अध्याय 2 व्यावसायिक संगठन के स्वरूप अध्िगम उद्देश्य इस अध्याय के अध्ययन के पश्चात् आपः ऽ व्यावसायिक संगठन के विभ्िान्न स्वरूपों की पहचान कर सवेंफगेऋ ऽ व्यावसायिक संगठनों के चुनिंदा स्वरूपों के लक्षण, गुण एवं सीमाओं को समझ सवेंफगेऋ ऽ विभ्िान्न व्यावसायिक संगठनों के स्वरूपों में अंतर कर सवेंफगेऋ और ऽ व्यावसायिक संगठन के उपयुक्त स्वरूप के चयन के निधर्रक तत्त्वों का विश्लेषण कर सवेंफगे। नेहा एक मेधवी छात्रा है जिसे अपने परीक्षा परिणाम की घोषणा की प्रतीक्षा थी। जब वह घर पर थी, तब उसने खाली समय का उपयोग करने का निणर्य लिया। उसे चित्राकारी में रुचि थी। उसने मिट्टी के बतर्नों एवं प्यालों पर चित्राकारी शुरू कर दी। नेहा के काम में उसके मित्रों एवं अन्य मिलने वालों ने रुचि दिखाइर् जिससे वह बहुत उत्साहित हुइर्। अब उसने व्यापार करना तय किया। इस व्यापार को वह अपने घर से चलाने लगी जिससे किराए की बचत हो गइर्। एक - दूसरे से चचार् के कारण वह एकल स्वामित्व के रूप में कापफी प्रसि( हो गइर्। परिणामस्वरूप उसके उत्पादनों की बिक्री में बढ़ोतरी हुइर्। गमिर्यों की समाप्ित तक उसे लगभग 2500 रु का लाभ हुआ। इससे उत्साहित होकर उसने इस काम को पेशे के रूप में अपना लिया। अतः उसने अपना व्यवसाय स्थापित करने का निणर्य लिया। यद्यपि वह इस व्यवसाय को एकल स्वामित्व के रूप मेें चलाने में समथर् है लेकिन उसे व्यवसाय के विस्तार के लिए उसे अध्िक ध्न की आवश्यकता भी है। अतः उसके पिता ने साझेदारी पफमर् का विकल्प सुझाया जिससे उसे अध्िक पंूजी प्राप्त करने में भी सुविध हो तथा उत्तरदायित्व एवं जोख्िाम में भी भागीदारी हो सके। उनका यह भी मत था कि संभव है कि भविष्य में व्यवसाय का और अिाक विस्तार हो और वंफपनी का निमार्ण भी करना पडे़। नेहा पिफलहाल इस असमंजस में है कि वह किस प्रकार के व्यावसायिक संगठन के स्वरूप को चुने। 2.1 परिचय यदि कोइर् व्यक्ित एक व्यवसाय प्रारंभ करने की योजना बना रहा है या वतर्मान व्यवसाय का विस्तार करना चाहता है तो उसे संगठन के स्वरूप के संबंध में एक महत्त्वपूणर् निणर्य लेना होगा। सबसे उपयुक्त स्वरूप का निधार्रण करते समय व्यक्ित को अपने साधनों को ध्यान में रखते हुए, प्रत्येक स्वरूप के लाभ एवं हानियों को देख कर करना होगा। व्यवसाय संगठन के विभ्िान्न स्वरूप निम्न हैंः ;कद्ध एकल स्वामित्व ;खद्ध संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय ;गद्ध साझेदारी ;घद्ध सहकारी समिति, तथा ;घद्ध संयुक्त पूंजी वंफपनी हम अपनी चचार् को एकल व्यापार से प्रारंभ करते हैं जो व्यावसायिक संगठन का सरलतम स्वरूप है। उसके बाद अिाक जटिल संगठनों के रूपों का विश्लेषण करेंगें। 2.2 एकल स्वामित्व आप कइर् बार सायंकाल अपने पास के छोटे स्टेशनरी स्टोर से रजिस्टर, पैन, चाटर् पेपर आदि खरीदने के लिए जाते हांेगे। संभावना यही है कि आप इस सौदे के दौरान किसी एकल स्वामित्व के संपकर् में ही आते होंगे। एकल व्यापार व्यावसायिक संगठन का एक प्रचलित रूप है तथा छोटे व्यवसाय के लिए अत्यंत उपयुक्त है विशेषतः व्यवसाय के प्रारंभ्िाक वषो± में एकल स्वामित्व उस व्यवसाय को कहते हैं जिसका स्वामित्व, प्रबंधन एवं नियंत्राण एक ही व्यक्ित के हाथ में होता है तथा वही संपूणर् लाभ पाने का अिाकारी तथा हानि के लिए उत्तरदायी होता है। जैसा एकल स्वामित्व शब्द से ही स्पष्ट है। एकल ;सोलद्ध शब्द का अथर् है एकमात्रा एवं ‘प्रोप्राइर्टर’ का अथर् है स्वामी अथार्त् वह एकल व्यवसाय का एकमात्रा स्वामी होता है। व्यवसाय का यह स्वरूप विशेष रूप से उन क्षेत्रों में प्रचलन में है जिनमें व्यक्ितगत सेवाएँ प्रदान की जाती है, जैसे - ब्यूटी पालर्र, नाइर् की दुकान एवं छोटे पैमाने के व्यापार - जैसे किसी क्षेत्रा में एक पुफटकर व्यापार की दुकान चलाना। लक्षण संगठन के एकल स्वामित्व स्वरूप की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैंः ;कद्ध निमार्ण एवं समापनः एकल स्वामित्व वाले व्यवसाय को प्रारंभ करने के लिए शायद ही किसी वैधानिक औपचारिकता की आवश्यकता होती है। हाँ, वुफछ मामलों में लाइसेंस की आवश्यकता हो सकती है। एकल स्वामित्व के नियमन के लिए अलग से कोइर् कानून नहीं है व्यवसाय को बंद भी सरलता से किया जा सकता है। इस प्रकार से व्यवसाय की स्थापना एवं उसका समापन दोनों ही सरल हैं। ;खद्ध दायित्वः एकल स्वामी का दायित्व असीमित होता है। इसका अथर् हुआ कि यदि व्यवसाय अध्ययन व्यवसाय की संपिायाँ सभी )णों के भुगतान के लिए पयार्प्त नहीं हैं तो स्वामी इन )णों के भुगतान के लिए व्यक्ितगत रूप से उत्तरदायी होगा। ऐसी स्िथति में इसके लिए उसकी निजी वस्तुएँ, जैसे उसकी अपनी कार तथा अन्य संपिायाँ बेची जा सकती हैं। उदाहरण के लिए अगर व्यवसाय बंद करते समय एक ड्राइर्क्लीनर एकल स्वामित्व वाली इकाइर् की बाह्य देयताएँ 80,000 रु हैं जबकि परिसंपिायाँ केवल 60,000 रु ही है। ऐसे में स्वामी को अपने निजी स्रोतों से 20,000 रु लाने होंगे। भले ही पफमर् के )णों के भुगतान के लिए उसे अपनी निजी संपिा ही क्यों न बेचनी पडे़। ;गद्ध लाभ प्राप्तकत्तार् तथा जोख्िाम वहनकत्तार्ः व्यवसाय की विपफलता से जोख्िाम को एकल स्वामी को अकेले ही वहन करना होगा। यदि व्यवसाय सपफल रहता है तो सभी लाभ भी उसी को प्राप्त होंगे। वह सभी व्यावसायिक लाभों का अिाकारी होता है, जो उसके जोख्िाम उठाने का सीधा प्रतिपफल है। ;घद्ध नियंत्राणः व्यवसाय के संचालन एवं उसके संबंध में निणर्य लेने का पूरा अिाकार एकल स्वामी के पास होता है, वह बिना दूसरों के हस्तक्षेप के अपनी योजनाओं को काया±वित कर सकता है। ‘एकल व्यापारी व्यवसाय एक ऐसी व्यावसायिक इकाइर् है जिसमें एक ही व्यक्ित पूंजी लगाता है, उद्यम का जोख्िाम उठाता है एवं प्रबंध्न करता है।’ - जे.एल.हैन्सन ‘एकल स्वामित्व व्यवसाय संगठन का वह स्वरूप है जिसका मुख्िाया एक ऐसा व्यक्ित है जो उत्तरदायित्व लिए हुए है जो परिचालन का निदेशन करता है एवं जो हानि का जोख्िाम उठाता है। - एल.एच.हेनी ;घद्ध स्वतंत्रा अस्ितत्व नहींः कानून की दृष्िट में एकल व्यापारी एवं उसके व्यवसाय में कोइर् अंतर नहीं है, क्योंकि इसमें व्यवसाय का इसके स्वामी से अलग कोइर् अस्ितत्व नहीं है। परिणामस्वरूप व्यवसाय के सभी कायो± के लिए स्वामी को ही उत्तरदायी ठहराया जाएगा। ;चद्ध व्यावसायिक निरंतरता का अभावः क्योंकि व्यवसाय एवं उसके स्वामी का एक ही अस्ितत्व है, इसलिए एकल स्वामी की मृत्यु पर, पागल हो जाने पर, जेल में बंद होने पर, बीमारी अथवा दिवालिया होने पर सीधा एवं हानिकर प्रभाव व्यवसाय पर पडे़गा और हो सकता है कि व्यापार बंद भी करना पडे़। गुण एकल स्वामित्व के कइर् लाभ हैं। इनमें से वुफछ महत्त्वपूणर् लाभ निम्न हैंः ;कद्ध शीघर् निणर्यः एकल स्वामी को व्यवसाय से संबंिात निणर्य लेने की बहुत अिाक स्वतंत्राता होती है क्योंकि उसे किसी दूसरे से सलाह की आवश्यकता नहीं है इसलिए वह तुरंत निणर्य ले सकता है। इसके कारण जब भी उसे कोइर् लाभ का अवसर प्राप्त होता है वह समय रहते उनका पूरा लाभ उठा सकता है। ;खद्ध सूचना की गोपनीयताः एकल स्वामी अकेले ही निणर्य लेने का अिाकार रखता है इसलिए वह व्यापार संचालन के कोका - कोला प्रारंभ में एकल स्वामित्व का व्यवसाय स्पूफतिर्दायक प्रारंभः दुनियाभर को एक खास स्वाद से परिचित करवाने वाले कोका - कोला का जन्म 8 मइर् 1886 को एटलांटॅा, जोेजिर्या में हुआ था। डाॅ॰ जाॅन स्िमथ पैंबटर्न, एक स्थानीय औषध्ि निमार्ता थे। उन्होंने कोका - कोला के नाम से एक शबर्त बनाया। वे इस नए उत्पाद को एक पास में स्िथत जैकब पफामेर्सी में ले गए। वहाँ उसका नमूना चखा गया तथा उसे अद्भुत घोष्िात किया गया। एक सोडा पेय के रूप में वह पाँच सैंट प्रति गिलास बेचा जाने लगा। पैंबटर्न को अपने उत्पाद की निहित संभावनाओं का अहसास भी नहीं हुआ। उसने ध्ीरे - धीरे अपने व्यवसाय को टुकड़ों में अपने साझेदारों को बेच दिया और 1888 में अपनी मृत्यु के वुफछ समय पहले ही कोका - कोला में अपने बचे - खुचे हितों को आसा जी॰वैफंडलर को बेच दिया। वैफंडलर, व्यापारिक सूझबूझ वाला एटलांटॅावासी था। उसने व्यवसाय के अन्य हिस्से भी खरीद लिए तथा अंत में पूरे व्यवसाय को नियंत्राण में ले लिया। 1 मइर्, 1889 के आसा जी वैफंडलर ने द एटलांटा पत्रिाका में एक पूरे पृष्ठ का विज्ञापन दिया जिसमें उसने अपने दवाइयों के थोक एवं पुफटकर व्यापार को कोका कोला के एकमात्रा स्वामी के रूप में घोष्िात किया। उसकेविज्ञापन में कहा गया कोका - कोला स्वादिष्ट! ताजगी देने वाला! स्पफूतिर्दायक! शक्ितवधर्क! पेय! कोका कोला का एकल स्वामित्व वैफंडलर को 1891 में जाकर प्राप्त हुआ, जिसके लिए उसे 2300 डाॅलर निवेश करने की आवश्यकता पड़ी। 1892 में जाकर वैफंडलर ने दी कोका - कोला काॅरपोरेशन के नाम से एक वंफपनी का गठन किया। स्रोतः कोका कोला वंफपनी की वैबसाइट से। संबंधों में सूचना को गुप्त रख सकता है तथा गोपनीयता बनाए रख सकता है। वह किसी कानून के अंतगर्त अपने लेखे - जोखे को प्रकाश्िात करने के लिए बाध्य भी नहीं है। ;गद्ध प्रत्यक्ष प्रोत्साहनः एकल स्वामी संपूणर् लाभ का ग्रहणकतार् होने के कारण प्रत्यक्ष रूप से अपने प्रयत्नों के लाभ को प्राप्त करता है। चूंकि वह अकेला ही स्वामी होता है इसलिए उसे लाभ में किसी के साथ हिस्सा बांटने की आवश्यकता नहीं है। इससे उसे कठिन परिश्रम करने के लिए अिाकतम प्रोत्साहन मिलता है। ;घद्ध उपलब्िध का अहसासः अपने स्वयं के लिए काम करने से व्यक्ितगत संतोष प्राप्त होता है। इस बात का अहसास कि वह स्वयं ही अपने व्यवसाय की सपफलता के लिए उत्तरदायी है, न केवल उसे आत्मसंतोष प्रदान करता है बल्िक स्वयं की योग्यताओं में आस्था एवं विश्वास की भावना को उत्पन्न करता है। ;चद्धस्थापित करने एवं बंद करने में सुगमताः व्यवसाय में प्रवेश के लिए न्यूनतम वैधनिक औपचारिकताओं की आवश्यकता होती है। यह एकल स्वामित्व का एक महत्त्वपूणर् लाभ है। एकल स्वामित्व को शासित करने के लिए अलग से कोइर् कानून नहीं है। क्योंकि इस का स्वरूप ऐसा है कि इसके कम से कम नियमन है इसलिए इसको स्थापित करना एवं इसे बंद करना सुगम है। सीमाएँ उपरोक्त लाभों के होते हुए भी एकल स्वामित्व की भी वुफछ सीमाएँ हैं। इनमें से वुफछ व्यवसाय अध्ययन प्रमुख सीमाएँ इस प्रकार हैंः ;कद्ध सीमित संसाधनः एक एकल स्वामी के संसाधन उसके व्यक्ितगत बचत एवं दूसरों से )ण लेने तक ही सीमित हैं। बैंक एवं दूसरे )ण देने वाले संस्थान एक एकल स्वामी को दीघर् अविा )ण देने में संकोच करेंगे। व्यापार का आकार साधारणतः छोटा ही रहता है तथा उसके विस्तार की संभावना भी कम होती है। इसका एक बड़ा कारण संसाधनों की कमी या अभाव है। ;खद्ध व्यावसायिक इकाइर् का सीमित जीवनकालः कानून की दृष्िट में स्वामी एवं स्वामित्व दोनों ही एक माने जाते हैं। स्वामी की मृत्यु, दिवालिया होना अथवा बीमारी से व्यवसाय प्रभावित होता है तथा इनसे वह बंद भी हो सकता है। ;गद्धअसीमित दायित्वः एकल स्वामित्व की एक बड़ी हानि है स्वामी का असीमित दायित्व। यदि व्यापार में असपफलता रहती है तो लेनदार अपनी लेनदारी को न केवल व्यवसाय की परिसंपिायों बल्िक स्वामी की निजी संपिायों से भी वसूल कर सकते हैं। एक भी गलत निणर्य या पिफर प्रतिकूल परिस्िथतियों के कारण स्वामी पर भारी वित्तीय भार पड़ सकता है। इसी कारण से एकल स्वामी परिवतर्न अथवा विस्तार का जोख्िाम उठाने के लिए कम ही तैयार होता है। ;घद्ध सीमित प्रबंध योग्यताः स्वामी पर प्रबंध संबंिात कइर् उत्तरदायित्व रहते हैं जैसे - क्रय, विक्रय, वित्त आदि। शायद ही कोइर् व्यक्ित हो जो इन सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठ हो। संसाधनों की कमी के कारण वह गुणी एवं महत्त्वाकांक्षी कमर्चारियों को न तो भतीर् कर सकते हैं और न ही उन्हें रोके रख सकते हैं। सारांश यह है कि एकल स्वामित्व के दोषों के होते हुए भी अनेक उद्यमी इसी संगठन को अपनाते हैं क्योंकि यह उन व्यवसायों के लिए सवोर्त्तम है जिनका आकार छोटा है, जिन्हें कम पूंजी की आवश्यकता है तथा जहाँ ग्राहकों को व्यक्ितगत सेवाओं की आवश्यकता है। 2.3 संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय विशेष प्रकार का संगठन स्वरूप है जो केवल भारत में ही पाया जाता है। हमारे देश का यह सबसे पुराना स्वरूप है। इसका अभ्िाप्राय उस व्यवसाय से है जिसका स्वामित्व एवं संचालन एक संयुक्त हिन्दू परिवार के सदस्य करते हैं। इसका प्रशासन हिन्दू कानून के द्वारा होता है। परिवार विशेष में जन्म लेने पर वह व्यक्ित व्यवसाय का सदस्य बन जाता है एवं तीन पीढि़यों तक व्यवसाय का सदस्य रह सकता है। व्यवसाय पर परिवार के मुख्िाया का नियंत्राण रहता है। वह परिवार सबसे बड़ी आयु का व्यक्ित होता है एवं ‘कत्तार्’ कहलाता है। सभी सदस्यों का पूवर्ज की संपिा पर बराबर का स्वामित्व होता है तथा उन्हें सहसमंाशी कहा जाता है। परिवार के व्यवसाय में सदस्यों को शासित करने की दो प्रणालियां हैः ;अद्ध दयाभाग प्रणालीः यह प्रणाली पश्िचमी बंगाल में प्रचलन में है एवं इसमें परिवार के पुरुष एवं स्त्राी सदस्य दोनों ही सहसंमाशी होते हैं। ;बद्ध मिताक्षरा प्रणालीः यह प्रणाली पश्िचमी बंगाल को छोड़कर शेष भारत में लागू होती है। दयाभाग प्रणाली के विपरीत व्यवसाय में केवल पुरुष सदस्य ही सहसंमाशी बन सकते हैं। लक्षण निम्न बिंदु संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय की आवश्यक विशेषताओं को उजागर करता हैः ;कद्ध निमार्णः संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय के लिए परिवार में कम से कम दो सदस्य एवं वह पैतृक संपिा जो उन्हें विरासत में मिली हो, का होना आवश्यक है। व्यवसाय के लिए किसी अनुबंध की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसमें सदस्यता जन्म के कारण मिलती है। यह हिन्दू उत्तरािाकार अिानियम 1956 द्वारा शासित होता है। ;खद्ध दायित्वः कतार् को छोड़कर अन्य सभी सदस्यों का दायित्व व्यवसाय की सहसमंाशी संपिा में उनके अंश तक सीमित होता है। ;गद्धनियंत्राणः परिवार के व्यवसाय पर कतार् का नियंत्राण होता है। वही सभी निणर्य लेता है तथा वही व्यवसाय के प्रबंधन के लिये अिाकृत होता है। उसके निणर्यों से दूसरे सभी सदस्य बाध्य होते हैं। ;घद्ध निरंतरताः कतार् की मृत्यु होने पर व्यवसाय चलता रहता है क्योंकि सबसे बड़ी आयु का अगला सदस्य कतार् का स्थान ले लेता है जिससे व्यवसाय में स्िथरता आती है। सभी सदस्यों की संयुक्त स्वीकृति से ही व्यवसाय को समाप्त किया जा सकता है। ;घद्ध नाबालिग सदस्यः व्यवसाय में व्यक्ित का प्रवेश संयुक्त हिन्दू परिवार में जन्म लेने के कारण होता है। इसीलिए नाबालिग भी व्यवसाय के सदस्य हो सकते हैं। गुण संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय के लाभ निम्नलिख्िात हैंः ;कद्ध प्रभावशाली नियंत्राणः कतार् के पास निणर्य लेने के पूरे अिाकार होते हैं। इससे सदस्यों में पारस्परिक मतभेद नहीं होता क्योंकि उनमें से कोइर् भी उसके निणर्य लेने के अिाकार में हस्तक्षेप व्यवसाय अध्ययन नहीं कर सकता। इसके कारण, निणर्य शीघ्र लिए जाते हैं तथा उनमें लचीलापन भी होता है। ;खद्ध स्थायित्वः कतार् की मृत्यु से व्यवसाय पर कोइर् प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि अगला सबसे अिाक आयु का व्यक्ित उसका स्थान ले लेता है। परिणामस्वरूप व्यवसाय का कायर् समाप्त नहीं होता तथा व्यवसाय की निरंतरता को किसी प्रकार का खतरा नहीं होता। ;गद्ध सदस्यों का सीमित दायित्वः कतार् को छोड़कर अन्य सभी सहसमांश्िायों का दायित्व व्यवसाय में उनके अंश तक सीमित होता है। इसीलिए उनके जोख्िाम स्पष्ट एवं निश्िचत होते हैं। संयुक्त हिन्दू परिवार में ¯लग समता - एक वास्तविक्ता। हिन्दू उत्तराध्िकार ;संशोध्नद्ध बिल संसद में 20 दिसंबर, 2004 को प्रस्तुत किया गया इसी के साथ राष्ट्रीय न्यूनतम साझा कायर्क्रम में लिंग की समानता का वायदा पूरा करने की दिशा में सरकार एक कदम और बढ़ी है। हिन्दू उत्तरािाकार कानून, 1956 के संशोधन का बिल पूवर्जों की संपिा की विरासत में स्ित्रायों को समान अिाकार देता है जो अब तक केवल पुरुषों को ही प्राप्त था। वास्तव में हिन्दू उत्तरािाकार कानून को समानता के संवैधानिक सि(ांत के अनुरूप लाने की दिशा में यह एक महत्त्वपूणर् कदम है। प्रस्तावित बिल के कानून बन जाने पर राष्ट्रीय महिला आयोग या नेशनल कमीशन पफॅार वूमैन, ;छब्ॅद्ध की सिपफारिशें भी लागू हो जाएँगी जिससे समाज में सामाजिक परिवतर्न लाने में कापफी सहायता मिलेगी। बिल हिन्दू संपिा में पुत्रों के समान पुत्रिायों को समान अिाकार देकर हिन्दू मिताक्षरा सहसमंाशी उत्तरािाकार अिानियम, 1956 की धारा 6 में किए भेदभाव को समाप्त करना चाहता है। जिसे केरल का माॅडल कहा था उसमें समांशी की अवधारणा को समाप्त कर दिया गया था और केरल संयुक्त परिवार प(ति ;संशोधनद्ध कानून, 1975 के अनुसार उत्तरािाकारियों ;पुरुष एवं स्त्राीद्ध को जन्म के कारण संपिा में अिाकार नहीं मिलता है। वे मात्रा किराएदार माने जाते हैं मानो बंटवारा हो चुका हो। आंध्र प्रदेश ;1986द्ध, तमिलनाडु ;1989द्ध, कनार्टक ;1994द्ध एवं महाराष्ट्र ;1994द्ध ने भी ऐसे कानून बनाए जिनमें पुत्रिायों को पुत्रों के समान समंाशी अिाकार दिया गया अथवा पूवर्जों की संपिा में उनका दावा स्वीकार किया गया है। स्ित्रायों के तथाकथ्िात समानािाकार का मुद्दा केवल कमजोर वगर् को समता प्रदान करना ही नहीं है बल्िक भारतीय समाज की आधुनिकता का मापदंड है एवं हमारी सभ्यता की उदार प्रकृति है। स्रोतः ;इर्.सी.थाॅमस के आलेख ‘दी रोड टू जैंडर इक्वैलिटी’ से साभारद्ध ;घद्ध निष्ठा एवं सहयोग में वृिः क्योंकि व्यवसाय को एक परिवार के सदस्य मिलकर चलाते हंै इसलिए एक दूसरे के प्रति अिाक निष्ठावान होते हैं। व्यवसाय का विकास परिवार की उपलब्िध होती है इसीलिए उसके लिए यह गवर् की बात होती है। इससे सभी सदस्यों का श्रेष्ठ सहयोग प्राप्त होता है। सीमाएँ संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय की वुफछ सीमाएँ नीचे दी गइर् हैंः ;कद्ध सीमित साधनः संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय मूल रूप से पैतृक संपिा पर आश्रित रहता है इसलिए इसके सामने सीमित पूंजी की समस्या रहती है। इससे व्यवसाय के विस्तार की संभावना कम हो जाती है। ;खद्ध कतार् का असीमित दायित्वः कतार् पर न केवल निणर्य लेने एवं प्रबंध करने के उत्तरदायित्व का बोझ होता है बल्िक उस पर असीमित दायित्व का भी भार होता है। व्यवसाय के )णों को चुकाने के लिए उसकी निजी संपिा का भी उपयोग किया जा सकता है। ;गद्ध कतार् का प्रभुत्वः कतार् अकेला ही व्यवसाय का प्रबंध करता है जो कभी - कभी अन्य सदस्यों को स्वीकायर् नहीं होता है। इससे उनमें टकराव हो जाता है यहाँ तक कि पारिवारिक इकाइर् भंग भी हो सकती है। ;घद्ध सीमित प्रबंध कौशलः यह आवश्यक तो नहीं कि कतार् सभी क्षेत्रों का विशेषज्ञ हो इसलिए व्यवसाय को उसके मूखर्तापूणर् निणर्यों के परिणाम भुगतने होते हैं। यदि वह प्रभावी निणर्य नहीं ले पाता है तो उससे वित्त संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं, जैसे - कम लाभ होना या हानि होना। अंत में हम कह सकते हैं कि संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय ढलान की ओर है क्योंकि देश में संयुक्त हिन्दू परिवारों की संख्या कम होती जा रही है। 2.4 साझेदारी एकल स्वामित्व के व्यापारिक विस्तार के वित्तीयन एवं प्रबंधन संबंिात निहित दोष के कारण एक जीवंत विकल्प के रूप में साझेदारी का मागर् प्रशस्त हुआ है। साझेदारी भारी पूंजी निवेश, विभ्िान्न प्रकार के कौशल एवं जोख्िाम में भागीदारी की आवश्कताओं को पूरा करती है। लक्षण उपयर्ुक्त परिभाषाओं के आधार पर साझेदारी संगठन की विशेषताओं का वणर्न नीचे दिया गया है। ;कद्ध स्थापनाः व्यावसायिक संगठन का साझेदारी स्वरूप भारतीय साझेदारी अिानियम 1932 द्वारा शासित है। साझेदारी कानूनी समझौते के परिणामस्वरूप अस्ितत्व में आती है जिसमें साझेदारों के मध्य संबंधों, लाभ एवं हानि को बाँटने एवं व्यवसाय के संचालन के तरीकों को निश्िचत किया जाता है। विश्िाष्ट बात यह है कि व्यवसाय वैधनिक होना चाहिए एवं उसके संचालन का उद्देश्य लाभ कमाना होना चाहिए। अतः कोइर् दो व्यक्ित यदि धमार्थर् सेवा के लिए एकजुट होते हैं तो यह साझेदारी नहीं होगी। ;खद्ध देयताः पफमर् के साझेदारों का दायित्व सीमित होता है यदि व्यवसाय की परिसंपिायाँ अपयर्ाप्त हैं तो )णों को व्यक्ितगत संपिायों से चुकाया जाएगा। इसके अतिरिक्त वे )णों को चुकता करने के लिए व्यक्ितगत रूप से एवं संयुक्त रूप से उत्तरदायी होंगे। संयुक्त रूप से प्रत्येक साझेदार )ण भुगतान के लिए उत्तरदायी है तथा वह प्रत्येक व्यवसाय में अपने हिस्से के अनुपात में योगदान करेगा तथा उस सीमा तक देनदार होगा। व्यवसाय की देनदारी का भुगतान करने के लिए वह साझेदार को व्यक्ितगत रूप से उत्तरदायी ठहराया जा सकता है लेकिन ऐसी स्िथति में वह साझेदार अन्य साझेदारों से उनके हिस्से की देनदारी के बराबर राश्िा वसूल कर सकता है। ;गद्ध जोख्िाम वहन करनाः व्यवसाय को एक टीम के रूप में चलाने से उत्पन्न जोख्िाम को वहन साझेदार करते हैं। इसके प्रतिपफल के रूप में उन्हें लाभ प्राप्त होता है जिसे, आपस में एक तय अनुपात में बाँट लेते हैं लेकिन उसी अनुपात में वे हानि को भी बाँटते हैं। ;घद्ध निणर्य लेना एवं नियंत्राणः साझेदार आपस में मिलकर दिन - प्रतिदिन के कायो± के संबंध में निणर्य लेने एवं नियंत्राण करने के उत्तरदायित्व को निभाते हैं। निणर्य उनकी आपसी राय से लिए जाते हैं। अतः साझेदारी पफमर् के कायो± के प्रबंधन में उन सभी का योगदान रहता है। ;घद्ध निरंतरताः साझेदारी में व्यवसाय की निरंतरता की कमी रहती है क्योंकि किसी भी साझेदार की मृत्यु, अवकाश ग्रहण करने, दिवालिया होने या पिफर पागल हो जाने से यह व्यवसाय अध्ययन समाप्त हो सकती है। बाकी साझीदार नए समझौते के आधार पर व्यवसाय को चालू रख सकते हैं। ;चद्ध सदस्यताः किसी साझेदारी को प्रारंभ करने के लिए कम से कम दो तथा बैंकिग व्यवस्था में अिाकतम 10 तथा अन्य व्यवसाय में 20 सदस्य हो सकते हैं। ;छद्ध एजेंसी संबंधः साझेदारी की परिभाषा इस तथ्य को रेखांकित करती है कि इसमें व्यवसाय को सभी मिलकर या पिफर सभी की ओर से कोइर् एक चला सकता है। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक साझेदार एजेंट भी है एवं स्वामी भी। और क्योंकि वह दूसरे साझेदारों का प्रतिनििात्व करता है इसलिए वह उनका एजेंट होता है तथा उसके काया±े से अन्य साझेदार आब( हो जाते हैं। प्रत्येक साझेदार स्वामी भी होता है तथा दूसरे साझेदारों के कायो± से आब( हो जाता है। गुण साझेदारी पफमर् के लाभ नीचे दिए गए हैंः ;कद्ध स्थापना एवं समापन सरलः एक साझेदारी पफमर् को संभावित साझेदारों के बीच समझौते के द्वारा सरलता से बनाया जा सकता है। जिसके अनुसार वह व्यवसाय को चलाते हंै तथा जोख्िाम को बाँटते हैं। पफमर् का पंजीकरण अनिवायर् नहीं होता एवं इसे बंद करना भी सरल होता है। ;खद्ध संतुलित निणर्यः साझेदार अपनी - अपनी विश्िाष्टता के अनुसार अलग - अलग कायोंर् को देख सकते हैं। एक व्यक्ित विभ्िान्न कायांेर् को करने के लिए बाध्य नहीं होता तथा इससे निणर्य लेने में गलतियाँ भी कम होती है। परिणामस्वरूप निणर्य अिाक संतुलित होते हैं। ;गद्ध अिाक कोषः साझेदारी में पूंजी कइर् साझेदारों द्वारा लगाइर् जाती है। इससे एकल स्वामित्व की तुलना में अिाक धन जुटाया जा सकता है तथा आवश्यकता पड़ने पर अतिरिक्त व्यावसायिक कायर् भी किए जा सकते हैं। ;घद्ध जोख्िाम को बाँटनाः साझेदारी पफमर् को चलाने में निहित जोख्िाम को सभी साझेदार बँाट सकते हैं। इससे अकेले साझेदार पर पड़ने वाला बोझ, तनाव एवं दबाव कम हो जाता है। ;घद्ध गोपनीयताः एक साझेदारी पफमर् के लिए अपने खातों को प्रकाश्िात करना एवं ब्यौरा देना कानूनी रूप से आवश्यक नहीं है। इसलिए यह अपने व्यावसायिक कायोंर् के संबंध में सूचना को गुप्त रख सकते हैं। सीमाएँ साझेदारी पफमर् की निम्न सीमाएँ हंैः ;कद्ध असीमित दायित्वः यदि पफमर् की देनदारी को चुकाने के लिए व्यवसाय की संपिायाँ पयार्प्त नहीं हैं तो साझेदारों को इसका भुगतान अपने निजी स्रोतों से करना होगा। साझेदारों के दायित्व संयुक्त एवं पृथक दोनों होते हैं इसलिए यह उन साझेदारों के लिए अनुचित होगा जिनके पास अिाक व्यक्ितगत धन है। यदि अन्य साझेदार )ण का भुगतान करने में असमथर् रहते हैं तो इसका भुगतान धनी साझेदारों को करना होगा। ;खद्ध सीमित साधनः साझेदारों की संख्या सीमित होती है। इसलिए बडे़ पैमाने के व्यावसायिक कायो± के लिए उनके द्वारा लगाइर् गइर् पूंजी अपयार्प्त रहती है। परिणामस्वरूप साझेदारी पफमर् एक निश्िचत आकार से अिाकार विस्तार नहीं कर पाती। ;गद्ध परस्पर विरोध की संभावनाः साझेदारी का संचालन व्यक्ितयों का एक समूह करता है जिनमें निणर्य लेने के अिाकार को बाँटा जाता है। वुफछ मामलों में यदि मतभेद है तो इससे साझेदारों के बीच विवाद पैदा हो सकता है। इसी प्रकार से एक साझेदार के निणर्य से दूसरे साझेदार आब( हो जाते हैं। इस प्रकार से किसी भारतीय साझेदारी अिानियम 1932 ने साझेदारी की परिभाषा इस प्रकार दी है - फ्यह उन व्यक्ितयों के पारस्परिक संबध हैं जिनके द्वारा या उन सबकी ओर से किसी एक साझेदार द्वारा संचालित व्यापार के लाभ को वे आपस में बाँटने के लिए सहमत होते हैं।’’ साझेदारी उन लोगों के बीच का संबंध है जो अनुबंध के लिए सवर्था योग्य हंै तथा जिन्होंने निजी लाभ के लिए आपस में मिलकर एक वैधानिक व्यापार करने का समझौता किया है। एल.एच.हेनी साझेदारी उन लोगों के मध्य संबंध है जिन्होंने किसी व्यवसाय में अपनी संपिा, श्रम अथवा निपुणता को मिला लिया है तथा वे आपस में उससे होने वाले लाभ को बाँट रहे हैं। भारतीय प्रसंविदा अिानियम एक का अनुचित निणर्य दूसरांे के लिए वित्तीय बबार्दी का कारण बन सकता है। कोइर् साझेदार यदि पफमर् को छोड़ना चाहता है तो उसे साझेदारी को समाप्त करना होगा क्योंकि वह स्वामित्व का हस्तांतरण नहीं कर सकता। ;घद्ध निरंतरता की कमीः किसी भी एक साझेदार की मृत्यु, अवकाश ग्रहण करने, दिवालिया होने अथवा पागल होने से साझेदारी समाप्त हो जाती है। इसे सभी की सहमति से कभी भी समाप्त किया जा सकता है इसलिए इसमें स्थायित्व एवं निरंतरता नहीं होती। ;घद्ध जनसाधारण के विश्वास की कमीः साझेदारी पफमर् के लिए इसकी वित्तीय सूचनाओं एवं अन्य संबंिात जानकारी का प्रकाशन अथवा उजागर करना कानूनी रूप से अनिवायर् नहीं है, इसलिए जनसाधारण के लिए पफमर् की वित्तीय स्िथति को जानना कठिन हो जाता है। इससे जनता का विश्वास भी कम होता है। 2.4.1 साझेदारों के प्रकार साझेदारी पफमर् में विभ्िान्न प्रकार के साझेदार हो सकते हैं जिनकी अलग - अलग भूमिकाएँ एवं दायित्व होते हैं। इनके अिाकारों एवं उत्तरदायित्वों को भली - भांति समझने के लिए इनके प्रकारों को समझना महत्त्वपूणर् है। इनका वणर्न नीचे किया गया है। ;कद्ध सिय साझेदारः एक सिय साझेदार वह है जो पूंजी लगाता है। पफमर् के लेनदारों के प्रति उसका दायित्व असीमित होता है। यह साझेदार अन्य साझेदारों की ओर से व्यवसाय संचालन में सिय रूप से भाग लेते हैं। व्यवसाय अध्ययन ;खद्ध सुप्त अथवा निष्िक्रय साझेदारः जो साझेदार व्यवस्था के दिन - प्रतिदिन के कायो± में भाग नहीं लेते हैं उन्हें सुसुप्त साझेदार कहते हैं। एक निष्िक्रय साझेदार पफमर् में पूंजी लगाता है, लाभ - हानि को बाँटता है तथा उसका असीमित दायित्व होता है। ;गद्ध गुप्त साझेदारः यह वह साझेदार होता है जिसके पफमर् से संबंध को साधारण जनता नहीं जानती। इस विश्िाष्टता को छोड़कर अन्य मामलों में यह अन्य साझेदारों के समान होता है। वह पूंजी लगाता है, प्रबंध में भाग लेता है, लाभ हानि को बांटता है तथा लेनदारों के प्रति इसका दायित्व असीमित होता है। ;घद्ध नाममात्रा का साझेदारः यह वह साझेदार होता है, पफमर् जिसके नाम का प्रयोग करती है, लेकिन वह इसमें कोइर् पूंजी नहीं लगता है। वह पफमर् के प्रबंध में सिय रूप से भाग नहीं लेता है, न ही लाभ - हानि में भागीदार होता है, लेकिन अन्य साझेदारों के समान पफमर् के )णों के भुगतान के लिए तीसरे पक्षों के प्रति उत्तरदायी होता है। ;घद्ध विबंध्न साझेदार ;इसटाॅपेलद्धः कोइर् व्यक्ित विबंध्न साझेदार तब माना जाता है, यदि वह अपनी पहल, आचरण अथवा व्यवहार से दूसरों को यह आभास होता है, कि वह किसी पफमर् का साझेदार है। ऐसे साझेदार पफमर् के )णों के भुगतान के लिए उत्तरदायी होते हैं क्योंकि अन्य पक्षों की दृष्िट में वे साझेदार होते हैं। भले ही वे इसमें पूंजी नहीं लगाते हैं और न ही इसके प्रबंध में भाग लेते हैं। उदाहरण के लिए सीमा की एक मित्रा रानी है जो कि एक साॅफ्रटवेयर पफमर् सिम्पलैक्स सोल्यूशन में साझेदार है, रानी, सीमा के साथ मोहन साॅफ्रटवेयर में व्यवसाय के सिलसिले में एक मीटिंग में भाग लेने जाती है तथा एक सौदे को तय करने की कायर्वाही में सिय रूप से भाग लेती है। रानी ऐसा आभास दिलाती है कि मानो वह सिम्पलैक्स सोल्यूशन में एक साझेदार है। यदि इस बातचीत के आधार पर सिम्पलैक्स सोल्यूशन को उधार की सुविधा दी जाती है तो रानी भी इस देनदारी के भुगतान के लिए ठीक उसी प्रकार उत्तरदायी होगी मानो वह भी पफमर् में एक साझेदार हो। ;चद्ध प्रतिनिध्ि साझेदार ;होल्डिंग आऊटद्ध यह वह व्यक्ित होता है जो जान - बूझकर पफमर् में अपने नाम को प्रयोग करने देता है अथवा अपने आपको इसका प्रतिनििा मानने देता है। ऐसा व्यक्ित किसी भी उस )ण के लिए उत्तरदायी होगा जो उसके ऐसे प्रतिनििात्व के कारण दिए गए हैं। यदि वह वास्तव में साझेदार नहीं है तथा इस उत्तरदायित्व से मुक्त होना चाहता है तो उसे तुरंत इसे नकारना होगा तथा उसे अपनी स्िथति स्पष्ट कर यह बताना होगा कि वह साझेदार नहीं है। यदि वह ऐसा नहीं करता है तो वह इस आधार पर हुइर् किसी भी प्रकार की हानि के लिए तीसरे पक्ष के प्रति उत्तरदायी होगा। 2.4.2.साझेदारी के प्रकार साझेदारी को दो घटकों के आधार पर वगीर्वृफत किया जा सकता है अविा एवं देयता। अवध्ि के आधार पर साझेदारी दो प्रकार की हो सकती है। ;कद्ध ऐच्िछक साझेदारी ;खद्ध विश्िाष्ट साझेदारी। देयता के आधार पर भी साझेदारी दो प्रकार हैं ;कद्ध सीमित दायित्व वाली एवं ;खद्ध असीमित दायित्व वाली। इनका वणर्न आगे के खंडों में किया गया है। अवध्ि के आधर पर वगीर्करण ;कद्ध ऐच्िछक साझेदारीः इस प्रकार की साझेदारी की रचना साझेदारों की इच्छा से होती है। यह उस समय तक चलती है जब तक कि अलग होने का नोटिस नहीं दिया जाता। किसी भी साझेदार द्वारा नोटिस देने पर यह समाप्त हो जाती है। ;खद्ध विश्िाष्ट साझेदारीः साझेदारी की रचना यदि किसी विश्िाष्ट परियोजनाएं जैसे किसी भवन के निमार्ण या कोइर् कायर् या पिफर एक निश्िचत अविा के लिए की जाती है तो इसे विश्िाष्ट साझेदारी कहते हैं। जिस उद्देश्य के लिए इसकी रचना की गइर् है उसके पूरा होने पर अथवा अविा की समाप्ित पर यह समाप्त हो जाती है। देयता के आधार पर वगीर्करण ;कद्ध सामान्य साझेदारीः सामान्य साझेदारी में साझेदारों का दायित्व असीमित एवं संयुक्त होता है। साझेदारों को प्रबंध में भाग लेने का अिाकार होता है तथा उनके कृत्यों से अन्य साझेदार तथा पफमर् आब( हो जाते हैं। ऐसे पफमर् का पंजीयन ऐच्िछक होता है। पफमर् का अस्ितत्व साझेदारों की मृत्यु, पागलपन एवं अवकाश ग्रहण करने से प्रभावित होता है। ;खद्ध सीमित साझेदारीः सीमित साझेदारी में कम से कम एक साझेदार का दायित्व असीमित होता है तथा शेष साझेदारों का सीमित। ऐसी साझेदारी सीमित दायित्व वाले साझेदारों की मृत्यु, पागलपन अथवा दिवालिया होने से समाप्त नहीं होता है। सीमित दायित्व वाले साझेदार प्रबंध में भाग नहीं ले सकते तथा उनके कायो± से न तो पफमर् और न ही दूसरे साझेदार आब( होते हैं। ऐसी साझेदारी का पंजीयन अनिवायर् है। इस प्रकार की साझेदारी की पहले भारत में अनुमति नहीं थी। सीमित दायित्व वाले साझेदारी की अनुमति 1991 नवीन लघु उद्योग नीति लागू करने के पश्चात् दी गइर्। यह कदम छोटे पैमाने के उद्यमियों के मित्रा एवं संबंिायों से समता पूंजी प्राप्त करने के लिए उठाया गया व्यवसाय अध्ययन क्योंकि अन्यथा ये लोग साझेदारी पफमर् में असीमित दायित्व की धारा के कारण सहायता करने से पीछे हटते थे। 2.4.3 साझेदारी संलेख साझेदारी उन लोगों का ऐच्िछक संगठन है जो समान उद्देश्य की प्राप्ित के लिए एकजुट होते हैं। साझेदारी बनाने के लिए सभी शते± एवं साझेदारों से संबंिात सभी पहलुओं के संबंध में स्पष्ट समझौता आवश्यक है। ताकि बाद में साझेदारों में किसी प्रकार की गलतपफहमी नहीं हो। यह समझौता मौख्िाक अथवा लिख्िात हो सकता है। लिख्िात समझौते का होना आवश्यक नहीं है लेकिन अच्छा यही रहता है कि समझौता लिख्िात ही हो क्योंकि यह निधार्रित शतो± का प्रमाण है। लिख्िात समझौता जो साझेदारी को शासित करने के लिए शतो± व परिस्िथतियों का उल्लेख करता है साझेदारी संलेख कहलाता है। साझेदारी संलेख में सामान्यतः निम्न पहलू शामिल होते हैंः सारणी 2.1 साझदे ारांे केपक्रार का तलु नात्मक विश्लष्े ाण कार्रप गदानेजी का यांूप ध्ंब्रप हिस्सांेलाभ/हानि म नदारीेद दारेसिय साझ ैजी लगाता हंूप ैभागीदार हंेध् मंब्रप ैभागीदार हेलाभ/हानि म ैअसीमित दायित्व ह प्त अथवा निष्िक्रयुस दारेसाझ ैजी लगाता हंूप ैता हेभाग लेंध् मंब्रप ैटता हंबोलाभ/हानि का ैअसीमित दायित्व ह दारेप्त साझुग ैजी लगाता हंूप परैता हेभाग लंेध् मंब्रप ेप्त रूप सुग ैटता हंलाभ - हानि बा ैअसीमित दायित्व ह दारेनाम मात्रा का साझ ैलगाता हंजी नहींूप ैता हेलंभाग नहींेध् मंब्रप ंेसाधरणतया लाभ/हानि म ैता हेहांभागीदार नही ैअसीमित दायित्व ह दारेध्न साझंविब ैलगाता हंजी नहींूप ैता हेलंभाग नहींेध् मंब्रप भागीदारंेलाभ/हानि म ैता हेहांनही ैअसीमित दायित्व ह दारेतिनिध्ि साझ्रप ैलगाता हंजी नहींूप ैता हेलंभाग नहींेध् मंब्रप भागीदारंेलाभ - हानि म ैता हेेहांनही ैअसीमित दायित्व ह ऽ पफमर् का नाम ऽ व्यवसाय की प्रवृफति एवं स्थान जहाँ वह स्िथत है ऽ व्यवसाय की अविा ऽ प्रत्येक साझेदार द्वारा किया गया निवेश ऽ लाभ - हानि का बंटवारा ऽ साझेदारों के कतर्व्य एवं दायित्व ऽ साझेदारों का वेतन एवं आहरण ऽ साझेदार के प्रवेश, अवकाश ग्रहण एवं हटाए जाने से संबंिात शते± ऽ पूंजी एवं आहरण पर ब्याज ऽ पफमर् के समापन की प्रिया ऽ खातों को तैयार करना एवं उसका अंकेक्षण ऽ विवादों के समाधान की प(ति 2.4.4 पंजीकरण साझेदारी पफमर् के पंजीकरण का अथर् है पफमर् के पंजीयन अध्िकारी के पास रहने वाले पफमो± के रजिस्टर में पफमर् का नाम तथा संबंिात विवरण की प्रविष्िट करना। यह पफमर् की उपस्िथति का पक्का प्रमाण होता है। पफमर् को पंजीवृफत कराना ऐच्िछक होता है। परंतु जिस पफमर् का पंजीयन नहीं हुआ है वह कइर् लाभों से वंचित रह जाती है। पफमर् का पंजीयन न कराने के निम्नलिख्िात परिणाम हो सकते हैंः ;अद्ध एक अपंजीवृफत पफमर् का साझेदार अपने पफमर् अथवा अन्य साझेदारों वफी विरु( मुकदमा दायर नहीं कर सकता, ;बद्ध पफमर् अन्य पक्षों के विरु( मुकदमा नहीं चला सकती, तथा ;सद्ध पफमर् साझेदारों के विरु( मुकदमा नहीं चला सकती। अतः हम कह सकते हैं कि पफमर् का पंजीयन यद्यपि अनिवायर् नहीं है पिफर भी पंजीयन कराना नाबालिग साझेदारः साझेदारी दो लोगों के बीच कानूनी अनुबंध पर आधारित होती है जो उनके द्वारा संचालित व्यापार के लाभ - हानि को बाँटने का समझौता करते हैं क्योंकि एक नाबालिग किसी के साथ अनुबंध् नहीं कर सकता इसलिए वह किसी पफमर् में साझेदार नहीं बन सकता। पिफर भी किसी नाबालिग को सभी अन्य साझेदारों की सहमति से पफमर् के लाभों में भागीदार बनाया जा सकता है। ऐसे में उसका दायित्व पफमर् में लगाइर् गइर् उसकी पूंजी तक सीमित होगा। वह पफमर् के प्रबंध में भाग नहीं ले सकेगा। अतः एक नाबालिग केवल लाभ में भागीदार होगा तथा वह हानि को वहन नहीं करेगा। हाँ, यदि वह चाहे तो पफमर् के खातों को देख सकता है। नाबालिग की स्िथति उसके बालिग हो जाने पर बदल जाती है। वास्तव में बालिग हो जाने पर नाबालिग को यह निणर्य लेना होगा कि क्या वह पफमर् में साझेदार बने रहना चाहता है। छः माह के अन्दर उसे अपने निणर्य का सावर्जनिक नोटिस देना होगा। यदि वह ऐसा करने मे असमथर् रहता है तो उसे पूणर्रूपेण साझेदार माना जाएगा तथा अन्य सिय साझेदारों के समान ही पफमर् की देनदारी के लिए उसका दायित्व भी असीमित होगा। ही उचित रहता है। भारतीय साझेदारी अिानियम 1932 के अनुसार किसी पफमर् वफी साझेदार पफमर् को उस राज्य के रजिस्ट्रार के पास पंजीकरण करा सकती है जिस राज्य में वह स्िथत है। एक पफमर् के पंजीयन की प्रिया निम्नलिख्िात हैः ;अद्ध पफमो± के रजिस्ट्रार, के पास निधार्रित प्रपत्रा ;पफॅामर्द्ध के रूप में आवेदन करना। इस आवेदन में निम्न विवरण दिया जाता हैः पफमर् का नाम, वह स्थान जहाँ पफमर् स्िथत है तथा वह स्थान जहाँ पफमर् अपना व्यवसाय कर रही है, प्रत्येक साझेदार के पफमर् में प्रवेश की तिथ्िा, साझेदारों के नाम एवं पते, एवं साझेदारी की अविा। ;बद्धइस आवेदन पर सभी साझेदारों के हस्ताक्षर होते हैं। पफमो± के रजिस्ट्रार के पास आवश्यक पफीस जमा कराना। ;सद्धस्वीवृफति के पश्चात रजिस्ट्रार पफमो± के रजिस्टर में प्रविष्िट कर देगा तथा तत्पश्चात पंजीयन प्रमाण पत्रा जारी कर देगा। 2.5 सहकारी संगठन सहकारी शब्द का अथर् है किसी साझे उद्देश्य के लिए एक साथ मिलकर काम करना। सहकारी समिति उन लोगों का स्वैच्िछक संगठन है जो सदस्यों के कल्याण के लिए एकजुट हुए हंै। अिाक लाभ के लालची मध्यस्थों के हाथों संभावित शोषण को ध्यान में रखते हुए वे अपने आथ्िार्क हितों की रक्षा से प्रेरित होते हैं। व्यवसाय अध्ययन एक सहकारी समिति का सहकारी समिति अिानियम 1912 के अंतगर्त पंजीकरण अनिवायर् है। इसकी प्रिया सरल है एवं समिति का गठन करने के लिए कम से कम दस बालिग सदस्यों की स्वीवृफति की आवश्यकता होती है। समिति की पूंजी को अंशों का निगर्मन कर इसके सदस्यों से जुटाया जाता है। पंजीकरण के पश्चात् समिति एक स्वतंत्रा वैधानिक अस्ितत्व प्राप्त कर लेती है। लक्षण सहकारी समिति की विशेषताएँ निम्नलिख्िात हैं। ;कद्ध स्वैच्िछक सदस्यताः सहकारी समिति की सदस्यता ऐच्िछक होती है। कोइर् भी व्यक्ित किसी सहकारी समिति में स्वेच्छा से सम्िमलित हो सकता है अथवा उसे छोड़ सकता है। किसी समिति में सम्िमलित होने अथवा उसे छोड़ने के लिए वह बाध्य नहीं होता। यद्यपि छोड़ने से पहले उसे एक नोटिस देना पड़ता है लेकिन सदस्य बने रहने के लिए वह बाध्य नहीं होता है। इसकी सदस्यता खुली होती है तथा किसी भी धमर्, जाति अथवा लिंग भेद का कोइर् भी व्यक्ित इसका सदस्य बन सकता है। ;खद्ध वैधानिक स्िथतिः सहकारी समिति का पंजीकरण अनिवायर् है इससे समिति को अपने सदस्यों से अलग पृथक अस्ितत्व प्राप्त हो जाता है। समिति अनुबंध कर सकती है एवं अपने नाम में परिसंपिा रख सकती है। दूसरों पर मुकदमा कर सकती है तथा दूसरे इस पर मुकदमा कर सकते हैं। इसके पृथक वैधानिक अस्ितत्व के कारण सदस्यों के इसमें प्रवेश अथवा इसको छोड़ कर जाने का इस पर प्रभाव नहीं पड़ता। ;गद्ध सीमित दायित्वः एक सहकारी समिति के सदस्यों का दायित्व उनके द्वारा लगायी पूंजी की राश्िा तक सीमित रहता है। किसी भी सदस्य के लिए यह राश्िा अिाकतम जोख्िाम की सीमा है। ;घद्ध नियंत्राणः किसी भी सहकारी समिति में निणर्य लेने की शक्ित उसकी निवार्चित प्रबंध कमेटी के हाथों में होती है। सदस्यों के पास वोट का अिाकार होता है जिससे उन्हें प्रबंध् समिति के सदस्यों को चुनने का अवसर मिलता है तथा सहकारी समिति का स्वरूप प्रजातान्ित्राक बनता है। ;घद्ध सेवा भावनाः सहकारी समिति के उद्देश्य पारस्परिक सहायता एवं कल्याण के मूल्यों पर अिाक जोर देते हैं। इसलिए इसके कायो± में सेवाभाव प्रधन रहता है। अगर सहकारी समिति को आिाक्य की प्राप्ित होती है तो इसे समिति के उपनियमों के अनुरूप सदस्यों में लाभांश के रूप में बंाट दिया जाता है। गुण सहकारी समिति के सदस्यों को अनेक लाभ होते हैं। सहकारी समिति के वुफछ लाभ नीचे दिए जा रहे हैं। ;कद्धवोट की समानताः सहकारी समिति एक व्यक्ित एक वोट के सि(ांत से शासित होती है। सदस्यों द्वारा लगायी गयी पूंजी की राश्िा से प्रभावित हुए बिना प्रत्येक सदस्य को वोट का समान अिाकार प्राप्त है। ;खद्ध सीमित दायित्वः सहकारी समिति के सदस्यों का दायित्व उनके द्वारा लगायी गयी पूंजी तक सीमित होता है। उनकी निजी संपिायों को व्यवसाय के )णों को चुकाने के लिए उपयोग में नहीं लाया जा सकता। ;गद्धस्थायित्वः सदस्यों की मृत्यु, दिवालिया होना अथवा पागलपन सहकारी समिति की निरंतरता को प्रभावित नहीं करता है। समिति इसीलिए सदस्यता में आए परिवतर्न से प्रभावित हुए बिना कायर् करती रहती है। ;घद्ध मितव्ययी प्रचालनः सदस्य समिति को साधारणतया अवैतनिक सेवाएँ देते हैं। क्यांेकि प्राइस वाॅटर हाउस वूफपसर् पूवर् में एक साझेदारी पफमर् थी आज अनेक वंफपनियों का उद्गम साझेदारी है। विश्व की शीषर् लेखांकन पफमर्। प्राइस वाॅटर हाउस वूफपसर् को 1998 में प्राइस वाॅटर हाउस एवं वूफपसर् एंड लैब्रेंड दो वंफपनियों को मिलाकर बनाया गया था। प्रत्येक का इतिहास 150 वषर् पुराना है तथा 1900 शताब्दी में ग्रेट बि्रटेन से जुड़ा है। 1850 में सैमुअल लोवैल प्राइस ने लंदन में लेखांकन व्यवसाय स्थापित किया। 1865 में विलियम एच होलीलैंड एवं एडविन वाॅटरहाउस के साथ मिलकर उसने साझेदारी पफमर् बनाइर्। जैसे - जैसे पफमर् बढ़ी पेशेवर कमर्चारियों में से आवश्यक योग्यता प्राप्त लोगों को साझेदारी में सम्िमलित कर लिया गया। 1980 के अंत तक प्राइस वाॅटर हाउस एक महत्त्वपूणर् लेखांकन पफमर् बन चुकी थी। स्रोतः कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्राइस वाॅटर हाउस काॅरपरेटर के अभ्िालेख। ध्यान मध्यस्थ की समाप्ित पर ही वेंफदि्रत होता है, इससे लागत में कमी आती है। अिाकांश ग्राहक समिति के सदस्य ही होते हैं। इसलिए डूबते )णों का जोख्िाम बहुत कम होता है। ;घद्ध सरकारी सहायताः सहकारी समिति लोकतंत्रा एवं धमर्निपेर्क्षता का उदाहरण है। इसलिए इनको कम टैक्स, अनुदान, नीची ब्याज की दर के )ण के रूप में सरकार से सहायता मिलती है। ;चद्ध सरल स्थापनाः सहकारी समिति कम से कम दस सदस्योें से प्रारंभ की जा सकती है। इसके पंजीकरण की प्रिया सरल है तथा इसमें कानूनी औपचारिकताएँ कम हैं। इसकी स्थापना सहकारी समिति अध्िनियम 1912 में दी गइर् व्यवस्था के अनुसार होती है। सीमाएँ सहकारी संगठन की निम्न सीमाएँ हैंः ;कद्ध सीमित संसाधनः सहकारी समिति के संसाधन सदस्यों की पूंजी से बनते हैं जिनके साधन सीमित होते हैं। निवेश पर लाभांश की नीची दर के कारण भी अध्िक सदस्य नहीं बन पाते। ;खद्ध अक्षम प्रबंधनः सहकारी समितियां ऊँचा वेतन नहीं दे पाती इसलिए उसको वुफशल व्यवसाय अध्ययन प्रबंधक नहीं मिल पाते। जो सदस्य स्वेच्छा से अवैतनिक सेवाएँ देते हैं वे साधारणतया पेशेवर योग्यता प्राप्त नहीं होते हैं, अतः वे प्रभावी प्रबंधन नहीं कर पाते। ;गद्ध गोपनीयता की कमीः सदस्यों की सभा में खुलकर चचार् होती है तथा समिति अिानियम की धरा ;7द्ध के अनुसार प्रत्येक सहकारी समिति पर प्रगट करने का दायित्व है इसीलिए समिति प्रचालन के संबंध में गोपनीयता बनाए रखना कठिन होता है। ;घद्ध सरकारी नियंत्राणः सहकारी समिति को सरकार सुविधाएँ देती है लेकिन बदले में उसे खातों के अंकेक्षण, खाते जमा करना आदि से संबंिात कइर् नियमों का पालन करना होता है। सहकारी संगठन के कायर् संचालन पर नियंत्राण के बहाने राज्य सहकारी विभाग का हस्तक्षेप होता है। इससे समिति के प्रचालन की स्वतन्त्राता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ;घद्ध विचारों की भ्िान्नताः परस्पर विरोधी विचारों के कारण आंतरिक कलह उत्पन्न हो सकती है जिससे निणर्य लेने में कठिनाइर् उत्पन्न होती है। कल्याण के प्रयोजन पर व्यक्ितगत स्वाथर् हावी हो सकतेे हैं। यदि वुफछ सदस्य ‘‘सहकारिता संगठन का वह स्वरूप है जिनमें वुफछ लोग मानवीयता एवं समानता के आधार पर अपने आथ्िार्क हितों के प्रोत्साहन हेतु स्वेच्छा से संगठित होते हैं।’’ इर्. एच. वैफलवटर् ‘‘सहकारिता संगठन एक समिति है जिसका उद्देश्य सहकारिता के सि(ांतों के अनुसार अपने सदस्यों के आथ्िार्क हितों को प्रोतसाहित करना है।’’ भारतीय सहकारिता अिानियम - 1912 व्यक्ितगत लाभ को प्राथमिकता दें तो अन्य सदस्य का हित पीछे छूट सकता है। 2.5.1 सहकारी समितियों के प्रकार प्रचालन की प्रकृति के आधार पर सहकारी समितियां कइर् प्रकार की होती हैं जिनका वणर्न नीचे किया गया हैः ;कद्ध उपभोक्ता सहकारी समितियांः उपभोक्ता सहकारी समितियों का गठन उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए किया जाता है। इसके सदस्य वे उपभोक्ता होते हैं, जो बढि़या गुणवत्ता वाली वस्तुएँ उचित मूल्य पर प्राप्त करना चाहते हैं। ऐसी समिति का उद्देश्य मध्यस्थ को समाप्त करना होता है ताकि प्रचालन मितव्ययी हो। समिति थोक विव्रेफता से वस्तुओं को सीधे बड़ी मात्रा में क्रय करती है तथा उन्हें अपने सदस्यों को बेच देती है। इस प्रकार बिचैलिए खत्म हो जाते हंै। यदि वुफछ लाभ होता है तो वह सदस्यों के द्वारा क्रय के आधार पर बंाट दिया जाता है। ;खद्ध उत्पादक सहकारी समितियाँः इन समितियांे की स्थापना छोटे उत्पादकों के हितों की रक्षा के लिए की जाती है। इसके सदस्य वे उत्पादक होते हैं जो उपभोक्ताओं की मांग को पूरा करने के लिए वस्तुओं के उत्पादन हेतु आगत जुटाते हैं। समिति का उद्देश्य बड़े पूंजीपतियों के विरु( खड़े होना तथा छोटे उत्पादकांे की सौदा करने की शक्ित को बढ़ाना है। यह सदस्यों को कच्चा माल, उपकरण एवं अन्य आगतों की आपूतिर् करती हैं तथा बिक्री के लिए उनके उत्पादों को भी खरीदती हैं। प्रचालन की प्रकृति के अनुसार लाभ को सदस्यों में उनके द्वारा उत्पादित अथवा विक्रय किए गए माल के आधार पर बंाट दिया जाता है। ;गद्ध विपणन सहकारी समितियाँः विपणन समितियों का गठन छोटे उत्पादकों को उनके उत्पादों को बेचने में सहायता के लिए किया जाता है। इसके सदस्य वे उत्पादक होते हैं जो अपने उत्पादों के उचित मूल्य वसूलना चाहते हैं। समिति का लक्ष्य मध्यस्यों को समाप्त करना तथा उत्पादों के लिए अनुकूल बाशार सुरक्ष्िात कर सदस्यों की प्रतियोगी स्िथति में सुधार करना है। समिति प्रत्येक सदस्य के उत्पाद को एकत्रिात करती है तथा उन्हें सवोर्त्तम मूल्य पर बेचने के लिए परिवहन, भंडारण, पैकेजिंग आदि विपणन काया±े को करती है। लाभ को उत्पाद संघ के सदस्यों को योगदान के अनुपात में बंाट दिया जाता है। सारणी 2.2 पफॅाच्यूर्न ग्लोबल 500 संगठनों की सूची में शामिल भारतीय वंफपनियाँ भारत में वरीयता वंफपनी भूमंडलीय 500 आगत ;$ मिलियनद्ध लाभ ;$ मिलियनद्ध वेबसाइट 1.इंडियन आॅयल 2.रिलायंस इंडस्ट्रीस 3.भारत पैट्रोलियम 4.हिन्दुस्तान पैट्रोलियम 5.आयल एंड नेच्यूरल गैस कमीशन ;ओएनजीसीद्ध 170 417 429 436 454 29643.2 14841.0 14436.9 14114.9 13751.7 1218.8 1699.9 315.5 315.5 319.5 ूूूण्पवबसण्बवउ ूूूण्तपसण्बवउ ूूूण्इींतंज चमजतवसमनउण्बवउ ूूूण्ीपदकनेजंदचमजतवसमनउण्बवउ ूूूण्वदहबपदकपंण्बवउ वुफल जोड़ - 86787.7 3897.7 स्रोतः दि पफॅांरच्यून ग्लोबल 500 - जुलाइर् 25, 2005 ;घद्ध किसान सहकारी समितियाँः इन समितियों का गठन किसानों को उचित मूल्य पर आगत उपलब्ध कराकर उनके हितों की रक्षा के लिए किया जाता है। इसके सदस्य वे किसान होते हैं जो मिलकर कृष्िा कायो± को करना चाहते हैं। समिति का उद्देश्य बड़े पैमाने पर कृष्िा का लाभ उठाना एवं उत्पादकता को बढ़ाना है। ऐसी समितियाँ पफसलों के उगाने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले बीज, खाद, मशीनरी एवं अन्य आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराती हैं। इससे न केवल किसानों की पैदावार तथा आय बढ़ती है बल्िक इससे खंडित भू - जोतों से संबंिात समस्याओं वफो हल करने में सहायता मिलती है। ;घद्ध सहकारी )ण समितियाँः सहकारी )ण समितियों की स्थापना सदस्यों को आसान शता±े पर सरलता से कजर् उपलब्ध कराने के लिए की जाती है। इसके सदस्य वे व्यक्ित होते हंै जो )णों के रूप में वित्तीय सहायता चाहते हैं। ऐसी समितियों का लक्ष्य सदस्यों को साहूकारों व्यवसाय अध्ययन के शोषण से संरक्षण प्रदान करना है जो )णों पर ऊँची दर से ब्याज लेते हैं। ऐसी समितियाँ अपने सदस्यों को सदस्यों से एकत्रिात की गइर् पूंजी एवं उनकी जमा में से नीची दर पर )ण देते हैं। ;चद्ध सहकारी आवास समितियाँः सहकारी आवास समितियों की स्थापना सीमित आय के लोगों को उचित लागत पर मकान बनाने में सहायता के लिए की जाती है। इसके सदस्य वे व्यक्ित होते हैं जो उचित मूल्य पर रहने का स्थान प्राप्त करने के इच्छुक हैं। इसका उद्देश्य सदस्यों की आवासीय समस्याओं का समाधान करना है। इसके लिए वह मकान बनाती है तथा किश्तों में भुगतान की सुविधा भी देती है। ये समितियाँ फ्रलैट बनाती हैं या पिफर सदस्यों को प्लॅाट/जमीन देती हैं जिस पर वे स्वंय अपनी पसंद से भवन बना सकते हैं। 2.6 संयुक्त पूंजी वंफपनी वंफपनी वुफछ लोगों का एक ऐसा संघ है जिसका गठन किसी व्यवसाय को चलाने के लिए किया गया हो तथा जिसका अपने सदस्यों से हटकर वैधानिक अस्ितत्व हो। वंफपनी संगठन वंफपनी अिानियम 1956 द्वारा शासित होते हैं। वंफपनी एक कृत्रिाम व्यक्ितत्व वाली संस्था है जिसका अलग से एक वैधानिक अस्ितत्व, शाश्वत उत्तरािाकार एवं सावर्मुद्रण है। संयुक्त पूंजी, वंफपनी लाभ के लिए वुफछ लोगों का स्वैच्िछक संगठन है जिसकी पूंजी हस्तांतरणीय अशों में विभक्त होती है और पूंजी का स्वामित्व वंफपनी सदस्यता की शतर् है। प्रो.हे.ने अंशधारक वंफपनी के स्वामी होते हैं जबकि निदेशक मंडल प्रमुख प्रबंधकत्तार् जिन्हें अंशधारक चुनते हैं। साधारणतया वंफपनी के स्वामियों का व्यवसाय पर परोक्ष रूप से नियंत्राण होता है। वंफपनी की पूंजी छोटे - छोटे भागों में विभक्त होती है। जिन्हें अंश/शेयर कहते हैं जिन्हें एक अंशधारक किसी दूसरे व्यक्ित को स्वतंत्राता पूवर्क हस्तान्तरित कर सकता है ;निजी वंफपनी में नहींद्ध। लक्षण संयुक्त पूंजी वंफपनी की परिभाषा उसके लक्षण स्पष्ट कर देती है। ये हैंः ;कद्ध कृत्रिाम व्यक्ितः वंफपनी की रचना कानून द्वारा होती है तथा इसका अपने सदस्यों से अलग स्वतंत्रा अस्ितत्व होता है। एक प्राकृतिक व्यक्ित के समान वंफपनी अपनी सम्पिा रख सकती है, )ण ले सकती है, उधार ले सकती है, अनुबंध कर सकती है, दूसरों पर मुकदमा कर सकती है, दूसरे इस पर मुकदमा कर सकते हैंऋ लेकिन व्यक्ितयों के समान यह सांस नहीं ले सकती, खा नहीं सकती, दौड़ नहीं सकती, बात नहीं कर सकती इसलिए इसे कृत्रिाम व्यक्ित कहा जाता है। ;खद्ध पृथक वैधानिक अस्ितत्वः समामेलन के दिन से ही वंफपनी को एक अलग पहचान मिल जाती है जो इसके सदस्यों से पृथक होती है। इसकी परिसंपिायाँ एवं इसकी देयताएं इसके स्वामियों की परिसंपिायों एवं देयताओं से पृथक होती हैं। कानून, व्यवसाय एवं इसके स्वामियों को एक नहीं मानता। अमूल का अद्भुत सहकारिता उपक्रम अमूल प्रतिदिन 21 लाख 20 हजार किसानों से ;जिनमें अनेकों अनपढ़ हैंद्ध 4,47,000 लीटर दूध इकट्टòा करता है। दूध को पैविंफग किए ब्रांड उत्पादों में परिवतिर्त करता है तथा 6 करोड़ के मूल्य का माल देशभर में पफैले 5,00,000 पुफटकर विक्रय वेंफद्रो को पहुँचाता है। इसका प्रारम्भ दिसम्बर 1946 में किसानों के समूह द्वारा किया गया जो स्वयं मध्यस्थों के चंगुल से मुक्त कराना चाहते थे, बाजार में सीधी पहुँच द्वारा अपने परिश्रम का पूरा लाभ सुनिश्िचत करना चाहते थे। आनन्द नामक गांव में स्िथत केयरा जिला दूध सहकारिता संघ ;जो अब अमूल के नाम से प्रसि( हैद्ध ने चमत्कारिक विस्तार किया। इसने अन्य दूध सहकारी समितियों को मिलाया तथा गुजरात में पफैला इनका जाल, अब 21.2 लाख किसान, 10,411 ग्राम स्तर के दुध एकत्राण केन्द्र, 14 जिलास्तर के संयंत्रांे को गुजरात सहकारी दुग्ध् उत्पादन संघ वफी देख - रेख मंे, संचालित कर रहा है। अमूल विभ्िान्न संघों द्वारा उत्पादित विभ्िान्न प्रकार के दुग्ध् उत्पादों का एक साझा ब्रांड हैं। ये उत्पाद हैं - तरल दूध, पाउडर, मक्खन घी, पनीर, कोको उत्पाद, मिठाइयाँ, आइसक्रीम, एवं गाढ़ा किया गया दूध। अमूल के वुफछ उपब्रांड हंै, अमूल स्प्रे, अमूल लस्सी, अमूल्या एवं न्यूटरामूल। खाद्य तेल उत्पादों का समूह धारा एवं लोकधारा के नाम से, जल - धारा नाम से पेयजल तथा पफलों का रस सपफल के नाम से बेचा जाता है। स्रोतः पंकज चन्द्रा के लेख पर आधरित। त्मकपण्िि बवउ/इनेेपदमेे ेचमबपंसद्धैमचजए 2005 पर के सौजन्य से। ;गद्ध स्थापनाः वंफपनी की स्थापना अिाक समय लेने वाली, खचीर्ली एवं जटिल प्रिया है। इसके कायर् प्रारंभ से पहले कइर् प्रलेख तैयार करना तथा कइर् कानूनी आवश्यकताओं का पालन करना होता है। भारतीय वंफपनी अिानियम 1956 में दी गइर् व्यवस्था के अनुसार वंफपनी का पंजीकरण अनिवायर् है। ;घद्ध शाश्वत उत्तरािाकारः वंफपनी की रचना कानून द्वारा होती है तथा कानून ही इसका अंत कर सकता है। इसके अस्ितत्व का अंत केवल तभी होगा जबकि इसको बंद करने की प्रिया जिसे समापन कहते हैं, पूरी हो जाएगी। सदस्य आते रहेंगें और जाते रहेंगंे लेकिन इसका अस्ितत्व बना रहेगा। ;घद्ध नियंत्राणः वंफपनी के मामलों का प्रबंध एवं नियंत्राण निदेशक मण्डल करता है जो वंफपनी के व्यवसाय को चलाने के लिए उच्च प्रबंध अिाकारियों की नियुक्ित करता है। निदेशकों की स्िथति अत्यिाक महत्व की होती है क्योंकि वंफपनी के कायो± के लिए वे अंशधारकों के प्रति सीधे उत्तरदायी होते हंै। वैसे अंशधारियांे को व्यवसाय के दिन - प्रतिदिन के संचालन में भाग लेने का अिाकार नहीं है। ;चद्ध दायित्वः हानि होने की स्िथति में सदस्यों का दायित्व वंफपनी में उनके द्वारा लगाइर् पूंजी तक सीमित होता है। लेनदार अपने दावों का निवारण करने के लिए केवल वंफपनी की परिसंपिायों का ही उपयोग कर सकते हैं क्योंकि )ण का भार वंफपनी पर है न कि इसके सदस्यों पर। सदस्यों से हानि में योगदान के लिए उनके हिस्से की अदत्त राश्िा तक के व्यवसाय अध्ययन ही लिया जा सकता है उदाहरण के लिए अक्षय किसी वंफपनी का अंशधरी है। उसके पास 10 रु के 2,000 अंश है जिनपर उसने 7 रु का भुगतान कर दिया है। यदि वंफपनी को हानि होती है तो उसकी देनदारी 6,000 रु की होगी जो कि 2,000 अंशों पर 3 रु प्रति अंश से अदत्त राश्िा है। वंफपनी की इससे और अिाक हानि के लिए वह उत्तरदायी नहीं होगा। ;छद्धसावर्मुद्रणः एक वृफत्रिाम व्यक्ित होने के नाते वंफपनी निदेशक मण्डल के माध्यम से कायर् करती है। वे जो भी समझौता करते हैं उस पर सावर्मुद्रा के द्वारा वंफपनी का अनुमोदन आवश्यक है। यदि कोइर् समझौता ऐसा है जिस पर वंफपनी की मुद्रा नहीं लगाइर् गइर् है तो वंफपनी की कानूनी बाध्यता नहीं होगी। ;जद्ध जोख्िाम उठानाः वंफपनी में हानि के जोख्िाम को सभी अंशधारक वहन करते हैं न कि एक या वुफछ व्यक्ित जैसा एकल स्वामित्व अथवा साझेदारी में होता है। वित्तीय कठिनाइर् के समय सभी अंशधारकों को वंफपनी की पूंजी में अपने - अपने हिस्से की सीमा तक )ण में योगदान देना होता है। अतः हानि की जोख्िाम को बड़ी संख्या में अंश धारकों में बंाट दिया जाता है। गुण वंफपनी के अनेक लाभ हैं जिनमें से वुफछ की चचार् नीचे की गइर् हैः ;कद्ध सीमित दायित्वः अंशधारक अपने अंशों की अदत्त राश्िा की सीमा तक उत्तरदायी होते हैं तथा )णों के निपटान के लिए कम्पनी की परिसंपिायों का ही उपयोग किया जा सकता है। स्वामी की निजी संपिा हर प्रकार के प्रभार से मुक्त रहती है। इससे निवेशक का जोख्िाम कम हो जाता है। ;खद्ध हितों का हस्तांतरणः स्वामित्व के हस्तांतरण में सरलता वंफपनी में निवेश का अतिरिक्त लाभ है क्योंकि एक सावर्जनिक वंफपनी के अंशों को बाजार में बेचा जा सकता है तथा आवश्यकता पड़ने पर इन्हें आसानी से रोकड़ में बदला जा सकता है। इससे निवेश में बाध नहीं आती तथा निवेश की दृष्िट से वंफपनी एक आकषर्क माध्यम बन जाता है। ;गद्ध स्थायी अस्ितत्वः वंफपनी का अपने सदस्यों से पृथक अस्ितत्व होता है तथा इस पर उनकी मृत्यु, अवकाश ग्रहण, त्याग - पत्रा, दिवालिया होना एवं पागलपन का कोइर् प्रभाव नहीं पड़ता। वंफपनी के सभी सदस्यों की मृत्यु पर भी वंफपनी अस्ितत्व मेें रहती है। इसका समापन वंफपनी अिानियम के प्रावधानों के अनुसार ही हो सकता है। ;घद्ध विस्तार की संभावनाः संगठन के एकल स्वामित्व और साझेदारी में तुलना करने पर एक वंफपनी के पास वित्त के अिाक ड्डोत हैं। एक वंफपनी जनता से धन की व्यवस्था के साथ - साथ बैंक और वििाय संस्थानों से )ण भी ले सकती है। इसमें विस्तार की व्यापक संभावना है। निवेशक का शेयर में पूंजी लगाने की ओर झुकाव रहता है क्योंकि इसमें सीमित दायित्व, स्वामित्व का हस्तांतरण और अिाक लाभ प्राप्ित की संभावना होती है। ;घद्ध पेशेवर प्रबंधः वंफपनी, विशेषज्ञों एवं पेशेवर लोगों को ऊँचा वेतन देने में सक्षम होती है इसलिए वह विभ्िान्न क्षेत्रों में निपुण लोगों को नियुक्त कर सकती है। उसके प्रचालन के पैमाने के विस्तृत होने के कारण कायर् विभाजन भी संभव हो पाता है। प्रत्येक विभाग एक कायर् विशेष को करता है तथा उसका मुख्िाया एक निपुण प्रबंधक होता है। इससे वंफपनी के निणर्य संतुलित होते हैं एवं उसका प्रचालन अिाक वुफशल होता है। सीमाएँ वंफपनी की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिख्िात हैंः ;कद्ध निमार्ण में जटिलः वंफपनी के निमार्ण के लिए अिाक समय, प्रयत्न एवं कानूनी आवश्यकताओं एवं निमार्ण प्रिया के विस्तृत ज्ञान की आवश्यकता होती है। अतः एकल व्यापारी एवं साझेदारी की तुलना में वंफपनी का निमार्ण अिाक जटिल होता है। ;खद्ध गोपनीयता की कमीः वंफपनी अिानियम के अनुसार एक सावर्जनिक वंफपनी को समय समय पर वंफपनी रजिस्ट्रार के कायार्लय में अनेकों सूचनाएँ देनी होती हैं। ये समस्त सूचनाएँ जनसाधारण को उपलब्ध होती हैं। इसीलिए वंफपनी प्रचालन के संबंध में पूरी गोपनीयता रखना कठिन होता है। ;गद्ध अवैयक्ितक कायर् वातावरणः स्वामित्व एवं प्रबंध में पृथकता से एक ऐसा वातावरण बन जाता है जिसमें वंफपनी के अिाकारीगण न तो प्रयत्न करते हैं और न ही व्यक्ितगत रूप से रुचि लेते हैं। वंफपनी के बडे़ आकार के कारण स्वामी एवं उच्च प्रबंधकों के लिए कमर्चारी, ग्राहक एवं लेनदारों से व्यक्ितगत संपकर् रखना कठिन हो जाता है। ;घद्ध अनेकानेक नियमः वंफपनी के कायर् संचालन के संबंध में कइर् कानूनी प्रावधन एवं बाध्यताएँ हैं। वंफपनी पर अंकेक्षण, वोट देने, विवरण जमा करने एवं प्रलेख तैयार करने के संबंध में अनेकों प्रतिबंध होते हैं तथा इसे रजिस्ट्रार, सेबी, वंफपनी लाॅ बोडर् जैसी अनेकों संस्थाओं से विभ्िान्न प्रमाण पत्रा लेने होते हैं। इससे वंफपनी की प्रचालन संबधी स्वतंत्राता कम हो जाती है तथा इन औपचारिकताओं मंे कापफी समय, प्रयत्न एवं पैसा लगता है। व्यवसाय अध्ययन के संगठनों में, जिनमें बड़ी संख्या में अंशधारी होते हैं, स्वामियों का वंफपनी के नियंत्राण एवं उसके संचालन में बहुत कम हाथ होता है। क्योंकि अशंधारी पूरे देश में पफैले होते हैं तथा उनका बहुत कम प्रतिशत साधारण सभा में उपस्िथत होता है। परिणामस्वरूप निदेशक मंडल को अपने अिाकारों को प्रयोग करने की पूरी आशादी मिल जाती है तथा कभी - कभी वह अंशधारकों के हितों के विरु( भी इसका उपयोग करते हैं। साधारणतया एक अंशधारक तरंअंेपनी मंजनिक कर्र सावैपनी आंसारणी 2.3 निजी क आधर पनींजनिक कर्साव पनींनिजी क नतमूकी न्यंेशकोसदस्य निद ंेजी सदस्यांूदत्त प्रनतम पूख्या न्यंस कांेशांक्रमण्िाका अुकी अन ेलियेफ क्रय केवंेशांतरण अंहस्ता त्राणंआमेजनता का ंसीमा नहीर्इेनतम 7 अध्िकतम काून्य र्कम तीन 5 लाख रु अनिवायेकम स ंएवंेशांअेअपनंध् नहींतिब्रपर्इेका ेजनता कोलियेक्रय केकंे)णपत्रा ।ैत्रिात कर सकती हंआम ेनतम - 2 अध्िकतम - 50 कम सून्य ंनहीर्एक लाख रु अनिवायेकम दा ंएवंेशांअेध् अपनंतिब्रतरण पर पंहस्ता ेफ लिए जनता कोफ क्रय वेवंे)ण पत्रा कर सकती।ंत्रिात नहींआम ;घद्ध निणर्य में देरीः वंफपनी का प्रबंध लोकतांत्रिाक ढंग से निदेशक मंडल के माध्यम से होता है जिसके बाद प्रबंध्न के विभ्िान्न स्तर उच्च, मध्य एवं निम्न स्तर के प्रबंध आते हंै। विभ्िान्न प्रस्तावों के संपे्रषण एवं अनुमोदन वफी प्रिया के कारण न केवल निणर्य लेने में बल्िक उन्हें वि्रफयान्िवत करने में देरी होती है। ;चद्ध अल्पतंत्राीय प्रबंधनः सि(ांततः वंफपनी एक लोकतांत्रिाक संस्था है जिसमें निदेशक मंडल स्वामियों यानि कि अंशधारकों के प्रतिनििा होते हैं परन्तु व्यवहार में अिाकांश बडे़ आकार जो प्रबंध से संतुष्ट नहीं हैं के समक्ष अपने अंशों को बेच देने के अलावा कोइर् विकल्प नहीं रहता क्योंकि निदेशकों को सभी प्रमुख निणर्यों को लेने का अिाकार होता है इसलिए वंफपनी का शासन वुफछ लोगों के हाथ में ही होता है। ;छद्ध हितों का टकरावः वंफपनी के विभ्िान्न अंशधारकों के हितों में टकराव हो सकता है। उदाहरण के लिए कमर्चारियों की रुचि ऊंँचे वेतन में होगी तो उपभोक्ता कम कीमत पर अच्छी गुणवत्ता वाली वस्तु एवं सेवाएँ चाहेंगे, वहीं अंशधारी चाहंेगंेे कि उन्हें ऊँची दर से लाभांश मिले एवं उनके अंशों का 2.6.1 वंफपनियों के प्रकार वास्तविक मूल्य बढे़। इन परस्पर विरोधी हितों वंफपनी दो प्रकार की हो सकती है निजी वंफपनी को संतुष्ट करना वंफपनी के प्रबंध्न में अकसर एवं सावर्जनिक वंफपनी। इनका विस्तार से वणर्न समस्याओं को जन्म देता है। नीचे दिया गया हैः भारत हैवी इलैक्ट्रीक्लस लि. - एक सावर्जनिक वंफपनी की गुणवत्ता यात्रा बी.एच.इर्.एल. ;भारत हैवी इलैक्ट्रीक्लस लि.द्ध आज भारत की ऊजार् आधारभूत ढाँचा संबंधी क्षेत्रा का सबसे बड़ा इंजीनियरिंग एवं विनिमार्ण उद्यम है। बी.एच.इर्.एल.की स्थापना 40 वषर् से अिाक पहले की गइर् थी। इसकी स्थापना के साथ भारत में देसी भारी विद्युत उपकरण उद्योग ने प्रवेश किया बी.एच.इर्.एल. में न केवल हमारे स्वप्न को पूरा किया बल्िक उससे कहीं आगे निकल। यह वंफपनी 1971 - 72 से लगातार लाभ कमा रही है तथा 1976 - 77 से लाभांश दे रही है। बी.एच.इर्.एल.30 मुख्य उत्पाद समूहों के 180 से अिाक उत्पादों का उत्पादन कर रही है तथा भारतीय अथर्व्यवस्था के मूल क्षेत्रा - जैसे बिजली उत्पादन एवं संचारण, उद्योग, परिवहन, दूरसंचार, नवीनीकरण योग्य ऊजार् आदि की आवश्यकताओं को पूरा कर रही है। बी.एच.इर्.एल.गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली ;प्ैव्.9001द्ध पयार्वरण प्रबंध प्रणाली ;प्ैव्.14001द्ध एवं पेशेवर स्वास्थ्य एवं सुरक्षा प्रबंध प्रणाली ;व्भ्ै।ै.18001द्ध से प्रमाण्िात है तथा पूणर् गुणवत्ता प्रबंध वफी दिशा में अग्रसर है। बी.एच.इर्.एल.की मुख्य उपलब्िध्याँ निम्न हैंः ऽ बी.एच.इर्.एल. ने सुविधाएँ एवं औद्योगिक उपयोगकतार्ओं के लिए 90,000 से भी अिाक मैगावॅाट बिजली के उत्पादन के लिए उपकरण लगाए हैं। ऽ 400 कि.वाट ;ए.सी. व डी.सी.द्ध तक के संचारण एवं वितरण के जाल में प्रचालन के लिए 2,25,000 मैगावाट के संचारण क्षमता एवं अन्य उपकरणों की आपूतिर् की। ऽ बिजली परियोजनाओं, पैट्रोवैफमीकल्स, रिपफाइनरीज, इस्पात, अल्यूमीनियम, रासायनिक खाद, सीमेंट, सीमेंट संयंत्रा आदि को 25000 से ऊपर ड्राइव नियंत्राण प्रणाली वाली मोटरों की आपूतिर् की है। ऽ 12000 कि.मी. से भी अिाक रेलवे लाइन के जाल को विद्युत टैªक्शन एवं एसी/डीसी लोको की आपूतिर् की है। ऽ पावरसंयंत्रा एवं अन्य उद्योगों को 10 लाख वाल्वों की आपूतिर् की। बी.एच.इर्.एल.का दिव्य स्वप्न एक अंतरार्ष्ट्रीय स्तर का इंजीनियरिंग उद्यम बनने का है जिससे उसकी भागीदारी में बढ़ोतरी होगी। कम्पनी अपनी इन आकांक्षाओं को मूतर्रूप देने एवं देश की वैश्िवक स्तर पर कायर् करने की आशा को पूरा करने के लिए प्रयत्नशील है। बीएचइर्एल की प्रमुख शक्ित उसके वुफशल और समपिर्त 43,500 कमर्चारी हैं। सभी कमर्चारी को अपने विकास और भविष्य को उज्जवल बनाने का समान अवसर दिया जाता है। लगातार प्रश्िाक्षण और पुनप्रश्िाक्षण, भविष्य की योजना, अनुवूफल कायर् संस्वृफति और प्रबंध् की भागीदारी इन सभी से प्रतिब( और प्रेरित कायर्बल को स्थापित करके उत्पादकता, गुणवत्ता और जवाबदेही के मानक हैं। स्रोतः बीएचइर्एल की वेबसाइर्ट निजी वंफपनी निजी वंफपनी से अभ्िाप्राय उस कम्पनी से हैः ;अद्ध जो अपने सदस्यों पर अंशों के हस्तान्तरण पर रोक लगाती हैऋ ;बद्ध जिसमें वतर्मान एवं भूतपूवर् कमर्चारियों को छोड़ कर न्यूनतम 2 एवं अिाकतम 50 सदस्य होते हैंऋ ;सद्ध जो अंश पूंजी लगाने के लिए जनता को आमंत्रिात नहीं करती हैंऋ और ;दद्ध जिसकी न्यूनतम पूंजी 1 लाख रु या समय समय पर निधार्रित और ऊँची राश्िा हो। यदि कोइर् निजी वंफपनी ऊपर दिए प्रावधानों में से किसी एक का भी उल्लघंन करती है तो यह निजी वंफपनी नहीं रहेगी तथा इसको प्राप्त व्यवसाय अध्ययन सभी छूटें एवं सुविधाओं से वंचित हो जाएगी। निजी वंफपनी को प्राप्त विशेषािाकारों से वुफछ निम्नलिख्िात हैंः ;अद्ध एक निजी वंफपनी के निमार्ण के लिए केवल दो सदस्यों की आवश्यकता होती है जबकि सावर्जनिक वंफपनी के निमार्ण के लिए 7 व्यक्ितयों की। ;बद्ध प्रविवरण पत्रा जारी करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि निजी वंफपनी के अंशों के अभ्िादान के लिए जनता को आमंत्रिात नहीं किया जाता है। ;सद्ध न्यूनतम अभ्िादान की राश्िा प्राप्त किए बिना भी अंशों का आवंटन किया जा सकता है। ;दद्ध एक निजी वंफपनी समामेलन प्रमाण - पत्रा प्राप्त होते ही व्यवसाय प्रारंभ कर सकती कलम तलवार से अिाक शक्ितशाली होती है। 1963 देवेन्द्र वुफमार जैन नाम के नौजवान ने लेखन सामग्री के क्षेत्रा में नया अध्याय आरंभ किया। यह नौजवान मेहनत का ध्नी एवं महत्वाकांक्षी था। 