पयार्वरण को यदि यथावत् छोड़ दिया जाये, तो वह निरंतर लाखों वषोर् तक जीवन का सहारा बन सकता है। इस योजना में एकमात्रा सवार्िाक अस्िथर और संभावित विनाशकारी शक्ित मानव प्रजाति है। मनुष्य आधुनिक प्रौद्योगिकी की सहायता से पयार्वरण में जाने - अनजाने दूरगामी और अपरिवर्तनीय बदलाव लाने की क्षमता रखता है। - अनजान 9.1 परिचय पिछले अध्यायों में हमने भारतीय अथर्व्यवस्था के समक्ष प्रमुख आथ्िार्क मुद्दों पर चचार् की है। अभी तक प्राप्त आथ्िार्क विकास की हमने भारी कीमत चुकाइर् है। इसके लिए हमें पयार्वरण की गुणवत्ता की बलि देनी पड़ी है। अब जैसे - जैसे हम वैश्वीकरण में जिसका संकल्प उच्च आथ्िार्क संवृि है, प्रवेश करते हंै वैसे - वैसे हमें पहले के विकास पथ के पयार्वरण पर प्रतिवूफल प्रभाव को ध्यान में रखना होगा और ध्यानपूवर्क धारणीय विकास के पथ को चुनना होगा। हमारे द्वारा अपनाये गये विकास के अधारणीय पथ और धारणीय विकास की चुनौतियों को समझने के लिए सबसे पहले हमें आथ्िार्क विकास में पयार्वरण के महत्व और योगदान को समझना होगा। इस बात को ध्यान में रखते हुए इस अध्याय को तीन भागों में बाँटा गया है। पहला भाग पयार्वरण के कायो± व भूमिका से संबंिात है। दूसरे भाग में भारत में पयार्वरण की स्िथति पर चचार् की गइर् है और तीसरे भाग में धारणीय विकास प्राप्त करने के लिए उठाये गये कदमों और युक्ितयों पर विचार किया गया है। 9.2 पयार्वरण परिभाषा और कायर्ः पयार्वरण को समस्त भूमंडलीय विरासत और सभी संसाधनों की समग्रता के रूप में परिभाष्िात किया जाता है। इसमें वे सभी जैविक और अजैविक तत्व आते हैं, जो एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। सभी जीवित तत्व - जैसे, पक्षी, पशु, पौधे, वन, मत्स्य आदि जैविक तत्व हैं जबकि हवा, पानी, भूमि, अजैविक तत्त्व हैं। चट्टान और सूयर् किरण पयार्वरण के अजैविक तत्व के उदाहरण हैं। पयार्वरण अध्ययन के अंतगत इन्हीं जैविक और अजैविक घटकों के बीच अंतस±बंधों का अध्ययन किया जाता है। पयार्वरण के कायर्ःपयार्वरण चार आवश्यक कायर् करता है - ;कद्ध यह संसाधनों की पूतिर् करता है, जिसमें नवीकरणीय और गैर - नवीकरणीय दोनों प्रकार के संसाधन शामिल होते हैं। नवीनीकरण - योग्य संसाधन वे हैं जिनका उपयोग संसाधन के क्षय या समाप्त होने वफी आशंका के बिना किया जा सकता है, अथार्त् संसाधनों की पूतिर् निरंतर बनी रहती है। नवीकरणीय संसाधनों के उदाहरणों में, वनों में पेड़ और समुद्र में मछलियाँ हैं। दूसरी ओर, गैर - नवीनीकरण योग्य संसाधन वे हंै जो कि निष्कषर्ण और उपयोग से समाप्त हो जाते हंै। उदाहरण के लिए, जीवाश्म ईंधन। ;खद्ध यह अवशेष को समाहित कर लेता है। ;गद्ध यह जननिक और जैविक विविाता प्रदान करके जीवन का पोषण करता है। यह सौदंयर् विषयक सेवाएँ भी प्रदान करता है, जैसे कि कोइर् सुंदर दृश्य। पयार्वरण इन कायो± को बिना किसी व्यवधान के तभी कर सकता है, जब तक कि ये कायर् उसकी धारण क्षमता की सीमा में हैं। इसका अथर् है कि संसाधनों का निष्कषर्ण इनके पुनजर्नन की दर से अिाक नहीं है और उत्पन्न अवशेष पयार्वरण की समावेशन क्षमता के भीतर है। जब ऐसा नहीं होता, तो पयार्वरण जीवन पोषण का अपना तीसरा और महत्वपूणर् कायर् करने में असपफल हो जाता है और इससे पयार्वरण संकट पैदा होता है। पूरे विश्व में आज यही स्िथति है। विकासशील देशों की तेजी से बढ़ती जनसंख्या और विकसित देशों के समृ( उपभोग तथा उत्पादन मानकों ने पयार्वरण के पहले दो कायो± पर भारी दबाव डाल डाला है। अनेक संसाधन विलुप्त हो गये हैं और सृजित अवशेष पयार्वरण के अवशोषी क्षमता के बाहर हंै। अवशोषी क्षमता का अथर् पयार्वरण की अपक्षय को सोखने की योग्यता से है। इसके कारण ही आज हम पयार्वरण संकट की दहलीज पर खड़े हैं। विकास के क्रम में नदियाँ और अन्य जल ड्डोत प्रदूष्िात हुए हंै और सूख गये हैं, इसने जल को एक आथ्िार्क वस्तु बना दिया है। इसके साथ इन्हें कीजिए जल एक आथ्िार्क उपभोक्ता वस्तु क्यों बन गया है? चचार् कीजिए। नीचे की सारणी में वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण के कारण होने वाले वुफछ आम रोगों और बीमारियों के नाम भरें। वायु प्रदूषण दमा जल प्रदूषण हैजा ध्वनि प्रदूषण बाॅक्स 9.1ः वैश्िवक उष्णता वैश्िवक उष्णता पृथ्वी और समुद्र के वातावरण के औसत तापमान में वृि को कहते हैं। वैश्िवक उष्णता औद्योगिकी क्रांति से ग्रीन हाउस गैसों में वृि के परिणामस्वरूप पृथ्वी के निचले वायुमंडल के औसत तापमान में क्रमिक बढ़ोत्तरी है। वत्तर्मान में और आने वाले दिनों में वैश्िवक उष्णता में अिाकांश मानव - उत्प्रेरित है। यह मानव द्वारा वनविनाश तथा जीवाश्म ईंधन के जलने से काबर्न डाइआॅक्साइड और अन्य ग्रीन हाऊस गैसों की वृि के कारण होता है। वायुमंडल में काबर्न डाइआॅक्साइड, मिथेन गैस तथा दूसरी गैसें ;जिनमें गमार्हट को सोखने की क्षमता हैद्ध वातावरण में मिलने से हमारे भूमंडल की सतह गमर् होती जायेगी। 