पफणीश्वरनाथ ‘रेणु’ ;सन् 1921 - 1977द्ध पफणीश्वरनाथ ‘रेणु’ का जन्म बिहार के पूण्िार्या िाले के औराही ¯हगना नामवफ गाँव में हुआ था। उन्होंने 1942 इर्. के ‘भारत छोड़ो’ स्वाधीनता आंदोलन में भाग लिया। नेपाल के राणाशाही विरोधी आंदोलन में भी उनकी सिय भूमिका रही। वे राजनीति में प्रगतिशील विचारधारा के समथर्क थे। 1953 इर्. में वे साहित्य - सृजन के क्षेत्रा में आए और उन्होंने कहानी, उपन्यास तथा निबंध आदि विविध साहित्ियक विधाओं में लेखन कायर् किया। रेणु ¯हदी के आँचलिक कथाकार हैं। उन्होंने अंचल - विशेष को अपनी रचनाओं का आधार बनाकर, आंचलिक शब्दावली और मुहावरों का सहारा लेते हुए, वहाँ के जीवन और वातावरण का चित्राण किया है। अपनी गहरी मानवीय संवेदना के कारण वे अभावग्रस्त जनता की बेबसी और पीड़ा स्वयं भोगते - से लगते हैं। इस संवेदनशीलता के साथ उनका यह विश्वास भी जुड़ा है कि आज के त्रास्त मनुष्य के भीतर अपनी जीवन - दशा को बदल देने की अवूफत ताकत छिपी हुइर् है। उनके प्रसि( कहानी - संग्रह हैंμठुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रिा की महक, तीसरी कसम। तीसरी कसम, उप़्ार्फ मारे गए गुलपफाम कहानी पर प्िाफल्म भी बन चुकी है।़मैला आँचल और परती परिकथा उनके उल्लेखनीय उपन्यास हैं। पफणीश्वरनाथ रेणु स्वतंत्रा भारत के प्रख्यात कथाकार हैं। रेणु ने अपनी रचनाओं के द्वारा प्रेमचंद्र की विरासत को नयी पहचान और भंगिमा प्रदान की। इनकी कला सजग आँखें, गहरी मानवीय संवदेना और बदलते सामाजिक यथाथर् की पकड़ अपनी अलग पहचान रखते हैं। रेणु ने मैला आँचल, ‘परती परिकथा’ जैसे अनेक महत्त्वपूणर् उपन्यासों के साथ अपने श्िाल्प और आस्वाद में भ्िान्न ¯हदी कहानी - परंपरा को जन्म दिया। आधुनिकतावादी पैफशन से दूर ग्रामीण समाज रेणु की कलम से इतना रससिक्त, प्राणवान और नया आयाम ग्रहण कर सका है कि नगर एवं ग्राम केविवादों से अलग उसे नयी सांस्कृतिक गरिमा प्राप्त हुइर्। रेणु की कहानियों में आँचलिक शब्दों के प्रयोग से लोकजीवन के मा£मक स्थलों की पहचान हुइर् है। उनकी भाषा संवेदनशील, संप्रेषणीय एवं भाव प्रधान है। ममा±तक पीड़ा और भावनाओं के द्वंद्व को उभारने में लेखक की भाषा अंतरमन को छू लेती है। पफणीश्वरनाथ ‘रेणु’/101 संवदिया हरगोबिन को अचरज हुआμतो आज भी किसी को संवदिया की शरूरत पड़ सकती है। इस शमाने में जबकि गाँव - गाँव मंे डाकघर खुल गए हैं, संवदिया के मारपफत संवाद क्यों भेजेगा कोइर्? आज़तो आदमी घर बैठे ही लंका तक खबर भेज सकता है और वहाँ का वुफशल संवाद मँगा सकता है। पिफर उसकी बुलाहट क्यों हुइर्? हरगोबिन बड़ी हवेली की टूटी ड्योढ़ी पारकर अंदर गया। सदा की भाँति उसने वातावरण को सूँघकर संवाद का अंदाश लगाया।... निश्चय ही कोइर् गुप्त समाचार ले जाना है। चाँद - सूरज को भी नहीं मालूम हो। परेवा - पंछी तक न जाने। फ्पाँव लागी, बड़ी बहुरिया।