मेरी आपिा मशीन से नहीं, मशीन के प्रति सनक को लेकर है। इसी सनक का नाम श्रम का बचत करने वाली मशीनें हैं। हम उस सीमा तक श्रम की बचत करते जाएँगे, जब तक कि हजारों लोग बेरोजगार होकर भूखों मरने के लिए सड़कों पर नहीं पेंफक दिए जाते।- महात्मा गाँधी 7.1 परिचय लोग तरह - तरह के काम करते हैं। वुफछ लोग खेतों, कारखानों, बैंकों, दुकानों आदि अनेक प्रकार के कायर्स्थलों पर काम करते हैं। वुफछ व्यक्ित घर पर भी अन्य काम करते हैं। घर पर होने वाले काम अब बुनाइर्, पफीते बनाना या हस्तकलाओं जैसे पारंपरिक कामों तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्िक इनमें सूचना - प्रौद्योगिकी उद्योग के प्रोग्राम बनाने जैसे आधुनिक काम भी शामिल हो चुके हैं। पहले कारखाने में काम करने का अथर् किसी शहर में स्िथत कमर्शाला में काम करना होता था, ¯कतु अब तो प्रौद्योगिकीय परिवतर्नों ने गाँव के घर में ही औद्योगिक उत्पादन संभव बना दिया है। व्यक्ित कायर् क्यों करते हैं? कायर् की हमारे व्यक्ितगत और सामाजिक जीवन में एक महत्त्वपूणर् भूमिका है। लोग आजीविका के लिए कायर् करते हंै। वुफछ लोगों को उत्तरािाकार के माध्यम से, कायर् किए बिना भी, धन मिल जाता है। ¯कतु, ऐसे धन से किसी को पूणर् संतोष नहीं होता। किसी कायर् से जुड़ा रहना, हमें अपनी साथर्कता की अनुभूति प्रदान करता है - इसी के माध्यम से हम अन्य व्यक्ितयों से सही अथो± में संपकर् स्थापित करते हैं। प्रत्येक कायर्रत व्यक्ित सिय रूप से राष्ट्रीय आय में योगदान करता है। इसी के माध्यम से वह विभ्िान्न आथ्िार्क ियाओं में भाग लेकर देश के आथ्िार्क विकास में हिस्सेदार बनता है। यही सही अथा±े में आजीविका उपाजर्न है। हम केवल अपने लिए काम नहीं करतेऋ अपने ऊपर निभर्र व्यक्ितयों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कायर् करके भी उपलब्िध का अनुभव करते हैं। कायर् के इसी महत्त्व को समझ कर महात्मा गाँधी ने श्िाक्षा और हस्तकलाओं सहित विभ्िान्न प्रकार के कामों के माध्यम से प्रश्िाक्षण पर बल दिया था। कायर् कर रहे व्यक्ितयों के अध्ययन से हमें देश में रोजगार की प्रकृति और गुणवत्ता के विषय में एक गहरी अंतदर्ृष्िट प्राप्त होती है। इससे हमें अपने मानवीय संसाधनों को जानने और उनके उपयुक्त प्रयोग की योजनाएँ बनाने में भी सहायता मिलती है। इससे विभ्िान्न उद्योगों तथा क्षेत्राकों के राष्ट्रीय आय में योगदान का विश्लेषण करने में भी सहायता मिलती है। ये समाज के सीमांत - वगो±, बाल - श्रमिकों आदि के शोषण की समस्याओं का निदान करने में भी सहायक सि( होते हैं। 