1750 की पूवर् - औद्योगिक स्तरों से अब तक काबर्न डाइआॅक्साइड और ब्भ्4 के वायुमंडलीय संवेंफद्रण में क्रमशः 31 प्रतिशत और 149 प्रतिशत की वृि हुइर् है। पिछली शताब्दी में ववायुमंडलीय तापमान में 1.1 ि;0ण्6 ब्द्ध की वृि हुइर् है और समुद्र तल कइर् इंच ऊपर उठ गया है। वैश्िवक उष्णता के वुफछ दीघर्कालीन परिणाम हैं - ध्रुवीय हिम का पिघलना जिसके परिणामस्वरूप समुद्र स्तर में वृि और बाढ़ का प्रकोप, हिम पिघलाव पर निभर्र पेयजल की पूतिर् में पारिस्िथतिक अंसतुलन के कारण प्रजातियों की विलुप्ितऋ उष्ण कटिबंधीय तूपफानों की बारंबारता और उष्णकटिबंधीय रोगों के प्रभाव में बढ़ोत्तरी। वैश्िवक उष्णता में योगदान करने वाले अन्य तत्व हंैःं कोयला व पेट्रोल उत्पाद का प्रज्ज्वलन ;ये काबर्न - डाइआॅक्साइड, मिथेन, नाइट्रस आॅक्साइड, ओजोन के स्रोत हैंद्ध, वनविनाश जो कि वातावरण में काबर्न डाइआॅक्साइड की मात्रा में वृि करता है , जानवरों की अपश्िाष्ट से निकलने वाली मिथेन गैस और पशु की संख्या में वृि जो कि वनविनाश, मिथेन उत्पादन और जीवाश्म इर्ंधन के प्रयोग में योगदान करती है। 1997 में क्योटो, जापान में जलवायु परिवतर्न पर एक संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन हुआ जिसमें वैश्िवक उष्णता का सामना करने के लिए अंतरार्ष्ट्रीय समझौता हुआ। इस समझौते में औद्योगीकृत राष्ट्रों से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सजर्न में कमी करने की माँग की गइर्। स्रोतः ूूूण्ूपजबपचमकपंण्वतह ही नवीकरणीय और गैर - नवीकरणीय संसाधनों के गहन और विस्तृत निष्कषर्ण से अनेक महत्वपूणर् संसाधन विलुप्त हो गये हैं और हम नये संसाधनों की खोज में प्रौद्योगिकी व अनुसंधान पर विशाल राश्िा व्यय करने के लिए मजबूर हैं। इसके साथ जुड़ी है पयार्वरण अपक्षय की गुणवत्ता की स्वास्थ्य लागत। जल और वायु की गुणवत्ता की गिरावट ;भारत में 70 प्रतिशत जल प्रदूष्िात हैद्ध से साँस और जल - संक्रामक रोगों की घटनाएँ बढ़ी हैं। परिणामस्वरूप, व्यय भी बढ़ता जा रहा है। वैश्िवक पयार्वरण मुद्दों जैसे, वैश्िवक उष्णता और ओजोन क्षय ने स्िथति को और भी गंभीर बना दिया है, जिसके कारण सरकार को अिाक धन व्यय करना पड़ा। अतः यह स्पष्ट है कि नकारात्मक पयार्वरण प्रभावों की अवसर लागत बहुत अिाक है। यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि क्या पयार्वरण समस्याएँ इस शताब्दी के लिए नइर् हैं? यदि ऐसा है तो क्यों? इस प्रश्न के उत्तर के लिए वुफछ विस्तार में जाने की बाॅक्स 9.2ः ओजोन अपक्षय ओजोन अपक्षय का अथर् समतापमंडल में ओजोन की मात्रा की कमी है। ओजोन अपक्षय की समस्या का कारण समतापमंडल में क्लोरीन और ब्रोमीन के ऊँचे स्तर हंै। इन यौगिकों के मूल है, क्लोरोफ्रलोरोकाबर्न्स ;ब्थ्ब्द्ध जिनका प्रयोग रेिफजरेटर और एयरकंडीशन को ठंडा रखने वाले पदाथर् या एरासोल प्रोपेलेन्ट्स में तथा अग्िनशामकों में प्रयुक्त किए जाने वाले ब्रोमोफ्रलोरोकाबर्न्स में होता है। ओजोन स्तर के अपक्षय के परिणामस्वरूप परा बैगनी विकिरण;न्टद्ध पृथ्वी की ओर आते हंै और जीवों को क्षति पहुँचाते हैं। ऐसा लगता है कि विकारण से मनुष्यों में त्वचा वैंफसर होता है, यह पादपप्लवक ;पफीटोप्लैंकटनद्ध के उत्पादन को कम कर जलीय जीवों को प्रभावित करता है। यह स्थलीय पौधों की संवृि को भी प्रभावित करता है। 1979 से 1990 के बीच ओजोन स्तर में लगभग 5 प्रतिशत की कमी आइर्। चूँकि ओजोन स्तर सवार्िाक हानिकारक पराबैगनी किरणों को पृथ्वी के वायुमंडल में आने से रोकता है, इसलिए अनुमानित ओजोन में कमी विश्व भर में चिंता का विषय है। इसके कारण मांटिªयल प्रोटोकोल को अपनाना पड़ा। इसके तहत ब्थ्ब् यौगिकों तथा अन्य ओजोन अपक्षयक रसायनों के प्रयोग पर रोक लगाना पड़ा जैसेः काबर्न टेट्राक्लोराइड, टिªक्लोरोथेन ;जिन्हें मिथाइल क्लोरोपफाॅमर् भी कहते हैंद्ध तथा ब्रोमाइन यौगिक तत्व जिन्हें हैलोन कहा जाता है।स्रोतरू ूूूण्बमनण्ीन आवश्यकता है। प्रारंभ के दिनों में जब सभ्यता शुरू ही हुइर् थी या जनसंख्या में इस असाधारण वृि के पूवर् और देशों द्वारा औद्योगीकरण अपनाने के पहले पयार्वरण संसाधनों की माँग और सेवाएँ उनकी पूतिर् से बहुत कम थी। इसका अथर् हुआ कि प्रदूषण, पयार्वरण की अवशोषी क्षमता के भीतर था और संसाधन निष्कषर्ण की दर इन संसाधनों के पुनः सजर्न की दर से कम थी। इसलिए, पयार्वरण समस्याएँ उत्पन्न नहीं हुइर् थी। लेकिन, जनसंख्या विस्पफोट और जनसंख्या की बढ़ती हुइर् आवश्यकताओं की पूतिर् के लिए औद्योगिक क्रांति के आगमन से स्िथति बदल गइर्। परिणामस्वरूप उत्पादन और उपभोग के लिए संसाधनों की माँग संसाधनों की पुनः सजर्न की दर से बहुत अिाक हो गइर्ऋ पयार्वरण की अवशोषी क्षमता पर दबाव बुरी तरह से बढ़ गया। यह प्रवृिा आज भी जारी है। इस तरह से, पयार्वरण की गुणवत्ता के मामले में माँग - पूतिर् संबंध पूरी तरह से उलट गये हंै - अब हमारे सामने पयार्वरण संसाधनों और सेवाओं की माँग अिाक है, लेकिन उनकी पूतिर् सीमित है। जिसके कारण अिाक उपयोग और दुरूपयोग हैं। इसीलिए, अवश्िाष्ट सृजन और प्रदूषण के पयार्वरण मुद्दे आजकल बहुत गंभीर हो गये हैं। 