हजारी प्रसाद द्विवेदी ;सन् 1907 - 1979द्ध हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म गाँव आरत दुबे का छपरा, िालाबलिया ;उ.प्र.द्ध में हुआ था। संस्कृत महाविद्यालय, काशी सेशास्त्राी परीक्षा उत्तीणर् करने के बाद उन्होंने 1930 में काशी ¯हदू विश्वविद्यालय से ज्योतिषाचायर् की उपाध्ि प्राप्त की। इसके बाद वे शांति निकेतन चले गए। 1940 - 50 तक द्विवेदी जी ¯हदी भवन, शांति निकेतन के निदेशक रहे। वहाँ उन्हें गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और आचायर् क्ष्िातिमोहन सेन का सान्िनध्य प्राप्त हुआ। सन् 1950 में वे वापस वाराणसी आए और काशी ¯हदू विश्वविद्यालय में ¯हदी विभाग के अध्यक्ष बने। 1952 - 53 में वे काशी नागरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष थे। 1955 में वे प्रथम राजभाषा आयोग के सदस्य राष्ट्रपति के नामिनी नियुक्त किए गए। 1960 - 67 तक पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ में ¯हदी विभागाध्यक्ष का पद ग्रहण किया। 1967 में काशी ¯हदू विश्वविद्यालय में रेक्टर नियुक्त हुए। यहाँ से अवकाश ग्रहण करने पर वे भारत सरकार की ¯हदी विषयक अनेक योजनाओं से संब( रहे। जीवन के अंतिम दिनों में उत्तर प्रदेश ¯हदी संस्थान के कायर्कारी अध्यक्ष थे। आलोक पवर् पुस्तक पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। लखनउफ विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट की मानद उपाध्ि दी और भारत सरकार ने उन्हें पदमभूषण अलंकरण से विभूष्िात किया। द्विवेदी जी का अध्ययन क्षेत्रा बहुत व्यापक था। संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, बाँग्ला आदि भाषाओंएवं इतिहास, दशर्न, संस्कृति, ध्मर् आदि विषयों में उनकी विशेष गति थी। इसी कारण उनकीरचनाओं में भारतीय संस्कृति की गहरी पैठ और विषय वैविध्य के दशर्न होते हैं। वे परंपरा के साथ आध्ुनिक प्रगतिशील मूल्यों के समन्वय में विश्वास करते थे। द्विवेदी जी की भाषा सरल और प्रांजल है। व्यक्ितत्व - व्यंजकता और आत्मपरकता उनकी शैली की विशेषता है। व्यंग्य शैली के प्रयोग ने उनके निबंधें पर पांडित्य के बोझ को हावी नहीं होने दिया है। भाषा - शैली की दृष्िट से उन्होंने ¯हदी की गद्य शैली को एक नया रूप दिया।उनकी महत्त्वपूणर् रचनाएँ हैंμअशोक के पूफल, विचार और वितवर्फ, कल्पलता, वुफटज, आलोक पवर् ;निबंध - संकलनद्ध, चारूचंद्रलेख, बाणभ‘ की आत्मकथा, पुननर्वा, अनामदास का पोथा ;उपन्यासद्ध, सूर - साहित्य, कबीर, ¯हदी साहित्य की भूमिका, कालिदास 160/अंतरा की लालित्य - योजना ;आलोचनात्मक ग्रंथद्ध। उनकी सभी रचनाएँ हजारी प्रसाद द्विवेदी गं्रथावली ;के ग्यारह खंडद्ध मंे संकलित हैं। वुफटज कहते हंै, पवर्त शोभा - निकेतन होते हैं। पिफर हिमालय का तो कहना ही क्या! पूवर् और अपर समुद्र - महोदिा और रत्नाकारμदोनों को दोनों