भाग 1 व्यवसाय के आधार अध्याय 1 व्यवसाय की प्रवृफति एवं उद्देश्य अिागम उद्देश्य इस अध्याय के अध्ययन के पश्चात् आपः ऽ व्यवसाय की अवधारणा व उसकी विशेषताओं की व्याख्या कर सवेंफगेऋ ऽ व्यवसाय, पेशा तथा रोजगार के विश्िाष्ट लक्षणों की तुलना कर सवेंफगेऋ ऽ व्यावसायिक ियाओं का वगीर्करण कर सवेंफगे तथा उद्योग एवं वाण्िाज्य का अथर् स्पष्ट कर सवेंफगेऋ ऽ विभ्िान्न प्रकार के उद्योगों को बता सवेंफगेऋ ऽ वाण्िाज्य से संबंिात िया - कलापों को समझा सवेंफगेऋ ऽ व्यवसाय के उद्देश्यों का विश्लेषण कर सवंेफगेऋ ऽ व्यावसायिक जोख्िामों एवं उनके कारणों की प्रवृफति का वणर्न कर सवेंफगेऋ एवं ऽ व्यवसाय प्रारंभ करते समय जिन मूलभूत कारकों को ध्यान में रखना चाहिए, उनकी विवेचना कर सवेंफगे। इमरान, मनप्रीत, जोसेपफ तथा पि्रयंका कक्षा दस में सहपाठी रहे हैं। उनकी परीक्षाएँ समाप्त होने के बाद वे रुचिका के घर में इकट्टòे होते हैं, जो उन सभी की मित्रा है। जब वे अपनी परीक्षाओं के दिनों के अनुभवों को आपस में बांट रहे थे, तभी रुचिका के पिताजी श्री रघुराज चैधरी उनका हाल - चाल पूछते हैं। वे प्रत्येक से जानना चाहते हैं कि उनकी भावी योजना क्या है। लेकिन कोइर् भी सुनिश्िचत उत्तर नहीं दे पाता। श्री रघुराज स्वयं में एक व्यवसायी हैं, वे उन्हें व्यवसाय को चुनने की सलाह देते हैं जो एक आशाजनक एवं चुनौतीपूणर् जीवनवृिा है। जोसेपफ इस विचार से उत्तेजित होकर कहता है कि ‘‘हाँ व्यवसाय वास्तव में ढे़र सारा धन कमाने के लिए बहुत अच्छा है। यहाँ तक कि इंजीनियर तथा डाॅक्टर बनने पर भी इतना धन नहीं कमाया जा सकता है।य् श्री रघुराज अपना मत जताते हुए कहते हैं ‘‘भइर्, व्यवसाय में धन के अत्िारिक्त भी बहुत वुफछ है।’’ उसके बाद वे अन्य मेहमानों में व्यस्त हो जाते हैं। यद्यपि वे चारों सहपाठी परस्पर बहुत से प्रश्न उठाते हैं, लेकिन उन्हें कोइर् भी स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता। वे सोचने लगते हैं कि वास्तव में व्यवसाय है क्या? धन के अतिरिक्त व्यवसाय में और क्या है? अव्यवसायी ियाओं से व्यवसाय किस प्रकार भ्िान्न है? एक व्यवसाय को प्रारंभ करने के लिए क्या - क्या आवश्यक है? आदि, आदि। 1.1 परिचय जाहिर है कि चारों सहपाठियों का वातार्लाप व्यवसाय के अथर्, प्रवृफति एवं उद्देश्य पर वेंफदि्रत था। सभी मानव समयानुसार अपनी आवश्यकताओं की पूतिर् हेतु विभ्िान्न प्रकार की वस्तुओं एवं सेवाओं की इच्छा अनुभव करते हैं। वस्तुओं एवं सेवाओं से आवश्यकताओं की पूतिर् हेतु वुफछ लोग उन चीजों का उत्पादन एवं विक्रय करने लगे जिनकी दूसरों को जरूरत हो। आज सभी आधुनिक समाजों में व्यवसाय एक मुख्य आथ्िार्क िया है, जिसका संबंध मनुष्यों की आवश्यकतानुसार वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन एवं विक्रय करना है। विभ्िान्न आथ्िार्क ियाओं का उद्देश्य मनुष्यों की वस्तुओं एवं सेवाओं की मंाग को पूरा करके धन कमाना है। व्यवसाय हमारे जीवन का वेंफद्रबिंदु है। यद्यपि हमारा जीवन आधुनिक समाज की बहुत - सी संस्थाओं, जैसे - विद्यालय, महाविद्यालय, औषधालय, राजनैतिक दल तथा धामिर्क संस्थाओं से प्रभावित होता है, लेकिन रोजमरार् के जीवन में मुख्य प्रभाव व्यवसाय का ही होता है। इसलिए यह महत्त्वपूणर् हो जाता है कि व्यवसाय की अवधारणा, प्रवृफति एवं उद्देश्य को पहले समझ लें। 1.2 व्यवसाय की अवधारणा व्यवसाय शब्द की व्युत्पिा व्यस्त रहने से हुइर् है। अतः व्यवसाय का अथर् व्यस्त रहना है, तथापि विशेष सदंभर् में, व्यवसाय का अथर् ऐसे किसी भी धंधे से है, जिसमें लाभाजर्न हेतु व्यक्ित विभ्िान्न प्रकार की ियाओं में नियमित रूप से संलग्न रहते हैं। वे ियाएँ अन्य लोगों की आवश्यकताओं की संतुष्िट हेतु वस्तुओं के उत्पादन, क्रय - विक्रय या विनिमय और सेवाओं की आपूतिर् से संबंिात हो सकती हंै। प्रत्येक समाज में मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की संतुष्िट हेतु अनेवफों प्रकार की ियाएँ करते हैं। ये ियाएँ विस्तृत रूप से दो समूहों में वगीर्वृफत की जा सकती हैं - आथ्िार्क एवं अनाथ्िार्क। आथ्िार्क ियाएँ, वे ियाएँ हैं, जिनके द्वारा हम अपने जीवन - यापन के लिए धन कमाते हैं, जबकि अनाथ्िार्क ियाएँ प्यारवश, सहानुभूति के लिए, भावुकतावश या देश भक्ित आदि के लिए की जाती हैं। उदाहरण के लिए, एक श्रमिक द्वारा पैफक्टरी में काम करना, एक डाॅक्टर द्वारा अपने क्िलनिक में कायर् करना, एक प्रबंधक द्वारा अपने कायार्लय में काम करना तथा एक श्िाक्षक का विद्यालय में अध्यापन कायर् करना आदि उदाहरणों में, सभी अपनी जीविका उपाजर्न के लिए कायर् कर रहे हैं। अतः ये सभी आथ्िार्क ियाओं में संलग्न हैं। दूसरी ओर एक गृहणी द्वारा अपने परिवार के लिए भोजन पकाना या एक वृ( व्यक्ित को सड़क पार कराने में एक बालक द्वारा सहायता करना अनाथ्िार्क ियाएँ हैं, क्योंकि ये ियाएँ या तो प्रेमवश या सहानुभूतिवश की जा रही हैं। आथ्िार्क ियाओं को भी आगे तीन श्रेण्िायों में विभाजित किया जा सकता है, जैसे - व्यवसाय, धंधा या रोजगार। अतः व्यवसाय को एक आथ्िार्क िया के रूप में परिभाष्िात किया जा सकता है, जिसमें वस्तुओं का उत्पादन व विक्रय तथा सेवाओं को प्रदान करना सम्िमलित है। उपरोक्त ियाओं का मुख्य उद्देश्य समाज में मनुष्यों की आवश्यकताओं की पूतिर् करके धन कमाना है। व्यवसाय अध्ययन 1.3 व्यावसायिक ियाओं की विशेषताएँ समाज में व्यावसायिक ियाएँ अन्य ियाओं से किस प्रकार भ्िान्न हैं। यह समझने के लिए व्यवसाय की प्रवृफति अथवा इसके आधारभूत लक्षणों को इसकी अद्वितीय विशेषताओं के सदंभर् में स्पष्ट करना चाहिए, जो निम्नलिख्िात हैंः ;कद्ध यह एक आथ्िार्क िया हैः व्यवसाय को एक आथ्िार्क िया समझा जाता है, क्योंकि यह लाभ कमाने के उद्देश्य से या जीवन - यापन के लिए किया जाता है, न कि प्यार के कारण अथवा मोह, सहानुभूति या किसी अन्य भावुकता के कारण। ;खद्ध वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन अथवा उनकी प्राप्ितः वस्तुओं को उपभोक्ताओं के उपभोग के लिए सुलभ कराने से पूवर् व्यावसायिक इकाइर्यों द्वारा या तो इनका उत्पादन किया जाता है या पिफर इनका क्रय किया जाता है। अतः प्रत्येक व्यावसायिक इकाइर् जिन वस्तुओं में व्यापार करती है उनका या तो स्वयं उत्पादन करती है या आपूतिर् करने के लिए उत्पादकों से प्राप्त करती है। वस्तुएँ या तो उपभोक्ता वस्तुएँ हो सकती हैं जो प्रतिदिन काम आती हैं, जैसे - चीनी, पैन, नोट बुक या पूंजीगत वस्तुएँ जैसे - मशीन, पफनीर्चर आदि। सेवाओं में यातायात, बैंक तथा विद्युत की आपूतिर् आदि को सम्िमलित किया जा सकता है, जो उपभोक्ताओं को सुविधाओं के रूप में सुलभ करायी जाती हैं। ;गद्ध