अध्याय 8 व्यावसायिक वित्त के ड्डोत अिागम उद्देश्य इस अध्याय के अध्ययन के पश्चात् आपः ऽ व्यावसायिक वित्त का अथर्, प्रकृति एवं महत्व को बता सवेंफगेऋ ऽ व्यावसायिक वित्त के विभ्िान्न ड्डोतों का वगीर्करण कर सकंेगेऋ ऽ वित्त के विभ्िान्न ड्डोतों के गुण एवं सीमाओं का मूल्यांकन कर सवेंफगेऋ ऽ वित्त के अंतरार्ष्ट्रीय ड्डोतों की पहचान कर सवेंफगेऋ ऽ वित्त के उचित ड्डोतों के चुनाव को प्रभावित करने वाले तत्वों की जाँच कर सकंेगे। अनिल सिंह पिछले दो वषोर् से एक जल - पान गृह चला रहे हैं। थोड़े ही समय में खाने की अद्भुत गुणवत्ता ने जल - पान गृह को प्रसि( कर दिया है। अपने इस व्यवसाय में सपफलता से अभ्िाप्रेरित श्री सिंह विभ्िान्न स्थानों पर इसी प्रकार के जल - पान गृहों की शृंखला खोलने पर विचार कर रहे हैं लेकिन अपने व्यापार के विस्तार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उनके अपने निजी ड्डोतों से उपलब्ध धन पयार्प्त नहीं है। उनके पिताजी ने उनसे कहा कि वह चाहें तो दूसरे जल - पान गृह के स्वामी के साथ साझेदारी कर सकते हैं वह अिाक धन लगाएगा। लेकिन वह व्यवसाय के लाभ एवं नियंत्राण में हिस्सेदार होगा। वह बैंक से )ण लेने की भी सोच रहा है। वह चिंतित भी है एवं भ्रमित भी क्योंकि वह यह नहीं जानता कि वह वैफसे एवं कहाँ से अतिरिक्त धन लाए। वह इस समस्या पर अपने मित्रा रमेश से विचार करता है। वह उसे दूसरे साधन जैसे अंश एवं )णपत्रा ;डिबेंचरद्ध के निगर्मन के संबंध में बताता है। जो कंपनी संगठन को ही उपलब्ध है। वह उसे दूसरी चेतावनी भी देता है कि प्रत्येक प(ति के अपने लाभ एवं सीमाएं हैं तथा अंतिम निणर्य कोष के उद्देश्य एवं अवध्ि जैसे तत्वों पर निभर्र करेगा। वह इन प(तियों का अध्ययन करना चाहता है। 8.1 परिचय यह अध्याय किसी व्यवसाय को प्रारंभ करने एवं चलाने के लिए विभ्िान्न ड्डोतों से धन जुटाने के बारे में रूपरेखा प्रस्तुत करता है। इसमें विभ्िान्न ड्डोतों के लाभ एवं सीमाओं पर भी चचार् की गइर् है एवं उन तत्त्वों को भी बताया गया है जो व्यावसायिक वित्त के उचित ड्डोत के चयन का निधार्रण करेंगे। हर उस व्यक्ित के लिए जो एक व्यवसाय प्रारंभ करना चाहता है धन जुटाने के विभ्िान्न ड्डोतों के संबंध में जानना बड़ा महत्त्वपूणर् है। उचित ड्डोत का चयन करने के लिए विभ्िान्न ड्डोतों के सापेक्ष्िाक गुणों को जानना भी महत्त्वपूणर् है। 8.2 व्यावसायिक वित्त का अथर्, प्रकृति एवं महत्त्व व्यवसाय समाज की, आवश्यकताओं की संतुष्िट के लिए वस्तु एवं सेवाओं का उत्पादन एवं वितरण करता है। व्यवसाय संचालन के लिए धन की आवश्यकता होती है। वित्त को इसीलिए व्यवसाय का जीवन रक्षक कहा जाता है। व्यवसाय के विभ्िान्न कायार्ें के लिए धन की आवश्यकता को व्यावसायिक वित्त कहते हैं। कोइर् भी व्यवसाय बिना पयार्प्त धन के कायर् नहीं कर सकता। उद्यमी जो पूँजी प्रारंभ में लगाता है, व्यवसाय के वित्त की पूरी आवश्यकता की पूतिर् के लिए पयार्प्त नहीं होती है। व्यवसायी वित्तीय आवश्यकताओं की पूतिर् के लिए इसीलिए अन्य ड्डोतों की तलाश करता है। वित्तीय आवश्यकताओं का सही आकलन एवं इसके विभ्िान्न ड्डोतों की पहचान करना किसी व्यावसायिक संगठन को चलाने का महत्वपूणर् पहलू है। वित्त की आवश्यकता व्यवसायी द्वारा व्यवसाय प्रारंभ के निणर्य के समय ही पैदा हो जाती है। वुफछ राश्िा की आवश्यकता तो तुरंत हो जाती है जैसे संयंत्रा एवं मशीन, पफनीर्चर एवं अन्य संपिायों की खरीद करनी होती है। इसी प्रकार से वुफछ कोष की आवश्यकता दिन - प्रतिदिन के कायो± के लिए होती है जैसे कच्चे माल की खरीद, कमर्चारियों को वेतन देने के लिए एवं अन्य। इसी प्रकार से जब व्यवसाय को बढ़ाना होता है तो धन की आवश्यकता होती है। व्यवसाय के लिए वित्त की आवश्यकताओं को निम्न श्रेणी में विभाजित किया जा सकता हैः ;कद्ध स्थायी पूँजी की आवश्यकताः व्यवसाय प्रारंभ करने के लिए स्थायी संपिायों जैसे भूमि एवं भवन, संयंत्रा एवं मशीनरी एवं पफनीर्चर तथा पिफक्सचसर् खरीदने के लिए धन की आवश्यकता होती है। इसे उद्यम की स्थायी पूँजी की आवश्यकता कहते हैं। स्थायी संपिायों के लिए आवश्यक पूँजी का व्यवसाय में निवेश लंबी अविा तक रहता है। विभ्िान्न व्यावसायिक इकाइयों को स्थायी पूँजी की अलग - अलग राश्िायों की आवश्यकता होती है, जो विभ्िान्न तत्वों पर निभर्र करती है जैसे - व्यवसाय की प्रकृति आदि। उदाहरण के लिए एक व्यापारिक इकाइर् को विनिमार्ण इकाइर् की तुलना में कम स्थायी पूँजी की आवश्यकता होगी। इसी प्रकार से स्थायी पूँजी की आवश्यकता एक छोटे उद्यम की अपेक्षा एक बड़े उद्यम के लिए अिाक होती है। ;खद्ध कायर्शील पूँजी की आवश्यकताः किसी उद्यम की वित्तीय आवश्यकता स्थायी संपिायों के क्रय के साथ ही समाप्त नहीं हो जाती है। व्यवसाय कितना भी व्यवसाय अध्ययन बड़ा अथवा छोटा हो उसे दिन - प्रतिदिन के कायर्कलापों के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है। इसे व्यवसाय की कायर्शील पूँजी की आवश्यकता कहते हैं। इसकी आवश्यकता माल का स्टाॅक, प्राप्यबिल जैसी चालू संपिायों के लिए एवं वेतन, मजदूरी, टैक्स एवं किराया जैसे वतर्मान खचो± के भुगतान के लिए होती है। कायर्शील पूँजी की राश्िा अलग - अलग व्यावसायिक इकाइयों के लिए अलग - अलग होती है, जो कइर् तत्वों पर निभर्र करती है उदाहरण के लिए उधार माल का विक्रय करने वाली अथवा कम बिक्री आवतर् वाली इकाइर् को माल अथवा सेवाओं की नकद बिक्री करने अथवा अिाक आवतर् वाली इकाइर् की तुलना में अिाक कायर्शील पूँजी की आवश्यकता होगी। स्थायी एवं कायर्शील पूँजी की आवश्यकता व्यवसाय के विकास एवं विस्तार के साथ बढ़ जाती है। कभी - कभी उत्पादन अथवा कायोर्ं की लागत को कम करने के लिए उच्च तकनीक का प्रयोग करना होता है जिसके लिए अतिरिक्त पूँजी की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार से त्यौहारों के मौसम के लिए अिाक स्टाॅक जमा करने अथवा चालू देनदारी का भुगतान करने या व्यवसाय के विस्तार अथवा इसके दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए भी अिाक पूँजी की आवश्यकता होती है। इसीलिए उन विभ्िान्न ड्डोतों का जिनसे पूँजी जुटाइर् जा सकती है, मूल्यांकन आवश्यक है। तालिका 8.1कोष के ड्डोतों का वगीर्करणस्वामित्व के आधर परअवध्ि के आधर पर जुटाने के ड्डोत के आधर पर .दीघर् अवध्ि- समता अंश - संचित आय - पूवार्ध्िकार अंश - )णपत्रा - वििाय संस्थानोंसे )ण - बैंकों से )ण अल्प अवध्ि- व्यापार साख - आढत - बैंक - वाण्िाज्ियक पत्रामध्य अवध्ि- बैंकों से )ण - सावर्जनिक जमा - वित्तीय संस्थानों से )ण - पट्टðाध्िवित्त स्वामित्व कोष- समता अंश - संचित प्राय )णगत कोष- )ण पत्रा - बैंकांे से )ण - वित्तीय संस्थानोंसे )ण - सावर्जनिक जमा - नीज वित्तीयन - वाण्िाज्ियक पत्रा आंतरिक ड्डोत- समता अंश पूंजी - संचित आय बाहृय ड्डोत- वित्तीय संस्थाएं - बैंकों से )ण - पूवार्ध्िकार अंश - सावर्जनिक जमा - )ण पत्रा - व्यापारिक पत्रा - व्यापार साख - पैफक्टरिंग 8.3 वित्त/धन के ड्डोतों का वगीर्करण एकल स्वामित्व एवं साझेदारी इकाइयों के लिए धन व्यक्ितगत ड्डोतों अथवा बैंक, मित्रों आदि से )ण लेकर कोष जुटाया जा सकता है। कंपनी संगठन के लिए व्यावसायिक वित्त के विभ्िान्न ड्डोत को जिन विभ्िान्न श्रेण्िायों में बांटा जा सकता है वह तालिका 8.1 में दी गइर् हंै। जैसा कि तालिका से स्पष्ट है पूँजी के ड्डोतों को विभ्िान्न आधार पर श्रेणीब( किया गया है। ये आधार हैं अविा, उत्पादन के ड्डोत तथा स्वामित्व। इस वगीर्करण एवं विभ्िान्न ड्डोतों का संक्ष्िाप्त विवरण नीचे दिया गया हैः 8.3.1 अविा के आधार पर अविा के आधार पर पूँजी के विभ्िान्न ड्डोतों को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है। ये हंै दीघर् अविा ड्डोत, मध्य अविा ड्डोत एवं अल्प अविा ड्डोत। दीघर् अविा ड्डोत व्यवसाय की पाँच वषर् से अिाक की अविा की आवश्यकताओं की पूतिर् करते हैं। इनमें जो ड्डोत सम्िमलित हैं वे हैं शेयर एवं डिबैंचर, लंबी अविा के )ण, एवं वित्तीय संस्थानों से )ण। इस प्रकार का धन उपकरण संयंत्रा आदि स्थायी संपिायों का क्रय करने के लिए आवश्यक होता है। लेकिन यदि पूँजी एक वषर् से अिाक परंतु पाँच वषर् से कम के लिए चाहिए तो मध्य अविा वित्त के ड्डोत का उपयोग करेंगे। इन ड्डोतों में सम्िमलित हैं वाण्िाज्ियक बैंकों से )ण, सावर्जनिक जमा, लीज वित्तीयन एवं वित्तीय संस्थानों से )ण। एक वषर् से कम समय के लिए पूँजी को लघु अविा वित्त कहते हैं। लघु अविा पूँजी व्यवसाय अध्ययन के ड्डोतों के वुफछ उदाहरण हंै - व्यापार साख, वाण्िाज्ियक बैंकों से )ण एवं वाण्िाज्ियक प्रपत्रा। अल्प अविा वित्त चालू संपिा जैसे प्राप्य बिल एवं स्टाॅक के लिए सवार्िाक सामान्य है। मौसमी व्यवसाय जिन्हंे संभावित बिक्री के लिए स्टाॅक जमा करना होता है। उन्हंे दो मौसम के मध्य की अविा के लिए लघु अविा वित्त की आवश्यकता होती है। थोक व्यापारी एवं विनिमार्ता जिनकी अिाकांश संपिा रहतिया अथवा प्राप्यनीय के रूप में होती है, को अल्प अविा के लिए बड़ी मात्रा में पूँजी की आवश्यकता होती है। 