भीष्म साहनी ;सन् 1915 - 2003द्ध भीष्म साहनी का जन्म रावल¯पडी ;अब पाकिस्तानद्ध में हुआ। उनकी प्रारंभ्िाक श्िाक्षा घर में ही हुइर्। इन्होंने उदूर् और अंग्रेशी का अध्ययन स्वूफल में किया। गवनर्मेंट कालेज लाहौर से आपने अंग्रेशी साहित्य में एम.ए. किया, तदुपरांत पंजाब विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की उपािा प्राप्त की। देश - विभाजन से पूवर् इन्होंने व्यापार के साथ - साथ मानद ;आॅनरेरीद्ध अध्यापन का कायर् किया। विभाजन के बाद पत्राकारिता, इप्टा नाटक मंडली में काम किया, मुंबइर् में बेरोशगार भी रहे। पिफर अंबाला के एक काॅलेज में तथा खालसा काॅलेज, अमृतसर में अध्यापन से जुड़े। वुफछ समय बाद स्थायी रूप से दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन काॅलेज में साहित्य का अध्यापन किया। लगभग सात वषर् विदेशी भाषा प्रकाशन गृह मास्को में अनुवादक के पद पर भी कायर्रत रहे। रूस प्रवास के दौरान रूसी भाषा का अध्ययन और लगभग दो दशर्न रूसी पुस्तकों का अनुवाद उनकी विशेष उपलब्िध रही। लगभग ढाइर् वषो± तक नयी कहानियाँ का वुफशल संपादन किया। ये प्रगतिशील लेखक संघ तथा अप्रफो - एश्िायाइर् लेखक संघ से भी संब( रहे। उनकी प्रमुख कृतियों में भाग्यरेखा, पहला पाठ, भटकती राख, पटरियाँ, वाघ्चू, शोभायात्रा, निशाचर, पाली, डायन ;कहानी - संग्रहद्ध, झरोखे, कडि़याँ, तमस, बसंती, मÕयादास की माड़ी, वुंफतो, नीलू नीलिमा नीलोपफर ;उपन्यासद्ध, माधवी, हानूश, कबिरा खड़ा बशार में, मुआवशे ;नाटकद्ध, गुलेल का खेल ;बालोपयोगी कहानियाँद्ध आदि महत्त्वपूणर् हैं। तमस उपन्यास के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके साहित्ियक अवदान के लिए ¯हदी अकादमी, दिल्ली ने उन्हें शलाका सम्मान से सम्मानित किया। उनकी भाषा में उदूर् शब्दों का प्रयोग विषय को आत्मीयता प्रदान करता है। उनकी भाषा - शैली में पंजाबी भाषा की सोंधी महक भी महसूस की जा सकती है। साहनी जी छोटे - छोटे वाक्यों का प्रयोग करके विषय को प्रभावी एवं रोचक बना देते हैं। संवादों का प्रयोग वणर्न में ताशगी ला देता है। ाफात़गांधी, नेहरू और यास्सेर अराप् उन दिनों मेरे भाइर् बलराज, सेवाग्राम में रहते थे, जहाँ वह ‘नयी तालीम’ पत्रिाका के सह - संपादक के रूप में काम कर रहे थे। यह सन् 1938 के आसपास की बात है, जिस साल कांग्रेस का हरिपुरा अिावेशन हुआ था। वुफछ दिन उनके साथ बिता पाने के लिए मैं उनके पास चला गया था। रेलगाड़ी वधार् स्टेशन पर रुकती थी। वहाँ से लगभग पाँच मील दूर सेवाग्राम तक का प़्ाफासला इक्के या ताँगे में बैठकर तय करना होता था। मैं देर रात सेवाग्राम पहुँचा। एक तो सड़क कच्ची थी, इस पर घुप्प अँधेरा था। उन दिनों सड़क पर कोइर् रोशनी नहीं हुआ करती थी। रात देर तक हम बतियाते रहे। भाइर् ने बताया कि गांधी जी प्रातः सात बजे घूमने निकलते हैं। फ्इधर, हमारे क्वाटर्र के सामने से ही वह जाएँगे। कोइर् भी उनके साथ जा सकता है। तुम भी मन आए तो चले जाना,य् मैं सवुफचाया। फ्मैं अकेला उनकी पाटीर् के साथ वैफसे जा मिलूँ? तुम भी साथ चलो।