ब्रजमोहन व्यास ;सन् 1886 - 1963द्ध ब्रजमोहन व्यास का जन्म इलाहाबाद में हुआ। पं. गंगानाथ झा और पं. बालकृष्ण भ‘ से उन्होंने संस्कृत का ज्ञान प्राप्त किया। व्यास जी सन् 1921 से 1943 तक इलाहाबाद नगरपालिका के कायर्पालक अिाकारी रहे। सन् 1944 से 1951 के लीडर समाचारपत्रा समूह के जनरल मैनेजर रहे। 23 माचर् 1963 को इलाहाबाद में ही उनका देहावसान हुआ। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं - जानकी हरण ;वुफमारदास कृतद्ध का अनुवाद, पं. बालकृष्ण भ‘ ;जीवनीद्ध, महामना मदन मोहन मालवीय ;जीवनीद्ध। मेरा कच्चा चिऋा उनकी आत्मकथा है। व्यास जी की सबसे बड़ी देन इलाहाबाद का विशाल और प्रसि( संग्रहालय है जिसमें दो हशार पाषाण मूतिर्याँ, पाँच - छह हशार मृणमूतिर्याँ, कनिष्क के राज्यकाल की प्राचीनतम बौ( मूतिर्, खजुराहो की चंदेल प्रतिमाएँ, सैकड़ों रंगीन चित्रों का संग्रह आदि शामिल है। उन्होंने संस्कृत, ¯हदी और अरबी - प़्ाफारसी के चैदह हशार हस्तलिख्िात गं्रथों का संकलन उसी संग्रहालय हेतु किया। पं. नेहरू को मिले मानपत्रा, चंद्रशेखर आशाद की पिस्तौल इलाहाबाद संग्रहालय की धरोहर मानी जाती है। पुरातत्व संबंधी संग्रहालय की विभ्िान्न धरोहर - सामग्री का संकलन बगैर विशेष व्यय के कर पाना ब्रजमोहन व्यास का अपना विश्िाष्ट कौशल है। प्रस्तुत पाठ उनके श्रम - कौशल और मेधा कायर् का ‘कच्चा चिऋा’ है। कच्चा चिऋा बनवाया था जिसमें बु( के थोड़े से केश और नखखंड रखे गए थे। पसोवे में स्तूप और व्यायामशाला के तो कोइर् चिÉ अब शेष नहीं रह गए, परंतु वहाँ एक पहाड़ी अवश्य है। ‘निवेशः शैलानां तदिदमिति बुिं दृढ़यति’ - ;भवभूतिद्ध। पहाड़ी का होना इंगित करता है कि यह स्थान वही है। मैं कहीं जाता हूँ तो छूँछे हाथ नहीं लौटता। यहाँ कोइर् विशेष महत्त्व की चीश तो नहीं मिली पर गाँव के भीतर वुफछ बढि़या मृण्मूतिर्याँ, सिक्के और मनके मिल गए। इक्के पर कौशाम्बी लौटा। एक दूसरे रास्ते से। एक छोटे - से गाँव के निकट पत्थरों के ढेर के बीच, पेड़ के नीचे, एक चतुमुर्ख श्िाव की मूतिर् देखी। वह वैसे ही पेड़ के सहारे रखी थी जैसे उठाने के लिए मुझे ललचा रही हो। अब आप ही बताइए, मैं करता ही क्या? यदि चांद्रायण व्रत करती हुइर् बिल्ली के सामने एक चूहा स्वयं आ जाए तो बेचारी को अपना कतर्व्य पालन करना ही पड़ता है। इक्के से उतरकर इधर - उधर देखते हुए उसे चुपचाप इक्के पर रख लिया। 20 सेर वशन में रही होगी। ‘न वूफवुफर भूँका, न पहरू जागा।’ मूतिर् अच्छी थी। पसोवे से थोड़ी सी चीशों के मिलने की कमी इसने पूरी कर दी। उसे लाकर नगरपालिका में संग्रहालय से संबंिात एक मंडप के नीचे अन्य मूतिर्यों के साथ रख दिया। उसके थोड़े ही दिन बाद गाँववालों को पता चल गया कि चतुमुर्ख श्िाव वहाँ से अंतधार्न हो गए। जिस प्रकार भरतपुर राज्य की सीमा पर डवैफती होने से पुलिस का ध्यान मान¯सह अथवा उसके सुपुत्रा तहसीलदार पर सहसा जाता है, वुफछ उसी प्रकार कौशाम्बी मंडल से कोइर् मूतिर् स्थानांतरित होने पर गाँववालों का संदेह मुझपर होता था। और वैफसे न हो? ‘अपना सोना खोटा तो परखवैया का कौन दोस?’ मैं इस संबंध में इतना प्रख्यात हो चुका था कि संदेह होना स्वाभाविक ही था, क्योंकि 95 प्रतिशत उनका संदेह सही निकलता था। एक दिन की बात है कि मैं अपने दफ्ऱतर में बैठा काम कर रहा था। चपरासी ने आकर इिाला की कि पसोवे के निकटस्थ एक गाँव से 15 - 20 आदमी मुझसे मिलने आए हैं। चोर की दाढ़ी में तिनका। मेरा माथा ठनका। मैंने उन सबको कमरे में ही बुलवा लिया। कमरा भर गया। उसमें बुइ़े, जवान, स्ित्रायाँ, बच्चे सभी थे। संभव है, धमर् पर आघात समझकर आसपास के गाँव के भी वुफछ लोग साथ में चले आए हों। मुख्िाया ने नतमस्तक होकर निवेदन किया, फ्महाराज! ;मेरे मस्तक पर हस्बमामूल चंदन थाद्ध जब से शंकर भगवान हम लोगन क छोड़ के हियाँ चले आए, गाँव भर पानी नै पिहिस। अउर तब तक न पी जब तक भगवान गाँव न चलिहैं। अब हम लोगन क प्रान आपै के हाथ में हैं। आप हुवुफम देओ तो हम भगवान को लेवाए जाइ।य् यदि मुझे मालूम होता कि गाँववालों को उन पर इतनी ममता है तो उन्हें कभी न लाता। मैंने तुरंत कहा, फ्आप उन्हें प्रसन्नता से ले जाएँ।य् सब लोग बड़े प्रसन्न हुए। मैंने स्वयं शेड पर जाकर भगवान शंकर को उनके हवाले कर दिया। स्त्राी - पुरुष सब उनके सामने बैठ गए। स्ित्रायों ने गाना आरंभ कर दिया। मैंने मिठाइर् और जल मँगाकर उन लोगों का उपवास तुड़वाया। दूर से दफ्ऱ तर वाले अपने अपफसर की करतूत देखकर मुसकरा रहे थे। मैंने उस मूतिर् को अपनी मोटऱपर रख लिया और उनके दो - तीन आदमियों को साथ लेकर लारी के अंे पर पहुँचा और मूतिर् को सम्मान सहित विदा किया। गाँववालों पर इसका बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ा। मुझे भविष्य का भी तो खयाल था। यह रवैया मेरा बराबर जारी रहा। उसी वषर् या संभवतः उसके दूसरे वषर्, मैं पिफर कौशाम्बी गया और गाँव - गाँव, नाले - खोले घूमता - पिफरता झख मारता रहा। भला यह कितने दिन ऐसे चल सकता, अगर बीच - बीच में छठे - छमासे कोइर् चीश इतनी महत्त्वपूणर् न मिल जाती जिससे दिल पफड़क उठता? बराबर यही सोचता कि फ्ना जाने केहि भेष में नारायण मिल जाएँ।य् और यही एक दिन हुआ। खेतों की डाँड़ - डाँड़ जा रहा था कि एक खेत की मेड़ पर बोिासत्व की आठ पुफट लंबी एक सुंदर मूतिर् पड़ी देखी। मथुरा के लाल पत्थर की थी। सिवाए सिर के पदस्थल तक वह संपूणर् थी। मैं लौटकर पाँच - छह आदमी और लटकाने का सामान गाँव से लेकर पिफर लौटा। जैसे ही उस मूतिर् को मैं उठवाने लगा वैसे ही एक बुढि़या जो खेत निरा रही थी, तमककर आइर् और कहने लगी, फ्बड़े चले हैं मूरत उठावै। इर् हमार है। हम न देबै। दुइ दिन हमार हर रुका रहा तब हम इनका निकरवावा है। इर् नकसान कउन भरी?य् मैं समझ गया। बात यह है कि मैं उस समय भले आदमी की तरह वुफरता धोती में था। इसलिए उसे इस तरह बोलने की हिम्मत पड़ी। सोचा कि बुढि़या के मुँह लगना ठीक नहीं। संस्वृफत - साहित्य का वचन याद आया - उद्वेजयति दरिद्रं परमुद्रायाः झणत्कारम्। दूसरे की मुद्रा की झनझनाहट गरीब आदमी के हृदय में उत्तेजना उत्पन्न करती है। उसी का आश्रय लिया। मैंने अपने जेब में पड़े हुए रुपयों को ठनठनाया। मैं ऐसी जगहों में नोट - वोट लेकर नहीं जाता। केवल ठनठनाता। उसकी बात ही और होती है। मैंने कहा, फ्ठीवैफ तो कहत हौ बुढि़या। इर् दुइर् रुपया लेओ। तुम्हार नुकसानौ पूर होए जाइर्! इर् हियाँ पड़े अंडसै करिहैं। न डेहरी लायक न बँडेरी लायक।य् बुढि़या को बात समझ में आ गइर् और जब रुपया हाथ में आ गया तो बोली, फ्भइया! हम मने नाहीं करित। तुम लै जाव।