ि़़ाफल्म क्लब की सदस्यता प्राप्त कर संसार - भर की सैकड़ों उत्वृफष्ट प्िाफल्में देखीं। यहाँ से सिनेमा - लेखन को वैचारिक गरिमा और गंभीरता देने का उनका सपफर शुरू हुआ।़‘दिनमान’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘दि पायोनियर’, ‘दि ¯हदुस्तान’, ‘जनसत्ता’, ‘दैनिक भास्कर’, ‘हंस’, ‘कथादेश’, जैसी पत्रा - पत्रिाकाओं में उनका सिनेमा विषयक लेखन प्रकाश्िात होता रहा है। वे उन विशेषज्ञों में से हैं जिन्होंने प्िाफल्म को समाज, समय और विचारधारा के आलोक़में देखा तथा इतिहास, संगीत, अभ्िानय, निदेर्शन की बारीकियों के सिलसिले में उसका विश्लेषण किया। अपने लेखन के द्वारा उन्होंने ¯हदी के उस अभाव को थोड़ा भरने में सपफलता पाइर् है, जिसके बारे में अपनी एक किताब की भूमिका में वे लिखते हैं - फ्यह ठीक है कि अब भारत में भी सिनेमा के महत्त्व और शास्त्राीयता को पहचान लिया गया है और उसके सि(ांतकार भी उभर आए हैं लेकिन दुभार्ग्यवश जितना गंभीर काम हमारे सिनेमा पर यूरोप और अमेरिका में हो रहा है शायद उसका शतांश भी हमारे यहाँ नहीं है। ¯हदी में सिनेमा के सि(ांतों पर शायद ही कोइर् अच्छी मूल पुस्तक हो। हमारा लगभग पूरा समाज अभी भी सिनेमा जाने या देखने को एक हलके अपराध की तरह देखता है।य् रखेंगे। पश्िचम में तो बार - बार चालीर् का पुनजीर्वन होता ही है, विकासशील दुनिया में जैसे - जैसे टेलीविशन और वीडियो का प्रसार हो रहा है, एक बहुत बड़ा दशर्क वगर् नए सिरे से चालीर् को घड़ी ‘सुधारते’ या जूते ‘खाने’ की कोश्िाश करते हुए देख रहा है। चैप्िलन की ऐसी वुफछ प्िाफल्में या इस्तेमाल न की गइर् रीलें भी मिली हैं जिनके बारे में कोइर् जानता ऩ़उनकी प्िाफल्में भावनाओं पर टिकी हुइर् हैं, बुि पर नहीं। ‘मेट्रोपोलिस’, ‘दी वैफबिनेट़़आॅपफ डाॅक्टर वैफलिगारी’, ‘द रोवंथ सील’, ‘लास्ट इयर इन मारिएनबाड’, ‘द सैैवि्रफपफाइस’ ़जैसी प्िाफल्में दशर्क से एक उच्चतर अहसास की माँग करती हैं। चैप्िलन का चमत्कार यही है कि उनकी प्िाफल्मों को पागलखाने के मरीशों, विकल मस्ितष्क लोगों से लेकर आइन्स्टाइऩजैसे महान प्रतिभा वाले व्यक्ित तक कहीं एक स्तर पर और कहीं सूक्ष्मतम रसास्वादन के साथ देख सकते हैं। चैप्िलन ने न सिप़्ार्फ प्ि़ाफल्म कला को लोकतांत्रिाक बनाया बल्िक दशर्कों की वगर् तथा वणर् - व्यवस्था को तोड़ा। यह अकारण नहीं है कि जो भी व्यक्ित, समूह या तंत्रा गैर बराबरी नहीं मिटाना चाहता वह अन्य संस्थाओं के अलावा चैप्िलन की प्िाफल्मों पर भी़हमला करता है। चैप्िलन भीड़ का वह बच्चा है जो इशारे से बतला देता है कि राजा भी