य् फ्मैं तो रोश ही उन्हें देखता हूँय्, भाइर् ने करवट बदलते हुए कहा, पिफर बोला, फ्अच्छा चलूँगा।य् दूसरे दिन मैं तड़के ही उठ बैठा, और कच्ची सड़क पर आँखें गाड़े गांधी जी की राह देखने लगा। ऐन सात बजे, आश्रम का पफाटक लाँघकर गांधी जी अपने साथ्िायों के साथ सड़क पर आ गए थे। उन पर नशर पड़ते ही मैं पुलक उठा। गांधी जी हू - ब - हू वैसे ही लग रहे थे जैसा उन्हें चित्रों में देखा था, यहाँ तक कि कमर के नीचे से लटकती घड़ी भी परिचित - सी लगी। बलराज अभी भी बेसुध सो रहे थे। हम रात देर तक बातें करते रहे थे। मैं उतावला हो रहा था। आख्िार मुझसे न रहा गया और मैंने ¯झझोड़कर उसे जगाया। फ्उठो, यार, गांधी जी तो आगे भी निकल गए।य् फ्मैंने तो कहा था तुम अपने आप चले जाना,य् बलराज, आँखंे मलते हुए उठ बैठे। फ्मैं अकेला वैफसे जाता?य् जिस समय हम बाहर निकले, गांधी जी की पाटीर् कापफी दूर जा चुकी थी।़फ्¯चता नहीं करो, हम उनसे जा मिलेंगे और वापसी पर तो उनके साथ ही होंगे।य् आख्िार, हम वफदम बढ़ाते वुफछ ही देर में उनसे जा मिले। गांधी जी ने मुड़कर देखा। भाइर् ने आगे बढ़कर मेरा परिचय कराया - फ्मेरा भाइर् है, कल ही रात पहुँचा है।य् फ्अच्छा। इसे भी घेर लिया,य् गांधी जी ने हँसकर कहा। फ्नहीं बापू, यह केवल वुफछ दिन के लिए मेरे पास आया है।य् गांधी जी ने मुसवुफराकर मेरी ओर देखा और सिर हिला दिया। मैं साथ चलने लगा। गांधी जी के साथ चलनेवाले लोगों में से मैंने दो - एक को पहचान लिया। डाॅ. सुशीला नÕयर थीं और गांधी जी के निजी सचिव महादेव देसाइर् थे। मैं कभी आसपास देखता, कभी नशर नीची किए शमीन की ओर, गांधी जी की धूलभरी चप्पलों की ओर देखने लगता। मैं गांधी जी से बात करना चाहता था पर समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या कहूँ। पिफर सहसा ही मुझे सूझ गया। फ्आप बहुत साल पहले हमारे शहर रावल¯पडी में आए थे,य् मैंने कहा। गांधी जी रुक गए, उन्होंने मेरी ओर देखा, उनकी आँखों में चमक - सी आइर् और मुसवुफराकर बोले - फ्याद है। मैं कोहाट से रावलपिंडी गया था... मिस्टर जाॅन वैफसे हैं?य् मैंने जाॅन साहब का नाम सुन रखा था। वे हमारे शहर के जाने - माने बैरिस्टर थे, मुस्िलम सज्जन थे। संभवतः गांधी जी उनके यहाँ ठहरे होंगे। पिफर सहसा ही गांधी जी के मुँह से निकला - फ्अरे, मैं उन दिनों कितना काम कर लेता था। कभी थकता ही नहीं था।...य् हमसे थोड़ा ही पीछे, महादेव देसाइर्, मोटा सा लऋ उठाए चले आ रहे थे। कोहाट और रावल¯पडी का नाम सुनते ही आगे बढ़ आए और उस दौरे से जुड़ी अपनी यादें सुनाने लगे। और एक बार जो सुनाना शुरू किया तो आश्रम के पफाटक तक सुनाते चले गए। किसी - किसी वक्त गांधी जी, बीच में, हँसते हुए वुफछ कहते। वे बहुत धीमी आवाश में बोलते थे, लगता अपने आपसे बातें कर रहे हैं, अपने साथ ही विचार विनिमय कर रहे हैं। उन दिनों को स्वयं भी याद करने लगे हैं। शीघ्र ही वे सब आश्रम के अंदर जा रहे थे। मैं सेवाग्राम में लगभग तीन सप्ताह