य् आज दिन वह मूतिर् प्रयाग संग्रहालय में प्रदश्िार्त है। जब यह संग्रहालय नगरपालिका के दफ्ऱ तर के एक विशाल अंग में था, एक प्रफांसीसी उसे देखने आया। मैंने बड़े उत्साह से उसे संपूणर् संग्रहालय दिखलाया। बाद में पता चला कि वह प्रफांस का एक बड़ा डीलर है जो ¯हदुस्तान तथा अन्य जगहों से चीशें खरीदता पिफरता है। मैं पहिले वैफसे समझ पाता। काकः वृफष्णः पिकः वृफष्णः को भेद पिककाकयोः। प्राप्ते वसन्तसमये काकः काकः पिकः पिकः।। कौवा भी काला होता है, कोयल भी काली होती है। दोनों में भेद ही क्या है। परंतु वसंत )तु के आते ही पता चल जाता है कि कौन कौवा है और कौन कोयल। संग्रहालय को देखकर बोला, फ्बहुत कीमती संग्रह!य् मैंने पूछा कि कीमती से आपका क्या तात्पयर् है। रुपयों में बतावें तो समझ में आवे। हँसकर बोला, फ्रुपयों में बता दूँ तो आपका इर्मान डिग जाए।य् वैसे ही हँसकर मैंने जवाब दिया कि फ्इर्मान! ऐसी कोइर् चीश मेरे पास हइर् नहीं तो उसके डिगने का कोइर् सवाल नहीं उठता। यदि होता तो इतना बड़ा संग्रह बिना पैसा - कौड़ी के हो ही नहीं सकता।य् उस बोिासत्व की ओर इशारा कर वह तुरंत बोल उठा, फ्आप उस मूतिर् को मेरे हाथ दस हशार रुपए में बेचेंगे? इतने रुपए में तो आपको बहुत सी मूतिर्याँ मिल जाएँगी।य् इस मूतिर् का चित्रा और उसका वणर्न विदेशी पत्रों में छप चुका था। अवश्य ही इस प्रफांसीसी ने उसे पढ़ा होगा। मैंने अपनी तबीयत में कहा, फ्यह एक ही रही।य् चोर के घर छिछोर पैठा। प्रफांसीसी महोदय ने मेरी आवृफति से मेरा निणर्य समझ लिया। बात खत्म हो गइर्। मूतिर् अब तक संग्रहालय का मस्तक उँफचा कर रही है। पाठक यह जानने के लिए उत्सुक होंगे कि आख्िार इस मूतिर् में कौन सा सुरखाब का पर लगा था जो दो रुपए में मिली और दस हशार रुपए उसपर न्योछावर कर पेंफके जा रहे हैं। संभव है कि वे सोचते हों कि मूतिर् में तो केवल सिर नहीं है, ;परंतु लेखक की बातें उससे भी एक पग आगे बेसिर पैर की हैं। पर बात ऐसी नहीं है।द्ध यह मूतिर् उन बोिासत्व की मूतिर्यों में है जो अब तक संसार में पाइर् गइर् मूतिर्यों में सबसे पुरानी है। यह वुफषाण सम्राट कनिष्क के राज्यकाल के दूसरे वषर् स्थापित की गइर् थी। ऐसा लेख उस मूतिर् के पदस्थल पर उत्कीणर् है। इस शेर के मार लेने से मेरा दिल दूना हो गया और नए सिरे से पिफर मुँह में खून लग गया। शेर तो रोश मिलता नहीं पर चीतल, साँभर तो हर बार मिलते ही रहते हैं। शेर की केवल आशा मात्रा रहती है। परंतु इसी आशा से श्िाकार अनुप्राण्िात रहता है और श्िाकारी जंगल - जंगल की खाक छानता पिफरता है। सन् 1938 के लगभग की बात है। गवनर्मेंट आॅपफ इंडिया का पुरातत्व विभाग कौशाम्बी में श्री मजूमदार की देखरेख में खुदाइर् कर रहा था। उस समय श्री के. एन. दीक्ष्िात डायरेक्टर - जनरल थे। मेरे परम मित्रा थे। उन्हें प्रयाग संग्रहालय से बड़ी सहानुभूति थी और सदा उसकी सहायता करने के लिए प्रस्तुत रहते थे। साधु प्रवृफति तो थे ही, परंतु आख्िार बड़े हाकिम ठहरे, रोब था, शमाने के अभ्यस्त थे। खुदाइर् के प्रसंग में मजूमदार साहब को पता चला कि कौशाम्बी से चार - पाँच मील दूर एक गाँव हजियापुर है। वहाँ किसी व्यक्ित के यहाँ भद्रमथ का एक भारी श्िालालेख है। श्री मजूमदार उसे उठवा ले जाना चाहते थे। गाँव के एक शमींदार गुलशार मियाँ ने, जिनका गाँव में दबादबा था, एतराश किया। गुलशार मियाँ हमारे भक्त थे और मैं भी उन्हें बहुत मानता था, यद्यपि उनकी भक्ित और मेरा मानना दोनों स्वाथर् से खाली नहीं थे। मैंने उनके भाइर् दिलदार मियाँ को म्युनिसिपैलिटी में चपरासी की नौकरी दे दी थी और उन लोगों की हर तरह से सहायता करता था। वे मुझे आसपास के गाँवों से पाषाण - मूतिर्याँ, श्िालालेख इत्यादि देते रहते थे। मजूमदार साहब ने जब उसे शबरदस्ती उठवाना चाहा तो वे लोग पफौजदारी पऱआमादा हो गए। बोले, फ्यह इलाहाबाद के अजायबघर के हाथ 25 रुपए का बिक चुका है, अगर बिना व्यास जी के पूछे इसे कोइर् उठावेगा तो उसका हाथ - पैर तोड़ देंगे।