मानवीय आवश्यकताओं की संतुष्िट के लिए वस्तुओं और सेवाओं का विक्रय या विनिमयः प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से व्यवसाय में मूल्य के बदले वस्तुओं और सेवाओं का हस्तांतरण व विनिमय सम्िमलित है। यदि वस्तुओं का उत्पादन, उत्पादक द्वारा स्वयं के उपभोग के लिए किया जाता है तो ऐसी िया व्यावसायिक िया नहीं कहलाती है। घर में परिवार के सदस्यों के लिए भोजन पकाना व्यवसाय नहीं हैं, लेकिन किसी रेस्तराँ में अन्य व्यक्ितयों को बेचने के लिए भोजन पकाना व्यवसाय है। इस प्रकार व्यवसाय की यह एक आवश्यक विशेषता है कि वस्तुओं या सेवाओं का क्रय - विक्रय या विनिमय होना चाहिए। ;घद्ध नियमित रूप से वस्तुओं और सेवाओं का विनिमयः व्यवसाय की एक विशेषता यह है कि इसमें नियमित रूप से वस्तुओं और सेवाओं का लेन - देन होता है। एक बार का क्रय या विक्रय साधारणतः व्यवसाय नहीं कहलाता। उदाहरणाथर्, यदि कोइर् व्यक्ित अपना घरेलू रेडियो चाहे लाभ पर ही बेचे व्यावसायिक िया नहीं कहलाएगी, लेकिन यदि वह अपनी दुकान पर या घर से नियमित रूप से रेडियो बेचता है तो यह एक व्यावसायिक िया कहलाएगी। ;घद्ध लाभ अजर्नः प्रत्येक व्यावसायिक िया लाभ के रूप में आय - अजिर्त करने के उद्देश्य से की जाती है। बिना लाभ कमाए कोइर् भी व्यवसाय लंबे समय तक कायर्रत नहीं रह सकता। इसीलिए व्यवसायकतार् व्यवसाय का विक्रय की मात्रा बढ़ाकर या लागत कम करके अिाकतम लाभ कमाने का हर संभव प्रयास करता है। ;चद्ध प्रतिपफल की अनिश्िचतताः प्रतिपफल की अनिश्िचतता से तात्पयर् व्यावसायिक ियाओं के संचालन से एक निश्िचत समय में होने वाले लाभ की अस्िथरता से है। प्रत्येक व्यवसाय में परिचालन हेतु वुफछ धन ;पूंजीद्ध के विनियोग की आवश्यकता होती है। व्यवसाय में विनियोजित पूंजी पर लाभ पाने की आशा तो होती है, लेकिन यह निश्िचत नहीं होता उद्यम स्तर पर व्यावसायिक कतर्व्य व्यवसाय में निहित विभ्िान्न प्रकार के कायो± को विभ्िान्न प्रकार के संगठनों द्वारा संपन्न किया जाता है जिन्हें व्यावसायिक इकाइर् या पफमर् कहा जाता है। व्यवसाय के संचालन हेतु उद्यम चार मुख्य प्रकार के काम करते हैं, ये हैं - वित्त व्यवस्था, उत्पादन, विपणन तथा मानव संसाधन प्रबंधन। वित्त व्यवस्था का संबंध, व्यवसाय के संचालन के लिए वित्त जुटाने तथा उनका सही उपयोग करने से है। उत्पादन का अथर् कच्चे माल को निमिर्त माल में परिवतिर्त करने या सेवाओं को उत्पन्न कराने से है। विपणन से तात्पयर् उन संपूणर् ियाओं से है, जो वस्तुओं तथा सेवाओं के आदान - प्रदान में, उत्पादक से उन व्यक्ितयों तक, उस स्थान व समय पर तथा उस कीमत पर उपलब्ध कराने से है जो वे चुकाने को तैयार हो एवं जिन्हें उनकी आवश्यकता हो। मानव संसाधन प्रबंधन को सुनिश्िचत करता है उद्यम में विभ्िान्न प्रकार के कायो± को पूरा करने का कौशल रखने वाले व्यक्ितयों की उपलब्धता को सुनिश्िचत करता है। कि लाभ कितना होगा। बल्िक सतत् प्रयासों के बावजूद भी हानि की आशंका सदैव बनी ही रहती है। ;छद्ध जोख्िाम के तत्त्वः जोख्िाम एक अनिश्िचतता है, जो व्यावसायिक हानि की ओर इंगित करता है, जिनका कारण वुफछ प्रतिकूल अथवा अवांछित घटकों से है। जोख्िामों का व्यवसाय अध्ययन संबंध वुफछ व्यावसायिक घटनाओं से है, जैसे - उपभोक्ताओं की पसंद या पफैशन में परिवतर्न, उत्पादन वििायों में परिवतर्न, कायर्स्थल पर हड़ताल या तालेबंदी, बाजार - प्रतिस्पधार्, आग, चोरी, दुघर्टनाएँ, प्रावृफतिक आपदाएँ आदि से होता है। कोइर् भी व्यवसाय जोख्िामों से अछूता नहीं रहता। लनाुतंेजगार मेशा तथा रोव्यवसाय, प आधर व्यवसाय शोप जगारेरा स्थापना की विध्ि1 य तथा अन्यर्उद्यमी का निण , यदिँपचारिकताएैनी आूकान ंे आवश्यक हा स्था कींकिसी व्यावसायिक स सदस्यता तथा व्यावहारिक माण - पत्रा्रग्यता का पेया वोक्ित - पत्रा तथा सुनिय तौसमझा फतिृव्रकी पर्काय2 तथांेआुवस्तेजनता का लभताुकी संेवाओस दान्रपँवाऐषज्ञ सेव्यक्ितगत विश करना ेवा केता या सैवा समझोस र्सार कायुअनेकंेनियमा करना। ग्यतोया3 ग्यता कीेनतम याूकिसी न्य ंआवश्यकता नही श्िाक्षण तथा्रपंेत्रा मेष क्षेविश णताद्धुग्यता ;निपेष योविश अतिआवश्यक रितर्क्ता द्वारा निधेनिया श्िाक्षण्रपंग्यता एवेया तिपफल्रप4 त लाभर्अजि पफीस रीूतन या मजदेव शेजी निवँूप5 ंफति एवृव्रव्यवसाय की प जीँूसार पुफ अनेआकार व श आवश्यकेनिव ेस्थापना वफ जींूलिए सीमित प आवश्यक ंजी की आवश्यकता नहींूप ख्िामेजा6 लाभ अनिश्िचत तथा वैख्िाम सदेअनियमित जा निश्िचत,ंपफीस नियमित एव ख्िाम भी।ेछ जाुक नियमितंनिश्िचत एव ।ंख्िाम नहीेजार्इेतन, कोव तरणंहित - हस्ता7 फेवंेपचारिकताऔफछ आुव भवंतरण संसाथ हित हस्ता ंभव नहींस ंभव नहींस हितांआचार स8 रितर्हिता निधंआचार सर्इेका ंनही हिता का पालनंवर आचार सेशेप आवश्यक क्तोलिए नियोव्यवहार क कांेरित नियमार्द्वारा निध पालन आवश्यक 1.4 व्यवसाय पेशा तथा रोजगार में तुलना जैसा पहले बतलाया जा चुका है कि आथ्िार्क ियाओं को तीन मुख्य वगोर्ं में विभाजित किया जा सकता हैः 1.व्यवसाय 2.पेशा 3.रोजगाार व्यवसाय का अभ्िाप्राय उन आथ्िार्क ियाओं से है, जिनका संबंध लाभ कमाने के उद्देश्य से वस्तुओं का उत्पादन या क्रय - विक्रय या सेवाओं की पूतिर् से है। व्यवसाय में संलग्न व्यक्ित द्वारा अपनी आय लाभ के रूप में दशार्यी जाती है। पेशे में, वे ियाएँ सम्िमलित हैं, जिनमें विशेष ज्ञान व दक्षता की आवश्यकता होती है और व्यक्ित इनका प्रयोग अपने धंधे में आय अजर्न हेतु करता है। इस प्रकार की ियाओं के लिए पेशेवर संस्थाओं द्वारा साधारणतया वुफछ मागर् दश्िार्काएँ व आचार संहिताएँ बनाइर् जाती हैं। पेशे में सलग्न व्यक्ितयों को पेशेवर कहा जाता है। उदाहरणाथर् चिकित्सक, चिकित्सा पेशे में ‘भारतीय चिकित्सक परिषद’ के नियमानुसार कायर् करते हैं। वकील ‘भारतीय बार काउंसिल’ के अनुरूप वकालत के पेशे में कायर्रत होते हैं। लेखाकार लेखांकन पेशे से संबंिात हैं तथा ‘भारतीय चाटर्डर् एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट’ के नियमों के अनुसार कायर् करते हैं। रोजगार का अभ्िाप्राय उन धंधों से है, जिनमें लोग नियमित रूप से दूसरों के लिए कायर् करते हैं और बदले में पारिश्रमिक प्राप्त करते हैं। वे व्यक्ित जो अन्य व्यक्ितयों द्वारा नियुक्त किए जाते हैं, कमर्चारी कहलाते हैं। अतः वे व्यक्ित जो कारखानों में काम करते हैं और बदले में वेतन अथवा मजदूरी पाते हैं तथा कारखाने के मालिकों की नौकरी में लगे होते हैं, उन्हें कारखानों के कमर्चारी कहते हैं। इसी प्रकार जो व्यक्ित बैंकों, बीमा कंपनियों या सरकारी विभागों के कायार्लयों में प्रबंधकों, सहायकों, क्लको±, चपरासियों या चैकीदारों के रूप में कायर् करते हैं, वे रोजगार करने वाले वगर् के अंतगर्त आते हैं। 