8.3.2 स्वामित्व के आधार पर स्वामित्व के आधार पर वित्त ड्डोतों को स्वामित्व कोष एवं )णगत कोष में वगीर्कृत किया जा सकता है। स्वामित्व कोष का अथर् है वह कोष जो उद्यम के स्वामियों ने दिया है। ये स्वामी एकल व्यापारी या साझेदार या कंपनी के अंशधारी हो सकते हैं। पूँजी के अतिरिक्त इसमें लाभ का वह भाग जो व्यवसाय में पुनः निवेश्िात है, भी सम्िमलित है। स्वामीगत पूँजी व्यवसाय में लंबी अविा के लिए लगी होती है एवं व्यवसाय के जीवनकाल में इसको लौटाना नहीं पड़ता है। यह पूँजी स्वामी को प्रबंध में नियंत्राण के अिाकार की प्राप्ित का आधार होती है। समता अंशों का निगर्मन एवं संचित आय दो मुख्य ड्डोत हैं जिनसे स्वामीगत कोष प्राप्त किये जा सकते हैं। दूसरी ओर )णगत कोष से अभ्िाप्राय )ण एवं उधार लेने के माध्यम से कोष एकत्रिात करना है। )णगत ड्डोेतों में वाण्िाज्ियक बैंकों से )ण, वित्तीय संस्थानों से )ण, )णपत्रों का निगर्मन, सावर्जनिक )ण एवं व्यापारिक साख सम्िमलित हैं। इन ड्डोतों से कोष एक निश्िचत अविा के लिए निधार्रित शतो± पर प्राप्त किये जाते हैं तथा उन्हें एक निश्िचत अविा की समाप्ित पर लौटाया जाता है। इन कोषों पर एक निश्िचत दर से ब्याज दिया जाता है। कभी - कभी तो इसका व्यवसाय पर बहुत अिाक भार हो जाता है क्योंकि कम आय होने अथवा हानि होने पर भी ब्याज का भुगतान करना होता है। सामान्यतः किसी स्थायी संपिा की जमानत पर ही ये कोष दिये जाते हैं। 8.3.3 आंतरिक एवं बाह्य सुविधओं के आधार पर कोषों के ड्डोत के श्रेणीकरण का एक और आधार कोष जुटाने के आंतरिक ड्डोत अथवा बाह्य ड्डोत हो सकता है। आंतरिक ड्डोत वह है जो संगठन में से ही जुटाए जाते हैं। उदाहरण के लिए एक व्यवसाय प्राप्य बिलों की वसूली की रफ्रतार बढ़ाने अतिरिक्त स्टाॅक को बेचने एवं अपने लाभों के पुनः विनियोग के द्वारा आंतरिक कोष पैदा करता है। कोषों के आंतरिक ड्डोत व्यवसाय की सीमित आवश्यकताओं की ही पूतिर् कर सकते हैं। कोष के बाह्य ड्डोतों में संगठन से बाहर के ड्डोत जैसे आपूतिर्कत्तार्, )णदाता एवं निवेशकत्तार् सम्िमलित हैं जब भी बड़ी मात्रा में राश्िा एकत्रिात करनी होती है। यह बाह्य ड्डोतों से पूँजी जुटाने से अिाक खचीर्ली होती है। कइर् मामलों में तो व्यावसायिक इकाइर् को बाह्य ड्डोतों से पूँजी जुटाने के लिए अपनी परिसंपिायों को गिरवी रखना पड़ता है। )ण पत्रों का निगर्मन, वाण्िाज्ियक बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों से उधार लेना एवं सावर्जनिक जमा स्वीकार करना पूँजी के बाह्य ड्डोतों के वुफछ उदाहरण हैं। 8.4 वित्त के ड्डोत एक व्यावसायिक इकाइर् विभ्िान्न ड्डोतों से पूँजी जुटा सकती है। प्रत्येक ड्डोत की अपनी विश्िाष्टताएं हैं जिन्हंे सही रूप में समझना आवश्यक है। जिससे की कोष जुटाने के सवर्श्रेष्ठ ड्डोत की पहचान की जा सके। सभी संगठनों के लिए कोइर् एक ड्डोत सवर्श्रेष्ठ नहीं होता। किस ड्डोत का उपयोग करना है इसका चुनाव स्िथति, उद्देश्य, लागत एवं जोख्िाम के आधार पर होता है। उदाहरणाथर् यदि व्यवसाय को स्िथर पूँजी की आवश्यकता की पूतिर् के लिए कोष जुटाना है तो दीघर् अवध्ि पूँजी की आवश्यकता होगी जिसे स्वामीगत पूँजी अथवा )णगत पूँजी के रूप में जुटाया जा सकता है। इसी प्रकार से यदि उद्देश्य व्यवसाय की दिन - प्रतिदिन की आवश्यकताओं की पूतिर् करना है तो अल्प अवध्ि ड्डोतों से प्राप्त किया जा सकता है। विभ्िान्न ड्डोतों का विवरण उनके लाभ एवं सीमाओं के साथ नीचे दिया गया हैः 8.4.1 संचित आय कंपनी साधारणतयाः अपनी पूरी आय को अंशधारियों में लाभंाश के रूप में नहीं वितरित करती। शु( आय के एक भाग को व्यवसाय में भविष्य में उपयोग के लिए संचित कर लेती है। इसे संचित आय या स्वयं वित्तीयकरण अथवा लाभ का पुनः विनियोग कहते हैं। किसी भी संगठन में पुनः विनियोग के लिए उपलब्ध लाभ कइर् तत्त्वों पर निभर्र करता है जैसे - शु( लाभ, लाभांश नीति एवं संगठन की आय। गुण एक वित्त के ड्डोत के रूप में संचित आय के गुण नीचे दिए गए हैंः ;कद्ध संचित आय, किसी भी संगठन की पूँजी का स्थायी ड्डोत है। ;खद्ध इसको ब्याज, लाभांश अथवा अतिरिक्त लागत के रूप में कोइर् व्यय नहीं करना पड़ता। ;गद्ध क्योंकि पूँजी आंतरिक ड्डोतों से जुटाइर् गइर् है अतः संचालन एवं स्वतंत्राता की लोचपूणर्ता अध्िक होती है। यह व्यवसाय की असंभावित हानि को आत्मसात करने की क्षमता को बढ़ाता है। ;घद्ध इससे कंपनी के समता, अंशों के बाजार मूल्य में वृि हो सकती है। सीमाएँ पूँजी के ड्डोत के रूप में संचित आय की निम्न सीमाएँ हो सकती हैंः ;कद्ध सीमा से अिाक लाभ का पुनः निवेश अंशधारकों में अंसतोष का कारण बन सकता है क्योंकि अब उनको उपाजिर्त लाभ से कम लाभांश मिलता है। ;खद्ध व्यवसाय के लाभों की अस्िथरता के कारण यह पूँजी का अनिश्िचत ड्डोत है। ;गद्ध इस पूँजी के संयोग लागत को बहुत - सी पफमर् मान्यता नहीं देती। इससे कोषों का अनुपयुक्त उपयोग होगा। व्यवसाय अध्ययन 8.4.2 व्यापारिक साख व्यापारिक साख एक व्यापारी द्वारा दूसरे व्यापारी को वस्तु एवं सेवाओं के क्रय के लिए दी गइर् उधार सुविधा को कहते हैं। व्यापारिक साख बिना तुरंत भुगतान किए माल की आपूतिर् को संभव बनाती है। क्रयकत्तार् के खातों में यह साख विभ्िान्न लेनदार या देय के नाम से दिखायी जाती हैं। व्यापारिक साख को व्यावसायिक संगठन एक अल्प अवध्ि वित्त के ड्डोत के रूप में उपयोग करते हैं। यह उन ग्राहकों को दी जाती है जिनकी वित्तीय स्िथति सुदृढ़ एवं ख्याति होती है। साख की मात्रा एवं अविा जिन कारकों पर निभर्र करती है वे हैं क्रेता पफमर् की साख, विक्रेता की वित्तीय स्िथति, क्रय की मात्रा, भुगतान का पिछला शेष एवं बाजार में प्रतियोगिता की सीमा। व्यापार साख की शतेर्ं अलग - अलग उद्योगों एवं अलग - अलग लोगों के लिए अलग - अलग होंगी। एक पफमर् अलग - अलग ग्राहकों को अलग - अलग शतोर्ं पर उधार की सुविधा दे सकती है। गुण व्यापारिक साख के प्रमुख लाभ निम्न हैंः ;कद्ध व्यापारिक साख कोषों का सुविधाजनक एवं सतत् ड्डोत है। ;खद्ध यदि ग्राहक की साख की स्िथति का विक्रेता को ज्ञान हो तो व्यापारिक साख तुरंत मिल जाती है। ;गद्ध व्यापारिक साख संगठन की बिक्री को बढ़ाती है। ;घद्ध यदि कोइर् संगठन निकट भविष्य में बिक्री में संभावित वृि की आपूतिर् के लिए भंडार स्तर में वृि करना चाहता है तो वह इसके वित्तीयन के लिए व्यापारिक साख का प्रयोग कर सकता है। ;घद्ध कोष की व्यवस्था से इसका संपिायों पर कोइर् आभार नहीं होता। सीमाएँ व्यापारिक साख की पूँजी के ड्डोत के रूप में वुफछ सीमाएँ हैं जो इस प्रकार हैंः ;कद्ध व्यापारिक साख की आसान एवं लोचपूणर् सुविधाओं का मिलना किसी भी पफमर् को अति व्यापार के लिए प्रेरित कर सकता है जिससे पफमर् की जोख्िाम बढ़ती है। ;खद्ध व्यापारिक साख के माध्यम से सीमित कोष ही जुटाए जा सकते हैं। ;गद्ध धन एकत्रिात करने के अिाकांश ड्डोतों की तुलना में यह खचीर्ला ड्डोत होता है। 8.4.3 आढ़त आढ़त एक ऐसी वित्त संबंिात सेवा है जिसमें आढ़तीया विभ्िान्न सेवाएँ प्रदान करता है जो इस प्रकार हैं। ;कद्ध विपत्रों को भुनाना ;भय अथवा बिना साखद्ध एवं ग्राहकोें की लेनदारी को वसूल करना - इसमें वस्तु एवं सेवाओं के कारण प्राप्य बिलों को एक निश्िचत कटौती पर पैफक्टर को बेच दिया जाता है। सभी साख नियंत्राण एवं क्रेता से उधार वसूली का पूरा उत्तदायित्व पैफक्टर का होता है एवं पफमर् को अप्राप्य )णों के कारण होने वाली हानि से सुरक्षा प्रदान करता है। पैफक्टरिंग की दो वििायाँ होती हैं - आलंबन सहित पैफक्टरिंग, आलंबन रहित पैफक्टरिंग। आलंबन सहित पैफक्टरिंग में ग्राहक को अप्राप्य )णों की जोख्िाम से सुरक्षा नहीं दी जाती है जबकि आलम्बन रहित पैफक्टरिंग में पैफक्टर साख के कारण पूरी जोख्िाम को वहन करता है अथार्त् देनदारी यदि प्राप्य हो जाए तो ग्राहक को बीजक की पूरी राश्िा का भुगतान किया जाएगा। ;खद्ध संभावित ग्राहक आदि की साख के संबंध में सूचना देना - पैफक्टर पफमोर्ं के व्यापार संबंिात इतिहास की पूरी जानकारी रखता है। पैफक्टरिंग की सेवाएँ लेने वालों के लिए यह मूल्यवान जानकारी होती है। इससे वह उन लोगों से व्यापार करने से बच जाएंगे जो भुगतान के संबंध में खरे नहीं हैं। पैफक्टर वित्त विपणन आदि के क्षेत्रा में भी उपयुक्त सलाह सेवाएँ प्रदान करते हैं। पैफक्टर अपनी सेवाओं के बदले पफीस लेते हैं। पैफक्टरिंग की सेवाएँ रिजवर् बैंक आॅपफ इंडिया की पहल के पफलस्वरूप भारतीय वित्त के क्षेत्रा में 90 के दशक के प्रारंभ में हुइर्। पैफक्टरिंग की सेवाएँ प्रदान करने वाले संगठनों में स्टेट बैंक