य् मजूमदार साहब ने पच्िछम सरीरा के थाने में रपट की पर किसी की वुफछ नहीं चली। गुलशार मियाँ ने उस श्िालालेख को नहीं दिया। मजूमदार साहब ने इस सबकी रिपोटर् नोन - मिचर् लगाकर दीक्ष्िात साहब को दिल्ली लिख भेजी। दीक्ष्िात साहब की साधु प्रवृफति के भीतर जो हाकिम पड़ा था, उसने करवट ली। एक दिन दीक्ष्िात साहब का अधर्सरकारी पत्रा मुझे मिला जिसका आशय यह था, फ्कौशाम्बी से मेरे पास रिपोटर् आइर् है कि आपके उकसाने के कारण शमींदार गुलशार मियाँ भद्रमथ के एक श्िालालेख को देने में आपिा करता है और आमादा पफौजदारी है। मैं इस मामले को बढ़ाना नहीं चाहता़परंतु यह कहे बिना रह भी नहीं सकता कि सरकारी काम में आपका यह हस्तक्षेप अनुचित है।य् खैर, यहाँ तक तो खून का घूँट किसी तरह पिया जा सकता था पर इसके आगे उन्होंने लिखा, फ्यदि यही आपका रवैया रहा तो यह विभाग आपके कामों में वह सहानुभूति न रखेगा जो उसने अब तक बराबर रखी है।य् एक मित्रा से ऐसा पत्रा पाकर मेरे बदन में आग लग गइर्। मैं सबवुफछ सहन कर सकता हूँ पर किसी की भी अकड़ बदार्श्त नहीं कर सकता। आग्नेय अस्त्रा से मेरे बदन में आग लग जाती है। वरुणास्त्रा से पानी - पानी हो जाता हूँ। मैंने तुरंत दीक्ष्िात जी को उत्तर दिया, जो थोड़े में इस प्रकार था, फ्मैं आपके पत्रा एवं उसकी ध्वनि का घोर प्रतिवाद करता हूँ। उसमें जो वुफछ मेरे संबंध में लिखा गया है, वह नितांत असत्य है। मैंने किसी को नहीं उकसाया। मैं आपसे स्पष्ट रूप से कह देना चाहता हूँ कि आपके विभाग की सहानुभूति चाहे रहे या न रहे, प्रयाग संग्रहालय की उत्तरोत्तर वृि होती रहेगी। प्रयाग संग्रहालय ने इस भद्रमथ के श्िालालेख को 25 रुपए का खरीदा है। पर आपके विभाग से, विशेषकर आपके होते हुए, झगड़ना नहीं चाहता। इसलिए यदि आप उसे लेना चाहते हैं तो 25 रुपए देकर ले लें, मैं गुलशार को लिख दूँगा।य् इसके उत्तर में उनका एक विनम्र पत्रा आया जिसमें उन्होंने अपने पूवर् पत्रा के लिए खेद प्रगट किया। विभाग की उपेक्षा जो मैंने की थी, उसे पी गए। बात खत्म हो गइर्। बाद में गुलशार ने मुझे बताया कि 25 रुपए लेकर उसने श्िालालेख दे दिया। प्रयाग संग्रहालय में और भी भद्रमथ के श्िालालेख थे, कोइर् क्षति नहीं हुइर्। गरीब शमींदार को 25 रुपए मिल गए। उसने मुझे धन्यवाद दिया। मैंने सोचा कि जिस गाँव में भद्रमथ का श्िालालेख हो सकता है वहाँ संभव है और भी श्िालालेख हों। अतः मैं हजियापुर, जो कौशाम्बी से केवल चार - पाँच मील था, गया और मैंने गुलशार मियाँ के यहाँ डेरा डाल दिया। उसके भाइर् को, जो म्युनिसिपैलिटी में नौकर था, साथ ले लिया था। गुलशार मियाँ के मकान के ठीक सामने उन्हीं का एक निहायत पुख्ता सजीला वुँफआ था। चबूतरे के उफपर चार पक्के खंभे थे जिनमें एक से दूसरे तक अठपहल पत्थर की बँडेर पानी भरने के लिए गड़ी हुइर् थी। सहसा मेरी दृष्िट एक बँडेर पर गइर् जिसके एक सिरे से दूसरे सिरे तक ब्राह्मी अक्षरों में एक लेख था। मेरी तबीयत पफड़क उठी। परंतु सजीले खंभों से खोदकर निकलवाने में हिचक हुइर्। गुलशार मियांँ मुझे असमंजस में देख तुरंत बोल उठे, फ्सरकार, अबहिन खोदवाय देइत है। सब आपैक तो है। हम सबन की देह आपकी पाली है, इर् खंभन की कउन बिसात है।