य् बड़ी हवेली की बड़ी बहुरिया ने हरगोबिन को पीढ़ी दी और आँख के इशारे से वुफछ देर चुपचाप बैठने को कहा। बड़ी हवेली अब नाममात्रा को ही बड़ी हवेली है। जहाँ दिनरात नौकर - नौकरानियांे और जन - मशदूरों की भीड़ लगी रहती थी, वहाँ आज हवेली की बड़ी बहुरिया अपने हाथ से सूपा में अनाज लेकर पफटक रही है। इन हाथों में सिपर्फ मेहँदी लगाकर ही गाँव की़नाइन परिवार पालती थी। कहाँ गए वे दिन? हरगोबिन ने लंबी साँस ली। बड़े भैया के मरने के बाद ही जैसे सब खेल खत्म हो गया। तीनों भाइयों ने आपस में लड़ाइर् - झगड़ा शुरू किया। रैयतों ने शमीन पर दावे करके दखल किया, पिफर तीनों भाइर् गाँव छोड़कर शहर में जा बसे, रह गइर् बड़ी बहुरियाμकहाँ जाती बेचारी! भगवान भले आदमी को ही कष्ट देते हैं। नहीं तो एक घंटे की बीमारी में बड़े भैया क्यों मरते?...बड़ी बहुरिया की देह से शेवर खींच - छीनकर बँटवारे की लीला हुइर् थी। हरगोबिन ने देखी है अपनी आँखों से द्रौपदी चीर - हरण लीला! बनारसी साड़ी को तीन टुकड़े करके बँटवारा किया था, निदर्य भाइयों ने। बेचारी बड़ी बहुरिया! गाँव की मोदिआइन बूढ़ी न जाने कब से आँगन में बैठकर बड़बड़ा रही थी, फ्उधर का सौदा खाने में बड़ा मीठा लगता है और दाम देते समय मोदिआइन की बात कड़वी लगती है। मैं आज दाम लेकर ही उठँूगी।य् बड़ी बहुरिया ने कोइर् जवाब नहीं दिया। पफणीश्वरनाथ ‘रेणु’/103 हरगोबिन ने पिफर लंबी साँस ली। जब तक यह मोदिआइन आँगन से नहीं टलती, बड़ी बहुरिया हरगोबिन से वुफछ नहीं बोलेगी। वह अब चुप नहीं रह सका, फ्मोदिआइन काकी, बाकी - बकाया वसूलने का यह काबुली - कायदा तो तुमने खूब सीखा है।य् ‘काबुली - कायदा’,सुनतेहीमोदिआइन तमककर खड़ी हो गइर्,फ्चुपरह मुँह - झौंसे!निमौछिये...य्। फ्क्या करूँ ंकाकी, भगवान ने मूँछ - दाढ़ी दी नही, न काबुली आगा साहब की तरह गुलशार दाढ़ी...।य् फ्पिफर काबुली का नाम लिया तो जीभ पकड़कर खींच लूँगी।य् हरगोबिन ने जीभ बाहर निकालकर दिखलाइर्। अथार्त्μखींच ले। ...पाँच साल पहले गुल मुहम्मद आगा उधर कपड़ा लगाने के लिए गाँव में आता था और मोदिआइन के ओसारे पर दुकान लगाकर बैठता था। आगा कपड़ा देते समय बहुत मीठा बोलता और वसूली के समय शोर - शुल्म से एक का दो वसूलता। एक बार कइर् उधर लेनेवालों ने मिलकर काबुली की ऐसी मरम्मत कर दी कि पिफर लौटकर गाँव में नहीं आया। लेकिन इसके बाद ही दुखनी मोदिआइन लाल मोदिआइन हो गइर्।... काबुली क्या, काबुली बादाम के नाम से भी चिढ़ने लगी मोदिआइन। गाँव के नाचनेवालों ने नाच में काबुली का स्वांग किया था। फ्तुम अमारा मुलुक जाएगा मोदिआइन? अम काबुली बादाम - पिस्ता - अकरोट किलायगा...!