7.2 श्रमिक और रोजगार रोजगार क्या है? श्रमिक कौन होता है? जब एक किसान खेतों में काम करता है तो वह खाद्यान्न और उद्योगों के लिए कच्चे माल का उत्पादन करता है। कपास ही कपड़े के कारखानों और विद्युतकरघों में कपड़े का रूप धारण कर लेता है। गाडि़याँ सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाती हैं। हम जानते हैं कि किसी देश में एक वषर् में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का वुफल मौदि्रक मूल्य इसका ‘सकल घरेलू उत्पाद’ कहलाता है। हमें नियार्त के लिए मूल्य प्राप्त होता है और आयात का मूल्य चुकाना पड़ता है, इसमें हम देखते हैं कि देश का निवल अजर्न धनात्मक हो सकता है ;यदि नियार्त का मूल्य आयात की अपेक्षा अिाक रहेद्ध या )णात्मक हो सकता है ;यदि आयात का मूल्य नियार्त की अपेक्षा अिाक रहेद्ध या शून्य हो सकता है ;यदि आयात और नियार्त के मूल्य समान होंद्ध। हम प्राप्त अजर्नों का योग करते हैं ;$ या - द्ध तो हमें उस वषर् के लिए देश का सकल घरेलू उत्पाद प्राप्त होता है। सकल राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान देने वाले सभी ियाकलापों को हम आथ्िार्क ियाएँ कहते हैं। वे सभी व्यक्ित जो आथ्िार्क ियाओं से संलग्न होेते हैं, श्रमिक कहलाते हैं, चाहे वे उच्च या निम्न किसी भी स्तर पर कायर् कर रहे हैं। यदि इनमें से वुफछ लोग बीमारी, शख्म होने आदि शारीरिक कष्टों, खराब मौसम, त्यौहार या सामाजिक - धामिर्क उत्सवों के कारण अस्थायी रूप से काम पर नहीं आ पाते, तो भी उन्हें श्रमिक ही माना जाता है। इन कामों में लगे मुख्य श्रमिकों की सहायता करने वालों को भी हम श्रमिक ही मानते हैं। आमतौर पर हम ऐसा सोचते हंै कि जिन्हें काम के बदले नियोत्तफा द्वारा वुफछ भुगतान किया जाता है, उन्हें श्रमिक कहा जाता है। पर ऐसा नहीं है। जो व्यक्ित स्व - नियोजित होते हैं, वे भी श्रमिक ही होते हैं। भारत में रोजगार की प्रकृति बहुमुखी है। वुफछ लोगों को वषर् भर रोजगार प्राप्त होता है, तो वुफछ लोग वषर् में वुफछ महीने ही रोजगार पाते हैं। अिाकांश मजदूरों को अपने कायर् की उचित मजदूरी नहीं मिल पाती। वैसे श्रमिकों की संख्या का अनुमान लगाते समय जितने भी व्यक्ित आथ्िार्क कायो± में लगे होते हैं, उन सबको रोजगार में लगे लोगों की श्रेणी में शामिल किया जाता है। आप विभ्िान्न आथ्िार्क ियाओं में लगे व्यक्ितयों की संख्याएँ जानने को उत्सुक होंगे। वषर् 2011 - 12 में भारत की वुफल श्रम - शक्ित का आकार लगभग 473 मिलियन आँका गया था। क्योंकि देश के अिाकांश लोग ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करतेंहै, इसीलिए ग्रामीण श्रमबल का अनुपात भी शहरी श्रमबल से कहीं अिाक है। इन 473 मिलियन श्रमिकों में तीन - चैथाइर् श्रमिक ग्रामीण हैं। भारत में श्रमशक्ित में पुरुषों की बहुलता है। श्रमबल में लगभग 70 प्रतिशत पुरुष तथा शेष ;इसमें महिला तथा पुरुष बाल श्रमिकों को भी शामिल किया गया हैद्ध महिलाएँ हैं। ग्रामीण क्षेत्रा में महिला श्रमिक वुफल श्रमबल का एक तिहाइर् हैं, तो शहरों में केवल 20 प्रतिशत महिलाएँ ही श्रमबल में भागीदार पाइर् गइर् हैं। महिलाएँ खाना बनाने, पानी लाने, ईंधन बीनने के साथ - साथ खेतों में भी काम करती हैं। उन्हें नकद या अनाज के रूप में मजदूरी नहीं मिलती - कितने ही मामलों में तो वुफछ भी भुगतान नहीं किया जाता। इसी कारण इन महिलाओं को श्रमिक वगर् में भी शामिल नहीं किया जाता। अथर्शास्ित्रायों का आग्रह है कि इन महिलाओं को भी श्रमिक ही माना जाना चाहिए। 