भुजाओं से थाहता हुआ हिमालय ‘पृथ्वी का मानदंड’ कहा जाए तो गलत क्या है? कालिदास ने ऐसा ही कहा था। इसी के पाद - देश में यह शंृखला दूर तक लोटी हुइर् है, लोग इसे श्िावालिक शृंखला कहते हंै। ‘श्िावालिक’ का क्या अथर् है? ‘श्िावालिक’ या श्िाव के जटाजूट का निचला हिस्सा तो नहीं है। लगता तो ऐसा ही है। श्िाव की लटियायी जटा ही इतनी सूखी, नीरस और कठोर हो सकती है। वैसे, अलकनंदा का स्रोत यहाँ से कापफी दूरी पऱहै, लेकिन श्िाव का अलक तो दूर - दूर तक छितराया ही रहता होगा। संपूणर् हिमालय को देखकर ही किसी के मन में समािास्थ महादेव की मूतिर् स्पष्ट हुइर् होगी। उसी समािास्थ महादेव केअलक - जाल के निचले हिस्से का प्रतिनििात्व यह गिरि - शंृखला कर रही होगी। कहीं - कहीं अज्ञात नाम - गोत्रा झाड़ - झंखाड़ और बेहया - से पेड़ खड़े अवश्य दिख जाते हैं पर और कोइर् हरियाली नहीं। दूब तक सूख गइर् है। काली - काली च‘ानें और बीच - बीच में शुष्कता की अंत£नरु( सत्ता का इशहार करने वाली रक्ताभ रेती! रस कहाँ है? ये जो ¯ठगने से लेकिन शानदार दरख्त गरमी की भयंकर मार खा - खाकर और भूख - प्यास की निरंतर चोट सह - सहकर भी जी रहे हैं, इन्हें क्या कहँू? सिप़्ार्फ जी ही नहीं रहे हंै, हँस भी रहे हैं। बेहया हैं क्या? या मस्तमौला हैं? कभी - कभी जो लोग ऊपर से बेहया दिखते हंै, उनकी जड़ें कापफी गहरी, पैठी रहती हैं। ये भी पाषाण की छाती पफाड़कर ऩजाने किस अतल गह्नर से अपना भोग्य खींच लाते हैं। श्िावालिक की सूखी नीरस पहाडि़यों पर मुसवुफराते हुए ये वृक्ष द्वंद्वातीत हैं, अलमस्त हैं। मैं किसी का नाम नहीं जानता, वुफल नहीं जानता शील नहीं जानता पर लगता है, ये जैसे मुझे अनादिकाल से जानते हैं। इन्हीं में एक छोटा - सा, बहुत ही ठिगना पेड़ है, पत्ते चैड़े भी हैं, बड़े भी हैं। पूफलों से तो ऐसा लदा है कि वुफछ पूछिए नहीं। अजीब सी अदा है, मुसवुफराता जान पड़ता है। लगता है, पूछ रहा है कि क्या तुम मुझे भी नहीं पहचानते? पहचानता तो हूँ, अवश्य पहचानता हूँ। लगता है, बहुत बार देख चुका हूँ। पहचानता हूँ उजाड़ के साथी, तुम्हें अच्छी तरह पहचानता हूँ। नाम भूल रहा हूँ। प्रायः भूल जाता हूँ। रूप देखकर प्रायः पहचान जाता हूँ, नाम नहीं याद आता। पर नाम ऐसा है कि जब तक रूप के पहले ही हािार न हो जाए तब तक रूप की पहचान अधूरी रह जाती है। भारतीय पंडितों का सैकड़ों बार का कचारा - निचोड़ा प्रश्न सामने आ गयाμरूप मुख्य है या नाम? 162/अंतरा नाम बड़ा है या रूप? पद पहले है या पदाथर्? पदाथर् सामने है, पद नहीं सूझ रहा है। मन व्यावुफल हो गया। स्मृतियों के पंख पैफलाकर सुदूर अतीत के कोनों में झाँकता रहा। सोचता हूँ इसमें व्यावुफल होने की क्या बात है? नाम में क्या रखा हैμह्नाट्स देअर इन ए नेम! नाम की शरूरत ही हो तो सौ दिए जा सकते हैं। सुस्िमता, गिरिकांता, वनप्रभा, शुभ्रकिरीटिनी, मदो(ता, विजितातपा, अलकावतंसा, बहुत