9.3 भारत की पयार्वरण स्िथति भूमि की उच्च गुणवत्ता, सैंकड़ों नदियाँ व उप नदियाँ, हरे - भरे वन, भूमि के सतह के नीचे बहुतायत में उपलब्ध खनिज - पदाथर्, हिन्द महासागर का विस्तृत क्षेत्रा, पहाड़ों की श्रंृखला आदि के रूप में भारत के पास पयार्प्त प्राकृतिक संसाधन हंै। दक्ष्िाण के पठार की काली मिट्टी विश्िाष्ट रूप से कपास की खेती के लिए उपयुक्त है। इसके कारण ही इस क्षेत्रा में कपड़ा उद्योग वेंफदि्रत है। अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक गंगा का मैदान है, जो कि विश्व के अत्यिाक उवर्र क्षेत्रों में से एक है और विश्व में सबसे गहन खेती और घनत्व जनसंख्या वाला क्षेत्रा है। भारतीय वन वैसे तो असमान रूप से वितरित हैं, पिफर भी वे उसकी अिाकांश जनसंख्या को हरियाली और उसके वन्य - जीवन को प्राकृतिक आवरण प्रदान करते हैं। देश में लौह - अयस्क, कोयला और प्राकृतिक गैस के भारी भंडार हैं। केवल भारत में ही विश्व के समस्त लौह - अयस्क भंडार का 20 प्रतिशत उपलब्ध है। हमारे देश के विभ्िान्न भागों में बाॅक्साइट, तांबा, क्रोमेट, हीरा, सोना, सीसा, भूरा कोयला, मैंगनीज, जिंक, यूरेनियम इत्यादि भी मिलते हैं। लेकिन, भारत में विकास गतिवििायों के पफलस्वरूप उसके सीमित प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव पड़ रहा है। इसके साथ - साथ मानव स्वास्थ्य और सुख - समृि पर भी उसका असर पड़ रहा है। भारत के पयार्वरण को दो तरपफा खतरा है - एक तो गरीबी के कारण पयार्वरण का अपक्षय और दूसरा खतरा साधन - संपन्नता और तेजी से बढ़ते हुए औद्योगिक क्षेत्राक के प्रदूषण से है। भारत की अत्यिाक गंभीर पयार्वरण समस्याओं में वायु प्रदूषण, दूष्िात जल, मृदा - क्षरण, वन्य - कटाव और वन्य - जीवन की विलुप्ित है। इनमें से प्रमुख ये है - ;कद्ध भूमि अपक्षय, ;खद्ध जैविक विविधता की हानि, ;गद्ध शहरी क्षेत्रों में वाहन प्रदूषण से उत्पन्न वायु प्रदूषण, ;घद्ध ताजे पानी का प्रबंधन और ;घद्ध ठोस अपश्िाष्ट बाॅक्स 9.3ः चिपको या अप्िपको - नाम में क्या रखा है? आप चिपको आंदोलन के बारे में जानते होंगे, जिसका उद्देश्य हिमालय पवर्त में वनों का संरक्षण करना है। कनार्टक में एक ऐसे ही आंदोलन ने एक दूसरा नाम लिया - अप्िपकोे, जिसका अथर् है बाहों में भरना। 8 सितंबर, 1983 को सिरसी जिले के सलकानी वन मंे वृक्ष काटे जा रहे थे। तब 160 स्त्राी - पुरूष, और बच्चों ने पेड़ों को बाहों में भर लिया और लकड़ी काटने वालों को भागने के लिए मजबूर होना पड़ा। वे अगले 6 सप्ताह तक वन की पहरेदारी करते रहे। इन स्वयंसेवकों ने वृक्षों को तभी छोड़ा, जब वन विभाग के अिाकारियों ने उन्हें आश्वासन दिया कि वृक्ष वैज्ञानिक आधार पर और जिले की वन संबंधी कायर् योजना के तहत काटे जाएँगे। जब ठेकेदार द्वारा वाण्िाज्ियक कटाइर् से अनेक प्राकृतिक वनों को हानि पहुँची, तो वृक्षों को बाहों में भर लेने के विचार ने लोगों में यह आशा और विश्वास उत्पन्न किया कि वे वनों का संरक्षण कर सकते हैं। उस विशेष घटना से जब वृक्षों की कटाइर् रूक गइर्, लोगों के द्वारा 12,000 वृक्षों को बचाया गया। वुफछ ही महीनों में यह आंदोलन पास के कइर् जिलों में भी पैफल गया। इर्धन की लकड़ी और औद्योगिकी प्रयोग के लिए पेड़ों की बेरोक - टोक कटाइर् से अनेक पयार्वरण समस्याओं का जन्म हुआ। उत्तर कनारा क्षेत्रा में एक कागज मिल बनने के 12 साल बाद उस क्षेत्रा में बाँस विलुप्त हो गये। एक किसान ने यह बतलाया कि बड़ी - बड़ी पिायों वाले पेड़, जो कि भूमि को वषार् के प्रत्यक्ष आक्रमण से रक्षा करते थे, समाप्त कर दिये गये। इससे मिट्टðी वषार् जल के साथ बह गइर् और अब सिपर्फ कंकड़ वाली मिट्टðी रह गइर्। अब घास के अलावा वहाँ वुफछ भी नहीं पैदा होता। किसान यह भी श्िाकायत करते हैं कि नदियाँ और उप नदियाँ जल्दी सूख रही हैं और वषार् की मात्रा भी अनियमित हो गइर् है। ऐसी बीमारियाँ और कीटाणु जो पहले नहीं थे, पफसलों को नुकसान पहुँचा रहे हैं। अप्िपको स्वयंसेवक, ठेकेदारों और वन अिाकारियों से यह चाहते हैं कि वे वुफछ नियमों तथा प्रतिबंधों का पालन करें। उदाहरण के लिए, वे चाहते हें कि काटने के लिए वृक्षों को चिित करने के पूवर् स्थानीय जनता से परामशर् लिया जाए और किसी जल स्रोत के 100 मीटर क्षेत्रा में और 30 डिग्री और उसके ऊपर की ढलान के वृक्षोें को न काटा जाए। क्या आप जानते हैं कि उद्योगों को सरकार वन भूमि प्रदान करती है, ताकि वे औद्योगिक उत्पादों के लिए वनों को कच्चे माल उपलब्ध करा सकें। भले ही एक कागज मिल 10,000 मजदूरों को और एक प्लाइर्वुड पैफक्टरी 800 लोंगों को नौकरी देती हो, परतु यदि यह दस लाख लोगों को उनकी दैनिक ंआवश्यकताओं से वंचित कर देती हैै, तो क्या यह स्वीकायर् है? आप क्या सेाचते हैं? स्त्रोतः स्टेट आॅपफ इंडियास एनवायरमेंट 2ः द सेवेंफड सिटीजंस रिपोटर्, 1984 - 85, संेटर साइस एंड एनवायरमेंट, 1996, नइर् दिल्ली। प्रबंधन। भारत में भूमि का अपक्षय विभ्िान्न मात्रा और रूपों में हुआ है, जो कि मुख्य रूप से अस्िथर प्रयोग और अनुपयुक्त ;प्रबंधनद्ध कायर् - प्रणाली का परिणाम है। भूमि के अपक्षय के लिए उत्तरदायी वुफछ प्रमुख कारण हंैः ;कद्ध वन विनाश के पफलस्वरूप वनस्पति की हानि ;खद्ध अधारणीय जलाऊ लकड़ी और चारे का निष्कषर्ण ;गद्ध खेती - बारी ;घद्ध वन - भूमि का अतिक्रमण ;घद्ध वनों में आग और अत्यिाक चराइर् ;चद्ध भू - संरक्षण