7.3 लोगों की रोजगार में भागीदारी श्रमिक जनंसख्या अनुपात जिसका प्रयोग देश में रोजगार की स्िथति के विश्लेषण के लिए सूचक के रूप में किया जाता है, यह जानने में सहायक है कि जनसंख्या का कितना अनुपात वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में सिय रूप से योगदान दे रहा है। यदि यह अनुपात अिाक है, तो इसका तात्पयर् है जनता की काम में भागीदारी अिाक होगी। यदि यह अनुपात मध्यम या कम हो, तो इसका अथर् होगा कि देश की जनंसख्या का बहुत अिाक अनुपात प्रत्यक्ष रूप से आथ्िार्क ियाओं में संलग्न नहीं है। सारणी 7.1 भारत में कायर्कतार् जनसंख्या अनुपात, 2011 - 2012 लिंग पुरुष स्त्राी संपूणर् कायर्कतार् जनसंख्या अनुपात संपूणर् ग्रामीण शहरी 54.4 54.3 54.6 21.9 24.8 14.7 38.6 39.9 35.5 स्रोतः की इंडिकेटसर् आॅपफ एंप्लाॅयमेंट एंड अनएंप्लाॅयमेंट इन इंडिया, 2011 - 12, छैै 68 राउंड, नेशनल स्टेटिस्िटकल आॅरगेनाइज़ेशन, नेशनल सेंपल सवेर् आॅपिफस, मिनिस्ट्री आॅपफ स्टेटिस्िटक्स एंड प्रोग्राम इंप्लीमेंटेशन, भारत सरकार, जनवरी 2014 आपने ‘जनसंख्या’ शब्द का अथर् तो पिछली कक्षाओं में पढ़ लिया होगा। जनसंख्या शब्द का अभ्िाप्राय किसी क्षेत्रा विशेष में किसी समय विशेष पर रह रहे व्यक्ितयों की वुफल संख्या से है। यदि भारत के श्रमिक जनसंख्या अनुपात का आकलन करना चाहें, तो हमें भारत में कायर् कर रहे सभी श्रमिकों की संख्या को देश की जनसंख्या से भाग कर उसे 100 से गुणा करना होगा। इस प्रकार, हमें श्रमिक जनसंख्या अनुपात ज्ञात हो जायेगा ;7.1सारणी देखेंद्ध। सारणी 7.1 भारत में विभ्िान्न आथ्िार्क ियाओं में लोगों की भागीदारी के विभ्िान्न स्तरों को स्पष्ट कर रही है। भारत में प्रत्येक 100 व्यक्ितयों में से लगभग 39 श्रमिक हैं। शहरी क्षेत्रों में यह अनुपात 36 है, जबकि ग्रामीण भारत में यह अनुपात लगभग 40 है। ऐसा अंतर क्यों है? ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च आय के अवसर सीमित हैं, इसी कारण रोजगार बाशार में उनकी भागीदारी अिाक है। अिाकांश व्यक्ित स्वूफल, महाविद्यालय या किसी प्रश्िाक्षण संस्थान में नहीं जा पाते। यदि वुफछ जाते भी हैं तो वे बीच में ही छोड़कर में एक बड़ा भाग विभ्िान्न शैक्ष्िाक संस्थाओं में अध्ययन कर सकने में सक्षम है। शहरी जनसमुदाय को रोजगार के भी विविधतापूणर् अवसर सुलभ हो जाते हैं। वे अपनी श्िाक्षा और योग्यता के अनुरूप रोजगार की तलाश में रहते हैं। किंतु ग्रामीण क्षेत्रा के लोग घर पर नहीं बैठ सकते, क्योंकि उनकी आथ्िार्क दशा उन्हें ऐसा नहीं करने देती। शहरी और ग्रामीण, दोनों ही वगार्ें में पुरुषों की श्रमशक्ित भागीदारी महिलाओं की तुलना में अिाक है। शहरी क्षेत्रों में तो पुरुष और महिला भागीदारी का अंतर बहुत ही बड़ा है - केवल 15 प्रतिशत शहरी महिलाएँ ही किसी आथ्िार्क कायर् में व्यस्त दिखाइर् दे रही है। ¯कतु, ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं की रोजगार बाशार में भागीदारी 25 प्रतिशत आँकी गइर्। महिलाएँ सामान्य और विशेष रूप से शहरों में काम क्यों नहीं कर रही हैं? यह बात देखने में आइर् है कि जहाँ कहीं भी पुरुष पयार्प्त रूप से उच्च आय अजिर्त करने में सपफल रहते हैं, परिवार की महिलाओं को घर से बाहर रोजगार प्राप्त करने से प्रायः निरुत्साहित किया जाता है। हमने पहले भी कहा है कि महिलाओं द्वारा परिवार के लिए किए गए अनेक कायो± को आथ्िार्क या उत्पादन कायर् ही नहीं माना जाता। कायर् या रोजगार की यह संकीणर् परिभाषा देश में महिला - वगर् की श्रमबल में भागीदारी को नहीं मानती तथा इसलिए देश में महिला श्रमिकों की संख्या को कम आँका जाता है। जरा सोचकर देख्िाए, कि घर के भीतर और खेतांे में महिलाएँ कितने ऐसे काम करती हैं, जिनका उन्हें कोइर् भुगतान नहीं किया जाता। चूँकि वे परिवार तथा खेतों के रख - रखाव में निश्िचत रूप से योगदान देती हैं, क्या आपको नहीं आयामों की जानकारी प्राप्त करना संभव होगा। इससे हम यह भी जान सवेंफगे कि श्रमिक का अपने काम से कितना लगाव है और अपने सहकमिर्यांे तथा उद्यम के प्रति उसके अिाकार क्या हैं? आइए, निमार्ण उद्योग के तीन कमिर्यांे की तुलना करेंः एक सीमेंट की दुकान का स्वामी है, दूसरा निमार्ण मजदूर है तो तीसरा निमार्ण करने वाली वंफपनी का एक सिविल इंजीनियर है। इन तीनांे के पद अथवा प्रतिष्ठा मंे अंतर है, जिन्हें विभ्िान्न नामों से भी संबोिात किया जाता है। जो अपने उद्यम के स्वामी और संचालक हैं, उन्हें स्वनियोजित कहा जाता है। इस प्रकार सीमेंट की दुकान का स्वामी स्वनियोजित है। स्रोतः की इंडिकेटसर् आॅपफ एंप्लाॅयमेंट एंड अनएंप्लाॅयमेंट इन इंडिया, 2011 - 12, छैै 68 राउंड, नेशनल स्टेटिस्िटकल आॅरगेनाइज़ेशन, नेशनल सेंपल सवेर् आॅपिफस, मिनिस्ट्री आॅपफ स्टेटिस्िटक्स एंड प्रोग्राम इंप्लीमेंटेशन, भारत सरकार, जनवरी 2014 लगता की उनकी संख्या भी महिला श्रमिकों में सम्िमलित की जानी चाहिए? 7.4 स्वनियोजित तथा भाड़े के श्रमिक क्या श्रमिक जनसंख्या अनुपात समाज में श्रमिकांे की स्िथति और कायर् की दशाआंे के विषय मंे भी वुफछ जानकारी देता है? यदि किसी उद्यम मंे श्रमिक के स्तर या पद की जानकारी मिल सके, तो निश्चय ही देश मंे रोजगार के गुणवत्ता के भारत का लगभग आध श्रमबल इसी श्रेणी में आता है। निमार्ण मजदूर अनियत मजदूरी वाले श्रमिक कहलाते हैं। ये भारत की श्रमशक्ित का 35 प्रतिशत हैं। ऐसे ही मजदूर अन्य लोगांे के खेतों में अनियत रूप से कायर् करते हैं और उसके बदले में पारिश्रमिक प्राप्त करते हंै। निमार्ण कंपनी के अभ्िायंता के रूप में काम कर रहे व्यक्ित शहरी श्रमिक ग्रामीण श्रमिक 15ः 35ः 43ः 42ः 9ः स्वयं कायर्रत नियमित वेतनभोगी कमर्चारी आकस्िमक पारिश्रमिक कमर्चारी श्रमशक्ित का मात्रा 16 प्रतिशत ही स्रोतः की