1.5 व्यावसायिक ियाओं का वगीर्करण विभ्िान्न व्यावसायिक ियाओं को दो विस्तृत वगो± मंे वगीर्वृफत किया जा सकता है - उद्योग एवं वाण्िाज्य। उद्योग से तात्पयर् वस्तुओं का उत्पादन अथवा प्रियण है। वाण्िाज्य में वे सभी ियाएँ सम्िमलित की जाती हैं, जो वस्तुओं के आदान - प्रदान, संभरण तथा वितरण को संभव बनाती हैं। इन दो वगो± के आधार पर हम व्यावसायिक पफमो± को औद्योगिक उद्यम तथा वाण्िाज्ियक उद्यम की श्रेण्िायों में विभक्त कर सकते हैं। अब हमें व्यावसायिक ियाओं का विस्तृत अध्ययन करना हैः 1.6 उद्योग उद्योग से अभ्िाप्राय उन आथ्िार्क ियाओं से है, जिनका संबंध संसाधनों वफो उपयोगी वस्तुओं में परिवतर्न करना है। उद्योग शब्द का प्रयोग उन ियाओं के लिए किया जाता है, जिनमें यांत्रिाक - उपकरण एवं तकनीकी कौशल का प्रयोग होता है। इनमें वस्तुओं के उत्पादन अथवा प्रिया तथा पशुओं के प्रजनन एवं पालन से संबंिात ियाएँ सम्िमलित हैं। व्यापक अथोर्ं में उद्योग का अथर् समान वस्तुओं अथवा संबंिात वस्तुओं के उत्पादन में लगी इकाइर्यों के समूह से है। उदाहरण के लिए, रूइर् अथवा कपास से सूती वस्त्रा आदि बनाने वाली सभी इकाइर्यों को उद्योग कहते हैं। इन्हीं के समकक्ष बै¯कग, बीमा आदि वफी सेवाएँ भी उद्योग कहलाती हैं, जैसे - बैं¯कग उद्योग, बीमा उद्योग आदि। उद्योगों को तीन व्यापक श्रेण्िायों व्यवसाय अध्ययन में विभाजित किया जा सकता है - प्राथमिक उद्योग, द्वितीयक या माध्यमिक उद्योग एवं तृतीयक या सेवा उद्योग। ;कद्ध प्राथमिक उद्योगः इन उद्योगोें में, वे सभी ियाएँ सम्िमलित हैं, जिनका संबंध प्रावृफतिक संसाधनों के खनन एवं उत्पादन तथा पशु एवं वनस्पति के विकास से है। इन उद्योगों को पुनः इस प्रकार वगीर्वृफत किया जा सकता है। ;अद्ध निष्कषर्ण उद्योगः ये उद्योग उत्पादों को प्रावृफतिक ड्डोतों से निष्कष्िार्त करते हैं। निष्कषर्ण उद्योग आधारभूत कच्चे माल की आपूतिर् करते हैं जो प्रायः भूमि से प्राप्त किया जाता है। इन उद्योगों के उत्पादों को दूसरे विनिमार्णी उद्योगों द्वारा बहुत - सी उपयोगी वस्तुओं में परिवतिर्त किया जाता है। मुख्य निष्कषर्ण उद्योगों में खेती करना, उत्खनन, इमारती लकड़ी, श्िाकार तथा मछली पकड़ना आदि को सम्िमलित किया जाता है। ;बद्ध जननिक उद्योगः इन उद्योगों का मुख्य कायर् पशु - पक्ष्िायों का प्रजनन एवं पालन तथा वनस्पति उगाना है, ताकि उनका उपयोग आगे विभ्िान्न उत्पादों के लिए किया जा सके। जननिक उद्योग, पौधों के प्रजनन के लिए ‘बीज तथा पौध संवधर्न ;नसर्रीद्ध कंपनियाँ’ इसके विशेष उदाहरण हैं। इसके अतिरिक्त पशु प्रजनन पफामर्, मुगीर् पालन, मछली पालन आदि जननिक उद्योगोें के अन्य उदाहरण हैं। ;ऽद्ध द्वितीयक या माध्यमिक उद्योगः इन उद्योगों में खनन उद्योगों द्वारा निष्कष्िार्त माल को कच्चे माल के रूप में प्रयोग किया जाता है। इन उद्योगों द्वारा निमिर्त माल या तो अंतिम उपभोग के लिए उपयोग में लाया जाता है या दूसरे उद्योगों में आगे की प्रिया में उपयोग किया जाता है। उदाहरणाथर् - कच्चा लोहा खनन, प्राथमिक उद्योग है, तो स्टील का निमार्ण करना द्वितीयक या माध्यमिक उद्योग है। माध्यमिक उद्योगों को आगे निम्न श्रेण्िायों में विभक्त किया सकता जाता है। ;अद्ध विनिमार्ण उद्योगः इन उद्योगोें द्वारा कच्चे माल को प्रवि्रफया में लेकर उन्हें अिाक उपयोगी बनाया जाता है। इस प्रकार ये प्रारूप उपयोगिता का सृजन करते हैं। ये उद्योग कच्चे माल से तैयार माल बनाते हैं, जिनका हम उपयोग करते हैं। विनिमार्णी उद्योगों को उत्पादन प्रिया के आधार पर चार श्रेण्िायों में बंाटा जा सकता हैः ऽ विश्लेषणात्मक उद्योगः ये उद्योग एक ही उत्पाद के विश्लेषण एवं पृथकीकरण द्वारा तत्त्वों को उत्पादित करते हैं, जैसे - तेल शोधक कारखाने। ऽ वृफत्रिाम उद्योगः ये उद्योग विभ्िान्न संघटकों को एकत्रिात करके प्रिया द्वारा एक नये उत्पादों का रूप देते हैं, जैसे - सीमंेट उद्योग। ऽ प्रियायी या प्रक्रमीय उद्योगः वे उद्योग, जो पक्के माल के निमार्ण के लिए विभ्िान्न व्रफमिक चरणों से गुजरते हैं। उदाहरणाथर् - चीनी तथा कागश उद्योग। ऽ सम्मेलित उद्योगः जो उद्योग एक नया उत्पाद तैयार करने के लिए विभ्िान्न पुजो± को जोड़ते हैं। उदाहरणस्वरूप - टेलीविजन, कार तथा कंप्यूटर आदि। ;बद्ध निमार्ण उद्योगः ऐसे उद्योग, जैसे - भवन, बंाध, पुल, सड़क, सुरंग तथा नहरों के निमार्ण में संलग्न रहते हैं। इन उद्योगों में अभ्िायांत्रिाकी तथा वास्तुकलात्मक चातुयर् महत्त्वपूणर् अंग होते हैं। ;गद्ध तृतीयक या सेवा उद्योगः इस प्रकार के उद्योग प्राथमिक तथा द्वितीयक उद्योगों को सहायक सेवाएँ सुलभ कराने में संलग्न होते हैं तथा व्यापारिक िया - कलापों को संपन्न कराते हैं। ये उद्योग सेवा - सुविधा सुलभ कराते हैं। व्यावसायिक ियाओं में, ये उद्योग वाण्िाज्य के सहायक अंग समझे जाते हैं, क्योंकि ये उद्योग - व्यापार की सहायता करते हैं। इस वगर् में यातायात, बैं¯कग, बीमा, माल - गोदाम, दूरसंचार, डिब्बा - बंदी तथा विज्ञापन आदि आते हैं। 1.7 वाण्िाज्य वाण्िाज्य में दो प्रकार की ियाएँ सम्िमलित हैं, पहली वे जो माल की बिक्री अथवा विनिमय के लिए की जाती हैं, इन्हंे व्यापार कहते हैं। दूसरी वे विभ्िान्न सेवाएँ जो व्यापार में सहायक होती हंै। इन्हें सेवाएँें अथवा व्यापार सहायक ियाएँ कहते हैं, जिनमें परिवहन बैं¯कग, बीमा, दूरसंचार, विज्ञापन, पैके¯जग एवं गोदाम व्यवस्था आदि सम्िमलित होती हंै। वाण्िाज्य, उत्पादक और उपभोक्ता के बीच की आवश्यक कड़ी का काम करता है। इसमें वे सभी ियाएँ सम्िमलित होती हैं, जो वस्तु एवं सेवाओं के अबाध प्रवाह को बनाए रखने के लिए आवश्यक होती हैं। अतः वाण्िाज्य को इस प्रकार से परिभाष्िात किया जा सकता है कि ये वे ियाएँ हंै जो विनिमय में आने वाली बाधाओं को दूर करती हैं। विनिमय संबंधी बाधा को व्यापार दूर करता है, जो वस्तुओं को उत्पादक से लेकर व्यवसाय अध्ययन उपभोक्ता तक पहुंचाता है। परिवहन स्थान संबंधी बाधा को दूर करता है, जो वस्तुओं को उत्पादन स्थल से बिक्री स्थल तक ले जाता है। संग्रहण एवं भंडारण, समय संबंधी रफकावट को दूर करते हंै। इसमें माल को गोदाम में बिक्री के समय तक रखा जाता है। गोदाम में रखे माल एवं स्थानांतरण के समय मागर् मंे माल की चोरी, आग, दुघर्टना आदि जोख्िामों से हानि हो सकती है। इन जोख्िामों से माल का बीमा कर सुरक्षा प्रदान की जा सकती है। इन सभी ियाओं के लिए आवश्यक पूंजी, बैंक तथा अन्य वित्तीय संस्थानों से प्राप्त होती है। विज्ञापन के द्वारा उत्पादक एवं व्यापारी, उपभोक्ताओं को बाजार में उपलब्ध वस्तुओं एवं सेवाओं के संबंध में सूचना देते हैं। अतः वाण्िाज्य से अभ्िाप्राय उन ियाआंे से है जो वस्तु एवं सेवाओं के विनिमय में आने वाली व्यक्ित, स्थान, समय, वित्त एवं सूचना संबंधी बाधाआंे को दूर करती हंै। 