अध्याय 11 अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार 1 अध्िगम उद्देश्य इस अध्याय के अध्ययन के पश्चात् आपः ऽ अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार का अथर् समझ सवेंफगेऋ ऽ यह बता सवेंफगे कि अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार का क्या कारण है तथा यह घरेलू व्यापार से किस प्रकार से भ्िान्न है? ऽ अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्रा एवं इसके राष्ट्र एवं व्यावसायिक इकाइयों के लाभों का वणर्न कर सवेंफगेऋ ऽ अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार में प्रवेश के विभ्िान्न तरीकों की पहचान कर सवेंफगे तथा उसका मूल्यांकन कर सवेंफगेऋ ऽ अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार में भारत की संब(ता के रुझान का विश्लेषण कर सवेंफगे। सुध्ीर मनचंदा मोटर वाहनों के कलपुजोर्ं का एक छोटा सा विनिमार्ता है। उसका कारखाना गुड़गाँव में स्िथत है जिसमें 55 कमर्चारी काम करते हैं तथा इसमें संयंत्रा एवं मशीनों में 92 लाख रु का निवेश किया गया है। घरेलू बाजार में मंदी के कारण अगले वुफछ वषोर् तक बिव्रफी बढ़ने की कोइर् संभावना नहीं है। अब वह बाह्य बाजार में संभावनाओं को तलाश रहा है। उसके कइर् प्रतियोगी पहले से नियार्त व्यापार में लगे हुए हंै। इसी प्रकार के व्यवसाय उसके एक घनिष्ट मित्रा से बातचीत में यह पता लगा कि मोटर वाहन के विभ्िान्न भाग एवं इससे जुड़े अन्य सामान की दक्ष्िाण - पूवर् एश्िाया एवं मध्य - पूवर् के देशों में अच्छा खासा बाजार है। लेकिन उसने यह भी बताया कि अंतरार्ष्ट्रीय बाजार में व्यापार करना देश के भीतर व्यापार करने जैसा नहीं है। अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय अध्िक जटिल है क्योंकि बाहर की विपणन परिस्िथतियां देश की व्यवसाय संबंध्ी परिस्िथतियों से भ्िान्न होती हैं। श्री मनचंदा को यह ज्ञान नहीं है कि वह बाह्य व्यवसाय को वैफसे जमाए। क्या उसे दूसरे देशों में बैठे ग्राहकों की पहचान कर उनसे संपवर्फ साध्ना चाहिए या उन्हें सीध्े माल नियार्त कर देना चाहिए या पिफर उसे अपना माल नियार्त ग्रहों के माध्यम से भेजना चाहिए जो कि दूसरे के निमिर्त माल का नियार्त करने में विश्िाष्टता प्राप्त किये हुए हैं। श्री मनचंदा का पुत्रा, जो हाल ही में अमेरिका से एम.बी.ए. करने के पश्चात् लौटा है, ने सुझाव दिया कि उन्हें अपनी निजी पैफक्टरी बैंकाक में लगानी चाहिए जिससे कि दक्ष्िाण - पूवर् एश्िाया एवं मध्य - पूवर् के देशों के ग्राहकों को माल की आपूतिर् की जा सके। वहाँ कारखाना लगाने से भारत से माल भेजने पर परिवहन व्यय की बचत होगी। इससे उनकी विदेश में ग्राहकों से नजदीकियां भी बढे़ंगी। श्री मनचंदा पशोपेश में है कि क्या करें जैसा उनके मित्रा ने विदेशों से व्यापार करने में आने वाली कठिनाइयों के संबंध् में बताया। वह सोच रहा है कि क्या वास्तव में वैश्िवक बाजार में प्रवेश किया जाए। उन्हें यह भी नहीं पता है कि अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार में प्रवेश के कौन - कौन से मागर् हैं तथा उनमें से कौन - सा श्रेष्ठतम है। 11.1 परिचय पूरे विश्व के विभ्िान्न देशों में वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन एवं उनके विव्रफय के तरीकों में आधरभूत परिवतर्न आ रहे हैं। जो राष्ट्रीय अथर्व्यवस्थाएं अभी तक आत्मनिभर्रता के लक्ष्य को प्राप्त करने में लगी थीं। अब उन्हें विभ्िान्न वस्तुओं एवं सेवाओं के एकत्राीकरण एवं आपूतिर् के लिए अध्िक से अध्िक दूसरों पर आश्रित होना पड़ रहा है। अपने देश की सीमाओं के पार व्यापार एवं विनियोग के बढ़ने के कारण अब देश अकेले नहीं पड़ रहे हैं। इस व्रफांतिकारी परिवतर्न का मुख्य कारण संप्रेषण, तकनीक, आधरगत ढाँचा आदि के क्षेत्रा में विकास है। नये - नये संप्रेषण के माध्यम एवं परिवहन के तीव्र एवं अध्िक सक्षम साधनों के विकास ने विभ्िान्न देशों को एक दूसरे के नशदीक ला दिया है जो देश भौगोलिक दूरी एवं सामाजिक, आथ्िार्क अंतर के कारण एक दूसरे से कटे हुए थे। अब एक दूसरे से संवाद कर रहे हैं। विश्व व्यापार संघ ;डब्ल्यू.टी.ओ.द्ध एवं विभ्िान्न देशों की सरकारों के द्वारा किये गये सुधरों का विभ्िान्न देशों के बीच संवाद एवं व्यावसायिक संबंध् की वृि में भारी योगदान रहा है। आज हम जिस दुनिया में जी रहे हैं उसमें वस्तु एवं व्यक्ितयों का सीमा पार आवागमन में बाधएँ बहुत कम हो गइर् हैं। राष्ट्रीय अथर्व्यवस्थाएँ आज सीमा रहित होती जा रही हैं तथा वैश्िवक अथर्व्यवस्था में समाहित होती जा रही हैं। आश्चयर् नहीं है कि आज पूरी दुनियां एक भूमंडलीय गाँव में बदल गइर् है। आज के युग में व्यवसाय किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है। अध्िक से अध्िक व्यावसायिक इकाइयाँ आज अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार में प्रवेश कर रही हैं। जहाँ उन्हें विकास एवं अध्िक लाभ के अवसर प्राप्त हो रहे हैं। भारत सदियों से अन्य देशों से व्यापार करता रहा है। लेकिन पिछले वुफछ वषोर्ं से इसने विश्व अथर्व्यवस्था में समाहित होने एवं अपने विदेशी व्यापार एवं निवेश में वृि की प्रवि्रफया को पयार्प्त गति प्रदान की है। ;देखें बाॅक्स भारत वैश्वीकरण की राह परद्ध। व्यवसाय अध्ययन भारत वैश्वीकरण की राह पर यू.एस.एस.आर. में कम्यूनिस्ट सरकार के पतन एवं यूरोप तथा अन्यत्रा में सुधर कायर्व्रफमों के पश्चात् अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय ने उत्थान के नये युग में प्रवेश किया। भारत भी इस प्रगति में अलग - थलग नहीं रहा। उस समय भारत भारी )ण के बोझ से दबा हुआ था। 1991 में भारत ने अपने भुगतान शेष के घाटे को पूरा करने के लिए कोष जुटाने के लिए अंतरार्ष्ट्रीय मुद्राकोष ;आइर्.एम.एपफ.द्ध को गुहार लगाइर्। आइर्.एम.एपफ.भारत को इस शतर् पर )ण देने को तैयार हो गया कि भारत ढाँचा गत परिवतर्न करेगा जिससे कि )ण के भुगतान को सुनिश्िचत किया जा सके। भारत के पास इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के अतिरिक्त और कोइर् विकल्प नहीं था। यह आइर्.एम.एपफ. द्वारा लगाइर् गइर् शतेर्ं ही थीं जिसके कारण भारत को कमोबेश अपनी आथ्िार्क नीतियों में उदारीकरण के लिए बाध्य होना पड़ा। तभी से आथ्िार्क क्षेत्रा में कापफी बड़ी मात्रा में उदारीकरण आया है। यद्यपि सुधर प्रवि्रफया थोड़ी ध्ीमी हो गइर् है पिफर भी भारत वैश्वीकरण एवं विश्व अथर्व्यवस्था से पूरी तरह जुड़ जाने के मागर् पर अग्रसर है। एक ओर कइर् बहुराष्ट्रीय निगम ;एम.एन.सीजद्ध अपनी वस्तुओं एवं सेवाओं की बिव्रफी का भारतीय बाजार में साहस कर रही हैं, वहीं भारतीय वंफपनियों ने भी विदेशों में उपभोक्ताओं को अपने उत्पाद एवं सेवाओं के विपणन हेतु अपने देश से बाहर कदम रखे हैं। 11.1.1 अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय/ व्यापार का अथर् जब व्यापारिक वि्रफयाएँ भौगोलिक सीमाओं की परिध्ि में होती हैं तो इसे घरेलू व्यापार अथवा राष्ट्रीय व्यापार कहते हैं। इसे आंतरिक व्यापार अथवा घरेलू व्यापार भी कहते हैं। कोइर् देश अपनी सीमाओं से बाहर विनिमार्ण एवं व्यापार करता है तो उसे अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय कहते हैं। अंतरार्ष्ट्रीय अथवा बाह्य व्यवसाय को इस प्रकार से परिभाष्िात किया जा सकता है। यह वह व्यावसायिक वि्रफया है जो राष्ट्र की सीमाओं के पार की जाती है। इसमें न केवल वस्तु एवं सेवाओं का ही व्यापार सम्िमलित है बल्िक पूँजी, व्यक्ित, तकनीक, बौिक संपिा जैसे पेटेंट्स, टेªडमावर्फ, ज्ञान एवं काॅपीराइट का आदान - प्रदान भी। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि बहुत से लोग अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय का अथर् अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार से लगाते हंै। लेकिन यह सत्य नहीं है। इसमें कोइर् शंका नहीं है कि अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार अथार्त्् वस्तुओं का आयात एवं नियार्त ऐतिहासिक रूप से अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय का एक महत्त्वपूणर् भाग रहा है। लेकिन पिछले वुफछ समय से अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय का क्षेत्रा कापफी विस्तृत हो गया है। सेवाओं का अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार जैसे अंतरार्ष्ट्रीय यात्रा एवं पयर्टन, परिवहन, संप्रेषण, बैंकिंग, भंडारण, वितरण एवं विज्ञापन कापफी अध्िक बढ़ गया है। दूसरी उतनी ही महत्त्वपूणर् प्रगति विदेशी निवेश में वृि एवं विदेशों में वस्तु एवं सेवाओं के उत्पादन में हुइर् है। अब वंफपनियाँ दूसरे देशों में अध्िक विनियोग तथा वस्तु एवं सेवाओं का उत्पादन करने लगी है जिससे कि वह विदेशी ग्राहकों के और समीप आ सवेंफ तथा कम लागत पर और अध्िक प्रभावी ढंग से उनकी सेवा कर सवेंफ। यह सभी गतिविध्ियां अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय का भाग हैं। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय एक व्यापक शब्द है, जो विदेशों से व्यापार एवं वहां वस्तु एवं सेवाओं के उत्पादन से मिलकर बना है। अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय वह वाण्िाज्ियक वि्रफया है जो राष्ट्रीय सीमाओं को पार कर गइर् है। रोजर बैनेट अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में वह लेन देन सम्िमलित है जो व्यक्ितयों वंफपनियों एवं संगठनों के उद्देश्यों की पूतिर् के लिए राष्ट्रीय सीमाओं के पार किये जाते हैं। इन लेन देनों/सौदों के विभ्िान्न स्वरूप हैं जो कइर् बार एक दूसरे से जुडे़ होते हैं। माइर्कल आर, जिंकोटा अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय निजी एवं सरकारी सभी व्यावसायिक लेन देन हैं जो दो अथवा अध्िक देशों के बीच होते हैं। निजी कंपनियाँ इन लेन देनों को लाभ के लिए करती हैं लेकिन सरकार अपने लेन देनों को इसलिए या पिफर अन्यथा कर सकती है। जाॅन डी डेनियल्स एवं ली एच रेडेवापफ 11.1.2 अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय के कारण अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय का आधरभूत कारण है कि देश अपनी आवश्यकता की वस्तुओं का भली प्रकार से एवं सस्ते मूल्य पर उत्पादन नहीं कर सकते। इसका कारण उनके बीच प्रावृफतिक संसाध्नों का असमान वितरण अथवा उनकी उत्पादकता में अंतर हो सकता है। उत्पादन के विभ्िान्न साध्न जैसे श्रम, पूँजी एवं कच्चा माल, जिनकी विभ्िान्न वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन के लिए आवश्यकता होती है, संसाधनों की उपलब्ध्ता अलग - अलग देशों में अलग - अलग होती है। वैसे विभ्िान्न राष्ट्रों में श्रम की उत्पादकता एवं उत्पादन लागत में भ्िान्नता विभ्िान्न सामाजिक - आथ्िार्क, भौगोलिक एवं राजनैतिक कारणों से होती है। इन्हीं कारणों से यह कोइर् असाधरण बात नहीं है कि कोइर् एक देश अन्य देशों की तुलना में श्रेष्ठ गुणवत्ता वाली वस्तुओं एवं कम लागत पर उत्पादन की स्िथति में हो। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं वुफछ देश वुफछ चुनिंदा वस्तुओं एवं सेवाओं के लाभ में उत्पादन करने की स्िथति में होते हैं जबकि इन्हीं को अन्य देश उतने ही प्रभावी एवं क्षमता से उत्पादन नहीं कर सकते। इसी कारण से प्रत्येक देश के लिए उन वस्तु एवं सेवाओं का उत्पादन अध्िक लाभप्रद रहता है जिनका वह अध्िक वुफशलतापूवर्क उत्पादन कर सकते हैं तथा शेष वस्तुओं को वह व्यापार के माध्यम से उन देशों से ले सकते हैं जो उन वस्तुओं का उत्पादन कम लागत पर कर सकते हैं। संक्षेप में किसी एक देश का दूसरे देश से व्यापार का यही कारण है और इसी व्यापार को अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय कहते हैं। व्यवसाय अध्ययन आज का अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार कापफी हद तक उफपर वण्िार्त भौगोलिक विश्िाष्टीकरण का परिणाम है। मूलरूप से किसी एक देश में इसके विभ्िान्न राज्यों एवं क्षेत्रों के बीच घरेलू व्यापार का कारण भी यही है। किसी एक देश के विभ्िान्न राज्य या पिफर क्षेत्रा उन्हीं वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन के विशेषज्ञ हो जाते हैं जिनके उत्पादन के लिए वह सवर्था उपयुक्त हैं। उदाहरण के लिए भारत में पश्िचमी बंगाल यदि जूट से तैयार वस्तुओं के उत्पादन में विश्िाष्टता लिए हुए है तो महाराष्ट्र में मुम्बइर् एवं इसके आस - पास के क्षेत्रा सूती वस्त्रों के उत्पादन में अध्िक संलग्न हैं। अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर भी क्षेत्राीय श्रम विभाजन इसी सि(ांत के आधर पर होता है। अिाकांश विकासशील देश जिनके पास श्रम शक्ित कापफी अध्िक है सिले/सिलाए वस्त्रों के उत्पादन एवं नियार्त में विश्िाष्टता लिए हुए हैं। इन देशों के पास पूँजी एवं तकनीकी ज्ञान की कमी है। इसीलिए यह टैक्सटाइल मशीनें विकसित देशों से आयात करते हैं जो इन मशीनों का उत्पादन अध्िक वुफशलता से करने की स्िथति में हैं। जो एक देश के लिए सत्य है वह व्यावसायिक इकाइयों के लिए भी सत्य है। विभ्िान्न पफमर् भी अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय से जुड़कर उन वस्तुओं का आयात करती हैं जिन्हें वह दूसरे देशों से कम मूल्य पर प्राप्त कर सकती हैं तथा दूसरे देशों को उन वस्तुओं का नियार्त करती हैं जहाँ उन्हें अपनी वस्तुओं का अध्िक मूल्य प्राप्त हो सकता है। राष्ट्रों एवं पफमोर्ं को अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय से केवल मूल्य का ही लाभ नहीं मिलता है बल्िक और भी बहुत से लाभ प्राप्त होते हैं। यह दूसरे लाभ भी राष्ट्रों एवं पफमोर्ंं को अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय करने के लिए प्रेरित करते हैं। इन लाभों का वणर्न हम बाद के एक अनुभाग में करेंगे। 11.1.3 अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय बनाम घरेलू व्यवसाय अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय का संचालन एवं प्रबंध्न घरेलू व्यवसाय को चलाने से कहीं अध्िक जटिल है। विदेशों की राजनीतिक, सामाजिक, सांस्वृफतिक एवं आथ्िार्क वातावरण की विविधताओं के कारण व्यावसायिक इकाइयों के लिए घरेलू व्यवसाय में अपनाइर् जाने वाली रणनीति को विदेशी बाजार में प्रयोग नहीं किया जा सकता। ;देखें बाॅक्स पफमो± के वातावरण में भ्िान्नता के प्रति सचेत होना आवश्यक हैद्ध। घरेलू एवं अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में विभ्िान्न पहलूओं पर अंतर नीचे दिये गये हैं। ;कद्ध व्रेफता एवं विव्रेफताओं की राष्ट्रीयताः व्यावसायिक सौदों के मुख्य पक्षों ;व्रेफता एवं विव्रेफताद्ध की राष्ट्रीयता घरेलू व्यवसाय में अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसायों में अलग - अलग होती है। घरेलू व्यवसाय में व्रेफता एवं विव्रेफता दोनों एक ही देश के वासिंदे होते हैं। इसीलिए दोनों पक्ष एक दूसरे को भली - भांति समझते हैं तथा व्यावसायिक लेन देन करते हैं। लेकिन अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में व्रेफता एवं विव्रेफता दो भ्िान्न देशों के होते हैं। भाषा, रुझान, सामाजिक रीतियाँ एवं व्यावसायिक उद्देश्य एवं व्यवहार में अंतर के कारण एक दूसरे से संवाद एवं व्यावसायिक सौदों को अंतिम रूप देना अपेक्षावृफत अध्िक कठिन होता है। ;खद्ध अन्य हिताथ्िार्यों की राष्ट्रीयताः घरेलू एवं अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में अन्य हिताथीर् जैसे कमर्चारी, आपूतिर्कतार्, अंशधारक/साझीदार एवं सामान्य जनता जिनका व्यावसायिक इकाइयों से वास्ता पड़ता है की राष्ट्रीयता भी भ्िान्न होती है। घरेलू/आंतरिक व्यवसाय में यह सभी अदाकार एक ही देश के होते हैं इसलिए इनके मूल्यों एवं व्यवहार में अपेक्षावृफत अध्िक अनुरूपता होती है, जबकि अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में इकाइयों को अलग देशों के हिताथ्िर्ायों के मूल्यों एवं आकांक्षाओं को ध्यान में रखना होता है। ;गद्ध उत्पादन के साध्नों में गतिशीलता: देश की सीमाओं की तुलना में अन्य देशों के बीच श्रम एवं पूँजी जैसे उत्पादन के साध्नों की गतिशीलता कम होती है। यह साधन देश की सीमाओं के भीतर स्वतंत्राता से गतिमान रहते हैं जबकि एक देश से दूसरे देश के बीच इनके आवागमन पर कइर् प्रकार की रोक लगी होती हैं। इनमें कानूनी रोक तो होती है। इनके अतिरिक्त सामाजिक - सांस्वृफतिक वातावरण, भौगोलिक प्रभाव एवं आथ्िार्क स्िथति में भ्िान्नता भी इनके स्वतंत्रा परिगमन में बाध्क होते हैं। यह श्रम के लिए विशेष रूप से सत्य है क्योंकि इनके लिए अपने आपको जलवायु, आथ्िार्क एवं सामाजिक - सांस्वृफतिक परिस्िथतियों के अनुवूफल ढालना कठिन होता है जो कि हर देश की अलग - अलग होती हैं। ;घद्ध विदेशी बाजारों मेेें ग्राहक: अंतरार्ष्ट्रीय बाजार में व्रेफता अलग - अलग देशों से आते हैं इसलिए उनकी सामाजिक - सांस्वृफतिक पृष्ठभूमि भी भ्िान्न होती है। उनकी रुचि, पैफशन, भाषा, विश्वास एवं रीतिरिवाश, रुझान एवं वस्तुओं को प्राथमिकता में अंतर के कारण न केवल वस्तु एवं सेवाओं की मांग में भ्िान्नता होती है बल्िक उनके संप्रेषण स्वरूप एवं व्रफय व्यवहार में विविध्ता होती है। सामाजिक - सांस्वृफतिक भ्िान्नता के कारण ही चीन के लोग जहाँ साइर्कल पसंद करते हैं वहीं इसके विपरीत जापानी मोटर साइर्कल की सवारी पसंद करते हैं। इसी प्रकार जबकि भारत के लोग दायीं ओर बैठकर कार चलाते हैं वहीं अमेरिका के लोग उन कारों