अध्याय 9 लघु व्यवसाय अिागम उद्देश्य इस अध्याय के अध्ययन के पश्चात् आपः ऽ लघु व्यवसाय के अथर् तथा उसकी प्रकृति की व्याख्या कर सवेंफगेऋ ऽ भारत में लघु व्यवसाय की भूमिका की व्याख्या कीजिएऋ ऽ लघु व्यवसाय की समस्याओं का विश्लेषण कर सवेंफगेऋ ऽ सरकार द्वारा लघु व्यवसाय को दी गइर् विभ्िान्न प्रकार की सहायता का वगीर्करण कर सवेंफगे, विशेषतः ग्रामीण एवं पहाड़ी क्षेत्रों में। अमर, अकबर और एंथनी तीन अच्छे मित्रा हैं जिन्होंने स्वूफली श्िाक्षा के उपरांत उद्यम में एक व्यावसायिक कोसर् पूरा किया है। नौकरी पाना मुश्िकल देखकर वे एक लघु व्यवसाय स्थापित करने की सोच रहे थे। जहाँ वे उन सभी कौशलों का प्रयोग कर सवेंफगे, जो उन्होंने उस कोसर्/पाठ्यक्रम में सीखे थे। यद्यपि उन्हें व्यवसाय का बहुत कम ज्ञान था, वे इस सोच में थे कि क्या व्यवसाय प्रारंभ किया जाए, कहाँ स्थापित किया जाए, किस प्रकार का माल व मशीनरी खरीदें, जो व्यवसाय के लिए आवश्यक हैं, कैसे पूँजी जुटाइर् जाए तथा कैसे विपणन किया जाए। तभी उन्होंने, रंगा रेंी जिला, जो आंध्र प्रदेश के बालानगर औद्योगिक क्षेत्रा के पास स्िथत है, द्वारा दी गइर् विज्ञप्ित पढ़ी, जो सरकार द्वारा आयोजित कायर्शाला के विषय में थी जिसका उद्देश्य लघु व्यवसाय में युवा उद्यमों को सहायता प्रदान करना था। इस सूचना से उत्साहित होकर तीनों मित्रों ने कायर्शाला में भाग लेने का निणर्य लिया। उन्हें ग्रामीण रोजगार वृि कायर्क्रम के अंतगर्त राज्य सरकारों द्वारा श्िाक्ष्िात युवकों को दी जाने वाली वित्त एवं अन्य सहायता के बारे में बताया गया। उन्होंने पाया कि ख्िालौनों की माँग थी, अतः उन्होंने ख्िालौनों का निमार्ण करने का निणर्य करने का निणर्य लिया, जिसके लिए अपने ही गाँव में उन्होंने खादी तथा ग्रामीण उद्योग आयोग से वित्तीय सहायता लेकर लघु व्यवसाय प्रारंभ करने का निणर्य लिया। आज, वे एक सपफल ख्िालौना निमार्ता हैं तथा भविष्य में उनकी नियार्त करने की भी योजना है। 9.1 परिचय पूवर् अध्याय में व्यवसाय की अवधारणा, व्यापार, वाण्िाज्य तथा उद्योग पर विचार - विमशर् किया गया था। वतर्मान अध्याय में व्यवसाय के आकार, लघु उद्योग तथा लघु व्यावसायिक इकाइयों के बारे में विचार - विमशर् करेंगे। यह लघु व्यवसाय की भूमिका तथा लघु क्षेत्राक इकाइयों की समस्याओं का भी उल्लेख करती हैं। तत्पश्चात् सरकार द्वारा लघु व्यवसाय को दी गइर् सहायता, विशेषतः ग्रामीण तथा पहाड़ी क्षेत्रों में, पर भी विचार - विमशर् किया गया है। 9.2 लघु व्यवसाय का अथर् तथा प्रकृति भारत में पारंपरिक तथा आधुनिक उद्योग दोनों ही ग्रामीण तथा लघु उद्योग क्षेत्रा में सम्िमलित हैं। इस क्षेत्रा के आठ उपसमूह हैं। ये हैं - हथकरघा, हस्तश्िाल्प, कोचॅर, सेरिकल्चर, खादी तथा ग्रामीण उद्योग, लघु - स्तरीय उद्योग तथा पाॅवरलूम। अंतिम दो, आधुनिक लघु उद्योग के अंतगर्त आती हैं जबकि अन्य सभी पारंपरिक उद्योगों के अंतगर्त आती हैं। भारत में ग्रामीण तथा लघु उद्योग मिलकर सबसे अिाक रोशगार अवसर उपलब्ध कराते हैं। इसके पहले कि हम लघु व्यवसाय का अथर् एवं प्रकृति को समझें, यह जानना महत्त्वपूणर् है कि हमारे देश में ‘आकार’ को कैसे परिभाष्िात किया जाता है, लघु उद्योग तथा लघु व्यावसायिक इकाइयों के संदभर् में। व्यावसायिक इकाइयों को मापने के लिए विभ्िान्न मापदंडों का प्रयोग किया जा सकता है जिनमें व्यवसाय में लगे हुए लोगों की संख्या, व्यवसाय में पूँजी निवेश, उत्पादन की मात्रा/मूल्य, व्यावसायिक ियाओं में बिजली का उपभोग इत्यादि सम्िमलित हैं। यद्यपि ऐसा कोइर् पैमाना नहीं है जिसकी कोइर् कमियाँ न हांे। आवश्यकता के आधार पर मापदंड भ्िान्न हो सकते हैं। लघु उद्योग का वणर्न करने के लिए भारत सरकार द्वारा प्रयोग की परिभाषा प्लांट तथा मशीनरी के विनियोग पर आधारित है। ये मापदंड भारत के सामाजिक - आथ्िार्क वातावरण को ध्यान में रखकर प्रयोग में लाए जाते हैं, जहाँ पूँजी का अभाव है तथा श्रम की अिाकता है। बड़े सेवा क्षेत्रा के उद्भव से सरकार ने यह आवश्यकता महसूस की, कि लघु पैमाने को उद्योग क्षेत्रा तथा संबंिात सेवा इकाइयों को एक ही वगर् में लाया जाए। लघु पैमाने के उद्यम विस्तारित होकर मध्यम पैमाने के उद्यमों में परिवतिर्त हो गये तथा दुनिया के तीव्र वैश्वीकरण के कारण प्रतिस्पधार्त्मक बने रहने के लिए उच्च स्तर की तकनीक अपनाने की आवश्यकता महसूस हुइर्। अतः यह आवश्यक हो गया कि ऐसे उपक्रमों को सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों के नाम से पुकारा जाए तथा इन्हें एकल वैधध्िक ढाँचा उपलब्ध् कराया व्यवसाय अध्ययन जाए। सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यम विकास ;एम.एस.एम.इर्.डी.द्ध अध्िनियम 2006 ऐसे उद्यमों से संबंध्ित परिभाषा, साख, विपणन तथा तकनीकी उन्नयन आदि मुद्दों की व्याख्या करता है। मध्यम पैमाने के उद्यम तथा सेवा संबंध्ी उद्यम भी इस अध्िनियम के कायर्क्षेत्रा में आ गए हैं। एम.एसएम.इर्.डी. अिानियम 2006, अक्तूबर 2006 से प्रभावी हो गया है। तद्नुसार उद्यम दो मुख्य श्रेण्िायों में वगीवृफत कर दिए गए हैं - विनिमार्णी उद्यम तथा सेवा उद्यम। विनिमार्णी उद्यम उद्योग ;विकास तथा विनियमनद्ध अध्िनियम 1951 की प्रथम अनुसूची में विश्िाष्िटवृफत किए गए किसी भी उद्योग से संबंध्ित माल के विनिमार्ण अथवा उत्पादन में संलग्न उद्यमों के मामले में निम्नलिख्िात तीन प्रकार के उद्यम होते हैं - 1.सूक्ष्म उद्यम - जहाँ संयत्रा एवं मशीनरी में 25 लाख रूपये से अध्िक का निवेश न हो। लघु उद्योग उद्यम की श्रेणी ऽनिमार्णी उद्यम निवेश सीमा ;रुपयेद्ध सेवा प्रदाता उद्यम निवेश सीमा ;रुपयेद्ध सूक्ष्म उद्यम 25 लाख तक 10 लाख तक लघु उद्यम 25 लाख से 5 करोड़ के बीच 10 लाख से 2 करोड़ के बीच मध्यम उद्यम 5 करोड़ से 10 करोड़ के बीच 2 करोड़ से 5 करोड़ के बीच ऽ प्लांट तथा मशीनरी में निवेश सीमा की गणना करते समय, प्रदूषण नियंत्राण, अनुसंधन एवं विकास, औद्योगिक सुरक्षा उपकरणों तथा अन्य ऐसी मदों की लागत को शामिल नहीं किया जाएगा। 2.लघु उद्यम - जहाँ संयत्रा एवं मशीनरी में निवेश 25 लाख रूपये से अध्िक हो, परंतु 5 करोड़ से अध्िक न हो। 3.मध्यम उद्यम - जहाँ संयत्रा एवं मशीनरी में निवेश 5 करोड़ रूपये से अध्िक हो परंतु 10 करोड़ रूपये से अध्िक न हो। सेवा उद्यम सेवा प्रदान करने वाले निम्न तीन प्रकार के उद्यम होते हैं - 1.सूक्ष्म उद्यम - जहांँ उपकरणों में निवेश 10 लाख रूपये से अध्िक न हो। 2.लघु उद्यम - जहाँ उपकरणों में निवेश 10 लाख रूपये से अध्िक हो परंतु यह 2 करोड़ रूपये से अध्िक न हो। 3.