आॅपफ इंडिया आढ़तिये तथा वाण्िाज्ियक सेवा लि., केन बैंक पैफक्टन लि., पफारमोस्ट पैफक्टर लि. एवं इनके अतिरिक्त कइर् गैर बैंकिग वित्त कंपनियाँ तथा अन्य दूसरी एजेंसियाँ पैफक्टरिंग सेवाएँ प्रदान करती हैं। गुण वित्तीय ड्डोत के रूप में पैफक्टरिंग के निम्न लाभ हैंः ;कद्ध पैफक्टरिंग के द्वारा कोष जुटाना बैंक जैसे वित्तीयन के अन्य माध्यमों से सस्ता होता है। ;खद्ध पैफक्टरिंग के माध्यम से रोकड़ प्रवाह बढ़ने से ग्राहक अपनी देयताओं के देय होने पर तुरंत भुगतान कर सकता है। ;गद्ध पैफक्टरिंग धन का लचीला ड्डोत है एवं उधार विक्रय से रोकड़ प्रवाह के एक निश्िचत स्वरूप को सुनिश्िचत करता है। एक ऐसी लेनदारी जिसे शायद पफमर् अन्यथा वसूल न कर पाए यह उसे सुरक्ष्िात करता है। ;घद्ध यह पफमर् की संपिा पर कोइर् भार नहीं पैदा करता। ;घद्ध क्योंकि पैफक्टर साख नियंत्राण का पूरा दायित्व अपने कधों पर ले लेता है, इसलिए ग्राहक व्यवसाय के दूसरे संचालन क्षेत्रों में ध्यान वेंफदि्रत कर सकता है। सीमाएँ वित्त के ड्डोत के रूप में पैफक्टरिंग की निम्न सीमाएँ हैंः ;कद्ध जब बीजक छोटी राश्िा के हों एवं बड़ी संख्या में हों तो यह ड्डोत खचीर्ला हो जाता है। ;खद्ध पैफक्टर पफमर् अगि्रम वित्त सामान्यतः ब्याज की प्रचलित दर की तुलना में ऊँची दर से उपलब्ध कराती है। ;गद्ध पैफक्टर ग्राहक के लिए तीसरा पक्ष होता व्यवसाय अध्ययन है। हो सकता है कि वह इससे व्यवहार करने में सहजता अनुभव न करें। 8.4.4 लीज वित्तीयन लीज एक अनुबंध होता है एक पक्ष अथार्त संपिा का स्वामी दूसरे पक्ष को आविाक भुगतान के बदले में संपिा के प्रयोग का अिाकार देता है। दूसरे शब्दों में यह संपति को निश्िचत अविा के लिए किराए पर देना है। संपति का स्वामी पट्टðाकार कहलाता है जबकि संपिा का उपयोगकत्तार् पट्टðाधारी कहलाता है ;देखें बाॅक्सद्ध। पट्टðाधारी पट्टðाकार को संपिा के उपयोग के बदले में निश्िचत आवध्िक राश्िा का भुगतान करता है जिसे पट्टðा किराया कहते हैं। लीज की व्यवस्था के नियमन के लिए शते± लीज अथवा पट्टðा अनुबंध में दी जाती है। लीज अथवा पट्टðे की अवध्ि के अंत में संपिा पट्टðाकार के पास वापस चली जाती है। पट्टेð के माध्यम से वित्त पफमर् के आधुनिकीकरण एवं विविधीकरण के लिए महत्त्वपूणर् साधन हैं। इस प्रकार वित्तीयन ऐसी संपिायों के क्रय करने के लिए अिाक प्रचलित है जो तीव्रता से बदलते तकनीकी विकास के कारण शीघ्र अप्रचलित हो जाती हैं जैसे कंप्यूटसर्, इलैक्ट्रोनिक उपकरण आदि। पट्टेð पर लेने का निणर्य लेने से पहले, संपिा को पट्टðे पर क्रय करने से पहले की लागत को उसके स्वामित्व को क्रय कर लेने की लागत से तुलना करनी आवश्यक है। गुण लीज वित्तीयन के महत्वपूणर् लाभ निम्न हैं ;कद्ध इसके कारण पट्टðाधारक को कम निवेश कर संपिा प्राप्त हो जाती है। वुफछ उदाहरणः पट्टðाकार 1.विश्िाष्ट लीजिंग कंपनियाँः लगभग ऐसी चार सौ बड़ी कंपनियाँ हंै जिनका संगठन लीजिंग पर वेंफदि्रत है जिसके कारण इन्हें लीजिंग कंपनी कहते हैं। 2.बैंक एवं उनके सहायक बैंकः पफरवरी 1994 में रिजवर् बैंक आॅपफ इंडिया ने बैंकों को लीजिंग के प्रत्यक्ष व्यापार की अनुमति प्रदान की। इससे पहले तक लीजिंग व्यवसाय की केवल सहायक बैंकों को ही अनुमति थी जिसे रिजवर् बैंक आॅपफ इंडिया एक गैर - बैंकिग कायर् मानता था। 3.विश्िाष्ट वित्तीय संस्थानः भारत में वेंफद्रीय एवं राज्य स्तर पर अनेकों वित्तीय संस्थान लीज को पारंपरिक वित्तीय साधनों के रूप में प्रयोग करते हैं। महत्त्वपूणर् बात यह है कि आइर्.सी.आइर्.सी.आइर्;प्ब्प्ब्प्द्ध भारत में लीजिंग व्यवसाय में अग्रणीयों में से एक है। 4.पट्टðाकार विनिमार्ताः प्रतियोगिता के कारण विनिमार्ता अपनी बिक्री को बढ़ाना चाहता है। इसके लिए लीज पर बेचना सवोर्त्तम साधन है पट्टðे पर विक्रय का महत्त्व दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है। आज - कल आॅटोमोबाइल उपभोक्ता की टिकाऊ वस्तुओं आदि के विक्रेताओं अपने उत्पादों के लिए लीज वित्त देने के लिए लीजिंग कंपनियों के साथ गठबंधन कर लिया है या उनके साथ अल्पकालीन साझेदारी कर ली है। पट्टðाधारक 1.सावर्जनिक क्षेत्राीय उपक्रमः इस बाजार का पिछले वषोर्ं में ऊँची दर से विकास हुआ है। बड़ी मात्रा में वेंफद्रीय एवं राज्य के स्वामित्व की इकाइयों ने लीज वित्तीयन का सहारा लिया है। 2.मध्य बाजारी वंफपनियाँः मध्य बाजारीय कंपनियाँ अथार्त् सामान्यतः अच्छे साख वाली परंतु आम जनता से कम संबंध रखने वाली कंपनियाँ भी, बैंक अथवा संस्थागत वित्तीयन के विकल्प के रूप लीज वित्तीयन को अपना रही हैं। 3.उपभोक्ताः हालांकि निगमित वित्तीयन के साथ कटु अनुभव के कारण उपभोक्ता की स्थायी वस्तुओं के लिए धन उपलब्ध कराने पर ध्यान वेंफदि्रत किया है। उदाहरण के लिए आज भारत का कार ली¯जग एक बड़ा बाजार है। 4.सरकारी विभाग एवं प्रािाकरणः लीजिंग के बाजार में नवीनतम प्रविष्िट सरकार स्वयं की हुइर् है। वेंफद्रीय सरकार के दूर - संचार विभाग 1000 करोड़ रुपये के लीज वित्त के निखर् माँग कर अग्रणी रहा है। ;खद्ध सरल प्रलेखीकरण के माध्यम से संपिायों का वित्तीयन आसान हो जाता है। ;गद्ध पट्टðाधारक द्वारा भुगतान किया गया लीज किराया कर योग्य लाभ की गणना करने के लिए घटाया जाता है। ;घद्ध इसके द्वारा वित्त लेने पर स्वामित्व अथवा व्यवसाय पर नियंत्राण कम नहीं होता है। ;घद्ध लीज समझौते से व्यावसायिक इकाइर् की )ण लेने की क्षमता पर कोइर् प्रभाव नहीं पड़ता है। ;चद्ध पट्टðाकार ही अप्रचलन के जोख्िाम को वहन करता है। इससे पट्टðाधारक को संपिा के पुनस्थर्पन के लिए अिाक अवसर मिल जाता है। सीमाएँ लीज वित्तीयन की निम्न सीमाएँ हैंः ;कद्ध लीज व्यवस्था संपिा के उपयोग पर कइर् प्रकार की रोक लगाती है। उदाहरण के लिए पट्टðाधारक को संपिा में किसी प्रकार का परिवतर्न अथवा उसमें संशोधन की अनुमति नहीं देना। ;खद्ध पट्टðटे का नवीनीकरण न होने पर सामान्य व्यवसाय संचालन प्रभावित हो सकता है। ;गद्ध उपकरण यदि अनुपयोगी है एवं पट्टðाधारी लीज अनुबंध को इसकी निधार्रित अविा से पूवर् ही समाप्त करना चाहता है तो इसके लिए ऊँची राश्िा का भुगतान करना पड़ सकता है। ;घद्ध पट्टðाधारक संपिा का कभी भी स्वामी नहीं बन सकता उसे इसका अवशेष मूल्य भी नहीं मिलता। 8.4.5 सावर्जनिक जमा जब संगठन सीधे जनता से धन जमा करते हैं तो इसे सावर्जनिक जमा कहते हैं। सावर्जनिक जमा पर साधारणतया बैंक जमा पर दिए जाने वाले ब्याज से ऊँचे दर से ब्याज दिया जाता है। जो भी व्यक्ित किसी संगठन में राश्िा जमा करना चाहता है तो उसे इसके लिए एक पफामर् भरना होता है। संगठन इसके बदले में )ण के प्रमाणस्वरूप जमा प्राप्ित की रसीद देता है। सावर्जनिक जमा व्यवसाय की मध्य एवं लघु व्यवसाय अध्ययन अविा दोनों वित्तीय आवश्यकताओं के लिए उपयोगी है। सावर्जनिक जमा, जमाकत्तार् एवं संगठन दोनों के लिए उपयुक्त रहता है जबकि जमाकत्तार्ओं को बैंक से अिाक दर से ब्याज मिलता है तो कंपनियों के लिए जमा की लागत बैंकों से )ण लेने की लागत से कम होती है। कंपनियाँ साधारणतः तीन वषर् के लिए सावर्जनिक जमा को आमंत्रिात करती हैं। सावर्जनिक जमा की स्वीकृति का नियमन भारतीय रिजवर् बैंक द्वारा होता है। सावर्जनिक जमा के निम्न लाभ हैंः गुण ;कद्ध जमा प्राप्ित की प्रिया सरल है एवं किसी प्रकार की प्रतिबंधन शते± नहीं होती जैसी कि साधारणतः )ण अनुबंधों में होती हैं। ;खद्ध सावर्जनिक जमा पर किया गया व्यय बैंक एवं वित्तीय संस्थाओं से )णों की लागत से कम होता है। ;गद्ध सावर्जनिक जमा आमतौर पर कंपनी की परिसंपिायों पर प्रभार नहीं। परिसंपिायों को अन्य ड्डोतों से )ण जुटाने के लिए जमानत के तौर पर उपयोग में लाया जा सकता है। ;घद्ध जमाकत्तार्ओं के पास वोट देने का अिाकार नहीं होता है। इसलिए कंपनी पर नियंत्राण प्रभावित नहीं होता है। सीमाएँ सावर्जनिक जमा की प्रमुख सीमाएँ निम्न हैः ;कद्ध नइर् कंपनियों के लिए सावर्जनिक जमा के द्वारा कोष जुटाना कठिन होता है। ;खद्ध यह वित्त प्रबंध्न का विश्वास योग्य ड्डोत नहीं है, क्योंकि हो सकता है कि जब कंपनी को ध्न की आवश्यकता हो और जनता सहयोग ही न करे। ;गद्ध सावर्जनिक जमा को जुटाना कठिन होता है विशेषतः जबकि जमा की राश्िा बड़ी मात्रा में हो। 