से नाम हैं! या पिफर पौरुष - व्यंजक नाम भी दिए जा सकते हैंμअवुफतोभय, गिरिगौरव, वूफटोल्लास, अपराजित, धरतीधकेल, पहाड़पफोड़, पातालभेद! पर मन नहीं मानता। नाम इसलिए बड़ानहीं है कि वह नाम है। वह इसलिए बड़ा होता है कि उसे सामाजिक स्वीकृति मिली होती है। रूप व्यक्ित - सत्य है, नाम समाज - सत्य। नाम उस पद को कहते हैं जिस पर समाज की मुहर लगी होती है। आधुनिक श्िाक्ष्िात लोग जिसे ‘सोशल सेक्शन’ कहा करते हंै। मेरा मन नाम के लिए व्यावुफलहै, समाज द्वारा स्वीकृत, इतिहास द्वारा प्रमाण्िात, समष्िट - मानव की चित्त - गंगा में स्नात। इस गिरिवूफट - बिहारी का नाम क्या है? मन दूर - दूर तक उड़ रहा हैμदेश में और कालमें - मनोरथानामगतिनर्विद्यते! अचानक याद आयाμअरे, यह तो वुफटज है! संस्कृत साहित्य का बहुत परिचित ¯कतु कवियों द्वारा अवमानित, यह छोटा सा शानदार वृक्ष ‘वुफटज’ है। ‘वूफटज’ कहा गया होता तो कदाचित् श्यादा अच्छा होता। पर नाम इसका चाहे वुफटज ही हो, विरुद तो निस्संदेह ‘वूफटज’ होगा। गिरिवूफट पर उत्पन्न होने वाले इस वृक्ष को ‘वूफटज’ कहने में विशेष आनंद मिलता है। बहरहाल, यह वूफटज - वुफटज है, मनोहर वुफसुम - स्तबकों से झबराया, उल्लास - लोल चारुस्िमत वुफटज! जी भर आया। कालिदास ने ‘आषाढ़स्य प्रथम - दिवसे’ रामगिरि पर यक्ष को जब मेघ की अभ्यथर्ना के लिए नियोजित किया तो कम्बख्त को ताशे वुफटज पुष्पों की अंजलि देकर ही संतोष करना पड़ाμ चंपक नहीं, बवुफल नहीं, नीलोत्पल नहीं, मल्िलका नहीं, अर¯वद नहींμपफकत वुफटज के पूफल! यह और बात है कि आज आषाढ़ का नहीं, जुलाइर् का पहला दिन है। मगर प़्ाफवर्फ भी कितना है। बार - बार मन विश्वास करने को उतारू हो जाता है कि यक्ष बहाना मात्रा है, कालिदास ही कभी ‘शापेनास्तंगमितमहिमा’ होकर रामगिरि पहुँचे थे, अपने ही हाथों इस वुफटज पुष्प का अघ्यर् देकरउन्होंने मेघ की अभ्यथर्ना की थी। श्िावालिक की इस अनत्युच्च पवर्त - शंृखला की भाँति रामगिरिपर भी उस समय और कोइर् पूफल नहीं मिला होगा। वुफटज ने उनके संतृप्त चित्त को सहारा दियाथाμबड़भागी पूफल है यह! धन्य हो वुफटज, तुम ‘गाढ़े के साथी’ हो। उत्तर की ओर सिर उठाकरदेखता हूँ, सुदूर तक ऊँची काली पवर्त - शृंखला छाइर् हुइर् है और एकाध सपेफद बादल के बच्चे उससे लिपटे खेल रहे हैं। मैं भी इन पुष्पों का अघ्यर् उन्हें चढ़ा दूँ। पर काहे वास्ते? लेकिन बुरा भी क्या है? वुफटज के ये सुंदर पूफल बहुत बुरे तो नहीं हैं। जो कालिदास के काम आया हो उसे श्यादा इश्शत मिलनी चाहिए। मिली कम है। पर इश्शत तो नसीब की बात है। रहीम को मैं बड़े आदर के साथ स्मरण करता हूँ। दरियादिल आदमी थे, पाया सो लुटाया। लेकिन दुनिया है कि मतलब से मतलब है, रस चूस लेती है, छिलका और गुठली पेंफक देती है। सुना है, रस चूस लेने के बाद रहीम को भी पेंफक दिया गया था। एक