इंडिकेटसर् आॅपफ एंप्लाॅयमेंट एंड अनएंप्लाॅयमेंट इन इंडिया, 2011 - 12, छैै 68 राउंड, नेशनल स्टेटिस्िटकल आॅरगेनाइज़ेशन, नेशनलहैं। जब किसी श्रमिक को कोइर् सेंपल सवेर् आॅपिफस, मिनिस्ट्री आॅपफ स्टेटिस्िटक्स एंड प्रोग्राम इंप्लीमेंटेशन,व्यक्ित या उद्यम नियमित रूप से भारत सरकार, जनवरी 2014 काम पर रख उसे मजदूरी ;वेतनद्ध देता है, तो वह श्रमिक नियमित वेतन भोगी कमर्चारी कहलाता है। चित्रा 7.1 को ध्यान से देख्िाए। इससे दोनों ही चित्रों से पता चल रहा है कि भारत में पुरुष और महिला श्रमिकों के 50 प्रतिशत से अिाक तो स्वरोजगारी वगर् में ही आते हैं। अतः स्वरोजगार ही देश की आजीविका का सबसे प्रमुख स्रोत है। अनियत मजदूरी कायर् पुरुषों और महिलाओं के लिए रोजगार का दूसरा प्रमुख स्रोत है। इस अनियत रोजगार में महिलाओं का अंश ;37 प्रतिशतद्ध पुरुषों से अिाक पाया गया है। नियमित वेतनभोगी रोजगारधारियों में पुरुष अिाक अनुपात में लगे हुए हंै। देश के 20 प्रतिशत पुरुष नियमित वेतनभोगी हैं और इस वगर् में केवल 13 प्रतिशत महिलाएँ हैं। महिलाओं के इस न्यून अंश का एक कारण कौशल स्तर में अंतर हो सकता है। नियमित वेतन वाले कायो± में अपेक्षाकृत उच्च कौशल और श्िाक्षा के स्तर की आवश्यकता होती है। संभवतः इनके अभाव के कारण ही अिाक अनुपात में महिलाओं को रोजगार नहीं मिल पा रहे हों। यदि ग्रामीण और शहरी श्रमबल के वितरण की तुलना करें तो चाटर् 7.2 के अनुसार, हमें ज्ञात होता है कि अनियत मजदूरी पाने वाले श्रमिक स्वनियोजित तथा ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा अिाक हैं। शहरों में स्वनियोजित और नियमित वेतन वाले रोजगार की संख्या अिाक है। गाँवों में अिाकांश ग्रामीण अपनी जमीन के टुकड़ों पर निभर्र हैं जो स्वतंत्रा रूप से खेती करते हैं, अतः स्वनियोजन में उनकी भागीदारी अिाक है। शहरी क्षेत्रों में काम का स्वरूप भी अलग होता है। हर व्यक्ित कारखाना, दुकान और कायार्लयों का संचालक नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त शहरी उद्यमों में नियमित रूप से श्रमिकों की आवश्यकता होती है। 7.5 पफमो±, कारखानों तथा कायार्लयों में रोजगार देश के आथ्िार्क विकास क्रम में श्रमशक्ित का कृष्िा तथा अन्य संबंिात ियाकलापों से उद्योगों और सेवाओं की ओर प्रवाह होता है। इसी प्रिया में मजदूर ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों में प्रवसन करते हैं। धीरे - धीरे उद्योग भी सकल रोजगार में अपना अंश खोने लगते हैं, क्योंकि सेवा क्षेत्राक में बहुत तीव्र दर पर प्रसार होने लगता है। श्रमशक्ित के कायार्नुसार या उद्योगवार वितरण से रोजगार स्वरूप के ये परिवतर्न सहज इन्हें कीजिए सभी समाचार - पत्रों में रोजगार अवसरांे से जुड़ा एक भाग होता है। वुफछ तो प्रति सप्ताह ;दैनिक भीद्ध रोजगार पर एक विशेष परिश्िाष्ट भी निकालते हैं - चाहे द हिन्दू का ‘आॅपोचुर्निटीज’ हो या द टाइम्स आॅपफ इंडिया का ‘एसेंट’। अनेक कंपनियाँ अपनी रिक्ितयों