8.4.6 वाण्िाज्ियक पत्रा अल्प अविा वित्त के ड्डोत के रूप में वाण्िाज्ियक पत्रों का प्रादुभार्व 90 के दशक के प्रारंभ में हुआ। वाण्िाज्ियक पत्रा किसी पफमर् द्वारा अल्प अवध्ि के लिए कोष जुटाने के लिए एक गैर - जमानती प्रतिज्ञा - पत्रा होता है। यह अवध्ि 90 दिन से 364 दिन तक की हो सकती है। इसे एक पफमर् दूसरी पफमर् को बीमा कंपनी को पेंशन कोष एवं बैंकांे को जारी करती है क्योंकि यह पूणर् असुरक्ष्िात होता है अच्छी साख वाली पफमे± ही वाण्िाज्ियक पत्रा को जारी कर सकती हैं। इसका नियमन भारतीय रिजवर् बैंक के कायर् क्षेत्रा में आता है। वाण्िाज्ियक पत्रों के लाभ एवं उनकी सीमाएँ नीचे दी गइर् हैंः लाभ ;कद्ध वाण्िाज्ियक पत्रा को बिना किसी जमानत के बेचा जाता है तथा इस पर किसी प्रकार की प्रतिबंिात शते± नहीं होती। ;खद्ध क्यांेकि यह एक स्वतंत्रा रूप से हस्तांतरणीय विलेख होता है इसकी तरलता अिाक होती है। ;गद्ध अन्य ड्डोतों की तुलना में इससे अिाक कोष जुटाए जा सकते हैं। वाण्िाज्ियक पत्रा जारी करने वाली पफमर् के लिए इसे जारी करने की लागत वाण्िाज्ियक बैंकों से )ण लेने पर आने वाली लागत से कम होती है। ;घद्ध वाण्िाज्ियक पत्रा से कोषों की प्राप्ित अबाध गति से प्राप्त होती है क्योंकि इसके भुगतान को जारीकत्तार् पफमर् की आवश्यकतानुसार ढाला जा सकता है। इसके अतिरिक्त परिपक्व हो रहे वाण्िाज्ियक पत्रा का भुगतान नये वाण्िाज्ियक पत्रा को बेच कर किया जा सकता है। ;घद्ध कंपनियाँ अपने अतिरिक्त कोष को वाण्िाज्ियक पत्रा में लगाकर अच्छा प्रतिपफल प्राप्त कर सकते हैं। सीमाएँ ;कद्ध वाण्िाज्ियक पत्रों के माध्यम से केवल अच्छी वित्तीय स्िथति एवं उच्च कोटि वाली पफमे± ही धन जुटा सकती हैं। नइर् एवं सामान्य कोटि की पफमे± इस प(ति से धन एकत्रिात नहीं कर सकती। ;खद्ध वाण्िाज्ियक पत्रा के माध्यम से जो राश्िा जुटाइर् जा सकती है, वह किसी भी एक समय पर आपूतिर्कतार्ओं के पास उपलब्ध अतिरिक्त रोकड़ तक सीमित होती है। ;गद्ध वाण्िाज्ियक पत्रा वित्तीयन का एक अव्यक्ितगत साधन होता है। यदि पफमर् वित्तीय कठिनाइयों के कारण वाण्िाज्ियक पत्रा का शोधन नहीं कर पाती तो वाण्िाज्ियक पत्रा की भुगतान तिथ्िा को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। 8.4.7 अंशों का निगर्मन अंशों के निगर्मन से प्राप्त पूँजी, अंश पूँजी कहलाती है। एक कंपनी की पूँजी छोटे - छोटे यूनिटों में विभक्त होती हैं, जिन्हें अंश कहते हैं। उदाहरणतः एक कंपनी 10 रुपये वाले 1,00,000 अंशों का निगर्मन 10,00,000 रुपये की पूँजी के लिए कर सकती है अंशों के धारक अंशधारी कहलाते हैं। प्राय अंश दो प्रकार के होते हैं जो कंपनी द्वारा निगर्मित होते हैं, समता अंश तथा पूवार्ध्िकार अंश। समता अंशों के निगर्मन से प्राप्त पूँजी, समता अंश पूँजी तथा पूवार्ध्िकार अंशों के निगर्मन से प्राप्त पूँजी पूवार्ध्िकारी अंश पूंँजी कहलाती है। ;अद्ध समता अंशः अंशों का निगर्मन किसी कंपनी द्वारा दीघर् अवध्ि पूँजी जुटाने के लिए सवार्िाक महत्त्वपूणर् ड्डोत है। समता अंश कंपनी की स्वामीगत पूँजी होती है इसलिए इन अंशों के माध्यम से जुटाइर् गइर् पूँजी को स्वामीगत पूँजी अथवा स्वामी के कोष भी कहते हैं। समता अंश पूँजी कंपनी के निमार्ण के पूवर् अपेक्ष्िात होती है। समता अंशधारकों को निश्िचत लाभांश नहीं मिलता बल्िक उन्हें कंपनी की आय के आधार पर भुगतान किया जाता है। इन्हें अवश्िाष्ट स्वामी की संज्ञा दी गइर् है क्योंकि इन्हें वंफपनी की आय एवं संपिायों के विरू( अन्य सभी दावों का भुगतान करने के पश्चात की बचत प्राप्त होती है। इन्हें स्वामित्व का पुरस्कार भी मिलता है तो इसकी जोख्िाम भी वहन करते हैं। उनका दायित्व कंपनी में उनके द्वारा लगाइर् पूँजी तक सीमित रहता है। इसके व्यवसाय अध्ययन साथ ही अपने वोट देने के अिाकार के माध्यम से इन अंशधारकों को कंपनी के प्रबंध में भागीदारी का अिाकार प्राप्त होता है। गुण समता अंशों के माध्यम से कोष जुटाने के महत्त्वपूणर् लाभ नीचे दिये गए हैंः ;कद्ध समता अंश उन निवेशकों के लिए उपयुक्त हैं जो अिाक आय के लिए जोख्िाम उठाने के लिए तत्पर होते हैं। ;खद्ध समता अंश धारकों को लाभंाश का भुगतान अनिवायर् नहीं है। इसलिए इसका कंपनी पर कोइर् भार नहीं होता है। ;गद्ध समता पूँजी स्थायी होती है क्योंकि इसको केवल वंफपनी के समापन पर ही लौटाया जाता है। ;घद्ध समता पूँजी वंफपनी की साख बनाती है एवं संभावित )णदाताओं में विश्वास पैदा करती है। ;घद्ध वंफपनी की संपिायों पर किसी प्रकार के प्रभार के बिना भी समता अंशों के माध्यम से कोष जुटाए जा सकते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर उधार लेने के लिए कंपनी की संपिायों को गिरवी रखा जा सकता है। ;चद्ध समता अंशों के मतािाकार के कारण कंपनी के प्रबंध पर प्रजातांत्रिाक नियंत्राण रहता है। सीमाएँ समता अंशों के माध्यम से धन जुटाने की प्रमुख सीमाएँ निम्न हैंः - ;कद्ध जो निवेशक नियमित आय चाहते हैं वे समता अंशों को प्राथमिकता नहीं देते क्यांेकि इन पर प्रतिपफल में परिवतर्न होता रहता है। ;खद्ध समता अंशों पर लागत अन्य ड्डोतों से कोष एकत्रिात करने पर किये गए व्यय से अिाक होती है। ;गद्ध अतिरिक्त समता अंशांे का निगर्मन वतर्मान अंशधारकों की मतािाकार शक्ित एवं आय को कम करती है। ;घद्ध समता अंशों के माध्यम से कोष एकत्रिात करने में अिाक औपचारिकताओं को पूरा करने में प्रियात्मक देरी होती है। ;बद्ध पूवार्िाकार अंशः पूवार्िाकार अंशों के निगर्मन द्वारा जुटाइर् गइर् पूँजी को पूवार्िाकार अंश पूँजी कहते हैं। पूवार्िाकार अंशधारियों की समता अंशधारियों की तुलना में दो ही क्षेत्रों में प्राथमिकता प्राप्त होती है। ;कद्ध वंफपनी के शु( लाभ में से समता अंश धारकों के लिए लाभांश घोष्िात करने से पूवर् स्िथर दर से लाभंाश प्राप्त करना। ;खद्ध समापन के समय वंफपनी के लेनदारों के दावों का भुगतान करने के पश्चात् पूँजी की वापसी, दूसरे शब्दों में पूवार्िाकार अंशधारकों को समता अंशधारकों की तुलना में लाभांश तथा पूँजी की वापसी के लिए प्राथमिकता प्राप्त होती है। पूवार्िाकार अंश )णपत्रों के अनुरूप होते हैं क्योंकि लाभांश का भुगतान निदेशकों के विवेक पर निभर्र करता है एवं टैक्स काट कर लाभ में से किया जाता है। इस कारण से यह समता अंशों से मिलते - जुलते हैं। इस प्रकार से पूवार्िाकार अंशों में वुफछ विशेषताएँ समता अंश एवं )णपत्रा दोनों की होती हैं। पूवार्िाकार अंशों का साधारणतः मतािाकार प्राप्त नहीं होते हैं। एक कंपनी विभ्िान्न प्रकार के पूवार्िाकार अंश जारी कर सकती हैं ;देखें बाॅक्सद्ध गुण ;कद्ध पूवार्िाकार अंशों के निम्न गुण हैंः पूवार्िाकार अंशों पर स्िथर दर से प्रतिपफल के कारण नियमित आय होती है तथा निवेश भी सुरक्ष्िात रहता है। ;खद्ध पूवार्िाकार अंश उन निवेशकों के लिए बहुत उपयुक्त रहते हैं जो स्िथर दर से प्रतिपफल चाहते हैं तथा कम जोख्िाम उठाना चाहते हैं। ;गद्ध जैसा कि पूवार्ध्िकार अंशधरियों को वोट देने का अध्िकार नहीं होता है, अतः वे समता अंशधरियों के प्रबंध् में नियंत्राण पर कोइर् प्रभाव नहीं डालते। ;घद्ध पूवार्ध्िकार अंशधरियों का निश्िचत लाभांश होने के कारण कंपनी अच्छे समय में कंपनी समता अंशधारकों को ऊँची दर से लाभांश दे सकती है। ;घद्ध कंपनी के समापन पर पूवार्िाकार अंशधारकों को समता अंशधारकों की तुलना मंे पूँजी की वापसी के लिए पूवार्िाकार होता है। ;चद्ध पूवार्िाकार अंश पूँजी का कंपनी की संपिा पर किसी प्रकार का प्रभार नहीं होता है। सीमाएँ व्यावसायिक वित्त ड्डोत के रूप में पूवार्ध्िकार अंशों की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिख्िात हैंः ;कद्ध पूवार्ध्िकार अंश उन निवेशकों के लिए उपयुक्त नहीं हैं जो जोख्िाम उठाने के लिए तैयार नहीं हैं। ;खद्ध पूवार्िाकार अंशों के निगर्मन के कारण कंपनी की संपिायों पर समता अंशधारकों का दावा कम हो जाता है। ;गद्ध पूवार्िाकार अंशों पर लाभांश की दर )णपत्रों पर ब्याज की दर से अिाक होती है। ;घद्ध इन अंशों पर उसी स्िथति में लाभांश का भुगतान किया जाता है जब कंपनी लाभ व्यवसाय अध्ययन कमा रही हो। इसलिए निवेशकों को प्रतिपफल सुनिश्िचत नहीं है। इसलिए इन अंशों के प्रति निवेशकों का आकषर्ण कम होता है। ;घद्ध लाभांश को व्यय के रूप में लाभ मंे से नहीं घटाया जाता। इसलिए कोइर् कर की बचत कंपनी को नहीं होती है जैसा कि )णों पर ब्याज में होता है। 8.4.8 )ण पत्रा )ण पत्रा दीघर् अवध्ि )णगत पूँजी एकत्रिात करने का एक महत्त्वपूणर् विलेख है। एक कंपनी )णपत्रा जारी कर कोष जुटा सकती है। जिन पर स्िथर दर से ब्याज दिया जाता है। पूवार्िाकार अंशों के प्रकार 1 संचयी एवं असंचयीः जिन पूवार्िाकार अंशों पर लाभांश का किसी वषर् में भुगतान नहीं किया जाता और अदत्त लाभंाश भविष्य के वषो± के लिए जुड़ता जाता है इन्हें संचयी पूवार्िाकार अंश कहते हैं। दूसरी ओर असंचयी पूवार्िाकार अंशों पर यदि किसी वषर् लाभांश नही दिया जाता तो यह आगामी वषो± के लिए जुड़ता नहीं है। 2 भागीदारी एवं अभागीदारीः जिन पूवार्िाकार अंशों को समता अंशधारकों को एक निश्िचत दर से लाभांश का भुगतान करने के पश्चात कंपनी के अिाक लाभ में भागीदारी का अिाकार होता है। उन्हें भागीदारी पूवार्िाकार अंश कहते हैं। अभागीदारी पूवार्िाकार अंश वह होते हैं जिनको कंपनी के लाभों में इस प्रकार की भागीदारी का अिाकार नहीं होता है। 