य् मोदिआइन बड़बड़ाती, गाली देती हुइर् चली गइर् तो बड़ी बहुरिया ने हरगोबिन से कहा, फ्हरगोबिन भाइर्, तुमको एक संवाद ले जाना है। आज ही। बोलो, जाओगे न?य् फ्कहाँ?य् फ्मेरी माँ के पास।य् हरगोबिन बड़ी बहुरिया की छलछलाइर् आँखों में डूब गया, फ्कहिए, क्या संवाद है?य् संवाद सुनाते समय बड़ी बहुरिया सिसकने लगी। हरगोबिन की आँखें भी भर आईं।... बड़ी हवेली की लक्ष्मी को पहली बार इस तरह सिसकते देखा है हरगोबिन ने। वह बोला, फ्बड़ी बहुरिया, दिल को कड़ा कीजिए।य् फ्और कितना कड़ा करूँ दिल?... माँ से कहना, मैं भाइर् - भाभ्िायों की नौकरी करके पेट पालूँगी। बच्चांे की जूठन खाकर एक कोने में पड़ी रहूँगी, लेकिन यहाँ अब नहीं... अब नहीं रह सवूँफगी। ...कहना, यदि माँ मुझे यहाँ से नहीं ले जाएगी तो मैं किसी दिन गले में घड़ा बाँधकर पोखरे में डूब मरुँ गी।... बथुआ - साग खाकर कब तक जीउँफ? किसलिए... किसके लिए?य् हरगोबिन का रोम - रोम कलपने लगा। देवर - देवरानियाँ भी कितने बेददर् हैं। ठीक अगहनी धान के समय बाल - बच्चों को लेकर शहर से आएँगे। दस - पंद्रह दिनों में कशर् - उधार की ढेरी लगाकर, वापस जाते समय दो - दो मन के हिसाब से चावल - चूड़ा ले जाएँगे। पिफर आम के मौसम में आकर हािार। कच्चा - पक्का आम तोड़कर बोरियों में बंद करके चले जाएँगे। पिफर उलटकर कभी नहीं देखते...राक्षस हैं सब! 104/अंतरा बड़ी बहुरिया आँचल के खूँट से पाँच रुपए का एक गंदा नोट निकालकर बोली, फ्पूरा राह - खचर् भी नहीं जुटा सकी। आने का खचर् माँ से माँग लेना। उम्मीद है, भैया तुम्हारे साथ ही आवेंगे।य् हरगोबिन बोला, फ्बड़ी बहुरिया, राह - खचर् देने की शरूरत नहीं। मैं इंतशाम कर लूँगा।य् फ्तुम कहाँ से इंतशाम करोगे?य् फ्मैं आज दस बजे की गाड़ी से ही जा रहा हूँ।य् बड़ी बहुरिया हाथ में नोट लेकर चुपचाप, भावशून्य दृष्िट से हरगोबिन को देखती रही। हरगोबिन हवेली से बाहर आ गया। उसने सुना, बड़ी बहुरिया कह रही थी, फ्मैं तुम्हारी राह देख रही हूँ।य् संवदिया!...अथार्त संदेशवाहक! हरगोबिन संवदिया!...संवाद पहुँचाने का काम सभी नहीं कर सकते। आदमी भगवान के घर से संवदिया बनकर आता है। संवाद के प्रत्येक शब्द को याद रखना, जिस सुर और स्वर में संवाद सुनाया गया है, ठीक उसी ढंग से जाकर सुनाना सहज काम नहीं। गाँव के लोगों की गलत धरणा है कि निठल्ला, कामचोर और पेटू आदमी ही संवदिया का काम करता है। न आगे नाथ, न पीछे पगहा। बिना मशदूरी लिए ही जो गाँव - गाँव संवाद पहुँचावे, उसको और क्या कहेंगे?...