का विज्ञापन इनमें करती हैं। इन स्तंभों को काट लीजिए और एक सारणी बनाइए, जिसके चार स्तंभ होंः कंपनी, ;सावर्जनिक या निजीद्ध, पद का नाम, रिक्ितयाँ, क्षेत्राक, ;प्राथमिक, द्वितीयक या तृतीयकद्ध और आवश्यक योग्यताएँ। इस सारणी के आधार पर कक्षा में समाचार - पत्रों में विज्ञापित रोजगार अवसरों पर चचार् करें। ही स्पष्ट हो जाते हैं। समान्यतया आथ्िार्क ियाओं को आठ विभ्िान्न औद्योगिक वगो± में विभाजित करते हैं। ये हैंः ;कद्ध कृष्िा ;खद्ध खनन और उत्खनन ;गद्ध विनिमार्ण ;घद्ध विद्युत, गैस एवं जलापूतिर् ;घद्ध निमार्ण कायर् ;चद्ध वाण्िाज्य ;छद्ध परिवहन और भंडारण तथा ;जद्ध सेवाएँ। सरलता के लिए सभी कायर्युक्त व्यक्ितयों को तीन प्रमुख वगो± में विभाजित किया जा सकता है। ये हैंः ;1द्ध प्राथमिक क्षेत्राक, जिसमें ;कद्ध तथा ;खद्ध सम्िमलित हैै। ;2द्ध द्वितीयक क्षेत्राक जिसमें ;कद्ध ;खद्ध तथा ;गद्ध को शामिल किया जाता है। ;3द्ध इसे सेवा क्षेत्राक कहते हैं और इसमें शेष तीनों उपवगर् ;कद्ध, ;खद्ध तथा ;गद्ध को रखा जाता है। सारणी 7.2 में हम भारत में वषर् 2011 - 12 में विभ्िान्न उद्योगों में कायर्रत श्रमिकों के विषय में जानकारी दे रहे हैं। भारत में अिाकांश श्रमिकों के रोजगार का स्रोत प्राथमिक क्षेत्राक ही है। द्वितीयक क्षेत्राक केवल लगभग 24 प्रतिशत श्रमबल को नियोजित कर रहा है। लगभग 27 प्रतिशत श्रमिक सेवा क्षेत्राक में संलग्न हैं। सारणी 7.2 भी यह स्पष्ट कर रही है कि ग्रामीण भारत की लगभग 67 प्रतिशत श्रमशक्ित कृष्िा, वन और मत्स्य पर निभर्र है। लगभग 16 प्रतिशत ग्रामीण श्रमिक ही विनिमार्ण उद्योगों, निमार्ण और अन्य क्षेत्रों में लगे हुए हैं। केवल 17 प्रतिशत ग्रामीण श्रमिकों को सेवा क्षेत्रा से ही रोजगार मिलता है। किंतु, शहरी क्षेत्राकों में कृष्िा और खनन रोजगार के प्रमुख स्रोत नहीं हैं, जहाँ अिाकांश लोग सेवा क्षेत्राक में कायर्रत हैं। 60 प्रतिशत शहरी श्रमिक सेवा क्षेत्राक में हैं। लगभग 30 प्रतिशत शहरी श्रमिक द्वितीयक क्षेत्राक में नियोजित हैं। सारणी 7.2 उद्योग में कायर्बल का वितरण, 2011 - 12 ;»द्ध औद्योगिक वगर् निवास स्थान लिंग वुफल प्राथमिक क्षेत्राक द्वितीयक क्षेत्राक तृतीयक/सेवा क्षेत्राक वुफल ग्रामीण 66.6 17.4 16.0 100 शहरी 9.0 31.0 100 60.0 पुरुष 25.9 43.6 30.5 100 महिला 17.2 20.0 62.8 100 24.3 48.9 26.8 100 यद्यपि प्राथमिक क्षेत्राक में पुरुष और महिला दोनों ही प्रकार के श्रमिक संवेंफित हैं, पर वहाँ महिलाओं का संवेंफद्रण बहुत अिाक है। इस प्राथमिक क्षेत्राक में लगभग 63 प्रतिशत महिलाएँ कायर्रत हैं - जबकि इस क्षेत्रा में काम कर रहे पुरुषों की संख्या आध्े से कम है। पुरुषों को द्वितीयक और सेवा क्षेत्राक दोनों में ही रोजगार के अवसर प्राप्त हो जाते हैं। 