1.7.1 व्यापार व्यापार वाण्िाज्य का अनिवायर् अंग है। इसका अथर् वस्तुओं की बिक्री, हस्तांतरण अथवा विनिमय से है। यह उत्पादित वस्तुओं को अंतिम उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराता है। आज के युग में, वस्तुओं का उत्पादन वृहद् पैमाने पर किया जाता है, लेकिन उत्पादकों के लिए अपनी वस्तुओं की बिक्री प्रत्येक उपभोक्ता को अलग - अलग कर पाना दुष्कर है। व्यापारी मध्यस्थ के रूप में व्यापारिक ियाएँ करते हुए विभ्िान्न बाजारों में उपभोक्ताओं को वस्तुएँ उपलब्ध कराते हैं। व्यापार व्यक्ित अथार्त् उत्पादक तथा उपभोक्ता संबंधी बाधा को दूर करता है। व्यापार की अनुपस्िथति में बडे़ पैमाने पर उत्पादन संभव नहीं हो सकता है। व्यापार को दो बडे़ वगो± में विभाजित किया जा सकता है - आंतरिक और बाह्य। आंतरिक अथवा देशी व्यापार में वस्तुओं और सेवाओं का आदान - प्रदान एक ही देश की भौगोलिक सीमाओं के अंदर किया जाता है। इसी को आगे थोक और पुफटकर व्यापार में विभाजित किया जा सकता है। जब वस्तुओं का क्रय - विक्रय बड़ी भारी मात्रा में किया जाता है, तो उसे थोक व्यापार तथा जब वस्तुआंे का क्रय विक्रय अपेक्षावृफत कम मात्रा में किया जाता है, तो उसे पुफटकर व्यापार कहा जाता है। बाह्य एवं विदेशी व्यापार में वस्तुओं एवं सेवाओं का आदान - प्रदान दो या दो से अिाक देशों के व्यक्ितयों अथवा संगठनों के मध्य किया जाता है। यदि वस्तुओं का क्रय दूसरे देश से किया जाता है, तो उसे आयात व्यापार कहते हैं तथा जब वस्तुओं का विक्रय दूसरे देशों को किया जाता है, तो उसे नियार्त व्यापार कहते हंै। जब वस्तुओं का आयात किसी अन्य देश को नियार्त करने के लिए किया जाता है, तो उसे पुनर्नियार्त या आयात - नियार्त व्यापार कहते हैं। 1.7.2 व्यापार के सहायक व्यापार में सहायक ियाओं को व्यापार के सहायक कहते हैं। इन ियाओं को सेवाएँ भी कहते हैं, क्योंकि ये उद्योग एवं व्यापार में सहायक होती हैं। परिवहन, बैं¯कग, बीमा, भंडारण एवं विज्ञापन व्यापार के सहायक कायर् हैं, अथर्ात् ये वे ियाएँे हैं जो सहायक की भूमिका निभाती हैं। वास्तव में, ये ियाएँ न केवल व्यापार मंे सहायक होती हैं, बल्िक उद्योग में भी सहायक होती हैं और इस प्रकार से पूरे व्यवसाय के लिए सहायक होती हैं। वास्तव में सहायक ियाएँ पूरे व्यवसाय का तथा विशेष रूप से वाण्िाज्य का अभ्िान्न अंग हंै। ये ियाएँें वस्तुओं के उत्पादन एवं वितरण मंें आने वाली बाधाओं को दूर करने में सहायक होती हैं। परिवहन माल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में सहायक होता है। बैं¯कग, व्यापारियों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है। बीमा विभ्िान्न प्रकार की जोख्िामों से सुरक्षा प्रदान करता है। भंडारण संग्रहण व्यवस्था के द्वारा समय की उपयोगिता का सृजन करता है। विज्ञापन के माध्यम से सूचनाएँ प्राप्त होती हैं। दूसरे शब्दों में, ये ियाएँ माल के स्थानांतरण, संग्रहण, वित्तीयन, जोख्िाम से सुरक्षा एवं माल की बिक्री संवधर्न को सरल बनाती हैं। सहायक कायोर्ं का संक्षेप में वणर्न निम्न हैः - ;कद्ध परिवहन एवं संप्रेषणः वस्तुओं का उत्पादन वुफछ विश्िाष्ट जगहों पर होता है। उदाहरणाथर् - चाय असम में, रुइर् गुजरात तथा महाराष्ट्र में, जूट पश्िचमी बंगाल और उड़ीसा में, चीनी उत्तर प्रदेश, बिहार तथा महाराष्ट्र आदि में, लेकिन उपभोग के लिए इन वस्तुओं वफी आवश्यकता देश के सभी भागों में होती है। स्थान संबंधी बाधा को सड़क परिवहन, रेल परिवहन या तटीय जहाजरानी दूर करती है। परिवहन के द्वारा कच्चा माल उत्पादन स्थल पर लाया जाता है तथा तैयार माल को कारखाने से उपभोग के स्थान तक ले जाया जाता है। परिवहन के साथ संप्रेषण माध्यमों की भी आवश्यकता होती है, जिससे की उत्पादक, व्यापारी एवं उपभोक्ता एक दूसरे से सूचनाओं का आदान - प्रदान कर सवंेफ। अतः डाक एवं टेलीपफोन सेवाएँें भी व्यावसायिक ियाओं की सहायक मानी जाती हैं। ;खद्ध बैं¯कग एवं वित्तः धन के बिना व्यवसाय का संचालन संभव नहीं, क्योंकि धन की आवश्यकता परिसंपिायों के क्रय करने तथा नित्य - प्रति के व्ययों को पूरा करने के लिए होती है। व्यवसायी आवश्यक धन राश्िा बैंक से प्राप्त कर सकते हैं। बैंक वित्त की समस्या का समाधान कर व्यवसाय की सहायता करते हैं। वाण्िाज्ियक बैंक अिाविकषर् एवं नकद साख, )ण एवं अगि्रम के माध्यम से राश्िा उधार देते हैं। बैंक चैकों की वसूली धन अन्य स्थानों पर भेजने तथा व्यापारियों की ओर से बिलों को भुनाने का कायर् भी करते हंै। विदेशी व्यापार में, वाण्िाज्ियक बैंक आयातकों एवं नियार्तकों दोनों की ओर से भुगतान की व्यवस्था भी करते हैं। वाण्िाज्ियक बैंक जनसाधारण से पूंजी एकत्रिात करने में भी वंफपनी प्रवतर्कों की सहायता करते हैं। ;गद्ध बीमाः व्यवसाय में अनेवफों प्रकार के जोख्िाम होते हैं। कारखाने की इमारत, मशीन, पफनीर्चर आदि का आग, चोरी एवं अन्य जोख्िामों से बचाव आवश्यक है। माल एवं अन्य वस्तुएँ चाहे गोदाम में हों या मागर् में, उनके खोने अथवा क्षतिग्रस्त हो जाने का भय व्यवसाय अध्ययन रहता है। कमर्चारियों की भी दुघर्टना अथवा व्यावसायिक जोख्िामों से सुरक्षा आवश्यक है। बीमा इन सभी को सुरक्षा प्रदान करता है। एक साधारण से प्रीमियम की राश्िा का भुगतान कर बीमा वंफपनी से हानि अथवा क्षति की राश्िा की एवं शारीरिक दुघर्टनावश चोट से होने वाली क्षति की पूतिर् कराइर् जा सकती है। ;घद्ध भंडारणः प्रायः वस्तुओं के उत्पादन के तुरंत पश्चात् ही उनका उपयोग या विक्रय नहीं होता। उन्हें आवश्यकता पड़ने पर सुलभ कराने के लिए गोदामों में सुरक्ष्िात रखा जाता है। माल को क्षति से बचाने के लिए उसकी सुरक्षा आवश्यक होती है। इसलिए उसके सुरक्ष्िात संग्रहण की विशेष व्यवस्था की जाती है। भंडारण व्यावसायिक इकाइयों को संग्रहण की कठिनाइर् को हल करने में सहायता प्रदान करता है तथा वस्तुओं को उस समय उपलब्ध कराता है जब उनकी आवश्यकता होती है। वस्तुओं की लगातार आपूतिर् द्वारा मूल्यों को उचित स्तर पर रखा जा सकता है। ;घद्ध विज्ञापनः विज्ञापन वस्तुओं के संवधर्न की महत्त्वपूणर् वििायों में से एक है। विशेष रूप से उपभोक्ता वस्तुओं जैसे - इलैक्ट्रोनिक वस्तुएँ, स्वचालित वाहन, साबुन, डिटरजेंट पाउडर आदि। इनमें से अिाकांश का निमार्ण एवं बाशार में आपूतिर् अनेवफों छोटी - बड़ी इकाइयों द्वारा की जाती है। उत्पादकों एवं व्यापारियों का प्रत्येक उपभोक्ता से व्यक्ितगत रूप में मिलना संभव नहीं होता। विक्रय बढ़ाने हेतु विभ्िान्न उत्पादों ;उनकी विशेषताएँ व मूल्य आदिद्ध की सूचना प्रत्येक संभावित ग्राहक तक पहुँचाना आवश्यक होता है। साथ ही उपभोक्ता को वस्तुओं के प्रयोग, गुणवत्ता तथा मूल्य आदि के संबंध में स्पधार्त्मक जानकारी देकर अपने उत्पाद खरीदने को लुभाने के लिए वस्तुओं का विज्ञापन आवश्यक है। इस प्रकार विज्ञापन बाजार में उपलब्ध वस्तुओं के संबंध में सूचना देने एवं उपभोक्ता को वस्तु विशेष को क्रय करने के लिए तत्पर करने में सहायक होता है। 