को बांयी और चलाते हैं जिनमें स्टीयरिंग, ब्रेक आदि बायीं ओर लगे होते हैं। अमेरिका में लोग अपनी टेलीविशन, मोटर साइर्कल या अन्य उपभोग की स्थायी वस्तुओं को व्रफय के पश्चात् दो से तीन वषर् में बदल लेते हैं वहीं भारत के लोग इनके स्थान पर दूसरी इकाइर् तब तक नहीं खरीदते जब तक कि वतर्मान इकाइयाँ पूरी तरह से घ्िास न जाएँ। इन्हीं विभ्िान्नताओं के कारण दूसरे देशों के ग्राहकों को ध्यान में रखकर वस्तुओं को तैयार किया जाता है एवं रणनीति तैयार की जाती है। यद्यपि किसी एक देश के ग्राहकों की रुचि एवं पसंद में भी अंतर हो सकते हैं लेकिन विदेशों में अपेक्षावृफत अध्िक होते हैं। ;घद्ध व्यवसाय प(तियों एवं आचरण में अंतरः कइर् देशों को लें तो उनमें व्यवसाय प(तियों एवं आचरणों में बहुत अिाक अंतर व्यवसाय अध्ययन पाएंगे जबकि एक ही देश के भीतर इतना अंतर नहीं होगा। दो देश सामाजिक - आथ्िार्क विकास, उपलब्धता, आथ्िार्क आधरगत ढाँचा एवं बाजार समथ्िार्त सेवाएँ एवं व्यवसाय संबंधी रीति एवं आचरण के क्षेत्रा में सामाजिक, आथ्िार्क वातावरण एवं ऐतिहासिक अवसरों के कारण, एक दूसरे से भ्िान्न होते हैं। अंतर के इन्हीं कारणों से अंतरार्ष्ट्रीय बाजार में प्रवेश की इच्छुक व्यावसायिक इकाइयाँ अपनी उत्पादन, वित्त, मानव संसाध्न एवं विपणन योजनाओं को अंतरार्ष्ट्रीय बाजार में व्याप्त परिस्िथतियों के अनुसार ढालती हैं। ;चद्ध राजनीतिक प्रणाली एवं जोख्िामेंः सरकार, राजनीतिक दल प्रणाली, राजनीतिक विचारधरा, राजनीतिक जोख्िामें आदि किस प्रकार की हैं। यह राजनीतिक तत्व व्यवसाय प्रचालन को बहुत अध्िक प्रभावित करते हैं। एक व्यवसायी अपने देश के राजनीतिक वातावरण से भली भांति परिचित होता है तथा इसे वह समझता है तथा व्यावसायिक गतिवििायों पर इसके प्रभाव का अनुमान लगा सकता है लेकिन अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में ऐसा नहीं है। अलग - अलग देशों का राजनीतिक वातावरण अलग - अलग होता है। राजनीतिक वातावरण की भ्िान्नता एवं उनके व्यवसाय पर पड़ने वाले प्रभाव को समझने के लिए विशेष प्रयत्न करना होता है। राजनैतिक वातावरण क्योंकि बदलता रहता है इसीलिए जिस देश से व्यापार करना है उसमें समय - समय पर हो रहे राजनैतिक परिवतर्नों पर नशर रखनी आवश्यक है तथा विभ्िान्न राजनैतिक जोख्िामों का सामना करने के लिए रणनीति बनायी जाती है। किसी अन्य बाहर के देश के राजनैतिक वातावरण की सबसे बड़ी समस्या है कि यह देश अपने ही देश के उत्पाद एवं सेवाओं को अन्य देशों की वस्तुओं एवं सेवाओं की अपेक्षा पसंद करते हैं। अपने ही देश में व्यवसाय कर रही पफमोर्ंं के लिए यह कोइर् समस्या नहीं है लेकिन जो पफमेर्ं दूसरे देशों को वस्तु एवं सेवाएँ नियार्त करना चाहती हैं या पिफर दूसरे देश मे अपने संयंत्रा लगाना चाहती हैं यह बहुत बड़ी कठिनाइर् पैदा करती है। ;छद्ध व्यवसाय के नियम एवं नीतियाँः प्रत्येक देश अपने सामाजिक - आथ्िार्क वातावरण एवं राजनीतिक विचारधरा के अनुसार व्यवसाय के नियम एवं कानून बनाता है। ये नियम कानून एवं आथ्िार्क नीतियाँ देश की सीमाओं में लगभग समान रूप से लागू होती हैं लेकिन कइर् देशों को लेते हैं तो इनमें बहुत अध्िक अंतर होता है। किसी एक देश के सीमा शुल्क एवं कर संबंध्ी नीतियाँ, आयात कोटा प्रणाली, आथ्िार्क सहायता एवं अन्य नियंत्राण अन्य देशों के समान नहीं होते हैं तथा विदेशी वस्तुओं, सेवाओं एवं पूँजी के साथ भेदभाव बरतते हैं। ;जद्ध व्यावसायिक लेन देनों के लिए प्रयुक्त मुद्राः आंतरिक एवं बाह्य व्यवसाय में एक और महत्वपूणर् अंतर है। बाह्य देशों की मुद्राएँ भ्िान्न - भ्िान्न होती हैं। विनिमय दर अथार्त् किसी एक देश की मुद्रा के मूल्य परिवतिर्त होती रहती है। इससे अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में कायर्रत पफमर् के अपनी वस्तुओं का मूल्य निधार्रित करना एवं विदेशी विनिमय की जोख्िामों से सुरक्षा कठिन हो जाती है। 11.1.4 अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय का क्षेत्रा जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय, अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार से अध्िक व्यापक होता है। इसमें न केवल अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार ;वस्तु एवं सेवाओं का आयात एवं नियार्तद्ध सम्िमलित है बल्िक और भी बहुत से कायर् हैं जो अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर कायर्रत हैं। अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय की प्रमुख वि्रफयाएं निम्नलिख्िात हैं। ;कद्ध वस्तुओं का आयात एवं नियार्तः व्यापार की वस्तुओं से अभ्िाप्राय उन मूतर् वस्तुओं से है अथार्त् जिन्हें हम देख सकते हैं एवं स्पशर् कर सकते हैं। जब हम इस संदभर् में देखते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यापार वस्तुओं के नियार्त का अथर् है मूतर् वस्तुओं को अन्य देशों को भेजना तथा इनके आयात का अथर् है मूतर् वस्तुओं को बाह्य देश से अपने देश में लाना। व्यापारिक वस्तुओं के आयात - नियार्त अथार्त् वस्तुओं के व्यापार में मूतर् वस्तुएँ ही सम्िमलित होती हैं तथा सेवाओं में व्यापार का भाग नहीं होता है। ;खद्ध सेवाओं का आयात एवं नियार्तः सेवाओं के आयात नियार्त में अमूतर् वस्तुओं का व्यापार होता है। इसी अमूतर् लक्षण के कारण सेवाओं में व्यापार को अदृश्य व्यापार भी कहते हैं। अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर अनेक सेवाओं का व्यापार होता है जिनमें सम्िमलित हैं पयर्टन एवं यात्रा, भोजनालय एवं विश्राम ;होटल एवं जलपान गृहद्ध मनोरंजन, परिवहन, पेशागत सेवाएँ ;जैसे प्रश्िाक्षण, भतीर्, परामशर् देना एवं अनुसंधनद्ध, संप्रेषण ;डाक, टेलीपफोन, पैफक्स, वूफरियर एवं तालिका 11.1 घरेलू एवं अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में वुफछ प्रमुख अंतर आधर व्यवसायूलेघर ीय व्यवसायªष्टर्तरांअ ंफता एवे्रव1कींेफताओ्रविव ीयताªराष्ट एक हींेन मेन - देव्यावसायिक लूलेघर गठन भागंव्यक्ित अथवा सेश केद ।ंैहेतेल ंेशोविभ्िान्न दंेीय व्यवसाय मªष्टर्तरांअ गठनंसंग एवेाप्त ला्रीयता पªकी राष्ट ।ंैहेतेभाग ल कींेयार्अन्य हिताथ्िा2ीयताªराष्ट ,र्कतार्तिूआपेसैजर्हिताथीेसरूदंेकोअन दारेसाझंशधरक एवंचारी, मध्यस्थ, अर्कम ।ंैहेतेनागरिक होश केसामान्यतः एक ही द ,र्कत्तार्तिूआपर्हिताथीेसरूअन्य द ंशधरक एवंचारी, मध्यस्थ, अर्कम ।ंैहेतेहोसंेशोदार अलग - अलग देसाझ 3ंेफ साध्नोउत्पादन व की गतिशीलता फ साध्नेउत्पादन वंेमंेश की सीमाओएक द त अध्िकृक्षाकेजी अपँूपंश्रम एवेसैज ।ंैहेतेगतिशील हा साध्नेफ बीच उत्पादन केवंेशोविभ्िान्न द त कमृक्षाकेजी अपँूपं - श्रम एवेसैज ।ंैहेतेगतिशील हा ेकंेाहका्रगंेबाजार म4भ्िान्नतांेस्वरूप म त अध्िक समरूपताृक्षाकेअपंेबाजार मूलेघर ।ैजाती हर्पाइ ंेाथमिकताआ्रभाषा पंेमंेीय बाजाराªष्टर्तरांअ कारणेआदि की भ्िान्नता कंेरीति - रिवाजा ।ैसमरूपता का अभाव रहता ह व्यवसाय की5ंएवंेणालिया्रप भ्िान्नतांेव्यवहार म फ भीतर व्यवसाय कीेवंेश की सीमाओएक द अध्िक समरूपतांेव्यवहार मंएवंेणालिया्रप ।ैजाती हर्पाइ ंएवँव्यवसाय की प(तियोंमंेशोविभ्िान्न द ।ंैहेतेव्यवहार भी भ्िान्न हा ँणालिया्रतिक पैराजन6ंेख्िामेजांएव तिकैश की राजनेएक ही देव्यवसाय काूलेघर ।ैता ह़वास्ता पडेसंेख्िामोजांणाली एव्रप तिकैकी राजनंेशोअलग - अलग द कींेख्िामोजांफ स्वरूप एवेवंेणालिया्रप कभी - कभीेजौती हेसीमा अध्िक हा ।ैजाती हेबाध्क हांेीय व्यवसाय मªष्टर्तरांअ ध्ितंबंव्यवसाय स7ँनीतियांनियम एव फ नियम,ेश वे, एक ही दंेव्यवसाय मूलेघर ूणाली लाग्रकर पंएवँन, नीतियाूकान ।ैंती हेहा तुन पर बहेन - देलंेीय व्यवसाय मªष्टर्तरांअ सीमाँनीतियांन एवूनियम, कानेकेंशोदेस ।ंैहेतेहाूटा आदि लागेकांल्क एवुश क्तुय्रपंेव्यवसाय म8ा्रदुम ।ैग की जाती हेया्रा प्रदुश की मेदेअपन ेन एक सेन - देलंेीय व्यवसाय मªष्टर्तरांअ ।ैता हेहांेा म्रदुकी मंेशोअध्िक द अन्य श्रव्य दृश्यद्ध, निमार्ण एवं इंजीनियरिंग, विपणन ;थोक विव्रफय, पुफटकर विव्रफय, विज्ञापन, विपणन अनुसंधन एवं भंडारणद्ध, शैक्षण्िाक एवं वित्तीय सेवाएँ ;जैसे कि बैंकिग एवं बीमाद्ध। इनमें से पयर्टन एवं परिवहन व्यावसायिक सेवाओं के विश्व व्यापार के प्रमुख अंग हैं। ;गद्ध लाइसेंस एवं प्रैफंचाइजीः अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश का एक और मागर् है किसी दूसरे देश में वहीं के व्यवसासी को वुफछ पफीस के बदले आपके अपने ट्रेडमावर्फ, पेटेंट या काॅपी - राइट के अंतगर्त वस्तुओं के उत्पादन एवं विव्रफय की अनुमति देना। लाइसेंस प्रणाली के अंतगर्त ही विदेशों में स्थानीय पैप्सी एवं कोकाकोला उत्पादन एवं विव्रफय करते हैं। प्रैफंचाइजी भी लाइसेंस प्रणाली के समान है लेकिन यह सेवाओं के संदभर् में प्रयुक्त होती है। उदाहरण के लिए मैकडोनाल्ड््स प्रैफंचाइज प्रणाली के द्वारा ही पूरे विश्व में स्वरित खाद्य जलपान गृह चलाते हैं। ;घद्ध विदेशी निवेशः विदेशों में निवेश करना अंतरर्ाष्ट्रीय व्यवसाय का एक और महत्वपूणर् प्रकार है। विदेशी निवेश में वुफछ वित्तीय प्रतिपफल के बदले विदेशों में ध्न का निवेश किया जाता है। विदेशी निवेश दो प्रकार का हो सकते हैं - प्रत्यक्ष एवं पेटिका निवेश प्रत्यक्ष निवेश में एक वंफपनी किसी देश में वस्तु एवं सेवाओं के उत्पादन एवं विपणन के लिए वहाँ संयंत्रा एवं मशीनों जैसी परिसंपिायों में प्रत्यक्ष निवेश करती है। प्रत्यक्ष निवेश निवेशक को विदेशी वंफपनी में नियंत्राण का अध्िकार देता है। इसे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अथार्त् एपफ.