ममता कालिया ;जन्म सन् 1940द्ध ममता कालिया का जन्म मथुरा उत्तर प्रदेश में हुआ। उनकी श्िाक्षा के कइर् पड़ाव रहे जैसे नागपुर, पुणे, इंदौर, मुंबइर् आदि। दिल्ली विश्वविद्यालय से उन्होंने अंग्रेशी विषय से एम.ए. किया। एम.एकरने के बाद सन् 1963 - 1965 तक दौलत राम कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेशी की प्राध्यापिका रहीं। 1966 से 1970 तक एस.एन.डी.टीमहिला विश्वविद्यालय, मुंबइर् में अध्यापन कायर्, पिफर 1973 से 2001 तक महिला सेवा सदन डिग्री कालेज, इलाहाबाद में प्रधानाचायर् रहीं। 2003 से 2006 तक भारतीय भाषा परिषद् कलकत्ता की निदेशक रहीं। वतर्मान में नयी दिल्ली में रहकर स्वतंत्रा लेखन कर रही हैं। उनकी प्रकाश्िात कृतियाँ हैं - बेघर, नरक दर नरक, एक पत्नी के नोट्स, प्रेम कहानी, लड़कियाँ, दौड़ आदि ;उपन्यासद्ध हैं तथा 12 कहानी - संग्रह प्रकाश्िात हैं जो संपूणर् कहानियाँ नाम से दो खंडों में प्रकाश्िात हैं। हाल ही में उनके दो कहानी - संग्रह और प्रकाश्िात हुए हैं, जैसे पच्चीस साल की लड़की, थ्िायेटर रोड के कौवे। कथा - साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए उत्तर प्रदेश ¯हदी संस्थान से साहित्य भूषण 2004 में तथा वहीं से कहानी सम्मान 1989 में प्राप्त हुआ। उनके समग्र साहित्य पर अभ्िानव भारती कलकत्ता ने रचना पुरस्कार भी दिया। इसके अतिरिक्त उन्हें सरस्वती प्रेस तथा साप्ताहिक ¯हदुस्तान का श्रेष्ठ कहानी पुरस्कार भी प्राप्त है। ममता कालिया शब्दों की पारखी हैं। उनका भाषाज्ञान अत्यंत उच्चकोटि का है। साधारण शब्दों में भी अपने प्रयोग से जादुइर् प्रभाव उत्पन्न कर देती हैं। विषय के अनुरूप सहज भावाभ्िाव्यक्ित उनकी खासियत है। व्यंग्य की सटीकता एवं सजीवता से भाषा में एक अनोखा प्रभाव उत्पन्न हो जाता है। अभ्िाव्यक्ित की सरलता एवं सुबोधता उसे विशेष रूप से ममर्स्पशीर् बना देती है। पाठ्यपुस्तक में संकलित दूसरा देवदास कहानी हर की पौड़ी, हरिद्वार के परिवेश को वेंफद्र में रखकर युवामन की संवेदना, भावना और विचारजगत की उथल - पुथल को आकषर्क भाषा - शैली में प्रस्तुत करती है। यह कहानी युवा हृदय में पहली आकस्िमक मुलाकात की हलचल, कल्पना दूसरा देवदास हर की पौड़ी पर साँझ वुफछ अलग रंग में उतरती है। दीया - बाती का समय या कह लो आरती की बेला। पाँच बजे जो पूफलों के दोने एक - एक रुपए के बिक रहे थे, इस वक्त दो - दो के हो गए हैं। भक्तों को इससे कोइर् श्िाकायत नहीं। इतनी बड़ी - बड़ी मनोकामना लेकर आए हुए हैं। एक - दो रुपए का मुँह थोड़े ही देखना है। गंगा सभा के स्वयंसेवक खाकी वरदी में मुस्तैदी से घूम रहे हैं। वे सबको सीढि़यों पर बैठने की प्राथर्ना कर रहे हैं। शांत होकर बैठिए, आरती शुरू होने वाली है। वुफछ भक्तों ने स्पेशल आरती बोल रखी है। स्पेशल आरती यानी एक सौ एक या एक सौ इक्यावन रुपए वाली। गंगातट पर हर छोटे - बड़े मंदिर पर लिखा है। ‘गंगा जी का प्राचीन मंदिर।’ पंडितगण आरती के इंतशाम में व्यस्त हैं। पीतल की नीलांजलि में सहस्र बिायाँ घी में भ्िागोकर रखी हुइर् हैं। सबने देशी घी के डब्बे अपनी इर्मानदारी के प्रतीकस्वरूप सजा रखे हैं। गंगा की मूतिर् के साथ - साथ चामुंडा, बालकृष्ण, राधाकृष्ण, हनुमान, सीताराम की मूतिर्यों की शृंगारपूणर् स्थापना है। जो भी आपका आराध्य हो, चुन लें। आरती से पहले स्नान! हर - हर बहता गंगाजल, निमर्ल, नीला, निष्पाप। औरतें डुबकी लगा रही हैं। बस उन्होंने तट पर लगे वुंफडों से बँधी शंजीरें पकड़ रखी हैं। पास ही कोइर् न कोइर् पंडा जजमानों के कपड़ों - लत्तों की सुरक्षा कर रहा है। हर एक के पास चंदन और ¯सदूर की कटोरी है। मदो± के माथे पर चंदन तिलक और औरतों के माथे पर ¯सदूर का टीका लगा देते हैं पंडे। कहीं कोइर् दादी - बाबा पहला पोता होने की खुशी में आरती करवा रहे हैं, कहीं कोइर् नयी बहू आने की खुशी में। अभी पूरा अंधेरा नहीं घ्िारा है। गोधूलि बेला है। यकायक सहस्र दीप जल उठते हैं पंडित अपने आसन से उठ खड़े होते हैं। हाथ में अँगोछा लपेट के पंचमंजिली नीलांजलि पकड़ते हैं और शुरू हो जाती है आरती। पहले पुजारियों के भरार्ए गले से समवेत स्वर उठता है - जय गंगे माता, जो कोइर् तुझको ध्याता, सारे सुख पाता, जय गंगे माता। घंटे घडि़याल बजते हैं। मनौतियों के दिये लिए हुए पूफलों की छोटी - छोटी किश्ितयाँ गंगा की लहरों पर इठलाती हुइर् आगे बढ़ती हैं। गोताखोर दोने पकड़, उनमें रखा चढ़ावे का पैसा उठाकर मुँह में दबा लेते हैं। एक औरत ने इक्कीस दोने तैराएँ हैं। गंगापुत्रा जैसे ही एक दोने से पैसा उठाता है, औरत अगला दोना सरका देती है। गंगापुत्रा उसपर लपकता है कि पहले दोने की दीपक से उसके लँगोट में आग की लपट लग जाती है। पास खड़े लोग हँसने लगते हैं। पर गंगापुत्रा हतप्रभ नहीं होता। वह झट गंगाजी में बैठ जाता है। गंगा मैया ही उसकी जीविका और जीवन है। इसके रहते वह बीस चक्कर मुँह भर - भर रेशगारी बटोरता है। उसकी बीवी और बहन वुफशाघाट पर रेशगारी बेचकर नोट कमाती हंै। एक रुपए के पच्चासी पैसे। कभी - कभी अस्सी भी देती हैं। जैसा दिन हो। पुजारियों का स्वर थकने लगता है तो लता मंगेशकर की सुरीली आवाश लाउडस्पीकरों के साथ सहयोग करने लगती है और आरती में यकायक एक स्िनग्ध सौंदयर् की रचना हो जाती है। ‘ओम जय जगदीश हरे’ से हर की पौड़ी गुंजायमान हो जाती है। औरतें श्यादातर नहाकर वस्त्रा नहीं बदलतीं। गीले कपड़ों में ही खड़ी - खड़ी आरती में शामिल हो जाती हैं। पीतल की पंचमंजिली नीलांजलि गरम हो उठी है। पुजारी नीलांजलि को गंगाजल से स्पशर् कर, हाथ में लिपटे अँगोछे को नामालूम ढंग से गीला कर लेते हैं। दूसरे यह दृश्य देखने पर मालूम होता है वे अपना संबोधन गंगाजी के गभर् तक पहुँचा रहे हैं। पानी पर सहस्र बाती वाले दीपकों की प्रतिच्छवियाँ झिलमिला रही हैं। पूरे वातावरण में अगरु - चंदन की दिव्य सुगंध है। आरती के बाद बारी है संकल्प और मंत्रोच्चार की। भक्त आरती लेते हैं, चढ़ावा चढ़ाते हैं। स्पेशल भक्तों से पुजारी ब्राह्मण - भोज, दान, मिष्ठान की धनराश्िा कबुलवाते हैं। आरती के क्षण इतने भव्य और दिव्य रहे हैं कि भक्त हुज्जत नहीं करते। खुशी - खुशी दक्ष्िाणा देते हैं। पंडित जी प्रसन्न होकर भगवान के गले से माला उतार - उतारकर यजमान के गले में डालते हैं। पिफर जी खोलकर देते हैं प्रसाद, इतना कि अपना हिस्सा खाकर भी ढेर सा बच रहता है, बाँटने के लिए - मुरमरे, इलायचीदाना, केले और पुष्प। खचर् हुआ पर भक्तों के चेहरे पर कोइर् मलाल नहीं। कइर् खचर् सुखदायी होतेहैं। वुफछ पंडे अभी भी अपने तख्त पर जमे हैं। देर से आनेवाले भक्तों का स्नान ध्यान अभी जारी है। आरती के दोने पिफर एक रुपए में बिकने लगे हैं। गंगाजल आकाश के साथ रंग बदल रहा है। संभव कापफी देर से नहा रहा था। जब घाट पर आया तो मंगल पंडा बोले, ‘का हो जजमान, बड़ी़देर लगाय दी। हम तो डर गए थे।’ संभव हँसा। उसके एक सार खूबसूरत दाँत साँवले चेहरे पर पफब उठे। उसने लापरवाही से कपड़े पहने और जांघ्िाया निचोड़कर थैले में डाला। जब वह वुफरते से पोंछकर चश्मा लगा रहा था, पंडे ने उसके माथे पर चंदन तिलक लगाने को हाथ बढ़ाया। ‘उ हूँ।’ उसने चेहरा हटा लिया तो मंगल पंडा ने कहा, ‘चंदन तिलक के बगैर अस्नान अधूरा होता है बेटा।’ संभव ने चुपचाप तिलक लगवा लिया। वह वापस सीढि़याँ चढ़ ही रहा था कि पौड़ी पर बने एक छोटे से मंदिर के पुजारी ने आवाश लगाइर्, ‘अरे दशर्न तो करते जाओ’। संभव ठिठक गया। उसकी इन चीशों में नियमित आस्था तो नहीं थी पर नानी ने कहा था, ‘मंदिर में बीस आने चढ़ाकर आना।’ संभव ने वुफरते की जेब में हाथ डाला। एक रुपए का नोट तो मिल गया चवन्नी के लिए उसे वुफछ प्रयत्न करना पड़ा। चवन्नी जेब में नहीं थी। संभव ने थैला खखोरा। पुजारी ने उसकी परेशानी ताड़ ली। फ्इधर आओ, हम दें रेजगारी।य् संभव ने झेंपते हुए एक का नोट जेब में रखकर दो का नोट निकाला। पुजारी जी ने चरणामृत दिया और लाल रंग का कलावा बाँधने के लिए हाथ बढ़ाया। संभव का ध्यान कलावे की तरपफ नहीं था। वह गंगा जी की छटा निहार रहा था। तभी एक औऱदुबली नाशुक सी कलाइर् पुजारी की तरपफ बढ़ आइर्। पुजारी ने उस पर कलावा बाँध दिया। उस हाथ़ने थाली में सवा पाँच रुपए रखे। लड़की अब बिलवुफल बराबर में खड़ी, आँख मूँदकर अचर्न कर रही थी। संभव ने यकायक मुड़कर उसकी ओर गौर किया। उसके कपड़े एकदम भीगे हुए थे, यहाँ तक कि उसके गुलाबी आँचल से संभव के वुफतेर् का एक कोना भी गीला हो रहा था। लड़की के लंबे गीले बाल पीठ पर काले चमकीले शाॅल की तरह लग रहे थे। दीपकों के नीम उजाले में, आकाश और जल की साँवली संिा - बेला में, लड़की बेहद सौम्य, लगभग काँस्य प्रतिमा लग रही थी। लड़की ने कहा, फ्पंडित जी, आज तो आरती हो चुकी। क्या करें हमें देर हो गइर्।य् पुजारी ने उत्साह से कहा, फ्इससे क्या, हम हिंया कराय दें। का कराना है संकल्प, कल्याण - मंत्रा, आरती जो कहो?य् फ्नहीं हम कल आरती की बेला आएँगे।य् लड़की ने कहा। संभव इंतशार में खड़ा था कि पुजारी उसे पचहत्तर पैसे लौटाए। लेकिन पुजारी भूल चुका था। जाने वैफसे पुजारी ने लड़की के ‘हम’ को युगल अथर् में लिया कि उसके मुँह से अनायास आशीष निकली, फ्सुखी रहो, पूफलोपफलो, जब भी आओ साथ ही आना, गंगा मैया मनोरथ पूरे करें।य् लड़की और लड़का दोनों अकबका गए। लड़की छिटककर दूर खड़ी हो गइर्। लड़के को तुरंत वहाँ से चल पड़ने की जल्दी हो गइर्। शायद उनकी चप्पलें एक ही रखवाले के यहाँ रखी हुइर् थीं। टोकन देकर चप्पलें लेते समय दोनों की निगाहें एक बार पिफर टकरा गईं। आँखों का चकाचैंध अभी मिटा नहीं था। संभव आगे बढ़कर कहना चाहता था, फ्देख्िाए इसमें मेरी कोइर् गलती नहीं थी। पुजारी ने गलत अथर् ले लिया।य् लड़की कहना चाहती थी, फ्आपको इतना पास नहीं खड़ा होना चाहिए था।