3 परिवतर्नीय एवं अपरिवतर्नीयः जिन पूवर्िाकार अंशों को एक निश्िचत समय में समता अंशों में परिवतिर्त किया जा सकता है, उन्हें परिवतर्नीय पूवार्िाकार अंश कहते हैं। दूसरी ओर गैर - परिवतर्नीय अंश समता अंशों में परिवतिर्त नहीं किए जा सकते। महिन्द्रा एंड महिन्द्रा भारत की पहली कंपनी थी। जिसने जनवरी 1990 में परिवतर्नीय शून्य ब्याज )णपत्रा जारी किए। टाइटन इंडस्ट्रीज बोडर् लगभग 126.83 करोड रु एकत्रिात करने के लिए अध्िकार के आधार पर आंश्िाक परिवतर्नीय )ण पत्रों के निगर्मन की अनुमति दे दी है। यह निगर्मन 600 करोड़ रु प्रति के 21 लाख आंश्िाक परिवतर्नीय )ण पत्रों का होगा। यह कंपनी के प्रत्येक 20 समता अंशधारकों को एक आंश्िाक परिवतर्नीय )णपत्रा के अनुपात में होगा। वंफपनी द्वारा जारी )ण पत्रा वंफपनी द्वारा लिए गए एक निश्िचत राश्िा के )ण की स्वीकृति है। जिसको भविष्य में भुगतान का यह वचन देती है। )ण पत्राधरी इसीलिए कंपनी के लेनदार होते हैं। )ण पत्रा धारकों को एक निश्िचत ब्याज की राश्िा एक निश्िचत अंतराल जैसे छः महीने अथवा एक वषर् पर भुगतान किया जाता है। )ण पत्रों का सावर्जनिक निगर्मन के लिए ब्त्प्ैप्स् ;भारतीय साख, स्तर निधार्रण एवं सूचना सेवाएँ लि.द्ध जैसी साख निधार्रण एजेंसी द्वारा जारी ;इश्यूद्ध की साख का स्तरीयकरण किया जाना चाहिए। इसके लिए जिन पक्षों को ध्यान में रखा जाता है वह कंपनी का विकास का लेखा - जोखा, इसकी लाभप्रदता, )ण चुकाने की क्षमता, साख एवं )ण देने मे निहित जोख्िाम। कंपनी विभ्िान्न प्रकार के )ण पत्रा निगर्मित कर सकती है। शून्य ब्याज )ण पत्रा ;र्प्क्द्ध जिन पर स्पष्टतया कोइर् ब्याज नहीं लगता हाल के वषो± में कापफी प्रचलित हुए हैं। )णपत्रा के अंकित मूल्य एवं इसके क्रय मूल्य का अंतर निवेशक की आय है। गुण )णपत्रों के माध्यम से कोष एकत्रिात करने के निम्न लाभ हैंः ;कद्ध यह कम जोख्िाम एवं स्िथर आय के लिए निवेशकों की पहली पंसद है। ;खद्ध )णपत्रा स्िथर प्रभाव कोष होते हैं एवं यह कंपनी के लाभ में भागीदार नहीं होते हैं। ;गद्ध )णपत्रों का निगर्मन उस स्िथति में उपयुक्त रहता है जब बिक्री एवं आय स्िथर होती है। ;घद्ध क्योंकि )ण पत्रों के साथ मतािाकार नहीं होता है। इसलिए इनके माध्यम से वित्तीयन के समता अंशधारकों का प्रबंध पर नियंत्राण कम नहीं होता है। ;घद्ध पूवार्िाकार अंशों अथवा समता पूँजी की तुलना में )ण पत्रों के माध्यम से वित्तीयन )ण पत्रों के प्रकार 1ण् सुरक्ष्िात एवं असुरक्ष्िातः सुरक्ष्िात )णपत्रा वे होते हैं जो कंपनी की परिसंपिायांे को बंधक रख कर, उन पर )ण भार डालते हैं। असुरक्ष्िात )णपत्रों को कंपनी की परिसंपिायों पर न तो कोइर् )ण भार होता है और न ही वह प्रतिभूति होती है। 2ण् पंजीकृत एवं वाहकः पंजीकृत )णपत्रा वे होते हैं जिनका कंपनी के रजिस्ट्रार में लेखा - जोखा होता है। इन्हें केवल नियमित हस्तांतरण विलेख द्वारा ही हस्तांतरित किया जा सकता है। इसके विपरीत जिन )ण पत्रों का सुपुदर्गी मात्रा से हस्तांतरण हो सकता हो, उन्हें वाहक )ण पत्रा कहते हैं। 3ण् परिवतर्नीय एवं गैर परिवतर्नीयः - परिवतर्नीय )ण पत्रा वह )ण पत्रा होते हैं जिन्हें एक निधार्रित अविा की समाप्ित पर समता अंशों में परिवतिर्त किया जा सकता है। दूसरी ओर अपरिवतर्नीय )ण पत्रा वे होते हैं जिन्हें समता अंशों में परिवतिर्त नहीं किया जा सकता है। 4ण् प्रथम एवं द्वितीयः जिन )ण पत्रों का भुगतान दूसरे )णपत्रों से पहले होता है उन्हें प्रथम )ण पत्रा कहते हैं। द्वितीय )ण पत्रा वे होते हैं, जिनका भुगतान प्रथम )ण पत्रों के भुगतान के पश्चात किया जाता है। कम खचीर्ला होता है क्योंकि )ण पत्रों पर जो ब्याज दिया जाता है, वह कर निधार्रण के लिए आय में से घटाया जाता है। सीमाएँ वित्त के ड्डोत के रूप में )ण पत्रों की वुफछ सीमाएँ होती है। यह नीचे दी गइर् हैंः ;कद्ध )ण पत्रा क्योंकि स्िथर भार विलेख होते हैं इसलिए इनका कंपनी की आय पर स्थायी भार बना रहता है। जब कंपनी की आय घटती - बढ़ती हो, तो जोख्िाम अध्िक होता है। ;खद्ध यदि )ण पत्रा शोध्य है तो वित्तीय कठिनाइर् की अविा के समय भी कंपनी को निधार्रित तिथ्िा तक उनके भुगतान के लिए प्रावधान करना होता है। ;गद्ध प्रत्येक कंपनी की निश्िचत )ण लेने की क्षमता होती हैं। )ण पत्रों के निगर्मन से कंपनी की ओर आगे )ण लेने की क्षमता कम हो जाती है। 8.4.9 वाण्िाज्ियक बैंक वित्तीय ड्डोत के रूप में वाण्िाज्ियक बैंकों का महत्त्वपूणर् स्थान है क्योंकि यह विभ्िान्न उद्देश्यों एवं पृथक समय अविा के लिए धन प्रदान करते हैं। बैंक हर प्रकार की पफमो± को तथा अनेकों ढंगों से )ण देते हैं जैसे नकद, साख, अध्िविकषर्, आवध्िक )ण, विपत्रों का क्रय/भुनाना एवं साख पत्रा जारी करना। बैंकों द्वारा जो ब्याज लिया जाता है वह कइर् तत्त्वों पर निभर्र करता है जैसे पफमर् की विशेषताएँ एवं अथर्व्यवस्था में ब्याज की दर का स्तर। )ण को या तो इकट्टòा व्यवसाय अध्ययन चुकाया जाता है या पिफर किश्तों में। बैंक साख कोषों का स्थायी ड्डोत नहीं है यद्यपि बैंको ने दीघर् अवध्ि के )ण देने प्रारंभ कर दिए हैं तथापि बैंक )णों को मध्य अविा एवं अल्प अवध्ि के लिए ही प्रयोग किया जाता है। वाण्िाज्ियक बैंकों द्वारा )ण देना स्वीकार करने से पहले )ण मांगने वाले को जमानत देनी होती है या पिफर संपिा पर )ण भार डालना होता है। गुण वाण्िाज्ियक बैंकों से कोष जुटाने के निम्न लाभ हैः ;कद्ध व्यवसाय में जब भी धन की आवश्यकता होती है बैंक धन उपलब्ध कराकर समयानुवूफल सहायता करते हंै। ;खद्ध बैंको को उधार लेने वाले द्वारा दी जाने वाली जानकारी को गुप्त रखा जाता है। इसलिए व्यवसाय की गोपनीयता बनी रहती है। ;गद्ध बैंकों से )ण लेने के लिए विवरण पत्रा एवं अभ्िागोपन आदि का निगर्मन नहीं किया जाता। अतः यह एक सुगम प्रणाली है। ;घद्ध व्यवसाय की आवश्यकतानुसार )ण की राश्िा को घटाया या बढ़ाया जा सकता है। यदि वित्त व्यवस्था ठीक है तो )ण को समय से पूवर् लौटाया भी जा सकता है। अतः यह एक वित्त प्रबंध्न का लचीला ड्डोत है। सीमाएँ वाण्िाज्ियक बैंकों की वित्त के ड्डोत के रूप में प्रमुख सीमाएँ निम्न हैंः ;कद्ध सामान्यतः कोष छोटी अवध्ि के लिए ही उपलब्ध् होते हैं इनकी अवध्ि को बढ़ाना या पिफर इनका नवीनीकरण अनिश्िचत एवं कठिन होता है। ;खद्ध बैंक वंफपनी के कायर् - कलापों एवं वित्तीय ढाँचे आदि की विस्तार से जाँच - पड़ताल करते हैं तथा परिसंपिायों की जमानत एवं व्यक्ितगत जमानत की भी माँग करते हैं। इससे धन प्राप्त करने की प्रिया वुफछ जटिल हो जाती है। ;गद्ध वुफछ मामलों में बैंक )ण की स्वीकृति प्रदान करने के लिए कठिन शते± लगा देते हैं, जैसे - बंधक रखे गए माल की बिक्री पर रोक लगाना। इससे व्यवसाय के सामान्य संचालन में कठिनाइर् आती है। 8.4.10 वित्तीय संस्थान सरकार ने देश भर में व्यावसायिक संगठनों को वित्त उपलब्ध कराने के लिए कइर् वित्तीय संस्थानों की स्थापना की है ;देखें बाॅक्सद्ध। इनको वेंफद्रीय सरकार एवं राज्य सरकारों दोनों ने स्थापित किया है। ये स्वामीगत पूँजी एवं )णगत पूँजी दोनों को लंबी अवध्ि एवं मध्य अवध्ि के लिए उपलब्ध् कराते हैं एवं वाण्िाज्ियक बैंक आदि परंपरागत वित्तीय एजेंसियों के पूरक होते हैं क्योंकि इन संस्थानों का उद्देश्य देश में औद्योगिक विकास का संवधर्न है इसीलिए इन्हें विकास बैंक कहा जाता है। वित्तीय सहायता के अतिरिक्त ये संस्थान बाजार का सवेर्क्षण, तथा उद्यम संचालकों को तकनीकी एवं प्रबंधकीय सेवाएँ भी प्रदान करते हैं। गुण वित्तीय संस्थानों के माध्यम से धन जुटाने के निम्न लाभ हैंः ;कद्ध वित्तीय संस्थान दीघर् अवध्ि वित्त उपलब्ध कराते हैं जिन्हें वाण्िाज्ियक बैंक नहीं देते हैं। वित्तीयन का यह ड्डोत उस समय उपयुक्त रहता है जब व्यवसाय के विस्तार, पुनगर्ठन एवं आधुनिकीकरण के लिए बड़ी धन राश्िा की लंबी अवध्ि के लिए आवश्यकता होती है। ;खद्ध कोष उपलब्ध कराने के साथ ये संस्थान पफमोर्ं को वित्तीय, प्रबंध संबंधी एवं तकनीकी सलाह भी देते हैं। ;गद्ध वित्तीय संस्थानों से )ण लेने से कंपनी की पूँजी बाजार में साख बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप कंपनी अन्य ड्डोतों से भी सरलता से कोष जुटा सकती है। ;घद्ध )ण का भुगतान सरल किश्तों में किया जा सकता है इसलिए व्यवसाय पर भार स्वरूप नहीं लगता। ;घद्ध मंदी के समय भी कोष उपलब्ध कराए जाते हैं जबकि वित्त के दूसरे ड्डोत उपलब्ध नहीं होते। सीमाएँ वित्तीय संस्थानों से वित्त प्राप्त करने की निम्न सीमाए हैंः ;कद्ध वित्तीय संस्थानों से )ण देने के लिए कडे़ मान दंड होते हैं। अनेक औपचारिकताओं के कारण प्रिया बहुत समय लेती है तथा खचीर्ली होती है। विश्िाष्ट वित्तीय संस्थान 1.