तक रहा। अकसर ही प्रातः उस टोली के साथ हो लेता। शाम को प्राथर्ना सभा में जा पहुँचता, जहाँ सभी आश्रमवासी तथा कस्तूरबा एक ओर को पालथी मारे और दोनों हाथ गोद में रखे बैठी होतीं और बिलवुफल मेरी माँ जैसी लगतीं। उन दिनों एक जापानी ‘भ्िाक्षु’ अपने चीवर वस्त्रों में गांधी जी के आश्रम की प्रदक्ष्िाणा करता। लगभग मीलभर के घेरे में, बार - बार अपना ‘गाँग’ बजाता हुआ आगे बढ़ता जाता। गाँग की आवाश हमें दिन में अनेक बार, कभी एक ओर से तो कभी दूसरी ओर से सुनाइर् देती रहती। उसकी प्रदक्ष्िाणा प्राथर्ना के वक्त समाप्त होती, जब वह प्राथर्ना - स्थल पर पहुँचकर बड़े आदरभाव से गांधी जी को प्रणाम करता और एक ओर को बैठ जाता। उन्हीं दिनों सेवाग्राम में अनेक जाने - माने देशभक्त देखने को मिले। पृथ्वी¯सह आशाद आए हुए थे, जिनके मुँह से वह सारा किस्सा सुनने को मिला कि वैफसे उन्होंने हथकडि़यों समेत, भागती रेलगाड़ी में से छलाँग लगाइर् और निकल भागने में सपफल हुए और पिफर गुमनाम रहकर बरसों तक एक जगह अध्यापन कायर् करते रहे। उन्हीं दिनों वहाँ पर मीरा बेन थीं, खान अब्दुल गफ्ऱपफार खान आए़हुए थे, वुफछ दिन के लिए राजेंद्र बाबू भी आए थे। उनके रहते यह नहीं लगता था कि सेवाग्राम दूर पार का कस्बा हो। एक दिन दोपहर के समय मैं आश्रम के बाहर निरुद्देश्य - सा टहल रहा था जब सड़क के किनारे एक खोखे के पीछे से अजीब - सी आवाश सुनाइर् दी - फ्मैं मर रहा हूँ, बापू को बुलाओ। मैं मर जाउँफगा, बापू को बुलाओ।य् मैंने उस ओर कदम बढ़ा दिए। खोखे के अंदर पंद्रहेक साल का एक लड़का, जो देखने में गाँव का रहने वाला जान पड़ता था, पड़ा हाथ - पैर पटक रहा था और हाँपफता हुआ बार - बार कहे जा रहा था - फ्मैं मर जाउँफगा, बापू को बुलाओ।य् दो - एक आदमी उसके पास आकर खड़े हो गए थे। उनमें से एक आश्रमवासी जान पड़ता था। फ्अरे वुफछ बताओ तो, तुम्हें क्या हुआ है। वैद्य को बुलाएँ?य् फ्बापू - बापू को बुलाओ,य् लड़का बार - बार दोहराए जा रहा था। फ्बापू नहीं आ सकते। शरूरी मी¯टग चल रही है।य् पर लड़का बराबर चिल्लाए जा रहा था और हाथ - पाँव पटक रहा था। इतने में मैंने आँख उठाकर देखा तो गांधी जी चले आ रहे थे। दोपहर का वक्त था और वह अपने नंगे बदन पर खादी की हलकी सी चादर ओढ़े मैदान लाँघ रहे थे। फ्आ गए बापू। आ रहे हैंय्, आश्रमवासी ने कहा। जिस पर लड़का उँफचा - उँफचा चिल्लाने लगा। फ्बापू, मैं मर रहा हूँ। मैं मर जाउँफगाय् और दाएँ - बाएँ सिर झुलाने लगा। गांधी जी उसके पास आकर खड़े हो गए। उसके पूफले हुए पेट की ओर उनकी नशर गइर्, उस पर हाथ पेफरा और बोले - फ्इर्ख पीता रहा है? इतनी श्यादा पी गया? तू तो पागल है!य् वुफछ देर तक तो गांधी जी उसके पूफले हुए पेट पर हाथ पेफरते रहे, पिफर उसे सहारा देकर उठाते हुए बोले - फ्इधर नीचे उतरो और मुँह में उँगली डालकर वैफ कर दो। चलो।य् और कहते हुए हँस पड़े - फ्तू तो पागल है।