बादशाह ने आदर के साथ बुलाया, दूसरे ने पेंफक दिया! हुआ ही करता है। इससे रहीम का मोल घट नहीं जाता। उनकी पफक्कड़ाना मस्ती कहीं गइर् नहीं। अच्छे - भले कद्रदान थे। लेकिन बड़े लोगों पर भी कभी - कभी ऐसी वितृष्णा सवार होती है कि गलती कर बैठते हैं। मन खराब रहा होगा, लोगों की बेरुखी और बेकद्रदानी से मुरझा गए होंगेμऐसी ही मनःस्िथति में उन्होंने बिचारे वुफटज को भी एक चपत लगा दी। झुँझलाए थे, कह दियाμ वे रहीम अब बिरछ कहँ, जिनकर छाॅह गंभीरऋ बागन बिच - बिच देख्िायत, सेंहुड़ वुफटज करीर। गोया वुफटज अदना - सा ‘बिरछ’ हो। ‘छाँह’ ही क्या बड़ी बात है, पूफल क्या वुफछ भी नहीं? छाया के लिए न सही, पूफल के लिए तो वुफछ सम्मान होना चाहिए। मगर कभी - कभी कवियों का भी ‘मूड’ खराब हो जाया करता है। वे भी गलत - बयानी के श्िाकार हो जाया करते हैं। पिफर बागों से गिरिवूफट - बिहारी वुफटज का क्या तुक है? वुफटज अथार्त जो वुफट से पैदा हुआ हो। ‘वुफट’ घड़े को भी कहते हैं, घर को भी कहते हैं। वुफट अथार्त घड़े से उत्पन्न होने के कारण प्रतापी अगस्त्य मुनि भी ‘वुफटज’ कहे जाते हैं। घड़े सेतो क्या उत्पन्न हुए होंगे। कोइर् और बात होगी। संस्कृत में ‘वुफटिहारिका’ और ‘वुफटकारिका’ दासी 164/अंतरा को कहते हैं। क्यों कहते हैं? ‘वुफटिया’ या ‘वुफटीर’ शब्द भी कदाचित् इसी शब्द से संब( है। क्या इस शब्द का अथर् घर ही है। घर में काम - काज करने वाली दासी वुफटकारिका और वुफटहारिका कहीही जा सकती है। एक शरा गलत ढंग की दासी ‘वुफटनी’ भी कही जा सकती है। संस्कृत में उसकी गलतियों को थोड़ा अिाक मुखर बनाने के लिए उसे ‘वुफ‘नी’ कह दिया गया है। अगस्त्य मुनि भी नारद जी की तरह दासी के पुत्रा थे क्या? घड़े में पैदा होने का तो कोइर् तुक नहीं है, न मुनि वुफटज के सिलसिले में, न पूफल वुफटज के। पूफल गमले में होते अवश्य हैं, पर वुफटज तो जंगल का सैलानीहै। उसे घड़े या गमले से क्या लेना - देना? शब्द विचारोत्तेजक अवश्य हैं। कहाँ से आया? मुझे तोइसी में संदेह है कि यह आयर्भाषाओं का शब्द है भी या नहीं। एक भाषाशास्त्राी किसी संस्कृत शब्दको एक से अिाक रूप से प्रचलित पाते थे तो तुरंत उसकी वुफलीनता पर शक कर बैठते थे। संस्कृत में ‘वुफटज’ रूप भी मिलता है और ‘वुफटच’ भी। मिलने को तो ‘वूफटज’ भी मिल जाता है। तो यहशब्द किस जाति का है? आयर् जाति का तो नहीं जान पड़ता। सिलवाँ लेवी कह गए हैं कि संस्कृत भाषा में पूफलों, वृक्षों और खेत - बागबानी के अिाकांश शब्द आग्नेय भाषा - परिवार के हैं। यह भी वहीं का तो नहीं है। एक शमाना था जब आस्ट्रेलिया और एश्िाया के महाद्वीप मिले हुए थे, पिफरकोइर् भयंकर प्राकृतिक विस्पफोट हुआ और वे दोनों अलग हो गए। उन्नीसवीं शताब्दी के भाषा - विज्ञानी पंडितों को यह देखकर आश्चयर् हुआ कि आस्ट्रेलिया से सुदूर जंगलों में बसी जातियों की भाषा एश्िाया में बसी