उतना ही नंगा है जितना मैं हूँ और भीड़ हँस देती है। कोइर् भी शासक या तंत्रा जनता का अपने उफपर हँसना पसंद नहीं करता। एक परित्यक्ता, दूसरे दजेर् की स्टेज अभ्िानेत्राी का बेटा होना, बाद में भयावह गरीबी और माँ के पागलपन से संघषर् करना, साम्राज्य, औद्योगिक व्रफांति, पूँजीवाद तथा सामंतशाही से मगरूर एक समाज द्वारा दुरदुराया जाना - इन सबसे चैप्िलन को वे जीवन - मूल्य मिले जो करोड़पति हो जाने के बावजूद अंत तक उनमें रहे। अपनी नानी की तरप़्ाफ से चैप्िलन खानाबदोशों से जुड़े हुए थे और यह एक सुदूूर रूमानी संभावना बनी हुइर् है कि शायद उस खानाबदोश औरत में भारतीयता रही हो क्योंकि यूरोप के जिप्सी भारत से ही गए थे - और अपने पिता की तरप़्ाफ से वे यहूदीवंशी थे। इन जटिल परिस्िथतियों ने चालीर् को हमेशा एक ‘बाहरी’, ‘घुमंतू’ चरित्रा बना दिया। वे कभी मध्यवगीर्, बुजर्ुआ या उच्चवगीर् जीवन - मूल्य न अपना सके। यदि उन्होंने अपनी प्िाफल्मों में अपनी पि्रय छवि ‘टैªम्प’़;बद्दू, खानाबदोश, आवारागदर्द्ध की प्रस्तुत की है तो उसके कारण उनके अवचेतन तक पहुँचते हैं। चालीर् पर कइर् प्ि़ाफल्म समीक्षकों ने नहीं, प्ि़ाफल्म कला के उस्तादों और मानविकी के विद्वानों ने सिर धुने हैं और उन्हें नेति - नेति कहते हुए भी यह मानना आरोह पड़ता है कि चालीर् पर वुफछ नया लिखना कठिन होता जा रहा हैं। दरअसल सि(ंात कला को जन्म नहीं देते, कला स्वयं अपने सि(ंात या तो लेकर आती है या बाद में उन्हें गढ़ना पड़ता है। जो करोड़ों लोग चालीर् को देखकर अपने पेट दुखा लेते हैं उन्हें मैल ओटिंगर या जेम्स एजी की बेहद सारगभ्िार्त समीक्षाओं से क्या लेना - देना? वे चालीर् को समय और भूगोल से काट कर देखते हैं और जो देखते हैं उसकी ताकत अब तक ज्यों - की - त्यों बनी हुइर् है। यह कहना कि वे चालीर् में खुद को देखते हैं दूर की कौड़ी लाना है लेकिन बेशक जैसा चालीर् वे देखते हैं वह उन्हें जाना - पहचाना लगता है, जिस मुसीबत में वह अपने को हर दसवें सेवंेफड में डाल देता है वह सुपरिचित लगती है। अपने को नहीं लेकिन वे अपने किसी परिचित या देखे हुए को चालीर् मानने लगते हैं। कला में बेहतर क्या है - बुि को प्रेरित करने वाली भावना या भावना को उकसाने वाली बुि? उसने भावना को चुना और उसके कारण थे। बचपन की दो घटनाओं ने चैप्िलन पर गहरा, स्थायी प्रभाव डाला था। एक बार जब वे बीमार थे तब उनकी माँ ने उन्हें इर्सा मसीह का जीवन बाइबिल से पढ़कर सुनाया था। इर्सा के सूली पर चढ़ने के प्रकरण तक आते - आते माँ और चालीर् दोनोें रोने लगे। अपनी आत्मकथा में चैप्िलन लिखते हैं: ‘ओकले स्ट्रीट के तहखाने के उस अँिायारे कमरे में माँ ने मेरे सामने संसार की वह सबसे दयालु ज्योति उजागर की जिसने साहित्य और नाट्य को उनके महानतम और समृ(तम विषय दिए हैं: स्नेह, करुणा और मानवता।’ दूसरी घटना भी कम मामिर्क नहीं है। बालक चालीर् उन दिनों एक ऐसे घर में रहता था जहाँ से कसाइर्खाना दूर नहीं था। वह रोज सैकड़ों जानवरों को वहाँ ले जाया जाता देखता था। एक बार एक भेड़ किसी तरह जान छुड़ाकर भाग निकली। उसे पकड़ने वाले उसका पीछा करते हुए कइर् बार पिफसले, गिरे और पूरी सड़क पर ठहाके लगने लगे। आख्िारकार उस गरीब जानवर को पकड़ लिया गया और उसे पिफर कसाइर् के पास ले जाने लगे। तब चालीर् को अहसास हुआ कि उस भेड़ के साथ क्या होगा। वह रोता हुआ माँ के पास दौड़ा, ‘उसे मार डालेंगे, उसे मार डालेंगे।’ बाद में चैप्िलन ने अपनी आत्मकथा में लिखाः ‘वसंत की वह बेलौस दोपहर और वह मशाकिया दौड़ कइर् दिनों तक मेरे साथ रहीऋ और मैं कइर् बार सोचता हूँ कि उस घटना ही ने तो कहीं मेरी भावी प्ि़ाफल्मों की भूमि तय नहीं कर दी थी - त्रासदी और हास्योत्पादक तत्वों के सामंजस्य की।’ भारतीय कला और सौंदयर्शास्त्रा को कइर् रसों का पता है, उनमें से वुफछ रसों का किसी कलावृफति में साथ - साथ पाया जाना श्रेयस्कर भी माना गया है, जीवन में हषर् और विषाद आते रहते हैं यह संसार की सारी सांस्वृफतिक परंपराओं को मालूम है, लेकिन वफरुणा का हास्य में बदल जाना एक ऐसे रस - सि(ांत की माँग करता है जो भारतीय परंपराओं में नहीं मिलता। ‘रामायण’ तथा ‘महाभारत’ में जो हास्य है वह ‘दूसरों’ पर है और अिाकांशतः वह परसंताप से प्रेरित है। जो करुणा है वह अकसर सद्व्यक्ितयों के लिए और कभी - कभार दुष्टों के लिए है। संस्वृफत नाटकों में जो विदूषक है वह राजव्यक्ितयों से वुफछ बदतमीजियाँ अवश्य करता है, ¯कतु करुणा और हास्य का सामंजस्य उसमें भी नहीं है। अपने उफपर हँसने और दूसरों में भी वैसा ही माद्दा पैदा करने की शक्ित भारतीय विदूषक में वुफछ कम ही नशर आती है। इसलिए भारत में चैप्िलन के इतने व्यापक स्वीकार का एक अलग सौंदयर्शास्त्राीय महत्त्व तो है ही, भारतीय जनमानस पर उसने जो प्रभाव डाला होगा उसका पयार्प्त मूल्यांकन शायद अभी होने को है। हास्य कब करुणा में बदल जाएगा और करुणा कब हास्य में परिवतिर्त हो जाएगी इससे पारंपरिक या सै(ांतिक रूप से अपरिचित भारतीय जनता ने उस ‘प्िाफनोमेनन’ को यूँ स्वीकार किया जैसे बत्तख पानी को स्वीकारती है। किसी ‘विदेशी’़कला - सि(ांत को इतने स्वाभाविक रूप से पचाने से अलग ही प्रश्न खड़े होते हैं और अंशतः