हेतु भारत विश्व जनसंख्या के लगभग 17 प्रतिशत और विश्व पशुधन के 20 प्रतिशत को विश्व के वुफल भौगोलिक क्षेत्रा के मात्रा 2.5 प्रतिशत क्षेत्रा मंे आश्रय देता है। जनसंख्या और पशुधन का अिाक घनत्व और वानिकी, कृष्िा, चराइर्, मानव बस्ितयाँ और उद्योगों के प्रतिस्पर्धी उपयोगों से देश के निश्िचत भू - संसाधनों पर भारी दवाब पड़ता है। देश में प्रतिव्यक्ित जंगल भूमि केवल 008 हेक्टेयर है, जबकि बुनियादी आवश्यकताओं इन्हें कीजिए ऽ आथ्िार्क विकास में पयार्वरण के योगदान को छात्रों को समझाने के लिए निम्न खेल खेला जा सकता है। एक छात्रा किसी उद्यम द्वारा प्रयुक्त किसी उत्पाद का नाम ले और दूसरा छात्रा उसकी जड़ों को प्रकृति और पृथ्वी एक ट्रक ड्राइवर को काले धुएँ का उत्सजर्न करने के कारण 1000 रुपये चालान के रूप में भुगतान करना पड़ा। क्या आपने समझा किं, उसे क्यों दंड दिया गया? क्या यह सही था? चचार् कीजिए। में खोज सकता है। ट्रक स्टील और रबर स्टील लोहा खनिज पृथ्वी रबर वृक्ष वन पृथ्वी पुस्तवेंफ कागज वृक्ष वन पृथ्वी वस्त्रा कपास पौधा प्रकृति पेट्रोल पृथ्वी मशीनें लोहा खनिज पृथ्वी समुचित उपायों को न अपनाया जाना ;छद्ध अनुचित पफसल चक्र ;जद्ध कृष्िा - रसायन का अनुचित प्रयोग जैसे, रासायनिक खाद और कीटनाशक ;झद्धसिंचाइर् व्यवस्था का नियोजन तथा अविवेवकपूणर् प्रबंधन ;टद्ध भूमि जल का पुनः पूणर् क्षमता से अिाक निष्कषर्ण ;ठद्ध संसाधनों की निबार्ध उपलब्धता और ;ड.द्ध कृष्िा पर निभर्र लोगों की दरिद्रता। की पूतिर् के लिए यह संख्या 0.47 हेक्टेयर होनी चाहिए। परिणामस्वरूप, वनों की कटाइर् स्वीकायर् सीमा से लगभग 15 मिलियन क्यूबिक मीटर अिाक होती है। मृदा - क्षरण के अनुमान यह दशार्ते हैं कि पूरे देश में एक वषर् में भूमि का क्षरण 5.3 बिलियन टन प्रतिशत की दर से हो रहा है और इससे देश को प्रत्येक वषर् 0.8 मिलियन टन नाइट्रोजन, बाॅक्स 9.4ः प्रदूषण नियंत्राण बोडर् भारत में वायु तथा जल प्रदूषण की दो प्रमुख पयार्वरण चिंताओं से निपटने के लिए सरकार ने 1974 में वेंफद्रीय प्रदूषण नियंत्राण बोडर् ;ब्च्ब्ठद्धकी स्थापना की। इसके बाद, राज्य स्तर पर सभी पयार्वरण चिंताओं से निपटने के लिए राज्यों ने अपने - अपने बोडर् बनाये। ये बोडर् ;ब्च्ब्ठद्धजल, वायु और भूमि प्रदूषण से संबंिात सूचनाओं का संकलन और वितरण करते हैं। वे कचड़े/व्यापार निकास और उत्सजर्न के मानक निधार्रित करते हैं। ये बोडर् सरकारों को जल प्रदूषण के रोकथाम, नियंत्राण और कमी के लिए जल - धाराओं द्वारा नदियों और वुफओं की स्वच्छता के संवधर्न के लिए तकनीकी सहायता प्रदान करते हैं। इनका कायर् वायु की गुणवत्ता में सुधार भी है। ये देश में वायु प्रदूषण के नियंत्राण द्वारा भी सरकारों को तकनीकी सहायता प्रदान करते हैं। ये बोडर् जल व वायु प्रदूषण से संबंिात समस्याओं की जाँच व अनुसंधान भी करते हैं और ऐसी जाँच व अनुसंधान को प्रायोजित करते हैं। इसके लिए वे जन संचार के माध्यम से जन जागरूकता कायर्क्रम भी संगठित करते हैं। च्ब्ठ कचरे व वाण्िाज्य अपश्िाष्टों के निपटान और उपचार से संबंिात नियमावली, संहिता और मागर्दशर्क सूचिका तैयार करते हैं। उद्योगों के विनियमन द्वारा वे वायु गुणवत्ता का मूल्यांकन करते हैं। वास्तव में अपने जिला स्तरीय अिाकारियों के माध्यम से राज्य बोडर् अपने क्षेत्रािाकार में आने वाले प्रत्येक उद्योग का समय - समय पर निरीक्षण निकास और गैसीय उत्सजर्न के हेतु उपलब्ध उपायों की पयार्प्तता का विश्लेषण करने के लिए करता है। वे उद्योग - स्थान निधार्रण व नगर नियोजन के लिए आवश्यक पृष्ठभूमि तथा वायु गुणवत्ता आँकड़े भी प्रदान करता है। प्रदूषण नियंत्राण बोडर् जल प्रदूषण से संबंिात तकनीकी और सांख्ियकी आँकड़ों का संकलन, संपादन और वितरण करते हैं। ये 125 नदियों ;इसमें उपनदियाँ भी शामिल हैंद्ध, वुफएँ, झील, खाड़ी, तालाब, टैंक, नाले और नहरों में जल की गुणवत्ता की देखरेख करते हैं। निकट के कारखाने/सिंचाइर् विभाग में जाइए और जल तथा वायु प्रदूषण को नियंत्रिात करने के लिए उनके द्वारा अपनाये गये उपायों का विवरण इकट्टòा कीजिए। वायु तथा जल प्रदूषण से संबंिात जागरूकता कायर्क्रमों को आप समाचार - पत्रों, रेडियो और दूरदशर्न या अपने स्थानीय इलाकों में विज्ञापन - पत्रों में देखते होंगे। वुफछ समाचार कतरनें, पैंपफलेट और अन्य सूचनाएँ एकत्रा करें और कक्षा में उन पर चचार् करें। 1.8 मिलियन टन पफाॅस्पफोरस और 26.3 मिलियन टन पोटाश्िायम का नुकसान होता है। भारत सरकार के अनुसार प्रत्येक वषर् भूमि क्षय से 5.8 मिलियन टन से 8.4 मिलियन टन पोषक तत्वों की क्षति होती है। भारत में शहरी इलाकों में वायु - प्रदूषण बहुत है, जिसमें वाहनों का सवार्िाक योगदान है। वुफछ अन्य क्षेत्रों में उद्योगों के भारी जमाव और थमर्ल पावर संयंत्रों के कारण वायु प्रदूषण होता है। वाहन उत्सजर्न चिंता का प्रमुख कारण है क्योंकि यह धरातल पर वायु प्रदूषण का स्रोत है और आम जनता पर अिाकतम प्रभाव डालता है। मोटर वाहनों की संख्या 1951 के 3 लाख से बढ़कर 2003 में 67 करोड़ हो गइर्। 