य् उन्होंने तुरंत उसे निकलवा कर हमें दे दिया। भद्रमथ के श्िालालेख की क्षति - पूतिर् हो गइर्। सन् - संवत् मुझे याद नहीं। बहुत दिन की बात हुइर्। उस साल ओरियंटल कांप्रेफन्स का अिावेशन मैसूर में था। मेरे अभ्िान्न मित्रा कविवर ठावुफर गोपालशरण ¯सह साहित्य विभाग के सभापति थे। एक तो उनका साथ रुचिकर, दूसरे इसके पहिले दक्ष्िाण मैं गया नहीं था। प्रशंसा बहुत सुन रखी थी। यह भी सुन रखा था कि ताम्रमूतिर्यों और तालपत्रा पर हस्तलिख्िात पोथ्िायों की वह मंडी है। दोनों का प्रयाग संग्रहालय में नितांत अभाव था। उपयुर्क्त तीनों कारणों में प्रत्येक मुझे प्रलुब्ध करने के लिए पयार्प्त थे। पर तीनों के सामूहिक आकषर्ण ने मुझे मैसूर की ओर बरबस खींच लिया। मद्रास पहुँचते ही मुझे चैन कहाँ? मैंने अपना काम आरंभ कर दिया। मद्रास में हम लोग दो दिन ठहरे। इन दो दिनों में मैंने नगर का कोना - कोना छान डाला। दर - दर भ्िाखारी की तरह झख मारता पिफरा। यद्यपि जेब में पैसा था तथापि हृदय तो भ्िाखारी का था। थैली काटकर दाम देनेवाले की शक्ल ही दूसरी होती है। लोगों से पूछ - पूछकर विव्रेफताओं के घर गया। आठ - दस चित्रा खरीदे भी। सस्ते दामों में। पर तालपत्रा पर लिखी पुस्तकों के दाम सुनकर मेरे छक्के छूट गए। किसी पुस्तक का दाम ढाइर् - तीन सौ रुपए से कम विव्रेफताओं ने नहीं बताया। ये मेरे बस की न थी और मैं तेलुगू और तमिल पढ़ भी नहीं सकता था। इसलिए मन सिकोड़ लेना पड़ा। संध्या समय मुख्य बाशार घूमने गया। बड़ी भीड़भाड़ थी। विशेषता यह थी कि भीड़ में नंगे बदन लोग बहुत बड़ी संख्या में थे। काला बदन, उस पर शुभ्र यज्ञोपवीत, मोटी तोंद, तहमद बाँधे, सिर से टोपी और पैर से जूता नदारद। साधारण स्िनग्ध बातचीत करने में इतनी शोर से बोलते थे जैसे लड़ रहे हों। यह दृश्य मेरे लिए बिलवुफल नया था। वहाँ लोगों ने मुझसे कहा कि श्रीनिवासजी हाइकोटर् के वकील हंै। उनके पास सिक्कों और कांस्य और पीतल की मूतिर्यों का बड़ा अच्छा संग्रह है। संध्या समय उनके यहाँ गया। श्रीनिवासजी भले लोग थे, यद्यपि इन चीशों का व्यापार भी करते थे। भलमनसाहत और इन चीशों का व्यापार परस्पर विरोधी हैं। मैं एक रुपए में तीन अठन्नी भुनाना चाहता हूँ। व्यापारी अपने एक रुपए का मूल्य तीन रुपया रखता है। श्रीनिवास जी भलेमानस विवे्रफता थे। उनसे मैंने चार - पाँच सौ रुपए की पीतल और कांस्य की मूतिर्याँ लीं। बहुत - से सिक्के उन्होंने मुझे मुफ्ऱत में ही दे दिए। उनके यहाँ चार - पाँच बड़े - बड़े नटराज भी थे। पर उनके दाम बीस - बीस, पचीस - पचीस हशार रुपए थे। मैंने सरसरी तौर से उन्हें देख भर लिया। मैं संग्रह करता हूँ, आश्िाक नहीं। यही अंतर मुझमें और भाइर् वृफष्णदास में है। वे संग्रहकतार् भी हैं और आश्िाक भी। संग्रह कर लेने और उसे हरम ;प्रयाग संग्रहालयद्ध में डाल लेने के बाद मेरा सुख समाप्त हो जाता है। भाइर् वृफष्णदास संग्रह करने के बाद भी चीशों को बार - बार हर पहलू से देखकर उसके सुख सागर में डूबते - उतराते रहते हैं। यदि संग्रहकतार् आश्िाक भी हुआ तो भगवान ही उसकी रक्षा करें। अपराह्न में मैसूर जाने के लिए स्टेशन आया। गाड़ी ने रेंगना शुरू ही किया था कि एक आदमी वुफछ चित्रा ले आया और गाड़ी के साथ - साथ चलने लगा। गिनने और देखने का कोइर् समय नहीं था। मैंने हाथ में तीन ठनठनाते रुपए लेकर उसे दिखाए। उसने रुपया लेकर तसवीरों को ख्िाड़की में पेंफक दिया। जब गाड़ी ने तेशी पकड़ी तो मैंने तसवीरों को देखा। तसवीरें बुरी नहीं थीं। यहाँ होती तो पाँच - पाँच रुपए प्रत्येक तसवीर के अवश्य देता। सौदा अच्छा रहा। आज के दिन वे पचीस - पचीस रुपए से कम की न मिलेंगी। मैसूर पहुँचकर अिावेशन में सम्िमलित हुआ। मैसूर के युवराज सभापति थे। अिावेशन में कोइर् खास बात न थी। अिावेशन समाप्त होने पर हम लोग रामेश्वरम् गए। तालपत्रा की पुस्तक का न मिलना अभी तक कसक रहा था। मैं वैफसे मन को समझा सकता था कि खलीपफा मंडी में बटोरने से सेर - भऱअन्न भी न मिलेगा जब प्रतिदिन वहाँ की बटोरन से अनेक भ्िाखारियों का पेट भरता है। रामेश्वरम् पहुँचने पर पंडे पीछे लगे, तीथर्स्थान जो था। पंडों के देखते ही मेरे हथवंफडे ने करवट बदली। मैंने झट ठावुफर साहब को ‘राजा साहब’ बना दिया और पंडों से कहा, फ्देखो भाइर्! राजा साहब का यहाँ कोइर् पंडा नहीं है। जो भी सबसे अिाक तालपत्रों पर लिखी पुस्तवेंफ भेंट करे वही हम लोगों का पंडा और हमारे वंश का पंडा।य् इसके पहले कि पंडे हमारे प्रस्ताव पर वुफछ निश्िचत कर सवेंफ, एक लड़कौंधा पंडा दौड़कर गया और उसने एक छोटा गऋर तालपत्रा पर लिख्िात पुस्तकों का मेरे सामने लाकर पटक दिया। मैंने कहा, फ्बस! तुम्हीं राजा साहब के और हमारे आज से पंडा हुएय् और उसकी बही पर अपने हस्ताक्षर कर दिए। चलते समय दोनों ही ने अपनी - अपनी हैसियत के मुताबिक दक्ष्िाणा दी। मेरी दक्ष्िाणा से उनका क्या बनता, परंतु ‘राजा साहब’ की दक्ष्िाणा से पुस्तकों का देना उसे नहीं अखरा। दक्ष्िाण के और दशर्नीय स्थानों को देखते हुए हम लोग प्रयाग लौट आए। तालपत्रा की पफाँस मन से निकल गइर्। संग्रह में तो आशातीत सपफलता हुइर्। इतनी संख्या में और इतनी महत्त्वपूणर् सामग्री आइर् कि धरते - उठाते नहीं बनता था। लगभग दो हशार पाषाण - मूतिर्याँ, पाँच - छह हशार मृण्मूतिर्याँ, कइर् हशार चित्रा, चैदह हशार हस्तलिख्िात पुस्तवेंफ, हशारों सिक्के, मनके, मोहरें इत्यादि। इनका प्रदशर्न और संरक्षण कोइर् हँसी - खेल नहीं है। लोगों की श्िाकायत थी कि म्युनिसिपैलिटी में इनके लिए स्थान बहुत छोटा है। बात ठीक ही थी। पर इसका कारण स्थान का संवुफचित होना नहीं था। आठ बड़े - बड़े कमरे इसके लिए निधार्रित कर दिए गए थे। कारण था सामग्री का अिाक होना, चीशों का विस्तार। संग्रहालय के पृथक विशाल भवन का निमार्ण अनिवायर् हो गया। परंतु उसके लिए बहुत धन की आवश्यकता थी। यह म्याउँफ का ठौर था। सहसा एक बात सूझ गइर्। इस हथवंफडे की दाद चाहूंँगा। ‘म्युनिसिपैलिटीश एक्ट’ में एक धारा है कि एकशेकेटिव आप्िाफसर मुकदमा चलाने के स्थान पर हरजाना ;तवानाद्ध लेकर समझौता कर ले।़दूसरे, नगर में भवन - निमार्ण की अनुमति देने में म्युनिसिपैलिटी ही नियमित शुल्क भी लेती थी। इन दोनों मदों से बीस हशार रुपया साल आय होती थी। हमने बोडर् एवं संयुक्त प्रांत की सरकार से यह स्वीवृफति ले ली कि इस आय का ‘संग्रहालय निमार्ण कोष’ बना दिया जाए। इस प्रकार इस कोष में दस वषर् के भीतर दो लाख रुपए एकत्रा हो गए, जैसे - जलविन्दुनिपातेन व्रफमशः पूयर्ते घटः। सहेतुः सवर्विद्यानां धमर्स्य च धनस्य च।। डाॅ. पन्नालाल आइर्.सी.