19 वषर् की कच्ची उम्र में उसने सदर बाजार में बिना किसी मशीन के सहायता के समुच्चय करने की छोटी दुकान शुरू की जहाँ वह लक्जर राइटिंग इन्सट्रयूमैंट प्रा॰ लि. ;स्ॅप्च्स्द्ध के नाम से पैनों का उत्पादन करने लगा था। लगातार तीन वषर् तक नम्बर वन राइटिंग इन्सट्रयूमेंट एक्सपोटर्र का पारितोषक स्ॅप्च्स् को दिया गया। इसी के परिणामस्वरूप स्ॅप्च्स् को चार अंतरार्ट्रीय ब्रांड - पाइलाॅट, पेपरमेट, पाकर्र एवं वाटरमैन के भारत में विनिमार्ण एवं वितरण के एकमात्रा अिाकार दिए गए हैं। लक्जर राइटिंग इन्सट्रयुमैंट्स लि॰ की आज लेखन उपकरण बाशार में 20 प्रतिशत से भी अिाक भागीदारी है जो सबसे अिाक भागीदारी है। इसका आवतर् 150 करोड़ को भी पार कर पाया गया है। आज की तारीख में लक्जर भारत का लेखनयन्त्रों का अग्रणी विनिमार्ता एवं नियार्तक है। वुफल नियार्त में इसका हिस्सा 15 प्रतिशत से भी ऊपर है तथा नइर् दिल्ली में चार एवं मुम्बइर् में तीन विनिमार्ण इकाइयाँ हैं जिनमें 600 से अिाक कमर्चारी हैं। बाजार के अिाकांश खण्डों मे यह अग्रणी है। यह विभ्िान्न उपयोगों एवं आवश्यकताओं के लिए विभ्िान्न प्रकार के पैनों का उत्पादन एवं वितरण करता है। स्रोतः ीजजचध्ूूूण्सनगवतचंतामतण्बवउ है। जबकि सावर्जनिक को व्यवसाय प्रारंभ करने के लिए व्यापार प्रारंभ प्रमाण पत्रा की प्राप्ित तक रुकना होता है। ;नद्ध एक निजी वंफपनी में दो निदेशक होने चाहिए जबकि सावर्जनिक वंफपनी में कम से कम तीन निदेशकों की आवश्यकता होती है। ;पद्ध एक निजी वंफपनी को सदस्यों की अनुुक्रमण्िाका रखने की आवश्यकता नहीं होती है जबकि सावर्जनिक वंफपनी के लिए यह आवश्यक है। ;पफद्ध एक निजी वंफपनी में निदेशकांे को )ण देने पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं है। )ण की स्वीवृफति बिना सरकारी अनुमति के दी जा सकती है जबकि सावर्जनिक वंफपनी में इसके लिए सरकार की अनुमति आवश्यक है। एक निजी वंफपनी के लिए अपने नाम के ‘पीछे प्राइवेट लिमिटेड’ शब्द लगाना अनिवायर् है। सावर्जनिक वंफपनी एक सावर्जनिक कम्पनी वह वंफपनी है जो निजी वंफपनी नहीं है। भारतीय वंफपनी अध्िनियम के तालिका - 2.4 फ स्वरूपेगठन वंस चयन अध्िकतम लाभ नतम लाभून्य जी की उपलब्ध्ींूप पनींक एकल स्वामित्व स्थापना की लागत एकल स्वामित्व पनींक स्थापना आसान एकल स्वामित्व पनींक तरणंस्वामित्व का स्था पनींक एकल स्वामित्व ग्यतोध्न की यांब्रप पनींक एकल स्वामित्व यमर्तनिंअ एकल स्वामित्व पनींक लचीलापन एकल स्वामित्व पनींक तरतांनिर पनींक एकल स्वामित्व दायित्व पनींक एकल स्वामित्व अनुसार एक सावर्जनिक वंफपनी वह हैः ;अद्ध जिसकी प्रदत्त पूंजी कम से कम 5 लाख रु अथवा समय - समय पर निधार्रित की गइर् इससे अिाक राश्िा होती हैैः ;बद्ध जिसमें कम से कम 7 सदस्य हों तथा अिाकतम संख्या की कोइर् सीमा नहीं हैऋ ;सद्ध जिसमें अंशों के हस्तांतरण पर कोइर् प्रतिबंध नहीं है। ;दद्ध जो अपनी अंश पूंजी के अभ्िादान के लिए जनता को आमंत्रिात कर सकती है तथा जन साधारण इसकी सावर्जनिक जमा में रुपया जमा करा सकते हैं। यदि एक निजी वंफपनी सावर्जनिक वंफपनी की सहायक वंफपनी है तो वह भी सावर्जनिक वंफपनी के समान मानी जाएगी। 2.7 व्यावसायिक संगठन के स्वरूप का चयन व्यावसायिक संगठनों के विभ्िान्न स्वरूपों का अध्ययन करने के पश्चात यह स्पष्ट ही है कि प्रत्येक स्वरूप के वुफछ लाभ एवं वुफछ हानियाँ हंै। उचित स्वरूप का चयन कइर् महत्त्वपूणर् घटकों पर निभर्र करता है। इसीलिए यह आवश्यक हो जाता है कि उपयुक्त स्वरूप का चयन करते समय वुफछ आधारभूत घटकों को ध्यान में रखा जाए। संगठन के चयन के महत्त्वपूणर् निधार्रक घटकों को तालिका 2.4 में दशार्या गया है तथा उनकी चचार् नीचे की गइर् हैः ;कद्ध प्रारंभ्िाक लागतः जहाँ तक व्यवसाय की प्रारंभ्िाक लागत का संबंध है, एकल स्वामित्व सबसे कम खचीर्ला सि( व्यवसाय अध्ययन होता है। तथापि इसकी कानूनी औपचारिकताएँ न्यूनतम होती हैं एवं कायर्कलापों का पैमाना छोटा। साझेदारी में भी सीमित पैमाने पर उद्यम के कारण कम कानूनी औपचारिकताओं एवं कम लागत का लाभ मिलता है। सहकारी समितियों एवं वंफपनियों का पंजीयन अनिवायर् है। वंफपनी के निमार्ण की कानूनी प्रिया लम्बी एवं खचीर्ली होती है। जहाँ तक प्रारंभ्िाक लागत का संबंध् है एकल स्वामित्व पहली पसंद है क्योंकि इस पर न्यूनतम व्यय आता है। इसके विपरीत वंफपनी संगठन के निमार्ण की प्रिया जटिल है तथा इस पर अिाक व्यय होता है। ;खद्ध दायित्वः एकल स्वामित्व एवं साझेदारी में स्वामी का दायित्व असीमित होता है। अतः आवश्यकता पड़ने पर )णों का भुगतान स्वामियों की निजी परिसंपिायों से किया जाता है। संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय में केवल कतार् का ही दायित्व असीमित होता है। सहकारी समितियों एवं वंफपनियों में दायित्व सीमित होता है तथा लेनदारों को अपने दावों के भुगतान के लिए वंफपनी की परिसंपिायों पर ही संतोष करना पड़ता है। निवेशकों के लिए वंफपनी संगठन अिाक उचित है क्योंकि इसमें जोख्िाम बंट जाता है। ;गद्ध निरंतरताः एकल स्वामित्व एवं साझेदारी पफमो± में इनके स्वामियों की मृत्यु, दिवालिया होने या पागल हो जाने जैसी घटनाओं से उनकी निरंतरता प्रभावित होती है। संयुक्त हिन्दू व्यवसायों, सहकारी समितियों एवं वंफपनियों की निरंतरता पर ऊपर वण्िार्त घटनाओं का तालिका 2.5 फ आधरेलना वुत एकल स्वामित्व दारीेसाझ परिवारूक्त हिन्दुयंस व्यवसाय सहकारी समिति पनींक ण/स्थापनार्निमा नतम विध्िकून्य ,ंपचारिकताएैआ सरल स्थापना च्िछक,ेजीयन एंप स्थापना सरल ंपचारिकताएैविध्ियक आ जीयन कींकम, प , स्थापनांआवश्यकता नही सरल र्जीयन अनिवायंप विध्ियक अध्िकंपचारिकताएैआ िया्रण पर्, निमार्जीयन अनिवायंप लीर्खचींबी एवंल सदस्य वल स्वामीेक नतम - 2ून्य ेक कंैअध्िकतम - ब लिए - 10 अन्य - 20 ेपिा कंपरिवार की स ेलिए कम सेविभाजन क र्इेसदस्य, कोकम दा ंअध्िकतम सीमा नही कम 10 बालिगेकम स अध्िकतमर्इेसदस्य का ंसीमा नही नतम - 2ूपनी न्यंनिजी क पनी - 7ंजनिक कर्साव पनी अध्िकतम - 50ंनिजी क ंसीमा नहीर्इेपनी - कांजनिक कर्साव जींूप सीमित वित्त एकलुतंसीमित, पर अध्िकेस्वामित्व स पिांकी संेजार्वूप सीमित साध्नंवित्तीय संेी मात्रा म़बड दायित्व असीमित क्तुयंसंअसीमित एव द्धर्असीमित ;कत्ता सीमित ;अन्य सदस्यद्ध सीमित सीमित ंध् एवंब्रप त्राणंनिय यर्स्वामी ही सभी निण यर्निण्रशीघैता हेल ,ंैहेतेय लर्दार निणेसाझ सभी तिृकी स्वीकेदारोसाझ आवश्यक ैता हेय लर्निणर्कत्ता तिनिध्ि,्रगए पेनुच ध् समितिंब्रत पर्अथा ैती हेय लर्निण थकृध् पंब्रपंस्वामी एव तरतांनिर अनिश्िचततांेव्यवसाय म स्वामी एकंव्यवसाय एव ही व्यक्ित किनेअध्िक स्थायित्व ल की स्िथति संेदारोसाझ े भावित्रप पर भीुत्यृकी मर्कता व्यवसायेस्थायित्व आग ैचलता रहता ह धनिक अस्ितत्वैथक वृप कारण स्थायित्वेक ेधनिक अस्ितत्व कैथक वृप कारण स्थायित्व व्यावसायिक संगठन के स्वरूप प्रभाव नहीं पड़ता है। यदि व्यवसाय को स्थायी ढाँचे की आवश्यकता है तो वंफपनी अिाक उपयुक्त रहती है जबकि थोड़ी अविा के उपक्रमों के लिए एकल स्वामित्व अथवा साझेदारी को प्राथमिकता दी जाती है। ;घद्ध प्रबंधन की योग्यताः एक एकल स्वामी के लिए प्रचालन के सभी क्षेत्रों में विशेषज्ञों की सेवाएँ प्राप्त करना कठिन होता है। जबकि अन्य प्रकार के संगठन जैसे - साझेदारी एवं वंफपनी में इसकी संभावना अिाक है। श्रम विभाजन के कारण प्रबंधक वुफछ क्षेत्रा विशेषों में विश्िाष्टता प्राप्त कर लेते हैं जिससे निणर्यों की श्रेष्ठता बढ़ जाती है। लेकिन लोगों में विचार भ्िान्नता के कारण टकराव की स्िथति भी पैदा हो सकती है। इसके अतिरिक्त यदि संगठन के कायो± की प्रवृफति जटिल है तथा जिनके लिए पेशेवर प्रबंध की आवश्यकता हो तो वंफपनी को पसंद किया जाएगा। दूसरी ओर, जहाँ प्रचालन सरल है वहाँ एकल स्वामित्व अथवा साझेदारी अिाक उपयुक्त रहेगी क्योंकि सीमित कौशल रखने वाले व्यक्ित भी ऐसे व्यवसायों को चला सकते हैं। अतः व्यवसाय के कायो± की प्रवृफति एवं पेशेवर प्रबंध की आवश्यकता संगठन के स्वरूप के चयन को प्रभावित करेंगे। ;चद्ध पूंजी की आवश्यकताः बड़ी मात्रा में पूंजी जुटाने के लिए वंफपनी अिाक श्रेष्ठ स्िथति में होती है क्योंकि इसके लिए यह बड़ी संख्या में विनियोगकतार्ओं को अंशों का निगर्मन कर सकती है। साझेदारी पफमर् को भी सभी साझेदारों के इकट्टòा संसाधनों का लाभ मिल व्यवसाय अध्ययन जाता है। लेकिन एक एकल स्वामी के साधन सीमित होते हैं। इसीलिए यदि प्रचालन बडे़ पैमाने पर है तो वंफपनी अिाक उपयुक्त रहेगी जबकि मध्य एवं छोटे आकार के व्यवसायों के लिए साझेदारी या एकल स्वामित्व अिाक उपयुक्त रहेंगे। विस्तार के लिए वंफपनी अिाक उचित रहेगी क्योंकि इसे बड़ी मात्रा में वित्त उपलब्ध हो जाता है। ;छद्धनियंत्राणः व्यवसाय प्रचालन पर सीधे नियंत्राण एवं निणर्य लेने का पूणर् अिाकार चाहिए तो एकल स्वामित्व को पसंद किया जाएगा। लेकिन यदि स्वामियों को नियंत्राण एवं निणर्य लेने में भागीदारी से परहेज नहीं है तो साझेदारी अथवा वंफपनी को अपनाया जा सकता है। वंफपनी में स्वामी एवं प्रबंधक पृथक - पृथक होते हैं। ;जद्धव्यवसाय की प्रवृफतिः जहाँ ग्राहकों से सीधे संपकर् की आवश्यकता है जैसे कि परचून की दुकान वहाँ एकल स्वामित्व अिाक उपयुक्त रहेगा। बड़ी विनिमार्ण इकाइयों के लिए जहाँ ग्राहक से सीधे व्यक्ितगत संपकर् की आवश्यकता नहीं है, वंफपनी स्वरूप को अपनाया जा सकता है। इसी प्रकार से जहाँ पेशेवर सेवाओं की आवश्यकता होती है वहाँ साझेदारी अध्िक उपयुक्त रहती है। अंत में कह सकते हैं कि ऊपर जितने घटकों की चचार् की गइर् है वे सब एक दूसरे से संबंिात है। पूंजी का योगदान एवं जोख्िाम, व्यवसाय के आकार एवं प्रवृफति के अनुसार बदलते हैं। अतः व्यवसाय संगठन का जो स्वरूप दायित्व की दृष्िट से छोटे पैमाने पर व्यवसाय चलाने पर उपयुक्त हों वही बड़े पैमाने पर व्यवसाय चलाने के लिए अनुपयुक्त सि( होगा। इसलिए उपयुक्त संगठन स्वरूप चुनने के पहले सभी प्रासंगिक घटकों को ध्यान में रखना चाहिए। 2.8 व्यवसाय संगठन के विभ्िान्न स्वरूपों का तुलनात्मक विशेलषण अब तक आपको यह सापफ हो गया होगा कि मुख्य शब्दावली एकल स्वामित्व दयाभाग प्रणाली साझेदारी मिताक्षरा प्रणाली साझेदारी संलेख सहसमांशी असीमित दायित्व सहायक एजेंसी संबंध् कृत्रिाम व्यक्ित संगठन के विभ्िान्न स्वरूप क्या हैं और वे किस प्रकार व्यवसाय को प्रारंभ करने तथा चलाने में मदद करते हैं। व्यवसाय संगठन के विभ्िान्न स्वरूपों की विशेषताओं का वणर्न और चचार् व्रफम से करेंगे। तालिका में हमने एक साथ व्यवसाय के विभ्िान्न स्वरूपों की विशेषताओं की व्याख्या की है जिससे आप एक स्वरूप की दूसरे स्वरूप से चयनित विशेषता में तुलना कर सकते हैं। वंफपनी शाश्वत उत्तराध्िकार सावर्मुद्रा पंजीकरण कत्तार् संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय सारांश व्यवसाय संगठन के विभ्िान्न स्वरूप निम्न हैंः 1. एकल स्वामित्व 2. संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय 3. साझेदारी 4. सहकारी समिति तथा 5. संयुक्त पूंजी वंफपनी एकल स्वामित्वः एकल स्वामित्व उस व्यवसाय को कहते हैं जिसका स्वामित्व, प्रबंधन एवं नियंत्राण एक ही व्यक्ित के हाथ में होता है तथा वही संपूणर् लाभ पाने का अिाकारी तथा हानि के लिए उत्तरदायी होता है। एकल स्वामित्व के कइर् लाभ हैं। इनमें से वुफछ महत्त्वपूणर् लाभ निम्न हैंः 1. शीघर् निणर्य 2. सूचना की गोपनीयता 3. प्रत्यक्ष प्रोत्साहन 4. उपलब्िध का अहसास 5. स्थापित करने एवं बंद करने में सुगमता। उपरोक्त लाभों के होते हुए भी एकल स्वामित्व की भी वुफछ सीमाएँ हैं। इनमें से वुफछ प्रमुख सीमाएँ इस प्रकार हैंः 1. सीमित संसाधन 2. व्यावसायिक इकाइर् का सीमित जीवनकाल 3. असीमित दायित्व 3. सीमित प्रबंध योग्यता। संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसायः उस व्यवसाय से है जिसका स्वामित्व एवं संचालन एक संयुक्त हिन्दू परिवार के सदस्य करते हैं। इसका प्रशासन हिन्दू कानून के द्वारा होता है। व्यवसाय पर परिवार के मुख्िाया का नियंत्राण रहता है। वह परिवार सबसे बड़ी आयु का व्यक्ित होता है एवं ‘कत्तार्’ कहलाता है। संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय के लाभ निम्नलिख्िात हैंः 1. प्रभावशाली नियंत्राण 2. स्थायित्व 3. सदस्यों का सीमित दायित्व 4. निष्ठा एवं सहयोग में वृि। संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय की वुफछ सीमाएँ नीचे दी गइर् हैंः 1. सीमित साधन 2. कतार् का असीमित दायित्व 3. कतार् का प्रभुत्व 4. सीमित प्रबंध कौशल। साझेदारीः साझेदारी भारी पूंजी निवेश, विभ्िान्न प्रकार के कौशल एवं जोख्िाम में भागीदारी की आवश्कताओं को पूरा करती है। साझेदारी पफमर् के लाभ नीचे दिए गए हैंः 1. स्थापना एवं समापन सरल 2. संतुलित निणर्य 3. अिाक कोष 4. जोख्िाम को बाँटना 5. गोपनीयता। साझेदारी पफमर् की निम्न सीमाएँ हंैः 1. असीमित दायित्व 2. सीमित साधन 3. परस्पर विरोध की संभावना 4. निरंतरता की कमी 5. जनसाधारण के विश्वास की कमी। साझेदारी पफमर् में विभ्िान्न प्रकार के साझेदार हो सकते हैः 1. सिय साझेदार 2. सुप्त अथवा निष्िक्रय साझेदार 3. गुप्त साझेदार 4. नाममात्रा का साझेदार 5. विबन्ध्न साझेदार ;इसटाॅपेलद्ध 6. प्रतिनिध्ी साझेदार ;होल्डिंग आऊटद्ध। अवध्ि के आधार पर साझेदारी दो प्रकार की हो सकती हैः 1. ऐच्िछक साझेदारी 2. विश्िाष्ट साझेदारी। देयता के आधार पर भी साझेदारी के दो प्रकार हैंः 1. सीमित दायित्व वाली एवं 2. असीमित दायित्व वाली। सहकारी संगठनः सहकारी समिति उन लोगों का स्वैच्िछक संगठन है जो सदस्यों के कल्याण के लिए एकजुट हुए हंै। सहकारी समिति के सदस्यों को अनेक लाभ होते हैंः 1. वोट की समानता 2. सीमित दायित्व 3. स्थायित्व 4. मितव्ययी प्रचालन 5. सरकारी सहायता 6. सरल स्थापना। सहकारी संगठन की निम्न सीमाएँ हैंः 1. सीमित संसाधन 2. अक्षम प्रबंधन 3. गोपनीयता की कमी 4. सरकारी नियंत्राण 5. विचारों की भ्िान्नता। प्रचालन की प्रकृति के आधार पर सहकारी समितियां कइर् प्रकार की होती हैं जिनका वणर्न नीचे किया गया हैः 1. उपभोक्ता सहकारी समितियां 2. उत्पादक सहकारी समितियाँ 3. विपणन सहकारी समितियाँ 4. किसान सहकारी समितियाँ 5. सहकारी )ण समितियाँ 6. सहकारी आवास समितियाँ। संयुक्त पूंजी वंफंपनीः वंफपनी एक कृत्रिाम व्यक्ितत्व वाली संस्था है जिसका अलग से एक वैधानिक अस्ितत्व, शाश्वत उत्तरािाकार एवं सावर्मुद्रण है। वंफपनी के अनेक लाभ हैं जिनमें से वुफछ की चचार् नीचे की गइर् हैः 1. सीमित दायित्व 2. हितों का हस्तांतरण 3. स्थायी अस्ितत्व 4. विस्तार की संभावना 5.पेशेवर प्रबंध। वंफपनी की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिख्िात हैंः 1. निमार्ण में जटिल 2. गोपनीयता की कमी 3. वैयक्ितक कायर् वातावरण 4. अनेकानेक नियम 5. निणर्य में देरी 6. अल्पतंत्राीय प्रबंधन 7. हितों का टकराव। वंफपनी दो प्रकार की हो सकती है निजी वंफपनी एवं सावर्जनिक वंफपनी। निजी वंफपनी से अभ्िाप्राय उस वंफपनी से है, जो अपने सदस्यों पर अंशों के हस्तांतरण पर रोक लगाती है। जो अंश पूंजी लगाने के लिए जनता को आमंत्रिात नहीं करती हैं। एक सावर्जनिक वंफपनी वह वंफपनी है जो निजी वंफपनी नहीं है। जो अपनी अंश पूंजी के अभ्िादान के लिए जनता को आमंत्रिात कर सकती है तथा जन साधारण इसकी सावर्जनिक जमा में रुपया जमा करा सकते हैं। जिसमें अंशों के हस्तांतरण पर कोइर् प्रतिबंध नहीं है। व्यावसायिक संगठन के स्वरूप का चयनः उचित स्वरूप का चयन कइर् महत्त्वपूणर् घटकों पर निभर्र करता है। उपयुक्त स्वरूप का चयन करते समय वुफछ आधारभूत घटकों को ध्यान में रखा जाएः 1. प्रारंभ्िाक लागत 2. दायित्व 3. निरंतरता 4. प्रबंधन की योग्यता 5. पूंजी की आवश्यकता 5. पूंजी की आवश्यकता 6. नियंत्राण 7. व्यवसाय की प्रवृफति। अभ्यास बहु विकल्प प्रश्न सही उत्तर पर निशान ; द्ध लगाइए। 1.ढाँचे जिस में स्वामित्व एवं प्रबंध् पृथक - पृथक होते हैं वह - - - - - कहलाता हैः ;कद्ध एकल स्वामित्व ;ऽद्ध साझेदारी ;गद्ध वंफपनी ;घद्ध सभी व्यावसायिक संगठन 2.संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय में कतार् का दायित्व - - - - होता हैः ;कद्ध सीमित ;ऽद्ध असीमित ;गद्ध )णों के लिए कोइर् दायित्व नहीं ;घद्ध संयुक्त 3.सहकारी समितियों में जिस सि(ांत का अनुपालन किया जाता है - - - - - वह हैः ;कद्ध एक अंश एक वोट ;ऽद्ध एक व्यक्ित एक वोट ;गद्ध वोट नहीं ;घद्ध बहु ;अनेकद्ध वोट्स 4.संयुक्त पूंजी वंफपनी के निदेशक मंडल का चुनाव - - - - - के द्वारा होता हैः ;कद्ध सामान्य जन ;ऽद्ध सरकारी संस्थाएं ;गद्ध अंशधरक ;घद्ध कमर्चारी 5.बैंक व्यवसाय में साझेदारों की अध्िकतम संख्या होती हैः ;कद्ध बीस ;ऽद्ध दस ;गद्ध कोइर् सीमा नहीं ;घद्ध दो 6.लाभ का बँटवारा आवश्यक नहीं। यह कथन - - - - - से संबंध्ित हैः ;कद्ध साझेदारी ;ऽद्ध संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय ;गद्ध एकल स्वामित्व ;घद्ध वंफपनी 7.वंफपनी की पूंजी विभ्िान्न संख्याओं में विभक्त होती है - - - - - प्रत्येक कहलाता हैः ;कद्ध लाभांश ;ऽद्ध लाभ ;गद्ध ब्याज ;घद्ध अंश 8.संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय के मुख्िाया को - - - - - कहते हैंः ;कद्ध स्वामी ;ऽद्ध निदेशक ;गद्ध कतार् ;घद्ध प्रबंध्क 9.सदस्यों का उचित - मूल्य पर आवासीय स्थान उपलब्ध् कराना - - - - - का उद्देश्य हैः ;कद्ध उत्पादक सहकारी समिति ;ऽद्ध उपभोक्ता सहकारी समिति ;गद्ध आवास सहकारी समिति ;घद्ध )ण सहकारी समिति 10.एक साझेदार जिसके पफमर् से संबंध् के बारे में जनता अपरिचित है - - - - - कहलाता हैः ;कद्ध सिय साझेदार ;ऽद्ध सुषुप्त साझेदार ;गद्ध नाम - मात्रा साझेदार ;घद्ध गुप्त साझेदार संक्ष्िाप्त उत्तर प्रश्न 1.व्यवसाय के निम्न प्रकारों में से एकल स्वामित्व संगठन किसके लिए अध्िक उपयुक्त रहेगा और क्यों? ;कद्ध परचून की दुकान ;ऽद्ध दवाइर् की दुकान ;गद्ध विध्िक सलाह संबंध्ी ;घद्ध श्िाल्प ;क्राफ्रटद्ध केन्द्र ;ड़द्ध इंटरनेट वैफपफे ;चद्ध ब्यूटी पालर्र ;छद्ध चाटर्डर् एकाउंटेंसी पफमर्। 2.व्यवसाय के निम्न प्रकारों में से साझेदारी संगठन किसके लिए अध्िक उपयुक्त रहेगा और क्यों? ;कद्ध परचून की दुकान ;ऽद्ध दवाइर् की दुकान ;गद्ध विध्िक सलाह संबंध्ी ;घद्ध श्िाल्प ;क्राफ्रटद्ध वेंफद्र ;ड़द्ध इंटरनेट वैफपफे ;चद्ध ब्यूटी पालर्र ;छद्ध चाटडर् एकाउंटेंसी पफमर् 3.निम्न शब्दावलियों को संक्षेप में समझाइएः ;कद्ध शाश्वत उत्तराध्िकार ;खद्ध सावर्मुद्रा ;गद्ध कतार् ;घद्ध वृफत्रिाम व्यक्ित 4.संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय में नाबालिग की स्िथति की साझेदारी पफमर् में उसकी स्िथति से तुलना कीजिए। 5.यदि पंजीयन ऐच्िछक है तो साझेदारी पफमर् स्वयं को पंजीवृफत कराने के लिए वैधानिक औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए क्यों इच्छुक रहती हैं? समझाइए। 6.एक निजी वंफपनी को उपलब्ध् महत्त्वपूणर् सुविधओं को बताइए। 7.सहकारी समिति किस प्रकार जनतांत्रिाक एवं ध्मर् - निरपेक्षता का आदशर् प्रस्तुत करती है? 8.‘प्रदशर्न द्वारा साझेदार’ का क्या अथर् है? समझाइए। विस्तृत उत्तर दें 1.एकल स्वामित्व पफमर् से आप क्या समझते हैं? इसके गुणों एवं सीमाओं को समझाइए। 2.साझेदारी के विभ्िान्न प्रकारों में व्यावसायिक स्वामित्व तुलनात्मक रूप से लोकपि्रय क्यों नहीं है? इसके गुणों एवं सीमाओं को समझाइए। 3.एक उपयुक्त संगठन का स्वरूप चुनना क्यों महत्त्वपूणर् है? उन घटकों का विवेचन कीजिए जो संगठन के किसी खास स्वरूप के चुनाव में सहायक होते हैं। 4.सहकारी संगठन स्वरूप के लक्षण, गुण एवं सीमाओं का विवेचन कीजिए। विभ्िान्न प्रकार की सहकारी समितियों को भी संक्षेप में समझाइए। 5.एक संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय एवं साझेदारी में अंतर कीजिए। 6.आकार एवं संसाध्नों की सीमाओं के होते हुए भी लोग एकल व्यवसाय को अन्य संगठनों की तुलना में प्राथमिकता क्यों देते हैं? व्यावहारिक प्रश्न 1.किस संगठन स्वरूप में एक स्वामी के व्यापारिक करार अन्य स्वामियों को भी बाध्य कर देते हैं। उत्तर के समथर्न में कारण बताइए। 2.एक संगठन की व्यावसायिक परिसंपिायों की राश्िा 50,000 रुपए है लेकिन अदत्त देय राश्िा 80,000 रुपए है। लेनदार निम्न स्िथतियों में क्या कायर्वाही कर सकते हैंः ;कद्ध यदि संगठन एक एकल स्वामित्व इकाइर् है। ;ऽद्ध यदि एक संगठन साझेदारी पफमर् है जिसमें एन्थोनी और अकबर साझेदार हैं लेनदार इन दो में से किस साझेदार के पास अपनी लेनदारी के भुगतान हेतु संपकर् साध् सकते हैं। कारण सहित समझाइए। 3.किरन एक एकल व्यवसायी है। पिछले दशक में उसका व्यवसाय पड़ोस के एक कोने की दुकान से, जिसमें वह नकली आभूषण, बैग, बालों की क्िलप, नेलपाॅलिश आदि बेचती थी, से बढ़ कर तीन शाखाओं वाली पुफटकर शृृंखला में बदल गया है। यद्यपि वह सभी शाखाओं के विभ्िान्न कायो± को स्वयं देखती हैं परंतु अब सोच रही है कि व्यवसाय के बेहतर प्रबंधन के लिए उसे एक वंफपनी का निमार्ण करना चाहिए या नहीं। उसकी योजना देश के अन्य भागों में शाखाएं खोलने की भी है। ;कद्ध एकल स्वामी बने रहने के दो लाभों को समझाइए। ;ऽद्ध संयुक्त पूंजी वंफपनी में परिवतिर्त करने के दो लाभ बताइए। ;गद्ध राष्ट्रीय स्तर पर व्यवसाय करने के निणर्य पर संगठन के स्वरूप के चुनाव में उसकी भूमिका क्या होगी? ;घद्ध वंफपनी को रूप व्यवसाय करने के लिए उसे किन - किन कानूनी औपचारिकताओं को पूरा करना होगा? परियोजना कायर् कक्षा में विद्याथ्िार्यों को कइर् टीमों में विभक्त कर निम्न पर कायर् करने लिए बांट दीजिएः ;कद्ध पड़ोस की किन्ही पाँच परचून/स्टेशनरी की दुकानों के अध्ययन हेतुऋ ;ऽद्ध संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय के कायर् संचालन के अध्ययन हेतुऋ ;गद्ध किन्हीं पाँच साझेदारी पफमो± के अध्ययन हेतु़ऋ ;घद्ध अपने क्षेत्रा की सहकारी समितियों की विचारधरा एवं कायर् संचालन के अध्ययन हेतुऋ ;घद्ध किन्हीं पाँच वंफपनियों ;जिसमें निजी एवं सावर्जनिक दोनों प्रकार की वंफपनियाँ शामिल होंद्ध के अध्ययन हेतु। टिप्पण्िायाँ 1.निम्न में से वुफछ पक्षोें के उपयर्ुक्त अध्ययनों हेतु विद्याथ्िार्यों को कायर् सौंपा जा सकता हैः व्यवसाय की प्रवृफति, निवेश्िात पूंजी के आधार पर मापा गया व्यवसाय का आकार, कायर्रत व्यक्ितयों की संख्या अथवा विक्रय आवतर्न, समस्याएँ, प्रोत्साहन, एकल स्वरूप विशेष के चयन का कारण, निणर्य लेने का ढंग, विस्तार की इच्छा एवं आवश्यक ध्यान रखने योग्य बातें, स्वरूप की उपयोगिता इत्यादि। 2.विद्याथ्िार्यों की विभ्िान्न टीमों को प्रोत्साहित करें कि वह अपने अध्ययन के परिणामों एवं निष्कषो± को परियोजना प्रतिवेदन एवं मल्टीमीडिया के रूप में प्रस्तुत करें।