2003 में व्यक्ितगत परिवहन, वाहन ;केवल दो पहिये वाहन और कारद्ध संख्या वुफल पंजीकृत वाहनों का 80 प्रतिशत थी। इस तरह ये, वुफल वायु प्रदूषण बोझ में उल्लेखनीय योगदान करते हैं। भारत विश्व का दसवाँ सवार्िाक औद्योगिक देश है। लेकिन, इसके कारण से अनचाहे और अप्रत्याश्िात परिणाम जैसे, अनियोजित शहरीकरण, प्रदूषण और दुघर्टनाओं का जोख्िाम जुड़े हुए हंै। इन्हें कीजिए आप किसी भी राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रा में वायु प्रदूषण के माप का स्तंभ देख सकते हैं। इस पर दिवाली से एक सप्ताह पूवर्, दिवाली के दिन और दिवाली के दो दिन बाद के समाचार काटिये। क्या आप इनके माप में कोइर् महत्वपूणर् अंतर देखते हंै? अपनी कक्षा में चचार् कीजिए। वेंफद्रीय प्रदूषण नियंत्राण बोडर् ;ब्मदजतंस च्वससनजपवपद ब्वदजतवस ठवंतकद्ध ने उद्योगों की 17 श्रेण्िायों की पहचान बडे़ पैमाने पर प्रदूषण पैफलाने वाले उद्योगों के रूप में की है। उपयुर्क्त बिंदु भारतीय पयार्वरण की चुनौतियों पर प्रकाश डालते हैं। पयार्वरण मंत्रालय और वेंफद्रीय व राज्य प्रदूषण नियंत्राण बोडो± द्वारा उठाये गये विभ्िान्न कदम तब तक कारगर नहीं होंगे, जब तक कि हम सोच - समझ कर धारणीय विकास के रास्ते को नहीं चुनते। भावी पीढि़यों के भविष्य की दृष्िट के लिए किया गया विकास ही चिरस्थायी होगा। बिना भावी पीढ़ी की चिंता किए, अपने वतर्मान जीवन - स्तर को बढ़ाने के लिए किए विकास - कायर् संसाधनों तथा पयार्वरण का अपक्षय इस गति से करेंगे, जिससे पयार्वरण संबंधी तथा आथ्िार्क संकट दोनों पैदा हो सकते हंै। 9.4 धारणीय विकास पयार्वरण और अथर्व्यवस्था दोनांे एक दूसरे पर निभर्र और एक दूसरे के लिए आवश्यक हैं। अतः पयार्वरण पर होने वाले परिणामों की अवहेलना करने वाला विकास उस पयार्वरण का विनाश कर देगा, जो जीवन को धारण करता है। अतः आवश्यकता है, ऐसे विकास की जो कि भावी पीढि़यों को जीवन की संभावित औसत गुणवत्ता प्रदान करे, जो कम से कम वतर्मान पीढ़ी के द्वारा उपभोग की गइर् सुविधाओं के बराबर हो। धारणीय विकास की अवधारणा पर संयुक्त राष्ट्र पयार्वरण और विकास सम्मेलन ;न्छब्म्क्द्ध ने बल दिया, जिसने इसे इस प्रकार परिभाष्िात किया - ‘ऐसा विकास जो वतर्मान पीढ़ी की आवश्यकताओं को भावी पीढि़यों की आवश्यकताओं की पूतिर् क्षमता का समझौता किये बिना पूरा करंे’। इस परिभाषा को दुबारा पढं़े। आप देखेंगे कि ‘आवश्यकता’ और ‘भावी पीढि़याँ’ ये दो महत्त्वपूणर् अवधारणाएँ हंै। परिभाषा में आवश्यकता की अवधारणा का संबंध संसाधनों के वितरण से है। सम्मेलन की रिपोटर् - आवर काॅमन फ्रयूचर ;वनत बवउउवद निजनतमद्ध जिसने उपयुर्क्त परिभाषा दी है, धारणीय विकास की व्याख्या ‘‘सभी की बुनियादी आवश्यकताओं की पूतिर् और एक अच्छे जीवन की आकांक्षाओं की संतुष्िट के लिए सभी को अवसर प्रदान करने के रूप मंे की है।’’ सभी की आवश्यकताओं की पूतिर् के लिए संसाधनों के पुनविर्तरण की आवश्यकता होगी, इसीलिए यह एक नैतिक प्रश्न है। एडवडर् बारबियर ने धारणीय विकास की परिभाषा बुनियादी स्तर पर गरीबों के जीवन के भौतिक मानकों को ऊँचा उठाने के सदंभर् मे दी है जिसे आय, वास्तविक आय, शैक्ष्िाक सेवाएँ, स्वास्थ्य देखभाल, सपफाइर्, जल पूतिर् इत्यादि के रूप में परिमाणात्मक रूप से मापा जा सकता है। अिाक स्पष्ट शब्दों में हम कह सकते हैं कि धारणीय विकास का लक्ष्य गरीबों की समग्र दरिद्रता को कम करके उन्हें चिरस्थायी व सुरक्ष्िात जीविका निवार्ह साधन प्रदान करना है जिससे संसाधन अपक्षय, पयार्वरण अपक्षय, सांस्कृतिक विघटन और सामाजिक अस्िथरता न्यूनतम हो। इस अथर् में धारणीय विकास का अथर् उस विकास से है जो सभी की, विशेष रूप से बहुसंख्यक निधर्नों की, बुनियादी आवश्यकताओं जैसे - रोजगार, भोजन, ऊजार्, जल, आवास आदि की पूतिर् करे और इन आवश्यकताओं की पूतिर् हेतु कृष्िा, विनिमार्ण, बिजली और सेवाओं की वृि सुनिश्िचत करे। बु्रटलैंड कमीशन ने भावी पीढ़ी को संरक्ष्िात करने पर जोर दिया। यह पयार्वरणविदों के उस तवर्फ के अनुवूफल है, जिसमें उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि यह हमारा नैतिक दायित्व है कि हम भावी पीढ़ी को एक व्यवस्िथत भूमंडल प्रदान करंें। दूसरे शब्दों में, वतर्मान पीढ़ी को आगामी पीढ़ी द्वारा एक बेहतर पयार्वरण उत्तरािाकार के रूप में सौंपा जाना चाहिए। कम से कम हमें आगामी पीढ़ी के जीवन के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली परिसंपिायों का भंडार छोड़ना चाहिए, जो कि हमें उत्तरािाकार के रूप प्राप्त हुआ है। वतर्मान पीढ़ी का दायित्व है कि ऐसे विकास का संव(र्न कर प्राकृतिक और निमिर्त पयार्वरण का सामंजस्य स्थापित करंे जो ;कद्ध प्राकृतिक संपदा का संरक्षण ;खद्ध विश्व की प्राकृतिक पारिस्िथतिक व्यवस्था की पुनजर्नन क्षमता की सुरक्षा और ;गद्ध भविष्य की पीढि़यों के ऊपर अतिरिक्त खचेर् या जोख्िाम को हटाने के अनुवूफल हो। हरमन डेली, एक विख्यात पयार्वरणवादी अथर्शास्त्राी के अनुसार धारणीय विकास की प्राप्ित के लिए निम्नलिख्िात आवश्यकताएँ हैंः ;कद्धमानव जनसंख्या को पयार्वरण की धारण क्षमता के स्तर तक सीमित करना होगा। पयार्वरण की धारण क्षमता एक जहाज के भार ढोने की क्षमता के समान है। अथर्व्यवस्था में इस प्रकार की क्षमता के अभाव में मनुष्यों की संख्या पृथ्वी की धारण - क्षमता से अिाक हो जाती है, जो हमें धारणीय विकास से दूर ले जाते हैं। ;खद्ध प्रौद्योगिक प्रगति आगत - निपुण हो न कि आगत उपभोगी। ;गद्धनवीकरणीय संसाधनों का निष्कषर्ण धारणीय आधार पर हो ताकि किसी भी स्िथति में निष्कषर्ण की दर पुनसृर्जन की दर से अिाक न हो। ;घद्ध गैर - नवीकरणीय संसाधनों का अपक्षय दर नवीनीकृत प्रतिस्थापकों से अिाक नहीं होनी चाहिए और ;घद्ध प्रदूषण के कारण उत्पन्न अक्षमताओं का सुधार किया जाना चाहिए। 