य् लड़की ने अपना होंठ दाँतों में दबाकर छोड़ दिया। भूल तो उसी की थी। बाद में तो वही आइर् थी। अंधेरे से घबराकर कहाँ, कितनी पास खड़ी हुइर्, उसे वुफछ खबर नहीं थी। लेकिन बातचीत के लायक दोनों की मनःस्िथति नहीं थी। पहचान भी नहीं। दोनों ने नशरें बचाते हुए चप्पलें पहनीं। लड़की घबराहट में ठीक से चप्पल पहन नहीं पाइर्। थोड़ी सी अँगूठे में अटकाकर ही आगे बढ़ गइर्। संभव ने आगे लपककर देखना चाहा कि लड़की किस तरपफ गइर्। वह घाट की भीड़ को काटता़हुआ सब्जीमंडी पहुंँच गया। हर की पौड़ी और सब्जीमंडी के बीच अनेक घुमावदार गलियाँ थीं। लड़का देख नहीं पाया लड़की कहाँ ओझल हो गइर्। नानी का घर करीब आ गया था लेकिन लड़का घर नहीं गया। वह वापस अनदेखी गलियों में चक्कर लगाता रहा। उसने चूड़ी की समस्त दुकानों पर नशर दौड़ाइर्। हर दुकान पर भीड़ थी पर एक भीगी, गुलाबी आकृति नहीं थी। आख्िार भटकते - भटकते संभव हार गया। पस्त कदमों से वह घर की ओर मुड़ा। नानी ने द्वार खोलते हुए कहा, फ्कहाँ रह गए थे लल्ला। मैं तो जी में बड़ा काँप रही थी। तुझे तो तैरना भी न आवे। कहीं पैर पिफसल जाता तो मैं तेरी माँ को कौन मुँह दिखाती।य् संभव वुफछ नहीं बोला। थैला तख्त पर पटक, पैर धोने नल के पास चला गया। नानी बोली, फ्ब्यालू कर ले।य् संभव पिफर भी नहीं बोला। नानी की आदत थी एक बात को कइर् - कइर् बार कहती। संभव तख्त पर लेट गया। नानी ने कहा, फ्थक गया न। अरे तुझे मेले - ठेले में चलने की आदत थोड़ेइर् है। कल बैसाखी है, इसलिए भीड़ बहुत बढ़ गइर् है। अभी तो कल देखना, तिल धरने की जगह नहीं मिलेगी पौड़ी पर। चल उठ खायबे को खा ले।य् फ्मुझे भूख नहीं है,य् संभव ने कहा और करवट बदल ली। फ्अरे क्या हो गया। अस्नान के बाद भी भूख नाँय चमकी। तभी न इतनी सींक सलाइर् देही है। मैंने सबिता से पहले ही कही थी, इसे अकेले ना भेज। यहाँ जी ना लगे इसका।य् नानी पास खड़े खटोले पर अधलेटी हो गइर्। उम्र के साथ - साथ नानी की काया इतनी संक्ष्िाप्त हो गइर् थी कि वे पैफल पसर कर सोती तो भी उनके लिए खटोला पयार्प्त था। पर उन्हें सिवुफड़कर, गठरी बनकर सोने की आदत थी। गंगा को छूकर आती हवा से आँगन कापफी शीतल था। ऊपर से नानी ने रोश की तरह शाम को़चैक धो डाला था। नींद और स्वप्न के बीच संभव की आँखों में घाट की पूरी बात उतर आइर्। लड़की का आँख मूँदकर अचर्ना करना, माथे पर भीगे बालों की लट, वुफरते को छूता उसका गुलाबी आँचल और पुजारी से कहता उसका सौम्य स्वर ‘हम कल आएँगे।’ संभव की आँख खुल गइर्। यह तो वह भूल ही गया था। लड़की ने कल वहाँ आने का वचन दिया था। संभव आशा आौर उत्साह से उठ बैठा। नानी को झकझोरते हुए बोला, फ्नानी, नानी चलो खा लें मुझे भूख लगी है।य् नानी की नींद झूले के समान थी, कभी गहरी, कभी उथली। उथले झोटे में उन्हें धेवते की सुध आइर्। वे रसोइर् से थाली उठा लाईं। संभव ने बहुत मगन होकर खाना शुरू किया, फ्वाह नानी! क्या आलू टमाटर बनाया है, माँ तो ऐसा बिलवुफल नहीं बना सकतीं। ककड़ी का रायता मुझे बहुत पसंद है।य् खाते - खाते संभव को याद आया आशीवर्चन की दुघर्टना तो बाद में घटी थी। वह कौर हाथ में लिए बैठा रह गया। उसकी आँखों के बीच आगे वुफछ घंटे पहले का सारा दृश्य घूम गया। पुजारी का वह मंत्रोच्चार जैसा पवित्रा उद्गार ‘सुखी रहो, पूफलो - पफलो, सारे मनोरथ पूरे हों। जब भी आओ साथ ही आना।’ लड़की का चिहुँकना, छिटककर दूर खड़े होना, घबराहट में चप्पल भी ठीक से न पहन पाना और आगे बढ़ जाना। संभव ने विचलित स्वर में कहा, फ्मुझे भूख नाँय। मैं तो यों ही उठ बैठा था।य् सारी रात संभव की आँखों में शाम मँडराती रही। उसकी श्यादा उम्र नहीं थी। इसी साल एम.