औरतों का गुलाम। शरा - सी मीठी बोली सुनकर ही नशे में आ जाए, ऐसे मदर् को भी भला मदर् कहेंगे? ¯कतु, गाँव में कौन ऐसा है, जिसके घर की माँ - बहू - बेटी का संवाद हरगोबिन ने नहीं पहुँचाया है?...लेकिन ऐसा संवाद पहली बार ले जा रहा है वह। गाड़ी पर सवार होते ही हरगोबिन को पुराने दिनों और संवादों की याद आने लगी। एक करफण गीत की भूली हुइर् कड़ी पिफर उसके कानों के पास गूँजने लगी। ‘पैयाँ पडँू दाढ़ी ध्रूँ ..हमारो संवाद ले ले जाहु रे संवदिया - या - या!...’ बड़ी बहुरिया के संवाद का प्रत्येक शब्द उसके मन में काँटे की तरह चुभ रहा हैμकिसके भरोसे यहाँ रहूँगी? एक नौकर था, वह भी कल भाग गया। गाय खूँटे से बँध्ी भूखी - प्यासी हिकर रही है। मैं किसके लिए इतना दुख झेलूँ? हरगोबिन ने अपने पास बैठे हुए एक यात्राी से पूछा, फ्क्यों भाइर्साहेब, थाना ¯बहपुर में डाकगाड़ी रफकती है या नहीं?य् यात्राी ने मानो वुफढ़कर कहा, फ्थाना ¯बहपुर में सभी गाडि़याँ रफकती हैं।य् हरगोबिन ने भाँप लिया, यह आदमी चिड़चिड़े स्वभाव का है, इससे कोइर् बातचीत नहीं जमेगी। वह पिफर बड़ी बहुरिया के संवाद को मन - ही - मन दुहराने लगा... लेकिन, संवाद सुनाते समय वह अपने कलेजे को वैफसे संभाल सकेगा! बड़ी बहुरिया संवाद कहते समय जहाँ - जहाँ रोइर् हैं, वहाँ वह भी रोयेगा! पफणीश्वरनाथ ‘रेणु’/105 कटिहार जंक्शन पहुँचकर उसने देखा, पंद्रह - बीस साल में बहुत वुफछ बदल गया है। अब स्टेशन पर उतरकर किसी से वुफछ पूछने की कोइर् शरूरत नहीं। गाड़ी पहुँची और तुरंत भोंपे से आवाश अपने - आप निकलने लगीμ‘थाना ¯बहपुर, खगडि़या और बरौनी जानेवाले यात्राी तीन नंबर प्लेटपफामऱ्पर चले जाएँ। गाड़ी लगी हुइर् है।’ हरगोबिन प्रसन्न हुआμकटिहार पहुँचने के बाद ही मालूम होता है कि सचमुच सुराज हुआ है। इसके पहले कटिहार पहुँचकर किस गाड़ी में चढ़े और किध्र जाए, इस पूछताछ में ही कितनी बार उसकी गाड़ी छूट गइर् है। गाड़ी बदलने के बाद पिफर बड़ी बहुरिया का करफण मुखड़ा उसकी आँखों के सामने उभर गया...हरगोबिन भाइर्, माँ से कहना, भगवान ने आँखें पेफर लीं, लेकिन मेरी माँ तो है...किसलिए..किसके लिए... मैं बथुआ - साग खाकर कब तक जीउँफ?’ थाना ¯बहपुर स्टेशन पर गाड़ी पहुँची तो हरगोबिन का जी भारी हो गया। इसके पहले भी कइर् भला - बुरा संवाद लेकर वह इस गाँव में आया है, कभी ऐसा नहीं हुआ। उसके पैर गाँव की ओर बढ़ ही नहीं रहे थे। इसी पगडंडी से बड़ी बहुरिया अपने मैके लौट आवेगी। गाँव छोड़कर चली जावेगी। पिफर कभी नहीं आवेगी! हरगोबिन का मन कलपने लगाμतब गाँव में क्या रह जाएगा? गाँव की लक्ष्मी ही गाँव छोड़कर जावेगी!... किस मुँह से वह ऐसा संवाद सुनाएगा? वैफसे कहेगा कि बड़ी बहुरिया बथुआ - साग खाकर गुशारा कर रही है?... सुननेवाले हरगोबिन के गाँव का नाम लेकर थूवेंफगेμवैफसा गाँव है, जहाँ लक्ष्मी जैसी बहुरिया दुख भोग रही है! अनिच्छापूवर्क हरगोबिन ने गाँव में प्रवेश किया। हरगोबिन को देखते ही गाँव के लोगों ने पहचान लियाμजलालगढ़ गाँव का संवदिया आया है!... न जाने क्या संवाद लेकर आया है! फ्राम - राम भाइर्! कहो, वुफशल समाचार ठीक है न?य् फ्राम - राम, भैयाजी! भगवान की दया से आनंदी है।य् फ्उध्र पानी - बूँदी पड़ा है?य् बड़ी बहुरिया के बड़े भाइर् ने हरगोबिन को नहीं पहचाना। हरगोबिन ने अपना परिचय दिया, तो उन्होंने सबसे पहले अपनी बहन का समाचार पूछा, फ्दीदी वैफसी है?य् फ्भगवान की दया से सब राजी - खुशी है।य् मुँह - हाथ धेने के बाद हरगोबिन की बुलाहट आँगन में हुइर्। अब हरगोबिन काँपने लगा। उसका कलेजा ध्ड़कने लगा... ऐसा तो कभी नहीं हुआ?... बड़ी बहुरिया की छलछलाइर् हुइर् आँखें! सिसकियों से भरा हुआ संवाद! उसने बड़ी बहुरिया की बूढ़ी माता को पाँवलागी की। बूढ़ी माता ने पूछा, फ्कहो बेटा, क्या समाचार है?य् 106/अंतरा फ्कोइर् संवाद?य् फ्एं?... संवाद... जी, संवाद तो कोइर् नहीं। मैं कल सिरसिया गाँव आया था, तो सोचा कि एक बार चलकर आप लोगों का दशर्न कर लूँ।य् बूढ़ी माता हरगोबिन की बात सुनकर वुफछ उदास - सी हो गइर्, फ्तो तुम कोइर् संवाद लेकर नहीं आए हो?य् फ्जी नहीं, कोइर् संवाद नहीं।... ऐसे बड़ी बहुरिया ने कहा है कि यदि छु‘ी हुइर् तो दशहरा के समय गंगाजी के मेले में आकर माँ से भेंट - मुलाकात कर जाउँफगी।य् बूढ़ी माता चुप रही। हरगोबिन बोला, फ्छु‘ी वैफसे मिले? सारी गृहस्थी बड़ी बहुरिया के ऊपर ही है।य् बूढ़ी माता बोली, फ्मैं तो बबुआ से कह रही थी कि जाकर दीदी को लिवा लाओ, यहीं रहेगी। वहाँ अब क्या रह गया है? शमीन - जायदाद तो सब चली ही गइर्। तीनों देवर अब शहर में जाकर बस गए हैं। कोइर् खोज - खबर भी नहीं लेते। मेरी बेटी अकेली...।य् पफणीश्वरनाथ ‘रेणु’/107 नहीं मायजी! शमीन - जायदाद अभी भी वुफछ कम नहीं। जो है, वही बहुत है। टूट भी गइर् है, है तो आख्िार बड़ी हवेली ही। ‘सवांग’ नहीं है, यह बात ठीक है! मगर, बड़ी बहुरिया का तो सारा गाँव ही परिवार है। हमारे गाँव की लक्ष्मी है बड़ी बहुरिया।... गाँव की लक्ष्मी गाँव को छोड़कर शहर वैफसे जाएगी? यों, देवर लोग हर बार आकर ले जाने की िाद करते हैं।य् बूढ़ी माता ने अपने हाथ हरगोबिन को जलपान लाकर दिया, फ्पहले थोड़ा जलपान कर लो, बबुआ!य् जलपान करते समय हरगोबिन को लगा, बड़ी बहुरिया दालान पर बैठी उसकी राह देख रही हैμभूखी - प्यासी...। रात में भोजन करते समय भी बड़ी बहुरिया मानो सामने आकर बैठ गइर्..