>Chapter-2>
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अध्याय 2

व्यावसायिक संगठन के स्वरूप



अधिगम उद्देश्य

इस अध्याय के अध्ययन के पश्चात् आप-

  • • व्यावसायिक संगठन के विभिन्न स्वरूपों की पहचान कर सकेंगे;
  • • व्यावसायिक संगठनोें के विभिन्न स्वरूपों के लक्षण, गुण एवं सीमाओं को समझ सकेंगे;
  • • विभिन्न व्यावसायिक संगठनों के स्वरूपों में अंतर कर सकेंगे; और
  • • व्यावसायिक संगठन के उपयुक्त स्वरूप के चयन के निर्धारक तत्त्वों की चर्चा कर सकेंगे।


नेहा एक मेधावी छात्रा है, जिसे अपने परीक्षा परिणाम की घोषणा की प्रतीक्षा थी जब वह घर पर थी, तबउसने खाली समय का उपयोग करने का निर्णय लिया। उसे चित्रकारी में रुचि थी। उसने मिट्टी के बर्तनोंएवं प्यालों पर चित्रकारी शुरू कर दी। नेहा के काम में उसके मित्रों एवं अन्य मिलने वालों ने रुचि दिखाई जिससे वह बहुत उत्साहित हुई। अब उसने व्यापार करना तय किया। इस व्यापार को वह अपने घर सेचलाने लगी जिससे किराये की बचत हो गई। एक-दूसरे से चर्चा के कारण वह एकल स्वामित्व के रूप में काफी प्रसिद्ध हो गई। परिणामस्वरूप उसके उत्पादनों की बिक्री में बढ़ोतरी हुई। गर्मियों की समाप्ति तक उसे लगभग 2500 रु. का लाभ हुआ। इससे उत्साहित होकर उसने इस काम को पेशे के रूप में अपना लिया। अतः उसने अपना व्यवसाय स्थापित करने का निर्णय लिया। यद्यपि वह इस व्यवसाय को एकलस्वामित्व के रूप मेें चलाने में समर्थ है, लेकिन उसे व्यवसाय के विस्तार के लिए अधिक धन की आवश्यकता भी है। अतः उसके पिता ने साझेदारी फर्म का विकल्प सुझाया, जिससे उसे अधिक पूँजी प्राप्तकरने में भी सुविधा हो तथा उत्तरदायित्व एवं जोखिम में भी भागीदारी हो सके। उनका यह भी मत था कि संभव है कि भविष्य में व्यवसाय का और अधिक विस्तार हो और कंपनी का निर्माण भी करना पड़े। नेहा फिलहाल इस असमंजस में है कि वह किस प्रकार के व्यावसायिक संगठन के स्वरूप को चुने।

2.1 परिचय


यदि कोई व्यक्ति एक व्यवसाय प्रारंभ करने की योजना बना रहा है या वर्तमान व्यवसाय का विस्तार करना चाहता है, तो उसे संगठन के स्वरूप के संबंध में एक महत्त्वपूर्ण निर्णय लेना होगा। सबसे उपयुक्त स्वरूप का निर्धारण करते समय व्यक्ति को अपने साधनों को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक स्वरूप के लाभ एवं हानियों को देखकर निर्णय करना होगा। व्यवसाय संगठन के विभिन्न स्वरूप निम्न हैं-

(क) एकल स्वामित्व;

(ख) संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय;

(ग) साझेदारी;

(घ) सहकारी समिति, तथा;

(ङ) संयुक्त पूंजी कंपनी।

हम अपनी चर्चा को एकल व्यापार से प्रारंभ करते हैं जो व्यावसायिक संगठन का सरलतम स्वरूप है। उसके बाद अधिक जटिल संगठनों के रूपों का विश्लेषण करेंगे।


2.2 एकल स्वामित्व


आप कई बार सायंकाल अपने पास के छोटे स्टेशनरी स्टोर से रजिस्टर, पेन, चार्ट पेपर आदि खरीदने के लिए जाते हाेंगे। संभावना यही है कि आप इस सौदे के दौरान किसी एकल स्वामित्व के संपर्क में ही आते होंगे।

एकल व्यापार व्यावसायिक संगठन का एक प्रचलित रूप है तथा छोटे व्यवसाय के लिए अत्यंत उपयुक्त है, विशेषतः व्यवसाय के प्रारंभिक वर्षों में एकल स्वामित्व उस व्यवसाय को कहते हैं जिसका स्वामित्व, प्रबंधन एवं नियंत्रण एक ही व्यक्ति के हाथ में होता है तथा वही संपूर्ण लाभ पाने का अधिकारी तथा हानि के लिए उत्तरदायी होता है। जैसा एकल स्वामित्व शब्द से ही स्पष्ट है ‘एकल’ शब्द का अर्थ है एकमात्र एवं ‘प्रोप्राइटर’ का अर्थ है स्वामी, अर्थात् वह एकल व्यवसाय का एकमात्र स्वामी होता है।

व्यवसाय का यह स्वरूप विशेष रूप से उन क्षेत्रों में प्रचलन में है, जिनमें व्यक्तिगत सेवाएँ प्रदान की जाती हैं, जैसे- ब्यूटी पार्लर, नाई की दुकान एवं छोटे पैमाने के व्यापार, जैसे- किसी क्षेत्र में एक फुटकर व्यापार की दुकान चलाना।

लक्षण

संगठन के एकल स्वामित्व स्वरूप की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं-

(क) निर्माण एवं समापन- एकल स्वामित्व वाले व्यवसाय को प्रारंभ करने के लिए शायद ही किसी वैधानिक औपचारिकता की आवश्यकता होती है। हाँ, कुछ मामलों में लाइसेंस की आवश्यकता हो सकती है। एकल स्वामित्व के नियमन के लिए अलग से कोई कानून नहीं है, व्यवसाय को बंद भी सरलता से किया जा सकता है। इस प्रकार से व्यवसाय की स्थापना एवं उसका समापन दोनों ही सरल हैं।

(ख) दायित्व- एकल स्वामी का दायित्व असीमित होता है। इसका अर्थ हुआ कि यदि व्यवसाय की संपत्तियाँ सभी ऋणों के भुगतान के लिए पर्याप्त नहीं हैं तो स्वामी इन ऋणों के भुगतान के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होगा। एेसी स्थिति में इसके लिए उसकी निजी वस्तुएँ, जैसे- उसकी अपनी कार तथा अन्य संपत्तियाँ बेची जा सकती हैं। उदाहरण के लिए, अगर व्यवसाय बंद करते समय एक ड्राईक्लीनर एकल स्वामित्व वाली इकाई की बाह्य देयताएँ 80,000 हैं, जबकि परिसंपत्तियाँ केवल 60,000 ही हैं, तो एेसे में स्वामी को अपने निजी स्रोतों से 20,000 लाने होंगे। भले ही फर्म के ऋणों के भुगतान के लिए उसे अपनी निजी संपत्ति ही क्यों न बेचनी पड़े।

(ग) लाभ प्राप्तकर्त्ता तथा जोखिम वहनकर्त्ता- व्यवसाय की विफलता से जोखिम को एकल स्वामी को अकेले ही वहन करना होगा। यदि व्यवसाय सफल रहता है तो सभी लाभ भी उसी को प्राप्त होंगे। वह सभी व्यावसायिक लाभों का अधिकारी होता है जो उसके जोखिम उठाने का सीधा प्रतिफल है।

(घ) नियंत्रण- व्यवसाय के संचालन एवं उसके संबंध में निर्णय लेने का पूरा अधिकार एकल स्वामी के पास होता है, वह बिना दूसरों के हस्तक्षेप के अपनी योजनाओं को कार्यान्वित कर सकता है।


‘एकल व्यापारी व्यवसाय एक एेसी व्यावसायिक इकाई है जिसमें एक ही व्यक्ति पूँजी लगाता है, उद्यम का जोखिम उठाता है एवं प्रबंधन करता है।’ -जे.एल. हैन्सन

‘एकल स्वामित्व व्यवसाय संगठन का वह स्वरूप है जिसका मुखिया एक एेसा व्यक्ति है जो उत्तरदायित्व लिए हुए है; जो परिचालन का निदेशन करता है एवं जो हानि का जोखिम उठाता है। -एल.एच. हेनी


(ङ) स्वतंत्र अस्तित्व नहीं- कानून की दृष्टि में एकल व्यापारी एवं उसके व्यवसाय में कोई अंतर नहीं है क्योंकि इसमें व्यवसाय का इसके स्वामी से अलग कोई अस्तित्व नहीं है। परिणामस्वरूप, व्यवसाय के सभी कार्यों के लिए स्वामी को ही उत्तरदायी ठहराया जाएगा।

(च) व्यावसायिक निरंतरता का अभाव- चूँकि व्यवसाय एवं उसके स्वामी का एक ही अस्तित्व है इसलिए एकल स्वामी की मृत्यु पर, पागल हो जाने पर, जेल में बंद होने पर, बीमारी अथवा दिवालिया होने पर सीधा एवं हानिकारक प्रभाव व्यवसाय पर पड़ेगा और हो सकता है कि व्यापार बंद भी करना पड़े।

गुण

एकल स्वामित्व के कई लाभ हैं। इनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण लाभ निम्न हैं-

(क) शीर्घ निर्णय- एकल स्वामी को व्यवसाय से संबंधित निर्णय लेने की बहुत अधिक स्वतंत्रता होती है क्योंकि उसे किसी दूसरे से सलाह की आवश्यकता नहीं है इसलिए वह तुरंत निर्णय ले सकता है। इसके कारण जब भी उसे कोई लाभ का अवसर प्राप्त होता है तो वह समय रहते उनका पूरा लाभ उठा सकता है।


स्फूर्तिदायक प्रारंभ- कोका-कोला प्रारंभ में एकल स्वामित्व का व्यवसाय था!

दुनियाभर को एक खास स्वाद से परिचित करवाने वाले कोका-कोला की शुरूआत 8 मई 1886 को एटलांटा, जॉर्जिया से हुई थी। डॉ. जॉन स्मिथ पैंबर्टन एक स्थानीय औषधि निर्माता थे। उन्होंने कोका-कोला के नाम से एक शर्बत बनाया। वे इस नए उत्पाद को एक पास में स्थित जैकब फार्मेसी में ले गए। वहाँ उसका नमूना चखा गया तथा उसे अद्भुत घोषित किया गया। एक सोडा पेय के रूप में वह पाँच सैंट प्रति गिलास बेचा जाने लगा। पैंबर्टन को अपने उत्पाद की निहित संभावनाओं का अहसास भी नहीं हुआ। उन्होंने धीरे-धीरे अपने व्यवसाय को टुकड़ों में अपने साझेदारों को बेच दिया और 1888 में अपनी मृत्यु के कुछ समय पहले ही कोका-कोला में अपने बचे-खुचे हितों को आसा जी. कैंडलर को बेच दिया। कैंडलर, व्यापारिक सूझ-बूझ वाला एटलांटावासी था। उसने व्यवसाय के अन्य हिस्से भी खरीद लिए तथा अंत में पूरे व्यवसाय को नियंत्रण में ले लिया।

1 मई, 1889 को आसा जी. कैंडलर ने ‘द एटलांटा’ पत्रिका में एक पूरे पृष्ठ का विज्ञापन दिया जिसमें उसने अपने दवाइयों के थोक एवं फुटकर व्यापार को कोका-कोला के एकमात्र स्वामी के रूप में घोषित किया। उसके विज्ञापन में कहा गया- "कोका-कोला स्वादिष्ट! ताजगीदायक! स्फूर्तिदायक! शक्तिवर्धक! पेय!" कोका-कोला का एकल स्वामित्व कैंडलर को 1891 में जाकर प्राप्त हुआ जिसके लिए उसे 2300 डॉलर निवेश करने की आवश्यकता पड़ी। 1892 में जाकर कैंडलर ने ‘दि कोका-कोला कॉरपोरेशन’ के नाम से एक कंपनी का गठन किया।

(स्रोतः कोका-कोला कंपनी की वेबसाइट से।)

(ख) सूचना की गोपनीयता- एकल स्वामी अकेले ही निर्णय लेने का अधिकार रखता है इसलिए वह व्यापार संचालन के संबंधों में सूचना को गुप्त रख सकता है तथा गोपनीयता बनाए रख सकता है। वह किसी कानून के अंतर्गत अपने लेखे-जोखे को प्रकाशित करने के लिए बाध्य भी नहीं है।

(ग) प्रत्यक्ष प्रोत्साहन- एकल स्वामी संपूर्ण लाभ का ग्रहणकर्ता होने के कारण प्रत्यक्ष रूप से अपने प्रयत्नों के लाभ को प्राप्त करता है। चूँकि वह अकेला ही स्वामी होता है इसलिए उसे लाभ में किसी के साथ हिस्सा बाँटने की आवश्यकता नहीं है। इससे उसे कठिन परिश्रम करने के लिए अधिकतम प्रोत्साहन मिलता है।

(घ) उपलब्धि का अहसास- अपने स्वयं के लिए काम करने से व्यक्तिगत संतोष प्राप्त होता है। इस बात का अहसास कि वह स्वयं ही अपने व्यवसाय की सफलता के लिए उत्तरदायी है, न केवल उसे आत्मसंतोष प्रदान करता है बल्कि स्वयं की योग्यताओं में आस्था एवं विश्वास की भावना भी उत्पन्न करता है।

(ङ) स्थापित करने एवं बंद करने में सुगमता- व्यवसाय में प्रवेश के लिए न्यूनतम वैधानिक औपचारिकताओं की आवश्यकता होती है। यह एकल स्वामित्व का एक महत्त्वपूर्ण लाभ है। एकल स्वामित्व को शासित करने के लिए अलग से कोई कानून नहीं है। चूँकि इसका स्वरूप एेसा है कि इसके कम से कम नियमन हैं इसलिए इसको स्थापित करना एवं इसे बंद करना सुगम है।

सीमाएँ

उपरोक्त लाभों के होते हुए भी एकल स्वामित्व की भी कुछ सीमाएँ हैं। इनमें से कुछ प्रमुख सीमाएँ इस प्रकार हैं-

(क) सीमित संसाधन- एक एकल स्वामी के संसाधन उसके व्यक्तिगत बचत एवं दूसरों से ऋण लेने तक ही सीमित हैं। बैंक एवं दूसरे ऋण देने वाले संस्थान एक एकल स्वामी को दीर्घ अवधि ऋण देने में संकोच करेंगे। व्यापार का आकार साधारणतः छोटा ही रहता है तथा उसके विस्तार की संभावना भी कम होती है। इसका एक बड़ा कारण संसाधनों की कमी या अभाव है।

(ख) व्यावसायिक इकाई का सीमित जीवनकाल- कानून की दृष्टि में स्वामी एवं स्वामित्व दोनों ही एक माने जाते हैं। स्वामी की मृत्यु, दिवालिया होना अथवा बीमारी से व्यवसाय प्रभावित होता है तथा इनसे वह बंद भी हो सकता है।

(ग) असीमित दायित्व- एकल स्वामित्व की एक बड़ी हानि है स्वामी का असीमित दायित्व। यदि व्यापार में असफलता रहती है तो लेनदार अपनी लेनदारी को न केवल व्यवसाय की परिसंपत्तियों बल्कि स्वामी की निजी संपत्तियों से भी वसूल कर सकते हैं। एक भी गलत निर्णय या फिर प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण स्वामी पर भारी वित्तीय भार पड़ सकता है। इसी कारण से एकल स्वामी परिवर्तन अथवा विस्तार का जोखिम उठाने के लिए कम ही तैयार होता है।

(घ) सीमित प्रबंध योग्यता- स्वामी पर प्रबंध संबंधित कई उत्तरदायित्व रहते हैं, जैसे- क्रय, विक्रय, वित्त आदि। शायद ही कोई व्यक्ति हो जो इन सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठ हो। संसाधनों की कमी के कारण वह गुणी एवं महत्त्वाकांक्षी कर्मचारियों को न तो भर्ती कर सकते हैं और न ही उन्हें रोके रख सकते हैं।

सारांश यह है कि एकल स्वामित्व के दोषों के होते हुए भी अनेक उद्यमी इसी को अपनाते हैं क्योंकि यह उन व्यवसायों के लिए सर्वोत्तम है जिनका आकार छोटा है; जिन्हें कम पूँजी की आवश्यकता है तथा जहाँ ग्राहकों को व्यक्तिगत सेवाओं की आवश्यकता है।


2.3 संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय


संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय विशेष प्रकार का संगठन स्वरूप है जो केवल भारत में ही पाया जाता है। हमारे देश का यह सबसे पुराना स्वरूप है। इसका अभिप्राय उस व्यवसाय से है जिसका स्वामित्व एवं संचालन एक संयुक्त हिन्दू परिवार के सदस्य करते हैं। इसका प्रशासन हिन्दू कानून के द्वारा होता है। परिवार विशेष में जन्म लेने पर वह व्यक्ति व्यवसाय का सदस्य बन जाता है एवं तीन पीढ़ियों तक व्यवसाय का सदस्य रह सकता है।

व्यवसाय पर परिवार के मुखिया का नियंत्रण रहता है, जो परिवार का सबसे बड़ा सदस्य होता है एवं ‘कर्त्ता’ कहलाता है। सभी सदस्यों का पूर्वज की संपत्ति पर बराबर का स्वामित्व होता है तथा उन्हें सह-समांशी कहा जाता है।

लक्षण

निम्न बिन्दु संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय की आवश्यक विशेषताओं को उजागर करते हैं-

(क) निर्माण- संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय के लिए परिवार में कम से कम दो सदस्य एवं वह पैतृक संपत्ति जो उन्हें विरासत में मिली हो, उनका होना आवश्यक है। व्यवसाय के लिए किसी अनुबंध की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसमें सदस्यता जन्म के कारण मिलती है। यह हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 द्वारा शासित होता है।

(ख) दायित्व- कर्ता को छोड़कर अन्य सभी सदस्यों का दायित्व व्यवसाय की सह-समांशी संपत्ति में उनके अंश तक सीमित होता है।

(ग) नियंत्रण- परिवार के व्यवसाय पर कर्ता का नियंत्रण होता है। वही सभी निर्णय लेता है तथा वही व्यवसाय के प्रबंधन के लिए अधिकृत होता है। उसके निर्णयों से दूसरे सभी सदस्य बाध्य होते हैं।

(घ) निरंतरता- कर्ता की मृत्यु होने पर व्यवसाय चलता रहता है क्योंकि सबसे बड़ी आयु का अगला सदस्य कर्ता का स्थान ले लेता है, जिससे व्यवसाय में स्थिरता आती है। सभी सदस्यों की संयुक्त स्वीकृति से ही व्यवसाय को समाप्त किया जा सकता है।

(ङ) नाबालिग सदस्य- व्यवसाय में व्यक्ति का प्रवेश संयुक्त हिन्दू परिवार में जन्म लेने के कारण होता है इसीलिए नाबालिग भी व्यवसाय के सदस्य हो सकते हैं।

गुण

संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय के लाभ निम्न- लिखित हैं-

(क) प्रभावशाली नियंत्रण- कर्ता के पास निर्णय लेने के पूरे अधिकार होते हैं। इससे सदस्यों में पारस्परिक मतभेद नहीं होता क्योंकि उनमें से कोई भी उसके निर्णय लेने के अधिकार में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। इसके कारण निर्णय शीघ्र लिए जाते हैं तथा उनमें लचीलापन भी होता है।

(ख) स्थायित्व- कर्ता की मृत्यु से व्यवसाय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि अगला सबसे अधिक आयु का व्यक्ति उसका स्थान ले लेता है। परिणामस्वरूप, व्यवसाय का कार्य समाप्त नहीं होता तथा व्यवसाय की निरंतरता को किसी प्रकार का खतरा नहीं होता।

(ग) सदस्यों का सीमित दायित्व- कर्ता को छोड़कर अन्य सभी सह-समांशियों का दायित्व व्यवसाय में उनके अंश तक सीमित होता है इसीलिए उनके जोखिम स्पष्ट एवं निश्चित होते हैं।

(घ) निष्ठा एवं सहयोग में वृद्धि- क्योंकि व्यवसाय को एक परिवार के सदस्य मिलकर चलाते हैं, इसलिए एक-दूसरे के प्रति अधिक निष्ठावान होते हैं। व्यवसाय का विकास परिवार की उपलब्धि होती है, इसीलिए उसके लिए यह गर्व की बात होती है। इससे सभी सदस्यों का श्रेष्ठ सहयोग प्राप्त होता है।


संयुक्त हिन्दू परिवार में लिंग समता - एक वास्तविकता

हिन्दू (संशोधन) अधिनियम-2005 के अनुसार, संयुक्त हिन्दू परिवार के सह-समांशी की पुत्री जन्म लेते हीे एक सह-समांशी बन जाती है। संयुक्त हिन्दू परिवार के बँटवारे के समय सह-समांशी संपत्तियाँ सभी सह-समांशियों में, उनके लिंग को ध्यान में रखे बिना, समान रूप से विभाजित की जाएँगी। संयुक्त हिन्दू परिवार का सबसे बड़ा सदस्य (पुरुष अथवा स्त्री) कर्त्ता बनता है। संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति में विवाहित पुत्री को समान अधिकार हैं।

सीमाएँ

संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय की कुछ सीमाएँ नीचे दी गई हैं-

(क) सीमित साधन- संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय मूल रूप से पैतृक संपत्ति पर आश्रित रहता है इसलिए इसके सामने सीमित पूँजी की समस्या रहती है। इससे व्यवसाय के विस्तार की संभावना कम हो जाती है।

(ख) कर्ता का असीमित दायित्व- कर्ता पर न केवल निर्णय लेने एवं प्रबंध करने के उत्तरदायित्व का बोझ होता है बल्कि उस पर असीमित दायित्व का भी भार होता है। व्यवसाय के ऋणों को चुकाने के लिए उसकी निजी संपत्ति का भी उपयोग किया जा सकता है।

(ग) कर्ता का प्रभुत्व- कर्ता अकेला ही व्यवसाय का प्रबंध करता है जो कभी-कभी अन्य सदस्यों को स्वीकार्य नहीं होता। इससे उनमें टकराव हो जाता है, यहाँ तक कि पारिवारिक इकाई भंग भी हो सकती है।

(घ) सीमित प्रबंध कौशल- यह आवश्यक तो नहीं कि कर्ता सभी क्षेत्रों का विशेषज्ञ हो इसलिए व्यवसाय को उसके मूर्खतापूर्ण निर्णयों के परिणाम भुगतने होते हैं। यदि वह प्रभावी निर्णय नहीं ले पाता है तो उससे वित्त संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं, जैसे- कम लाभ होना या हानि होना।

अंत में हम कह सकते हैं कि संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय ढलान की ओर है क्योंकि देश में संयुक्त हिन्दू परिवारों की संख्या कम होती जा रही है।


2.4 साझेदारी


एकल स्वामित्व के व्यापारिक विस्तार के वित्तीयन एवं प्रबंधन संबंधित निहित दोष के कारण एक जीवंत विकल्प के रूप में साझेदारी का मार्ग प्रशस्त हुआ है। साझेदारी भारी पूँजी निवेश, विभिन्न प्रकार के कौशल एवं जोखिम में भागीदारी की आवश्कताओं को पूरा करती है।

लक्षण

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर साझेदारी संगठन की विशेषताओं का वर्णन निम्न है-

(क) स्थापना- व्यावसायिक संगठन का साझेदारी स्वरूप भारतीय साझेदारी अधिनियम- 1932 द्वारा शासित है। साझेदारी कानूनी समझौते के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आती है जिसमें साझेदारों के मध्य संबंधों, लाभ एवं हानि को बाँटने एवं व्यवसाय के संचालन के तरीकों को निश्चित किया जाता है। विशिष्ट बात यह है कि व्यवसाय वैधानिक होना चाहिए एवं उसके संचालन का उद्देश्य लाभ कमाना होना चाहिए। अतः कोई दो व्यक्ति यदि धर्मार्थ सेवा के लिए एकजुट होते हैं तो यह साझेदारी नहीं होगी।?