1.8 व्यवसाय के उद्देश्य व्यवसाय का प्रारंभ बिंदु कोइर् उद्देश्य होता है। सभी व्यवसाय वुफछ उद्देश्यों को प्राप्त करने के प्रति अभ्िामुख होते हैं। ये उद्देश्य उस ओर संकेत करते हैं, विफ व्यवसायी अपने कायो± के बदले क्या प्राप्त करना चाहते हैं। साधारणतया यह समझा जाता है कि व्यवसाय का संचालन केवल लाभ कमाने के लिए होता है। व्यवसायी स्वयं भी यह दशार्ते हंै कि वस्तुओं अथवा सेवाओं के उत्पादन या वितरण करने में उनका मुख्य लक्ष्य लाभ कमाना ही है। समस्त व्यवसाय ही लागत से अिाक कमाने का व्यावसायियों का प्रयास कहलाता है। दूसरे शब्दों में, व्यवसाय का उद्देश्य लाभ अजिर्त करना है, जो लागत पर आगम का आिाक्य है। आज के युग में, यह सवर्सम्मति से स्वीकार किया गया है कि व्यावसायिक इकाइयाँ समाज का एक अंग हंै और उनके वुफछ उद्देश्य, सामाजिक उत्तरदायित्वों सहित होने चाहिए ताकि वे लंबे समय तक चल सकें तथा प्रगति कर सकें। लाभ, अग्रणी उद्देश्य होता है, लेकिन एकमात्रा नहीं। यद्यपि लाभ कमाना ही व्यवसाय का एक उद्देश्य नहीं हो सकता, लेकिन इसके महत्त्व की उपेक्षा नहीं की जा सकती। प्रत्येक व्यवसाय का यह प्रयत्न होता है कि जो वुफछ भी उसने निवेश किया है उससे अिाक प्राप्त किया जाए। लागत से आगम का आिाक्य लाभ कहलाता है। लाभ व्यवसाय का विभ्िान्न कारणों से एक आवश्यक उद्देश्य माना जाता है। ;अद्ध यह व्यवसायी के लिए आय का ड्डोत है। ;बद्ध यह व्यवसाय के विस्तार के लिए आवश्यक वित्त का ड्डोत हो सकता है। ;सद्ध यह व्यवसाय की वुफशल कायर्शैली का द्योतक होता है। ;दद्ध यह व्यवसाय का समाज के लिए उपयोगी होने की स्वीकारोक्ित भी हो सकता है। तथा ;नद्ध यह एक व्यावसायिक इकाइर् की प्रतिष्ठा को बढ़ाता है। पिफर भी, एक अच्छे व्यवसाय के लिए केवल लाभ पर बल देना तथा दूसरे उद्देश्यों को भुला देना, खतरनाक साबित हो सकता है। यदि व्यवसाय के प्रबंधक केवल लाभ के मनोग्रस्त हो जाएँ तो वे ग्राहकों, कमर्चारियों, विनियोजकों तथा समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को भुला सकते हैं तथा तत्काल लाभ कमाने के लिए समाज के विभ्िान्न वगोर्ं का शोषण भी कर सकते हैं। इसका नतीजा, यह हो सकता है कि प्रभावित लोग उस व्यावसायिक इकाइर् के साथ असहयोग करें या उसके दुराचरण का विरोध करें। पफलस्वरूप इकाइर् का धंधा चैपट हो सकता है और वह लाभ नहीं कमा पाता। यही कारण है कि ऐसा व्यवसाय मुश्िकल से ही मिलता है जिसका उद्देश्य केवल अिाक से अिाक लाभ कमाना हो। 1.8.1 व्यवसाय के बहुमुखी उद्देश्य किसी उद्यम के लाभ में लगातार वृि, समाज को उपयोगी सेवाएँ प्रदान करने के कारण हो सकती है। वास्तव में उद्देश्य हर उस क्षेत्रा में वांछनीय है, जो प्रत्येक क्षेत्रा में व्यवसाय को जीवित रखते हैं तथा समृि को प्रभावित करते हैं। यदि किसी व्यवसाय को आवश्यकता तथा लक्ष्य में संतुलन रखना है तो उसे बहुमुखी उद्देश्यों को भी अपने सम्मुख रखना होगा। वह केवल एक लक्ष्य को सामने रखकर महारथ हासिल नहीं कर सकता। उद्देश्य प्रत्येक क्षेत्रा में विश्िाष्ट तथा व्यवसाय के अनुरूप होने चाहिए। उदाहरणाथर् - विक्रय मात्रा का निधार्रण होना चाहिए, जो पूंजी एकत्रिात करनी है उसका अनुमान होना चाहिए तथा उत्पाद की इकाइर्यों का लक्ष्य भी निधार्रित होना चाहिए। उद्देश्य यह बताते हैं कि व्यवसाय निश्िचत रूप से यह कायर् करने जा रहा है ताकि वह अपने ियाकलापों का विश्लेषण कर सके तथा अपने कायर् के निष्पादन में सुधार ला सके। व्यवसाय के लिए उद्देश्यों की आवश्यकता प्रत्येक उस क्षेत्रा में होती है, जहाँ निष्पादन परिणाम व्यवसाय के जीवित रहने और समृि को प्रभावित करते हैं। उनमें से वुफछ क्षेत्रों का वणर्न नीचे किया गया हैः ;कद्ध बाशार स्िथतिः बाशार स्िथति से तात्पयर् एक उद्यम की उसके प्रतियोगियों से संबंिात व्यवसाय अध्ययन अवस्था से है। एक उद्यम को अपने उपभोक्ताओं को प्रतियोगी उत्पाद उपलब्ध करवाने तथा उन्हें संतुष्ट रखने के लिए अपने पैरों पर मशबूती से खडे़ रहना चाहिए। ;खद्ध नवप्रवतर्नः नवप्रवतर्न से तात्पयर् नए विचारों का समावेश या जिस वििा से कायर् किया जाता है उसमें वुफछ नवीनता लाने से है प्रत्येक व्यवसाय नवप्रवतर्न की दो वििायाँ हैं। ऽ उत्पाद अथवा सेवा में नवप्रवतर्न तथा ऽ उनकी पूतिर् में निपुणता तथा सियता में नवप्रवतर्न की आवश्यकता। कोइर् भी व्यवसाय आधुनिक प्रतियोगिता के युग में बिना नवप्रवतर्न के पफल - पफूल नहीं सकता। अतः नवप्रवतर्न एक महत्त्वपूणर् उद्देश्य है। ;गद्ध उत्पादकताः उत्पादकता का मूल्यांकन उत्पादन के मूल्य की निवेश के मूल्य से तुलना करके किया जाता है। इसका प्रयोग वुफशलता के माप के रूप में किया जाता है। लंबे समय तक चलते रहने तथा प्रगति के लिए प्रत्येक उद्यम को उपलब्ध स्रोतों का, अिाकतम सदुपयोग करते हुए विशाल उत्पादकता की ओर लक्ष्य रखना चाहिए। ;घद्ध भौतिक एवं वित्तीय संसाधनः प्रत्येक व्यवसाय को संयंत्रा ;प्लांटद्ध, मशीन तथा कायार्लय इत्यादि जैसे - भौतिक ड्डोतों तथा वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है। इन कोषों की सहायता से संसाधनों वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन कर के उपभोक्ताओं तक पहुँचा जा सके। व्यावसायिक इकाइयाँ इन ड्डोतों को अपनी आवश्यकतानुसार प्राप्त कर उनका दक्षतापूणर् प्रयोग करना चाहिए। ;घद्ध लाभाजर्नः लाभाजर्न से तात्पयर् विनियोजित पूंजी पर लाभाजर्न से है। प्रत्येक व्यवसाय का एक मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना होता है। लाभ व्यवसाय की सपफलता का एक सुदृढ़ परीक्षण है। ;चद्ध प्रबंध निष्पादन एवं विकासःप्रत्येक उद्यम की, अपने प्रबंधक से यह अपेक्षा रहती है कि वह व्यावसायिक ियाओं में उचित आचार संहिता तथा सामंजस्य स्थापित करें। अतः प्रबंध निष्पादन एवं विकास बहुत ही महत्त्वपूणर् उद्देश्य है। इस उद्देश्य के लिए उद्यमों को सियता से कायर् करना चाहिए। ;छद्ध कमर्चारी निष्पादन एवं मनोवृिाः किसी भी ;कतर्व्यद्ध व्यवसाय की उत्पादकता तथा लाभाजर्न क्षमता में योगदान की मात्रा कमर्चारियों द्वारा कायर् का निष्पादन एवं उनकी मनोवृिा निधार्रित करती है। अतः प्रत्येक व्यवसाय को कमर्चारियों द्वारा किए हुए कायो± में सुधार लाना और कमर्चारियों के प्रति सकारात्मक व्यवहार का आश्वासन देने का प्रयत्न करना चाहिए। ;जद्ध सामाजिक उत्तरदायित्वः सामाजिक उत्तरदायित्व से तात्पयर्, व्यावसायिक पफमो± के दायित्व से है वे समाज की समस्याओं को सुलझाने के लिए आवश्यक ड्डोत जुटाएँ तथा आवश्यकतानुसार सामाजिक सेवा का कायर् करें। अतः एक व्यावसायिक उपक्रम को विभ्िान्न व्यक्ितयों तथा समुदायों के हित में, अपने उत्तरदायित्व तथा उनकी समृि के लिए अग्रसर रहना चाहिए। 