भारतीय औद्योगिक वित्त निगम ;प्थ्ब्प्द्धरू इसकी स्थापना औद्योगिक वित्त निगम अिानियम 1948 के अंतगर्त जुलाइर् 1948 में एक संवैधानिक निगम के रूप में हुइर् थी। इसके उद्देश्यों में संतुलित क्षेत्राीय विकास में सहायता प्रदान करना एवं अथर्व्यवस्था के प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों में नये उद्यमियों के प्रवेश को प्रोत्साहन देना सम्िमलित है। 2.राज्य वित्त निगम ;ैथ्ब्द्धरू राज्य वित्त निगम, प्रािानियम 1951 ने राज्य सरकारों को अपने - अपने क्षेत्रों में उन औद्योगिक इकाइयों को मध्य एवं अल्प अवध्ि के लिए वित्त उपलब्ध कराने के अिाकार दिए। जो भा.औ.वि.नि. के क्षेत्रा से बाहर थे। इसका कायर् क्षेत्रा भा.औ.वि.नि. के कायर् क्षेत्रा से अिाक व्यापक है क्योंकि यह न केवल सावर्जनिक कंपनियाँ बल्िक निजी कंपनियाँ, साझेदारी पफमे± एवं एकल स्वामित्व इकाइर्याँ भी इसके कायर् क्षेत्रा में आती हैं। 3.भारतीय औद्योगिक साख एवं विनियोग निगम ;प्ब्प्ब्प्द्धरू इसकी स्थापना 1955 में कंपनी अिानियम के अंतगर्त एक कंपनी के रूप मे हुइर् थी। भा.औ.वि.नि.;प्ब्प्ब्प्द्ध केवल निजी क्षेत्रा में औद्योगिक उद्यमों के निमार्ण, विस्तार एवं आधुनिकीकरण में सहायता करती है। इस निगम ने देश के अंदर विदेशी पूँजी के भाग लेने को भी प्रोत्साहित किया है। 4.भारतीय औद्योगिक विकास बैंक ;प्क्ठप्द्धरू इसकी स्थापना औद्योगिक विकास बैंक, अिानियम 1964 के अंतगर्त 1964 में की गइर् थी। इसका उद्देश्य अन्य वित्तीय संस्थानों की गतिविध्ियों में समन्वय स्थापित करना था, जिनमें वाण्िाज्ियक बैंक भी सम्िमलित हैं। यह बैंक तीन प्रकार के कायर् करता है। अन्य वित्तीय संस्थानों को सहायता देना, औद्योगिक इकाइयों को सीधे सहायता प्रदान करना एवं वित्तीय तकनीकी सेवाओं का प्रवतर्न एवं समन्वय स्थापित करना। 5.राज्य औद्योगिक विकास निगम ;ैप्क्ब्द्धः बहुत - सी राज्य सरकारों ने अपने - अपने राज्यों में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए राज्य औद्योगिक विकास निगमों की स्थापना की है। रा.औ.वि.नि.;ैप्ब्क्श्ेद्ध के उद्देश्य अलग - अलग राज्यों में अलग - अलग हैं। 6.भारतीय यूनिट ट्रस्ट ;न्ज्प्द्धरू इसकी स्थापना भारत सरकार द्वारा यूनिट ट्रस्ट आॅपफ इंडिया अिानियम 1963 के अंतगर्त 1964 में की गइर् थी। यू.टी.आइर्.;न्ज्प्द्ध का मूल उद्देश्य जनता की बचत को गति प्रदान करना एवं उनको उत्पादक उपक्रमों में दिशा प्रदान करना है। इसके लिए यह औद्योगिक इकाइर्यों को सीधे सहायता देता है, उनके शेयर एवं डिबेंचरों में निवेश करता है एवं अन्य वित्तीय संस्थानों के साथ भागीदारी करता है। 7.भारतीय औद्योगिक निवेश बैंक लि.ः प्रारंभ में इसकी स्थापना जजर्र इकाइर्यों के पुनवार्स के लिए प्राथमिक एजेंसी के रूप में की गइर् थी एवं इसे भारतीय औद्योगिक पुननिर्मार्ण बैंक भी कहते थे। 1985 में इसका पुनगर्ठन कर इसका नाम भारतीय औद्योगिक पुनगर्ठन बैंक कर दिया तथा 1997 में इसका नाम पिफर से बदल कर भारतीय औद्योगिक निवेश बैंक कर दिया गया। बैंक बीमार इकाइर्यों को उनकी शेयर पूँजी के पुनगर्ठन, प्रबंध प्रणाली में सुधार एवं आसान शतो± पर वित्त की व्यवस्था में सहायता प्रदान करता है। 8.भारतीय जीवन बीमा निगम ;स्प्ब्द्धः इसकी स्थापना अिानियम 1956 के अंतगर्त 1956 में तत्कालिन 245 बीमा कंपनियों के राष्ट्रीयकरण के पश्चात् की गइर् थी। यह बीमा प्रीमियम के रूप में जनता की बचत को गतिमान बनाती है तथा सीधे )ण, शेयर एवं डिबेंचरों के अभ्िागोपन एवं उनके क्रय के द्वारा सावर्जनिक एवं निजी दोनों प्रकार की औद्योगिक इकाइर्यों को उपलब्ध कराती है। ;खद्ध वित्तीय संस्थानों के द्वारा )ण लेने वाली कंपनी पर वुफछ प्रतिबंध् लगाती हैं जैसे - लाभांश के भुगतान पर रोक। ;गद्ध वित्तीय संस्थानों से )ण लेने वाली कंपनी के निदेर्शक मंडल में अपने प्रतिनििा नियुक्त कर सकते हैं जिससे कंपनी के अध्िकारों पर अंवुफश लग जाता है। 8.5 अंतरार्ष्ट्रीय वित्तीयन उपरोक्त ड्डोतों के अतिरिक्त संगठनों के लिए अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर कोष जुटाने के विभ्िान्न ढंग हैं। अथर् व्यवस्था में खुलेपन एवं व्यावसायिक संगठनों के कायर् प्रचलन के वैश्वीकरण के कारण भारतीय कंपनियाँ विश्व पंूजी बाजार से कोष जुटा सकती है। विभ्िान्न अंतरार्ष्ट्रीय ड्डोत जिन से कोष पैदा किए जा सकते हैं निम्न हैंः ;कद्ध वाण्िाज्ियक बैंकः पूरे विश्व में वाण्िाज्ियक बैंक वाण्िाज्ियक उद्देश्यों के लिए विदेशी मुद्रा )ण देते हैं यह गैर - व्यापारिक अंतरार्ष्ट्रीय कायो± के लिए वित्त के महत्त्वपूणर् ड्डोत हैं। बैंक के द्वारा दी जाने वाली विभ्िान्न प्रकार के )ण एवं सेवाएँ अलग - अलग देशों की अलग - अलग हैं। उदाहरण के लिए स्टंैडडर् चाटर्डर्, भारतीय उद्योग के लिए विदेशी मुद्रा )ण के प्रमुख ड्डोत के रूप मे उभरा है। ;खद्ध अंतरार्ष्ट्रीय एजेंसी एवं विकास बैंकः अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार एवं व्यवसाय के वित्तीयन के लिए पिछले वषो± में अनेकों अंतरार्ष्ट्रीय एजेंसी एवं विकास बैंक सामने आए हैं। यह विश्व के आथ्िार्क रूप से पिछडे क्षेत्रों में विकास को बढ़ावा देने के लिए दीघर् अवध्ि एवं मध्य अविा )ण एवं अनुदान देते हैं। इन की स्थापना विभ्िान्न आयोजनों को धन देने के लिए राष्ट्रीय, क्षेत्राीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर दुनिया के विकसित देशों की सरकारों ने की थी। इनमें से वुफछ प्रसि( संस्थाएँ हैं, अंतरार्ष्ट्रीय वित्त निगम ;प्थ्ब्द्ध, ऐग्िशम बैंक ;म्गपउ ठंदाद्ध एवं एश्िायन विकास बैंक। ;गद्धअंतरार्ष्ट्रीय पूँजी बाजारः आधुनिक संगठन जिनमें बहुराष्ट्रीय वंफपनियाँ भी सम्िमलित हैं। रुपयों एवं विदेशी करेंसी में कापफी बड़ी मात्रा में )ण पर निभर्र करते हैं। इसके लिए जिन प्रमुख वित्तीय विलेखों का प्रयोग किया जा रहा है वे इस प्रकार हैंः ;कद्ध अंतरार्ष्ट्रीय जमा रसीदः कंपनी के स्थानीय करेंसी शेयर जमा बैंक को सौंप दिए जाते हैं। जमा बैंक इन शेयरों के बदले में जमा रसीद जारी कर देते हैं। इन जमा रसीदों को यूनाइटेड स्टेट डाॅलरों में अंकित करने पर यह अंतरार्ष्ट्रीय जमा रसीद कहलाती है। जी.डी.आर. विनिमय साध्य विलेख होते हैं तथा अन्य प्रतिभूतियों के समान स्वतंत्रा रूप से इनमें व्यापार किया जा सकता है। भारत के संदभर् में जी.डी.आर.किसी भारतीय कंपनी द्वारा विदेशी करेंसी में कोष एकत्रिात करने के लिए विदेशों में जारी विलेख है जिनका किसी विदेशी स्टाॅक एक्सचेंज मंे सूचीयन कराया गया है एवं उसमें इसका क्रय - विक्रय होता है। जी.डी.आर. धारक इसे कभी भी उतने शेयरों में परिवतिर्त कर सकता है, जितने का यह प्रतिनििात्व करती है। उक्त धारकों को वोट देने का अिाकार नहीं होता है। वे केवल लाभांश एवं पूँजी में वृि के ही अिाकारी होते हैं। कइर् भारतीय वंफपनियों जैसे इपफोसिस रिलायंस, विपरों एवं प्ब्प्ब्प् नेळक्त् जारी कर धन एकत्रिात किया है। ;खद्ध अमेरिकन जमा रसीद ;।क्त्श्ेद्धः यू.एस.ए.में किसी कंपनी द्वारा जारी जमा रसीद को अमेरिकन जमा रसीद कहते हैं। ए.डी.आर. अमेरिका के बाजारों में निमिर्त प्रतिभूतियों के समान खरीदी - बेची व्यवसाय अध्ययन जाती हैं। यह जी.डी.आर. के समान ही होती है। अंतर केवल इतना है यह केवल अमेरिका के नागरिक को ही जारी की जा सकती है तथा यू.एस.ए. के स्टाॅक एक्सचेंज में ही इनका सूचीयन एवं क्रय विक्रय किया जा सकता है। ;गद्ध विदेशी करेंसी परिवतर्नीय बाँड ;थ्ब्ब्ठश्ेद्धः यह समता अंशों से जुड़ी )ण प्रतिभूति होती है जिन्हें एक निश्िचत अविा की समाप्ित पर समता अथवा जमा रसीदों में परिवतिर्त किया जाता है। कंपनियों में जी.डी.आर.प्रवतर्न करने की प्रतिस्प्रधर् केवल आइर्.पी.ओ. ;प्रारंभ्िाक जनता प्रस्तावनाद्ध बाजार ही नहीं हैं जिसमें हलचल है, बल्िक अन्य कंपनियाँ जो अिाकांश छोटे एवं मझले आकार की हैं उन्होंने जी.डी.आर.के माध्यम से कोष एकत्रिात करने के लिए विदेशी बाजार में 464 मिलियन डाॅलर ;लगभग 2040 करोड रुद्ध अंतरार्ष्ट्रीय बाजार से जी.डी.आर.के माध्यम से एकत्रिात कर लिए हैं। 2004 में नौ कंपनियों द्वारा एकत्रिात 228.6 मिलियन डाॅलर एवं 2003 में चार कंपनियांे द्वारा जुटाइर् गइर् 63.09 मिलीयन डाॅलर से लगभग दो गुना है। लगभग 20 कंपनियाँ आगे आने वाले महीनों में 1 विलियन डाॅलर से भी अिाक की राश्िा के जी.डी.आर.इश्यू लाने के लिए तैयार खड़ी हैं। दूसरी ओर यद्यपि एपफ.सी.सीबी.;विदेशी करेंसी परिवतर्नीय बाँडद्ध इश्यू के लिए कंपनियों की संख्या कम हो रही है पिफर भी कइर् कंपनियाँ एपफ.सी.सी.बी.के लिए दौड़ में शामिल हैं। इसका कारण नियमों एवं तथ्यों के उजागर करने के संबंध में ढील है। उदाहरण के लिए आरती ड्रग्स लि. ने एपफ.सी.सी.बी.जारी कर 12 मिलीयन डाॅलर एकत्रिात करने का निणर्य लिया है। सबसे महत्त्वपूणर् बात यह है कि इस बार छोटी एवं मझली कंपनियाँ छोटी राश्िा के कोष जुटाने के लिए भी जी.डी.