एपूरा किया था। अब वह सिविल सविर्सेश प्रतियोगिताओं में बैठने वाला था। माता - पिता का खयाल था वह हरिद्वार जाकर गंगा जी के दशर्न कर ले तो बेखटके सिविल सेवा में चुन लिया जाएगा। लड़का इन टोटकों को नहीं मानता था पर घूमना और नानी से मिलना उसे पसंद था। अभी तक उसके जीवन में कोइर् लड़की किसी अहम भूमिका में नहीं आइर् थी। लड़कियाँ या तो क्लास में बाँयी तरपफ की बेंचों पर बैठनेवाली एक कतार थी या पिफर ताइर् चाची की लड़कियाँ जिनवेफ़साथ खेलते खाते वह बड़ा हुआ था। इस तरह बिलवुफल अकेली, अनजान जगह पर, एक अनाम लड़की का सद्य - स्नात दशा में सामने आना, पुजारी का गलत समझना, आशीवार्द देना, लड़की का घबराना और चल देना सब मिलाकर एक नयी निराली अनुभूति थी जिसमें उसे वुफछ सुख और श्यादा बेचैनी लग रही थी। उसने मन ही मन तय किया कि कल शाम पाँच बजे से ही वह घाट पर जाकर बैठ जाएगा। पौड़ी पर इस तरह बैठेगा कि कल वाले पुजारी के देवालय पर सीधी आँख पड़े। उसने तो लड़की का नाम भी नहीं पूछा। वैसे वह हरिद्वार की नहीं लगती थी। वैफसी लगती थी, संभव ने याद करने की कोश्िाश की। उसे सिप़्ार्फ उसकी दुबली पतली काया, गुलाबी साड़ी, और भीगी - भीगी श्याम सलोनी आँखें दिखीं। उसे अप़्ाफसोस था वह उसे ठीक से देख भी नहीं पाया पर यह तय था कि वह उसे हशारों की भीड़ में भी पहचान लेगा। अभी चिडि़यों ने आँगन में लगे अमरूद के पेड़ पर चहचहाना शुरू ही किया था कि नानी ने आवाश दी, फ्लल्ला चलेगा गंगाजी, आज बैसाखी है।य् संभव को लगा वह रातभर सोया नहीं है। नानी की मौजूदगी में जैसे उसे संकोच हो रहा था। उसने कहा, फ्तुम मेरे भी नाम की डुबकी लगा लेना नानी, मैं तो अभी सोउँफगा।य् नानी द्वार उढ़काकर चली गईं, तो लड़के ने अपनी कल्पना को निद्व±द्व छोड़ दिया। आज जब वह सलोनी उसे दिखेगी तो वह उसके पास जाकर कहेगा, फ्पुजारी जी की नादानी का मुझे बेहद अप़्ाफसोस है। यकीन मानिए, पंडित जी मेरे लिए भी उतने ही अनजान हैं। जितने आपके लिए।य् लड़की कहेगी, फ्कोइर् बात नहीं।य् वह पूछेगा, फ्आप दिल्ली से आइर् हैं?य् लड़की कहेगी, फ्नहीं हम तो... के हैं।य् बस उसके हाथ पते की बात लग जाएगी। अगर उसने रुख दिखाया तो वह कहेगा, फ्मेरा नाम संभव है और आपका?य् वह क्या कहेगी? उसका नाम क्या होगा। वह बी.ए. में पढ़ रही होगी या एम.ए. में? इन सवालों के जवाब वह अभी ढूँढ भी नहीं पाया था कि नानी वापस आ गईं। फ्ले तू अभी तक सुपने ले रहा है, वहाँ लाखन लाख लोग नहान कर लिए। अरे कभी तो बड़ों का कहा कर लो।य् लड़के की तंद्रा नष्ट हो गइर्। नानी उवाच के बीच सपने नौ दो ग्यारह होगए। लड़के ने उठते - उठते तय किया कि इस वक्त वह घाट तक चला तो जाएगा, पर नहाएगा नहीं। हाथ - मुँह धोकर प्राथर्ना कर लेगा। वुफछ देर पौड़ी पर बैठ गंगा की जलराश्िा निहारेगा। लौटते हुए मथुरा जी की प्राचीन दुकान से गरम जलेबी खरीदेगा और वापस आ जाएगा। उसने वुफरते की जेब में बीस का नोट डाला और चल दिया। वास्तव में पौड़ी पर आज अद्भुत भीड़ थी। गंगा के घाट से भी चैड़ा मानव - रेला दिखाइर् दे रहा था। भोर की आरती हो चुकी थी। लेकिन भजन शोर - शोर से चले जा रहे थे। नारियल, पूफल और प्रसाद की घनघोर बिक्री थी। भीड़ लड़के ने दिल्ली में भी देखी थी, बल्िक रोश देखता था। दफ्ऱतर जाती भीड़, खरीद पफरोख्त़करती भीड़, तमाशा देखती भीड़, सड़क क्राॅस करती भीड़। लेकिन इस भीड़ का अंदाश निराला था। इस भीड़ में एकसूत्राता थी। न यहाँ जाति का महत्त्व था, न भाषा का, महत्त्व उद्देश्य का था और वह सबका समान था, जीवन के प्रति कल्याण की कामना। इस भीड़ में दौड़ नहीं