एस. जो उस समय सरकार के परामशर्दाता थे, के सौजन्य और सहायता से वंफपनी बाग में एक भूखंड भी भवन के लिए मिल गया। अब केवल श्िालान्यास और भवन - निमार्ण की देर रह गइर्। मैंने सोच रखा था कि जवाहरलाल नेहरू जी से श्िालान्यास कराउँफगा। उनकी - मेरी आपसदारी और उनकी संग्रहालय के प्रति निष्ठा के कारण उचित ही था। मैं सिपर्फ मौके की ताक मेें था। वह मौका आ गया। प्रयाग में मुझे देखते ही जवाहरलाल जी़ने कहा, फ्व्यास! तुम्हारे म्युिायम की इमारत न बनेगी?य् पर मैंने नम्रता से मुसवुफराते हुए उत्तर दिया, फ्यह मेरा अहद है कि जब तक आप उसका श्िालान्यास न करेंगे, मैं उसे अपनी ¯शदगी में बनने न दूँगा। पर मैं आपसे वैफसे कहूँ? क्या सिवाए श्िालान्यास करने के आपको और कोइर् काम नहीं है?य् जवाहरलाल जी तुरंत बोल उठे, फ्यह सब प्िाफजूल बात है। अगली बार जब मैं आउँफगा तो श्िाला रख दूँगा। अब श्यादा देर मत करो।य् बात खत्म़हो गइर्। उपस्िथत सज्जन हम लोगों की बात पर मुसवुफरा रहे थे। यह तो वुफछ ऐसा हो गया, जैसे - लभते वा प्राथर्यिता न वा श्रियम् श्रिया दुरापः कथमीप्िसतो भवेत्। - भवभूति लक्ष्मी की इच्छा करने वाले को लक्ष्मी मिले या न मिले परंतु यदि लक्ष्मी किसी के पास जाना चाहें तो उन्हें कौन रोक सकता है? दो ही तीन दिन बाद डाॅ. ताराचंद स्वयं मेरे पास आए और श्िालान्यास का पूरा प्रोग्राम निश्िचत कर चले गए। निश्िचत समय पर अभूतपूवर् समारोह के साथ जवाहरलाल जी ने संग्रहालय का श्िालान्यास कर दिया। वह समारोह इतना सुंदर हुआ कि फ्न भूतो न भविष्यति।’ परंतु उल्लेखनीय होते हुए भी उसका वणर्न न करूँ गा, कारण वह कच्चे चिऋे की परििा के बाहर है। पंडित जवाहरलाल जी ने बंबइर् के विख्यात इंजीनियर ‘मास्टर साठे और मूता’ को लिखकर उनसे नए भवन का नक्शा बनवा दिया और समय से भवन बनकर तैयार हो गया। इस बात का मुझे संतोष है कि जनता के जिस हरजाने के रुपए से इस भवन का निमार्ण हुआ उसे मैंने पाइर् - पाइर् ब्याज सहित ;संगृहीत चीशें पंद्रह लाख से कम की नहीं हैंद्ध उन्हें ‘प्रजानामेव भूत्यथर्म्’ लौटा दिया। एक बात और। इसके पहिले कि मैं इस ‘कच्चे चिऋे’ को समाप्त करूँ , मैं उन लोगों से क्षमा माँगता हूँ जिन्हें मैंने छला है और पिफर सिवाय मेरे क्षमा माँगने और उनके क्षमा करने के और कोइर् चारा भी तो नहीं है। अपने पापों का ;यदि आप उन्हें पाप समझें, मैं नहीं समझताद्ध प्रायश्िचत तो मैंने लिखकर कर लिया। परंतु समाप्त करते - करते मैं ऐसी वृफतघ्नता का पाप नहीं कर सकता जिसके प्रायश्िचत का शास्त्रा में भी विधान नहीं है। यह संग्रहालय चार महानुभावों के साहाÕय और सहानुभूति से बन सका है। राय बहादुर कामता प्रसाद कक्कड़ ;तत्कालीन चेयरमैनद्ध,हिशहाइनेस श्री महेंद्र¯सहजू देव नागौद नरेश और उनके सुयोग्य दीवान लाल भागर्वेंद्र¯सह जिनके भरहुत और भुमरा संग्रह के कारण संग्रहालय का मस्तक उँफचा है और मेरा स्वामीभक्त अदर्ली जगदेव, जिसके अथक परिश्रम से इतना बड़ा संग्रह संभव हुआ। ठावुफर ने ठीक ही कहा है - सामिल मैं पीर मैं सरीर मैं न राखै भेद हिम्मत कपाट को उघारै तो उघरि जाय। ऐसी ठान ठानै तो बिनाहू जंत्रा - मंत्रा किये साँप के जहर को उतारै तो उतरि जाय। ठावुफर कहत वुफछ कठिन न जानौ आज हिम्मत किये ते कहौ कहा न सुधरि जाय। चारि जने चारिहू दिसा तें चारों कोन गहि मेरु को हिलाय के उखारैं तो उखरि जाय।। मैं तो केवल निमित्तमात्रा था। अरुण के पीछे सूयर् था। मैंने पुत्रा को जन्म दिया, उसका लालन - पालन किया, बड़ा हो जाने पर उसके रहने के लिए विशाल भवन बनवा दिया, उसमें उसका गृह - प्रवेश करा दिया, उसके संरक्षण एवं परिवधर्न के लिए एक सुयोग्य अभ्िाभावक डाॅ. सतीशचंद्र काला को नियुक्त कर दिया और पिफर मैंने संन्यास ले लिया। - ‘मेरा कच्चा चिऋा’ आत्म - कथा का अंश प्रश्न - अभ्यास 1.