डी.आइर्. कहते हैं। जब किसी एक या अध्िक विदेशी व्यवसायी के साथ उत्पादन एवं विपणन में ध्न लगाया जाता है तो इस वि्रफया को संयुक्त उपव्रफम कहते हैं। यदि कोइर् कंपनी चाहती है तो वह विदेशी उपव्रफम में 100 प्रतिशत निवेश कर एक पूणर् रूप से अपने स्वामित्व में एक सहायक कंपनी की स्थापना कर सकती है। इस प्रकार से उस सहायक कंपनी के विदेशों में व्यवसाय पर इसका पूरा नियंत्राण होगा। दूसरी ओर एक पेटिका निवेश एक कंपनी का दूसरी कंपनी में उसके शेयर खरीद या पिफर )ण के रूप में निवेश होता है। निवेशक कंपनी को लाभांश या )ण पर ब्याज के रूप में आय होती है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के समान पेटिका निवेश में निवेशक उत्पादन एवं विपणन वि्रफयाओं में लिप्त नहीं होता है। इसमें विदेशों में शेयर, बाँड, बिल या नोट में निवेश कर या विदेशी व्यावसायिक पफमोर्ंं को )ण देकर उनसे आय प्राप्त होती है। 11.1.5 अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय के लाभ अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में अनेक जटिलताओं एवं जोख्िामों के होते हुए भी यह राष्ट्रों एवं व्यावसायिक पफमो± के लिए महत्वपूणर् हैं। इससे उन्हें अनेक लाभ हैं। पिछले वषोर्ं में प्राप्त इन लाभों के कारण ही विभ्िान्न राष्ट्रों के बीच व्यापार एवं निवेश का विस्तार हुआ है। परिणामस्वरूप वैश्वीकरण में आशातीत वृि हुइर् है। अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय के विभ्िान्न देशों एवं पफमार्ंें के लाभों का वणर्न नीचे किया गया है। राष्ट्रों को लाभ ;कद्ध विदेशी मुद्रा का अजर्नः अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय से एक देश को विदेशी मुद्रा के अजर्न में सहायता मिलती है जिसे वह पूँजीगत वस्तुओं एवं उवर्रक, पफामार्स्यूटिकल उत्पाद एवं अन्य बहुत सी ऐसी उपभोक्ता वस्तुएँ जो अपने देश में उपलब्ध् नहीं हैं, के आयात पर व्यय करता है। ;खद्ध संसाध्नों का अध्िक क्षमता से उपयोगः जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय का संचालन एक सरल सि(ांत पर किया जाता है - उन वस्तुओं का उत्पादन करें जिसे आपका देश अध्िक क्षमता से कर सकता है तथा आध्िक्य उत्पादन को दूसरे देशों के उन उत्पादों से विनिमय कर लें जिनका वे अध्िक क्षमता से उत्पादन कर सकते हैं। जब राष्ट्र इस सि(ांत पर व्यापार करते हैं तो वे, यदि सभी वस्तु एवं सेवाओं का स्वयं ही उत्पादन करें, तो इससे अध्िक उन वस्तुओं का उत्पादन कर सवेंफगे जिनका वह भली - भंाति उत्पादन कर सकते हैं। इस प्रकार से सभी देशों की वस्तु एवं सेवाओं को एकत्रिात कर उसे समानता के आधर पर उनमें वितरित कर दिया जाए तो इससे व्यापार कर रहे सभी देशों को लाभ होगा। ;गद्ध विकास की संभावनाओं एवं रोजगार के अवसरों में सुधरः यदि उत्पादन केवल घरेलू उपभोग के लिए किया जाएगा तो इससे देश के विकास एवं रोजगार की संभावनाओं में रुकावट पैदा होगी। अनेक देश विशेषतः व्यवसाय अध्ययन विकासशील देश बड़े पैमाने पर उत्पादन की अपनी योजनाओं को इसलिए कायार्न्िवत नहीं कर सके क्योंकि घरेलू बाजार में आध्िक्य उत्पादन की खपत नहीं थी इसीलिए वह रोजगार के अवसर भी पैदा नहीं कर सके। वुफछ समय बाद वुफछ देश जैसे सिंगापुर, दक्ष्िाणी कोरिया एवं चीन ने विदेशों में अपने माल की बिव्रफी पर ध्यान दिया तथा नियार्त करों एवं पफलों - पूफलों की रणनीति अपनाइर् एवं शीघ्र ही संसार के नक्शे में चोटी के निष्पादक बन गये। इससे न केवल उनके विकास के अवसर बढे़ बल्िक इनके देशवासियों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा हुए। ;घद्ध जीवन स्तर में वृिः यदि वस्तु एवं सेवाओं का अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार नहीं होता तो विश्व समुदाय के लिए दूसरे देशों में उत्पादित वस्तुओं का उपभोग संभव नहीं होता। आज वह इनका उपभोग कर अपने भी उच्च जीवन स्तर का आनन्द ले रहे हैं। पफमो± को लाभ ;कद्ध उच्च लाभ की संभावनाएँः अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में घरेलू व्यवसाय की तुलना में अध्िक लाभ प्राप्त होता है। जब घरेलू बाजार में मूल्य कम हो तो उन देशों में माल बेचकर लाभ कमाया जा सकता है जिनमें मूल्य अध्िक है। ;खद्ध बढ़ी हुइर् क्षमता का उपयोगः कइर् इकाइयाँ घरेलू बाजार में उनकी वस्तुओं की मांग से कहीं अध्िक क्षमता स्थापित कर लेते हैं। बाह्य विस्तार एवं अन्य देशों के ग्राहकों से आदेश प्राप्त करने की योजना के द्वारा वह अपनी अतिरिक्त उत्पादन क्षमता के उपयोग की सोच सकते हैं तथा व्यवसाय की लाभप्रदता को बढ़ा सकते हैं। बड़े पैमाने पर उत्पादन से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। जिससे उत्पादन लागत में कमी आती है तथा प्रति इकाइर् लाभ में वृि होती है। ;गद्ध विकास की संभावनाएँः व्यावसायिक इकाइयों में उस समय निराशा व्याप्त हो जाती है जब घरेलू बाजार में उनके उत्पादों की मांग में ठहराव आने लगता है। ऐसी इकाइयाँ विदेशी बाजार में प्रवेश कर अपने विकास के अवसर कापफी हद तक बढ़ा सकती हैं। यही कारण है जिसने विकसित देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को विकासशील देशों के बाजार में प्रवेश के लिए प्रेरित किया है। जब उनके अपने देश में मांग लगभग परिपूणर्ता पर पहुँच चुकी है तभी विकसित देशों में उनकी वस्तुओं को बहुत पसंद किया जाने लगा तथा वहाँ इनकी मांग बड़ी तेजी से बढ़ी। ;घद्ध आंतरिक बाजार में घोर प्रतियोगिता से बचावः जब आंतरिक बाजार में गहन प्रतियोगिता हो तब पयार्प्त विकास के लिए अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार ही एक मात्रा उपाय है। घरेलू बाजार में गहन प्रतियोगिता के कारण कइर् कंपनियाँ अपने उत्पादों के लिए बाजार की तलाश में विदेशों को पलायन करती हैं। अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय इस प्रकार से उन पफमार्ंें के लिए विकास की सीढ़ी का काम करता है जिन्हें घरेलू बाजार में भारी प्रतियोगिता का सामना करना पड़ रहा है। ;घद्ध व्यावसायिक दृष्िटकोणः कइर् कंपनियों के अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय का विकास उनकी व्यावसायिक नीतियों अथवा रणनीतिगत प्रबंध्न का एक भाग है। अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसायी बनने की आकांक्षा, विकास की तीव्र इच्छा, अध्िक प्रतियोगी होने की आवश्यकता, विविध्ि करण की आवश्यकता एवं अंतरार्ष्ट्रीयकरण के लाभ प्राप्ित का परिणाम है। 11.2 अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश की विध्ियाँ सरल शब्दों में विध्ि का अथर् है वैफसे या किस मागर् से। इसलिए ‘अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश की विध्ि’ वाक्य खंड का अथर् है अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश के विभ्िान्न तरीके। अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय का अथर् एवं क्षेत्रा की परिचचार् करते समय हमने अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश के वुफछ मागार्ें के संबंध् में बताया। आगे के अनुमान में हम अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश की वुफछ महत्त्वपूणर् प्रणालियों पर उनके लाभ एवं सीमाओं सहित परिचचार् करेंगे। इस चचार् से आप यह जान जाएँगे कि किन परिस्िथतियों में कौन - सी प्रणाली अध्िक उपयुक्त है। 