(ख) देयता- फर्म के साझेदारों का दायित्व असीमित होता है। यदि व्यवसाय की परिसंपत्तियाँ अपर्याप्त हैं तो ऋणों को व्यक्तिगत संपत्तियों से चुकाया जाएगा। इसके अतिरिक्त, वे ऋणों को चुकता करने के लिए व्यक्तिगत रूप से एवं संयुक्त रूप से उत्तरदायी होंगे। संयुक्त रूप से प्रत्येक साझेदार ऋण भुगतान के लिए उत्तरदायी है तथा वह प्रत्येक व्यवसाय में अपने हिस्से के अनुपात में योगदान करेगा तथा उस सीमा तक देनदार होगा। व्यवसाय की देनदारी का भुगतान करने के लिए उस साझेदार को व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी ठहराया जा सकता है, लेकिन एेसी स्थिति में वह साझेदार अन्य साझेदारों से उनके हिस्से की देनदारी के बराबर राशि वसूल सकता है।

(ग) जोखिम वहन करना- व्यवसाय को एक टीम के रूप में चलाने से उत्पन्न जोखिम को साझेदार वहन करते हैं। इसके प्रतिफल के रूप में उन्हें लाभ प्राप्त होता है जिसे वे आपस में एक तय अनुपात में बाँट लेते हैं लेकिन उसी अनुपात में वे हानि को भी बाँटते हैं।

(घ) निर्णय लेना एवं नियंत्रण- साझेदार आपस में मिलकर दिन-प्रतिदिन के कार्यों के संबंध में निर्णय लेने एवं नियंत्रण करने के उत्तरदायित्व को निभाते हैं। निर्णय उनकी आपसी राय से लिए जाते हैं। अतः साझेदारी फर्म के कार्यों के प्रबंधन में उन सभी का योगदान रहता है।

(ङ) निरंतरता- साझेदारी में व्यवसाय की निरंतरता की कमी रहती है क्योंकि किसी भी साझेदार की मृत्यु, अवकाश ग्रहण करने, दिवालिया होने या फिर पागल हो जाने से यह समाप्त हो सकती है। बाकी साझीदार नए समझौते के आधार पर व्यवसाय को चालू रख सकते हैं।

(च) सदस्यता- किसी साझेदारी को प्रारंभ करने हेतु न्यूनतम दो सदस्यों की आवश्यकता होती है। कंपनी अधिनियम-2013 की धारा 464 के अनुसार किसी साझेदारी फर्म में साझेदारों की अधिकतम संख्या 100 तक हो सकती है। कंपनी विविध नियम-2014 के नियम 10 के अनुसार वर्तमान में किसी साझेदारी संगठन में अधिकतम 50 सदस्य हो सकते हैं।

(छ) एजेंसी संबंध- साझेदारी की परिभाषा इस तथ्य को रेखांकित करती है कि इसमें व्यवसाय को सभी साझेदार मिलकर या फिर सभी की ओर से कोई एक साझेदार चला सकता है। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक साझेदार एजेंट भी है एवं स्वामी भी। चूँकि वह दूसरे साझेदारों का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए वह उनका एजेंट होता है तथा उसके कार्याें से अन्य साझेदार आबद्ध हो जाते हैं। प्रत्येक साझेदार स्वामी भी होता है तथा दूसरे साझेदारों के कार्यों से आबद्ध हो जाता है।

गुण

साझेदारी फर्म के लाभ नीचे दिए गए हैं-

(क) स्थापना एवं समापन सरल- एक साझेदारी फर्म को संभावित साझेदारों के बीच समझौते के द्वारा सरलता से बनाया जा सकता है जिसके अनुसार वह व्यवसाय को चलाते हैं तथा जोखिम को बाँटते हैं। फर्म का पंजीकरण अनिवार्य नहीं होता एवं इसे बंद करना भी सरल होता है।

(ख) संतुलित निर्णय- साझेदार अपनी-अपनी विशिष्टता के अनुसार अलग-अलग कार्यों को देख सकते हैं। एक व्यक्ति विभिन्न कार्यों को करने के लिए बाध्य नहीं होता तथा इससे निर्णय लेने में गलतियाँ भी कम होती हैं। परिणामस्वरूप, निर्णय अधिक संतुलित होते हैं।

(ग) अधिक कोष- साझेदारी में पूँजी कई साझेदारों द्वारा लगाई जाती है। इससे एकल स्वामित्व की तुलना में अधिक धन जुटाया जा सकता है तथा आवश्यकता पड़ने पर अतिरिक्त व्यावसायिक कार्य भी किए जा सकते हैं।

(घ) जोखिम को बाँटना- साझेदारी फर्म को चलाने में निहित जोखिम को सभी साझेदार बाँट सकते हैं। इससे अकेले साझेदार पर पड़ने वाला बोझ, तनाव एवं दबाव कम हो जाता है।

(ङ) गोपनीयता- एक साझेदारी फर्म के लिए अपने खातों को प्रकाशित करना एवं ब्यौरा देना कानूनी रूप से आवश्यक नहीं है इसलिए यह अपने व्यावसायिक कार्यों के संबंध में सूचना को गुप्त रख सकते हैं।

सीमाएँ

साझेदारी फर्म की निम्न सीमाएँ हैं-

(क) असीमित दायित्व- यदि फर्म की देनदारी को चुकाने के लिए व्यवसाय की संपत्तियाँ पर्याप्त नहीं हैं तो साझेदारों को इसका भुगतान अपने निजी स्रोतों से करना होगा। साझेदारों के दायित्व संयुक्त एवं पृथक दोनों होते हैं इसलिए यह उन साझेदारों के लिए अनुचित होगा जिनके पास अधिक व्यक्तिगत धन है। यदि अन्य साझेदार ऋण का भुगतान करने में असमर्थ रहते हैं तो इसका भुगतान धनी साझेदारों को करना होगा।


"साझेदारी उन लोगों के बीच का संबंध है जो अनुबंध के लिए सर्वथा योग्य हैं तथा जिन्होंने निजी लाभ के लिए आपस में मिलकर एक वैधानिक व्यापार करने का समझौता किया है।"

एल.एच. हेनी

"साझेदारी उन लोगों के मध्य संबंध है जिन्होंने किसी व्यवसाय में अपनी संपत्ति, श्रम अथवा निपुणता को मिला लिया है तथा वे आपस में उससे होने वाले लाभ को बाँट रहे हैं।"

भारतीय प्रसंविदा अधिनियम 1872


(ख) सीमित साधन- साझेदारों की संख्या सीमित होती है इसलिए बड़े पैमाने के व्यावसायिक कार्यों के लिए उनके द्वारा लगाई गई पूँजी अपर्याप्त रहती है। परिणामस्वरूप, साझेदारी फर्म एक निश्चित आकार से अधिक विस्तार नहीं कर पाती।

(ग) परस्पर विरोध की संभावना- साझेदारी का संचालन व्यक्तियों का एक समूह करता है जिनमें निर्णय लेने के अधिकार को बाँटा जाता है। कुछ मामलों में यदि मतभेद है तो इससे साझेदारों के बीच विवाद पैदा हो सकता है। इसी प्रकार से एक साझेदार के निर्णय से दूसरे साझेदार आबद्ध हो जाते हैं। इस प्रकार से किसी एक का अनुचित निर्णय दूसराें के लिए वित्तीय बर्बादी का कारण बन सकता है। कोई साझेदार यदि फर्म को छोड़ना चाहता है तो उसे साझेदारी को समाप्त करना होगा क्योंकि वह स्वामित्व का हस्तांतरण नहीं कर सकता।

(घ) निरंतरता की कमी- किसी भी एक साझेदार की मृत्यु, अवकाश ग्रहण करने, दिवालिया होने अथवा पागल होने से साझेदारी समाप्त हो जाती है। इसे सभी की सहमति से कभी भी समाप्त किया जा सकता है इसलिए इसमें स्थायित्व एवं निरंतरता नहीं होती।

(ङ) जनसाधारण के विश्वास की कमी- साझेदारी फर्म के लिए इसकी वित्तीय सूचनाओं एवं अन्य संबंधित जानकारी का प्रकाशन अथवा उजागर करना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है इसलिए जनसाधारण के लिए फर्म की वित्तीय स्थिति को जानना कठिन हो जाता है। इससे जनता का विश्वास भी कम होता है।

2.4.1 साझेदारों के प्रकार

साझेदारी फर्म में विभिन्न प्रकार के साझेदार हो सकते हैं जिनकी अलग-अलग भूमिकाएँ एवं दायित्व होते हैं। इनके अधिकारों एवं उत्तरदायित्वों को भली-भाँति समझने के लिए इनके प्रकारों को समझना महत्त्वपूर्ण है। इनका वर्णन नीचे किया गया है-

(क) सक्रिय साझेदार- एक सक्रिय साझेदार वह है जो पूँजी लगाता है। फर्म के लेनदारों के प्रति उसका दायित्व असीमित होता है। यह साझेदार अन्य साझेदारों की ओर से व्यवसाय संचालन में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।

(ख) सुप्त अथवा निष्क्रिय साझेदार- जो साझेदार व्यवस्था के दिन-प्रतिदिन के कार्यों में भाग नहीं लेते हैं, उन्हें सुसुप्त साझेदार कहते हैं। एक निष्क्रिय साझेदार फर्म में पूँजी लगाता है, लाभ-हानि को बाँटता है तथा उसका असीमित दायित्व होता है।

(ग) गुप्त साझेदार- यह वह साझेदार होता है जिसके फर्म से संबंध को साधारण जनता नहीं जानती। इस विशिष्टता को छोड़कर बाकी मामलों में वह अन्य साझेदारों के समान होता है। वह पूँजी लगाता है, प्रबंध में भाग लेता है, लाभ हानि को बाँटता है तथा लेनदारों के प्रति उसका दायित्व असीमित होता है।

(घ) नाममात्र का साझेदार- यह वह साझेदार होता है, जिसके नाम का प्रयोग फर्म करती है लेकिन वह इसमें कोई पूँजी नहीं लगाती है। वह फर्म के प्रबंध में सक्रिय रूप से भाग नहीं लेता है, न ही लाभ-हानि में भागीदार होता है लेकिन अन्य साझेदारों के समान फर्म के ऋणों के भुगतान के लिए तीसरे पक्षों के प्रति उत्तरदायी होता है।

(ङ) विबंधन साझेदार (एस्टॉपेल)- कोई व्यक्ति विबंधन साझेदार तब माना जाता है, जब वह अपनी पहल, आचरण अथवा व्यवहार से दूसरों को यह आभास कराता है कि वह किसी फर्म का साझेदार है। एेसे साझेदार फर्म के ऋणों के भुगतान के लिए उत्तरदायी होते हैं क्योंकि अन्य पक्षों की दृष्टि में वे साझेदार होते हैं। भले ही वे इसमें पूँजी नहीं लगाते हैं और न ही इसके प्रबंध में भाग लेते हैं। उदाहरण के लिए, सीमा की एक मित्र है रानी, जोकि एक सॉफ्टवेयर फर्म ‘सिम्पलैक्स सोल्यूशन’ में साझेदार है। रानी, सीमा के साथ ‘मोहन सॉफ्टवेयर’ में व्यवसाय के सिलसिले में आयोजित एक बैठक में भाग लेने जाती है तथा एक सौदे को तय करने की कार्यवाही में सक्रिय रूप से भाग लेती है। रानी एेसा आभास दिलाती है कि मानो वह ‘सिम्पलैक्स सोल्यूशन’ में एक साझेदार है। यदि इस बातचीत के आधार पर ‘सिम्पलैक्स सोल्यूशन’ को उधार की सुविधा दी जाती है तो रानी भी इस देनदारी के भुगतान के लिए ठीक उसी प्रकार उत्तरदायी होगी जैसे वह भी फर्म में एक साझेदार हो।

(च) प्रतिनिधि साझेदार (होल्डिंग आउट)- यह वह व्यक्ति होता है जो जान-बूझकर फर्म में अपने नाम को प्रयोग करने देता है अथवा अपने आपको इसका प्रतिनिधि मानने देता है। एेसा व्यक्ति किसी भी उस ऋण के लिए उत्तरदायी होगा जो उसके एेसे प्रतिनिधित्व के कारण दिए गए हैं। यदि वह वास्तव में साझेदार नहीं है तथा इस उत्तरदायित्व से मुक्त होना चाहता है तो उसे तुरंत इसे नकारना होगा तथा उसे अपनी स्थिति स्पष्ट कर यह बताना होगा कि वह साझेदार नहीं है। यदि वह एेसा नहीं करता है तो वह इस आधार पर हुई किसी भी प्रकार की हानि के लिए तीसरे पक्ष के प्रति उत्तरदायी होगा।

2.4.2 साझेदारी के प्रकार

साझेदारी को दो घटकों के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है-अवधि एवं देयता।

अवधि के आधार पर साझेदारी दो प्रकार की हो सकती है-(i) एेच्छिक साझेदारी; एवं (ii) विशिष्ट साझेदारी।

देयता के आधार पर भी साझेदारी दो प्रकार की होती है-(i) सीमित दायित्व वाली; एवं (ii) असीमित दायित्व वाली। इनका वर्णन आगे के खंडों में किया गया है।


अवधि के आधार पर वर्गीकरण

(क) एेच्छिक साझेदारी- इस प्रकार की साझेदारी की रचना साझेदारों की इच्छा से होती है। यह उस समय तक चलती है जब तक कि अलग होने का नोटिस नहीं दिया जाता। किसी भी साझेदार द्वारा नोटिस देने पर यह समाप्त हो जाती है।

(ख) विशिष्ट साझेदारी- साझेदारी की रचना यदि किसी विशिष्ट परियोजनाएँ जैसे किसी भवन के निर्माण या कोई कार्य या फिर एक निश्चित अवधि के लिए की जाती है, तो इसे विशिष्ट साझेदारी कहते हैं। जिस उद्देश्य के लिए इसकी रचना की गई है उसके पूरा होने पर अथवा अवधि की समाप्ति पर यह समाप्त हो जाती है।


देयता के आधार पर वर्गीकरण

(क) सामान्य साझेदारी- सामान्य साझेदारी में साझेदारों का दायित्व असीमित एवं संयुक्त होता है। साझेदारों को प्रबंध में भाग लेने का अधिकार होता है तथा उनके कृत्यों से अन्य साझेदार तथा फर्म आबद्ध हो जाते हैं। एेसे फर्म का पंजीयन एेच्छिक होता है। फर्म का अस्तित्व साझेदारों की मृत्यु, पागलपन एवं अवकाश ग्रहण करने से प्रभावित होता है।

(ख) सीमित साझेदारी- सीमित साझेदारी में कम से कम एक साझेदार का दायित्व असीमित होता है तथा शेष साझेदारों का सीमित। एेसी साझेदारी सीमित दायित्व वाले साझेदारों की मृत्यु, पागलपन अथवा दिवालिया होने से समाप्त नहीं होता है। सीमित दायित्व वाले साझेदार प्रबंध में भाग नहीं ले सकते तथा उनके कार्यों से न तो फर्म और न ही दूसरे साझेदार आबद्ध होते हैं। एेसी साझेदारी का पंजीयन अनिवार्य है।

इस प्रकार की साझेदारी की पहले भारत में अनुमति नहीं थी। सीमित दायित्व वाले साझेदारी की अनुमति 1991 नवीन लघु उद्योग नीति लागू करने के पश्चात् दी गई। यह कदम छोटे पैमाने के उद्यमियों के मित्र एवं संबंधियों से समता पूँजी प्राप्त करने के लिए उठाया गया क्योंकि अन्यथा ये लोग साझेदारी फर्म में असीमित दायित्व की धारा के कारण सहायता करने से पीछे हटते थे।

2.4.3 साझेदारी संलेख

साझेदारी उन लोगों का एेच्छिक संगठन है, जो समान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एकजुट होते हैं। साझेदारी बनाने के लिए सभी शर्तें एवं साझेदारों से संबंधित सभी पहलुओं के संबंध में स्पष्ट समझौता आवश्यक है। ताकि बाद में साझेदारों में किसी प्रकार की गलतफहमी नहीं हो। यह समझौता मौखिक अथवा लिखित हो सकता है। लिखित समझौते का होना आवश्यक नहीं है, लेकिन अच्छा यही रहता है कि समझौता लिखित ही हो, क्योंकि यह निर्धारित शर्तों का प्रमाण है। लिखित समझौता जो साझेदारी को शासित करने के लिए शर्तों व परिस्थितियोें का उल्लेख करता है साझेदारी संलेख कहलाता है। साझेदारी संलेख में सामान्यतः निम्न पहलू शामिल होते हैं-

• फर्म का नाम;

• व्यवसाय की प्रकृति एवं स्थान जहाँ वह स्थित है;

• व्यवसाय की अवधि;

• प्रत्येक साझेदार द्वारा किया गया निवेश;

• लाभ-हानि का बंटवारा;

• साझेदारों के कर्तव्य एवं दायित्व;

• साझेदारों का वेतन एवं आहरण;

• साझेदार के प्रवेश, अवकाश ग्रहण एवं हटाए जाने से संबंधित शर्तें;

• पूँजी एवं आहरण पर ब्याज;

• फर्म के समापन की प्रक्रिया;

• खातों को तैयार करना एवं उसका अंकेक्षण;

• विवादों के समाधान की पद्धति।


सारणी 2.1 साझेदारों के प्रकार का तुलनात्मक विश्लेषण

प्रकार

पूंजी का योगदान

प्रबंध

लाभ/हानि में हिस्सा

देनदारी

सक्रिय साझेदार

 

पूँजी लगाता है

 

प्रबंध में भागीदार है

 

लाभ/हानि मे भागीदार है

असीमित दायित्व है

 

सुप्त अथवा निष्क्रिय साझेदार

पूँजी लगाता है

 

प्रबंध में भाग लेता है

 

लाभ/हानि को बाँटता है

असीमित दायित्व है

 

गुप्त साझेदार

 

पूँजी लगाता है

 

प्रबंध में भाग लेता है पर गुप्त रूप से

लाभ-हानि बाँटता है

 

असीमित दायित्व है

 

नाम मात्र का साझेदार

 

पूँजी नहीं लगाता है

 

प्रबंध में भाग नहीं लेता है

 

साधारणतया लाभ/हानि में भागीदार नहीं होता है

असीमित दायित्व है

 

विबंधन साझेदार

 

पूँजी नहीं लगाता है

प्रबंध में भाग नहीं लेता है

लाभ/हानि में भागीदार नहीं होता है

असीमित दायित्व है

 

प्रतिनिधि साझेदार

 

पूँजी नहीं लगाता है

प्रबंध में भाग नहीं लेता है

लाभ-हानि में भागीदार नहीं होेता है

असीमित दायित्व है

 

2.4.4 पंजीकरण

साझेदारी फर्म के पंजीकरण का अर्थ है फर्म के पंजीयन अधिकारी के पास रहने वाले फर्मों के रजिस्टर में फर्म का नाम तथा संबंधित विवरण की प्रविष्टि करना। यह फर्म की उपस्थिति का पक्का प्रमाण होता है।

फर्म को पंजीकृत कराना एेच्छिक होता है। परंतु जिस फर्म का पंजीयन नहीं हुआ है, वह कई लाभों से वंचित रह जाती है। फर्म का पंजीयन न कराने के निम्नलिखित परिणाम हो सकते हैं-

(अ) एक अपंजीकृत फर्म का साझेदार अपने फर्म अथवा अन्य साझेदारों की विरुद्ध मुकदमा दायर नहीं कर सकता;

(ब) फर्म अन्य पक्षों के विरुद्ध मुकदमा नहीं चला सकती; तथा

(स) फर्म साझेदारों के विरुद्ध मुकदमा नहीं चला सकती।

अतः हम कह सकते हैं कि फर्म का पंजीयन यद्यपि अनिवार्य नहीं है फिर भी पंजीयन कराना ही उचित रहता है। भारतीय साझेदारी अधिनियम 1932 के अनुसार किसी फर्म की साझेदार फर्म को उस राज्य के रजिस्ट्रार के पास पंजीकरण करा सकती है जिस राज्य में वह स्थित है।

एक फर्म के पंजीयन की प्रक्रिया निम्नलिखित है-

(1) फर्मों के रजिस्ट्रार, के पास निर्धारित प्रपत्र (फॅार्म) के रूप में आवेदन करना। इस आवेदन में निम्न विवरण दिया जाता है-

• फर्म का नाम;

• वह स्थान जहाँ फर्म स्थित है तथा वह स्थान जहाँ फर्म अपना व्यवसाय कर रही है;

• प्रत्येक साझेदार के फर्म में प्रवेश की तिथि;

• साझेदारों के नाम एवं पते, एवं

• साझेदारी की अवधि।

(2) इस आवेदन पर सभी साझेदारों के हस्ताक्षर होते हैं। फर्मों के रजिस्ट्रार के पास आवश्यक फीस जमा कराना।

(3) स्वीकृति के पश्चात रजिस्ट्रार फर्मों के रजिस्टर में प्रविष्टि कर देगा तथा तत्पश्चात पंजीयन प्रमाण पत्र जारी कर देगा।


2.5 सहकारी संगठन


सहकारी शब्द का अर्थ है किसी साझे उद्देश्य के लिए एक साथ मिलकर काम करना।

सहकारी समिति उन लोगों का स्वैच्छिक संगठन है, जो सदस्यों के कल्याण के लिए एकजुट हुए हैं। अधिक लाभ के लालची मध्यस्थों के हाथों संभावित शोषण को ध्यान में रखते हुए वे अपने आर्थिक हितों की रक्षा से प्रेरित होते हैं।

एक सहकारी समिति का सहकारी समिति अधिनियम 1912 के अंतर्गत पंजीकरण अनिवार्य है। इसकी प्रक्रिया सरल है एवं समिति का गठन करने के लिए कम से कम दस बालिग सदस्यों की स्वीकृति की आवश्यकता होती है। समिति की पूँजी को अंशों का निर्गमन कर इसके सदस्यों से जुटाया जाता है। पंजीकरण के पश्चात् समिति एक स्वतंत्र वैधानिक अस्तित्व प्राप्त कर लेती है।


नाबालिग साझेदार

साझेदारी दो लोगों के बीच कानूनी अनुबंध पर आधारित होती है, जो उनके द्वारा संचालित व्यापार के लाभ-हानि को बाँटने का समझौता करते हैं, क्योंकि एक नाबालिग किसी के साथ अनुबंध नहीं कर सकता, इसलिए वह किसी फर्म में साझेदार नहीं बन सकता। फिर भी किसी नाबालिग को सभी अन्य साझेदारों की सहमति से फर्म के लाभों में भागीदार बनाया जा सकता है। एेसे में उसका दायित्व फर्म में लगाई गई, उसकी पूँजी तक सीमित होगा। वह फर्म के प्रबंध में भाग नहीं ले सकेगा। अतः एक नाबालिग केवल लाभ में भागीदार होगा तथा वह हानि को वहन नहीं करेगा। हाँ, यदि वह चाहे तो फर्म के खातों को देख सकता है। नाबालिग की स्थिति उसके बालिग हो जाने पर बदल जाती है। वास्तव में बालिग हो जाने पर नाबालिग को यह निर्णय लेना होगा कि क्या वह फर्म में साझेदार बने रहना चाहता है। छः माह के अन्दर उसे अपने निर्णय का सार्वजनिक नोटिस देना होगा। यदि वह एेसा करने मे असमर्थ रहता है, तो उसे पूर्णरूपेण साझेदार माना जाएगा तथा अन्य सक्रिय साझेदारों के समान ही फर्म की देनदारी के लिए उसका दायित्व भी असीमित होगा।

लक्षण

सहकारी समिति की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(क) स्वैच्छिक सदस्यता- सहकारी समिति की सदस्यता एेच्छिक होती है। कोई भी व्यक्ति किसी सहकारी समिति में स्वेच्छा से सम्मिलित हो सकता है अथवा उसे छोड़ सकता है। किसी समिति में सम्मिलित होने अथवा उसे छोड़ने के लिए वह बाध्य नहीं होता। यद्यपि छोड़ने से पहले उसे एक नोटिस देना पड़ता है, लेकिन सदस्य बने रहने के लिए वह बाध्य नहीं होता है। इसकी सदस्यता खुली होती है तथा किसी भी धर्म, जाति अथवा लिंग भेद का कोई भी व्यक्ति इसका सदस्य बन सकता है।

(ख) वैधानिक स्थिति- सहकारी समिति का पंजीकरण अनिवार्य है, इससे समिति को अपने सदस्यों से अलग पृथक अस्तित्व प्राप्त हो जाता है। समिति अनुबंध कर सकती है एवं अपने नाम में परिसंपत्ति रख सकती है। दूसरों पर मुकदमा कर सकती है तथा दूसरे इस पर मुकदमा कर सकते हैं। इसके पृथक वैधानिक अस्तित्व के कारण सदस्यों के इसमें प्रवेश अथवा इसको छोड़ कर जाने का इस पर प्रभाव नहीं पड़ता।

(ग) सीमित दायित्व- एक सहकारी समिति के सदस्यों का दायित्व उनके द्वारा लगायी पूँजी की राशि तक सीमित रहता है। किसी भी सदस्य के लिए यह राशि अधिकतम जोखिम की सीमा है।

(घ) नियंत्रण- किसी भी सहकारी समिति में निर्णय लेने की शक्ति उसकी निर्वाचित प्रबंध कमेटी के हाथों में होती है। सदस्यों के पास वोट का अधिकार होता है, जिससे उन्हें प्रबंध समिति के सदस्यों को चुनने का अवसर मिलता है तथा सहकारी समिति का स्वरूप प्रजातान्त्रिक बनता है।

(ङ) सेवा भावना- सहकारी समिति के उद्देश्य पारस्परिक सहायता एवं कल्याण के मूल्यों पर अधिक ज़ोर देते हैं। इसलिए इसके कार्यों में सेवाभाव प्रधान रहता है। अगर सहकारी समिति को आधिक्य की प्राप्ति होती है, तो इसे समिति के उपनियमों के अनुरूप सदस्यों में लाभांश के रूप में बाँट दिया जाता है।

गुण

सहकारी समिति के सदस्यों को अनेक लाभ होते हैं। सहकारी समिति के कुछ लाभ नीचे दिए जा रहे हैं।

(क) वोट की समानता- सहकारी समिति एक व्यक्ति एक वोट के सिद्धांत से शासित होती है। सदस्यों द्वारा लगायी गयी पूँजी की राशि से प्रभावित हुए बिना प्रत्येक सदस्य को वोट का समान अधिकार प्राप्त है।

(ख) सीमित दायित्व- सहकारी समिति के सदस्यों का दायित्व उनके द्वारा लगायी गयी पूँजी तक सीमित होता है। उनकी निजी संपत्तियों को व्यवसाय के ऋणों को चुकाने के लिए उपयोग में नहीं लाया जा सकता।

(ग) स्थायित्व- सदस्यों की मृत्यु, दिवालिया होना अथवा पागलपन सहकारी समिति की निरंतरता को प्रभावित नहीं करता है। समिति इसीलिए सदस्यता में आए परिवर्तन से प्रभावित हुए बिना कार्य करती रहती है।

(घ) मितव्ययी प्रचालन- सदस्य समिति को साधारणतया अवैतनिक सेवाएँ देते हैं। क्याेंकि ध्यान मध्यस्थ की समाप्ति पर ही केंद्रित होता है, इससे लागत में कमी आती है। अधिकांश ग्राहक समिति के सदस्य ही होते हैं। इसलिए डूबते ऋणों का जोखिम बहुत कम होता है।

(ङ) सरकारी सहायता- सहकारी समिति लोकतंत्र एवं धर्मनिर्पेक्षता का उदाहरण है। इसलिए इनको कम टैक्स, अनुदान, नीची ब्याज की दर के ऋण के रूप में सरकार से सहायता मिलती है।

(च) सरल स्थापना- सहकारी समिति कम से कम दस सदस्योें से प्रारंभ की जा सकती है। इसके पंजीकरण की प्रक्रिया सरल है तथा इसमें कानूनी औपचारिकताएँ कम हैं। इसकी स्थापना सहकारी समिति अधिनियम 1912 में दी गई व्यवस्था के अनुसार होती है।


प्राइस वॉटर हाउस कूपर्स पूर्व में एक साझेदारी फर्म थी

आज अनेक कंपनियों का उद्गम साझेदारी है। विश्व की शीर्ष लेखांकन फर्म। प्राइस वॉटर हाउस कूपर्स को 1998 में प्राइस वॉटर हाउस एवं कूपर्स एंड लैब्रेंड दो कंपनियों को मिलाकर बनाया गया था। प्रत्येक का इतिहास 150 वर्ष पुराना है तथा 1900 शताब्दी में ग्रेट ब्रिटेन से जुड़ा है। 1850 में सैमुअल लोवैल प्राइस ने लंदन में लेखांकन व्यवसाय स्थापित किया। 1865 में विलियम एच होलीलैंड एवं एडविन वॉटरहाउस के साथ मिलकर उसने साझेदारी फर्म बनाई। जैसे-जैसे फर्म बढ़ी पेशेवर कर्मचारियों में से आवश्यक योग्यता प्राप्त लोगों को साझेदारी में सम्मिलित कर लिया गया। 1980 के अंत तक प्राइस वॉटर हाउस एक महत्त्वपूर्ण लेखांकन फर्म बन चुकी थी।

(स्रोतः कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्राइस वॉटर हाउस कॉरपरेटर के अभिलेख।)

सीमाएँ

सहकारीसंगठन की निम्न सीमाएँ हैं-

(क) सीमित संसाधन- सहकारी समिति के संसाधन सदस्यों की पूंजी से बनते हैं, जिनके साधन सीमित होते हैं। निवेश पर लाभांश की नीची दर के कारण भी अधिक सदस्य नहीं बन पाते।

(ख) अक्षम प्रबंधन- सहकारी समितियां ऊँचा वेतन नहीं दे पाती, इसलिए उसको कुशल प्रबंधक नहीं मिल पाते। जो सदस्य स्वेच्छा से अवैतनिक सेवाएँ देते हैं वे साधारणतया पेशेवर योग्यता प्राप्त नहीं होते हैं, अतः वे प्रभावी प्रबंधन नहीं कर पाते।

(ग) गोपनीयता की कमी- सदस्यों की सभा में खुलकर चर्चा होती है तथा समिति अधिनियम की धारा (7) के अनुसार प्रत्येक सहकारी समिति पर प्रगट करने का दायित्व है, इसीलिए समिति प्रचालन के संबंध में गोपनीयता बनाए रखना कठिन होता है।

(घ) सरकारी नियंत्रण- सहकारी समिति को सरकार सुविधाएँ देती है, लेकिन बदले में उसे खातों के अंकेक्षण, खाते जमा करना आदि से संबंधित कई नियमों का पालन करना होता है। सहकारी संगठन के कार्य संचालन पर नियंत्रण के बहाने राज्य सहकारी विभाग का हस्तक्षेप होता है। इससे समिति के प्रचालन की स्वतन्त्रता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