य् लड़का हाय - हाय करता हुआ नीचे उतरा और नाली के किनारे बैठ गया। गांधी जी उसकी पीठ पर हाथ रखे झुके रहे। थोड़ी ही देर में उसका पेट हलका हो गया और वह हाँपफता हुआ बैठ गया। फ्अब इधर खोखे में आकर लेट जा। वुफछ देर चुपचाप लेटा रह।य् वुफछ देर तक गांधी जी उसके पास खड़े रहे, पिफर आश्रमवासी को कोइर् हिदायत सी देकर मुड़ गए और हँसते हुए फ्तू तो पागल है,’ कहकर मैदान पार करने लगे। गांधी जी के चेहरे पर लेशमात्रा भी क्षोभ का भाव नहीं था। वे हँसते हुए चले गए थे। हर दिन प्रातः जिस कच्ची सड़क पर वे घूमने निकलते उसके एक सिरे पर एक वुफटिया थी, जिसमें एक रुग्ण व्यक्ित रहते थे, संभवतः वह दिव्फ के मरीश थे। गांधी जी हर दिन उसके पास जाते और उसके स्वास्थ्य के बारे में पूछताछ करते। उनका वातार्लाप गुजराती भाषा में हुआ करता। मैं समझता हूँ गांधी जी की देखरेख में उसका इलाज चल रहा था। यह गांधी जी का रोश का नियम था। यह भी लगभग उसी समय की बात रही होगी। पंडित नेहरू काश्मीर यात्रा पर आए थे जहाँ उनका भव्य स्वागत हुआ था। शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में, झेलम नदी पर, शहर के एक सिरे से दूसरे सिरे तक, सातवें पुल से अमीराकदल तक, नावों में उनकी शोभायात्रा देखने को मिली थी जब नदी के दोनों ओर हशारों - हशार काश्मीर निवासी अदम्य उत्साह के साथ उनका स्वागत कर रहे थे। अद्भुत दृश्य था। इस अवसर पर नेहरू जी को जिस बँगले में ठहराया गया था, वह मेरे पुफपेफरे भाइर् का था और भाइर् के आग्रह पर कि मैं पंडित जी की देखभाल में उनका हाथ बटाउँफ, मैं भी उस बँगले में पहुँच गया था। दिनभर तो पंडितजी स्थानीय नेताओं के साथ जगह - जगह घूमते, विचार - विमशर् करते, बड़े व्यस्त रहते पर शाम को जब बँगले में खाने पर बैठते तो और लोगों के साथ मैं भी जा बैठता। उनका वातार्लाप सुनता, नेहरू जी को नशदीक से देख पाने का मेरे लिए यह सुनहरा मौका था। उस रोश खाने की मेश पर बड़े लब्धप्रतिष्ठ लोग बैठे थे - शेख अब्दुल्ला, खान अब्दुल गफ्ऱ़पफार खान, श्रीमती रामेश्वरी नेहरू, उनके पति आदि। बातों - बातों में कहीं धमर् की चचार् चली तो रामेश्वरी नेहरू और जवाहरलाल जी के बीच बहस - सी छिड़ गइर्। एक बार तो जवाहरलाल बड़ी गरमजोशी के साथ तनिक तुनककर बोले, फ्मैं भी धमर् के बारे में वुफछ जानता हूँ।य् रामेश्वरी चुप रहीं। शीघ्र ही जवाहरलाल ठंडे पड़ गए और धीरे से बोले, आप लोगों को एक किस्सा सुनाता हूँ।य् और उन्होंने प्रफांस के विख्यात लेखक, अनातोले प्रफांस द्वारा लिख्िात एक मामिर्क कहानी कह सुनाइर्। कहानी इस तरह है कि पेरिस शहर में एक गरीब बाशीगर ;नटद्ध रहा करता था जो तरह - तरह के करतब दिखाकर अपना पेट पालता था और इसी व्यवसाय में उसकी जवानी निकल गइर् थी और अब बड़ी उम्र का हो चला था। वि्रफसमस का पवर् था। पेरिस के बड़े गिरजे में पेरिस - निवासी, सजे - धजे, हाथों में पूफलों के गुच्छे और तरह - तरह के उपहार लिए, माता मरियम को श्र(ांजलि अपिर्त करने गिरजे में जा रहे थे। गिरजे के बाहर गरीब बाशीगर हताश सा खड़ा है क्योंकि वह इस पवर् में भाग नहीं ले सकता। न तो उसके पास माता मरियम के चरणों