मध्यम उद्यम - जहाँ उपकरणों में निवेश 2 करोड़ रूपये से अध्िक हो परंतु यह 5 करोड़ रूपये से अध्िक न हो। ;कद्ध ग्रामीण उद्योग ग्रामीण उद्योग की परिभाषा में, कोइर् भी वे उद्योग जो ग्रामीण क्षेत्रा में स्िथत हों तथा बिना विद्युत के वस्तुओं का उत्पादन करते हों तथा सेवाएँ प्रदान करते हैं और जिनमें अचल पूँजी विनियोग प्रति व्यक्ित या प्रति कारीगर 50,000 से अिाक न हो, या कोइर् ऐसी राश्िा जो वंेफद्रीय सरकार द्वारा समय - समय पर विनिदेर्श्िात की जाती है। ;खद्ध वुफटीर उद्योग ये ग्रामीण उद्योग अथवा पारंपरिक उद्योग के 227 नाम से भी जाने जाते हैं। इनको पूँजी विनियोग के मापदंड से नहीं परिभाष्िात किया जाता, जैसा कि अन्य लघु स्तरीय उद्योगों में किया जाता है, तथापि वुफटीर उद्योगों की वुफछ विशेषताएँ हैं, जो निम्न हैं - ऽ इनका संगठन व्यक्ितयों द्वारा अपने निजी संसाधनों से किया जाता हैऋ ऽ साधारणतः ये पारिवारिक श्रम तथा स्थानीय उपलब्ध प्रतिभाओं का प्रयोग करते हैंऋ ऽ सरल औजारों का प्रयोगऋ ऽ पूँजी विनियोग का छोटा आकारऋ ऽ सरल वस्तुओं का उत्पादन, साधारणतः अपने ही परिसर मेंऋ तथा ऽ वस्तुओं के उत्पादन में देशी तकनीकों का प्रयोग। 9.3 लघुस्तर, कृष्िा तथा ग्रामीण उद्योग के लिए प्रशासनिक ढाँचा भारत सरकार ने लघुस्तरीय उद्योग एवं कृष्िा तथा ग्रामीण उद्योग मंत्रालय की संरचना, एक मुख्य मंत्रालय के रूप में की है, जो लघु स्तरीय उद्योगों की उन्नति एवं विकास के लिए नीतियों का निमार्ण करती हैं तथा वेंफद्रीय सहयोगों का संयोजन करती है। बाद में, सितंबर 2001 में यह मंत्रालय दो भ्िान्न मंत्रालयों में बँट गया, जो हैं - लघु स्तरीय उद्योग मंत्रालय एवं कृष्िा तथा ग्रामीण उद्योग मंत्रालय। लघु व्यावसायिक उद्योग मंत्रालय एस.एसआइर्॰ लघु व्यावसायिक इकाइयों की उन्नति तथा विकास के लिए नीतियों का निमार्ण करती है, कायर्क्रम तथा परियोजनाएँ बनाती है। लघु स्तरीय विकास संगठन एस.डी.ओ, जो विकास आयुक्त के कायार्लय के नाम से भी जानी जाती है और जो लघु स्तरीय उद्योग मंत्रालय से भी जुड़ी है जिसका उत्तरदायित्व सभी प्रतिपादित नीतियों एवं विभ्िान्न प्रकार के कायर्क्रमों का ियान्वयन तथा निरीक्षण करना है। खादी एवं ग्रामीण उद्योग के विकास, छोटी एवं सूक्ष्म इकाइयों के लिए, कृष्िा तथा ग्रामीण उद्योग मंत्रालय, एक मुख्य शाखा है। यह प्रधानमंत्राी की ‘रोजगार योजना’ को ियान्िवत करती है। कृष्िा तथा ग्रामीण उद्योगों से संबंिात विभ्िान्न नीतियाँ, कायर्क्रम एवं परियोजनाएँ इत्यादि का निष्पादन, खादी तथा ग्रामीण उद्योग आयोग हथकरघा बोडर्, कोयॅर बोडर् तथा सिल्क बोडर् द्वारा किया जाता है। लघु स्तरीय उद्योगों की उन्नति एवं विकास के लिए, राज्य सरकारें, अपने - अपने राज्यों में विभ्िान्न प्रकार की प्रोत्साहक एवं विकासात्मक परियोजनाओं को निष्पादित करती हैं। इनका निष्पादन राज्य उद्योग निदेर्शालय के द्वारा किया जाता है, जिनके अंतगर्त, जिला उद्योग वंेफद्र आते हैं और जो वंेफद्र तथा राज्य स्तरीय परियोजनाओं का ियान्वयन करती हैं। 9.4 भारत में लघु व्यवसाय की भूमिका देश के सामाजिक - आथ्िार्क विकास के संदभर् में, लघु उद्योगों के योगदान की दृष्िट से, भारत में लघु स्तरीय उद्योग एक विशेष स्थान रखते हैं। निम्नलिख्िात बिंदु उनके योगदान के महत्त्व को दशार्ते हैंः - ;कद्ध भारत में लघु उद्योग औद्योगिक इकाइयों के 95 प्रतिशत हैं। ये लगभग 40 प्रतिशत तक का सकल औद्योगिक उत्पाद मूल्य में तथा वुफल नियार्त का व्यवसाय अध्ययन 45 प्रतिशत ;प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष नियार्तद्ध योगदान देती हैं।;खद्ध कृष्िा के बाद लघु व्यवसाय द्वितीय सबसे बड़ा क्षेत्रा है, जो मानव संसाधनों का प्रयोग कर रोजगार सृजन करता है। ये बड़े उद्योगों के निवेश्िात पूँजी की तुलना में बड़ी संख्या के रोशगार के अवसर उत्पन्न करते हैं। इसलिए ये अिाक श्रम प्रधान हैं तथा कम पूँजी प्रधान हैं। यह भारत जैसे देश में, जहाँ श्रम का आिाक्य है, एक वरदान है। ;गद्ध हमारे देश में लघु उद्योग विविध प्रकारों की वस्तुओं का उत्पादन करती हैं जिनके अंतगर्त निम्न आते हैं - अिाकांश मात्रा में उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन, तैयार वस्त्रा, होशरी उत्पाद, लेखन सामग्री, साबुन तथा प्रक्षालक अपमाजर्क, घरेलू बतर्न, चमड़ा, प्लास्िटक तथा रबड़ उत्पाद, संशोिात खाद्य पदाथर् तथा सब्िजयाँ, लकड़ी तथा स्टील पफनीर्चर, मेश - वुफसीर्, रंग - रोगन रक्षक, माचिस इत्यादि। आधुनिक वस्तुओं के उत्पादन के अंतगर्त आते हैं - विद्युत तथा विद्युत संबंिात उत्पाद जैसे - टेलिविजन, गणक/गण्िात्रा, विविध चिकित्सा औशार, विद्युतीय श्िाक्षण सामग्री, जैसे - ओवरहैड, प्रोजेक्टर, वातानुवूफलित संयंत्रा, दवाइर्याँ एवं औषिा, कृष्िा औशार तथा यंत्रा एवं विभ्िान्न प्रकार के अन्य इंजीनियरिंग उत्पाद। हथकरघा, हस्तश्िाल्प तथा पारंपरिक ग्रामीण उद्योग के अन्य उत्पाद नियार्त की दृष्िट से विशेष स्थान रखते हैं। ;तालिका देखें जिसमें सरकार द्वारा वगीर्कृत मुख्य उद्योग समूह जो लघु व्यवसाय के अंतगर्त आते हैं, का उल्लेख है।द्ध लघुस्तरीय क्षेत्रा में मुख्य उद्योग समूह ऽ खाद्य उत्पाद ऽ रसायन एवं रासायनिक उत्पाद ऽ मूल धातु उद्योग ऽ धातु उत्पाद ऽ विद्युत मशीनरी तथा पुजेर् ऽ रबड़ एवं प्लास्िटक उत्पाद ऽ मशीनरी एवं कल पुजेर् विद्युत वस्तुओं को छोड़कर ऽ होशरी एवं वस्त्रा - लकड़ी उत्पाद ऽ कागज उत्पाद तथा छपाइर् ऽ परिवहन/यातायात औशार एवं पुजेर् ऽ चमड़ा तथा चमड़ा उत्पाद ऽ पुफटकर निमार्ण उद्योग ऽ पेय, तम्बाकू तथा तम्बाकू उत्पाद ऽ मरम्मत सेवाएँ ऽ सूती वस्त्रोद्योग ऽ ऊनी, सिल्क, कृत्रिाम तन्तु वस्त्रोद्योग ऽ जूट, सन तथा मेस्टा वस्त्रोद्योग ऽ अन्य सेवाएँ ;घद्ध लघु उद्योगों का योगदान, हमारे देश के संतुलित क्षेत्राीय विकास के संदभर् में, ध्यान देने योग्य है तथा सराहनीय है। लघु उद्योग सरल वस्तुओं के उत्पादन में स्थानीय संसाधनों व कमिर्यों का तथा स्थानीय उपलब्ध सामग्री एवं सरल तकनीक का प्रयोग करती हैं, अतः देश में कहीं भी स्थापित की जा सकती हैं, क्योंकि इनकी कोइर् स्थापना सीमा नहीं है। इनका विस्तार बिना किसी स्थापना बाधा के संभव है तथा इसके औद्योगिकीकरण के लाभ सभी क्षेत्रों द्वारा उठाए जा सकते हैं। यही कारण है कि ये देश के संतुलित विकास में एक महत्त्वपूणर् योगदान देते हैं। 