9.5 धारणीय विकास की रणनीतियाँ ऊजार् के गैर पारंपरिक स्रोतों का उपयोग: जैसा कि आप जानते हैं कि भारत अपनी विद्युत आवश्यकताओं के लिए थमर्ल और हाइड्रों पाॅवर संयंत्रों पर बहुत अिाक निभर्र है। इन दोनों का पयार्वरण पर प्रतिवूफल प्रभाव पड़ता है। थमर्ल पाॅवर संयंत्रा बड़ी मात्रा में काबर्न - डाइआॅक्साइड का उत्सजर्न करते हैं, जो एक ग्रीन हाउस गैस है। थमर्ल पाॅवर प्लांटों से बड़ी मात्रा में धुएँ के रूप में राख भी निकलती है, जिसका उचित उपयोग न हो तो जल, भूमि और पयार्वरण के अन्य संघटकों के प्रदूषण का कारण हो सकता है। जल - विद्युत परियोजनाओं से वन जलमग्न हो जाते हंै और नदी प्रवाह क्षेत्रों तथा नदी की घाटियों के प्राकृतिक प्रवाह में हस्तक्षेप करते हैं। वायु शक्ित और सौर किरणें पारंपरिक ऊजार् के अच्छे उदाहरण हंै, तकनीकी ज्ञान के अभाव में इसका विस्तृत रूप में अभी तक विकास नहीं हो पाया है। इन्हें कीजिए दिल्ली में बसें और अन्य सावर्जनिक जन परिवहन पेट्रोल या डीजल के बजाय उच्चदाब गैस ब्छळ का उपयोग करते हैं तथा वुफछ वाहन परिवतर्नीय इंजनों का उपयोग करते हैं। सौर ऊजार् का उपयोग स्ट्रीट लाइट के लिए किया जाता है। इन परिवतर्नों के बारे में आप क्या सोचते हैं? भारत में धारणीय विकास की आवश्यकता पर अपनी कक्षा मंे परिचचार् का आयोजन कीजिए। ग्रामीण क्षेत्रों में एल.पी.जी. गोबर गैसः ग्रामीण क्षेत्रा में रहने वाले परिवार प्रायः लकड़ी, उपले और अन्य जैविक पदाथोर्ं का इस्तेमाल ईंधन के रूप में करते हैं। इससे वन विनाश, हरित - क्षेत्रा में कमी, मवेश्िायों के गोबर का अप्रत्यय और वायु प्रदूषण जैसे अनेक प्रतिवूफल प्रभाव होते हैंै। इस स्िथति को सुधारने के लिए सहायिकी द्वारा कम कीमत पर तरल पेट्रोलियम गैस ;स्च्ळद्ध प्रदान की जा रही है। इसके अतिरिक्त, गोबर गैस संयंत्रा आसान )ण और सहायिकी देकर उपलब्ध कराये जा रहे हैं। जहाँ तक तरल पेट्रोलियम गैस का संबंध है, यह एक स्वच्छ इर्ंधन है जो कि परिवारों में प्रदूषण को कापफी हद तक कम करता है। इसमें ऊजार् का अपव्यय भी न्यूनतम होता है। गोबर गैस संयंत्रा को चलाने के लिए गोबर को संयंत्रा में डाला जाता है और उससे गैस का उत्पादन होता है, जिसका ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। जो बच जाता है, वह एक बहुत ही अच्छा जैविक उवर्रक और मृदा अनुवूफलक है। शहरी क्षेत्रों में उच्चदाब प्राकृतिक गैस ;ब्छळद्धः दिल्ली में सावर्जनिक परिवहन प्रणाली में उच्चदाब प्राकृतिक गैस ;ब्छळद्ध के ईंधन के रूप में प्रयोग से वायु प्रदूषण बड़े पैमाने पर कम हुआ है और पिछले वुफछ वषो± से हवा स्वच्छ हुइर् है। वायु शक्ितः जिन क्षेत्रों में हवा की गति आमतौर पर तीव्र होती है, वहाँ पवन चक्की से बिजली प्राप्त की जा सकती है। ऊजार् का यह स्रोत पयार्वरण पर कोइर् प्रतिवूफल प्रभाव भी नहीं डालता। हवा के साथ - साथ टरबाइन घूमते हैं और बिजली पैदा होती है। इसमें शक नहीं कि इसमें प्रारंभ्िाक व्यय बहुत है, लेकिन इसके लाभ ऐसे हंै जो इसकी अिाक लागत को आत्मसात् कर लेते हैं। पफोटोवोल्टीय सेल द्वारा सौर शक्ितः प्राकृतिक रूप से भारत में सूयर् किरण के माध्यम से सौर ऊजार् भारी मात्रा में उपलब्ध है। हम इसका प्रयोग विभ्िान्न तरीकों से करते हैं। उदाहरण के लिए, हम कपड़े, अनाज तथा अन्य कृष्िा उत्पाद और दैनिक उपयोग की विभ्िान्न वस्तुओं को सुखाते हैं। सदीर् में सूयर् किरण का उपयोग हम गरमाहट के लिए करते हैं। पौधे सौर ऊजार् का प्रयोग प्रकाश - संश्लेषण के लिए करते हैं। अब पफोटोवाॅल्िटक सेलों की मदद से सौर ऊजार् को विद्युत में परिवतर्न किया जा सकता है। ये सेल सौर ऊजार् को एक विश्िाष्ट प्रकार के उपकरण से पकड़ते हैं और पिफर ऊजार् को बिजली में बदल देते हैं। यह प्रौद्योगिकी दूरदराज के क्षेत्रों और ऐसी जगहों के लिए उपयोगी है, जहाँ गि्रड अथवा तारों द्वारा विद्युत पूतिर् या तो संभव नहीं है अथवा खचीर्ली है। यह प्रौद्योगिकी प्रदूषण से पूणर्तया मुक्त है। लघु जलीय प्लांटः पहाड़ी इलाकों में लगभग सभी जगहों में झरने मिलते हैं। इन झरनों में से अिाकांश स्थायी होते हैं। मिनिहाइडल प्लांट इन झरनों की ऊजार् से छोटी टरबाइन चलाते हैं। टरबाइन से बिजली का उत्पादन होता है, जिसका प्रयोग स्थानीय स्तर पर किया जा सकता है। इस प्रकार के पाॅवर प्लांट पयार्वरण के लिए हितकर होते हैं, क्योंकि जहाँ वे लगाये जाते हैं वहाँ भू - उपयोग की प्रणाली में कोइर् परिवतर्न नहीं करते। इसका यह भी अथर् है कि ऐसे प्लांटों के उपयोग से बड़े - बड़े संचरण टावर ;जतंदेउपेेपवद