पसोवा की प्रसिि का क्या कारण था और लेखक वहाँ क्यों जाना चाहता था? 2.फ्मैं कहीं जाता हँू तो ‘छँूछे’ हाथ नहीं लौटता।य् से क्या तात्पयर् है? लेखक कौशाम्बी लौटते हुए अपने साथ क्या - क्या लाया? 3.फ्चांद्रायण व्रत करती हुइर् बिल्ली के सामने एक चूहा स्वयं आ जाए तो बेचारी को अपना कतर्व्य पालन करना ही पड़ता है।य् - लेखक ने यह वाक्य किस संदभर् में कहा और क्यों? 4.फ्अपना सोना खोटा तो परखवैया का कौन दोस?य् से लेखक का क्या तात्पयर् है? 5.गाँववालों ने उपवास क्यों रखा और उसे कब तोड़ा? दोनों प्रसंगों को स्पष्ट कीजिए। 6.लेखक बुढि़या से बोिासत्व की आठ पुफट लंबी संुदर मूतिर् प्राप्त करने में वैफसे सपफल हुआ? 7.फ्इर्मान! ऐसी कोइर् चीश मेरे पास हुइर् नहीं तो उसके डिगने का कोइर् सवाल नहीं उठता। यदि होता तो इतना बड़ा संग्रह बिना पैसा - कौड़ी के हो ही नहीं सकता।य् - के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है? 8.दो रुपए में प्राप्त बोिासत्व की मूतिर् पर दस हशार रुपए क्यों न्यौछावर किए जा रहे थे? 9.भद्रमथ श्िालालेख की क्षतिपूतिर् वैफसे हुइर्? स्पष्ट कीजिए। 10.लेखक अपने संग्रहालय के निमार्ण में किन - किन के प्रति अपना आभार प्रकट करता है और किसे अपने संग्रहालय का अभ्िाभावक बनाकर निश्िंचत होता है? भाषा श्िाल्प 1.निम्नलिख्िात का अथर् स्पष्ट कीजिए - ;कद्धइक्के को ठीक कर लिया ;खद्ध कील - काँटे से दुरूस्त था। ;गद्धमेरे मस्तक पर हस्बमामूल चंदन था ;घद्ध सुरखाब का पर 2.लोकोक्ितयों का संदभर् सहित अथर् स्पष्ट कीजिए - ;कद्धचोर की दाढ़ी में तिनका ;खद्ध ना जाने केहि भेष में नारायण मिल जाएँ ;गद्धचोर के घर छिछोर पैठा ;घद्ध यह म्याउँफ का ठौर था योग्यता - विस्तार 1.अगर आपने किसी संग्रहालय को देखा हो तो पाठ से उसकी तुलना कीजिए। 2.अपने नगर में अथवा किसी सुप्रसि( राष्ट्रीय संग्रहालय को देखने की योजना बनाएँ। 3.लोकहित संपन्न किसी बड़े काम को करने में इर्मान / इर्मानदारी आड़े आए तो आप क्या करेंगे। शब्दाथर् और टिप्पणी ¯कवदंती - लोगों द्वारा कही गइर् सन्िनकट - पास, नशदीक छँूछे - बु(ू ;बनना, बनानाद्ध खाली अंतरधान - छिप जाना, गायब हो जाना प्रख्यात - बहुत प्रसि( इिाला - सूचना, खबर उत्कीणर् - खुदा हुआ प्रतिवाद - विरोध, खंडन बंडेर - छाजन के बीचोंबीच लगाया जाने वाला बल्ला जिस पर ठाट का बोझ रहता है बिसात - बिछाइर् जाने वाली चीश लड़कौंध - छोटी आयु का साहाÕय - सहायता, मदद, मैत्राी न वूफवुफर भूँका, न पहरू जागा - शरा सा भी खटका न होना झक मारना - बेकार बात करना मुँह लगना - व्यथर् समय बरबाद करना खून का घूँट पीकर रह जाना - गुस्से को दबा जाना सुरखाब का पर लगना - खास बात होना मुँह में खून लगना - आदत पड़ जाना खाक छानना - भटकना, खोज करना पानी - पानी होना - शमि±दा होना छक्के छूटना - घबरा जाना दिल पफड़कना - जोश उत्पन्न करना नून - मिचार् लगाना - भड़काना पी जाना - छिपाना, सहन करना डेरा डालना - अंा जमाना रुपए में तीन अठन्नी भुनाना - अिाकतम लाभ लेना

RELOAD if chapter isn't visible.