हुइर् वुफछ जातियों की भाषा से संब( है। भारत की अनेक जातियाँ वह भाषा बोलती हैं, जिनमें संथाल, मुंडा आदि भी शामिल हैं। शुरू - शुरू में इस भाषा का नाम आस्ट्रो - एश्िायाटिक दिया गया था। दक्ष्िाण - पूवर् या अग्िनकोण की भाषा होने के कारण इसे आग्नेय - परिवार भी कहा जाने लगा है। अब हम लोग भारतीय जनता के वगर् - विशेष को ध्यान में रखकर और पुराने साहित्य का स्मरण करके इसे कोल - परिवार की भाषा कहने लगे हैं। पंडितों ने बताया है कि संस्कृत भाषा के अनेक शब्द, जो अब भारतीय संस्कृति के अविच्छेद्य अंग बन गए हैं, इसी श्रेणी की भाषा के हैं। कमल, वुफड्मल, वंफबु, वंफबल, तांबूल आदि शब्द ऐसे ही बताए जाते हैं। पेड़ - पौधों, खेती के उपकरणों और औशारों के नाम भी ऐसे ही हंै। ‘वुफटज’ भी हो तो क्याआश्चयर्? संस्कृत भाषा ने शब्दों के संग्रह में कभी छूत नहीं मानी। न जाने किस - किस नस्ल के कितने शब्द उसमें आकर अपने बन गए हैं। पंडित लोग उसकी छानबीन करके हैरान होते हैं।संस्कृत सवर्ग्रासी भाषा है। यह जो मेरे सामने वुफटज का लहराता पौधा खड़ा है वह नाम और रूप दोनों में अपनी अपराजेय जीवनी शक्ित की घोषणा कर रहा है। इसीलिए यह इतना आकषर्क है। नाम है कि हशारों वषर् से जीता चला आ रहा है। कितने नाम आए और गए। दुनिया उनको भूल गइर्, वे दुनिया को भूल गए।मगर वुफटज है कि संस्कृत की निरंतर स्पफीयमान शब्दराश्िा में जो जमके बैठा, सो बैठा ही है। और हजारी प्रसाद द्विवेदी/165 रूप की तो बात ही क्या है! बलिहारी है इस मादक शोभा की। चारों ओर वुफपित यमराज के दारुणनिःश्वास के समान धधकती लू में यह हरा भी है और भरा भी है, दुजर्न के चित्त से भी अिाक कठोर पाषाण की कारा में रु( अज्ञात जलस्रोत से बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है। और मूखर् के मस्ितष्क से भी अिाक सूने गिरि कांतार में भी ऐसा मस्त बना है कि इर्ष्यार् होती है। कितनी कठिन जीवनी - शक्ित है! प्राण ही प्राण को पुलकित करता है, जीवनी - शक्ित ही जीवनी - शक्ित को प्रेरणा देती है। दूर पवर्तराज हिमालय की हिमाच्छादित चोटियाँ हैं, वहीं कहीं भगवान महादेव समािा लगाकर बैठे होंगेऋ नीचे सपाट पथरीली शमीन का मैदान है, कहीं - कहीं पवर्तनंदिनी सरिताएँ आगे बढ़ने का रास्ता खोज रही होंगीμबीच में यह च‘ानों की ऊबड़ खाबड़ जटाभूमि हैμसूखी, नीरस, कठोर। यहीं आसन मारकर बैठे हैं मेरे चिरपरिचित दोस्त वुफटज। एक बार अपने झबरीले मूधार् को हिलाकर समािानिष्ठ महादेव को पुष्पस्तबक का उपहार चढ़ा देते हैं और एक बार नीचे की ओर अपनी पाताल भेदी जड़ों को दबाकर गिरिनंदिनी सरिताओं को संकेत से बता देते हैं कि रस का स्रोत कहाँ है। जीना चाहते हो? कठोर पाषाण को भेदकर, पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्य संग्रह करोऋ वायुमंडल को चूसकर, झंझा - तूपफान को रगड़कर, अपना प्राप्य वसूल