229 ;घद्ध लघु उद्योग उद्यमशीलता के लिए विस्तृत क्षेत्रा प्रदान करते हैं। अत्यक्त/निहित कौशल तथा लोगों की प्रतिभा को व्यवसाय का एक उचित माध्यम मिलता है तथा एक व्यावसायिक कल्पना को वास्तविक रूप मिलता है - कम पूँजी निवेश के साथ तथा बिना किसी खास औपचारिकता के लघु व्यवसाय प्रारंभ किए जा सकते हैं। अमर, अकबर तथा एंथनी, हमारी कहानी के पात्रा भी यह प्रमाण्िात करते हैं। यदि व्यक्ित सपफलता के लिए दृढ़संकल्प हो, तो वह लघु व्यवसाय प्रारंभ कर सकता है। ;चद्ध कम लागत पर उत्पादन का लाभ भी लघु उद्योगों को उपलब्ध है। स्थानीय संसाधनों की कीमत कम होती है। उपरिव्यय कम होने के कारण प्रतिष्ठान लागत तथा परिचालन लागत भी कम होती है। वास्तव में, लघु उद्योग कम लागत पर उत्पादन का लाभ उठाते हैं, यही उनकी प्रतिस्पिार्त शक्ित है। ;छद्ध बड़ी संगठनों की तुलना में छोटा आकार होने के कारण ये शीघ्र तथा समय पर, बिना अिाक लोगों से परामशर् किए, निणर्य लेने में समथर् हैं। नए व्यवसाय के सुअवसर भी सही समय पर उठाए जा सकते हैं। ;जद्ध उपभोक्ता आधारित उत्पादों के लिए लघु उद्योग सबसे अिाक उपयुक्त हैं अथार्त वैयक्ितक उपभोक्ता की रुचि, पसंद एवं आवश्यकताओं के अनुसार उत्पादन को अभ्िाकल्िपत किया जा सकता है, उदाहरणस्वरूप दजीर् द्वारा बनाया गया वुफतार् या पैंट/पतलून। बाशार में ऐसे उपभोक्ता आधारित उत्पाद प्रचलन में हैं। यहाँ तक कि अपारंपरिक उत्पाद जैसे वंफप्यूटर तथा अन्य उत्पाद भी। वे उपभोक्ताओं की आवश्यकता के अनुसार उत्पादन कर सकते हैं, क्योंकि वे सरल तथा लचीले उत्पादन तकनीकों का प्रयोग करते हैं। ;झद्ध अत में, परंंतु कम महत्त्वपूणर् नहीं, लघु उद्योग में निहित अनुवूफलनशीलता, व्यक्ितगत स्पशर् के कारण ही ये कमिर्यों तथा उपभोक्ताओं दोनों से ही अच्छे व्यक्ितगत संबंध बनाए रखने में समथर् हैं। सरकार को लघु स्तरीय इकाइयों की व्यापारिक ियाओं में हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। संगठन का छोटा आकार होने के कारण समय पर तथा शीघ्र निणर्य, बिना अिाक लोगों से परामशर् किए, जैसा कि बड़े संगठनों में होता है, लिए जा सकते हैं। नए व्यवसाय के सुअवसर भी सही समय पर उठाए जा सकते हैं जो बड़े व्यवसायों के लिए स्वस्थ प्रतिस्पधार् उत्पन्न करते हैं, जो अथर्व्यवस्था के लिए अच्छी बात है। 9.5 ग्रामीण भारत में लघु व्यवसाय की भूमिका विकासशील देशों में, ऐसा पाया गया है कि ग्रामीण परिवार एकमात्रा कृष्िा में संलग्न हैं। ऐसे बहुत से प्रमाण हैं कि इन ग्रामीण परिवारों में भी विभ्िान्न प्रकार के आय ड्डोत हो सकते हैं। व्यवसाय अध्ययन ग्रामीण परिवार भी विभ्िान्न स्तर पर अकृष्िा ियाओं में भाग ले सकते हैं, जैसे - रोजगार वेतन, स्वरोजगार, जो खेती एवं श्रम आधारित पारंपरिक कृष्िा ियाकलापों के साथ - साथ की जा सकती हैं। बड़े विस्तृत रूप में इसका श्रेय, भारत सरकार को, कृष्िा आधारित ग्रामीण उद्योग की स्थापना तथा उन्नति के लिए सरकार द्वारा चलाइर् गइर् नीतियों को दिया जा सकता है। ग्रामीण तथा लघु स्तरीय उद्योगों का महत्त्व, हमेशा से ही भारत की औद्योगिक योजनाओं का एक अभ्िान्न अंग रहा है, विशेषतः द्वितीय पंचवषीर्य योजना के पश्चात्। ग्रामीण क्षेत्रों में वुफटीर तथा ग्रामीण उद्योग रोजगार का अवसर उपलब्ध कराने में एक महत्त्वपूणर् भूमिका निभाते हैं, विशेषकर समाज के कमजोर वगर् के लोगों के लिए तथा श्िाल्पकारों के लिए। क्षेत्राीय तथा ग्रामीण उद्योगों का विकास, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने से, ये शहरी क्षेत्रों में प्रवसन को भी रोकने में सहायता करते हैं। ग्रामीण तथा लघु उद्योगों में उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में अिाक कमिर्यों का प्रयोग होता है जो गरीबी तथा बेरोजगारी जैसी समस्याओं का सामना करने में अत्यंत कारगर हैं। ये उद्योग और भी अन्य सामाजिक - आथ्िार्क क्षेत्रों में भी अपना महत्त्वपूणर् योगदान देते हैं जैसे आय विषमता में कमी लाकर, उद्योगों का सभी दूरस्थ विषम क्षेत्रों में विकास एवं अन्य अथर्व्यवस्था के क्षेत्रों में संपकर् स्थापित करके इत्यादि। वास्तविकता में भारत सरकार दो उद्देश्यों की पूतिर् के लिए, लघु स्तरीय उद्योग का विकास तथा ग्रामीण औद्योगीकरण को एक शक्ितशाली मानती है जो इस प्रकार हैं - तीव्र औद्योगिक विकास के उद्देश्य की पूतिर् के लिए तथा ग्रामीण तथा पिछड़े क्षेत्रों में अतिरिक्त उत्पादक रोजगार क्षमताओं के सृजन के लिए। पिफर भी बहुत सारी आकार संबंिात समस्याओं के कारण लघु उद्योगों की क्षमता पूरी तरह प्रयोग में नहीं हो पाती। अब हम ऐसी ही वुफछ मुख्य समस्याओं के बारे में परीक्षण करेंगे जो लघु व्यावसायिओं को चाहे वे ग्रामीण क्षेत्रा में हो या शहर में, उन्हें दिन - प्रतिदिन के ियाकलापों में सामना करना पड़ता है। 9.6 लघु व्यवसाय की समस्याएँ बहुत से कारकों/पक्ष के संदभर् में, दीघर् स्तरीय उद्योगों की तुलना में, लघु स्तरीय उद्योग, एक विशेष प्रतिवूफल स्िथति में हैं, जिनमें मुख्य हैं - व्यापार का स्तर, वित्त उपलब्धता, आधुनिक तकनीक को प्रयोग कर पाने का सामथ्यर्, कच्चा माल प्राप्त करना इत्यादि। ये सभी विभ्िान्न प्रकार की समस्याओं को उत्पन्न करती हैं। इनमें से बहुत सी समस्याएँ व्यवसाय के लघु आकार के कारण हैं, जो उन्हें, लाभ उठाने में बाधा उत्पन्न करती हैं, जो केवल बड़े स्तर की व्यावसायिक संगठनों को ही उपलब्ध हैं। तथापि ये सभी समस्याएँ हर श्रेणी के लघु व्यवसाय में समान नहीं हैं। उदाहरण के लिए, लघु सहायक इकाइयों के संदभर् में मुख्य समस्याएँ हैं - देरी से भुगतान, मूल इकाइर् द्वारा माँग की अनिश्िचतता तथा उत्पादन प्रिया में निरंतर परिवतर्न इत्यादि हैं। पारंपरिक लघु स्तरीय इकाइयों की समस्याओं में, दूरस्थ स्थापना, कम विकसित आधारभूत 231 सुविधाएँ, प्रतिबंधन प्रतिभाओं का अभाव, निम्न गुणवत्ता, पारंपरिक तकनीकी तथा अपयार्प्त वित्त की उपलब्धता। नियार्त प्रधान लघु स्तरीय इकाइयों की समस्याओं में निम्न आते हैं - विदेशी बाजार की पयार्प्त जानकारी का अभाव, विपणन वुफशलता का अभाव, विनिमय दरों में उतार - चढ़ाव, गुणवत्ता मानक तथा परिवहन के पहले का वित्त इत्यादि। सामान्य रूप से लघु व्यवसायों को निम्न प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है - ;कद्ध वित्त - लघु व्यवसाय उद्योग की यह एक सबसे गंभीर समस्या है जिसका इन्हें सामना करना पड़ता है - अपनी ियाओं के निष्पादन के लिए पयार्प्त वित्त की उपलब्धता का अभाव। सामान्यतः लघु व्यवसाय एक छोटे पूँजी आधार से व्यवसाय प्रारंभ करते हैं। बहुत सारी लघु क्षेत्रा की इकाइयाँ अपनी साख - सृजनशीलता के अभाव के कारण पूँजी बाजार से पूँजी उठाने में सक्षम नहीं हैं। वे स्थानीय वित्त संसाधनों पर निभर्र करती हैं और उन्हें बार - बार )णदाताओं के द्वारा शोषण का श्िाकार होना पड़ता है। देरी से भुगतान के कारण अथवा बचे हुए बिना बिक्री के माल में लगी पूँजी के कारण इन इकाइयों को बार - बार पयार्प्त कायर्शील पूंजी के अभाव को झेलना पड़ता है। पयार्प्त समानांतर प्रतिभूति अथवा जमानत तथा सीमांत पूँजी के अभाव में बैंक भी इन्हें )ण नहीं देती, जो बहुत - सी इकाइयाँ इस स्िथति में नहीं हैं कि वे इन्हें दिखा सकें। ;खद्ध कच्चा माल - कच्चा माल प्राप्त करना, लघु व्यवसाय की एक अन्य मुख्य समस्या है। जब इनकी आवश्यकता के अनुसार इन्हें कच्चा माल नहीं प्राप्त होता, तो इन्हें इनकी गुणवत्ता के साथ समझौता करना पड़ता है, अथार्त् अच्छी किस्म के कच्चे माल के लिए इन्हें ऊँची कीमतें देनी पड़ती हैं। कम