काव्य खंड हरिवंश्ा राय बच्चन 1 जन्म: सन् 1907, इलाहाबाद प्रमुख रचनाएँ: मधुशाला ;1935द्ध, मधुबाला ;1938द्ध, मधुकलश ;1938द्ध, निशा निमंत्राण, एकांत संगीत, आवुफल - अंतर, मिलनयामिनी, सतरंगिणी, आरती और अंगारे, नए पुराने झरोखे, टूटी - पूफटी कडि़याँ ;काव्य संग्रहद्धऋ क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निमार्ण पिफर, बसेरे से दूर, दशद्वार से सोपान तक ;आत्मकथा चार खंडद्धऋ हैमलेट, जनगीता, मैकबेथ ;अनुवादद्धऋ प्रवासी की डायरी ;डायरीद्ध उनका पूरा वाघ्मय ‘बच्चन ग्रंथावली’ के नाम से दस खंडों में प्रकाश्िात। निधन: सन् 2003, मुंबइर् में पूवर् चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले 1942 - 1952 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, आकाशवाणी के साहित्ियक कायर्क्रमों से संब(, पिफर विदेश मंत्रालय में ¯हदी विशेषज्ञ रहे। दोनों महायु(ों के बीच मध्यवगर् के विक्षुब्ध, विकल मन को बच्चन ने वाणी का वरदान दिया। उन्होंने छायावाद की लाक्षण्िाक वक्रता के बजाय सीधी - सादी जीवंत भाषा और संवेदनसिक्त गेय शैली में अपनी बात कही। व्यक्ितगत जीवन में घटी घटनाओं की सहज अनुभूति की इर्मानदार अभ्िाव्यक्ित बच्चन के यहाँ कविता बनकर प्रकट हुइर्। यह विशेषता ¯हदी काव्य संसार में उनकी विलक्षण लोकपि्रयता का मूल आधार है। मध्ययुगीन पफारसी के कवि उमर खÕयाम का मस्तानापन हरिवंश राय बच्चन की़प्रारंभ्िाक कविताओं विशेषकर मध्ुशाला में एक अद्भुत अथर् - विस्तार पाता है - जीवन एक तरह का मधुकलश है, दुनिया मधुशाला है, कल्पना साकी और कविता वह प्याला जिसमें ढालकर जीवन पाठक को पिलाया जाता है। कविता का एक घूँट जीवन का एक घूँट है। पूरी तन्मयता से जीवन का घूँट भरें, कड़वा - ख‘ा भी सहज भाव से स्वीकार करें तो अंततः एक आरोह सूप्िाफयाना - सी बेखयाली मन पर छाएगी, एक के बहाने सारी दुनिया से इश्क हो जाएगा, औऱतेरा - मेरा के समस्त झगडे़ कापूफर हो जाएँगे। इसे बच्चन का़हालावादी दशर्न कहते हैं। यह बात ध्यान देने योग्य है कि उनकी युगबोध - संबंधी कविताएँ जो बाद में लिखी गईं, उनका मूल्यांकन अभी तक कम ही हो पाया है। बच्चन का कवि - रूप सबसे विख्यात है, पर उन्होंने कहानी, नाटक, डायरी आदि के साथ बेहतरीन आत्मकथा भी लिखी है - जो इर्मानदार आत्मस्वीवृफति और प्रांजल शैली के कारण निरंतर पठनीय बनी हुइर् है। मैं जग - जीवन का भार लिए पिफरता हूँ, पिफर भी जीवन में प्यार लिए पिफरता हूँऋ कर दिया किसी ने झंवृफत जिनको छूकर मैं साँसों के दो तार लिए पिफरता हूँ! मैं स्नेह - सुरा का पान किया करता हूँ, मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ, जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते, मैं अपने मन का गान किया करता हूँ! मैं निज उर के उद्गार लिए पिफरता हूँ, मैं निज उर के उपहार लिए पिफरता हूँऋ है यह अपूणर् संसार न मुझको भाता मैं स्वप्नों का संसार लिए पिफरता हूँ! मैं जला हृदय मंे अग्िन, दहा करता हूँ, सुख - दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँऋ जग भव - सागर तरने को नाव बनाए, मैं भव मौजों पर मस्त बहा करता हूँ! मैं यौवन का उन्माद लिए पिफरता