लोऋ आकाश को चूमकर अवकाश की लहरी में झूमकर उल्लास खींच लो। वुफटज का यही उपदेश हैμभ्िात्त्वा पाषाणपिठरं छित्त्वा प्राभ×जनी व्यथाम् पीत्वा पातालपानीयं वुफजट श््युम्बते नभः। दुरंत जीवन - शक्ित है। कठिन उपदेश है। जीना भी एक कला है। लेकिन कला ही नहीं, तपस्या है। जियो तो प्राण ढाल दो ¯शदगी में, मन ढाल दो जीवनरस के उपकरणों में! ठीक है। लेकिन क्यों? क्या जीने के लिए जीना ही बड़ी बात है? सारा संसार अपने मतलब के लिए ही तो जी रहा है। याज्ञवल्क्य बहुत बड़े ब्रह्मवादी )ष्िा थे। उन्होंने अपनी पत्नी को विचित्रा भाव से समझाने की कोश्िाश की कि सब वुफछ स्वाथर् के लिए है। पुत्रा के लिए पुत्रा पि्रय नहीं होता, पत्नी के लिए पत्नी पि्रया नहीं होतीμसब अपने मतलब के लिए पि्रय होते हैंμ‘आत्मनस्तु कामाय सवर् पि्रयं भवति!’ विचित्रा नहीं है यह तवर्फ? संसार में जहाँ कहीं प्रेम है, सब मतलब के लिए। सुना है, पश्िचम के हाॅब्स और हेल्वेश्िायस जैसे विचारकों ने भी ऐसी ही बात कही है। सुनके हैरानी होती है। दुनिया में त्याग नहीं है, प्रेम नहीं है, पराथर् नहीं है, परमाथर् नहीं हैμहै केवल प्रचंड स्वाथर्। भीतर की जिजीविषाμजीते रहने की प्रचंड इच्छा हीμअगर बड़ी बात हो तो पिफर यह सारी बड़ी - बड़ी बोलियाँ, जिनके बल पर दल बनाए जाते हैं, शत्राुमदर्न का अभ्िानय किया जाता है, देशो(ार का नारा लगाया जाता है, साहित्य और कला की महिमा गाइर् जाती है, झूठ है। इसके द्वारा कोइर् - न - कोइर् अपना बड़ा स्वाथर् सि( करता है। लेकिन अंतरतर से कोइर् कह रहा है, ऐसा सोचना गलत ढंग से सोचना है। स्वाथर् से भी बड़ी कोइर् - न - कोइर् बात अवश्य है, जिजीविषा से भी प्रचंड कोइर् - न - कोइर् शक्ित अवश्य है। क्या है? 166/अंतरा याज्ञवल्क्य ने जो बात धक्कामार ढंग से कह दी थी वह अंतिम नहीं थी। वे ‘आत्मनः’ का अथर् वुफछ और बड़ा करना चाहते थे। व्यक्ित की ‘आत्मा’ केवल व्यक्ित तक सीमित नहीं है, वह व्यापक है। अपने में सब और सबमें आपμइस प्रकार की एक समष्िट - बुि जब तक नहीं आती तब तक पूणर् सुख का आनंद भी नहीं मिलता। अपने आपको दलित द्राक्षा की भाँति निचोड़कर जब तक ‘सवर्’ के लिए निछावर नहीं कर दिया जाता तब तक ‘स्वाथर्’ खंड - सत्य है, वह मोह को बढ़ावादेता है, तृष्णा को उत्पन्न करता है और मनुष्य को दयनीय - कृपण बना देता है। कापर्ण्य दोष से जिसका स्वभाव उपहत हो गया है, उसकी दृष्िट म्लान हो जाती है। वह स्पष्ट नहीं देख पाता। वह स्वाथर् भी नहीं समझ पाता, परमाथर् तो दूर की बात है। वुफटज क्या केवल जी रहा है। वह दूसरे के द्वार पर भीख माँगने नहीं जाता, कोइर् निकट आ गया तो भय के मारे अधमरा नहीं हो जाता, नीति और धमर् का उपदेश नहीं देता पिफरता, अपनी उन्नति के लिए अपफसरों का जूता नहीं चाटता पिफरता, दूसरों को अवमानित करने के लिए ग्रहों की़खुशामद नहीं करता। आत्मोन्नति