1.8.2 व्यावसायिक जोख्िाम व्यावसायिक जोख्िाम से आशय अपयार्प्त लाभ या पिफर हानि होने की उस संभावना से है जो नियंत्राण से बाहर अनिश्िचतताओं या आकस्िमक घटनाओं के कारण होती है। उदाहरणाथर् किसी वस्तु विशेष की मंाग में कमी, उपभोक्ताओं की रफचि या प्राथमिकताओं में परिवतर्न या उसी प्रकार के उत्पाद बेचने वाली प्रतियोगी संस्थाओं में प्रतिस्पधार् अिाक होने से लाभ में कमी, बाशार में कच्चे माल की कमी के कारण मूल्यों में वृि आदि। जो पफमर् ऐसे कच्चे माल को उपयोग में ला रही हैं। उन्हें इसे क्रय करने के लिए अिाक राश्िा का भुगतान करना पड़ता है। परिणामतः लागत मूल्य बढ़ जाता है इस कारण लाभ में कमी आ सकती है। व्यवसायों को निश्िचत रूप से दो प्रकार के जोख्िामों का सामना करना पड़ता है - अनिश्िचतता और शु(। अनिश्िचतता जोख्िामों में दोनों संभावनाएँ विद्यमान होती हैं लाभ की भी तथा हानि की भी। संदिग्ध हानियाँ बाशार की दशा जिसमें मंाग व पूतिर् में उतार - चढ़ाव सामिल हैं तथा इस कारण मूल्यों में आए परिवतर्न से, या ग्राहकों की रूचि या पफैशन में परिवतर्न होने के कारण, होती हंै। यदि बाशार की दशा व्यवसाय के पक्ष में है तो लाभ हो सकता है। दशा विपरीत होने की अवस्था में हानि की संभावना रहती है। शु( हानियों में या तो हानि होगी अथवा हानि नहीं होगी। आग लगना, चोरी होना या हड़ताल होना शु( हानियों के उदाहरण हैं। यदि ये घटनाएँ घटित होती हैं तो हानि होगी तथा इन घटनाओं के घटित न होने पर हानि नहीं होगी। 1.9 व्यावसायिक जोख्िामों की प्रवृफिा व्यावसायिक जोख्िामों को समझने के लिए इनकी विश्िाष्ट विशेषताओं का ज्ञान आवश्यक हैः ;कद्ध व्यावसायिक जोख्िाम अनिश्िचतताओं के कारण होते हंैः अनिश्िचतता से तात्पयर्, भविष्य में होने वाली घटनाओं की अनभ्िाज्ञता से है। प्रावृफतिक आपदाएँ, मंाग और मूल्य में परिवतर्न सरकारी नीति में परिवतर्न, तकनीक में सुधार आदि ऐसे उदाहरण हैं जिनसे अनिश्िचतता बनी रहती है। ये परिवतर्न व्यवसाय के लिए जोख्िाम के कारण हो सकते हैं। इन कारणों का पहले से ज्ञान नहीं हो सकता है। ;खद्ध जोख्िाम प्रत्येक व्यवसाय का आवश्यक अंग होता हैः प्रत्येक व्यवसाय में जोख्िाम होता है। कोइर् भी व्यवसाय इससे अछूता नहीं है। यद्यपि व्यवसाय में हानि की मात्रा भ्िान्न हो सकती है। जोख्िाम को कम किया जा सकता है लेकिन समाप्त नहीं किया जा सकता। ;गद्धजोख्िाम की मात्रा मुख्यतः व्यवसाय की प्रवृफति एवं आकार पर निभर्र करती हैः व्यवसाय की प्रवृफति ;उत्पादित एवं विित वस्तुओं और सेवाओं के प्रकारद्ध तथा व्यवसाय का आकार ;उत्पादन एवं विक्रय व्यवसाय अध्ययन की मात्राद्ध येे मुख्य घटक हैं जो व्यवसाय में जोख्िाम की मात्रा का निधार्रण करते हैं। उदाहरणाथर् - जो व्यवसाय पफैशन की चीजों में लेन - देन करते हैं, उनमें जोख्िाम की मात्रा अिाक होती है। उसी प्रकार वृहद् स्तरीय व्यवसाय में लघु स्तरीय व्यवसाय की अपेक्षा जोख्िाम अिाक होता है। ;घद्ध जोख्िाम उठाने का प्रतिपफल लाभ होता हैः जोख्िाम नहीं तो लाभ नहीं एक पुराना सि(ांत है, जो सभी प्रकार के व्यवसायों में लागू होता है। किसी व्यवसाय में अिाक जोख्िाम होने पर लाभ अिाक होने का अवसर होता है। कोइर् भी उद्यमी भविष्य में अिाक लाभ पाने की लालसा में ही अिाक जोख्िाम उठाता है। लाभ इस प्रकार जोख्िाम का एक प्रतिपफल है। 1.9.1 व्यावसायिक जोख्िामों के कारण व्यावसायिक जोख्िामों के अनेवफों कारण होते हैं जिनको निम्नलिख्िात भागों में विभाजित किया जा सकता हैः ;कद्ध प्रावृफतिक कारणः प्रावृफतिक आपदाएँ जैसे - बाढ़, भूचाल, बिजली गिरना, भारी वषार्, अकाल आदि पर मनुष्य का लगभग नहीं के बराबर नियंत्राण है। व्यवसाय में इनसे संपिा एवं आय की बड़ी भारी हानि हो सकती है। ;खद्ध मानवीय कारणः मानवीय कारणों में कमर्चारियों की बेइर्मानी, लापरवाही या अज्ञानता को सम्िमलित किया जा सकता है। बिजली पफेल हो जाना, हड़ताल होना, प्रबंधकों की अवुफशलता आदि भी मानवीय कारणों के अच्छे उदाहरण हैं। ;गद्ध आथ्िार्क कारणः इन कारणों में माल की मंाग में अनिश्िचतता, प्रतिस्पधार्, मूल्य, ग्राहकों से देय राश्िा, तकनीक में परिवतर्न या उत्पादन की वििा में परिवतर्न आदि को सम्िमलित किया जा सकता है। वित्तीय समस्याओं में )ण पर ब्याज दर में वृि, करों की भारी उगाही आदि भी इस प्रकार के कारणों की श्रेणी में आते हैं। परिणामतः व्यवसाय संचालन लागत ;व्ययद्ध असंभावित रूप से अिाक हो जाती है। ;घद्ध अन्य कारणः इनमें अदृश्य घटनाएँ जैस - राजनैतिक उथल - पुथल, मशीनों में खराबी, बाॅयलर का पफट जाना, मुद्रा विनमय दर में उतार - चढ़ाव आदि हैं जिनके कारण व्यवसाय में जोख्िामों की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं। 1.9.2 व्यवसाय का आरंभ - मूल घटक किसी व्यवसाय को प्रारंभ करना ठीक उसी प्रकार का काम है जैसे मनुष्य विभ्िान्न संसाधनों का उपयोग कर अपने प्रयत्नों से किसी निश्िचत उद्देश्य को प्राप्त करे। नए व्यवसाय की सपफलता मुख्यतः उसके उद्यमी अथवा प्रवतर्क की इस योग्यता पर निभर्र करता है कि वह संभावित समस्याओं का पूवार्नुमान लगाने तथा कम से कम लागत मंे उनका समाधान करने मंे कितना सक्षम है। आज के व्यावसायिक जगत मंे यह इसलिए और भी महत्त्वपूणर् है, क्योंकि प्रतिस्पधार् बड़ी कठोर है और जोख्िाम भी अिाक है। वुफछ समस्याएँ जिनसे व्यावसायिक पफमो± को जूझना ही पड़ता है, वे बुनियादी प्रवृफति की हैं। एक पैफक्ट्री खोलने के लिए उसकी योजना बनाने तथा उसके ियान्वयन में व्यवसाय का स्थान, संभावित ग्राहक, साजो - सामान तथा उनकी किस्में, विन्यास, क्रय तथा वित्तीय समस्याएँ तथा कमर्चारियों के चयन आदि समस्याओं का ध्यान रखना। बडे़ व्यवसाय में समस्याएँ और भी अिाक जटिल हो जाती हैं पिफर भी वुफछ मूल घटक ऐसे हैं, जिनका किसी व्यवसायी को व्यवसाय प्रारम्भ करते समय ध्यान रखना चाहिए। वे निम्नलिख्िात हैंः ;कद्ध व्यवसाय के स्वरूप का चयनः किसी भी उद्यमी को नए व्यवसाय को प्रारंभ करने से0 पूवर् उसकी प्रवृफति तथा प्रकार पर ध्यान देना चाहिए। स्वतः ही वह उस प्रकार के जोख्िामों से व्यवहार