11.2.1 आयात एवं नियार्त नियार्त से अभ्िाप्राय वस्तु एवं सेवाओं को अपने देश से दूसरे देश को भेजने से है। इसी प्रकार से आयात का अथर् है विदेशों से माल का व्रफयकर अपने देश में लाना। एक पफमर् आयात और नियार्त दो तरीकों से कर सकती है प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष आयात/नियार्त। प्रत्यक्ष आयात/नियार्त में पफमर् स्वयं विदेशी व्रेफता/आपूतिर्कतार् तक पहुँचती है तथा आयात/नियार्त से संबंिात सभी औपचारिकताओं, जिनमें जहाज में लदान एवं वित्तीयन भी सम्िमलित है, को स्वयं ही पूरा करती है। दूसरी ओर अप्रत्यक्ष आयात/नियार्त वह है जिसमें पफमर् की भागीदारी न्यूनतम होती है तथा वस्तुओं के आयात/नियार्त से संबंध्ित अध्िकांश कायर् को वुफछ मध्यस्थ करते हैं जैसे अपने ही देश में स्िथत नियार्त गृह या विदेशी ग्राहकों से व्रफय करने वाले कायार्लय तथा आयात के लिए थोक आयातक। इस प्रकार की पफमर्ें नियार्त की स्िथति में विदेशी ग्राहकों से एवं आयात में आपूतिर्कत्तार्ओं से सीध्े व्यवहार नहीं करती हैं। लाभ नियार्त के प्रमुख लाभ निम्नलिख्िात हैंः - ;कद्ध प्रवेश के अन्य माध्यमों की तुलना में अंतरार्ष्ट्रीय बाजार में प्रवेश की आयात/नियार्त सबसे सरल प(ति है। यह संयुक्त उपव्रफमों की स्थापना एवं प्रबंध्न से या विदेशों मंे स्वयं के स्वामित्व वाली सहायक इकाइयों की तुलना में कम जटिल वि्रफया है। ;खद्ध आयात/नियार्त में संब(ता कम होती है अथार्त् इसमें व्यावसायिक इकाइयों को उतना धन एवं समय लगाने की आवश्यकता नहीं है जितना कि संयुक्त उपव्रफम में सम्िमलित होने या पिफर मेहमान देश में विनिमार्ण संयंत्रा एवं सुविधाओं को स्थापित करने में लगाया जाता है। व्यवसाय अध्ययन ;गद्ध क्योंकि आयात/नियार्त में विदेशों में अिाक निवेश की आवश्यकता नहीं होती है इसीलिए विदेशों में निवेश की जोख्िाम शून्य होता है या पिफर अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश के अन्य माध्यमों की तुलना में यह बहुत ही कम होता है। आयात/नियार्त की सीमाएँ: अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश माध्यम के रूप में आयात/नियार्त की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिख्िात हैंः ;कद्ध आयात/नियार्त में वस्तुओं को भौतिक रूप से एक देश से दूसरे देश को लाया ले जाया जाता है। इसलिए इन पर पैकेजिंग, परिवहन एवं बीमा की अतिरिक्त लागत आती है। विशेष रूप से यदि वस्तुएँ भारी हैं तो परिवहन व्यय आयात/नियार्त में बाध्क होता है। दूसरे देश में पहुँचने पर इन पर सीमा शुल्क एवं अन्य कर लगते हैं एवं खचेर् होते हैं। इन सभी खचोर् के प्रभाव स्वरूप उत्पाद की लागत में कापफी वृि हो जाती है तो वह कम प्रतियोगी हो जाते हैं। ;खद्ध जब किसी देश में आयात पर प्रतिबंध् लगा होता है तो वहाँ नियार्त नहीं किया जा सकता है। ऐसी स्िथति में पफमोर्ंं के पास केवल अन्य माध्यमों का ही विकल्प रह जाता है जैसे लाइसेंसिंग/पैं्रफचाइजिंग या पिफर संयुक्त उपव्रफम। इनके कारण दूसरे देशों में स्थानीय उत्पादन एवं विपणन के माध्यम से उत्पादों को उपलब्ध् कराना संभव हो जाता है। ;गद्ध नियार्त इकाइयाँ मूलरूप से अपने गृह देश से प्रचालन करती हैं। वे अपने देश में उत्पादन कर उन्हें दूसरे देशों में भेजती हैं। नियार्त पफमोर्ंं के कायर्कारी अध्िकारियों वफा अपनी वस्तुओं के प्रवतर्न के लिए अन्य देशों की गिनी चुनी यात्राओं को छोड़कर इनका विदेशी बाजार से और अध्िक संपवर्फ नहीं हो पाता। इससे नियार्त इकाइयाँ स्थानीय निकायों की तुलना में घाटे की स्िथति में रहती है क्योंकि स्थानीय निकाय ग्राहकों के कापफी समीप होते हैं तथा उन्हें भली - भांति समझते भी हैं। उपरोक्त सीमाओं के होते हुए सभी जो पफमे± अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय को प्रारंभ कर रहीं हैं उनके लिए आयात/नियार्त ही पहली पसंद है। जैसाकि साधरणतः होता है व्यावसायिक इकाइयाँ विदेशों से व्यापार पहले आयात/नियार्त से ही प्रारंभ करते हैं और जब वह विदेशी बाजार से परिचित हो जाते हैं तो अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय प्रचालन के अन्य स्वरूपों को अपनाने लगते हैं। 11.2.2 संविदा विनिर्मार्ण संविदा विनिमार्ण अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय का वह स्वरूप है जिसमें एक पफमर् विदेशों में अपनी आवश्यकता के अनुसार घटक एवं वस्तुओं के उत्पादन के लिए स्थानीय विनिमार्ता अथवा विनिमार्ताओं से अनुबंध् कर लेते हैं। ठेके पर विनिमार्ण को बाह्य स्रोतीकरण भी कहते हैं। इसके तीन प्रमुख प्रकार होते हैंः ;कद्ध वुफछ घटकों का उत्पादन जैसे स्वचालित वाहनों का घटक या पिफर जूतों के उफपर के भाग। इन घटकों को बाद में कार एवं जूते बनाने में प्रयोग में लाया जाता है। ;खद्ध घटकों को समुच्चय कर अंतिम उत्पाद में परिवतिर्त करना जैसे हाडर्डिस्क, मदरबोडर्, फ्रलाॅपी डिस्क ड्राइव तथा माॅडम चित्त का समुच्चय कर वंफप्यूटर बनाना। ;गद्ध वुफछ वस्तुओं का पूणर् रूप से उत्पादन जैसे सिले सिलाए वस्त्रा। वस्तुओं का उत्पादन अथवा संमुच्चयीकरण विदेशी वंफपनियों द्वारा प्रदत्त तकनीक एवं प्रबंध् दिशानिदेर्श के अनुसार स्थानीय उत्पादकों के द्वारा किया जाता है। इन उत्पादित अथवा समुच्चय की गइर् वस्तुओं को यह स्थानीय उत्पादक अंतरार्ष्ट्रीय पफमोर्ंं को सौंप देते हैं जो इन्हें या तो अपने अंतिम उत्पादों के लिए प्रयोग में लाते हैं या पिफर अपने गृह देश, मेहमान देश एवं अन्य देशों में अपने ब्रांड के नाम से विव्रफय करते हैं। जितने भी प्रमुख ब्रांड हैं जैसे नाइक, री बाॅक, लीविस एवं रैंगलर यह सभी अपने उत्पाद अथवा घटकों का उत्पादन विकासशील देशों में ठेके पर ही कराते हैं। लाभ ठेके पर उत्पादन के अंतरार्ष्ट्रीय कंपनी एवं विदेशों एवं स्थानीय उत्पादक दोनों को अनेक लाभ हैं। जो इस प्रकार हैंः ;कद्ध इससे अंतरार्ष्ट्रीय पफमेर्ं बिना उत्पादन सुविधाओं की स्थापना में पूँजी लगाए बड़े पैमाने पर वस्तुओं का उत्पादन करा लेती हैं। यह पफमेर्ं दूसरे देशों में पहले से ही उपलब्ध् उत्पादन सुविधओं का उपयोग करती हैं। ;खद्ध बाह्य देशों में इनकी कोइर् पूँजी नहीं लगी होती या पिफर बहुत कम लगी होती है इसलिए बाह्य देशों में निवेश मे कोइर् जोख्िाम नहीं उठानी पड़ती। ;गद्ध ठेके पर उत्पादन का अंतरार्ष्ट्रीय कंपनी को एक और लाभ कम लागत पर उत्पादन या एकत्राीकरण है विशेष रूप से यदि स्थानीय उत्पादनकतार् ऐसे देशों के हैं जहाँ कच्चामाल एवं श्रम सस्ता है। ;घद्ध बाह्य देशों के स्थानीय उत्पादकों को भी ठेके पर उत्पादन का लाभ मिलता है। यदि उनकी उत्पादन क्षमता उपयोग में नहीं आ रही है तो ठेके पर उत्पादन का काम एक प्रकार से उन्हें उनके उत्पादों के लिए तैयार बाजार देता है तथा उनकी उत्पादन क्षमताओं के अध्िक उपयोग को सुनिश्िचत करता है। गोदरेज समूह भारत में ठेका उत्पादन से इसी प्रकार लाभांवित हो रहा है। यह अनुबंध् के अध्ीन कइर् बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए नहाने के साबुन का उत्पादन कर रहा है जैसे रैकिट एंड कोलमैन के लिए डिटोल साबुन। इससे इसकी साबुन का उत्पादन के अतिरिक्त क्षमता को उपयोग करने में सहायता मिल रही है। ;कद्ध स्थानीय उत्पादक को भी अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में सम्िमलित होने का अवसर मिलता है तथा यदि अंतरार्ष्ट्रीय निकाय इन उत्पादित वस्तुओं की अपने देश को आपूतिर् करते हैं या पिफर किसी अन्य देश को भेजते हैं तो नियार्त पफमोर्ंं को मिलने वाले प्रोत्साहन का लाभ भी मिलता है। व्यवसाय अध्ययन हानियाँ संविदा विनिमार्ण की अंतरार्ष्ट्रीय निकायों स्थानीय उत्पादकों को प्रमुख हानियाँ निम्नलिख्िात हैंः ;कद्ध स्थानीय पफमेर्ं यदि उत्पादन डिजाइन एवं गुणवत्ता मान के अनुरूप कायर् नहीं करती हैं तो इससे अंतरार्ष्ट्रीय पफमर् को गुणवत्ता उत्पादन की कठिन समस्या पैदा हो सकती है। ;खद्ध बाह्य देश के स्थानीय उत्पादक का उत्पादन प्रवि्रफया पर कोइर् नियंत्राण नहीं रहता क्योंकि वस्तुओं का उत्पादन अनुबंध् में निधर्रित शतो± एवं विश्िाष्ट वणर्न के अनुसार किया जाता है। ;गद्ध संविदा विनिमार्ण के अंतगर्त उत्पादन करने वाली स्थानीय इकाइर् अपनी इच्छानुसार इस माल को नहीं बेच सकती। इसे अपने माल को अंतरार्ष्ट्रीय कंपनी को पूवर् निधार्रित मूल्य पर ही बेचना होगा। खुले बाजार में इन वस्तुओं की मूल्य यदि अुनबंध्ित मूल्य से अिाक है तो स्थानीय पफमर् को इससे कम लाभ प्राप्त होगा। 