हेतु नीलम नहीं धारण करता, अँगूठियों की लड़ी नहीं पहनता, दाँत नहीं निपोरता, बगलें नहीं झाँकता। जीता है और शान से जीता हैμकाहे वास्ते, किस उद्देश्य से? कोइर् नहीं जानता। मगर वुफछ बड़ी बात है। स्वाथर् के दायरे से बाहर की बात है। भीष्म पितामह की भाँति अवधूत की भाषा में कह रहा हैμ‘चाहे सुख हो या दुख, पि्रय हो या अपि्रय’ जो मिल जाए उसे शान के साथ, हृदय से बिलवुफल अपराजित होकर, सोल्लास ग्रहण करो। हार मत मानो।’ सुखं वा यदि वा दुःखं पि्रयं वा यदि वा{पि्रयम्। प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदयेनापराजितः।। हृदयेनापराजितः! कितना विशाल वह हृदय होगा जो सुख से, दुख से, पि्रय से, अपि्रय से विचलित न होता होगा! वुफटज को देखकर रोमाँच हो आता है। कहाँ से मिली है यह अवुफतोभयावृिा, अपराजित स्वभाव, अविचल जीवन - दृष्िट। जो समझता है कि वह दूसरों का उपकार कर रहा है वह अबोध है, जो समझता है कि दूसरे उसका अपकार कर रहे हैं वह भी बुिहीन है। कौन किसका उपकार करता है, कौन किसका अपकार कर रहा है? मनुष्य जी रहा है, केवल जी रहा हैऋ अपनी इच्छा से नहीं, इतिहास - विधाता की योजना के अनुसार। किसी को उससे सुख मिल जाए, बहुत अच्छी बात हैऋ नहीं मिल सका, कोइर् बात नहीं, परंतु उसे अभ्िामान नहीं होना चाहिए। सुख पहुँचाने का अभ्िामान यदि गलत है तो दुख पहुँचाने का अभ्िामान तो नितरां गलत है। दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं। सुखी वह है जिसका मन वश में है, दुखी वह है जिसका मन परवश है। परवश होने का अथर् है खुशामद करना, दाँत निपोरना, चाटुकारिता, हाँ - हजूरी। जिसका हजारी प्रसाद द्विवेदी/167 मन अपने वश में नहीं है वही दूसरे के मन का छंदावतर्न करता है, अपने को छिपाने के लिए मिथ्या आडंबर रचता है, दूसरों को पँफसाने के लिए जाल बिछाता है। वुफटज इन सब मिथ्याचारों से मुक्त है। वह वशी है। वह वैरागी है। राजा जनक की तरह संसार में रहकर, संपूणर् भोगों को भोगकर भी उनसे मुक्त है। जनक की ही भाँति वह घोषणा करता हैμ‘मै स्वाथर् के लिए अपने मन को सदा दूसरे के मन में घुसाता नहीं पिफरता, इसलिए मैं मन को जीत सका हूँ, उसे वश में कर सका हूँ’μ नाहमात्माथर्मिच्छामि मनोनित्यं मनोन्तरे। मनो मे निजिर्तं तस्मात् वशे तिष्ठति सवर्दा।। वुफटज अपने मन पर सवारी करता है, मन को अपने पर सवार नहीं होने देता। मनस्वी मित्रा, तुम धन्य हो! प्रश्न - अभ्यास 1.वुफटज को ‘गाढ़े के साथी’ क्यों कहा गया है? 2.‘नाम’ क्यों बड़ा है? लेखक के विचार अपने शब्दांे में लिख्िाए। 3.‘वुफट’, ‘वुफटज’ और ‘वुफटनी’ शब्दों का विश्लेषण कर उनमें आपसी संबंध स्थापित कीजिए। 4.वुफटज किस प्रकार अपनी अपराजेय जीवनी - शक्ित की घोषणा करता है? 5.‘वुफटज’ हम सभी को क्या उपदेश देता है? टिप्पणी कीजिए। 6.वुफटज के जीवन से हमें क्या सीख मिलती है? 7.