(ङ) विचारों की भिन्नता- परस्पर विरोधी विचारों के कारण आंतरिक कलह उत्पन्न हो सकती है, जिससे निर्णय लेने में कठिनाई उत्पन्न होती है। कल्याण के प्रयोजन पर व्यक्तिगत स्वार्थ हावी हो सकतेे हैं। यदि कुछ सदस्य व्यक्तिगत लाभ को प्राथमिकता दें, तो अन्य सदस्य का हित पीछे छूट सकता है।

2.5.1 सहकारी समितियों के प्रकार

प्रचालन की प्रकृति के आधार पर सहकारी समितियाँ कई प्रकार की होती हैं, जिनका वर्णन नीचे किया गया हैः

(क) उपभोक्ता सहकारी समितियाँ- उपभोक्ता सहकारी समितियों का गठन उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए किया जाता है। इसके सदस्य वे उपभोक्ता होते हैं, जो बढ़िया गुणवत्ता वाली वस्तुएँ उचित मूल्य पर प्राप्त करना चाहते हैं। एेसी समिति का उद्देश्य मध्यस्थ को समाप्त करना होता है ताकि प्रचालन मितव्ययी हो। समिति थोक विक्रेता से वस्तुओं को सीधे बड़ी मात्रा में क्रय करती है तथा उन्हें अपने सदस्यों को बेच देती है। इस प्रकार बिचौलिए खत्म हो जाते हैं। यदि कुछ लाभ होता है तो वह सदस्यों के द्वारा क्रय के आधार पर बाँट दिया जाता है।

(ख) उत्पादक सहकारी समितियाँ- इन समितियाें की स्थापना छोटे उत्पादकों के हितों की रक्षा के लिए की जाती है। इसके सदस्य वे उत्पादक होते हैं, जो उपभोक्ताओं की माँग को पूरा करने के लिए वस्तुओं के उत्पादन हेतु आगत जुटाते हैं। समिति का उद्देश्य बड़े पूँजीपतियों के विरुद्ध खड़े होना तथा छोटे उत्पादकाें की सौदा करने की शक्ति को बढ़ाना है। यह सदस्यों को कच्चा माल, उपकरण एवं अन्य आगतों की आपूर्ति करती हैं तथा बिक्री के लिए उनके उत्पादों को भी खरीदती हैं। प्रचालन की प्रकृति के अनुसार लाभ को सदस्यों में उनके द्वारा उत्पादित अथवा विक्रय किए गए माल के आधार पर बाँट दिया जाता है।

(ग) विपणन सहकारी समितियाँ- विपणन समितियों का गठन छोटे उत्पादकों को उनके उत्पादों को बेचने में सहायता के लिए किया जाता है। इसके सदस्य वे उत्पादक होते हैं, जो अपने उत्पादों के उचित मूल्य वसूलना चाहते हैं। समिति का लक्ष्य मध्यस्थों को समाप्त करना तथा उत्पादों के लिए अनुकूल बाज़ार सुरक्षित कर सदस्यों की प्रतियोगी स्थिति में सुधार करना है। समिति प्रत्येक सदस्य के उत्पाद को एकत्रित करती है तथा उन्हें सर्वोत्तम मूल्य पर बेचने के लिए परिवहन, भंडारण, पैकेजिंग आदि विपणन कार्याें को करती है। लाभ को उत्पाद संघ के सदस्यों को योगदान के अनुपात में बाँट दिया जाता है।


‘‘सहकारिता संगठन का वह स्वरूप है, जिनमें कुछ लोग मानवीयता एवं समानता के आधार पर अपने आर्थिक हितों के प्रोत्साहन हेतु स्वेच्छा से संगठित होते हैं।’’

ई. एच. कैलवर्ट

‘‘सहकारिता संगठन एक समिति है, जिसका उद्देश्य सहकारिता के सिद्धांतों के अनुसार अपने सदस्यों के आर्थिक हितों को प्रोतसाहित करना है।’’

भारतीय सहकारिता अधिनियम-1912

(घ) किसान सहकारी समितियाँ- इन समितियों का गठन किसानों को उचित मूल्य पर आगत उपलब्ध कराकर उनके हितों की रक्षा के लिए किया जाता है। इसके सदस्य वे किसान होते हैं, जो मिलकर कृषि कार्यों को करना चाहते हैं। समिति का उद्देश्य बड़े पैमाने पर कृषि का लाभ उठाना एवं उत्पादकता को बढ़ाना है। एेसी समितियाँ .फसलों के उगाने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले बीज, खाद, मशीनरी एवं अन्य आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराती हैं। इससे न केवल किसानों की पैदावार तथा आय बढ़ती है बल्कि इससे खंडित भू-जोतों से संबंधित समस्याओं को हल करने में सहायता मिलती है।

(ङ) सहकारी ऋण समितियाँ- सहकारी ऋण समितियों की स्थापना सदस्यों को आसान शर्ताें पर सरलता से कर्ज उपलब्ध कराने के लिए की जाती है। इसके सदस्य वे व्यक्ति होते हैं, जो ऋणों के रूप में वित्तीय सहायता चाहते हैं। एेसी समितियों का लक्ष्य सदस्यों को साहूकारों के शोषण से संरक्षण प्रदान करना है जो ऋणों पर ऊँची दर से ब्याज लेते हैं। एेसी समितियाँ अपने सदस्यों को सदस्यों से एकत्रित की गई पूंजी एवं उनकी जमा में से नीची दर पर ऋण देते हैं।

(च) सहकारी आवास समितियाँ- सहकारी आवास समितियों की स्थापना सीमित आय के लोगों को उचित लागत पर मकान बनाने में सहायता के लिए की जाती है। इसके सदस्य वे व्यक्ति होते हैं जो उचित मूल्य पर रहने का स्थान प्राप्त करने के इच्छुक हैं। इसका उद्देश्य सदस्यों की आवासीय समस्याओं का समाधान करना है। इसके लिए वह मकान बनाती है तथा किश्तों में भुगतान की सुविधा भी देती है। ये समितियाँ फ्लैट बनाती हैं या फिर सदस्यों को प्लॅाट/ज़मीन देती हैं जिस पर वे स्वंय अपनी पसंद से भवन बना सकते हैं।


2.6 संयुक्त पूँजी कंपनी


कंपनी कुछ लोगों का एक एेसा संघ है, जिसका गठन किसी व्यवसाय को चलाने के लिए किया गया हो तथा जिसका अपने सदस्यों से हटकर वैधानिक अस्तित्व हो। कंपनी संगठन कंपनी अधिनियम 1956 द्वारा शासित होते हैं। कंपनी एक कृत्रिम व्यक्तित्व वाली संस्था है, जिसका अलग से एक वैधानिक अस्तित्व, शाश्वत उत्तराधिकार एवं सार्वमुद्रण है। कंपनी संगठन ‘कंपनी अधिनियम-2013’ द्वारा शासित होते हैं। कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 2(20) के अन्तर्गत दी गई परिभाषा के अनुसार कंपनी से आशय उन कंपनियों से है जिनका समामेलन कम्पनी अधिनियम 2013 में या इससे पूर्व किसी कंपनी अधिनियम के अन्तर्गत हुआ है।


सारणी 2.2 फॅार्च्यून ग्लोबल संगठनों के संघ में शामिल भारतीय कंपनियाँ

भारत में वरीयता कंपनी

भूमंडलीय श्रेणीक्रम

भारत में श्रेणीक्रम

आगम 
($मिलियन)

वेबसाइट

इंडियन अॉयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड

161

1

54,711

www.iocl.com

रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड

215

2

43,437

www.ril.com

टाटा मोटर्स लिमिटेड

226

3

42,092

www.tatamotors.com

भारतीय स्टेट बैंक

232

4

41,681

www.sbi.co.in

भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड

350

5

20,082

www.bharat petroleum.com

हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड

367

6

28,820

www.hindustanpetroleum.com

राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड

423

7

25,237

www.rajeshindia.com

अंशधारक कंपनी के स्वामी होते हैं, जबकि निदेशक मंडल प्रमुख प्रबंधकर्त्ता जिन्हेें अंशधारक चुनते हैं। साधारणतया कंपनी के स्वामियों का व्यवसाय पर परोक्ष रूप से नियंत्रण होता है। कंपनी की पूँजी छोटे-छोटे भागों में विभक्त होती है। जिन्हें अंश/शेयर कहते हैं जिन्हें एक अंशधारक किसी दूसरे व्यक्ति को स्वतंत्रता पूर्वक हस्तान्तरित कर सकता है (निजी कंपनी में नहीं)।

लक्षण

संयुक्त पूँजी कंपनी की परिभाषा उसके लक्षण स्पष्ट कर देती है। ये हैं-

(क) कृत्रिम व्यक्ति- कंपनी की रचना कानून द्वारा होती है तथा इसका अपने सदस्यों से अलग स्वतंत्र अस्तित्व होता है। एक प्राकृतिक व्यक्ति के समान कंपनी अपनी सम्पत्ति रख सकती है, ऋण ले सकती है, उधार ले सकती है, अनुबंध कर सकती है, दूसरों पर मुकदमा कर सकती है, दूसरे इस पर मुकदमा कर सकते हैं; लेकिन व्यक्तियों के समान यह सांस नहीं ले सकती, खा नहीं सकती, दौड़ नहीं सकती, बात नहीं कर सकती इसलिए इसे कृत्रिम व्यक्ति कहा जाता है।

(ख) पृथक वैधानिक अस्तित्व- समामेलन के दिन से ही कंपनी को एक अलग पहचान मिल जाती है, जो इसके सदस्यों से पृथक होती है। इसकी परिसंपत्तियाँ एवं इसकी देयताएं इसके स्वामियों की परिसंपत्तियों एवं देयताओं से पृथक होती हैं। कानून, व्यवसाय एवं इसके स्वामियों को एक नहीं मानता।

(ग) स्थापना- कंपनी की स्थापना अधिक समय लेने वाली, खर्चीली एवं जटिल प्रक्रिया है। इसके कार्य प्रारंभ से पहले कई प्रलेख तैयार करना तथा कई कानूनी आवश्यकताओं का पालन करना होता है। कंपनियों का समामेलन कंपनी अधिनियम 2013 अथवा किसी पूर्व कंपनी अधिनियम में होना अनिवार्य है। वे सभी कंपनियाँ जिनका समामेलन कंपनी अधिनियम, 1956 अथवा उससे पूर्व के कंपनी अधिनियम के अन्तर्गत हुआ है, उन्हें किसी भी कम्पनियों की सूची में सम्मिलित किया जाएगा।

(घ) शाश्वत उत्तराधिकार- कंपनी की रचना कानून द्वारा होती है तथा कानून ही इसका अंत कर सकता है। इसके अस्तित्व का अंत केवल तभी होगा जबकि इसको बंद करने की प्रक्रिया जिसे समापन कहते हैं, पूरी हो जाएगी। सदस्य आते रहेंगें और जाते रहेंगें लेकिन इसका अस्तित्व बना रहेगा।

(ङ) नियंत्रण- कंपनी के मामलों का प्रबंध एवं नियंत्रण निदेशक मण्डल करता है, जो कंपनी के व्यवसाय को चलाने के लिए उच्च प्रबंध अधिकारियों की नियुक्ति करता है। निदेशकों की स्थिति अत्यधिक महत्व की होती है, क्योंकि कंपनी के कार्यों के लिए वे अंशधारकों के प्रति सीधे उत्तरदायी होते हैं। वैसे अंशधारियाें को व्यवसाय के दिन-प्रतिदिन के संचालन में भाग लेने का अधिकार नहीं है।

(च) दायित्व- हानि होने की स्थिति में सदस्यों का दायित्व कंपनी में उनके द्वारा लगाई पूँजी तक सीमित होता है। लेनदार अपने दावों का निवारण करने के लिए केवल कंपनी की परिसंपत्तियों का ही उपयोग कर सकते हैं, क्योंकि ऋण का भार कंपनी पर है न कि इसके सदस्यों पर। सदस्यों से हानि में योगदान के लिए उनके हिस्से की अदत्त राशि तक के ही लिया जा सकता है उदाहरण के लिए अक्षय किसी कंपनी का अंशधारी है। उसके पास 10 रु के 2,000 अंश है जिनपर उसने 7 रु का भुगतान कर दिया है। यदि कंपनी को हानि होती है तो उसकी देनदारी 6,000 रु की होगी जो कि 2,000 अंशों पर 3 रु प्रति अंश से अदत्त राशि है। कंपनी की इससे और अधिक हानि के लिए वह उत्तरदायी नहीं होगा।


अमूल का अद्भुत सहकारिता उपक्रम

अमूल प्रतिदिन 21 लाख 20 हजार किसानों से (जिनमें अनेकों अनपढ़ हैं) 4,47,000 लीटर दूध इकट्ठा करता है। दूध को पैकिंग किए ब्रांड उत्पादों में परिवर्तित करता है तथा 6 करोड़ के मूल्य का माल देशभर में फैले 5,00,000 फुटकर विक्रय केंद्रों को पहुँचाता है।

इसकी शुरूआत दिसम्बर 1946 में किसानों के समूह द्वारा की गई जो स्वयं को मध्यस्थों के चंगुल से मुक्त कराना चाहते थे, बाज़ार में सीधी पहुँच द्वारा अपने परिश्रम का पूरा लाभ सुनिश्चित करना चाहते थे। आनन्द नामक गाँव में स्थित केयरा जिला दूध सहकारिता संघ (जो अब अमूल के नाम से प्रसिद्ध है) ने चमत्कारिक विस्तार किया। इसने अन्य दूध सहकारी समितियों को मिलाया तथा गुजरात में फैला इनका जाल, अब 21.2 लाख किसान, 10,411 ग्राम स्तर के दूध एकत्रण केन्द्र, 14 जिलास्तर के संयंत्राें को गुजरात सहकारी दुग्ध उत्पादन संघ की देख-रेख में संचालित कर रहा है। अमूल विभिन्न संघों द्वारा उत्पादित विभिन्न प्रकार के दुग्ध उत्पादों का एक साझा ब्रांड हैं। ये उत्पाद हैं- तरल दूध, पाउडर, मक्खन घी, पनीर, कोको उत्पाद, मिठाइयाँ, आइसक्रीम एवं गाढ़ा किया गया दूध। अमूल के कुछ उपब्रांड हैं, अमूल स्प्रे, अमूल लस्सी, अमूल्या एवं न्यूट्रामूल। खाद्य तेल उत्पादों का समूह धारा एवं लोकधारा के नाम से, जल-धारा नाम से पेयजल तथा फलों का रस सफल के नाम से बेचा जाता है।

(स्रोतः पंकज चन्द्रा के लेख पर आधारित। ‘‘Rediff.com’’, बिजनेस स्पेशल, सितंबर, 2005.)


‘पूर्व कंपनी अधिनियम’ से आशय निम्न में से किसी भी एक अधिनियम से है-

• भारतीय कंपनी अधिनियम, 1866 (1866 का 10) से पूर्व कंपनियों से संबंधित लागू अधिनियम।

• भारतीय कंपनी अधिनियम, 1866 (1866 का 10)

भारतीय कंपनी अधिनियम, 1882 (1882 का 6)

भारतीय कंपनी अधिनियम, 1913 (1913 का 6)

स्थानांतरित कंपनियाँ पंजीकरण अध्यादेश, 1942 (1942 का अध्यादेश 42)

• कंपनी अधिनियम, 1956

(छ) सार्वमुद्रण- एक कंपनी की सार्वमुद्रा हो भी सकती है और नहीं भी। यदि कंपनी की सार्वमुद्रा है तो वह कंपनी की प्रपत्रों (जैसे समझौते) पर अनिवार्य रूप से लगी होनी चाहिए। यदि कंपनी की सार्वमुद्रा न हो तो प्रपत्रों पर हस्ताक्षर करने वाला व्यक्ति संचालक मंडल के संकल्प से प्राधिकृत होना चाहिए।

(ज) जोखिम उठाना- कंपनी में हानि के जोखिम को सभी अंशधारक वहन करते हैं न कि एक या कुछ व्यक्ति जैसा एकल स्वामित्व अथवा साझेदारी में होता है। वित्तीय कठिनाई के समय सभी अंशधारकों को कंपनी की पूँजी में अपने-अपने हिस्से की सीमा तक ऋण में योगदान देना होता है। अतः हानि की जोखिम को बड़ी संख्या में अंश धारकों में बाँट दिया जाता है।

गुण

कंपनी के अनेक लाभ हैं जिनमें से कुछ की चर्चा नीचे की गई है-

(क) सीमित दायित्वः अंशधारक अपने अंशों की अदत्त राशि की सीमा तक उत्तरदायी होते हैं तथा ऋणों के निपटान के लिए कंपनी की परिसंपत्तियों का ही उपयोग किया जा सकता है। स्वामी की निजी संपत्ति हर प्रकार के प्रभार से मुक्त रहती है। इससे निवेशक का जोखिम कम हो जाता है।

(ख) हितों का हस्तांतरण- स्वामित्व के हस्तांतरण में सरलता कंपनी में निवेश का अतिरिक्त लाभ है, क्योंकि एक सार्वजनिक कंपनी के अंशों को बाज़ार में बेचा जा सकता है तथा आवश्यकता पड़ने पर इन्हें आसानी से रोकड़ में बदला जा सकता है। इससे निवेश में बाधा नहीं आती तथा निवेश की दृष्टि से कंपनी एक आकर्षक माध्यम बन जाता है।

(ग) स्थायी अस्तित्व- कंपनी का अपने सदस्यों से पृथक अस्तित्व होता है तथा इस पर उनकी मृत्यु, अवकाश ग्रहण, त्याग-पत्र, दिवालिया होना एवं पागलपन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कंपनी के सभी सदस्यों की मृत्यु पर भी कंपनी अस्तित्व मेें रहती है। इसका समापन कंपनी अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार ही हो सकता है।

(घ) विस्तार की संभावना- संगठन के एकल स्वामित्व और साझेदारी में तुलना करने पर एक कंपनी के पास वित्त के अधिक स्रोत हैं। एक कंपनी जनता से धन की व्यवस्था के साथ-साथ बैंक और वित्तिय संस्थानों से ऋण भी ले सकती है। इसमें विस्तार की व्यापक संभावना है। निवेशक का शेयर में पूँजी लगाने की ओर झुकाव रहता है, क्योंकि इसमें सीमित दायित्व, स्वामित्व का हस्तांतरण और अधिक लाभ प्राप्ति की संभावना होती है।

(ङ) पेशेवर प्रबंध- कंपनी, विशेषज्ञों एवं पेशेवर लोगों को ऊँचा वेतन देने में सक्षम होती है इसलिए वह विभिन्न क्षेत्रों में निपुण लोगों को नियुक्त कर सकती है। उसके प्रचालन के पैमाने के विस्तृत होने के कारण कार्य विभाजन भी संभव हो पाता है। प्रत्येक विभाग एक कार्य विशेष को करता है तथा उसका मुखिया एक निपुण प्रबंधक होता है। इससे कंपनी के निर्णय संतुलित होते हैं एवं उसका प्रचालन अधिक कुशल होता है।

सीमाएँ

कंपनी की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित हैं-

(क) निर्माण में जटिल- कंपनी के निर्माण के लिए अधिक समय, प्रयत्न एवं कानूनी आवश्यकताओं एवं निर्माण प्रक्रिया के विस्तृत ज्ञान की आवश्यकता होती है। अतः एकल व्यापारी एवं साझेदारी की तुलना में कंपनी का निर्माण अधिक जटिल होता है।

(ख) गोपनीयता की कमी- कंपनी अधिनियम के अनुसार एक सार्वजनिक कंपनी को समय-समय पर कंपनी रजिस्ट्रार के कार्यालय में अनेकों सूचनाएँ देनी होती हैं। ये समस्त सूचनाएँ जनसाधारण को उपलब्ध होती हैं।
इसीलिए कंपनी प्रचालन के संबंध में पूरी गोपनीयता रखना कठिन होता है।

(ग) अवैयक्तिक कार्य वातावरण- स्वामित्व एवं प्रबंध में पृथकता से एक एेसा वातावरण बन जाता है जिसमें कंपनी के अधिकारीगण न तो प्रयत्न करते हैं और न ही व्यक्तिगत रूप से रुचि लेते हैं। कंपनी के बड़े आकार के कारण स्वामी एवं उच्च प्रबंधकों के लिए कर्मचारी, ग्राहक एवं लेनदारों से व्यक्तिगत संपर्क रखना कठिन हो जाता है।

(घ) अनेकानेक नियम- कंपनी के कार्य संचालन के संबंध में कई कानूनी प्रावधान एवं बाध्यताएँ हैं। कंपनी पर अंकेक्षण, वोट देने, विवरण जमा करने एवं प्रलेख तैयार करने के संबंध में अनेकों प्रतिबंध होते हैं तथा इसे रजिस्ट्रार, सेबी, कंपनी लॉ बोर्ड जैसी अनेकों संस्थाओं से विभिन्न प्रमाण पत्र लेने होते हैं। इससे कंपनी की प्रचालन संबधी स्वतंत्रता कम हो जाती है तथा इन औपचारिकताओं में काफी समय, प्रयत्न एवं पैसा लगता है।

सारणी 2.3 निजी कंपनी और सार्वजनिक कंपनी में अंतर

क्र. सं.

आधार

सार्वजनिक कंपनी

निजी कंपनी

1.

सदस्य

न्यूनतम 7, अधिकतम कोई सीमा नहीं।

न्यूनतम 2, अधिकतम 200

2.

 

निदेशकों की न्यूनतम संख्या

3

 

2

 

3.

सदस्यों की अनुक्रमणिका

अनिवार्य है।

अनिवार्य नहीं है।

4.

अंशों का हस्तांतरण

हस्तांतरण पर कोई प्रतिबंध नहीं है।

हस्तांतरण पर प्रतिबंध होता है।

5.

अंशों के क्रय हेतु जनता को आमंत्रण

अंशों एवं ऋणपत्रों के क्रय हेतु जनता को आमंत्रित कर सकती है।

अंशों एवं ऋणपत्रों के क्रय के लिए जनता को आमंत्रित नहीं कर सकती।


(ङ) निर्णय में देरी- कंपनी का प्रबंध लोकतांत्रिक ढंग से निदेशक मंडल के माध्यम से होता है, जिसके बाद प्रबंधन के विभिन्न स्तर उच्च, मध्य एवं निम्न स्तर के प्रबंध आते हैं। विभिन्न प्रस्तावों के संप्रेषण एवं अनुमोदन की प्रक्रिया के कारण न केवल निर्णय लेने में बल्कि उन्हें क्रियान्वित करने में देरी होती है।

(च) अल्पतंत्रीय प्रबंधन- सिद्धांततः कंपनी एक लोकतांत्रिक संस्था है, जिसमें निदेशक मंडल स्वामियों यानि कि अंशधारकों के प्रतिनिधि होते हैं परन्तु व्यवहार में अधिकांश बड़े आकार के संगठनों में, जिनमें बड़ी संख्या में अंशधारी होते हैं, स्वामियों का कंपनी के नियंत्रण एवं उसके संचालन में बहुत कम हाथ होता है। क्योंकि अशंधारी पूरे देश में फैले होते हैं तथा उनका बहुत कम प्रतिशत साधारण सभा में उपस्थित होता है। परिणामस्वरूप निदेशक मंडल को अपने अधिकारों को प्रयोग करने की पूरी आज़ादी मिल जाती है तथा कभी-कभी वह अंशधारकों के हितों के विरुद्ध भी इसका उपयोग करते हैं। साधारणतया एक अंशधारक जो प्रबंध से संतुष्ट नहीं हैं के समक्ष अपने अंशों को बेच देने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता, क्योंकि निदेशकों को सभी प्रमुख निर्णयों को लेने का अधिकार होता है इसलिए कंपनी का शासन कुछ लोगों के हाथ में ही होता है।

(छ) हितों का टकराव- कंपनी के विभिन्न अंशधारकों के हितों में टकराव हो सकता है। उदाहरण के लिए कर्मचारियों की रुचि ऊंँचे वेतन में होगी, तो उपभोक्ता कम कीमत पर अच्छी गुणवत्ता वाली वस्तु एवं सेवाएँ चाहेंगे, वहीं अंशधारी चाहेंगेें कि उन्हें ऊँची दर से लाभांश मिले एवं उनके अंशों का वास्तविक मूल्य बढ़े। इन परस्पर विरोधी हितों को संतुष्ट करना कंपनी के प्रबंधन में अकसर समस्याओं को जन्म देता है।


भारत हैवी इलैक्ट्रीक्लस लि. - एक सार्वजनिक कंपनी की गुणवत्ता यात्रा

बी.एच.ई.एल. (भारत हैवी इलैक्ट्रीक्लस लि.) आज भारत की ऊर्जा आधारभूत ढाँचा संबंधी क्षेत्र का सबसे बड़ा इंजीनियरिंग एवं विनिर्माण उद्यम है। बी.एच.ई.एल. की स्थापना 40 वर्ष से अधिक पहले की गई थी। इसकी स्थापना के साथ भारत मेें देसी भारी विद्युत उपकरण उद्योग ने प्रवेश किया बी.एच.ई.एल. में न केवल हमारे स्वप्न को पूरा किया बल्कि उससे कहीं आगे निकल। यह कंपनी 1971-72 से लगातार लाभ कमा रही है तथा 1976-77 से लाभांश दे रही है। बी.एच.ई.एल. 30 मुख्य उत्पाद समूहों के 180 से अधिक उत्पादों का उत्पादन कर रही है तथा भारतीय अर्थव्यवस्था के मूल क्षेत्र जैसे- बिजली उत्पादन एवं संचारण, उद्योग, परिवहन, दूरसंचार, नवीनीकरण योग्य ऊर्जा आदि की आवश्यकताओं को पूरा कर रही है।

बी.एच.ई.एल. गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली (ISO-9001) पर्यावरण प्रबंध प्रणाली (ISO-14001) एवं पेशेवर स्वास्थ्य एवं सुरक्षा प्रबंध प्रणाली (OHSAS-18001) से प्रमाणित है तथा पूर्ण गुणवत्ता प्रबंध की दिशा में अग्रसर है।

बी.एच.ई.एल. की मुख्य उपलब्धियाँ निम्न हैं-

1. बी.एच.ई.एल. ने सुविधाएँ एवं औद्योगिक उपयोगकर्ताओं के लिए 90,000 से भी अधिक मैगावॅाट बिजली के उत्पादन के लिए उपकरण लगाए हैं।

2. 400 कि.वाट (ए.सी. व डी.सी.) तक के संचारण एवं वितरण के जाल में प्रचालन के लिए 2,25,000 मैगावाट के संचारण क्षमता एवं अन्य उपकरणों की आपूर्ति की।

3. बिजली परियोजनाओं, पैट्रोकैमीकल्स, रिफाइनरीज, इस्पात, अल्यूमीनियम, रासायनिक खाद, सीमेंट, सीमेंट संयंत्र आदि को 25000 से ऊपर ड्राइव नियंत्रण प्रणाली वाली मोटरों की आपूर्ति की है।

4. 12000 कि.मी. से भी अधिक रेलवे लाइन के जाल को विद्युत ट्रैक्शन एवं एसी/डीसी लोको की आपूर्ति की है।

5. पावरसंयंत्र एवं अन्य उद्योगों को 10 लाख वाल्वों की आपूर्ति की।

बी.एच.ई.एल. का दिव्य स्वप्न एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का इंजीनियरिंग उद्यम बनने का है, जिससे उसकी भागीदारी में बढ़ोतरी होगी। कंपनी अपनी इन आकांक्षाओं को मूर्तरूप देने एवं देश की वैश्विक स्तर पर कार्य करने की आशा को पूरा करने के लिए प्रयत्नशील है। बीएचईएल की प्रमुख शक्ति उसके कुशल और समर्पित 43,500 कर्मचारी हैं। सभी कर्मचारी को अपने विकास और भविष्य को उज्जवल बनाने का समान अवसर दिया जाता है। लगातार प्रशिक्षण और पुनप्रशिक्षण, भविष्य की योजना, अनुकूल कार्य संस्कृति और प्रबंध की भागीदारी इन सभी से प्रतिबद्ध और प्रेरित कार्यबल को स्थापित करके उत्पादकता, गुणवत्ता और जवाबदेही के मानक हैं।

स्त्रोतः बीएचईएल की वेबसाईट

2.6.1 कंपनियों के प्रकार

कंपनी दो प्रकार की हो सकती है निजी कंपनी एवं सार्वजनिक कंपनी। इनका विस्तार से वर्णन नीचे दिया गया है-


निजी कंपनी

निजी कंपनी से अभिप्राय उस कम्पनी से है-

(क) जो अपने सदस्यों पर अंशों के हस्तान्तरण पर रोक लगाती है;

(ख) जिसमें वर्तमान एवं भूतपूर्व कर्मचारियों को छोड़ कर न्यूनतम 2 एवं अधिकतम 200 सदस्य होते हैं; और

(ग) जो अंश पूंजी लगाने के लिए जनता को आमंत्रित नहीं करती हैं।

यदि कोई निजी कंपनी ऊपर दिए प्रावधानों में से किसी एक का भी उल्लघंन करती है तो यह निजी कंपनी नहीं रहेगी तथा इसको प्राप्त सभी छूटें एवं सुविधाओं से वंचित हो जाएगी। निजी कंपनी को प्राप्त विशेषाधिकारों से कुछ निम्नलिखित हैं-

(क) एक निजी कंपनी के निर्माण के लिए केवल दो सदस्यों की आवश्यकता होती है, जबकि सार्वजनिक कंपनी के निर्माण के लिए 7 व्यक्तियों की।

(ख) प्रविवरण पत्र जारी करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि निजी कंपनी के अंशों के अभिदान के लिए जनता को आमंत्रित नहीं किया जाता है।