आर. के मागर् को अपना रही हैं। उदाहरण के लिए अॅापटोसरकट्स 20 मिलीयन डाॅलर, यदि 5 मिलीयन डाॅलर भी मिल जाए तो ठीक रहेगा, के विकल्प के साथ के जी.डी.आर.इश्यू लाने का निणर्य लिया है। इस शेयर का मूल्य बी.एस.इर्.में 17 मइर् 2004 को 34 रु से बढ़कर 160 रु हो गया। इस प्रकार से इसमें 370 प्रतिशत की तेजी आइर्। विडियोकोन इंडस्ट्रीज लाॅयका लैब्स, इंडियन ओवरसीज बैंक, श्रेय इंप्रफास्ट्रक्चर पफाइनेंस, जुबलीएंट आरगेनोसिस, महाराष्ट्रा सीम लैस, माॅस चिप सेमी वंफडक्टसर् एवं क्रयूॅ बॅास भी जी.डी.आर.इश्यू की योजना बना रही है। हाल ही में दो बैंकांे ने न्ज्प् ठंदा ;240 मिलीयन डाॅलरद्ध एवं ब्मदजनतपंस ठंदा ;70 मिलीयन डाॅलरद्ध जी.डी.आर.बाजार से कोष जुटाए। विदेशों में ब्याज की दरों में वृि के कारण कंपनियाँ एपफ.सी.सी.बी.की तुलना में जी.डी.आर.को प्राथमिकता देती हैं। इस प्रकार से एक एपफ.सी.सी.बी. धारक के पास पूवर् निधार्रित मूल्य पर समता अंशों में परिवतर्न करने या पिफर बाँडों को रख लेने के विकल्प होते हैं। एपफ.सी.सीबी. को किसी विदेशी करेंसी में जारी किया जाता है। इन पर स्िथर दर से ब्याज मिलता है जो किसी भी अन्य इसी प्रकार के गैर परिवतर्नीय )ण विलेख पर मिलने वाली दर से कम होता है। एपफ.सी.सी.बीका विदेशी स्टाॅक एक्सचेंज में ही सूचीयन एवं क्रय विक्रय होता है। एपफ.सी.सी.बी.भारत में जारी होने वाले परिवतर्नीय )णपत्रों के समान ही होते हैं। 8.6 कोषों के ड्डोत के चयन को प्रभावित करने वाले तत्त्व व्यवसाय की वित्तीय, आवश्यकताएँ विभ्िान्न प्रकार की होती हैं दीघर्कालीन, अल्पकालीन, स्थायी एवं परिवतर्नीय। इसीलिए पफमे± कोष एकत्रिात करने के लिए विभ्िान्न ड्डोतों का प्रयोग करती हैं। छोटी अवध्ि के )णों को उपयुक्त पूँजी में कमी के कारण कम लागत का लाभ मिलता है। दीघर् अविा )ण भी कइर् कारणों से आवश्यक माने गए हैं। इसी प्रकार से निगमित क्षेत्रों में कोष एकत्रिात करने की किसी भी योजना में समता पूँजी की भूमिका रहती है। कोषों का कोइर् भी ड्डोत ऐसा नहीं है जिसकी सीमाएँ न हों इसलिए उचित यही रहेगा कि किसी एक ड्डोत पर निभर्र न रहकर विभ्िान्न ड्डोतों के मिश्रण को अपनाना चाहिए। इस मिश्रण के चयन को भी कइर् कारक प्रभावित करते हैं। इससे व्यवसाय के लिए यह निणर्य लेना जटिल हो जाता है। वित्त के ड्डोतों के चयन को प्रभावित करने वाले तत्त्वों पर संक्षेप में चचार् नीचे की गइर् है। ;कद्धलागतः दो प्रकार की लागत होती है। कोष एकत्रिात करने की लागत एवं उन्हें प्रयोग करने की लागत। संगठन ने कोष जुटाने के किस ड्डोत का उपयोग करना है। इसका निणर्य लेने के लिए दोनों प्रकार की लागतों को ध्यान में रखना चाहिए। ;खद्ध वित्तीय शक्ित एवं प्रचालन में स्थायित्वः कोष के ड्डोत के चयन का व्यवसाय की वित्तीय शक्ित एक प्रमुख निधार्रक तत्त्व है। व्यवसाय की वित्तीय स्िथति ठोस होनी चाहिए जिससे कि वह )ण की मूलराश्िा एवं उस पर ब्याज का भुगतान कर सके। जब संगठन की आय स्िथर न हो तो स्िथर व्यय भार कोष जैसे पूवार्िाकार अंश एवं डिबेंचर का सोच - समझकर चुनाव करना चाहिए क्योंकि यह संगठन पर वित्तीय भार को बढ़ाते हैं। ;गद्धसंगठन के प्रकार एवं वैधानिक स्िथतिः व्यवसाय संगठन को प्रकार एवं उसकी स्िथति धन जुटाने के निणर्य को प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए एक साझेदारी पफमर् समता अंशों के निगर्मन द्वारा धन नहीं जुटा सकती क्योंकि इन्हंे केवल संयुक्त पूँजी वंफपनी ही निगर्मित कर सकती है। ;घद्ध उद्देश्य एवं समय अविाः जिस अविा के लिए धन की आवश्यकता है। उसके अनुसार ही व्यावसायिक इकाइर् की योजना बनानी चाहिए। उदाहरण के लिए अल्प अविा की आवश्यकता को, व्यापारिक साख, वाण्िाज्ियक प्रपत्रा आदि के माध्यम से कम ब्याज दर पर कोष उधार लेकर, पूरा किया जा सकता है। दीघर् अविा वित्त के लिए शेयरों एवं डिबेंचरों का निगर्मन अिाक उपयुक्त रहेगा। इसी प्रकार से जिस उद्देश्य से जिस उद्देश्य के लिए कोषों की आवश्यकता है। उन्हें ध्यान में रखना चाहिए जिससे कि ड्डोत का उपयोग से मिलान किया जा सके। उदाहरण के लिए दीघर् अवध्ि की विस्तार योजना के लिए बैंक अिाविकषर् के माध्यम से वित्त नहीं जुटाना चाहिए क्योंकि इसका भुगतान अल्प अविा में ही करना होगा। ;घद्ध जोख्िामः वित्त के प्रत्येक ड्डोत का उसकी जोख्िाम के आधार पर मूल्यांकन करना चाहिए। उदाहरण के लिए समता अंश पूँजी में सबसे कम जोख्िाम है क्योंकि अंश पूँजी का भुगतान कंपनी के समापन पर ही करना होता है तथा यदि कंपनी को किसी वषर् लाभ नहीं होता है तो लाभांश का भुगतान करने की विवशता नहीं होती है। दूसरी ओर )ण में मूल एवं ब्याज दोनों के भुगतान का समय निधार्रित होता है तथा चाहे पफमर् को लाभ हो अथवा हानि ब्याज का भुगतान तो करना ही होगा। ;चद्ध नियंत्राणः कोष का एक विशेष ड्डोत, पफमर् के प्रबंध पर स्वामियों के नियंत्राण एवं शक्ित को प्रभावित कर सकता है। समता अंशों के निगर्मन से नियंत्राण में कमी आती है क्योंकि समता अंशधारकों को वोट देने का अिाकार होता है। उदाहरण के लिए वित्तीय संस्थान )ण समझौते के अंतर्गत परिसंपिायों पर नियंत्राण कर सकते हैं अथवा उनके प्रयोग पर अंवुफश लगा मुख्य शब्दावली वित्त स्वामीगत पूँजी स्थायी पूँजी कायर्शील पूँजी अल्प अविा ड्डोत प्रतिबंिात शते± व्यवसाय अध्ययन सकते हैं। इसलिए व्यावसायिक इकाइयों को ड्डोत का चुनाव करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह व्यवसाय पर नियंत्राण में दूसरों के साथ किस सीमा तक भागीदारी चाहते हैं। ;छद्धसाख पर प्रभावः व्यवसाय यदि वुफछ ड्डोतों पर आश्रित रहता है तो बाजार में उसकी साख पर प्रभाव पडता है। उदाहरण के लिए सुरक्ष्िात )णपत्रा कंपनी के असुरक्ष्िात लेन दारों के हितों को प्रभावित कर सकते है जिससे कंपनी को आगे उधार माल देने के निणर्य पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। ;जद्धलोचपूणर्ता एवं सुगमताः एक और पहलू जो वित्त के ड्डोत के चयन को प्रभावित करता है। वह है धन प्राप्त करने में लोचपूणर्ता एवं सुगमता। उदाहरण के लिए यदि दूसरे विकल्प सरलता से मिल रहे हैं तो व्यावसायिक संगठन बैंक एवं वित्तीय संस्थानों से )ण नहीं लेना चाहेंगे क्योकि इनमें अंवुफश के प्रावधान, विस्तृत जाँच एवं कइर् प्रकार के प्रलेखोें की आवश्यकता होती है। ;झद्ध कर लाभः वुफछ ड्डोतों का मूल्यांकन उन पर कर लाभ मिलने के आधार भी किया जा सकता है। उदाहरण के लिए पूवार्िाकार अंशों पर लाभांश को कर निधार्रण के लिए घटाया नहीं जाता जबकि डिबेंचर एवं )ण पर दिए गए ब्याज को घटाया जाता है इसीलिए करो में लाभ के लिए इन्हें पसंद किया जाता है। )णगत पूँजी दीघर् अविा ड्डोत स्िथर भार कोष परिसंपिायों पर प्रभार वोट देने का अध्िकार पैफक्टरिंग प्राप्य खाते विपत्रों को भुनाना ए.डी.आर., जी.डी.आर., एपफ.सी.सी.बीसारांश व्यावसायिक वित्त का अथर् एवं महत्त्वः व्यवसाय की स्थापना एवं उसके प्रचालन के लिए आवश्यक वित्त को व्यावसायिक वित्त कहते हैं। कोइर् भी व्यवसाय का बिना पयार्प्त धन राश्िा के अपनी ियाओं को नहीं कर सकता। धन की आवश्यकता स्थायी संपिायों का क्रय करने ;स्थायी पूँजी की आवश्यकताद्ध दिन - प्रतिदिन के कायोर् के लिए ;कायर्शील पूँजी की आवश्यकताद्ध एवं व्यवसाय के विकास एवं विस्तार की योजनाओं के लिए होती हैं। कोष के ड्डोतों का वगीर्करणः व्यवसाय के लिए उपलब्ध कोषों के विभ्िान्न ड्डोतों को तीन मुख्य आधारों पर वगीर्कृृत किया जाता है। वे हैंः ;कद्धअविा ;दीघर्, मध्य एवं अल्पद्ध ;खद्ध स्वामित्व ;स्वामीगत कोष एवं )णगत कोषद्ध एवं ;गद्ध निमार्ण ड्डोत ;आंतरिक ड्डोत एवं बाह्य ड्डोतद्ध ड्डोत दीघर्, मध्य एवं अल्प अविा ड्डोतः जो ड्डोत 5 वषर् से अिाक अविा के लिए कोष प्रदान करते हैं उन्हें दीघर् अविा ड्डोत कहते हैं। जिन ड्डोतों से एक वषर् से अिाक लेकिन 5 साल से कम अविा की आवश्यकताओं की पूतिर् होती है, उन्हें मध्य अविा ड्डोत कहते हैं तथा जिन ड्डोतों से एक वषर् से कम के लिए धन जुटाया जा सकता है, उन्हें अल्प अविा ड्डोत कहते हैं। स्वामीगत कोष एवं )णगत कोषः उद्यम के स्वामी जिन कोषों की व्याख्या करते हैं उन्हें स्वामीगत कोष कहते हैं जबकि दूसरे व्यक्ितयों अथवा संस्थानों से )णों के माध्यम से जो कोष जुटाए जाते हैं उन्हें )णगत पूँजी कहते हैं। आंतरिक एवं बाह्य ड्डोतः आंतरिक ड्डोत वह होते हैं जिनका निमार्ण व्यवसाय के भीतर ही होता है जैसे लाभों के पुनविर्नियोग के द्वारा। पूँजी के बाह्य ड्डोत, वह ड्डोत होते हैं जो व्यवसाय के बाहर होते है जैसे आपूतिर्कत्तार्, )णदाता एवं निवेशकों के द्वारा दिया गया वित्त। व्यवसाय के वित्त के ड्डोतः व्यवसाय के विभ्िान्न कोषों के ड्डोत इस प्रकार हैंः संचित आय, व्यापार साख, पैफक्टरिंग, लीज वित्तीयन, सावर्जनिक जमा, वाण्िाज्ियक बैंक एवं वित्तीय संस्थानों से )ण एवं वित्त के अंतरार्ष्ट्रीय ड्डोत। संचित आयः कंपनी की आय का