थी, अतिक्रमण नहीं था और भी अनोखी बात यह थी कि कोइर् भी स्नानाथीर् किसी सैलानी आनंद में डुबकी नहीं लगा रहा था। बल्िक स्नान से श्यादा समय ध्यान ले रहा था। दूर जलधारा के बीच एक आदमी सूयर् की ओर उन्मुख हाथ जोड़े खड़ा था। उसके चेहरे पर इतना विभोर, विनीत भाव था मानो उसने अपना सारा अहम त्याग दिया है, उसके अंदर ‘स्व’ से जनित कोइर् वुफंठा शेष नहीं है, वह श्ुा( रूप से चेतनस्वरूप, आत्माराम और निमर्लानंद है। एक छोटे से लड़के ने लगभग हँसते हुए उसका ध्यान भंग किया। फ्भैया आप नहीं नहाएँगे?य् संभव ने गौर किया। जाने कब पौड़ी पर उसके नशदीक यह बच्चा आ बैठा था। उसका भाल चंदन च£चत था। चेहरे पर चमकीली ताशगी थी। फ्अकेले हो?य् फ्नहीं बुआ साथ हैं।य् फ्कहाँ से आए हो?य् फ्रोहतकय् फ्अब वापस जाओगे?य् फ्नहींय् बच्चे ने चमकीली आँखों से बताया, फ्अभी तो मंसा देवी जाना है, वह उधर।य् बच्चा सामने पहाड़ी पर बना एक मंदिर इंगित से दिखाने लगा। यह स्थल संभव को पहले दिन से ही अपनी ओर खींच रहा था। लेकिन नानी ने उसे बरज दिया था, फ्ना लल्ला मंसा देवी जाना है तो क्या वह झूलागाड़ी में तो बैठियो न। रस्सी से चलती है, क्या पता कब टूट जाए। एक बार टूटी थी, हजारन मरे गिरे थे। जाना है तो चढ़कर जाना, उसका महातम आता था। उसे यहाँ सुबह - सुबह नानी का झाड़ू लगाना, चक्की चलाना, पानी भरना, रात के माँजे बरतन पिफर से धो - धोकर लगाना, सब कष्ट दे रहा था। वह एतराश नहीं कर रहा था तो सिपर्फ इसलिए़कि महश चार दिन रुककर वह नानी की दिनचयार् में हस्तक्षेप करने का अिाकारी नहीं बन सकता। संभव ने बच्चे से कहा, फ्अगर गिर गए तो?य् बच्चा हँसा, फ्इतने बड़े होकर डरते हो भैया? गिरेंगे वैफसे, इतने लोग जो चढ़ रहे हैं।य् शहर के इतिहास के साथ - साथ संभव उसका भूगोल भी आत्मसात करना चाहता था। इसलिए थोड़ी देर बाद वह अटकता भटकता, उस जगह पहुँच गया जहाँ से रोपवे शुरू होती थी। रोपवे के नाम में कोइर् धमार्डंबर नहीं था। ‘उषा ब्रेको सविर्स’ की ख्िाड़की के आगे लंबा क्यू था। वहीं मंसा देवी पर चढ़ाने वाली चुनरी और प्रसाद की थैलियाँ बिक रही थीं। पाँच, सात और ग्यारह रुपए की। कइर् बच्चे ¯बदी - पाउडर और उसके साँचे बेच रहे थे, तीन - तीन रुपए। उन्होंने अपनी हथेली पर कलात्मक ¯बदियाँ बना रखी थीं। नमूने की खातिर। उससे पहले संभव ने कभी ¯बदी जैसे शृंगार प्रसाधन पर ध्यान नहीं दिया था। अब यकायक उसे ये ¯बदियाँ बहुत आकषर्क लगीं। मन ही मन उसने एक ¯बदी उस अज्ञातयौवना के माथे पर सजा दी। माँग में तारे भर देने जैसे कइर् गाने उसे आधे अधूरे याद आकर रह गए। उसका नंबर बहुत जल्द आ गया। अब वह दूसरी कतार में था जहाँ से केबिल कार में बैठना था। सभी काम बड़ी तत्परता से हो रहे थे। जल्द ही वह उस विशाल परिसर में पहुँच गया जहाँ लाल, पीली, नीली, गुलाबी केबिल कार बारी - बारी से आकर रुकतीं, चार यात्राी बैठातीं और रवाना हो जातीं। केबिल कार का द्वार खोलने और बंद करने की चाभी आॅपरेटर के नियंत्राण में थी। संभव एक गुलाबी केबिल कार में बैठ गया। कल से उसे गुलाबी के सिवा और कोइर् रंग सुहा ही नहीं रहा था। उसके सामने की सीट पर एक नवविवाहित दंपति चढ़ावे की बड़ी थैली और एक वृ( चढ़ावे की छोटी थैली लिए बैठे थे। संभव को अपफसोस हुआ कि वह चढ़ावा खरीदकर नहीं लाया। इस वक्त जहाँ से केबिल काऱगुशर रही थी, नीचे कतारब( पूफल ख्िाले हुए थे। लगता था