में रखने के लिए कोइर् तोहप़्ाफा है और न ही उस पफटेहाल को कोइर् गिरजे के अंदर जाने देगा - सहसा ही उसके मन में यह विचार कौंध गया - मैं उपहार तो नहीं दे सकता, पर मैं माता मरियम को अपने करतब दिखाकर उनकी अभ्यथर्ना कर सकता हूँ। यही वुफछ है जो मैं भेंट कर सकता हूँ। जब श्र(ालु चले जाते हैं और गिरजा खाली हो जाता है तो बाशीगर चुपके से अंदर घुस जाता है, कपड़े उतारकर पूरे उत्साह के साथ अपने करतब दिखाने लगता है। गिरजे में अँधेरा है, श्र(ालु जा चुके हैं, दरवाशे बंद हैं। कभी सिर के बल खड़े होकर, कभी तरह - तरह अंगचालन करते हुए बड़ी तन्मयता के साथ एक के बाद एक करतब दिखाता है यहाँ तक कि हाँपफने लगता है। उसवेेफ हाँपफने की आवाश कहीं बड़े पादरी के कान में पड़ जाती और वह यह समझकर कि कोइर् जानवर गिरजे के अंदर घुस आया है और गिरजे को दूष्िात कर रहा है, भागता हुआ गिरजे के अंदर आता है। उस वक्त बाशीगर, सिर के बल खड़ा अपना सबसे चहेता करतब बड़ी तन्मयता से दिखा रहा था। यह दृश्य देखते ही बड़ा पादरी तिलमिला उठता है। माता मरियम का इससे बड़ा अपमान क्या होगा? आगबबूला, वह नट की ओर बढ़ता है कि उसे लात जमाकर गिरजे के बाहर निकाल दे। वह नट की ओर गुस्से से बढ़ ही रहा है तो क्या देखता है कि माता मरियम की मूतिर् अपनी जगह से हिली है, माता मरियम अपने मंच पर से उतर आइर् हैं और धीरे - धीरे आगे बढ़ती हुइर् नट के पास जा पहुँची हैं और अपने आँचल से हाँपफते नट के माथे का पसीना पोंछती उसके सिर को सहलाने लगी हैं।..यह कहानी नेहरूजी के मुँह से सुनी। मेश पर बैठे सभी व्यक्ित दत्तचित होकर सुन रहे थे। नेहरू जी का कमरा उफपरवाली मंजिल पर था, जिसके बगलवाले कमरे में मैं और मेरे पुफपेफरे भाइर् टिके हुए थे। उस रात देर तक नेहरू जी चिऋियाँ लिखवाते रहे थे। सुबह सवेरे जब मैं उठकर नीचे जा रहा था तो नेहरू जी के कमरे के सामने से गुशरते हुए मैंने देखा कि नेहरू जी पफशर् पर बैठे चरखा कात रहे हैं। उनकी पीठ दरवाशे की ओर थी। मैं चुपचाप नीचे उतर आया। नीचे आकर देखा कि बरामदे में तिपाइर् पर अखबार रखा था। मैंने अखबार उठा लिया और बरामदे में खड़ा नशरसानी करने लगा। मैं अभी अखबार देख ही रहा था कि सीढि़यों पर किसी के उतरने की आवाश आइर्। मैं समझ गया कि नेहरू जी उतर रहे हैं। उन्हें उस रोश अपने साथ्िायों के साथ पहलगाम के लिए रवाना हो जाना था। अखबार मेरे हाथ में था। तभी मुझे एक बचकाना - सी हरकत सूझी। मैंने पैफसला किया कि मैं अखबार पढ़ता रहूँगा और तभी नेहरू जी के हाथ में दूँगा जब वह माँगेंगे। कम - से - कम छोटा सा वातार्लाप तो इस बहाने हो जाएगा। नेहरू आए। मेरे हाथ में अखबार देखकर चुपचाप एक ओर को खड़े रहे। वह शायद इस इंतशार में खड़े रहे कि मैं स्वयं अखबार उनके हाथ में दे दूँगा। मैं अखबार की नशरसानी क्या करता, मेरी तो टाँगे लरशने लगी थीं, डर रहा था कि नेहरू जी बिगड़ न उठें। पिफर भी अखबार को थामे रहा। वुफछ देर बाद नेहरू जी धीरे - से बोले - फ्आपने देख लिया हो तो क्या मैं एक नशर देख सकता हूँ?