वह भाग जो लाभांश के रूप में नहीं बाँटी जाती है संचित आय कहलाती है। संचित आय के लिए उपलब्ध राश्िा कंपनी की लाभांश नीति पर निभर्र करती है। इसका उपयोग सामान्यतः वंफपनी के विकास एवं विस्तार के लिए किया जाता है। व्यापार साखः एक व्यापारी द्वारा दूसरे व्यापारी को माल एवं सेवाआंे का उधार विक्रय किया जाता है इसे व्यापार साख कहते हैं। व्यापार साख के कारण वस्तुएँ उधार खरीदी जा सकती हैं। व्यापार साख की शत±े भ्िान्न - भ्िान्न उद्योंगों में भ्िान्न - भ्िान्न होती हैं तथा इन्हें बीजक में स्पष्ट कर दिया जाता है। छोटी एवं नइर् व्यावसायिक इकाइर्याँ व्यापार साख पर अिाक निभर्र करती हैं क्योंकि इनके लिए दूसरे ड्डोतों से कोष जुटाना थोड़ा कठिन होता है। पैफक्टरिंगः पिछले वुफछ वषो± में पैफक्टरिंग अल्प अविा वित्त के लोकपि्रय ड्डोत के रूप में उभर कर आया है। यह एक ऐसी वित्तीय सेवा है जिसमें पैफक्टर साख नियंत्राण एवं क्रेता से )ण वसूली के लिए उत्तरदायी होता है एवं जो पफमर् को अप्राप्य )ण से होने वाली हानि से सुरक्षा प्रदान करता है। पैफक्टरिंग की दो प(तियाँ होती है। लीज वित्तीयनः लीज एक ऐसा अनुबंध होता है जिसमें संपिा का स्वामी ;पट्टðाकारद्ध दूसरे पक्ष ;पट्टðाधारकद्ध को संपिा के प्रयोग का अिाकार देता है। पट्टðाकार निधार्रित अविा के लिए संपिा को किराए पर देता है जिसके बदले वह आविाक भुगतान लेता है जिसे लीज किराया कहते हैं। सावर्जनिक जमाः एक वंफपनी जनता को अपनी बचत को वंफपनी में धन एकत्रिात करने के लिए प्रेरित कर सकती है। सावर्जनिक जमा व्यवसाय की दीघर् अविा एवं अल्प अविा दोनों वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करती है। जमा पर ब्याज की दर साधारणतः बैंक एवं अन्य वित्तीय संस्थानों द्वारा लिए जाने वाले ब्याज से अिाक होती है। वाण्िाज्ियक प्रपत्राः यह अल्प अविा के लिए कोष एकत्रिात करने के लिए किसी पफमर् द्वारा निगर्मित असुरक्ष्िात प्रतिज्ञा पत्रा होते हैं। वाण्िाज्ियक पत्रों की भुगतान अविा 90 से 364 दिनों के लिए होती है क्योंकि यह असुरक्ष्िात होते हैं इसलिए जिन पफमोर् की साख की दर अच्छी होती है वही इन्हें जारी कर सकती है तथा इनका नियमन भारतीय रिजवर् बैंक के कायर् क्षेत्रा में आता है। समता अंशों का निगर्मनः समता अंश कंपनी की स्वामीगत पूँजी का प्रतिनििात्व करते हैं। समता अंशों के धारकों की आय में परिवतर्न होता रहता है। इसलिए इन्हें कंपनी का जोख्िाम उठाने वाला कहते हैं। यह अंश धारक समृि के समय अिाक आय प्राप्त करते हैं तथा अपने मतािाकार का प्रयोग कर कंपनी के प्रबंध में भागीदार बनते हैं। पूवार्िाकार अंशों का निगर्मनः इन अंशों के धारकों को लाभांश के भूगतान एवं पूँजी की वापसी के संबंध में पूवार्िाकार प्राप्त होता है, जो निवेश कत्तार् बिना अिाक जोख्िाम उठाए नियमित आय चाहते हैं उनकी यह पहली पसंद होती है। एक कंपनी विभ्िान्न प्रकार के पूवार्िाकार अंशों का निगर्मन कर सकती है। )णपत्रों का निगर्मनः )ण पत्रा कंपनी की )ण पूँजी होती है तथा इनके धारक कंपनी के लेनदार होते हैं। यह स्थायी भार कोष होते हैं तथा इन पर स्िथर दर से ब्याज मिलता है। )णपत्रों का निगर्मन उसी स्िथति में अिाक उपयुक्त रहता है जब कंपनी की बिक्री एवं आय अपेक्षाकृत स्िथर होती हैं। वाण्िाज्ियक बैंकः बैंक सभी आकर की पफमो± को अल्प अविा एवं मध्य अविा )ण देते हैं। )ण का भुगतान इकट्ठा या पिफर किश्तों में किया जाता है। बैंक की ब्याज की दर )ण मांगने वाली पफमर् की विशेषताओं तथा अथर् व्यवस्था में प्रचलित ब्याज की दर जैसे तत्वों पर निभर्र करती है। वित्तीय संस्थाएँः व्यावसायिक कंपनियों को औद्योगिक वित्त की व्यवस्था के लिए वेंफद्रीय एवं राज्य सरकारें दोनों ने पूरे देश में कइर् वित्तीय संस्थानों की स्थापना की है। इन्हें विकास बैंक भी कहते हैं। वित्त का यह ड्डोत अिाक उपयुक्त रहता है जब व्यावसायिक इकाइर् के विस्तार, पुनगर्ठन एवं आधुनिकीकरण के लिए बड़ी मात्रा में कोष की आवश्यकता होती है। अंतरार्ष्ट्रीय वित्तीयनः अथर्व्यवस्था के उदारीकरण एवं भुमंडलीयकरण के साथ भारतीय कंपनियों में अंतरार्ष्ट्रीय बाजार से कोष जुटाने प्रारंभ कर दिए हैं। कोष जुटाने के अंतरार्ष्ट्रीय ड्डोत हैं। वाण्िाज्ियक बैंकों से विदेशी मुद्रा में )ण, अंतरार्ष्ट्रीय एजेंसी एवं विकास बैंकों द्वारा वित्तीय सहायता। अंतरार्ष्ट्रीय पूँजी बाजार में वित्तीय प्रपत्रा ;ळक्त्श्ेध्।क्त्श्ध्थ्ब्ब्ठश्ेद्ध का निगर्मन। चयन को प्रभावित करने वाले तत्वः किसी व्यवसाय के द्वारा अपने मुख्य उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए विभ्िान्न ड्डोतों का प्रभावी मूल्यांकन करना चाहिए। वित्त के ड्डोतों का चयन जिन तत्वों पर निभर्र करते हैं वे हैंः लागत, वित्तीय शक्ित, जोख्िाम का परिदृश्य, करों में लाभ एवं कोष प्राप्ित में लोचपूणर्ता। उचित कोष के ड्डोत के चयन के संबंध में निणर्य लेते समय तत्वों का विश्लेषण करना चाहिए। अभ्यास बहु विकल्प प्रश्न 1.दिए गए विकल्पों में से सही पर निशान लगाएं। समता अंशधारी कहलाते हैंः ;कद्ध कंपनी के स्वामी ;खद्ध कंपनी के साझेदार ;गद्ध कंपनी के अिाकारी ;घद्ध कंपनी के अभ्िाभावक 2.विभोध्य शेध्य शब्द का प्रयोग होता हैः ;कद्ध पूवार्िाकार अंशों के लिए ;खद्ध वाण्िाज्ियक पत्रों के लिए ;गद्ध समता अंशों के लिए ;घद्ध सावर्जनिक जमा के लिए 3.चालू संपिायों के क्रय के लिए कोष की आवश्यकता एक उदाहरण है। ;कद्ध स्थायी पूँजी की आवश्यकता ;खद्ध लाभ का पुनविर्नियोग ;गद्ध चालू पूँजी की आवश्यकता ;घद्ध पट्टा वित्त 4.।क्त् जारी किए जाते हैंः ;कद्ध कनाडा में ;खद्ध चीन में ;गद्ध भारत में ;घद्ध यू.एस.ए मंे 5.सावर्जनिक जमा वे जमा हैं जिनको सीधे उठाया जाता हैः - ;कद्ध जनता से ;खद्ध निदेशकों से ;गद्ध अंकेक्षकों से ;घद्ध स्वामियों से 6.पट्टðा करार में पट्टðाधारी को निम्न अिाकार प्राप्त हैं। ;कद्ध पट्टðाकार द्वारा अजिर्त लाभ ;खद्ध संगठन के प्रबंधन में भाग लेने ;गद्ध परिसंपिा का विश्िाष्ट अविा का अिाकार के लिए उपयोग ;घद्ध संपिायों का विक्रय 7.डिबेंचर/)णपत्रा दशार्ते हैंः ;कद्ध कंपनी की स्िथर पूँजी ;खद्ध कंपनी की स्थायी पूँजी ;गद्ध कंपनी की चल पूँजी ;घद्ध कंपनी की )ण पूँजी 8.पैफक्टरिंग व्यवस्था में पैफक्टर ;कद्ध वस्तु एवं सेवाओं का उत्पादन ;खद्ध ग्राहक की ओर से भुगतान एवं वितरण करता है। करता है। ;गद्ध ग्राहक की देनदारों अथवा प्राप्य ;घद्ध वस्तुओं को एक स्थान से खातों की वसूली करता है। दूसरे स्थान को हस्तांतरित करता है। 9.वाण्िाज्ियक प्रपत्रों की भुगतान अविा साधारणतः ;कद्ध 20 से 40 दिन ;खद्ध 60 से 90 दिन ;गद्ध 120 से 365 दिन ;घद्ध 90 से 364 दिन होती है। 10.पूँजी के आंतरिक ड्डोत हैं जो निम्न से सृजन किए जाते हैंः ;कद्ध बाहर के लोग जैसे आपूतिर्कतार् ;खद्ध वाण्िाज्ियक बैंकों से )ण ;गद्ध अंशों का निगर्मन ;घद्ध व्यवसाय के भीतर लघु उत्तरीय प्रश्न 1.व्यवसाय वित्त किसे कहते हैं? व्यवसाय को कोषों की आवश्यकता क्यों होती है? समझाइये। 2.दीघर् अविा एवं अल्प अविा वित्त जुटाने के ड्डोतों की सूची बनाइए। 3.कोष जुटाने के आंतरिक एवं बाह्य ड्डोतों में क्या अंतर है? समझाइये। 4.पूवार्िाकार अंशधारकों को कौन - कौन से पूवार्िाकार प्राप्त हैं? 5.किन्ही तीन विश्िाष्ट वित्तीय संस्थानों के नाम दीजिए एवं उनके उद्देश्य भी बताइए। 6.ळक्त् एवं ।क्त् में क्या अंतर है? समझाइये। दीघर् उत्तरीय प्रश्न 1.व्यापारिक साख एवं बैंक साख को व्यावसायिक इकाइर्यों के अल्प अविा वित्त के ड्डोत के रूप में समझाइए। 2.आधुनीकीकरण एवं विस्तार के लिए वित्तीयन के लिए एक बडी औद्यौगिक इकाइर् किन ड्डोतों से पूँजी जुटा सकती है उन पर चचार् कीजिए। 3.डिबेंचरों के निगर्मनों के समता अंशों के निगर्मन से हट कर क्या लाभ हैं? 4.सावर्जनिक जमा एवं संचित आय के व्यावसायिक वित्त की प्रणालियों के रूप में गुण एवं दोषों को बताइए। 5.अंतरार्ष्ट्रीय वित्तीयन में उपयुक्त होने वाले वित्तीय उपकरणों पर चचार् कीजिए। 6.वाण्िाज्ियक प्रपत्रा किसे कहते हैं इसके लाभ एवं सीमाएँ क्या हैं? परियोजना कायर् 1.उन कंपनियों के बारे में सूचना एकत्रिात कीजिए जिन्हांेने हाल ही के वषोर्ं में डिबेंचर निगर्मित किए हैं। इन्हें और अिाक जनपि्रय बनाने के लिए सुझाव दीजिए। 2.संस्थागत वित्त वुफछ विगत के वषार्े में महत्त्वपूणर् हो गया है। एक उपयोग में नहीं आ रही काॅपी में भारतीय वंफपनियों को वित्तीय सहायता प्रदान करने वाले वित्तीय संस्थानों के संबंध में विस्तृत जानकारी को चिपकाइए। 3.इस अध्याय मे वण्िार्त विभ्िान्न ड्डोतों के आधार पर एक जलपानगृह स्वामी की वित्तीय समस्याओं को हल करने के उपयुक्त विकल्प कोे बताइए। 4.सभी वित्तीय ड्डोतों का एक तुलनात्मक चाटर् बनाइए।

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