कशर् - उधार अब कोइर् देते नहीं।... एक पेट तो वुफत्ता भी पालता है, लेकिन मैं?... माँ से कहना...! हरगोबिन ने थाली की ओर देखाμदाल - भात, तीन किस्म की भाजी, घी, पापड़, अचार।... बड़ी बहुरिया बथुआ - साग उबालकर खा रही होगी। बूढ़ी माता ने कहा, फ्क्यों बबुआ, खाते क्यों नहीं?य् फ्मायजी, पेटभर जलपान जो कर लिया है।य् फ्अरे, जवान आदमी तो पाँच बार जलपान करके भी एक थाल भात खाता है।य् हरगोबिन ने वुफछ नहीं खाया। खाया नहीं गया। संवादिया डटकर खाता है और ‘अपफर’ कर सोता है, ¯कतु हरगोबिन को नींद नहीं आ रही है। ...यह उसने क्या किया? क्या कर दिया? वह किसलिए आया था? वह झूठ क्यों बोला?... नहीं, नहीं, सुबह उठते ही वह बूढ़ी माता को बड़ी बहुरिया का सही संवाद सुना देगाμअक्षर - अक्षर, ‘मायजी, आपकी इकलौती बेटी बहुत कष्ट में है। आज ही किसी को भेजकर बुलवा लीजिए। नहीं तो वह सचमुच वुफछ कर बैठेगी। आख्िार, किसके लिए वह इतना सहेगी!... बड़ी बहुरिया ने कहा है, भाभी के बच्चों की जूठन खाकर वह एक कोने में पड़ी रहेगी...!’ रातभर हरगोबिन को नींद नहीं आइर्। आँखों के सामने बड़ी बहुरिया बैठी रहीμसिसकती, आँसू पोंछती हुइर्। सुबह उठकर उसने दिल को कड़ा किया। वह संवदिया है। उसका काम है सही - सही संवाद पहुँचाना। वह बड़ी बहुरिया का संवाद सुनाने के लिए बूढ़ी माता के पास जा बैठा। बूढ़ी माता ने पूछा, फ्क्या है, बबुआ? वुफछ कहोगे?य् फ्मायजी, मुझे इसी गाड़ी से वापस जाना होगा। कइर् दिन हो गए।य् फ्अरे, इतनी जल्दी क्या है! एकाध् दिन रहकर मेहमानी कर लो।य् फ्नहीं, मायजी! इस बार आज्ञा दीजिए। दशहरा में मैं भी बड़ी बहुरिया के साथ आउँफगा। तब डटकर पंद्रह दिनों तक मेहमानी करूँगा।य् 108/अंतरा बूढ़ी माता बोली, फ्ऐसी जल्दी थी तो आए ही क्यों? सोचा था, बिटिया के लिए दही - चूड़ा भेजूँगी। सो दही तो नहीं हो सकेगा आज। थोड़ा चूड़ा है बासमती धन का, लेते जाओ।य् चूड़ा की पोटली बगल में लेकर हरगोबिन आँगन से निकला तो बड़ी बहुरिया के बड़े भाइर् ने पूछा, फ्क्यों भाइर्, राह - खचर् तो है?य् हरगोबिन बोला, फ्भैयाजी, आपकी दुआ से किसी बात की कमी नहीं।य् क् क् क् स्टेशन पर पहुँचकर हरगोबिन ने हिसाब किया। उसके पास जितने पैसे हैं, उससे कटिहार तक का टिकट ही वह खरीद सकेगा। और यदि चैअन्नी नकली साबित हुइर् तो सैमापुर तक ही।...बिना टिकट के वह एक स्टेशन भी नहीं जा सकेगा। डर के मारे उसकी देह का आध खून सूख जाएगा। गाड़ी में बैठते ही उसकी हालत अजीब हो गइर्। वह कहाँ आया था? क्या करके जा रहा है? बड़ी बहुरिया को क्या जवाब देगा? यदि गाड़ी में निरगुन गानेवाला सूरदास नहीं आता, तो न जाने उसकी क्या हालत होती! सूरदास के गीतों को सुनकर उसका जी स्िथर हुआ, थोड़ाμ ...