हूँ, उन्मादों में अवसाद लिए पिफरता हूँ, जो मुझको बाहर हँसा, रफलाती भीतर, मैं, हाय, किसी की याद लिए पिफरता हूँ! आरोह कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना? नादान वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना! पिफर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे? मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भुलाना! मैं मैं मैं और, और जग और, बना - बना कितने जग जग जिस पृथ्वी पर प्रति पग से उस पृथ्वी कहाँ का नाता, रोश मिटाताऋ जोड़ा करता को ठुकराता! वैभव, मैं शीतल मैं निज रोदन में राग लिए पिफरता हूँ, वाणी में आग लिए पिफरता हूँ, हों जिस पर भूपों के प्रासाद वह खंडहर का भाग लिए पिफरता हूँ। निछावर, मैं मैं मैं रोया, इसको तुम कहते हो पूफट पड़ा, तुम कहते, छंद क्यों कवि कहकर संसार दुनिया का हँू एक नया गाना, बनानाऋ मुझे दीवाना! अपनाए, मैं मैं मैं दीवानों का वेश मादकता निःशेष जिसको सुनकर मस्ती का संदेश लिए लिए जग लिए पिफरता हूँ, पिफरता हूँऋ झूम, झुके, पिफरता हूँ! लहराए, दिन जल्दी - जल्दी ढलता है! हो जाए न पथ में रात कहीं, मंजिल भी तो है दूर नहीं - यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी - जल्दी चलता है! दिन जल्दी - जल्दी ढलता है! बच्चे प्रत्याशा में होंगे, नीड़ों से झाँक रहे होंगे - यह ध्यान परों में चिडि़यों के भरता कितनी चंचलता है! दिन जल्दी - जल्दी ढलता है! मुझसे मिलने को कौन विकल? मैं होउफँ किसके हित चंचल? यह प्रश्न श्िाथ्िाल करता पद को, भरता उर में विह्नलता है! दिन जल्दी - जल्दी ढलता है! आरोह अभ्यास कविता के साथ 1.कविता एक ओर जग - जीवन का भार लिए घूमने की बात करती है और दूसरी ओर मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ - विपरीत से लगते इन कथनों का क्या आशय है? 2.जहाँ पर दाना रहते हैं, वहीं नादान भी होते हैं - कवि ने ऐसा क्यों कहा होगा? 3.मैं और, और जग और कहाँ का नाता - पंक्ित में और शब्द की विशेषता बताइए। 4.शीतल वाणी में आग - के होने का क्या अभ्िाप्राय है? 5.बच्चे किस बात की आशा में नीड़ों से झाँक रहे होंगे? 6.दिन जल्दी - जल्दी ढलता है - की आवृिा से कविता की किस विशेषता का पता चलता है? कविता के आसपास संसार में कष्टों को सहते हुए भी खुशी और मस्ती का माहौल वैफसे पैदा किया जा सकता है? जयशंकर प्रसाद की आत्मकथ्य कविता की वुफछ पंक्ितयाँ दी जा रही हैं। क्या पाठ में दी गइर्’ आत्मपरिचय कविता से इस कविता का आपको कोइर् संबंध् दिखाइर् देता है? चचार् करें। आत्मकथ्य मधुप गुन - गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी, ’’ ’’ उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथ्िाक की पंथा की। सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी वंफथा की? छोटे से जीवन की वैफसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ? क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ? सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्म - कथा? अभी समय भी नहीं, थकी सोइर् है मेरी मौन व्यथा।- जयशंकर प्रसाद

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