एक तरह की कला की सावर्जनिकता को ही रेखांकित करते हैं। किसी भी समाज में इने - गिने लोगों को ‘अमिताभ बच्चन’ या ‘दिलीप वुफमार’ कहकर ताना दिया जाता है लेकिन किसी भी व्यक्ित को परिस्िथतियों का औचित्य देखते हुए ‘चालीर्’ या ‘जानी वाॅकर’ कह दिया जाता है। यह स्वयं एक स्वीकारोक्ित है कि हमारे बीच ‘नायक’ कम हैं जबकि हर व्यक्ित दूसरे को कभी - न - कभी विदूषक समझता हैै। दरअसल मनुुष्य स्वयं इर्श्वर या नियति का विदूषक, क्लाउन, जोकर या साइड - किक है। यह अकारण नहीं है कि महात्मा गांधी से चालीर् चैप्िलन का खासा पुट था और गांधी तथा नेहरू दोनों ने कभी चालीर् का सान्िनध्य चाहा था। चालीर् के नितांत अभारतीय सौंदयर्शास्त्रा की इतनी व्यापक स्वीवृफति देखकर राजकपूर ने भारतीय प्ि़ाफल्मों का एक सबसे साहसिक प्रयोग किया। ‘आवारा’ सिप़्ार्फ ‘दि टैªम्प’ का शब्दानुवाद ही नहीं था बल्िक चालीर् का आरोह भारतीयकरण ही था। वह अच्छा ही था कि राजकपूर ने चैप्िलन की नकल करने के आरोपों की परवाह नहीं की। राजकपूर के ‘आवारा’ और ‘श्री 420’ के पहले प्िाफल्मी नायकों पऱहँसने की और स्वयं नायकों के अपने पर हँसने की परंपरा नहीं थी। 1953 - 57 के बीच जब चैप्िलन अपनी गैर - टैªम्पनुमा अंतिम प्िाफल्में बना रहे थे तब राजकपूर चैप्िलन का युवा़अवतार ले रहे थे। पिफर तो दिलीप वुफमार ;बाबुल, शबनम, कोहिनूर, लीडर, गोपीद्ध, देव आनंद ;नौ दो ग्यारह, पंफटूश, तीन देवियाँद्ध, शम्मी कपूर, अमिताभ बच्चन ;अमर अकबऱएंथनीद्ध तथा श्रीदेवी तक किसी - ना - किसी रूप से चैप्िलन का कशर् स्वीकार कर चुके हैं। बुढ़ापे में जब अजर्ुन अपने दिवंगत मित्रा वृफष्ण की पत्िनयों को डावुफओं से न बचा सके और हवा में तीर चलाते रहे तो यह दृश्य करुण और हास्योत्पादक दोनों था ¯कतु महाभारत में सिपर्फ़उसकी त्रासद व्याख्या स्वीकार की गइर्। आज प्िाफल्मों में किसी नायक को झाड़़ओं से पिटताुभी दिखाया जा सकता है लेकिन हर बार हमें चालीर् की ही ऐसी प़्ाफजीहतें याद आती हैं। चालीर् की अिाकांश प्िाफल्में भाषा का इस्तेमाल नहीं करतीं इसलिए उन्हें श्यादा - से - श्यादा़मानवीय होना पड़ा। सवाव्फ चित्रापट पर कइर् बड़े - बड़े काॅमेडियन हुए हैं, लेकिन वे चैप्िलन की सावर्भौमिकता तक क्यों नहीं पहुँच पाए इसकी पड़ताल अभी होने को है। चालीर् का चिर - युवा होना या बच्चों जैसा दिखना एक विशेषता तो है ही, सबसे बड़ी विशेषता शायद यह है कि वे किसी भी संस्वृफति को विदेशी नहीं लगते। यानी उनके आसपास जो भी चीशें, अडं़गे, खलनायक, दुष्ट औरतें आदि रहते हैं वे एक सतत ‘विदेश’ या ‘परदेस’ बन