जवूमतेद्ध और तारों की इसमें जरूरत नहीं होती है और संचरण की हानि को रोका जा सकता है। पारंपरिक ज्ञान व व्यवहारः पारंपरिक रूप से भारतीय लोग पयार्वरण के निकट रहे हैं। वे पयार्वरण के एक अंग के रूप में रहे हैं, न कि उसके नियंत्राक के रूप में। यदि हम अपनी कृष्िा व्यवस्था, स्वास्थ्य - सुविधा व्यवस्था, आवास, परिवहन आदि को पीछे मुड़कर देखें, तो पता चलेगा कि हमारे सभी ियाकलाप पयार्वरण के लिए हितकर रहे हैं। लेकिन, आजकल हम अपनी पांरपरिक प्रणालियों से दूर हो गये हैं, जिससे हमारे पयार्वरण और हमारी ग्रामीण विरासत को भारी मात्रा में हानि पहुँची है। अब समय आ गया है कि हम पारंपरिक ज्ञान पर ध्यान दें। इसका सबसे अच्छा उदाहरण स्वास्थ्य की देखभाल है। भारत बहुत ही सौभाग्यशाली है। यहाँ औषिागुण से युक्त पौधों की लगभग 15,000 प्रजातियाँ हैं। इनमें से लगभग 8,000 जड़ी - बूटियों का प्रयोग उपचार की विभ्िान्न प्रणालियों में लोक - परंपरा सहित नियमित रूप से होता है। उपचार की पश्िचमी प(ति के अचानक आ जाने से हमने पारंपरिक प्रणालियों जैसे, आयुवेर्दिक, यूनानी, तिब्बती व लोक प्रणालियों की अवहेलना शुरू कर दी। अब इन स्वास्थ्य प्रणालियों की माँग पुराने रोगों के उपचार के लिए पिफर से हो रही है। आजकल सभी सौंदयर् उत्पाद जैसे, बालों के लिए तेल, टूथपेस्ट, शरीर के लिए लोशन, चेहरे की क्रीम इत्यादि हबर्ल हैं। ये उत्पाद न केवल पयार्वरण के अनुवूफल हैं बल्िक उनसे कोइर् हानि नहीं होती और उनके लिए बड़ी मात्रा में किसी औद्योगिक और रासायनिक प्रिया का सहारा भी नहीं लेना पड़ता। जैविक कंपोस्ट खादः पिछले पाँच दशकों में कृष्िा उत्पादन बढ़ाने की कोश्िाश में हमने जैविक कंपोस्ट खाद की अवहेलना की और पूरी तरह से रासायनिक खाद का उपयोग करने लगे। इससे मात्रा में उवर्र भूमि पर बहुत प्रतिवूफल प्रभाव पड़ा। रासायनिक प्रदूषण से जल व्यवस्था, विशेषकर भूतल जल प्रणाली, दूष्िात हुइर्। यह भी सही है कि प्रत्येक वषर् सिंचाइर् की माँग में बढ़ोत्तरी हो रही है। पूरे देश में अब भारी संख्या में किसान विभ्िान्न जैविक अवश्िाष्टों जैसे, करकट से बनी कंपोस्ट खाद का उपयोग कर रहे हैं। देश के वुफछ भागों में जानवर इसलिए पाले जाते हैं, जिससे वे गोबर दे सवेंफ। जो महत्वपूणर् खाद है और मिट्टðी को उवर्र बनाता है। वेंफचुए सामान्यतः वंफपोस्ट खाद प्रिया की अपेक्षा तीव्रता से जैविक वस्तुओं को वंफपोस्ट में बदल सकते हैं। इस प्रिया का अब व्यापक तौर पर प्रयोग हो रहा है। इससे नागरिक प्रशासन अिाकारियों को भी अप्रत्यक्ष रूप से लाभ होता है, क्योंकि उन्हें कम वूफड़ा हटाना पड़ता है। जैविक - कीट नियंत्राणः हरित क्रांति के आगमन के बाद, अिाक उत्पाद के लिए पूरे देश में रासायनिक कीटनाशकों का अिाकािाक प्रयोग होने लगा। इससे बहुत जल्दी प्रतिवूफल प्रभाव दिखने लगे। भोज्य पदाथर् दूष्िात हो गये। मृदा, जलाशय, यहाँ तक कि भूतल जल भी कीटनाशकों के कारण प्रदूष्िात हो गये। दूध, माँस और मछलियाँ भी दूष्िात पाइर् गइंर्। इस चुनौती का सामना करने के लिए अब बेहतर कीट नियंत्राक तरीकों को बनाने के प्रयास हो रहे हैं। इनमें से एक उपाय पौधों के उत्पाद पर आधारित कीटनाशकों का उपयोग है। नीम के पेड़ इसमें कापफी उपयोगी साबित हो रहे हैं। नीम से अनेक प्रकार के कीट नियंत्राक रसायन बनाये गये हैं और उनका उपयोग हो रहा है। मिश्रित पफसल और एक ही भूमि पर लगातार कइर् वषो± तक अलग - अलग पफसलों के उत्पादन से भी किसानों को लाभ पहुँचा है। इसके अतिरिक्त, विभ्िान्न जानवर और पक्ष्िायों 9.6 निष्कषर् के बारे में जागरूकता बढ़ी है जो कीट नियंत्राण में सहायक है। उदाहरण के लिए, साँप, चूहों और अनेक प्रकार के कीड़ों को खा जाता है। इसी प्रकार उल्लू, मोर जैसे पक्षी अनेक हानिकारक कीटों का भक्षण करते हैं। यदि हम इन्हें कृष्िा क्षेत्रा में रहने दें तो वे कापफी संख्या में कीटों का नाश कर देंगे। इस संबंध में छिपकली भी उपयोगी है। हमें उनकी कीमत समझनी चाहिए और उनका संरक्षण होना चाहिए। आजकल धारणीय विकास शब्द बहुत लोकपि्रय हो गया है। विकास की विचारधारा में निश्चय ही यह एक दृष्टांत परिवतर्न है। कइर् प्रकार से इसकी व्याख्या भी की गइर् है। लेकिन, इस मागर् को अपनाने से चिरस्थायी विकास और सभी के लिए कल्याण सुनिश्िचत होगा। आथ्िार्क विकास से, जिसका लक्ष्य बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूतिर् के लिए वस्तुओं व सेवाओं के उत्पादन को बढ़ाना है, पयार्वरण पर बहुत दबाव पड़ता है। विकास की प्रारंभ्िाक अवस्थाओं में पयार्वरण संसाधनों की माँग पूतिर् से कम थी। अब विश्व के समक्ष पयार्वरण संसाधनों की बढ़ती माँग है, लेकिन उनकी पूतिर् अत्यिाक उपयोग व दुरूपयोग की वजह से सीमित है। धारणीय विकास का लक्ष्य उस प्रकार के विकास का संव(र्न है, जोकि पयार्वरण समस्याओं को कम करे और भावी पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूतिर् करने की क्षमता से समझौता किए बिना, वतर्मान पीढ़ी की शरूरतों को पूरा करे। पुनरावतर्न ऽ पयार्वरण के चार कायर् हैंः संसाधन पूतिर्, अपश्िाष्ट - विसजर्न, जननिक और जैविक विविधता प्रदान करते