य् सुनते ही मैं पानी - पानी हो गया और अखबार उनके हाथ में दे दिया। उन दिनों मैं अप्रफो - एश्िायाइर् लेखक संघ में कायर्कारी महामंत्राी के पद पर सवि्रफय था। ट्यूनीसिया की राजधानी ट्यूनिस में अप्रफो - एश्िायाइर् लेखक संघ का सम्मेलन होने जा रहा था। भारत से जानेवाले प्रतिनििा मंडल में सवर्श्री कमलेश्वर, जो¯गदरपाल, बालू राव, अब्दुल बिस्िमल्लाह आदि थे। कायर्कारी महामंत्राी के नाते मैं अपनी पत्नी के साथ वुफछ दिन पहले पहुँच गया था। ट्यूनिस में ही उन दिनों लेखक संघ की पत्रिाका ‘लोटस’ का संपादकीय कायार्लय हुआ करता था। एकाध वषर् पहले ही पत्रिाका के प्रधान संपादक पैफश अहमद पैफश चल बसे थे। ट्यूनिस में ही उन दिनों प्ि़ाफलिस्तीनी अस्थायी सरकार का सदरमुकाम हुआ करता था। उस समय तक प्िाफलिस्तीन का मसला हल नहीं हुआ था और ट्यूनिस में ही, यास्सेर अराप़़्ाफात के नेतृत्व में यह अस्थायी सरकार काम कर रही थी। लेखक संघ की गतिवििा में भी प्िाफलिस्तीनी लेखकों,़बुिजीवियों तथा अस्थायी सरकार का बड़ा योगदान था। एक दिन प्रातः ‘लोटस’ के तत्कालीन संपादक मेरे पास होटल में आए और कहा कि मुझे और मेरी पत्नी को उस दिन सदरमुकाम में आमंत्रिात किया गया है। उन्होंने कायर्व्रफम का ब्यौरा नहीं दिया, केवल यह कहकर चले गए कि मैं बारह बजे तुम्हें लेने आउँफगा। वहाँ पहुँचे तो बड़ी झंेप हुइर्। हमारे पहुँचने पर यास्सेर अरापफात अपने दो - एक साथ्िायों के साथ़बाहर आए और हमें अंदर लिवा ले गए। संभव है संपादक महोदय ने सुरक्षा की दृष्िट से हमें खोलकर न बताया हो कि वास्तव में हम दोनों को दिन के भोजन पर आमंत्रिात किया गया था। अंदर पहुँचे तो सदरमुकाम के लगभग बीसेक अिाकारी तथा वुफछेक प्ि़ाफलिस्तीनी लेखक तपाक से मिले। वुफछेक से मैं पहले मिल चुका था। हम बड़े कमरे में दाख्िाल हुए। दाईं ओर को लंबी सी खाने की मेश पहले से लगी थी। उस पर पहले से ही एक बड़ा सा भुना हुआ बकरा रखा था जो लगभग आधे मेश को घेरे हुए था। मैं और मेरी पत्नी कमरे के बाईं ओर बैठाए गए, जहाँ चाय - पान का प्रबंध था। यास्सेर अरापफात हमारे साथ़बैठ गए। धीरे - धीरे बातों का सिलसिला शुरू हुआ। हमारा वातार्लाप श्यादा दूर तक तो जा नहीं सकता था। प्ि़ाफलिस्तीन के प्रति साम्राज्यवादी शक्ितयों के अन्यायपूणर् रवैए की हमारे देश के नेताओं द्वारा की गइर् भत्सर्ना, प्िाफलिस्तीन आंदोलन के प्रति विशाल स्तर पर हमारे देशवासियों की सहानुभूति और समथर्ऩआदि। दो - एक बार जब मैंने गांधी जी और हमारे देश के अन्य नेताओं का िाव्रफ किया तो अरापफात़बोले - फ्वे आपके ही नहीं, हमारे भी नेता हैं। उतने ही आदरणीय जितने आपके लिए।