कलम तलवार से अधिक शक्तिशाली होती है-

लक्जर राइटिंग इंस्ट्रयूमेंट्स प्रा. लि. का उदाहरण

1963 में देवेन्द्र कुमार जैन नाम के नौजवान ने लेखन सामग्री के क्षेत्र में नया अध्याय आरंभ किया। यह नौजवान मेहनत का धनी एवं महत्वाकांक्षी था। 19 वर्ष की कच्ची उम्र में उसने सदर बाज़ार में बिना किसी मशीन के सहायता के समुच्चय करने की छोटी दुकान शुरू की, जहाँ वह लक्जर राइटिंग इन्सट्रयूमेंट प्रा. लि. (LWIPL) के नाम से पेनों का उत्पादन करने लगा था।

लगातार तीन वर्ष तक ‘नम्बर वन राइटिंग इन्सट्रयूमेंट एक्सपोर्टर’ का पारितोषक LWIPL को दिया गया। इसी के परिणामस्वरूप LWIPL को चार अंतर्राष्ट्रीय ब्रांड- पाइलॉट, पेपरमेट, पार्कर एवं वाटरमैन के भारत में विनिर्माण एवं वितरण के एकमात्र अधिकार दिए गए हैं।

लक्जर राइटिंग इन्सट्रयूमेंट्स प्रा. लि. की आज लेखन उपकरण बाज़ार में 20 प्रतिशत से भी अधिक भागीदारी है, जो सबसे अधिक भागीदारी है। इसका आवर्त 150 करोड़ को भी पार कर गया है। आज की तारीख में लक्जर भारत का लेखनयन्त्रों का अग्रणी विनिर्माता एवं निर्यातक है। कुल निर्यात में इसका हिस्सा 15 प्रतिशत से भी ऊपर है तथा नई दिल्ली में चार एवं मुम्बई में तीन विनिर्माण इकाइयाँ हैं, 
जिनमें 600 से अधिक कर्मचारी हैं। बाज़ार के अधिकांश खण्डों मे यह अग्रणी है। यह विभिन्न उपयोगोें एवं आवश्यकताओं के लिए विभिन्न प्रकार के पेनों का उत्पादन एवं वितरण करता है।

(स्रोतः http://www.luxorparker.com)

(ग) न्यूनतम अभिदान की राशि प्राप्त किए बिना भी अंशों का आवंटन किया जा सकता है।

(घ) एक निजी कंपनी समामेलन प्रमाण-पत्र प्राप्त होते ही व्यवसाय प्रारंभ कर सकती है। जबकि सार्वजनिक को व्यवसाय प्रारंभ करने के लिए व्यापार प्रारंभ प्रमाण-पत्र की प्राप्ति तक रुकना होता है।

(ङ) एक निजी कंपनी में दो निदेशक होने चाहिए, जबकि सार्वजनिक कंपनी में कम से कम तीन निदेशकों की आवश्यकता होती है।

(च) निजी कंपनी को सदस्यों की अनुुक्रमणिका रखने की आवश्यकता नहीं होती है जबकि सार्वजनिक कंपनी के लिए यह आवश्यक है।

(छ) एक निजी कंपनी में निदेशकाें को ऋण देने पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं है। ऋण की स्वीकृति बिना सरकारी अनुमति के दी जा सकती है, जबकि सार्वजनिक कंपनी में इसके लिए सरकार की अनुमति आवश्यक है।

एक निजी कंपनी के लिए अपने नाम के ‘पीछे प्राइवेट लिमिटेड’ शब्द लगाना अनिवार्य है।


सार्वजनिक कंपनी

एक सार्वजनिक कंपनी वह कंपनी है जो निजी कंपनी नहीं है। भारतीय कंपनी अधिनियम के अनुसार एक सार्वजनिक कंपनी वह है-

(अ) जिसमें कम से कम 7 सदस्य हों तथा अधिकतम संख्या की कोई सीमा नहीं है;

(ब) जिसमें अंशों के हस्तांतरण पर कोई प्रतिबंध नहीं है।


तालिका 2.4 संगठन के स्वरूप के चुनाव को प्रभावित करने वाले कारक

चयन

अधिकतम लाभ

न्यूनतम लाभ

पूँजी की उपलब्धता

कंपनी

एकल स्वामित्व

स्थापना की लागत

एकल स्वामित्व

कंपनी

स्थापना आसान

एकल स्वामित्व

कंपनी

स्वामित्व का स्थांतरण

कंपनी

एकल स्वामित्व

प्रबंधन की योग्यता

कंपनी

एकल स्वामित्व

अंतर्नियम

एकल स्वामित्व

कंपनी

लचीलापन

एकल स्वामित्व

कंपनी

निरंतरता

कंपनी

एकल स्वामित्व

दायित्व

क्ांपनी

एकल स्वामित्व

(स) जो अपनी अंश पूँजी के अभिदान के लिए जनता को आमंत्रित कर सकती है तथा जन साधारण इसकी सार्वजनिक जमा में रुपया जमा करा सकते हैं।

यदि एक निजी कंपनी सार्वजनिक कंपनी की सहायक कंपनी है तो वह भी सार्वजनिक कंपनी के समान मानी जाएगी।


2.7 व्यावसायिक संगठन के स्वरूप का चयन

व्यावसायिक संगठनों के विभिन्न स्वरूपों का अध्ययन करने के पश्चात यह स्पष्ट ही है कि प्रत्येक स्वरूप के कुछ लाभ एवं कुछ हानियाँ हैं। उचित स्वरूप का चयन कई महत्त्वपूर्ण घटकों पर निर्भर करता है। इसीलिए यह आवश्यक हो जाता है कि उपयुक्त स्वरूप का चयन करते समय कुछ आधारभूत घटकों को ध्यान में रखा जाए। संगठन के चयन के महत्त्वपूर्ण निर्धारक घटकों को तालिका 2.4 में दर्शाया गया है तथा उनकी चर्चा नीचे की गई है-

(क) प्रारंभिक लागत- जहाँ तक व्यवसाय की प्रारंभिक लागत का संबंध है, एकल स्वामित्व सबसे कम खर्चीला सिद्ध होता है। तथापि इसकी कानूनी औपचारिकताएँ न्यूनतम होती हैं एवं कार्यकलापों का पैमाना छोटा। साझेदारी में भी सीमित पैमाने पर उद्यम के कारण कम कानूनी औपचारिकताओं एवं कम लागत का लाभ मिलता है। सहकारी समितियों एवं कंपनियों का पंजीयन अनिवार्य है। कंपनी के निर्माण की कानूनी प्रक्रिया लम्बी एवं खर्चीली होती है। जहाँ तक प्रारंभिक लागत का संबंध है एकल स्वामित्व पहली पसंद है, क्योंकि इस पर न्यूनतम व्यय आता है। इसके विपरीत कंपनी संगठन के निर्माण की प्रक्रिया जटिल है तथा इस पर अधिक व्यय होता है।

(ख) दायित्व- एकल स्वामित्व एवं साझेदारी में स्वामी का दायित्व असीमित होता है। अतः आवश्यकता पड़ने पर ऋणों का भुगतान स्वामियों की निजी परिसंपत्तियों से किया जाता है। संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय में केवल कर्ता का ही दायित्व असीमित होता है। सहकारी समितियों एवं कंपनियों में दायित्व सीमित होता है तथा लेनदारों को अपने दावों के भुगतान के लिए कंपनी की परिसंपत्तियों पर ही संतोष करना पड़ता है। निवेशकों के लिए कंपनी संगठन अधिक उचित है, क्योंकि इसमें जोखिम बंट जाता है।

(ग) निरंतरता- एकल स्वामित्व एवं साझेदारी फर्मों में इनके स्वामियों की मृत्यु, दिवालिया होने या पागल हो जाने जैसी घटनाओं से उनकी निरंतरता प्रभावित होती है। संयुक्त हिन्दू व्यवसायों, सहकारी समितियों एवं कंपनियों की निरंतरता पर ऊपर वर्णित घटनाओं का प्रभाव नहीं पड़ता है। यदि व्यवसाय को स्थायी ढाँचे की आवश्यकता है तो कंपनी अधिक उपयुक्त रहती है जबकि थोड़ी अवधि के उपक्रमों के लिए एकल स्वामित्व अथवा साझेदारी को प्राथमिकता दी जाती है।


तालिका 2.5 संगठनों के स्वरूप का तुलनात्मक विश्लेषण

तुलना के आधार

एकल स्वामित्व

साझेदारी

 

संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय

सहकारी समिति

 

कंपनी

 

निर्माण/स्थापना

 

न्यूनतम विधिक

औपचारिकताएँ,

सरल स्थापना

 

पंजीयन एेच्छिक, स्थापना सरल

 

विधियक औपचारिकताएँ कम, पंजीयन की आवश्यकता नहीं, स्थापना सरल

पंजीयन अनिवार्य विधियक औपचारिकताएं अधिक

पंजीयन अनिवार्य, निर्माण प्रक्रिया लंबी एवं खर्चीली

 

सदस्य

 

केवल स्वामी

 

न्यूनतम-2

अधिकतम-50

 

परिवार की संपत्ति के विभाजन के लिए कम से कम दो सदस्य, कोई अधिकतम सीमा नहीं

कम से कम 10 बालिग सदस्य कोई अधिकतम सीमा नहीं

 

निजी कंपनी न्यूनतम-2

सार्वजनिक कंपनी-7

निजी कंपनी अधिकतम-50

सार्वजनिक कंपनी-कोई सीमा नहीं

पूँजी

 

सीमित वित्त

 

सीमित, परंतु एकल स्वामित्व से अधिक

पूर्वजों की संपत्ति

 

सीमित

 

बड़ी मात्रा में वित्तीय संसाधन

दायित्व

 

असीमित

 

असीमित एवं संयुक्त

असीमित (कर्त्ता)

सीमित (अन्य सदस्य)

सीमित

 

सीमित

 

प्रबंध एवं नियंत्रण

 

स्वामी ही सभी निर्णय लेता है शीघ्र निर्णय

साझेदार निर्णय लेते हैं, सभी साझेदारो की स्वीकृति आवश्यक

कर्त्ता निर्णय लेता है

 

चुने गए प्रतिनिधि, अर्थात प्रबंध समिति निर्णय लेती है

स्वामी एवं प्रबंध पृथक

 

निरंतरता

 

व्यवसाय में अनिश्चितता व्यवसाय एवं स्वामी एक ही व्यक्ति

अधिक स्थायित्व लेकिन साझेदारों की स्थिति से प्रभावित

कर्ता की मृत्यु पर भी स्थायित्व आगे व्यवसाय चलता रहता है

पृथक वैधानिक अस्तित्व के कारण स्थायित्व

पृथक वैधानिक अस्तित्व के कारण स्थायित्व


(घ) प्रबंधन की योग्यता- एक एकल स्वामी के लिए प्रचालन के सभी क्षेत्रों में विशेषज्ञों की सेवाएँ प्राप्त करना कठिन होता है। जबकि अन्य प्रकार के संगठन जैसे- साझेदारी एवं कंपनी में इसकी संभावना अधिक है। श्रम विभाजन के कारण प्रबंधक कुछ क्षेत्र विशेषों में विशिष्टता प्राप्त कर लेते हैं, जिससे निर्णयों की श्रेष्ठता बढ़ जाती है। लेकिन लोगों में विचार भिन्नता के कारण टकराव की स्थिति भी पैदा हो सकती है। इसके अतिरिक्त यदि संगठन के कार्यों की प्रकृति जटिल है तथा जिनके लिए पेशेवर प्रबंध की आवश्यकता हो तो कंपनी को पसंद किया जाएगा। दूसरी ओर, जहाँ प्रचालन सरल है वहाँ एकल स्वामित्व अथवा साझेदारी अधिक उपयुक्त रहेगी, क्योंकि सीमित कौशल रखने वाले व्यक्ति भी एेसे व्यवसायों को चला सकते हैं। अतः व्यवसाय के कार्यों की प्रकृति एवं पेशेवर प्रबंध की आवश्यकता संगठन के स्वरूप के चयन को प्रभावित करेंगे।

(ङ) पूँजी की आवश्यकता- बड़ी मात्रा में पूंजी जुटाने के लिए कंपनी अधिक श्रेष्ठ स्थिति में होती है क्योंकि इसके लिए यह बड़ी संख्या में विनियोगकर्ताओं को अंशों का निर्गमन कर सकती है। साझेदारी फर्म को भी सभी साझेदारों के इकट्ठा संसाधनों का लाभ मिल जाता है। लेकिन एक एकल स्वामी के साधन सीमित होते हैं। इसीलिए यदि प्रचालन बड़े पैमाने पर है तो कंपनी अधिक उपयुक्त रहेगी जबकि मध्य एवं छोटे आकार के व्यवसायों के लिए साझेदारी या एकल स्वामित्व अधिक उपयुक्त रहेंगे। विस्तार के लिए कंपनी अधिक उचित रहेगी क्योंकि इसे बड़ी मात्रा में वित्त उपलब्ध हो जाता है।

(च) नियंत्रण- व्यवसाय प्रचालन पर सीधे नियंत्रण एवं निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार चाहिए तो एकल स्वामित्व को पसंद किया जाएगा। लेकिन यदि स्वामियों को नियंत्रण एवं निर्णय लेने में भागीदारी से परहेज नहीं है तो साझेदारी अथवा कंपनी को अपनाया जा सकता है। कंपनी में स्वामी एवं प्रबंधक पृथक-पृथक होते हैं।

(छ) व्यवसाय की प्रकृति- जहाँ ग्राहकों से सीधे संपर्क की आवश्यकता है जैसे कि परचून की दुकान वहाँ एकल स्वामित्व अधिक उपयुक्त रहेगा। बड़ी विनिर्माण इकाइयों के लिए जहाँ ग्राहक से सीधे व्यक्तिगत संपर्क की आवश्यकता नहीं है, कंपनी स्वरूप को अपनाया जा सकता है। इसी प्रकार से जहाँ पेशेवर सेवाओं की आवश्यकता होती है वहाँ साझेदारी अधिक उपयुक्त रहती है।

अंत में कह सकते हैं कि ऊपर जितने घटकों की चर्चा की गई है वे सब एक दूसरे से संबंधित है। पूंजी का योगदान एवं जोखिम, व्यवसाय के आकार एवं प्रकृति के अनुसार बदलते हैं। अतः व्यवसाय संगठन का जो स्वरूप दायित्व की दृष्टि से छोटे पैमाने पर व्यवसाय चलाने पर उपयुक्त हों वही बड़े पैमाने पर व्यवसाय चलाने के लिए अनुपयुक्त सिद्ध होगा। इसलिए उपयुक्त संगठन स्वरूप चुनने के पहले सभी प्रासंगिक घटकों को ध्यान में रखना चाहिए।


मुख्य शब्दावली


एकल स्वामित्व                              साझेदारी                               संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय

सहकारी संगठन                            संयुक्त पूँजी कम्पनी


सारांश


व्यवसाय संगठन के विभिन्न स्वरूप निम्न हैं- 1. एकल स्वामित्व 2. संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय 3. साझेदारी 4. सहकारी समिति तथा 5. संयुक्त पूँजी कंपनी

एकल स्वामित्व-

एकल स्वामित्व उस व्यवसाय को कहते हैं, जिसका स्वामित्व, प्रबंधन एवं नियंत्रण एक ही व्यक्ति के हाथ में होता है तथा वही संपूर्ण लाभ पाने का अधिकारी तथा हानि के लिए उत्तरदायी होता है। एकल स्वामित्व के कई लाभ हैं। इनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण लाभ निम्न हैं- 1. शीर्घ निर्णय 2. सूचना की गोपनीयता 3. प्रत्यक्ष प्रोत्साहन 4. उपलब्धि का अहसास 5. स्थापित करने एवं बंद करने में सुगमता। उपरोक्त लाभों के होते हुए भी एकल स्वामित्व की भी कुछ सीमाएँ हैं। इनमें से कुछ प्रमुख सीमाएँ इस प्रकार हैं- 1. सीमित संसाधन 2. व्यावसायिक इकाई का सीमित जीवनकाल 3. असीमित दायित्व 3. सीमित प्रबंध योग्यता।

संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय-

इसका अभिप्राय उस व्यवसाय से है जिसका स्वामित्व एवं संचालन एक संयुक्त हिन्दू परिवार के सदस्य करते हैं। इसका प्रशासन हिन्दू कानून के द्वारा होता है। व्यवसाय पर परिवार के मुखिया का नियंत्रण रहता है। वह परिवार सबसे बड़ी आयु का व्यक्ति होता है एवं ‘कर्त्ता’ कहलाता है। संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय के लाभ निम्नलिखित हैं- 1. प्रभावशाली नियंत्रण 2. स्थायित्व 3. सदस्यों का सीमित दायित्व 4. निष्ठा एवं सहयोग में वृद्धि। संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय की कुछ सीमाएँ नीचे दी गई हैं- 1. सीमित साधन 2. कर्ता का असीमित दायित्व 3. कर्ता का प्रभुत्व 4. सीमित प्रबंध कौशल।

साझेदारी

साझेदारी भारी पूँजी निवेश, विभिन्न प्रकार के कौशल एवं जोखिम में भागीदारी की आवश्कताओं को पूरा करती है। साझेदारी फर्म के लाभ निम्न हैं- 1. स्थापना एवं समापन सरल 2. संतुलित निर्णय 3. अधिक कोष 4. जोखिम को बाँटना 5. गोपनीयता। साझेदारी फर्म की निम्न सीमाएँ हैं-

1. असीमित दायित्व 2. सीमित साधन 3. परस्पर विरोध की संभावना 4. निरंतरता की कमी 5. जनसाधारण के विश्वास की कमी। साझेदारी फर्म में विभिन्न प्रकार के साझेदार हो सकते है- 1. सक्रिय साझेदार 2. सुप्त अथवा निष्क्रिय साझेदार 3. गुप्त साझेदार 4. नाममात्र का साझेदार 5. विबन्धन साझेदार (इसटॉपेल) 6. प्रतिनिधी साझेदार (होल्डिंग आऊट)।

अवधि के आधार पर साझेदारी दो प्रकार की हो सकती हैः 1. एेच्छिक साझेदारी 2. विशिष्ट साझेदारी। देयता के आधार पर भी साझेदारी के दो प्रकार हैं- 1. सीमित दायित्व वाली एवं 2. असीमित दायित्व वाली।

सहकारी संगठन

सहकारी समिति उन लोगों का स्वैच्छिक संगठन है जो सदस्यों के कल्याण के लिए एकजुट हुए हैं। सहकारी समिति के सदस्यों को अनेक लाभ होते हैं- 1. वोट की समानता 2. सीमित दायित्व 3. स्थायित्व 4. मितव्ययी प्रचालन 5. सरकारी सहायता 6. सरल स्थापना। सहकारी संगठन की निम्न सीमाएँ हैं- 1. सीमित संसाधन 2. अक्षम प्रबंधन 3. गोपनीयता की कमी 4. सरकारी नियंत्रण 5. विचारों की भिन्नता। प्रचालन की प्रकृति के आधार पर सहकारी समितियाँ कई प्रकार की होती हैं जिनका वर्णन नीचे किया गया हैः 1. उपभोक्ता सहकारी समितियां 2. उत्पादक सहकारी समितियाँ 3. विपणन सहकारी समितियाँ 4. किसान सहकारी समितियाँ 5. सहकारी ऋण समितियाँ 6. सहकारी आवास समितियाँ।

कंपनी-

कंपनी एक कृत्रिम व्यक्तित्व वाली संस्था है, जिसका अलग से एक वैधानिक अस्तित्व, शाश्वत उत्तराधिकार एवं सार्वमुद्रण है। कंपनी के अनेक लाभ हैं जिनमें से कुछ की चर्चा नीचे की गई है-

1. सीमित दायित्व 2. हितों का हस्तांतरण 3. स्थायी अस्तित्व 4. विस्तार की संभावना 5. पेशेवर प्रबंध। कंपनी की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित हैं- 1. निर्माण में जटिल 2. गोपनीयता की कमी 3. वैयक्तिक कार्य वातावरण 4. अनेकानेक नियम 5. निर्णय में देरी 6. अल्पतंत्रीय प्रबंधन 7. हितोें का टकराव। कंपनी दो प्रकार की हो सकती है निजी कंपनी एवं सार्वजनिक कंपनी। निजी कंपनी से अभिप्राय उस कंपनी से है, जो अपने सदस्यों पर अंशों के हस्तांतरण पर रोक लगाती है। जो अंश पूंजी लगाने के लिए जनता को आमंत्रित नहीं करती हैं। एक सार्वजनिक कंपनी वह कंपनी है जो निजी कंपनी नहीं है। जो अपनी अंश पूँजी के अभिदान के लिए जनता को आमंत्रित कर सकती है तथा जन साधारण इसकी सार्वजनिक जमा में रुपया जमा करा सकते हैं। जिसमें अंशों के हस्तांतरण पर कोई प्रतिबंध नहीं है।

व्यावसायिक संगठन के स्वरूप का चयन-

उचित स्वरूप का चयन कई महत्त्वपूर्ण घटकों पर निर्भर करता है। उपयुक्त स्वरूप का चयन करते समय कुछ आधारभूत घटकों को ध्यान में रखा जाए- 1. प्रारंभिक लागत 2. दायित्व 3. निरंतरता 4. प्रबंधन की योग्यता 5. पूँजी की आवश्यकता 5. पूँजी की आवश्यकता 6. नियंत्रण 7. व्यवसाय की प्रकृति।


अभ्यास

बहु-विकल्पीय प्रश्न

सही उत्तर पर निशान (  ✔) लगाइए।

1. ढाँचे, जिसमें स्वामित्व एवं प्रबंध पृथक-पृथक होते हैं, वह ----- कहलाता है।

(क) एकल स्वामित्व                                            (ख) साझेदारी

(ग) कंपनी                                                          (घ) सभी व्यावसायिक संगठन

2. संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय में कर्ता का दायित्व ---- होता है।

(क) सीमित

(ख) असीमित

(ग) ऋणों के लिए कोई दायित्व नहीं

(घ) संयुक्त

3. सहकारी समितियों में जिस सिद्धांत का अनुपालन किया जाता है, वह है ----- ।

(क) एक अंश एक वोट                                         (ख) एक व्यक्ति एक वोट

(ग) वोट नहीं                                                       (घ) बहु (अनेक) वोट

4. संयुक्त पूँजी कंपनी के निदेशक मंडल का चुनाव ----- के द्वारा होता है।

(क) सामान्य जन                                                 (ख) सरकारी संस्थाएं

(ग) अंशधारक                                                     (घ) कर्मचारी

5. लाभ का बँटवारा आवश्यक नहीं। यह कथन ----- से संबंधित है।

(क) साझेदारी                                                     (ख) संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय

(ग) एकल स्वामित्व                                              (घ) कंपनी

6. कंपनी की पूंँजी विभिन्न भागों में विभक्त होती है, जिसका प्रत्येक भाग कहलाता है-

(क) लाभांश                                                          (ख) लाभ

(ग) ब्याज                                                             (घ) अंश

7. संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय के मुखिया को ----- कहते हैं।

(क) स्वामी                                                           (ख) निदेशक

(ग) कर्ता                                                              (घ) प्रबंधक

8. सदस्यों का उचित-मूल्य पर आवासीय स्थान उपलब्ध कराना ----- का उद्देश्य है।

(क) उत्पादक सहकारी समिति                             (ख) उपभोक्ता सहकारी समिति

(ग) आवास सहकारी समिति                                 (घ) ऋण सहकारी समिति

9. एक साझेदार जिसके फर्म से संबंध के बारे में जनता अपरिचित है, ----- कहलाता है।

(क) सक्रिय साझेदार                                            (ख) सुषुप्त साझेदार

(ग) नाम-मात्र साझेदार                                         (घ) गुप्त साझेदार

लघु उत्तरीय प्रश्न

1. संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय में नाबालिग की स्थिति की साझेदारी फर्म में उसकी स्थिति से तुलना कीजिए।

2. यदि पंजीयन एेच्छिक है तो साझेदारी फर्म स्वयं को पंजीकृत कराने के लिए वैधानिक औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए क्यों इच्छुक रहती हैं? समझाइए।

3. एक निजी कंपनी को उपलब्ध महत्त्वपूर्ण सुविधाओं को बताइए।

4. सहकारी समिति किस प्रकार जनतांत्रिक एवं धर्म-निरपेक्षता का आदर्श प्रस्तुत करती है?

5. ‘प्रदर्शन द्वारा साझेदार’ का क्या अर्थ है? समझाइए।

6. 50 शब्दों में संक्षिप्त टिप्पणी करें।

(क) कर्ता                                                               (ख) सार्वमुद्रा

(ग) कृत्रिम व्यक्ति                                                   (घ) शाश्वत उत्तराधिकार

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1. एकल स्वामित्व फर्म से आप क्या समझते हैं? इसके गुणों एवं सीमाओं को समझाइए।

2. साझेदारी के विभिन्न प्रकारों में व्यावसायिक स्वामित्व तुलनात्मक रूप से लोकप्रिय क्यों नहीं है? इसके गुणों एवं सीमाओं को समझाइए।

3. एक उपयुक्त संगठन का स्वरूप चुनना क्यों महत्त्वपूर्ण है? उन घटकों का विवेचन कीजिए जो संगठन के किसी खास स्वरूप के चुनाव में सहायक होते हैं।

4. सहकारी संगठन स्वरूप के लक्षण, गुण एवं सीमाओं का विवेचन कीजिए। विभिन्न प्रकार की सहकारी समितियों को भी संक्षेप में समझाइए।

5. एक संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय एवं साझेदारी में अंतर कीजिए।

6. आकार एवं संसाधनों की सीमाओं के होते हुए भी लोग एकल व्यवसाय को अन्य संगठनों की तुलना में प्राथमिकता क्यों देते हैं?

व्यावहारिक प्रश्न

1. किस संगठन स्वरूप में एक स्वामी के व्यापारिक करार अन्य स्वामियों को भी बाध्य कर देते हैं। उत्तर के समर्थन में कारण बताइए।

2. एक संगठन की व्यावसायिक परिसंपत्तियों की राशि 50,000 रुपए है लेकिन अदत्त देय राशि 80,000 रुपए है। लेनदार निम्न स्थितियों में क्या कार्यवाही कर सकते हैं-

(क) यदि संगठन एक एकल स्वामित्व इकाई है।

(ऽ) यदि एक संगठन साझेदारी फर्म है जिसमें एन्थोनी और अकबर साझेदार हैं लेनदार इन दो में से किस साझेदार के पास अपनी लेनदारी के भुगतान हेतु संपर्क साध सकते हैं। कारण सहित समझाइए।

3. किरन एक एकल व्यवसायी है। पिछले दशक में उसका व्यवसाय पड़ोस के एक कोने की दुकान से, जिसमें वह नकली आभूषण, बैग, बालों की क्लिप, नेलपॉलिश आदि बेचती थी, से बढ़ कर तीन शाखाओं वाली फुटकर शृृंखला में बदल गया है। यद्यपि वह सभी शाखाओं के विभिन्न कार्यों को स्वयं देखती हैं परंतु अब सोच रही है कि व्यवसाय के बेहतर प्रबंधन के लिए उसे एक कंपनी का निर्माण करना चाहिए या नहीं। उसकी योजना देश के अन्य भागों में शाखाएँ खोलने की भी है।

(क) एकल स्वामी बने रहने के दो लाभों को समझाइए।

(ऽ) संयुक्त पूँजी कंपनी में परिवर्तित करने के दो लाभ बताइए।

(ग) राष्ट्रीय स्तर पर व्यवसाय करने के निर्णय पर संगठन के स्वरूप के चुनाव में उसकी भूमिका क्या होगी?

(घ) कंपनी को रूप व्यवसाय करने के लिए उसे किन-किन कानूनी औपचारिकताओं को पूरा करना होगा?

परियोजना कार्य

कक्षा में विद्यार्थियों को कई टीमों में विभक्त कर निम्न पर कार्य करने लिए बाँट दीजिए-

(क) पड़ोस की किन्ही पाँच परचून/स्टेशनरी की दुकानों के अध्ययन हेतु;

(ऽ) संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय के कार्य संचालन के अध्ययन हेतु;

(ग) किन्हीं पाँच साझेदारी फर्मों के अध्ययन हेत़ु;

(घ) अपने क्षेत्र की सहकारी समितियों की विचारधारा एवं कार्य संचालन के अध्ययन हेतु-

(ङ) किन्हीं पाँच कंपनियों (जिसमें निजी एवं सार्वजनिक दोनों प्रकार की कंपनियाँ शामिल हों) के अध्ययन हेतु।

टिप्पणियाँ

1. निम्न में से कुछ पक्षोें के उपर्युक्त अध्ययनों हेतु विद्यार्थियों को कार्य सौंपा जा सकता हैः

व्यवसाय की प्रकृति, निवेशित पूंजी के आधार पर मापा गया व्यवसाय का आकार, कार्यरत व्यक्तियों की संख्या अथवा विक्रय आवर्तन, समस्याएँ, प्रोत्साहन, एकल स्वरूप विशेष के चयन का कारण, निर्णय लेने का ढंग, विस्तार की इच्छा एवं आवश्यक ध्यान रखने योग्य बातें, स्वरूप की उपयोगिता इत्यादि।

2. विद्यार्थियों की विभिन्न टीमों को प्रोत्साहित करें कि वह अपने अध्ययन के परिणामों एवं निष्कर्षों को परियोजना प्रतिवेदन एवं मल्टीमीडिया के रूप में प्रस्तुत करें।

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