की वििायाँ यद्यपि कोइर् भी व्यावसायिक उद्यम जोख्िाम से बचा हुआ नहीं है पिफर भी बहुत सी ऐसी वििायाँ हैं जिनके द्वारा जोख्िाम भरी परिस्िथतियों से आसानी से निबटा जा सकता है। उदाहरण के लिए - उद्यम द्वारा ;अद्ध अति जोख्िाम भरे सौदों को न करना ;बद्ध जोख्िाम कम करने के लिए अग्िनशमन उपकरणों का सुरक्षात्मक उपयोग ;सद्ध जोख्िाम का बीमा वंफपनी को हस्तंातरण करने के लिए बीमा पाॅलिसी क्रय करना ;दद्ध चालू वषर् की आय में वुफछ संभावित जोख्िामों के लिए आयोजन करना - जैसा कि डूबते एवं संदिग्ध )णों के लिए आयोजन अथवा ;यद्ध अन्य उद्यमों से जोख्िामों को आपस में बंाटना जैसे - उत्पादक तथा थोक व्यापारी द्वारा कीमतों के कम होने से हुइर् हानि को, विभाजित करने के लिए सहमत होना। उद्योग या सेवा को चुनना पसंद करेगा जिसमें अिाक लाभ अजिर्त करने की आशा हो, लेकिन यह निणर्य बाजार में ग्राहकों की आवश्यकता तथा उद्यमी के तकनीकी ज्ञान एवं उत्पाद विशेष के निमार्ण में उसकी रुचि से प्रभावित होगा। ;खद्ध पफमर् के आकारः व्यवसाय के आरम्भ करते समय व्यवसाय के आकार या उसके विस्तार, निणर्य संबंधी पहलू यह दूसरा महत्त्वपूणर् निणर्य है, जिसका ध्यान रखा जाना चाहिए। वुफछ घटक बडे़ आकार के पक्ष में होते हैं, तो अन्य उसे सीमित रखने के पक्ष में होते हैं। यदि उद्यमी को यह विश्वास हो कि उसके उत्पाद की मांग बाशार में अच्छी होगी तथा वह व्यवसाय के लिए आवश्यक पूंजी का प्रबंध कर सकता है तो वह बडे़ पैमाने पर व्यवसाय प्रारंभ करेगा। यदि बाशार की दशा अनिश्िचत है तथा जोख्िाम भारी हैं तो छोटे पैमाने का व्यवसाय ही बेहतर रहेगा। ;गद्ध स्वामित्व के स्वरूप का चुनावः स्वामित्व के संबंध में संगठन का रूप एकाकी व्यापार, साझेदारी या संयुक्त पँूजी कंपनी का हो सकता है। उपयुक्त स्वामित्व स्वरूप का चुनाव पूंजी की आवश्यकता, स्वामियों के दायित्व, लाभ के विभाजन वििाक औपचारिकताएँ, व्यवसाय की निरंतरता हित - हस्तंातरण आदि पर निभर्र करेगा। ;घद्ध उद्यम का स्थानः व्यवसाय प्रारंभ करते समय ध्यान में रखने वाला एक अत्यंत महत्त्वपूणर् घटक है वह स्थान, जहाँ व्यावसायिक ियाओं का संचालन होगा। इसके संबंध में व्यवसाय अध्ययन किसी भी त्राुटि का परिणाम ऊँची उत्पादन लागत, उचित प्रकार के उत्पादन निवेशों की प्राप्ित में असुविधा तथा ग्राहकों को अच्छी सेवा देने में कठिनाइर् के रूप में होगा। उद्यम के स्थान के चुनाव करने में कच्चे माल की उपलब्िध, श्रम, बिजली आपूतिर्, बैंकिग, यातायात, संपे्रषण, भंडारण आदि महत्त्वपूणर् विचारणीय घटक हैं। ;घद्ध प्रस्थापन की वित्त व्यवस्थाः वित्त व्यवस्था से अभ्िाप्राय प्रस्तावित व्यवसाय को प्रारंभ करने तथा उसकी निरंतरता के लिए आवश्यक पूंजी की व्यवस्था करना है। पूंजी की आवश्यकता स्थायी संपिायों जैसे - भूमि, भवन, मशीनरी तथा साजो - सामान तथा चालू संपिायों जैसे - कच्चा माल, देनदार ;पुस्तक )णद्ध तैयार माल का स्टाॅक आदि में निवेश करने के लिए भी पूंजी की आवश्यकता होती है। दैनिक व्ययों का भुगतान करने के लिए भी पूंजी की आवश्यकता होती है। समुचित वित्तीय योजना ;अद्ध पूंजी की आवश्यकता ;बद्ध स्रोत जहाँ से पूंजी प्राप्त हो सकेगी तथा ;सद्ध पफमर् में पूंजी के सवोर्त्तम उपयोग की निश्िचत रूपरेखा बनाइर् जानी चाहिए। ;चद्ध भौतिक सुविधाएँः व्यवसाय प्रारंभ करते समय भौतिक सुविधाओं की उपलब्िध का भी ध्यान रखना चाहिए जिसमंे मशीन तथा साजो - समान, भवन एवं सहायक सेवाएँ शामिल हैं, क्यांेकि ये भी बड़े महत्त्वपूणर् घटक होते हैं। इस घटक का निणर्य व्यवसाय की प्रकृति एवं आकार वित्त की उपलब्धता तथा उत्पादन प्रिया पर निभर्र करेगा। ;छद्ध संयंत्रा अभ्िान्यास ;प्लंाट लेआउटद्धः जब भौतिक सुविधाओं की आवश्यकताएँ निश्िचत हो जाएँ तो उद्यमी को संयत्रा का ऐसा नक्शा बनाना चाहिए जिसमें सभी आवश्यक सुविधाएँ शामिल हों। जिसमें वह इन भौतिक सुविधाओं को व्यवस्िथत कर सके। अभ्िान्यास ;नक्शाद्ध से आशय प्रत्येक उस वस्तु की व्यवस्था करने से है जो किसी उत्पाद के निमार्ण के लिए आवश्यक हो, जैसे - मशीन, मानव, कच्चा माल तथा निमिर्त माल की भौतिक व्यवस्था। ;जद्ध सक्षम एवं वचनब( कामगार बलः प्रत्येक उद्यम को विभ्िान्न कायो± को पूरा करने के लिए सक्षम एवं वचनब( कामगार बल की आवश्यकता होती है ताकि भौतिक तथा वित्तीय संसाधनों को वांछित उत्पाद में परिवतिर्त किया जा सवेेफ। कोइर् भी उद्यमी सभी कायो± को स्वयं नहीं कर सकता। अतः उसे वुफशल और अवुफशल श्रम तथा प्रबंधकीय कमर्चारियों की आवश्यकताओं में तादात्मय स्थापित करना चाहिए। कमर्चारी अपने काम श्रेष्ठ तरीके से कर सवेंफ इसके लिए प्रश्िाक्षण तथा उत्प्रेरण की समुचित व्यवस्था भी करनी होगी। ;झद्ध कर संबंधी योजनाः आज - कल कर आयोजना एक आवश्यक कायर् बन गया है, क्योंकि देश में विविध कर कानून प्रचलित है, जो व्यवसाय की कायर्वििा के प्रत्येक पहलू को प्रभावित करते हैं। व्यवसाय के प्रवतर्क को विभ्िान्न कर कानूनों के अंतगर्त कर दायित्व तथा व्यावसायिक निणर्यों पर उनके प्रभाव के संबंध में पहले से सोचकर चलना चाहिए। ;णद्ध उद्यम प्रवतर्नः उपरोक्त घटकों के विषय में निणर्य लेने के उपरांत, एक उद्यमी एक उद्यम के वास्तविक प्रवतर्न के लिए कायर्वाही कर सकता है जिसका तात्पयर् विभ्िान्न संसाधनों को गतिशीलता प्रदान करना, आवश्यक कानूनी औपचारिकताओं की पूतिर्, उत्पादन प्रिया का श्रीगणेश तथा विक्रय प्रवतर्न अभ्िायान को प्रोत्साहन देना होगा। मुख्य शब्दावली व्यवसाय पेशा भंडारण लाभ बीमा सामाजिक उत्तरदायित्व तृतीयक खनन प्राथमिक नवप्रवतर्न रोजगार द्वितीयक जोख्िाम उद्योग विनिमार्ण सारांश व्यवसाय की अवधारणा तथा विशेषताएँः व्यवसाय से आशय उन आथ्िार्क ियाओं से है, जिनमें, समाज में मनुष्यों की आवश्यकताओं की पूतिर् करते हुए लाभ कमाने के उद्देश्य से वस्तुओं और सेवाओं का सृजन एवं विक्रय किया जाता है। इसकी विश्िाष्ट विशेषताएँ हैंः 1. आथ्िार्क िया 2. वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन एवं प्राप्ित 3. मानवीय आवश्यकताओं की संतुष्िट के लिए वस्तुओं और सेवाओं का विक्रय एवं विनिमय 4. नियमित रूप से वस्तुओं और सेवाओं का लेन - देन 5. लाभ अजर्न 6. प्रतिपफल की अनिश्िचतता एवं 7. जोख्िाम के तत्त्व। व्यवसाय, पेशा तथा रोजगार में तुलनाः व्यवसाय का अभ्िाप्राय उन आथ्िार्क ियाओं से है जिनका संबंध लाभ कमाने के उद्देश्य से वस्तुओं का उत्पादन, या क्रय - विक्रय, या सेवाओं की पूतिर् से हो। पेशे में वे ियाएँ सम्िमलित हैं जिनमें विशेष ज्ञान व दक्षता की आवश्यकता होती है और व्यक्ित इनका प्रयोग अपने धंधे में करता है। रोजगार का अभ्िाप्राय उन धंधों से है जिनमें