रंग - बिरंगी वादियों से कोइर् ¯हडोला उड़ा जा रहा है। एक बार चारों ओर के विहंगम दृश्य में मन रम गया तो न मोटे - मोटे पफौलाद के खंभें नशर आए़और न भारी केबिल वाली रोपवे। पूरा हरिद्वार सामने खुला था। जगह - जगह मंदिरों के बुजर्, गंगा मैया की धवल धार और सड़कों के खूबसूरत घुमाव। नीचे सड़क के रास्ते चढ़ते, हाँपफते लोग। लिमका की दुकानें और नाम अनाम पेड़। बहुत जल्द उनकी केबिल कार मंसा देवी के द्वार पर पहुँच गइर्। यहाँ पिफर चढ़ावा बेचने वाले बच्चे नशर आए। संभव ने एक थैली खरीद ली और सीढि़याँ चढ़कर प्रांगण में पहुँच गया। नाम मंसा देवी का था पर वचर्स्व सभी देवी - देवताओं का मिला जुला था। एकदम अंदर के प्रकोष्ठ में चामुंडा रूप धारिणी मंसादेवी स्थापित थीं। व्यापार यहाँ भी था। मनोकामना के हेतुक लाल - पीले धागे सवा रुपए में बिक रहे थे। लोग पहले धागा बाँधते, पिफर देवी के आगे शीश नवाते। संभव ने भी पूरी श्र(ा के साथ मनोकामना की, गाँठ लगाइर्, सिर झुकाया, नैवेद्य चढ़ाया और वहाँ से बाहर आ गया। आँगन में रुद्राक्ष मालाओं की अनेक गुमटियाँ थीं, जहाँ दस रुपए से लेकर तीन हशार तक की मालाओं पर लिखा था - ‘असली रुद्राक्ष, नकली साबित करने वाले को पाँच सौ रुपए इनाम।’ एक तरपफ हलवाइर् गरम जलेबी, पूरी, कचैड़ी छान रहे थे। मेले का माहौल था।़संभव वापस केबिल कार की कतार में लग गया। वापसी का रास्ता ढलवाँ था। कार और भी जल्द नीचे पहुँच रही थी। इस बार संभव के साथ तीन समवयस्क लड़के बैठे हुए थे वह केबिल कार की ढलवाँ दौड़ देख रहा था कि यकायक दो आश्चयर् एक साथ घटित हुए। वह बच्चा जो पौड़ी पर उसके करीब आकर बैठ गया था, दूर पीली केबिल कार में नशर आया। बच्चे की लाल कमीश उसे अच्छी तरह याद थी। हालाँकि इतनी दूर से उसका चेहरा स्पष्ट नशर नहीं आ रहा था। और बच्चे से सटी हुइर् जो दुबली, पतली, श्याम सलोनी आकृति बैठी थी, वह थी वही लड़की जो कल शाम के झुटपुटे में हर की पौड़ी पर उससे टकराइर् थी। संभव बेहद बेचैन हो गया। वह दाएँ - बाएँ झुक - झुककर चीÉने की कोश्िाश करने लगा। उसका मन हुआ पंछी की तरह उड़कर पीली केबिल कार में पहँुच जाए। बहुत जल्द केबिल कार वापस नीचे पहुँच गइर्। संभव ने आगे - आगे जाते बच्चे को लपककर वंफधे से थाम लिया और बोला, फ्कहो दोस्त?य् बच्चे ने अचकचाकर उसकी ओर देखा - फ्अरे भैयाय्। रुककर बोला, फ्हमने सोचा जब हमारा दोस्त नहीं डरता तो हो जाए एक टिªप।य् तभी आगे से एक महीन सी आवाश ने कहा, फ्मन्नू घर नहीं चलना है।य् बालक मन्नू ने कहा, फ्अभी आया बुआ।य् संभव ने अस्पुफट स्वर में पूछा, फ्ये तुम्हारी बुआ हैं।य् फ्और क्याय् मन्नू ने साश्चयर् जवाब दिया। फ्हमें नहीं मिलाओगे, हम तो तुम्हारे दोस्त हैं।य् मन्नू वाकइर् उसका हाथ खींचता हुआ चल दिया, फ्बुआ, बुआ, इनसे मिलो, ये हैं हमारे नए दोस्त...य् उसने प्रश्नवाचक नशरों से संभव को देखा, फ्अपना नाम खुद बताइए।य् वह अपना बताता, इससे पहले उसी महीन मीठी आवाश ने कहा, फ्ऐसे वैफसे दोस्त हैं तुम्हारे, तुम्हें उनका नाम भी नहीं पता?य् अब संभव ने गौर किया, बिलवुफल वही वंफठ, वही उलाहना, वही अंदाश। पुलक से उसका रोम - रोम हिल उठा। हे इर्श्वर! उसने कब सोचा था मनोकामना का मौन उद्गार इतनी शीघ्र शुभ परिणाम दिखाएगा। लड़की ने आज गुलाबी परिधान नहीं पहना था पर सपेफद साड़ी में लाज से गुलाबी होते हुए उसने मंसा देवी पर एक और चुनरी चढ़ाने का संकल्प लेते हुए सोचा, फ्मनोकामना की गाँठ भी अद्भुत, अनूठी है, इधर बाँधो उधर लग जाती है...