कि आहो रामा! नैहरा को सुख सपन भयो अब, देश पिया को डोलिया चली - इर् - इर् - इर्, भाइर् रोओ मति, यही करम की गति...!! पफणीश्वरनाथ ‘रेणु’/109 सूरदास चला गया तो उसके मन में बैठी हुइर् बड़ी बहुरिया पिफर रोने लगीμकिसके लिए इतना दुख सहूँ? पाँच बजे भोर में वह कटिहार स्टेशन पहुँचा। भोंपे से आवाश आ रही थीμबैरगाद्दी, वुफसियार और जलालगढ़ जानेवाले यात्राी एक नंबर प्लेटप़्ाफामर् पर चले जाएँ। हरगोबिन को जलालगढ़ जाना है, ¯कतु वह एक नंबर प्लेटप़्ाफामर् पर वैफसे जाएगा? उसके पास तो कटिहार तक का ही टिकट है।... जलालगढ़! बीस कोस!... बड़ी बहुरिया राह देख रही होगी।... बीस कोस की मंिाल भी कोइर् दूर की मंजिल है? वह पैदल ही जाएगा। हरगोबिन महावीर - विव्रफम - बजरंगी का नाम लेकर पैदल ही चल पड़ा। दस कोस तक वह मानो ‘बाइर्’ के झोंके पर रहा। कस्बा - शहर पहुँचकर उसने पेटभर पानी पी लिया। पोटली में नाक लगाकर उसने सूँघाμअहा! बासमती धान का चूड़ा है। माँ की सौगात - बेटी के लिए। नहीं, वह इससे एक मुऋी भी नहीं खा सकेगा... ¯कतु, वह क्या जवाब देगा बड़ी बहुरिया को? उसके पैर लड़खड़ाए।... उहूँ, अभी वह वुफछ नहीं सोचेगा। अभी सिप़्ार्फ चलना है। जल्दी पहुँचना है, गाँव।... बड़ी बहुरिया की डबडबायी हुइर् आँखें उसको गाँव की ओर खींच रही थींμमैं बैठी राह ताकती रहूँगी!..पंद्रह कोस!... माँ से कहना, अब नहीं रह सवूँफगी। सोलह... सत्राह... अठारह... जलालगढ़ स्टेशन का सिगनल दिखलाइर् पड़ता है... गाँव का ताड़ सिर उँफचा करके उसकी चाल को देख रहा है। उसी ताड़ के नीचे बड़ी हवेली के दालान पर चुपचाप टकटकी लगाकर राह देख रही है बड़ी बहुरियाμ भूखी - प्यासीμ‘हमरो संवाद ले जाहु रे संवदिया - या - या!!’ लेकिन, यह कहाँ चला आया हरगोबिन? यह कौन गाँव है? पहली साँझ में ही अमावस्या का अंधकार! किस राह से वह किधर जा रहा है?... नदी है! कहाँ से आ गइर् नदी? नदी नहीं, खेत हैं।... ये झोंपड़े हैं या हाथ्िायों का झुंड? ताड़ का पेड़ किधर गया? वह राह भूलकर न जाने कहाँ भटक गया... इस गाँव में आदमी नहीं रहते क्या?... कहीं कोइर् रोशनी नहीं, किससे पूछे?... कहाँ, वह रोशनी है या आँखें? वह खड़ा है या चल रहा है? वह गाड़ी में है या धरती पर? फ्हरगोबिन भाइर्, आ गए?य् बड़ी बहुरिया की बोली या कटिहार स्टेशन का भोंपा बोल रहा है? फ्हरगोबिन भाइर्, क्या हुआ तुमको...?य् फ्बड़ी बहुरिया?य् हरगोबिन ने हाथ से टटोलकर देखा, वह बिछावन पर लेटा हुआ है। सामने बैठी छाया को छूकर बोला, फ्बड़ी बहुरिया?य् 110/अंतरा फ्हरगोबिन भाइर्, अब जी वैफसा है?... लो, एक घूँट दूध और पी लो।... मुँह खोलो.... हाँ... पी जाओ। पीओ!