य् बीच - बीच में आतिथ्य भी चल रहा था। अरापफात़हमें पफल छील - छीलकर ख्िाला रहे थे। हमारे लिए शहद की चाय बना रहे थे। साथ - ही - साथ इधर - उधर की बातें भी चल रही थीं - अरापफात की इंजीनियरिंग़की श्िाक्षा के बारे में, उनकी अनथक हवाइर् यात्राओं के बारे में, शहद की उपयोगिता के बारे में। शीघ्र ही हम बड़े इत्मीनान से उनके साथ बतिया रहे थे। जब भोजन का समय आया तो मैं अपनी जगह पर से उठा और यह अनुमान लगाकर कि गुसलखाना कमरे के पार गलियारे में होगा, मैं सीधा कमरा लाँघ गया। मेरा अनुमान ठीक निकला। गुसलखाना वहीं पर था। पर मेरी झेंप का अंत नहीं था जब मैं गुसलखाने में से बाहर निकला तो यास्सेर अरापफात तौलिया़हाथ में लिए बाहर खड़े थे। - आज के अतीत का अंश प्रश्न - अभ्यास 1.लेखक सेवाग्राम कब और क्यों गया था? 2.लेखक का गांधी जी के साथ चलने का पहला अनुभव किस प्रकार का रहा? 3.लेखक ने सेवाग्राम में किन - किन लोगों के आने का िाक्र किया है? 4.रोगी बालक के प्रति गांधी जी का व्यवहार किस प्रकार का था? 5.काश्मीर के लोगों ने नेहरू जी का स्वागत किस प्रकार किया? 6.अखबार वाली घटना से नेहरू जी के व्यक्ितत्व की कौन सी विशेषता स्पष्ट होती है? 7.प्िाफलिस्तीन के प्रति भारत का रवैया बहुत सहानुभूतिपूणर् एवं समथर्न भरा क्यों था?़8.अरापफात के आतिथ्य प्रेम से संबंिात किन्हीं दो घटनाओं का वणर्न कीजिए।़9.अरापफात ने ऐसा क्यों बोला कि ‘वे आपके ही नहीं हमारे भी नेता हैं। उतने ही आदरणीय जितने़आपके लिए।’ इस कथन के आधार पर गांधी जी के व्यक्ितत्व पर प्रकाश डालिए। भाषा - श्िाल्प 1.पाठ से िया विशेषण छाँटिए और उनका अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए। 2.‘मैं सेवाग्राम में ...............माँ जैसी लगती’ गद्यांश में िया पर ध्यान दीजिए। 3.नेहरू जी द्वारा सुनाइर् गइर् कहानी को अपने शब्दों में लिख्िाए। योग्यता - विस्तार 1.भीष्म साहनी की अन्य रचनाएँ ‘तमस’ तथा ‘मेरा भाइर् बलराज’ पढि़ए। 2.गांधी तथा नेहरू जी से संबंिात अन्य संस्मरण भी पढि़ए और उन पर टिप्पणी लिख्िाए। 3.यास्सेर अरापफात के आतिथ्य से क्या प्रेरणा मिलती है और अपने अतिथ्िा का सत्कार आप किस़प्रकार करना चाहेंगे। शब्दाथर् और टिप्पणी गाँडा - बाजू और गले में पहना जाने वाला ताबीश या काला धागा प्रदक्ष्िाणा - परिक्रमा घुप्प - गहरा, घोर झिंझोड़कर - पकड़कर शोर से हिलाना पालथी - बैठने का एक आसन जिसमें दाहिने और बाएँ पैरों के पंजे क्रम से बाईं और दाईं जाँघ के नीचे दबे रहते हैं। चीवर - वस्त्रा, पहनावा, बौ( भ्िाक्षुओं का ऊपरी पहनावा क्षोभ - रोषयुक्त, असंतोष रुग्ण - बीमार, अस्वस्थ दिव्फ - तपेदिक लब्ध प्रतिष्ठ - प्रसिि प्राप्त, यश अ£जत करना अभ्यथर्ना - प्राथर्ना, निवेदन दत्तचित - जिसका मन किसी कायर् में अच्छी तरह लगा हो, एकाग्र लरजना - काँपना, हिलना - डुलना नशरसानी - पुनविर्चार, पुनरीक्षण, नशर डालना सदरमुकाम - राजधानी आँखों में चमक आना - प्रसन्न होना हाथ पैर पटकना - बेचैन होना, तड़पना पेट पालना - गुशारा करना पानी - पानी होना - शमि±दा होना आँखें गाड़ना - एक जगह नशर टिकाना पुलक उठना - प्रसन्न हो जाना घेर लेना - अपनी ओर कर लेना तिलमिला उठना - कष्ट या पीड़ा से विकल हो जाना एक नशर देखना - अवलोकन करना, ध्यान से देखना चल बसना - दिवंगत होना

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