वुफटज क्या केवल जी रहा हैμलेखक ने यह प्रश्न उठाकर किन मानवीय कमशोरियों पर टिप्पणी की है? 8.लेखक क्यों मानता है कि स्वाथर् से भी बढ़कर जिजीविषा से भी प्रचंड कोइर् न कोइर् शक्ित अवश्यहै? उदाहरण सहित उत्तर दीजिए। 9.‘वुफटज’ पाठ के आधार पर सि( कीजिए कि ‘दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं।’ 10.निम्नलिख्िात गद्यांशांे की सप्रसंग व्याख्या कीजिएμ;कद्ध ‘कभी - कभी जो लोग ऊपर से बेहया दिखते हैं, उनकी जड़ें काप़्ाफी गहरी पैठी रहती हैं। ये भी पाषाण की छाती पफाड़कर न जाने किस अतल गह्नर से अपना भोग्य खींच लाते हैं।’ ;खद्ध ‘रूप व्यक्ित - सत्य है, नाम समाज - सत्य। नाम उस पद को कहते हैं जिस पर समाज की मुहर लगी होती है। आधुनिक श्िाक्ष्िात लोग जिसे ‘सोशल सैक्शन’ कहा करते हैं। मेरा मननाम के लिए व्यावुफल है, समाज द्वारा स्वीकृत, इतिहास द्वारा प्रमाण्िात, समष्िट - मानव कीचित्त - गंगा में स्नात!’ ;गद्ध ‘रूप की तो बात ही क्या है! बलिहारी है इस मादक शोभा की। चारों ओर वुफपित यमराजके दारुण निःश्वास के समान धधकती लू में यह हरा भी है और भरा भी है, दुजर्न के चित्त से भी अिाक कठोर पाषाण की कारा में रु( अज्ञात जलस्रोत से बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है।’ 168/अंतरा ;घद्ध ‘हृदयेनापराजितः! कितना विशाल वह हृदय होगा जो सुख से, दुख से, पि्रय से, अपि्रय से विचलित न होता होगा! वुफटज को देखकर रोमांच हो आता है। कहाँ से मिली है यहअवुफतोभया वृिा, अपराजित स्वभाव, अविचल जीवन दृष्िट!’ योग्यता - विस्तार 1.‘वुफटज’ की तजर् पर किसी जंगली पूफल पर लेख अथवा कविता लिखने का प्रयास कीजिए। 2.लेखक ने ‘वुफटज’ को ही क्यों चुना? उसको अपनी रचना के लिए जंगल में पेड़ - पौधे तथा पूफलों - वनस्पतियों की कोइर् कमी नहीं थी। 3.वुफटज के बारे में उसकी विशेषताओं को बताने वाले दस वाक्य पाठ से छाँटिए और उनकी मानवीय संदभर् में विवेचना कीजिए। 4.‘जीना भी एक कला है’μवुफटज के आधार पर सि( कीजिए। शब्दाथर् और टिप्पणी अंतनिर्रु( - भीतरी रुकावट गह्नर - गहरा, गइा द्वंद्वातीत - द्वंद्व से परे मदो(ता - नशे या गवर् से चूर विजितातपा - धूप को दूर करने वाली अवुफतोभय - जिसे कहीं या किसी से भय न हो, नितांत भयशून्य अवमानित - अपमानित, तिरस्कृत विरुद - कीतिर् - गाथा, प्रशंसासूचक पदवी स्तबक - गुच्छा, पूफलों का गुच्छा लोल - चंचल, हिलता - डोलता पफकत - अकेला, केवल, एकमात्रा अनत्युच्च - जो बहुत उँफचा न हो अविच्छेद्य - विच्छेद रहित स्पफीयमान - पैफलता हुआ, विस्तृत, व्यापक मूधार् - मस्तक, सिर दुरंत - जिसका पार पाना कठिन हो, प्रबल कापर्ण्य - कृपणता, वंफजूसी उपहत - चोट खाया हुआ, घायल, नष्ट निपोरना - खुशामद करना, दिखाना अवधूत - विरक्त, संन्यासी नितरां - बहुत अिाक मिथ्याचार - झूठा आचरण हजारी प्रसाद द्विवेदी/169

RELOAD if chapter isn't visible.