11.2.3 अनुज्ञप्ित लाइसैंस एवं मतािाकारी लाइसैंस प्रदान करना एक ऐसी अनुबंध्ीय व्यवस्था है जिसमें एक पफमर् बाह्य देश की दूसरी पफमर् को पफीस, जिसे राॅयल्टी कहते हैं, के बदले में अपने पेटेंट अध्िकार, व्यापार के रहस्य या पिफर तकनीक दे देता है। जो पफमर् दूसरी पफमर् को इस प्रकार का लाइसैंस प्रदान करती है वह लाइसैंस प्रदानकतार् एवं बाह्यदेश की जो पफमर् इस प्रकार के अध्िकार प्राप्त करती है को केवल तकनीक का ही अुनज्ञप्ित लाइसेंस नहीं दिया जाता बल्िक पैफशन उद्योग में कइर् डिजाइन कतार् अपने नाम के प्रयोग करने का लाइसेंस दे देते हैं। कभी - कभी दो इकाइयों के बीच तकनीक का आदान - प्रदान भी होता है। इसी प्रकार से दो पफमोर्ं के बीच ज्ञान, तकनीक एवं पेटेंट अध्िकार का पारस्परिक विनिमय होता है। इसे प्रति अनुज्ञप्ित लाइसैंस कहते हैं। मताध्िकारी अनुज्ञप्ित लाइसैंस से बहुत मिलता जुलता है। दोनों में एक प्रमुख अंतर है कि पहले का प्रयोग वस्तुओं उत्पादन एवं विनिमय के लिए होता है तो मताध्िकारी का प्रयोग सेवाओं के संदभर् में किया जाता है। दूसरा अंतर है कि विशेषाध्िकार अनुज्ञप्ित से अध्िक कठोर होता है। विशेषाध्िकार प्रदानकतार् साधरणतया विशेषाध्िकार प्राप्तकतार्ओं अपने व्यवसाय का प्रचालन किस प्रकार से करना चाहिए। इस संबंध् में सख्त नियम एवं शतंेर् रखते हैं। इन दो अंतरों को छोड़कर विशेष अध्िकार अनुज्ञप्ित के समान ही है। जैसा कि अुनज्ञप्ित में होता है विशेषाध्िकार समझौते में भी एक पक्ष दूसरे पक्ष को तकनीक, टैªडमावर्फ एवं पेटेन्ट को एक तय प्रतिपफल के बदले निश्िचत समय के लिए उपयोग करने का अिाकार देता है। अविभावक कंपनी को विशेषािाकार प्रदानकत्तार् एवं समझौते के दूसरे पक्ष को विशेषाध्िकार प्राप्तकतार् कहते हैं। प्रैंफचाइजर कोइर् भी सेवा प्रदान करने वाला जैसे एक जलपान गृह, होटल, यात्रा एजेंसी, बैंक, थोक विव्रेफता या पिफर पुफटकर विव्रेफता हो सकता है जिसने कि अपने नाम या टैªडमावर्फ के अध्ीन सेवाओं के निमार्ण एवं विपणन के विशेष तकनीक का विकास किया हो। विश्िाष्ट तकनीक के कारण ही प्रैफचांइजर अपने प्रतियोगियों से अध्िक श्रेष्ठ हो जाता है तथा इससे संभावित सेवा प्रदानकतार् विशेषाध्िकार प्रणाली में सम्िमलित होने के लिए तैयार हो जाते हैं। मैक्डोनाल्ड, विशेषाध्िकार ;प्रैंफचाइजिंगद्ध मूल रूप से अनुज्ञप्ित का एक विश्िाष्ट स्वरूप है जिसमें प्रैंफचाइजर न केवल अमूतर् परिसंपिा ;साधरणतया ट्रेडमावर्फद्ध को विशेषाध्िकार प्राप्तकतार् ;प्रैंफचाइजीद्ध को बेच देता है बल्िक इस पर भी जोर देता है कि प्रैफंचाइजी व्यवसाय का संचालन किस प्रकार से करें। इसके संबंध् में नियमों के मानने के लिए सहमत हों। चाल्सर्, डब्ल्यू. एल. हिलप्रैंफचाइजिंग अनुज्ञप्ित का ही एक स्वरूप है जिसमें जनक कंपनी ;प्रैफंचाइजरद्ध अन्य स्वतंत्रा इकाइर् ;प्रैफंचाइजीद्ध को एक निधर्रित तरीके से व्यवसाय संचालन का अध्िकार देती है। यह अध्िकार प्रैंफचाइजर के उत्पादों को उसका नाम, उत्पादन एवं विपणन तकनीक का प्रयोग करते हुए बेचने के रूप में अथवा सामान्य व्यवसाय के रूप में हो सकता है। डोनैल्ड डब्ल्यू हैकेट पीशाहट एवं वाॅलमाटर् वुफछ अग्रणी विशेषािाकार प्रदानकतार् ;प्रैफंचाइजरद्ध हैं जो पूरे विश्व में प्रचालन कर रहे हैं। लाभ संयुक्त उपव्रफम एवं पूणर्स्वामित्व सहायक इकाइयांे की तुलना में अनुज्ञप्ित/प्रैंफचाइजिंग विदेशी व्यापार में प्रवेश का सबसे सरल मागर् है जिसमें परखा हुआ माल/तकनीक होता है तथा जिसमें न अध्िक जोख्िाम है और न ही अध्िक निवेश की आवश्यकता। अनुज्ञप्ित के वुफछ विश्िाष्ट लाभ निम्नलिख्िात हैं। ;कद्धअनुज्ञप्ित/प्रैंफचाइजिंग प्रणाली में अनुज्ञप्ितदाता/ प्रैंफचाइजर व्यवसाय को स्थापित करता है एवं इसमें अपनी पूँजी लगाता है। अथार्त् अनुज्ञप्ितदाता/प्रैंफचाइजर एक प्रकार से दूसरे देशों में निवेश करता है। इसीलिए इसे अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश का एक महंगा माध्यम माना गया है। ;खद्धबहुत ही कम विदेशी निवेश के कारण अनुज्ञप्ितदाता/प्रैंफचाइजर को विदेशी व्यापार से होने वाली हानि में कोइर् भागीदारी नहीं होती। ;गद्ध अनुज्ञप्ित धरक/प्रैंफचाइजी से तब तक पूवर् निधर्रित पफीस का भुगतान मिलता रहेगा जब तक कि उसकी व्यावसायिक इकाइर् में उत्पादन अथवा विव्रफय होता रहेगा। ;घद्धबाह्य देश के व्यवसाय का प्रबंध् अनुज्ञप्ित धरक/प्रैंफचाइजी के द्वारा किया जाता है जो कि एक स्थानीय व्यक्ित होता है। इसीलिए सरकार द्वारा व्यवसाय के अिाग्रहण अथवा उसमें हस्तक्षेप का जोख्िाम कम होता है। व्यवसाय अध्ययन ;घद्धअनुज्ञप्ित धरक/प्रैंफचाइजी क्योंकि एक स्थानीय व्यक्ित होता है। उसे बाजार का अध्िक ज्ञान होता है तथा उसके संपवर्फ सूत्रा भी अध्िक होते हैं। इसका लाभ अुनज्ञप्ित दाता/प्रैंफचाइजर को अपने विपणन कायर् को सपफलतापूवर्क चलाने में मिलता है। ;चद्धअनुज्ञप्ित/प्रैंफचाइजिंग के अनुबंध् की शतो± के अनुसार इस अनुबंध् के पक्षों को ही अुनज्ञप्ित दाता/प्रैंफंचाइजर के काॅपीराइट, पेटेंट एवं ब्रांड के नाम का बाह्य देशों में उपयोग करने का कानूनी अध्िकार होता है। परिणामस्वरूप अन्य पफमो±, ट्रेडमावर्फ एवं पेटेंट्स का उपयोग नहीं कर सकती। सीमाएँ एक अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय के साध्न के रूप में अनुज्ञप्ित/विशेषाध्िकार ;प्रैंफचाइजिंगद्ध की वुफछ कमियाँ हैं जो निम्नलिख्िात हैंः ;कद्धअनुज्ञप्ितधरक/प्रैंफचाइजी जब आध्िकारित वस्तुओं के विनिमार्ण एवं विपणन में निपुणता प्राप्त कर लेता है तो उसके द्वारा समान उत्पाद के थोड़े भ्िान्न ब्रांड के नाम में व्यापार करने का खतरा रहता है। इससे अनुज्ञप्ित दाता/प्रैंफचाइजर को भारी प्रतियोगिता का सामना करना पड़ सकता है। ;खद्ध यदि व्यापार के रहस्यों को भली प्रकार से गुप्त नहीं रखा गया तो विदेशी बाजार में दूसरों को इनका ज्ञान हो जायेगा। अनुज्ञप्ित धरक/प्रैंफइचाइजी की इस चूक के कारण अनुज्ञप्ित दाता/प्रैंफचाइजर को भारी हानि हो सकती है। ;गद्ध वुफछ अवध्ि के पश्चात् अनुज्ञप्ित दाता/ प्रैंफचाइजर एवं अनुज्ञप्ित धरक/प्रैंफचाइजी के बीच खातों के रखने, राॅयल्टी का भुगतान एवं गुणवत्ता उत्पादों के उत्पादन के संबंध् में मानकों का पालन न करना जैसे मामलों पर मतभेद पैदा हो जाते हैं। इन मतभेदों के कारण मुकदमें शुरू हो जाते हैं जिससे दोनों पक्षों को हानि होती है। 11.2.4 संयुक्त उपव्रफम संयुक्त उपव्रफम बाह्य बाजार में प्रवेश का एक सामान्य माध्यम है। संयुक्त उपव्रफम का अथर् होता है दो या दो से अध्िक स्वतंत्रा इकाइयों के संयुक्त स्वामित्व में एक पफमर् की स्थापना। व्यापक अथोर् में यह भी संगठन का वह स्वरूप है जिसमें एक लंबी अवध्ि के लिए सहयोग की अपेक्षा की जाती है। एक संयुक्त स्वामित्व उपव्रफम को तीन प्रकार से बनाया जा सकता हैः ;कद्ध विदेशी निवेशक द्वारा स्थानीय कंपनी में हिस्सेदारी का व्रफय। ;खद्ध स्थानीय पफमर् द्वारा पूवर् स्थापित विदेशी पफमर् में हिस्सा प्राप्त कर लेना। ;गद्ध विदेशी एवं स्थानीय उद्यमी दोनों ही मिलकर एक न एक उद्यम की स्थापना कर लें। लाभ संयुक्त उपव्रफम के वुफछ प्रमुख लाभ इस प्रकार हैंः ;कद्ध इस प्रकार के उपव्रफमों की समता पूँजी में स्थानीय साझी का भी योगदान होता है, इसलिए अंतरार्ष्ट्रीय पफमर् पर विश्वव्यापी विस्तार में कम वित्तीय भार पड़ेगा। ;खद्धसंयुक्त उपव्रफमों के कारण बड़ी पूँजी एवं श्रमशक्ित वाली बड़ी योजनाओं को कायार्न्िवत करना संभव हो पाता है। ;गद्ध विदेशी व्यावसायिक इकाइयों को स्थानीय साझी के मेहमान देश की प्रतियोगी परिस्िथतियों, संस्वृफति, भाषा, राजनीतिक प्रणाली एवं व्यावसायिक प(तियों के संबंध् में जानकारी का पूरा लाभ प्राप्त होता है। ;घद्धकइर् मामलों में विदेशी व्यापार में प्रवेश करना खचीर्ला एवं जोख्िाम भरा भी होता है। संयुक्त उपव्रफम करार के द्वारा इस प्रकार की लागत एवं जोख्िाम को बाँटने के माध्यम से इनसे बचा जा सकता है। हानियाँ संयुक्त उपव्रफम की प्रमुख सीमाओं का वणर्न नीचे किया गया हैः ;कद्ध विदेशी पफमेर्ं जो संयुक्त उपव्रफम में साझा करती हैं वह अपनी प्रौद्योगिकी एवं व्यापार के राज विदेशी स्थानीय पफमर् के साथ बाँटती है इससे प्रौद्योगिकी एवं व्यापार के राज दूसरों को उजागर किये जाने का भय रहता है। ;खद्धद्विस्वामित्व व्यवस्था में विरोधभास की संभावना रहती है जिससे निवेशक इकाइयों के बीच नियंत्राण की लड़ाइर् हो सकती है। 11.2.5 संपूणर् स्वामित्व वाली सहायक इकाइयाँ/कंपनियाँ अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय का यह माध्यम उन कंपनियों की पंसद होती है जो अपने विदेशों में परिचालन पर पूणर् नियंत्राण चाहते हैं। जनक कंपनी अन्य देश में स्थापित कंपनी में 100 प्रतिशत पूँजी निवेश कर पूणर् नियंत्राण प्राप्त कर लेती है। संपूणर् स्वामित्व वाली सहायक कंपनी की स्थापना दो प्रकार से की जा सकती हैः ;कद्ध विदेशों में परिचालन प्रारंभ के लिए एक बिल्वुफल ही नइर् कंपनी स्थापित करना। इसे ‘हरित क्षेत्रा उपव्रफम’ भी कहते हैं। ;खद्ध दूसरे देश में पहले से ही स्थापित संगठन का अध्िग्रहण कर लेना तथा मेहमान देश में इसी इकाइर् के माध्यम से अपने उत्पादों का उत्पादन एवं संवधर्न करना। लाभ विदेश में एक संपूणर् स्वामित्व वाली सहायक कंपनी के वुफछ प्रमुख लाभ नीचे दिए गए हैंः ;कद्धजनक कंपनी अपने विदेश की वि्रफयाओं पर पूरा नियंत्राण रख सकती है। ;खद्धजनक कंपनी क्योंकि अपनी विदेशी सहायक कंपनी के प्रचलन पर नशर रखती है इससे इसके प्रौद्योगिकी एवं व्यापार के राज दूसरों पर नहीं खुलते। व्यवसाय अध्ययन सीमाएँ किसी अन्य देश में पूणर् रूप से अपने स्वामित्व में सहायक कंपनी की स्थापना की सीमाएँ निम्नलिख्िात हैंः ;कद्धजनक कंपनी को विदेशी सहायक कंपनी की पूँजी में 100 प्रतिशत निवेश करना होगा। इस प्रकार का अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय छोटी एवं मध्य आकार की इकाइयों के लिए उपयुक्त नहीं हैं जिनके पास विदेशों में निवेश के लिए पयार्प्त ध्न नहीं है। ;खद्धअब क्योंकि जनक कंपनी को ही विदेशी सहायक कंपनी की 100 प्रतिशत समता पूँजी में ध्न लगाया होता है इसीलिए यदि इसकी विदेशी व्यापारिक कायर् असपफल रहते हैं तो उसकी पूरी हानि इसी को वहन करनी होगी। ;गद्ध वुफछ देश अपने देश में अन्य देश के व्यक्ितयों द्वारा शतप्रतिशत स्वामित्व वाली सहायक कंपनी की स्थापना के विरु( होते हैं। इस प्रकार से विदेशों में व्यवसाय संचालन को बड़ा राजनीतिक जोख्िाम उठाना पड़ता है। 