य् हरगोबिन होश में आया।... बड़ी बहुरिया का पैर पकड़ लिया, फ्बड़ी बहुरिया!... मुझे मापफ़करो। मैं तुम्हारा संवाद नहीं कह सका।... तुम गाँव छोड़कर मत जाओ। तुमको कोइर् कष्ट नहीं होने दूँगा। मैं तुम्हारा बेटा! बड़ी बहुरिया, तुम मेरी माँ, सारे गाँव की माँ हो! मैं अब निठल्ला बैठा नहीं रहूँगा। तुम्हारा सब काम करूँ गा।... बोलो, बड़ी माँ, तुम... तुम गाँव छोड़कर चली तो नहीं जाओगी? बोलो...!य् बड़ी बहुरिया गरम दूध में एक मुऋी बासमती चूड़ा डालकर मसकने लगी।... संवाद भेजने के बाद से ही वह अपनी गलती पर पछता रही थी। प्रश्न - अभ्यास 1.संवदिया की क्या विशेषताएँ हैं और गाँववालों के मन में संवदिया की क्या अवधारणा है? 2.बड़ी हवेली से बुलावा आने पर हरगोबिन के मन में किस प्रकार की आशंका हुइर्? 3.बड़ी बहुरिया अपने मायके संदेश क्यों भेजना चाहती थी? 4.हरगोबिन बड़ी हवेली में पहुँचकर अतीत की किन स्मृतियों में खो जाता है? 5.संवाद कहते वक्त बड़ी बहुरिया की आँखें क्यों छलछला आईं? 6.गाड़ी पर सवार होने के बाद संवदिया के मन में काँटे की चुभन का अनुभव क्यों हो रहा था। उससे छुटकारा पाने के लिए उसने क्या उपाय सोचा? 7.बड़ी बहुरिया का संवाद हरगोबिन क्यों नहीं सुना सका? 8.‘संवदिया डटकर खाता है और अपफर कर सोता है’ से क्या आशय है? 9.जलालगढ़ पहँुचने के बाद बड़ी बहुरिया के सामने हरगोबिन ने क्या संकल्प लिया? भाषा - श्िाल्प 1.इन शब्दों का अथर् समझिएμ काबुली - कायदा रोम - रोम कलपने लगा अगहनी धान पफणीश्वरनाथ ‘रेणु’/111 2.पाठ से प्रश्नवाचक वाक्यों को छाँटिए और संदभर् के साथ उन पर टिप्पणी लिख्िाए। 3.इन पंक्ितयों की व्याख्या कीजिएμ ;कद्धबड़ी हवेली अब नाममात्रा को ही बड़ी हवेली है। ;खद्ध हरगोबिन ने देखी अपनी आँखों से द्रौपदी की चीरहरण लीला। ;गद्धबथुआ साग खाकर कब तक जीउँफ? ;घद्ध किस मुँह से वह ऐसा संवाद सुनाएगा। योग्यता - विस्तार 1.संवदिया की भूमिका आपको मिले तो आप क्या करेंगे? संवदिया बनने के लिए किन बातों का ध्यान रखना पड़ता है? 2.इस कहानी का नाट्य रूपांतरण कर विद्यालय के मंच पर प्रस्तुत कीजिए। शब्दाथर् और टिप्पणी संवदिया - संदेशवाहक, संदेश पहुँचाने वाला मारप़् - ाफत माध्यम, शरिया परेवा - कबूतर, कोइर् तेश उड़ने वाला पक्षी सूपा - छाज, सूप रैयत - प्रजा हिकर - बेचैन होकर पुकारना अपफरना - पेट भरकर खाना चूड़ा - चिड़वा बहुरिया - पुूत्रावधदखल - हस्तक्षेप, अिाकार माँगना आगे नाथ न पीछे पगहा - कोइर् िाम्मेदारी न होना कलेजा धड़कना - घबरा जाना खोज खबर न लेना - जानकारी प्राप्त न करना, पूछताछ न करना खून सूख जाना - बहुत अिाक डर जाना 112/अंतरा

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