य् फ्पारो बुआ, पारो बुआ, इनका नाम है...य् मन्नू ने बुआ का आँचल खींचते हुए कहा। फ्संभव देवदासय् संभव ने हँसते हुए वाक्य पूरा किया। उसे भी मनोकामना का पीला - लाल धागा और उसमें पड़ी गिठान का मधुर स्मरण हो आया। प्रश्न - अभ्यास 1.पाठ के आधार पर हर की पौड़ी पर होने वाली गंगा जी की आरती का भावपूणर् वणर्न अपने शब्दों में कीजिए। 2.‘गंगापुत्रा के लिए गंगा मैया ही जीविका और जीवन है’ - इस कथन के आधार पर गंगा पुत्रों के जीवन - परिवेश की चचार् कीजिए। 3.पुजारी ने लड़की के ‘हम’ को युगल अथर् में लेकर क्या आशीवार्द दिया और पुजारी द्वारा आशीवार्द देने के बाद लड़के और लड़की के व्यवहार में अटपटापन क्यों आया? 4.उस छोटी सी मुलाकात ने संभव के मन में क्या हलचल उत्पन्न कर दी, इसका सूक्ष्म विवेचन कीजिए। 5.मंसा देवी जाने के लिए केबिलकार में बैठे हुए संभव के मन में जो कल्पनाएँ उठ रही थीं, उनका वणर्न कीजिए। 6.फ्पारो बुआ, पारो बुआ इनका नाम है... उसे भी मनोकामना का पीला - लाल धागा और उसमें पड़ी गिठान का मधुर स्मरण हो आया।य् कथन के आधार पर कहानी के संकेतपूणर् आशय पर टिप्पणी लिख्िाए। 7.‘मनोकामना की गाँठ भी अद्भुत, अनूठी है, इधर बाँधो उधर लग जाती है।’ कथन के आधार पर पारो की मनोदशा का वणर्न कीजिए। 8.निम्नलिख्िात वाक्यों का आशय स्पष्ट कीजिए - ;कद्ध ‘तुझे तो तैरना भी न आवे। कहीं पैर पिफसल जाता तो मैं तेरी माँ को कौन मुँह दिखाती।’ ;खद्ध ‘उसके चेहरे पर इतना विभोर विनीत भाव था मानो उसने अपना सारा अहम त्याग दिया है, उसके अंदर स्व से जनित कोइर् वुंफठा शेष नहीं है, वह शु( रूप से चेतनस्वरूप, आत्माराम और निमर्लानंद है।’ ;गद्ध ‘एकदम अंदर के प्रकोष्ठ में चामुंडा रूप धारिणी मंसादेवी स्थापित थी। व्यापार यहाँ भी था।’ 9.‘दूसरा देवदास’ कहानी के शीषर्क की साथर्कता स्पष्ट कीजिए। 10.‘हे इर्श्वर! उसने कब सोचा था कि मनोकामना का मौन उद्गार इतनी शीघ्र शुभ परिणाम दिखाएगा - आशय स्पष्ट कीजिए।’ भाषा - श्िाल्प 1.इस पाठ का श्िाल्प आख्याता ;नैरेटर - लेखकद्ध की ओर से लिखते हुए बना है - पाठ से वुफछ उदाहरण देकर सि( कीजिए। 2.पाठ में आए पूजा - अचर्ना के शब्दों तथा इनसे संबंध्ित वाक्यों को छाँटकर लिख्िाए। योग्यता - विस्तार 1.चंद्रध्र शमार् गुलेरी की ‘उसने कहा था’ कहानी पढि़ए और उस पर बनी प्िाफल्म देख्िाए।़2.हरिद्वार और उसके आसपास के स्थानों की जानकारी प्राप्त कीजिए। 3.गंगा नदी पर एक निबंध् लिख्िाए। 4.आपके नगर / गाँव में नदी - तालाब - मंदिर के आसपास जो कमर्कांड होते हैं उनका रेखाचित्रा के रूप मंे लेखन कीजिए। शब्दाथर् और टिप्पणी गोधूलि बेला - संध्या का समय हुज्जत - बहस ब्यालू - शाम का भोजन नीलांजलि - विशेष प्रकार का दीपक जिसे प्रज्ज्वलित कर आरती के समय देवमू£त के सामने घुमाया जाता है। मनोरथ - मन की इच्छा, अरमान बेखटके - बिना किसी रुकावट के कलावा - कलाइर् में बाँध्ी गइर् लाल डोरी, मौली प्रकोष्ठ - कक्ष, कमरा झुटपुटा - वुफछ - वुफछ अँध्ेरा, अस्पुफट - अस्पष्ट, वुफछ - वुफछ उजाला आत्मसात - अपने में समा लेना जी खोलकर देना - उदारतापूवर्क खचर् करना नशरें बचाना - एक दूसरे से कतराना नौ दो ग्यारह होना - भाग जाना, गायब होना

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