11.3 विश्व व्यवसाय में भारत की भागीदारी आज भारत विश्व की 10वीं सबसे बड़ी एवं चीन के पश्चात् सबसे तेजी से विकसित हो रही अथर्व्यवस्था है। 11.3.1 भारत का विदेशी व्यापार वस्तुओं में पूरे विश्व के व्यापार में भारत का हिस्सा बहुत कम है। आयात एवं नियार्त हमारे देश की प्रमुख आथ्िार्क वि्रफयाएँ हैं। विदेशी व्यापार में तेजी से हो रही वृि के कारण देश के सकल देशीय ;घरेलूद्ध उत्पाद में विदेशी व्यापार का हिस्सा 1990 - 91 के 14.6 प्रतिशत से बढ़कर 2003 - 04 में 24.1 प्रतिशत हो गया। यदि संपूणर्ता में देखें तो आयात एवं नियार्त दोनों में पिछले वषा±े में असाधरण वृि हुइर् है। 1950 - 51 में भारत से माल का वुफल नियार्त 606 करोड़ रु था, जो 2003 - 04 में 293367 करोड़ रु हो गया। अथार्त पिछले पाँच दशक में लगभग 480 गुणा वृि हुइर् ;देखंे तलिका 11.2द्ध देश के आयात में भी इसी प्रकार से आशा से अध्िक वृि हुइर् है। 1950 - 51 में देश में वुफल नियार्त 608 करोड़ रु का हुआ जो 2003 - 04 में बढ़कर 359108 करोड़ रु हो गया अथार्त् इस दौरान 590 गुणा वृि हुइर्। मिश्रण की दृष्िट से देखें तो कपड़ा एवं सिले - सिलाए वस्त्रा, रत्न एवं जेवरात, इंजीनियरिंग उत्पाद एवं रसायन तथा संबंध्ित उत्पाद एवं वृफष्िा तथा वृफष्िा सहायक उत्पाद भारत के नियार्त की प्रमुख मदें हैं ;देखें तालिका 11.3द्ध। संपूणर्ता की दृष्िट से देखें तो विश्व के वुफल नियार्त में भारत का योगदान मात्रा 0.8 प्रतिशत है। लेकिन यदि अकेले उत्पादों को लें तो चाय, मोती, बेशकीमती एवं अथर् कीमती पत्थर, दवाइयाँ एवं औषध्ियाँ, चावल, कच्चा लोहा एवं चमड़ा तालिका 11.2 भारत का आयात - नियार्त: 1950 - 51 से 2003 - 04 ;मूल्य करोड़ रु मेंद्ध वषर् नियार्त1 आयात व्यापार शेष 1950 - 51 1960 - 61 1970 - 71 1980 - 81 1990 - 91 1995 - 96 2000 - 01 2001 - 02 2002 - 03 606 642 1535 6711 32553 106353 203571 209018 255137 608 1122 1634 12549 43198 122678 230873 245200 297206 - 2 - 480 - 99 - 5838 - 10645 - 16325 - 27302 - 36182 - 42069 2003 - 04 293367 359108 - 65741 स्रोतः डी.जी.सी.आइर्.एस नोटः पुनः नियार्त सम्िमलित हैं। तालिका 11.3 भारत का नियार्त वस्तुओं का संयोजन उत्पाद/वस्तुएँ प्रतिशत भाग 2002 - 03 2003 - 04 ;कद्ध प्राथमिक उत्पाद/वस्तुएँ 16.6 15.5 - वृफष्िा एवं वृफष्िा जनक 12.8 11.8 - कच्चा लोहा एवं खनिज पदाथर् 3.8 3.7 ;खद्ध निमिर्त वस्तुएँ 76.6 76.0 - कपड़ा - तैयार वस्त्रा भी सम्िमलित है 21.1 19.0 - रत्न एवं गहने 17.2 16.6 - इंजीनियरिंग वस्तुएँ/सामान 17.2 19.4 - रसायन एवं संबंध्ित वस्तुएँ 14.2 14.8 - चमड़ा एवं चमड़े से बना सामान 3.5 3.4 ;गद्ध पैट्रोलियम, कच्चा एवं इससे जुडे़ उत्पाद 4.9 5.6 ;घद्ध अन्य 1.9 2.9 वुफल नियार्त 100.0 100.0 तालिका 11.4 भारत के नियार्त वस्तुओं की संरचना उत्पाद/वस्तुएँ प्रतिशत भागीदारी 2002 - 03 2003 - 04 1 पैट्रोलियम तेल एवं लुवरी कैंट ;पीओएलद्ध 28.7 26.3 2 मोती, बेश्कीमती एवं अथर् कीमती पत्थर 9.9 9.1 3 पूँजीगत वस्तुएँ 12.1 13.3 4 इलैक्ट्रोनिक वस्तुएँ 9.1 9.6 5 सोना एवं चाँदी 7.0 8.8 6 रसायन 6.9 7.4 7 खाद्य तेल 3.0 3.3 8 कोक, कोयला एवं राख के गोले 2.0 1.8 9 कच्ची धतु एवं अवश्िाष्ट धतु 1.7 1.7 10 पेशे संबंध्ित उपकरण एवं चाक्षुवीय वस्तुएँ 1.8 1.6 11 अन्य 7.8 17.1 वुफल आयात 100.0 100.0 स्रोतः डी.जी.सी.आइर्.एस, कलकत्ता भारत सरकार के आथ्िार्क सवेर् 2004 - 2005 की रिपोटर्। एवं चमड़े से बनी वस्तुओं, सूती धगा, तैयार वस्त्रा एवं उससे बनी चीजें, सिले - सिलाए वस्त्रा एवं तंबाकू का हिस्सा कापफी अध्िक है जो कि 3 प्रतिशत से 13 प्रतिशत तक की श्रेणी में है। वुफछ मदों के नियार्त में भारत सबसे बड़ा नियार्तक होने के कारण विश्िाष्ट स्थान पाए हुए है। ये वस्तुएँ हैं - बासमती चावल, चाय एवं आयुवेर्दिक वस्तुएँ। जहाँ तक आयात का संबंध् है वस्तुएँ जैसे कच्चा तेल एवं पैट्रोलियम उत्पाद, पूँजीगत वस्तुएँ ;अथार्त् मशीनेंद्ध इलैक्ट्रॅानिक वस्तुएँ, मोती, कीमती एवं उच्च कीमती पत्थर, सोना एवं चाँदी एवं रसायन भारत की प्रमुख आयात की मदें हैं ;तालिका 11.4द्ध। भारत के प्रमुख व्यापार में साझी हैं यू.एसए., यू.के., बैलजियम, जमर्नी, जापान, स्वीट्शरलैंड, हाँगकाँग, यू.ए,इर्., चीन, सिंगापुर एवं मलेश्िाया। जबकि यू.एस.ए. भारत के वुफल व्यापार ;आयात - नियार्त दोनों को संमिलित करद्ध में 11.6 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हुए अग्रणी साझेदार है। अन्य देशों का हिस्सा 2003 - 04 में 2.1 प्रतिशत से 4.4 प्रतिशत की बीच रहा ;देखें सारिणी 11.5द्ध। 11.3.2 भारत का सेवाओं का व्यापार पिछले वषोर्ं में सेवा क्षेत्रा में व्यापार भी कइर् तालिका 11.5 भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदार देश भारत के वुफल व्यापार में ;आयात - नियार्तद्धप्रतिशत् भागीदारी 2002 - 03 2003 - 04 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 यू, एस. एयू. केबेलजीयम जमर्नी जापान स्िवटजरलैंड हाँगकंाग यू ए इर् चीन सिंगापुर मलेश्िाया उपयोग ;1 से 11द्ध अन्य 13.4 11.6 4.6 4..4 4.7 4.1 4.0 3.9 3.2 3.1 2.4 2.7 3.1 3.4 3.8 5.1 4.2 5.0 2.5 3.0 1.9 2.1 47.9 47.6 52.1 52.4 वुफल आयात 100.0 100.0 स्रोतः डी.जी.सी.आइर्.एस, कलकत्ता भारत सरकार के आथ्िार्क सवेर् 2004 - 2005तालिका 11.6 नियार्त 1960 - 61 1970 - 71 1980 - 81 1990 - 91 2000 - 01 2002 - 03 2004 - 05 - विदेश यात्रा 15 36 964 2613 16064 15991 18873 - परिवहन 45 109 361 1765 9364 12261 14958 - बीमा 8 12 51 199 1234 1783 1927 आयात - विदेश यात्रा 12 18 90 703 12741 16155 16111 - परिवहन 25 78 355 1961 16172 15826 10703 - बीमा 6 12 34 159 1004 1687 1672 गुणा बढ़ गया है। सारिणी 11.6 में भारत की तीन सेवाओं के आयात - नियार्त के आँकड़े दियें हैं जो भारत के लिए ऐतिहासिक रूप से महत्वपूणर् रहे हैं। तालिका से स्पष्ट है कि विदेश यात्रा, परिवहन एवं बीमा सेवाओं का आयात - नियार्त में पिछले चार दशकों में आश्चयर्जनक वृि हुइर् है। विलक्षणता सेवाओं के नियार्त की संरचना के परिवतर्न में है। साॅफ्रटवेयर एवं अन्य मिश्रित सेवाएँ ;पेशागत, तकनीकी एवं व्यावसायिक सेवाओं सहितद्ध भारत द्वारा नियार्तित सेवाओं का प्रमुख वगर् बनकर उभरी हैं। जबकि यात्रा एवं परिवहन का हिस्सा 1995 - 96 के 64.3 प्रतिशत से घटकर 2003 - 04 में 29.6 प्रतिशत रह गया है, इसी अवध्ि में साॅफ्रटवेयर की भागीदारी 10.2 प्रतिशत से बढ़कर 49 प्रतिशत हो गइर् है ;देखें तालिका 11.7द्ध। 11.3.3 भारत का विदेशी निवेश भारत के विदेशी निवेश - आवक एवं जावक दोनों - से संबंध्ित आंकड़े तालिका 11.8 में दिये हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि विदेशी निवेश के भारत में आगम एवं यहाँ से बहिगमर्न दोनों में ही आश्चयर्जनक वृि हुइर् तालिका 11.7 वुफल सेवा क्षेत्रा के नियार्त में प्रमुख सेवाओं प्रतिशत हिस्सा वषर् यात्रा परिवहन साफ्रटवेयर मिश्रित 1995 - 96 36.9 27.4 10.2 22.9 2000 - 01 21.5 12.6 39.0 21.3 2001 - 02 18.3 12.6 44.1 20.3 2002 - 03 16.0 12.2 46.2 22.4 2003 - 04 16.5 13.1 48.9 18.7 ;मूल्य करोड़ रु मेंद्ध तालिका 11.8 भारत में विदेशी निवेश का आगम एवं बहिगमर्न 1990 - 91 2000 - 01 2001 - 02 2002 - 03 2003 - 04 आगम 201 80824 73907 67756 151406 बहिगर्मन 19 54080 41987 47658 83616 शु( 182 26744 31920 22098 67592 है। जबकि विदेशी निवेश के आगम 1990 - 91 आश्चयर्जनक वृि हुइर् है जो कि 1990 - 91 में 201 करोड़ से 2003 - 04 में 151406 में मात्रा 19 करोड़ रु था और 2003 - 04 में करोड़ रु बढ़कर 2750 गुणा वृि हुइर् है। बढ़कर 83616 करोड़ रु हो गया अथार्त् वहीं भारत का विदेशों में निवेश में अध्िक 4927 गुणा वृि। मुख्य शब्दावली अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लाइसे¯सग ;अनुज्ञप्ितद्ध अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय पेटिका निवेश मतािाकारी वस्तु व्यापार नियार्त बा“य स्रोतीकरण अदृश्य व्यापार आयात संयुक्त उपक्रम विदेशी निवेश संविदा संपूणर् उपक्रम विनिमार्ण इकाइर्याँ/कंपनियाँ सारांश अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय/व्यापार का अथर्ः कोइर् देश अपनी सीमाओं से बाहर विनिमार्ण एवं व्यापार करता है तो उसे अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय कहते हैं। अंतरार्ष्ट्रीय अथवा बाह्य व्यवसाय को इस प्रकार से परिभाष्िात किया जा सकता है। यह वह व्यावसायिक वि्रफयाएँ हैं जो राष्ट्र की सीमाओं के पार की जाती हैं। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि बहुत से लोग अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय का अथर् अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार से लगाते हंै। अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय एक व्यापक शब्द है, जो विदेशों से व्यापार एवं वहां वस्तु एवं सेवाओं के उत्पादन से मिलकर बना है। अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय के कारणः अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय का आधरभूत कारण है कि देश अपनी आवश्यकता की वस्तुओं का भली प्रकार से एवं सस्ते मूल्य पर उत्पादन नहीं कर सकते। इसका कारण उनके बीच प्रावृफतिक संसाध्नों का असमान वितरण अथवा उनकी उत्पादकता में अंतर हो सकता है। वैसे विभ्िान्न राष्ट्रों में श्रम की उत्पादकता एवं उत्पादन लागत में भ्िान्नता विभ्िान्न सामाजिक - आथ्िार्क, भौगोलिक एवं राजनैतिक कारणों से होती है। इन्हीं कारणों से यह कोइर् असाध् ारण बात नहीं है कि कोइर् एक देश अन्य देशों की तुलना में श्रेष्ठ गुणवत्ता वाली वस्तुओं एवं कम लागत पर उत्पादन की स्िथति में हो। अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय बनाम घरेलू व्यवसायः अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय का संचालन एवं प्रबंध्न घरेलू व्यवसाय को चलाने से कहीं अध्िक जटिल है। घरेलू एवं अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में विभ्िान्न पहलूओं पर अंतर नीचे दिये गये हैं। ;कद्ध व्रेफता एवं विव्रेफताओं की राष्ट्रीयता ;खद्ध अन्य हिताथ्िार्यों की राष्ट्रीयता ;गद्ध उत्पादन के साध्नों में गतिशीलता ;घद्ध जीवन स्तर में वृि ;घद्ध व्यवसाय प(तियों एवं आचरण में अंतर ;चद्ध राजनीतिक प्रणाली एवं जोख्िामें ;छद्ध व्यवसाय के नियम एवं नीतियाँ ;जद्ध व्यावसायिक लेन - देनों के लिए प्रयुक्त मुद्रा अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय का क्षेत्राः अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय की प्रमुख वि्रफयाएं निम्नलिख्िात है। ;कद्ध वस्तुओं का आयात एवं नियार्त ;खद्ध सेवाओं का आयात एवं नियार्त ;गद्ध लाइसेंस एवं प्रैफंचाइजी ;घद्ध विदेशी निवेश अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय के लाभः अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में अनेक जटिलताओं एवं जोख्िामों के होते हुए भी यह राष्ट्रों एवं व्यावसायिक पफमार्ंें के लिए महत्वपूणर् हैं। राष्ट्रों को लाभः ;कद्ध विदेशी मुद्रा का अजर्न ;खद्ध संसाध्नों का अध्िक क्षमता से उपयोग ;गद्ध विकास की संभावनाओं एवं रोजगार के अवसरों में सुधर ;घद्ध जीवन स्तर में वृि पफमो± को लाभः ;कद्ध उच्च लाभ की संभावनाएँ ;खद्ध बढ़ी हुइर् क्षमता का उपयोग ;गद्ध विकास की संभावनाएँ ;घद्ध आंतरिक बाजार में घोर प्रतियोगिता से बचाव ;घद्ध व्यावसायिक दृष्िटकोण अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश की विध्ियाँः अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश की विध्ि’ वाक्य खंड का अथर् है अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश के विभ्िान्न तरीके। आयात एवं नियार्त संविदा विनिर्मार्ण अनुज्ञप्ित लाइसैंस एवं मतािाकारी संयुक्त उपव्रफम संपूणर् स्वामित्व वाली सहायक इकाइयाँ/कंपनियाँ विश्व व्यवसाय में भारत की भागीदारी भारत का विदेशी व्यापार वस्तुओं में भारत का सेवाओं का व्यापार भारत का विदेशी निवेश अभ्यास बहु विकल्प प्रश्न 1.प्रवेश के निम्न माध्यमों में से किसमें घरेलू विनिमार्ता पफीस के बदले अन्य देश के विनिमार्ता को अपनी बौिक परिसंपिायों, जैसे पेटेंट एवं ट्रेडमावर्फ, को प्रयोग करने का अध्िकार देता है। ;कद्धअनुज्ञप्ित ;खद्ध अनुबंध् ;गद्ध संयुक्त उपव्रफम ;घद्ध इनमें से कोइर् भी नहीं। 2. अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में समस्त उत्पादन अथवा उसके एक भाग का बाह्य स्रोतीकरण एवं विपणन वि्रफयाओं पर ध्यान वेंफदि्रत करने को कहते हैंः ;कद्धअनुज्ञप्ित ;खद्ध प्रैंफचाइजिंग ;गद्ध ठेके पर विनिमार्ता ;घद्ध संयुक्त उपव्रफम। 3. दो अथवा दो से अध्िक पफमोर्ं द्वारा मिलकर एक नइर् व्यावसायिक इकाइर् का निमार्ण, जोकि अपनी जनक इकाइयों से कानूनी रूप से स्वतंत्रा एवं पृथक है, को कहते हैं। ;कद्धठेके पर विनिमार्ण ;खद्ध प्रैंफचाइजिंग ;गद्ध संयुक्त उपव्रफम ;घद्ध अनुज्ञप्ित। 4.निम्न में से कौन - सा नियार्त व्यापार का लाभ नहीं है? ;कद्धअंतरार्ष्ट्रीय बाजार में प्रवेश का सरल मागर् ;खद्धतुलना में कम जोख्िाम ;गद्ध विदेशी बाजारों में सीमित उपस्िथति ;घद्ध निवेश की आवश्यकता कम। 5.प्रवेश के निम्न मागांेर् में से किसमें जोख्िाम अध्िक है? ;कद्ध अनुज्ञप्ित ;खद्ध प्रैंफचाइजिंग ;गद्ध ठेके पर विनिमार्ण ;घद्ध संयुक्त उपव्रफम। 6. प्रवेश के निम्न माध्यमों में से किसमें विदेश में व्यवसाय पर सवार्ध्िक नियंत्राण की अनुमति होती है? ;कद्ध अनुज्ञप्ित/प्रैंफचाइजिंग ;खद्ध संपूणर् स्वामित्व वाली सहायक कंपनी ;गद्ध ठेके पर विनिमार्ण ;घद्ध संयुक्त उपव्रफम। 7. प्रवेश के निम्न माध्यमों में से कौन - सा माध्यम पफमर् को अंतरार्ष्ट्रीय बाजार के अध्िक समीप लाता है? ;कद्ध अनुज्ञप्ित ;खद्ध प्रैंफचाइजिंग ;गद्ध ठेके पर विनिमार्ण ;घद्ध संयुक्त उपव्रफम। 8.निम्न में से कौन सी मद भारत की प्रमुख नियार्त मदों में से एक नहीं है? ;कद्ध कपड़ा एवं वस्त्रा ;खद्ध रत्न एवं जेवरात ;गद्ध तेल एवं पैट्रोलियम उत्पाद ;घद्ध बासमती चावल। 9.निम्न में से कौन - सी मद भारत की प्रमुख आयात मदों में से एक नहीं है? ;कद्ध आयुवेर्दिक दवाइयाँ ;खद्ध तेल एवं पैट्रोलियम उत्पाद ;गद्ध मोती एवं कीमती पत्थर ;घद्ध मशीनरी। 10 निम्न में से कौन - सा देश भारत का प्रमुख व्यापारिक साझेदार नहीं है? ;कद्ध यू.एस.ए. ;खद्ध यू.के;गद्ध जमर्नी ;घद्ध न्यूजीलैंड। लघु उत्तरीय प्रश्न 1. अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार एवं अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में अंतभेर्द कीजिए। 2. अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय के किन्हीं तीन लाभों की व्याख्या कीजिए। अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार 1 3.दो देशों के बीच व्यापार के प्रमुख कारण क्या हैं? 4.विभ्िान्न देश व्यापार क्यों करते हैं? इसकी व्याख्या कीजिए। 5.ठेके पर विनिमार्ण/उत्पादन की सीमाओं का उल्लेख कीजिए। 6.ऐसा क्यों कहा जाता है कि अनुज्ञप्ित वैश्िवक विस्तार का सरल मागर् है। 7.विदेशों में ठेका उत्पादन एवं संपूणर् स्वामित्व वाली उत्पादन सहायक कंपनी में अंतभर्ेद कीजिए। 8.अनुज्ञप्ित एवं विशेषाध्िकार/प्रैंफचाइजिंग में अंतभर्ेद कीजिए। 9.भारत की नियार्त की प्रमुख मदों को सूचीब( कीजिए। 10.भारत से नियार्त की जाने वाली प्रमुख मदें कौन - कौन सी हैं? 11.उन प्रमुख देशों की सूची बनाइए जिनसे भारत का व्यापार है। दीघर् उत्तरीय प्रश्न 1.अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय क्या है? यह आंतरिक व्यवसाय से किस प्रकार भ्िान्न है? 2.अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार से अध्िक व्यापक है। विवेचना कीजिए। 3.अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय से व्यावसायिक इकाइयों को क्या लाभ हैं? 4.अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश हेतु नियार्त किस प्रकार से विदेशों में संपूणर् स्वामित्व कंपनियों की स्थापना से श्रेष्ठतर माध्यम है? 5.अंतरार्ष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश के चयन को शासित करने वाले तत्वों की संक्षेप में विवेचना कीजिए। 6.भारत के विदेशी व्यापार की प्रमुख प्रवृिा की विवेचना कीजिए। 7.अदृश्य व्यापार क्या है? भारतीय सेवा व्यापार के प्रमुख पक्षों की विवेचना कीजिए।

RELOAD if chapter isn't visible.