जाते हैं और चैप्िलन ‘हम’ बन जाते हैं। चालीर् के सारे संकटों में हमें यह भी लगता है कि यह ‘मैं’ भी हो सकता हूँ, लेकिन ‘मैं’ से श्यादा चालीर् हमें ‘हम’ लगते हैं। यह संभव है कि वुफछ अथो± में ‘बस्टर कीटन’ चालीर् चैप्िलन से बड़ी हास्य - प्रतिभा हो लेकिन कीटन हास्य का काफ्रका है जबकि चैप्िलन प्रेमचंद के श्यादा नशदीक हैं। एक होली का त्योहार छोड़ दें तो भारतीय परंपरा में व्यक्ित के अपने पर हँसने, स्वयं को जानते - बूझते हास्यास्पद बना डालने की परंपरा नहीं के बराबर है। गाँवों और लोक - संस्वृफति में तब भी वह शायद हो, नागर - सभ्यता में तो वह थी नहीं। चैप्िलन का भारत में महत्त्व यह है कि वह ‘अंग्रेशों जैसे’ व्यक्ितयों पर हँसने का अवसर देते हैं। चालीर् स्वयं पर सबसे श्यादा तब हँसता है जब वह स्वयं को गवोर्न्मत्त, आत्म - विश्वास से लबरेश, सपफलता, सभ्यता, संस्वृफति तथा समृि की प्रतिमूतिर्, दूसरों से श्यादा शक्ितशाली तथा श्रेष्ठ, अपने ‘वज्रादपि कठोराण्िा’ अथवा ‘मृदुनि वुफसुमादपि’ क्षण में दिखलाता है। तब यह समझिए कि वुफछ ऐसा हुआ ही चाहता है कि यह सारी गरिमा सुइर् - चुभे गुब्बारे जैसी पुफस्स हो उठेगी। अपने जीवन के अिाकांश हिस्सों में हम चालीर् के टिली ही होते हैं जिसके रोमांस हमेशा पंक्चर होते रहते हैं। हमारे महानतम क्षणों में कोइर् भी हमें चिढ़ाकर या लात मारकर भाग सकता है। अपने चरमतम शूरवीर क्षणों में हम क्लैब्य और पलायन के श्िाकार हो सकते हैं। कभी - कभार लाचार होते हुए जीत भी सकते हैं। मूलतः हम सब चालीर् हैं क्योंकि हम सुपरमैन नहीं हो सकते। सत्ता, शक्ित, बुिमत्ता, प्रेम और पैसे के चरमोत्कषो± में जब हम आइर्ना देखते हैं तो चेहरा चालीर् - चालीर् हो जाता है। अभ्यास पाठ के साथ 1.लेखक ने ऐसा क्यों कहा है कि अभी चैप्िलन पर करीब 50 वषो± तक काप़्ाफी वुफछ कहा जाएगा? 2.चैप्िलन ने न सिप़्ार्फ प्ि़ाफल्म - कला को लोकतांत्रिाक बनाया बल्िक दशर्कों की वगर् तथा वणर् - व्यवस्था को तोड़ा । इस पंक्ित में लोकतांत्रिाक बनाने का और वणर् - व्यवस्था तोड़ने का क्या अभ्िाप्राय है? क्या आप इससे सहमत हैं? 4.लेखक ने चालीर् का भारतीयकरण किसे कहा और क्यों? गांधी और नेहरू ने भी उनका सािध्य क्यों चाहा? 5.लेखक ने कलावृफति और रस के संदभर् में किसे श्रेयस्कर माना है और क्यों? क्या आप वुफछ ऐसे उदाहरण दे सकते हैं जहाँ कइर् रस साथ - साथ आए हों? 6.जीवन की जद्दोजहद ने चालीर् के व्यक्ितत्व को वैफसे संपÂ बनाया? 7.