मात्रा में क्रय खरीद के कारण इनकी सौदा करने की शक्ित अपेक्षाकृत कम होती है। माल के भंडारण की सुविधाओं के अभाव में ये थोक में खरीदने का जोख्िाम उठाने में समथर् नहीं हैं। अथर्व्यवस्था में धातुओं के समान्यतः अभाव में, रासायनिक तथा कच्चे माल के कषर्ण के कारण, लघु स्तरीय उद्योग सबसे अिाक क्षतिग्रस्त होते हैं। अथर्व्यवस्था के लिए इसका अथर् यह भी निकलता है कि उत्पादन क्षमता व्यथर् होती है जो अन्य इकाइयों के लिए भी हानि का कारण है। ;गद्ध प्रबंधन कौशल - लघु व्यवसाय सामान्यतः एक ही व्यक्ित द्वारा उन्नत तथा प्रतिचालित किए जाते हैं, जिसके पास आवश्यक नहीं है कि वह प्रबंधन कौशल होना एक व्यवसाय को चलाने के लिए आवश्यक है। बहुत सारे लघु व्यावसायिक उद्यमों के पास प्रभावी तकनीकी ज्ञान होता है परंतु वे उत्पादन का विपणन करने में कम ही सपफल होते हैं। इसके अतिरिक्त व्यापार ियाओं के लिए वे अिाक समय भी नहीं निकाल पाते। साथ ही साथ, वे इस स्िथति में नहीं है कि एक पेशेवर प्रबंधक बन सवेंफ। ;घद्ध श्रम - लघु व्यावसायिक पफमर् अपने व्यवसाय अध्ययन कमर्चारियों को अिाक वेतन देने में असमथर् होती हैं जो कमर्चारियों की अिाक काम करने तथा ज्यादा उत्पादन करने की इच्छा को प्रभावित करती हैं। इसलिए प्रति कमर्चारी उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है तथा श्रमिक परिवतर्न सामान्यतः अिाक होती है। कम वेतन के कारण लघु व्यावसायिक संगठनों की मुख्य समस्या प्रतिभावान लोगों को आकष्िार्त न कर पाना है। अप्रश्िाक्ष्िात कमर्चारी कम वेतन पर काम करते हैं परंतु उनको प्रश्िाक्षण देना भी समय लेने वाली प्रिया है। बड़े सगंठनों की तुलना में श्रम - विभाजन भी संभव नहीं है जिसके परिणाम एकाग्रता तथा विश्िाष्टीकरण के अभाव के रूप में उभरते हैं। ;घद्ध विपणन - विपणन एक अत्यंत महत्त्वपूणर् िया है जो आय उत्पन्न करती है। वस्तुओं के प्रभावी विपणन के लिए उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं की संपूणर् समझ अत्यंत आवश्यक है। लगभग सभी स्िथतियों में विपणन लघु संगठनों का एक कमजोर क्षेत्रा है। इसलिए इन संगठनों को अिाकतर मध्यस्थों पर निभर्र होना पड़ता है जो इन्हें कभी - कभी कम भुगतान तथा देर से भुगतान कर उनका शोषण करते हैं। इसके अतिरिक्त आवश्यक आधारभूत संरचनाओं के अभाव में प्रत्यक्ष विपणन लघु व्यावसायिक पफमो± के लिए उपयुक्त नहीं है। ;चद्ध गुणवत्ता - बहुत सारे लघु व्यावसायिक संगठन वांछित गुणवत्ता के मानकों का अनुसरण नहीं कर पाते। इसके स्थान पर उनका ध्यान लागत को कम कर, कीमतों को कम रखने पर होता है। उनके पास पयार्प्त संसाधन नहीं होते कि वे गुणवत्ता अनुसंधान में विनियोग कर सवंेफ तथा उद्योग के मानकों का साधारण कर पाएँ, न ही उनके पास ऐसे विशेषज्ञ होते हैं जो प्रौद्योगिकी को उन्नत कर सवंेफ। वास्तव में, विश्व - बाजार की प्रतिस्पधार् में गुणवत्ता को बनाए रखना इनकी सबसे बड़ी कमशोरी है। ;छद्ध क्षमता का उपयोग - विपणन कौशल अथवा माँग के अभाव में बहुत सारी लघु व्यावसायिक पफमो± को अपनी पूरी क्षमता से भी कम में काम करना पड़ता है जिसके कारण परिचालन लागत बढ़ने लगती हैं। धीरे - धीरे यह इन इकाइयों के बीमार होने का कारण बन जाता है। ;जद्ध प्रौद्योगिकी ;टेक्नालाॅजीद्ध - लघु उद्योगों के परिपेक्ष्य में अक्सर पुरानी तकनीक का प्रयोग एक गंभीर कमी माना जाता है जो परिमाणस्वरूप कम उत्पादकता तथा खचीर्ले उत्पादन के रूप में परिलक्ष्िात होते हैं। ;झद्ध बीमारी ;सिकनेसद्ध - लघु उद्योगों में बीमार इकाइयों का होना, नीति निधार्रकों तथा उद्यमों दोनों के लिए ही एक चिन्ता का कारण है। बीमारी के कारण आंतरिक तथा बाह्य दोनों ही है। आंतरिक समस्याओं में हैं - वुफशल तथा प्रश्िाक्ष्िात कमिर्यों का अभाव, प्रबंधन, तथा विपणन कौशल। वुफछ बाह्य समस्याओं के अंतगर्त, देरी से भुगतान, कायर्शील पूँजी की कमी, अपयार्प्त )ण तथा उत्पादों की माँग का अभाव इत्यादि आते हैं। ;×ाद्ध वैश्िवक प्रतिस्पधार् - समस्याओं के अतिरिक्त जिनका उल्लेख उफपर किया गया 233 है, लघु व्यवसाय बिना डर के नहीं हैं विशेषतः उदारीकरण, निजीकरण तथा वैश्वीकरण ;एल.पी.जी.द्ध की नीतियाँ जिनका अनुसरण संसार के अिाकतर देश कर रहे हैं। यह स्मरणीय है कि भारत ने भी एल.पी.जी. का अनुसरण 1991 से करना प्रारंभ किया है। आइए देखें की विश्व प्रतिस्पधार् की होड़ में ऐसे कौन - से क्षेत्रा हैं जहाँ लघु व्यवसाय जोख्िाम/संकट का अनुभव करते हैं - ;अद्ध प्रतियोगिता केवल मध्यम तथा बड़े उद्योगों से ही नहीं परंतु मल्टीनेशनल कंपनियों से भी है जो आकार तथा व्यावसायिक परिमाण के परिपेक्ष्य में भीमकाय/विशाल हैं। व्यवसाय परिणाम के प्रारंभ में खुलते ही ये लघु स्तरीय इकाइयों के लिए एक कटु प्रतियोगिता के परिणाम में सामने आती है। ;बद्ध बड़े उद्योगों तथा मल्टीनेशनल की गुणवत्ता मानक प्रौद्योगिकी कौशल, वित्त की साख के सामथ्यर्, प्रबंध, तथा विपणन क्षमता इत्यादि का सामना करना इनके लिए कठिन है। ;सद्ध गुणवत्ता प्रमानकों जैसे प्ैव् 9000 जैसी कठोर माँगों के कारण इनकी विकसित देशों के बाजार तक पहुँच सीमित है। 9.7 लघु उद्योग तथा लघु व्यावसायिक सरकार द्वारा प्राप्त सहायता/ सहयोग रोजगार उत्पिा, देश का संतुलित क्षेत्राीय विकास तथा नियार्त को बढ़ावा देने में, लघु व्यवसाय के योगदान को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार की नीतियों का बल लघु व्यावसायिक क्षेत्रों की स्थापना, उन्नति तथा विकास पर रहा है, विशेषतः ग्रामीण उद्योग तथा पिछड़े इलाकों के वुफटीर तथा ग्राम उद्योगों में वेंफद्रीय तथा राज्य दोनों ही स्तर पर सरकारें सिय भागीदारी निभा रही हैं। इन विभ्िान्न ियाकलापों द्वारा - ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के सुअवसर उपलब्ध कराना, आधारभूत संरचना, वित्त, प्रौद्योगिक, प्रश्िाक्षण, कच्चा माल तथा विपणन के परिपेक्ष्य में अपना विशेष सहयोग दे कर। ग्रामीण उद्योगों के विकास के लिए विभ्िान्न नीतियाँ तथा सरकारी सहयोग की योजनाएँ, स्थानीय संसाधनों तथा स्थानीय उपलब्ध कच्चे माल के प्रयोग तथा उपलब्ध स्थानीय श्रमशक्ित के प्रयोग पर बल देती हंै। इनका ियात्मक रूपांतर विभ्िान्न एजेंसियों, विभागों तथा निगमों इत्यादि द्वारा किया जाता है जो औद्योगिक विभाग के अंतगर्त आती हैं। इन सभी का मुख्य संबंध लघु तथा ग्रामीण उद्योगों की उन्नति से है। वुफछ सहयोग के उपाय तथा कायर्क्रम जो लघु तथा ग्रामीण उद्योगों की उन्नति के लिए किए गए हैं उनकी चचार्/विचार विमशर् नीचे दी गइर् है। 1.