हुए जीवन का पोषण तथा सौदयर् सेवाएँ प्रदान करना। जनसंख्या विस्पफोट, प्रचुर मात्रा में उपभोग और उत्पादन ने पयार्वरण पर भारी दबाव डाला है। भारत में विकास कायोर्ं ने प्राकृतिक संसाधनों की निश्िचत परिभाषा पर दबाव डाला है। इससे मानव स्वास्थ्य और सुख समृि पर भी प्रतिवूफल प्रभाव पड़ा है। भारत के पयार्वरण पर दो प्रकार के संकट मँडरा रहे हैं - पहला संकट तो निधर्नताजनित पयार्वरण क्षय का है और दूसरा संकट संपन्नता तथा तेजी से बढ़ते औद्योगिक क्षेत्राक से हो रहे प्रदूषण का है। ऽ यद्यपि सरकार अनेक प्रकार के प्रयासों से पयार्वरण की रक्षा करने का यत्न कर रही है, पिफर भी धारणीय विकास का मागर् अपनाना आवश्यक है। ऽ धारणीय विकास का अथर् वतर्मान पीढ़ी की आवश्यकताओं को इस प्रकार पूरा करना है कि भविष्य की पीढि़यों को अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने में किसी बाधा का सामना न करना पड़े। प्राकृतिक संसाधनों के संव(र्न, सरंक्षण और पारिस्िथतिक पुनजर्नन क्षमता को बनाए रखने और भावी पीढि़यों के लिए पयार्वरणीय सवंफटों के निवारण से ही धारणीय विकास संभव हो पाएगा अभ्यास1.पयार्वरण से आप क्या समझते हंै?2.जब संसाधन निस्सरण की दर उनके पुनजर्नन की दर से बढ़ जाती है, तो क्या होता है?3.निम्न को नवीकरणीय और गैर - नवीकरणीय संसाधनों में वगीर्कृत करें। ;कद्धवृक्ष ;खद्ध मछली ;गद्ध पेट्रोलियम ;घद्ध कोयला ;घद्ध लौह अयस्क ;चद्ध जल 4.आजकल विश्व के सामने .....और .....की दो प्रमुख पयार्वरण समस्याएँ हैं। 5.निम्न कारक भारत में कैसे पयार्वरण संकट में योगदान करते हैं? सरकार के समक्ष वे कौन - सी समस्याएँ पैदा करते हैंः ऽ बढ़़ती जनसंख्या ऽ वायु - प्रदूषण ऽ जल - प्रदूषण ऽ संपन्न उपभोग मानक ऽ निरक्षरता ऽ औद्योगीकरण ऽ शहरीकरण ऽ वन - क्षेत्रा में कमी ऽ अवैध वन कटाइर् ऽ वैश्िवक उष्णता6.पयार्वरण के क्या कायर् होते हैं?7.भारत में भू - क्षय के लिए उत्तरदायी छह कारकों की पहचान करें।8.समझायें कि नकारात्मक पयार्वरणीय प्रभावों की अवसर लागत उच्च क्यों होती है?9.भारत में धारणीय विकास की प्राप्ित के लिए उपयुक्त उपायों की रूपरेखा प्रस्तुत करें। 10.भारत में प्रावृफतिक संसाधनों की प्रचुरता है - इस कथन के समथर्न में तकर् दें। 11.क्या पयार्वरण संकट एक नवीन परिघटना है? यदि हाँ, तो क्यों? 12.इनके दो उदाहरण दें - ;कद्ध पयार्वरणीय संसाधनों का अति प्रयोग ;खद्ध पयार्वरणीय संसाधनों का दुरुपयोग 13. पयार्वरण की चार प्रमुख ियाओं का वणर्न कीजिए। महत्त्वपूणर् मुद्दों की व्याख्या कीजिए। पयार्वरणीय हानि की भरपाइर् की अवसर लागतें भी होती हैं? व्याख्या कीजिए। 14.पयार्वरणीय संसाधनों की पूतिर् - मांग के उत्क्रमण की व्याख्या कीजिए। 15.वतर्मान पयार्वरण संकट का वणर्न करें। 16.भारत में विकास के दो गंभीर नकारात्मक पयार्वरण प्रभावों को उजागर करें। भारत की पयार्वरण समस्याओं में एक विरोधाभास है - एक तो यह निधर्नताजनित है और दूसरे जीवन - स्तर में संपन्नता का कारण भी है। क्या यह सत्य है? 17.धारणीय विकास क्या है? 18.अपने आस - पास के क्षेत्रा को ध्यान में रखते हुए धारणीय विकास की चार रणनीतियाँ सुझाइए। 19.धारणीय विकास की परिभाषा में वतर्मान और भावी पीढि़यों के बीच समता के विचार की व्याख्या करें। अतिरिक्त गतिवििायाँ 1 मान लीजिए कि महानगरों की सड़कों पर 70 लाख कारें और आ रही हैं। आपके विचार में किस प्रकार के संसाधन घटते जा रहे होंगे। व्याख्या करें। 2 उन मदों की सूची बनाइए, जिन्हें पुनः प्रयोग के योग्य बनाया जा सकता है। 3 भारत में मृदा अपरदन के कारणों और उसके बचाव की युक्ितयों पर एक चाटर् बनाइए। 4 जनसंख्या विस्पफोट पयार्वरणीय संकट में किस प्रकार योगदान देता है। कक्षा में परिचचार् का आयोजन करें। 5 ‘पयार्वरणीय हानि की भरपाइर् करने के लिए राष्ट्र को बड़ी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।’ चचार् करें। 6 आपके गाँव में एक कागज का कारखाना लगाया जाता है। सामाजिक कायर्कतार्, उद्योगपति और ग्रामीणों के समूह के साथ इस विषय में एक लघु नाटिका का आयोजन करें। पुस्तवेंफ अग्रवाल अनिल एंड सुनीता नारायन 1996.ग्लोबल वा²मग इन एन अनइक्वल वल्डर्, सेंटर पफाॅर साइंस एंड इनवायरमेंट, रिपि्रंट एडिशन, नइर् दिल्ली। भरूचा इरेच 2005.टेक्स्ट बुक आॅपफ इनवायरमेंटल स्टडीज पफाॅर अंडरगे्रजुएट कोसर्, यूनिवसिर्टी पे्रस ;इंडियाद्ध प्राइवेट लिमिटेड। सेंटर पफाॅर साइंस एंड इनवायरमेंट 1996. स्टेट आॅपफ इंडियाज इनवायरमेंट 1ः द पफस्टर् सिटीजन्स रिपोटर्, 1982. रिपि्रंट एडिशन, नइर् दिल्ली। सेंटर पफाॅर साइंस एंड इनवायरमेंट 1996 स्टेट आॅपफ इंडियाज इनवायरमेंट 2ः द सेवेंफड सिटीजन्स रिपोटर् 1985.रिपि्रंट एडिशन, नइर् दिल्ली। एम. करपगम 2001. इनवायरमेंटल इकोनाॅमिक्स: ए टेक्स्ट बुक स्टरलिंग पब्िलशसर्, नइर् दिल्ली। राजगोपालन आर. 2005.इनवायरमेंटल स्टडीजः प्रफाॅम व्रफाइसिस टू क्योर, आॅक्सपफोडर् यूनिवसिर्टी प्रेस, नइर् दिल्ली। शुमेकर इर्. एपफ, स्माॅल एंड ब्यूटीपुफल, एबसस पब्िलशसर् पत्रिाकाएँ साइंटिपिफक अमेरिकन इंडो - 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