लोग नियमित रूप से दूसरों के लिए कायर् करते हैं और बदले में पारिश्रमिक प्राप्त करते हैं। इन तीनों की तुलना स्थापना की वििा, कायर् की प्रवृफति, आवश्यक योग्यता, पुरस्कार या प्रतिपफल, पूंजी विनियोजन, जोख्िाम, हित हस्तांतरण तथा आचार संहिता के आधार पर किया जा सकता है। व्यावसायिक ियाओं का वगीर्करणः व्यावसायिक ियाओं को दो विस्तृत वगो± में विभाजित किया जा सकता हैः उद्योग और वाण्िाज्य। उद्योग से तात्पयर् वस्तुओं एवं पदाथोर् का उत्पादन अथवा संसािात करना है। उद्योग प्राथमिक, द्वितीयक या माध्यमिक तथा तृतीयक सेवा उद्योग हो सकते हैं। प्राथमिक उद्योगों में वे सभी ियाएँ सम्िमलित हैं जिनका संबंध प्रावृफतिक संसाधनों के खनन एवं उत्पादन तथा पशु एवं वनस्पति के विकास से है। प्राथमिक उद्योग निष्कषर्ण ;जैसे खननद्ध अथवा जननिक ;जैसे मुगीर् पालनद्ध प्रकार के हैं। द्वितीयक या माध्यमिक उद्योगों में निष्कषर्ण उद्योगों द्वारा निष्कष्िार्त माल को कच्चे माल के रूप में प्रयोग किया जाता है। ये उद्योग विनिमार्णी या रचनात्मक कहलाते हो सकते हैं। विनिमार्णी उद्योगों को विश्लेषणात्मक, वृफत्रिाम प्रिया तथा व्यवस्िथत के रूप में विभाजित किया जा सकता है। तृतीयक या सेवा उद्योग प्राथमिक तथा द्वितीयक उद्योगों को सहायक सेवाएँ सुलभ कराने में संलग्न रहते हैं तथा व्यापार संबंिात कायोर्ं में भी सहायता करते हैं। वाण्िाज्य से तात्पयर् व्यापार और व्यापार की सहायक ियाओं से है। व्यापार का संबंध वस्तुओं के विक्रय, हस्तांतरण अथवा विनिमय से है। इसको आंतरिक ;देशीयद्ध तथा बाह्य ;विदेशीद्ध व्यापार के रूप में विभाजित किया जाता है। आंतरिक व्यापार को पुनः थोक व्यापार या पुफटकर व्यापार में विभाजित किया जा सकता है। एक अन्य विभाजन बाह्य व्यापार, आयात, नियार्त अथवा पुननिर्यार्त व्यापार के रूप में भी हो सकता है। व्यापार की सहायक ियाएँ वे हैं जो व्यापार को सहायता प्रदान करती हैं। इनमें परिवहन तथा संचार, बैंविंफग एवं वित्त, बीमा, भंडारण तथा विज्ञापन सम्िमलित हैं। व्यवसाय के उद्देश्यः यद्यपि केवल लाभ कमाना ही व्यवसाय का मुख्य उद्देश्य समझा जाता है। व्यवसाय के लिए उद्देश्यों की आवश्यकता प्रत्येक उस क्षेत्रा में होती है, जो निष्पादन परिणाम व्यवसाय के जीवन और समृि को प्रभावित करते हैं। उद्देश्यों में से वुफछ हैं क्षेत्रा बाशार स्िथति नवप्रवतर्न, उत्पादकता, भौतिक एवं वित्तीय संसाधन, लाभदायकता, प्रबंधक निष्पादन एवं विकास, कमर्चारी निष्पादन एवं अभ्िावृिा तथा सामाजिक उत्तरदायित्व। व्यावसायिक जोख्िामः व्यावसायिक जोख्िामों से आशय अपयार्प्त लाभ या पिफर हानि होने की संभावना से है, जो अनिश्िचतताओं या असंभावित घटनाओं के कारण होती है। इनकी प्रवृफति को इनकी विश्िाष्ट विशेषताओं की सहायता से स्पष्ट किया जा सकता है, जो निम्न हैः 1.व्यावसायिक जोख्िाम अनिश्िचतताओं के कारण होते हैं, 2.जोख्िाम प्रत्येक व्यवसाय का अंग होता है, 3.जोख्िाम की मात्रा मुख्यतः व्यवसाय की प्रवृफति एवं आकार पर निभर्र करती है, तथा 4.जोख्िाम उठाने का प्रतिपफल लाभ होता है। व्यावसायिक जोख्िामों के अनेवफों कारण होते हैं जिनको निम्नलिख्िात भागों में विभाजित किया जा सकता है जैसे - प्रावृफतिक, मानवीय, आथ्िार्क तथा अन्य कारण हैं। व्यवसाय का आरंभः मूल घटक जिनका एक व्यवसायी को जो एक व्यवसाय प्रारंभ करने के पूवर् ध्यान में रखना चाहिए, वे - व्यवसाय के स्वरूप का चयन, पफमर् का आकार, स्वामित्व के रूप का चुनाव, उद्यम का स्थान, वित्त व्यवस्था प्रस्तावना, भौतिक सुविधाएँ, संयंत्रा अभ्िान्यास तथा वचनब( कामगार बल का आयोजन तथा उद्यम प्रवतर्न, हो सकते हैं। अभ्यास बहु विकल्प प्रश्नः 1.निम्नलिख्िात में से कौन - सी िया व्यावसायिक गतिवििा का चरित्रा - चित्राण नहीं करती हैः ;कद्ध वस्तुओं एवं सेवाओं का सृजन ;ऽद्ध जोख्िाम की विद्यमानता ;गद्ध वस्तुओं और सेवाओं की बिक्री अथवा विनिमय ;घद्ध वेतन अथवा मजदूरी 2.तेल शोधक कारखाने तथा चीनी मिलें किस उद्योग की विस्तृत श्रेणी में आते हैं। ;कद्ध प्राथमिक ;ऽद्ध द्वितीयक ;गद्ध तृतीयक ;घद्ध किसी में नहीं 3.निम्नलिख्िात में से किसे व्यापार के सहायक की श्रेणी मंे वगीर्वृफत नहीं किया जा सकताः ;कद्ध खनन ;ऽद्ध बीमा ;गद्ध भंडारण ;घद्ध यातायात 4.ऐसे धंधे को किस नाम से पुकारते हैं? जिसमें लोग नियमित रूप से दूसरों के लिए कायर् करते हैं और बदले में पारिश्रमिक प्राप्त करते हैं। ;कद्ध व्यवसाय ;ऽद्ध रोजगार ;गद्ध पेशा ;घद्ध इनमें से कोइर् नहीं। 5.ऐसे उद्योगों को क्या कहते हैं जो दूसरे उद्योगोें को समथर्न सेवा सुलभ करते हैं। ;कद्ध प्राथमिक उद्योग ;ऽद्ध द्वितीयक उद्योग ;गद्ध वाण्िाज्ियक उद्योग ;घद्ध तृतीयक उद्योग 6.निम्नलिख्िात में से किसको व्यावसायिक उद्देश्य की श्रेणी में वगीर्वृफत नहीं किया जा सकताः ;कद्ध विनियोग ;ऽद्ध उत्पादकता ;गद्ध नवप्रवतर्न ;घद्ध लाभदायकता 7.व्यावसायिक जोख्िाम होने की संभावना नहीं होती है। ;कद्ध सरकारी नीति में परिवतर्न से;ऽद्ध अच्छे प्रबंध से ;गद्ध कमर्चारियों की बेइर्मानी से ;घद्ध बिजली गुल होने से लघु उत्तरीय प्रश्नः 1.विभ्िान्न प्रकार की आथ्िार्क ियाओं को बताइए। 2.व्यवसाय को एक आथ्िार्क िया क्यों समझा जाता है? 3.व्यवसाय की अवधारणा स्पष्ट कीजिए। 4.व्यावसायिक िया - कलापों को आप कैसे वगीर्वृफत करेंगे। 5.उद्योगोें के विभ्िान्न प्रकार क्या हंै? 6.ऐसी कोइर् दो व्यावसायिक ियाओं को स्पष्ट कीजिए जो व्यापार की सहायक होती है। 7.व्यवसाय में लाभ की क्या भूमिका होती है? 8.व्यावसायिक जोख्िाम क्या होता है? इसकी प्रकृति क्या है? दीघर् उत्तरीय प्रश्नः 1.व्यवसाय की विशेषताओं को समझाइए। 2.व्यवसाय की तुलना पेशा तथा रोजगार से कीजिए। 3.विभ्िान्न प्रकार के उद्योगों को उदाहरण सहित समझाइए। 4.वाण्िाज्य से संबंिात ियाओं का वणर्न कीजिए। 5.व्यवसाय के बहु - उद्देश्य क्या हैं? उनमें से विफन्ही पाँच उद्देश्यों को समझाइए। 6.व्यावसायिक जोख्िामों की अवधारणा को समझाइए तथा इनके कारणों को भी स्पष्ट कीजिए। 7.एक व्यवसाय प्रारंभ करते समय कौन - कौन से महत्त्वपूणर् कारकों को ध्यान मंे रखना चाहिए? समझाकर लिख्िाए। परियोजना कायर् 1.किसी स्थानीय संचालित व्यापारिक अथवा व्यावसायिक इकाइर् का चुनाव कीजिए तथा यह पता लगाइए कि उस व्यवसाय में कितने प्रकार की जोख्िामों का सामना करना पड़ता है तथा वे इन जोख्िामोें से वैफसे निपटते हैं? 2.एक स्थानीय व्यावसायिक इकाइर् का चुनाव कीजिए तथा पता लगाइए कि उसके उद्देश्य क्या हैं? यह भी जाँच - पड़ताल कीजिए कि वे अन्य उद्देश्यों को क्यों नहीं अपनाते हैं?

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