संस्थागत सहयोग ;कद्ध कृष्िा ग्रामीण विकास हेतु राष्ट्रीय बैंक ;नाबाडर्द्ध संपूणर् ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने के लिए, 1982 में नाबाडर् की स्थापना की गइर् थी। तभी से इसने देश की ग्रामीण व्यावसायिक इकाइयों को बढ़ावा देने के लिए बहु - विकल्पी, व्यवसाय अध्ययन बहु - प्रयोजन योजनाओं को अपना रही है। कृष्िा के अतिरिक्त, ये साख तथा बिना साख के प्रस्तावों को प्रयोग में लाकर, लघु उद्योग, वुफटीर तथा ग्रामीण उद्योग तथा ग्रामीण दस्तकारों को सहयोग देती हैं। ये ग्रामीण उद्यमकत्तार्ओं के लिए सलाह तथा परामशर् सेवाएँ देती हैं, प्रश्िाक्षण तथा विकास कायर्क्रमों का आयोजन करती हैं। 2.ग्रामीण लघु व्यावसायिक विकास वेंफद्र ;आर.एस.बी.डी.सी.द्ध ग्रामीण लघु व्यावसायिक विकास वेंफद्र द्वारा समथर्न प्राप्त विश्व संघ द्वारा स्थापित लघु तथा मध्यम प्रकार की उद्यमों के लिए अपने आप में एक पहली संस्था है। यह सामाजिक तथा आथ्िार्क रूप से पिछड़े हुए व्यक्ितयों द्वारा समूहों के हित के लिए कायर् करती हैं। इनका मुख्य लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्रों की वतर्मान तथा भविष्य के लघु उद्यमों तथा छोटी इकाइयों को प्रबंधन तथा तकनीकी सहयोग देना है। स्थापना के प्रारंभ से ही आर.एस.बी.डी.सी. ने नोएडा, ग्रेटर नोएडा तथा गाजियाबाद के विभ्िान्न गाँवों में, ग्रामीण उद्यम, कौशल उन्नति के लिए कायर्शालाएँ, मोबाइल चिकित्सा वेंफद्र, प्रश्िाक्षक कायर्क्रम, जागरूकता तथा परामशर् श्िाविरों इत्यादि का आयोजन किया है। यह बड़ी संख्या में ग्रामीण बेरोजगार युवक तथा विभ्िान्न व्यापार में संलग्न महिलाओं का ध्यान रखता हंै। ये विभ्िान्न व्यवसाय हैं - संसाधन खाद्यान्न, मुलायम ख्िालौने बनाना बने - बनाए परिधान, मोमबत्ती बनाना, अगरबत्ती निमार्ण, दो पहिए की मरम्मत तथा सेवाएँ, वमार् वंफपोजिंग तथा अपारंपरिक निमार्ण सामग्री इत्यादि। 3.राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम ;एन. एसआइर्. सी.द्ध देश में लघु व्यवसाय की उन्नति मंे सहयोग तथा विकास को बढ़ावा देने के लिए 1955 में इसकी स्थापना की गइर् थी। इनका बल इसके ियाकलापों के इन व्यापारिक पक्षों पर हैः - ऽ देशी आपूतिर् तथा आसान हायर परचेज की शतो± पर मशीनों की आयात ऽ देशी तथा आयातित कच्चे माल की प्राप्ित, आपूतिर् तथा वितरण ऽ लघु व्यावसायिक इकाइयों के उत्पादन का नियार्त तथा नियार्त साख का विकास ऽ परामशर् सेवाओं का निरीक्षण ऽ प्रौद्योगिकी व्यावसायिक उपमाचित्रा ;इन्क्यूबेटरद्ध के समान सेवाएँ देना प्रौद्योगिकी सुधार के बारे में जागरूकता पैदा करना। ऽ साॅफ्रटवेयर प्रौद्योगिकी पाकर् का तथा प्रौद्योगिकी स्थानांतरण वेंफद्रों का विकास एन.एस.आइर्.सी द्वारा लघु व्यवसाय के निष्पादन तथा साख श्रेणी ;करैडिट रेटिंगद्ध की नइर् योजना का ियान्वयन के दो उद्देश्य हैं - ;कद्ध साख श्रेणी की आवश्यकता के बारे में लघु उद्योगों को जानकारी देना ;खद्ध अच्छे वित्त का रिकाडर् बनाए रखने के लिए लघु व्यावसायिक इकाइयों को प्रोत्साहित करना। यह ये सुनिश्िचत करने के लिए किया जाता है कि जब भी वे अपनी कायर्शील पूँजी तथा निवेश की आवश्यकताओं के लिए वित्तीय संस्थाओं के सामने प्रस्ताव रखें तो उनकी साख श्रेणी उच्च हो। 235 विपणन सहायता योजना विपणन, जो व्यवसाय के विकास के लिए सामरिक उपकरण है, सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों ;एम.एस.एम.इर्.द्ध की संवृि तथा अस्ितत्व हेतु महत्त्वपूणर् है। सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यम मंत्रालय, राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम ;जो इस मंत्रालय के अध्ीन एक लोक सेवा उद्यम हैद्ध के माध्यम से विपणन सहायता योजना के अंतगर्त सूक्ष्म तथा लघु उद्यमों को विपणन सहायता उपलब्ध् करा रहा है। उद्देश्य: इस योजना के मुख्य उद्देश्य निम्नलिख्िात हैं। 1.सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों की विपणन क्षमता तथा प्रतियोगित्व ;प्रतियोगिता की भावनाद्ध को बढ़ाना। 2.सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों की सक्षमताएँ प्रदश्िार्त करना। 3.सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों को प्रचलित बाशार दृश्यलेख ;सिनेरियोद्ध तथा उनकी ियाओं पर इसके प्रभाव के बारे में अद्यतन करना। 4.सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उपव्रफमों को उनके उत्पादों तथा सेवाओं के विपणन हेतु मैत्राी - संघ बनाने की सुविध देना। 5.बड़े संस्थागत व्रेफताओं से अन्योन्यवि्रफया हेतु सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों को मंच उपलब्ध् कराना। 6.सरकार के विभ्िान्न कायर्व्रफमों का प्रचार करना। 7.सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमियों की विपणन वुफशलता को बढ़ाना। सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों को विपणन सहायता - इस योजना के अंतगर्त निम्नलिख्िात ियाओं के माध्यम से उनके उत्पादों का प्रतियोगित्व तथा विपणनीयता बढ़ाइर् जानी प्रस्तावित है, 1.एन.एस.आइर्.सी. द्वारा विदेशों में अंतरार्ष्ट्रीय तकनीकी प्रदशर्नियाँ आयोजित करना तथा अंतरार्ष्ट्रीय प्रदशर्नियों/व्यापार मेलों में भाग लेना। उभरते तथा विकासशील बाशारों में नये व्यावसायिक अवसरों की खोज करने हेतु भारतीय सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों की सहायता करने के उन्हें विस्तृत अनावरण उपलब्ध् कराने की दृष्िट से एन.एस.आइर्.सी. द्वारा अंतरार्ष्ट्रीय तकनीकी प्रदशर्नियाँ आयोजित की जाती हैं। इससे व्यापार प्रवतर्न, संयुक्त उपक्रम स्थापित करने, तकनीक अंतरित करने, विपणन व्यवस्िथत करने तथा विदेशों में भारतीय सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों की छवि निमार्ण में सहायता मिलती है। अंतरार्ष्ट्रीय प्रदशर्नियों के आयोजन के अतिरिक्त, एन.एस.आइर्.सी. भारतीय सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों के चयनित अंतरार्ष्ट्रीय प्रदशर्नियों तथा व्यापार मेलों में भाग लेने में सहायता करता है। ऐसे आयोजनों में भाग लेने में सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यम अंतरार्ष्ट्रीय व्यवहारों को जान पाते हैं। 2.घरेलु प्रदशर्नियाँ आयोजित करना तथा भारत में प्रदशर्नियों/व्यापार मेलों में भाग लेना वुफछ निश्िचत थीम आधरित प्रदशर्नियाँ/तकनीकी मेले एन.एस.आइर्.सी. द्वारा आयोजित किए जाते व्यवसाय अध्ययन हैं, जो सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों द्वारा उपलब्ध् कराए गए उत्पादों तथा सेवाओं पर वेंफदि्रत होते हैं तथा इनमें रोजगार निमार्ण हेतु उपयुक्त तकनीकी, विश्िाष्ट क्षेत्रों से उत्पाद अथवा गुच्छ ;कलस्टरद्ध ;जैसे पूवोर्त्तर क्षेत्रा, खाद्य प्रसंस्करण, मशीनें एवं उपकरण, चमड़ा इत्यादिद्ध सम्िमलित होते हैं। ऐसे आयोजनों में भाग लेने से सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों को नये बाशार कब्जाने तथा वतर्मान बाशारों के विस्तार के माध्यम से उनके विपणन मागो± को जोड़ने की अपेक्षा की जाती है। 3.