चालीर् चैप्िलन की प्ि़ाफल्मों में निहित त्रासदी/करफणा/हास्य का सामंजस्य भारतीय कला और सौंदयर्शास्त्रा की परििा में क्यों नहीं आता? चालीर् सबसे श्यादा स्वयं पर कब हँसता है? पाठ के आसपास 1.आपके विचार से मूक और सवाव्फ प्िाफल्मों में से किसमें श्यादा परिश्रम करने की आवश्यकता़है और क्यों? 2.सामान्यतः व्यक्ित अपने उफपर नहीं हँसते, दूसरों पर हँसते हैं। कक्षा में ऐसी घटनाओं का िाक्र कीजिए जब - ;कद्ध आप अपने उफपर हँसे होंऋ ;खद्ध हास्य करफणा में या करफणा हास्य में बदल गइर् हो। 3.चालीर् हमारी वास्तविकता है, जबकि सुपरमैन स्वप्न आप इन दोनों में खुद को कहाँ पाते हैं? आरोह 4.भारतीय सिनेमा और विज्ञापनों ने चालीर् की छवि का किन - किन रूपों में उपयोग किया हैं? वुफछ प्िाफल्में ;जैसे आवारा, श्री 420, मेरा नाम जोकर, मिस्टर इंडिया और विज्ञापनों ;जैसे चैरी ब्लाॅसमद्ध को गौर से देख्िाए और कक्षा में चचार् कीजिए। ़5.आजकल विवाह आदि उत्सव, समारोहों एवं रेस्तराँ में आज भी चालीर् चैप्िलन का रूप ध्रे किसी व्यक्ित से आप अवश्य टकराए होंगे। सोचकर बताइए कि बाशार ने चालीर् चैप्िलन का वैफसा उपयोग किया है? भाषा की बात 1.... तो चेहरा चालीर् - चालीर् हो जाता है। वाक्य में चालीर् शब्द की पुनरफक्ित से किस प्रकार की अथर् - छटा प्रकट होती है? इसी प्रकार के पुनरफक्त शब्दों का प्रयोग करते हुए कोइर् तीन वाक्य बनाइए। यह भी बताइए कि संज्ञा किन स्िथतियों में विशेषण के रूप में प्रयुक्त होने लगती है? 2.नीचे दिए वाक्यांशों में हुए भाषा के विश्िाष्ट प्रयोगों को पाठ के संदभर् में स्पष्ट कीजिए। ;कद्ध सीमाओं से ख्िालवाड़ करना ;खद्ध समाज से दुरदुराया जाना ;गद्ध सुदूर रूमानी संभावना ;घद्ध सारी गरिमा सुइर् - चुभे गुब्बारे जैसी पुफस्स हो उठेगी। ;घद्ध जिसमें रोमांस हमेशा पंक्चर होते रहते हैं। गौर करें ;कद्ध दरअसल सि(ांत कला को जन्म नहीं देते, कला स्वयं अपने सि(ांत या तो लेकर आती है या बाद में उन्हें गढ़ना पड़ता है। ;खद्ध कला में बेहतर क्या है - बुि को प्रेरित करने वाली भावना या भावना को उकसाने वाली बुि? ;गद्ध दरअसल मनुष्य स्वयं इर्श्वर या नियति का विदूषक, क्लाउन, जोकर या साइड किक है। ;घद्ध सत्ता, शक्ित, बुिमता, प्रेम और पैसे के चरमोत्कषर् में जब हम आइर्ना देखते हैं तो चेहरा चालीर् - चालीर् हो जाता है। ;घद्ध माॅडनर् टाइम्स द ग्रेट डिक्टेटर आदि प्ि़ाफल्में कक्षा में दिखाइर् जाएँ और प्ि़ाफल्मों में चालीर् की भूमिका पर चचार् की जाए। शब्द - छवि प्ि़ाफनोमेनन - तथ्य बज्रादपि कठोराण्िा - वज्र से भी कठोर मृदूनि कुसुमादपि - पूफल से भी कोमल

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