अन्य संगठनों/उद्योग संघों/एजेंसियों द्वारा आयोजित प्रदशर्नियों के सहप्रायोजन हेतु सहायता ऐसी सहायता एन.एस.आइर्.सी. द्वारा आयोजन के सहप्रायोजन के रूप में प्रदान की जाती है। एन.एस.आइर्.सी. द्वारा एक आयोजन के सहप्रायोजन हेतु आवेदक संगठन/एजेंसी को वेंफद्र कसौटी/शते± अवश्य पूरी करनी होती हैं। 4.व्रेफता - विवे्रफता भेंट बड़े तथा विभागीय वे्रफताओं जैसे रेलवे, रक्षा, संचार विभाग तथा बड़ी कंपनियों को व्रेफता - विव्रेफता भेंट में भाग लेने हेतु आमंत्रिात किया जाता है ताकि सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों का विपणन प्रतियोगित्व बढ़ाने हेतु उन्हें इनके निकट लाया जा सके। इन कायर्व्रफमों में भाग लेने से जहाँ एक ओर सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यम बड़े वे्रफताओं की आवश्यकताओं को जान पाते हैं, वहीं दूसरी ओर बड़े वे्रफता अपने व्रफय के बारे में सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों की सक्षमताओं को जान पाते हैं। 5.तीव्र अभ्िामान तथा विपणन प्रवतर्न आयोजन सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों के लाभ हेतु विभ्िान्न योजनाओं के बारे में सूचनाएं प्रसारित करने हेतु उन्हें नवीनतम विकास, गुणवत्ता प्रमापों आदि के बारे में अपने ज्ञान को संवध्िर्त करने तथा उनके उत्पादों तथा सेवाओं के बारे में उनकी विपणन संभाव्यता में सुधर करने में भी सहायता मिलती है। 6. अन्य सहायक ियाएँ ऽ सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों के उत्पादों तथा सेवाओं के लिए प्रदशर्न वेंफद्रों, दृश्य पटल तथा प्रचार पटल इत्यादि का विकास। ऽ सूचना प्रसार हेतु साहित्य विवरण्िाका तथा उत्पाद विश्िाष्ट सूची - पत्रा एवं सी.डी. आदि की छपाइर्/निमार्ण एवं लघु चल - चित्रों का निमार्ण। ऽ सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों के उत्पादों तथा सेवाओं के विपणन की सुविध हेतु वैबसाइट/पोटर्ल का विकास। ऽ सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यम क्षेत्रा तथा आयोजनों हेतु विभ्िान्न कायर्क्रमों/योजनाओं के बारे में विज्ञापन तथा प्रचार सामग्री का विकास एवं प्रसार। ऽ सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यम उत्पादकों/आपूतिर् - कतार्ओं/नियार्तकों की निदेश्िाका का निमार्ण तथा अद्यतन। ऽ सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों की सपफलता की कथाओं का प्रपत्राीकरण। ऽ नये बाशारों/व्यवसायों तथा घरेलू एवं अंतरार्ष्ट्रीय बाशारों हेतु उत्पाद - श्रेण्िायों को खोजने तथा आंकने हेतु अध्ययन करना। ऽ 45237 अंतरार्ष्ट्रीय श्िाष्टमंडलों तथा नेटववि±फग आयोजनों की मेशबानी। भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक ;एस.आइर्.डी.बी.आइर्.द्ध ऽ लघु व्यावसायिक संगठनों की साख आवश्यकताओं की पूतिर् के लिए इसकी स्थापना एक शीषर् बैंक के रूप में हुइर् जो विभ्िान्न योजनाओं के अंतगर्त प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष वित्त सहायता प्रदान करती है। ऽ अन्य संस्थाओं के कायो± का समन्वयन करना जो समरूपी ियाएँ कर रहे हैं। इस प्रकार अब तक हमने विभ्िान्न संस्थाएँ जो लघु उद्योगों के सहयोग के लिए, वेंफद्रीय स्तर तथा राज्य स्तर पर कायर् कर रही हैं, के बारे में सीखा। असंगठित क्षेत्रों के उद्यम हेतु राष्ट्रीय आयोग ;एन.सी.इर्.यू.एस.द्ध एन.सी.इर्.यू.एस. की स्थापना सितंबर 2004 में निम्नलिख्िात उद्देश्यों के साथ हुइर् थी - ऽ अनौपचारिक क्षेत्रा में उन उपायों का सुझाना जो लघु व्यवसाय की उत्पादकता को बढ़ाने में आवश्यक माने जाते हैं। ऽ दीघर् आधार पर अिाक रोजगार सुअवसरों को उत्पन्न करना, विशेषतः ग्रामीण क्षेत्रों में ऽ उभरते वैश्िवक वातावरण के संदभर् में इस क्षेत्रा की प्रतिस्पधार् को बढ़ाना। इस क्षेत्रा के अन्य संस्थाओं के विभ्िान्न क्षेत्रों में संबंध स्थापित करना और साख, कच्चा माल, आधारभूत सरंचना, प्रौद्योगिकी उन्नति, विपणन तथा कौशल विकास के लिए उपयुक्त प्रबंधों को प्रतिपादित करना इत्यादि। आयोग ने जिन विभ्िान्न विषयों की पहचान की पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, वे हैं - ऽ समूह के रूप में अनौपचारिक क्षेत्रों के लिए विकास स्तंभ ताकि बाह्य आथ्िार्क सहायता प्राप्त की जा सके। ऽ अनौपचारिक क्षेत्रों को कौशल प्रदान करने के लिए निजी तथा सावर्जनिक साझेदारी की क्षमता। ऽ अनौपचारिक क्षेत्रों के लिए सूक्ष्म - वित्त तथा संबंिात सेवाओं का प्रावधान। ऽ अनौपचारिक क्षेत्रा के कमिर्यों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना। 6.ग्रामीण तथा महिला उद्यम विकास ;आर.डब्ल्यू.इर्.द्ध ग्रामीण तथा महिला उद्यम विकास कायर्क्रम का लक्ष्य अनूकूल व्यावसायिक वातावरण का विकास करना है, संस्थागत तथा मानवीय क्षमताओं का निमार्ण करना है जो ग्रामीण लोगों तथा महिलाओं द्वारा उद्यम में पहल को प्रोत्साहन तथा सहयोग देती हैं। आर.डब्ल्यू.इर् निम्नलिख्िात सेवाएँ प्रदान करती है ऽ ग्रामीण तथा महिला उद्यमी की पहल को प्रोत्साहित करने के लिए व्यावसायिक वातावरण का सृजन ऽ मानवीय तथा संस्थागत क्षमता को बढ़ाना है जिनकी आवश्यकता उत्पादकता तथा उद्यम गतिवाद को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक है। ऽ महिला उद्यमियों को प्रश्िाक्षण सामग्री / पुस्ितका देना तथा उन्हें प्रश्िाक्ष्िात करना। व्यवसाय अध्ययन ऽ कोइर् भी अन्य परामशर् सेवाएँ प्रदान करना। 7.लघु तथा मध्यम उद्यम हेतु विश्व संघ भारत में सूक्ष्म लघु तथ्य मध्यम व्यवसाय आधारित केवल यही एक अंतरार्ष्ट्रीय समिति का गठन किया गया है। इसका उद्देश्य ग्रामीण उद्यमों के दीघर् विकास के लिए एक एक्शन प्लान माॅडल बनाना है। इसके अतिरिक्त, अन्य कृष्िा क्षेत्रा के विकास के लिए बहुत - सी योजनाएँ हैं जो भारत सरकार द्वारा प्रारंभ की गइर् हैं। उदाहरण के लिए वे योजनाएँ जो कम दर पर सहायता प्राप्त )ण उद्यम के लिए हैं जैसे संपूणर् ग्रामीण विकास कायर्क्रम आइर्.आर.डी.पी, प्रधानमंत्राी रोजगार योजना पी.एम.आर.वाइर्, ग्रामीण युवकों के लिए स्वरोजगार प्रश्िाक्षण तथा योजनाएँ जिनका उद्देश्य लैगिंक तत्वों को मशबूत करना है जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं तथा बच्चों का विकास ऐसे भी ग्रामीण क्षेत्रा आधारित कायर्क्रम योजनाएँ हैं जो वेतन पर रोजगार उपलब्ध कराती हंै जैसे जवाहर रोजगार योजना जे.आर.वाइर्, काम के बदले खाना इत्यादि, दो परस्पर उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए है जो हैं - ग्रामीण आधारभूत संरचना का सृजन तथा गरीब ग्रामीणवासियों के लिए अतिरिक्त आय उत्पन्न करना, विशेषता जब कृष्िा का निम्न मौसम हो। अंतिम, परंतु कम महत्त्वपूणर् नहीं, विशेष खादी, हथकरघा तथा हस्तश्िाल्प उद्योग के लिए विभ्िान्न योजनाएँ हैं। 8.पारंपरिक उद्योगों के पुनरुत्थान के लिए कोष योजना वेंफद्रीय सरकार ने सन् 2005 में 100 करोड़ रुपये का एक कोष बनाया है जिसका उद्देश्य पारंपरिक उद्योगों को उत्पादकता तथा प्रतिस्पधार् को बढ़ाना है ताकि उनका दीघर् विकास हो सके। इसके, ियान्वयन कृष्िा तथा ग्रामीण उद्योग मंत्रालय द्वारा राज्य सरकारों के साथ मिलकर होना है। इस योजना के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार से हैं ऽ देश के विभ्िान्न भागों में पारंपरिक उद्योग समूह या विकास करनाऋ ऽ नवाचार तथा पारंपरिक कौशल का निमार्ण, प्रौद्योगिकी में सुधार तथा सावर्जनिक - निजी साझेदारी को प्रोत्साहन देना, विपणन समझ का विकास करना इत्यादि जिससे उन्हें प्रतियोगी, लाभकारी तथा दीघर् बनाया जा सकेऋ तथा ऽ पारंपरिक उद्योगों में दीघर् रोजगार सुअवसरों का सृजन करना। 9. जिला औद्योगिक वेंफद्र ;डी.आइर्.सी.द्ध इस विचार से कि जिला स्तर पर एक संपूणर् प्रशासनिक ढाँचा देने के लिए, जो जिले में संयुक्त रूप से औद्योगीकरण की समस्याओं को देख सके 1 मइर् 1978 में जिला औद्यौगिक केन्द्र कायर्क्रम का प्रारंभ किया गया। अन्य शब्दों में जिला औद्यौगिक केन्द्र जिला स्तर पर एक ऐसी संस्था है जो उन सभी उद्यमों को लघु तथा ग्रामीण उद्योगों की सभी स्थापना के लिए सेवाएँ तथा सहयोग सुविधाएँ प्रदान करती हैं। उपयुक्त योजनाओं की पहचान, संभाव्यता प्रतिवेदन तैयार करना, साख का प्रबंध करना, मशीनरी रिपोटर् तथा औजार, कच्चे माल का प्रावधान तथा अन्य विस्तार सेवाएँ, ये वुफछ मुख्य ियाकलाप हैं जिनका उत्तरदायित्व डी.आइर्.सी लेती है। विस्तृत रूप से, जिला औद्यौगिक केन्द्र, ग्रामीण उद्यमियों तथा वे सभी जो ग्रामीण क्षेत्रों के आथ्िार्क विकास से जुड़े हुए हैं। उनके दृष्िटकोण में परिवतर्न लाने का प्रयास कर रहा 239 है। यहाँ तक कि एक संवफीणर् वणर्क्रम के अंतगर्त, उन उपेक्ष्िात कारकों पर दृष्िट डालने का प्रयास किया है जैसे - ग्रामीण कारीगर, प्रश्िाक्ष्िात श्िाल्पकार, तथा हथकरघा चालक तथा इन सभी के ियाकलापों को राष्ट्रीय कायर्क्रमों के द्वारा ग्रामीण विकास की सामान्य प्रिया में जोड़ना। इस प्रकार डी.आइर्.सी जिले स्तर पर आथ्िार्क तथा औद्योगिक वृि हेतु एक केन्द्र बिंदु रूप में उभर कर आ रही है। ;खद्ध प्रोत्साहन पिछड़ी जनजातियों तथा पहाड़ी क्षेत्रों के औद्योगिक विकास पर विशेष बल हमेशा से ही भारत सरकार के लिए महत्त्व के विषय रहे हैं तथा ये सभी पंचवषीर्य योजनाओं तथा औद्योगिक नीति कथनों में स्पष्ट रूप से अभ्िाव्यक्त हैं। यह समझते हुए कि पिछड़े इलाकों का विकास एक दीघर्कालीन प्रिया है, बहुत सारी समितियों का गठन किया गया है जो पिछड़े क्षेत्रों की पहचान कर सकें तथा संतुलित क्षेत्राीय विकास के अत्यंत कठिन विशाल कायर् को करने के लिए योजनाएँ भी सुझा सकें। पिछड़े क्षेत्रों के संपूणर् विकास के लिए सरकार ने संपूणर् ग्रामीण विकास कायर्क्रम का ियान्वयन द्वारा उठाया गया एक ऐसा ही प्रयास है। सरकार द्वारा चलाए गए ग्रामीण उद्योग परियोजना कायर्क्रम का उद्देश्य चुने हुए ग्रामीण क्षेत्रों में लघु व्यवसाय का विकास करना था। यद्यपि ये पिछड़े क्षेत्रों के विकास कायर्क्रम एक राज्य में दूसरे राज्य से भ्िान्न थे तथापि पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग को आकष्िार्त करने के लिए एक महत्त्वपूणर् संगठित प्रोत्साहन पैकेश के रूप में अपना प्रतिनििात्व प्रस्तुत किया। वुफछ सामान्य प्रोत्साहन जिन पर विचार - विमशर् किया गया है वे इस प्रकार हैं - भूमिः हर राज्य उद्योग स्थापित करने के लिए विकसित भू - खंडों को प्रस्तावित करता है। विकसित भू - खंडों को प्रस्तावित करता है। शते± तथा अनुबंध अलग हो सकती हैं। वुफछ राज्य किराए को प्रारंभ्िाक वषो± में खचेर् के रूप में मद में दिखाती हैं, वुफछ इन्हें किस्तों में देने की अनुमति प्रदान करते हैं। विद्युतः 50 प्रतिशत की रियायती दर विद्युत की आपूतिर् की जाती है, जबकि वुफछ राज्य प्रारंभ के वषो± में इन इकाइयांे को छूट प्रदान करती है। जलः 50 प्रतिशत की छूट के साथ बिना लाभ अथवा हानि के आधार पर जल की आपूतिर् की जाती है अथवा प्रारंभ के पाँच वषो± तक जल - खचेर् की छूट/रियायत दी जाती है। बिव्रफी करः सभी वेंफद्र - प्रशासित राज्यों में, औद्योगिक इकाइयाँ बिव्रफी - करों से मुक्त हैं जबकि वुफछ राज्य इस छूट को पाँच वषो± तक बढ़ा सकती है। चुंगीः अिाकतर राज्यों ने चुंगी को समाप्त कर दिया है। कच्चा मालः विरल ;स्वैफसर्द्ध कच्चे माल जैसे सीमंेट, लोहा तथा स्टील आदि के आबंटन में, उन इकाइयों को, जो पिछड़े क्षेत्रों में स्थापित हैं, उन्हें वरीयता दी जाती है। वित्तः स्थायी संपिायों के निमार्ण के लिए 10 - 15 प्रतिशत की आथ्िार्क सहायता दी जाती है। रियायती दरों पर ट्टण भी प्रस्तावित किए जाते हैं। औद्योगिक भू - संपिा: वुफछ राज्य पिछड़े क्षेत्रों में औद्योगिक भू - संपिा की स्थापना को भी प्रोत्साहन देते हैं। कर - अवकाश: जो उद्योग पिछड़े, पहाड़ी तथा जनजातिय क्षेत्रांे में स्थापित हैं उन्हें 5 - 10 वषो± तक कर न देने की छूट दी जाती है। सारांशतः ऐसा कहा जा सकता है कि भारत में लघु व्यवसाय को सरकार की तरपफ से सहयोग/समथर्न प्राप्त है, विभ्िान्न संस्थाओं द्वारा विभ्िान्न स्वरूपों में तथा भ्िान्न कारणों से। पिछड़े इलाकों मे विशेष ध्यान देने के बावजूद भी, ऐसा पाया गया है कि विकास में आधारभूत सुविधाओं को विकसित करने की आवश्यकता है, क्योंकि किसी भी मात्रा में आथ्िार्क सहायता या छूट, इन सुविधाओं के अभाव के कारणों से उत्पन्न प्रावृफतिक बाधाओं को दूर नहीं कर सकती। 9.8 भविष्य परिवतिर्त होते रहते हैं। विश्व व्यापार संगठन के स्ंास्थापक सदस्य होने के नाते, भारत की विश्ववतर्मान काल विश्व व्यापार संघ ;ॅज्व्द्ध की व्यापार संगठन की नीतियों के ढाँचे/स्वरूप केशासन प्रणाली है, जहाँ व्यापार के नियम प्रति वचनब( है। परिणामस्वरूप लघु व्यवसायविश्व/सावर्भौम अपेक्षाओं के अनुसार बार - बार भी पूवर् - उदारीकरण के सुरक्ष्िात युग से दूर होते जा रहे हैं। भारतीय अथर्व्यवस्था संपूणर् रूप से जब विश्व अथर्व्यवस्था से जुड़ती जा रही है। यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि लघु व्यवसाय के लिए कि वे अपनी योग्यताओं का अन्वेषण करें, प्रवेश करें तथा नए बाजार विकसित करें। उन्हें अपने आपको निरंतर पुनः परिस्िथतियों के अनुरूप ढालना है ताकि राष्ट्रीय तथा अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती प्रतिस्पधार् की चुनौतियों का सामना कर सकें। अपने उफजार्वादी, लचीलेपन तथा नवाचार जैसे जोशपूणर् उद्यम साथ - साथ, लघु व्यवसाय की तेजी से बदलती हुइर् आवश्यकताओं के अनुवूफल बनाने की आवश्यकता है। सरकार को भी अपने लघु व्यवसाय क्षेत्रा के सहयोग को पुनः अभ्िाविन्यासित करने की आवश्यकता है, एक सरल सुसाध्य बनाने के रूप में तथा प्रवतर्क के रूप में न कि एक नियंत्राक के रूप में। नइर् योजनाएँ/युक्ितयाँ बनाने की आवश्यकता है जिससे बडे़ तथा छोटे मुख्य शब्दावली 241 उद्योगों की साझेदारी को बढ़ावा मिल सवेंफ, समूह - उपागम को अपनाएँ, सृजनात्मक विपणन ;ब्सनेजमत ।चचतवंबीद्ध का विकास हो सके, औद्योगिक वुफशलताओं का उन्नतीकरण के द्वारा सुधार हो सके, तथा लघु व्यवसाय की मूल दक्षताओं का पहचान कर उन्हें नियार्त - प्रतिस्पधार् के लिए तैयार किया जा सके। वास्तव में, लघु व्यवसाय को वैश्वीकरण को, एक विश्िाष्ट कल - पुरजों की आपूतिर् में सिय भागीदारी द्वारा, एक सुअवसर के रूप में देखना चाहिए। यदि लघु व्यवसाय को अपना बाजार का अंश था? स्वस्थ विकास को बनाए रखना है, तो उन्हें अपने लिए इस क्षेत्रा में स्वयं जगह बनानी होगी। उनकी दीघर्कालीन प्रतिस्पधार् स्िथति इस बात पर निभर्र करती है कि वे कितनी अच्छी तरह से प्रबंधन सीखते हैं, अपनाते हैं और अपनी प्रतिस्पधार् क्षमता का सुधार करते हैं। संक्ष्िाप्त में लघु व्यवसाय की सपफलता का मंत्रा इस आधुनिक युग में होना चाहिए फ्स्थानीय स्तर पर काम करें, सोचें विश्व के स्तर परय् लधु स्तर उद्योग वुफटीर उद्योग महिला उद्यम नियार्त प्रधान इकाइयाँ ग्रामीण उद्योग सूक्ष्म व्यवसायिक सहायक उद्योग खादी उद्योग छोटी व्यावसयिक इकाइर्याँ सारांश पूँजी विनियोग के आधार पर, लघु व्यावसायिक इकाइयों को विभ्िान्न श्रेण्िायों में बाँटा जा सकता है, जिनमें है लघु स्तरीय उद्योग, सहयोगी लघु औद्योगिक इकाइयाँ, नियार्त - प्रबंिात इकाइयाँ, महिलाओं द्वारा स्वामित्व तथा प्रबंिात लघु स्तरीय सेवाएँ तथा व्यावसायिक ;उद्योग संबंिातद्ध उद्यम, सूक्ष्म व्यावसायिक उद्यम, ग्रामीण उद्योग तथा वुफटीर उद्योग। प्रशासनिक ढाँचा/स्वरूपः लघु स्तरीय उद्योग के प्रशासनिक ढाँचे में दो मंत्रालय आते हैं जो हैं - लघु स्तरीय उद्योग मंत्रालय तथा वृफष्िा एवं ग्रामीण उद्योग मंत्रालय भारत सरकार, लघु स्तरीय उद्योग मंत्रालय भारत में लघु स्तरीय उद्योग की उन्नति तथा विकास के लिए नीतियों का निधार्रण करने तथा वेंफद्रीय सहायता के समन्वयन के लिए, एक प्रतिमान/बहुलक मंत्रालय है। समान रूप से, वृफष्िा तथा ग्रामीण उद्योग मंत्रालय, ग्रामीण तथा खादी उद्योग के विकास तथा समन्वयन के लिए एक प्रतिमान मंत्रालय है। शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों दोनांे की अतिलघु तथा सूक्ष्म उद्योग के लिए राज्य सरकार भी विभ्िान्न उन्नतिशील विकासोन्मुख परियोजनाओं को निष्पादित करती है, ताकि उन राज्यों के लघु स्तरीय उद्योग की उन्नति तथा विकास के लिए सहयोग तथा समथर्न दे सवेंफ। भारत में लघु व्यवसाय की भूमिकाः किसी देश के सामाजिक - आथ्िार्क विकास में लघु स्तरीय उद्योग एक महत्त्वपूणर् भूमिका निभाती है। भारत में लघु उद्योग, औद्योगिक इकाइयों का 95 प्रतिशत है। ये लगभग 40 प्रतिशत तक का सपफल औद्योगिक उत्पाद मूल्य में तथा कुल नियार्त का 45 प्रतिशत योगदान देते हैं। लघु स्तरीय उद्योग, वृफष्िा के बाद, द्वितीय सबसे बड़ा क्षेत्रा है, जो मानवीय संसाधनों का प्रयोग कर रोजगार सृजन करता है तथा अथर्व्यवस्था के लिए विभ्िान्न प्रकार की वस्तुओं का उत्पादन करता है। स्थानीय उपलब्ध सामग्री का प्रयोग तथा देशी प्रौद्योगिकी का उपयोग कर ये इकाइयाँ देश के संतुलित क्षेत्राीय विकास में अपना योगदान देती हैं। ये उद्यम के क्षेत्रा को अिाक विस्तृत करने में सहायक हैं, कम लागत पर उत्पादन का लाभ उठातीं हैं, शीघ्र निणर्य लेने में सक्षम हैं तथा अपने आप को उपभोक्ता आधारित उत्पादन के अनुकूल शीघ्रता से ढालने के कारण उनके लिए सबसे अिाक उपयुक्त है। ग्रामीण भारत में लघु व्यवसाय की भूमिकाः ;कद्ध वृफष्िा ियाओं में लघु व्यावसायिक इकाइयाँ आय के विभ्िान्न स्रोत प्रदान करती हैं तथा ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषतः पारंपरिक दस्तकारों तथा समाज के पिछड़े वगोर्ं के लिए रोजगार के सुअवसर उपलब्ध कराती हैं। लघु उद्योग की समस्याएँ: लघु उद्योग विभ्िान्न प्रकार की समस्याओं से जूझ रहे हैं जिनमें मुख्य हैं - ;कद्ध वित्त ;खद्ध कच्चे माल का उपलब्ध न होना ;गद्ध प्रबंधन कौशल ;घद्ध वुफशल कमिर्क ;घद्ध उनकी उत्पादित वस्तुओं का विपणन ;चद्ध गुणवत्ता मानकों का अनुपालन ;छद्ध क्षमता का निम्न प्रयोग ;जद्ध पारंपरिक प्रौद्योगिकी का प्रयोग ;झद्ध बीमारी ग्रस्त इकाइयाँ ;×ाद्ध विश्व प्रतिस्पधार् का सामना करना। लघु उद्योग को उपलब्ध सरकारी सहायता/सहयोगः लघु व्यवसाय के विभ्िान्न क्षेत्रों में योगदान को देखते हुए जिनमें रोजगार सृजन, संतुलित क्षेत्राीय विकास, नियार्त को बढ़ावा, आदि हैं। केंद्रीय तथा राज्य सरकारें लघु स्तरीय औद्योगिक इकाइयों को आधारभूत संरचना, वित्त, प्रौद्योगिकी तथा प्रश्िाक्षण जैसे क्षेत्रों में अपना सहयोग प्रदान कर रही हैं। वुफछ मुख्य संस्थाएँ जो सहयोग प्रदान कर रही हैं, वे हैं - वृफष्िा तथा ग्रामीण विकास राष्ट्रीय बैंक, ग्रामीण लघु व्यवसाय विकास वेंफद्र, राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम, भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक, संगठित क्षेत्रों की उद्यम इकाइयों के लिए राष्ट्रीय आयोग, ग्रामीण तथा महिला उद्यम विकास, लघु तथा मध्यवतीर् इकाइयों के लिए विश्व संघ, पारंपरिक उद्योगों की पुनर्स्थापना/पुननिर्माण हेतु कोष योजना तथा जिला उद्योग केंद्र अभ्यास लघु उत्तरीय प्रश्न ;कद्ध कौन से विभ्िान्न परिमाप/आगम हैं जो व्यवसाय के आकार को मापने में प्रयोग किए जाते हैं? ;खद्ध भारत सरकार द्वारा लघु स्तरीय उद्योग के लिए किस परिभाषा का प्रयोग किया गया है? ;गद्ध कैसे आप सहायक इकाइर् तथा छोटी इकाइर् में अंतभेर्द करेंगे। ;घद्ध वुफटीर उद्योगों की विशेषताएँ बताइए। दीघर् उत्तरीय प्रश्न ;कद्ध भारत के सामाजिक - आथ्िार्क विकास में लघु स्तरीय उद्योग योगदान देते हैं? ;खद्ध ग्रामीण भारत में लघु व्यवसाय की भूमिका का वणर्न कीजिए। ;गद्ध लघु स्तरीय उद्योग की समस्याएँ, जिनका उन्हें सामना करना पड़ता है, पर विचार विमशर् कीजिए। ;घद्ध लघु स्तरीय उद्योग की वित्त तथा विपणन की समस्याओं को हल करने के लिए सरकार ने क्या उपाय किए हैं? ;घद्ध कौन से प्रोत्साहन हैं जो सरकार द्वारा पिछड़े तथा पहाड़ी क्षेत्रों के उद्योगों के लिए सरकार द्वारा दिए गए हैं। परियोजना कायर् ;कद्ध यह पता लगाने के लिए कि कौन सी ऐसी वास्तविक समस्याएँ हैं जिनका सामना लघु स्तरीय इकाइर् के स्वामी को करना पड़ता है, एक प्रश्नावली तैयार कीजिए। इस पर एक ‘परियोजना प्रतिवेदन’ ;प्रोजेक्ट रिपोटर्द्ध तैयार कीजिए। ;खद्ध वे पाँच लघु स्तरीय इकाइयों का सवेर्क्षण कीजिए जो आपके क्षेत्रा में हों या आपकी जानकारी में हों तथा पता लगाइए कि उन्होंने किसी भी सरकार द्वारा स्थापित संस्थाओं से कोइर् सहायता/सहयोग प्राप्त किया है।

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