7.6 संवृि एवं परिवतर्नशील रोजगार संरचना आपने अध्याय 2 और 3 में विस्तार से नियोजन - रणनीतियों के बारे में पढ़ा था। यहांँ हम केवल दो विकास सूचकों पर विचार करेंगे। ये हैं, रोजगार संवृि और सकल घरेलू उत्पाद। पचास वषो± से चल रहे योजनाब( विकास का ध्येय राष्ट्रीय उत्पाद और रोजगार में वृि के माध्यम से अथर्व्यवस्था का प्रसार रहा है। 1960 - 2010 की अविा में भारत में सकल घरेलू उत्पाद में सकारात्मक वृि हुइर् है और यह स्रोतः की इंडिकेटसर् आॅपफ एंप्लाॅयमेंट एंड अनएंप्लाॅयमेंट इन इंडिया, 2011 - 12, छैै 68 राउंड, नेशनल स्टेटिस्िटकल आॅरगेनाइज़ेशन, नेशनल सेंपल सवेर् आॅपिफस, मिनिस्ट्री आॅपफ स्टेटिस्िटक्स एंड प्रोग्राम इंप्लीमेंटेशन, भारत सरकार, जनवरी 2014 सारणी 7.3 रोजगार प(िा की प्रवृिायाँ ;क्षेत्राक और स्िथतिद्ध, 1972 - 2012 ;प्रतिशत मेंद्ध मद प्राथमिक द्वितीयक सेवा योग स्वनियोजित नियमित वेतनभोगी कमर्चारी अनियत दिहाड़ी मजदूर योग 1972 - 73 1983 क्षेत्राक 74.3 68.6 10.9 11.5 14.8 16.9 100 100 स्िथति 61.4 57.3 15.4 13.8 23.2 28.9 100 100 1993 - 94 64 16 20 100 54.6 13.6 31.8 100 1999 - 2000 60.4 15.8 23.8 100 52.6 14.6 32.8 100 2011 - 12 48.9 24.3 26.8 100 52.0 18.0 30.0 100 संवृि दर रोजगार वृि दर से अिाक रही है। ¯कतु, सकल घरेलू उत्पाद की वृि दर में वुफछ उतार - चढ़ाव भी आते रहे हैं। पर इस अविा में रोजगार की वृि लगभग 2 प्रतिशत बनी रही। चाटर् 7.3, 1990 के दशक के अंतिम वषो± में एक अन्य ¯चताजनक घटनाक्रम की ओर भी इंगित कर रहा हैः रोजगार वृि दर कम होकर उसी स्तर पर पहुँच गइर्, जहाँ से योजनाकाल के प्रारंभ्िाक चरणों में थी। इन्हीं वषो± के दौरान हम सकल घरेलू उत्पाद और रोजगार की वृि दरों के बीच कापफी बड़ा अंतर पाते हैं। इसका अथर् यह है कि हम भारतीय अथर्व्यवस्था में रोजगार सृजन के बिना ही अिाक वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करने में समक्ष रहे हैं। इस परिघटना को विद्वान ‘रोजगारहीन संवृि’ का नाम दे रहे हैं। अभी तक हमने देखा कि रोजगार सकल घरेलू उत्पाद की वृि की तुलना में किस तरह बढ़ा है। अब यह जानना भी आवश्यक है कि रोजगार और सकल घरेलू उत्पाद की वृि दरों के इन स्वरूपों ने विभ्िान्न वगो± के श्रमबल पर किस प्रकार के प्रभाव डाले। इससे हम समझ पाएँगे कि हमारे देश में किस प्रकार के रोजगार अवसरों का सृजन हो रहा है। आइए, पिछले खंड में बताए गए दो सूचकों पर एक बार पिफर से विचार करें। ये सूचक हैं, विभ्िान्न उद्योगों में लोगो को मिले रोजगार तथा उनकी स्िथतियाँ। हम जानते हैं कि भारत कृष्िा प्रधान देश है। जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग ग्रामीण क्षेत्रों मंे बसा है और यह अपनी मुख्य आजीविका के लिए कृष्िा पर निभर्र है। भारत सहित अनेक देशों के विकास रणनीतियों का ध्येय कृष्िा पर निभर्र जनसंख्या के अनुपात को कम करना रहा है। औद्योगिक क्षेत्राकों के आधार पर श्रमबल का वितरण यह दिखाता है कि श्रमबल कृष्िा कायार्ें से हटकर गैर कृष्िा कायार्ें की ओर बड़े पैमाने पर बढ़ रहा है ;सारणी 7.3 देखेंद्ध। जहाँ 1972 - 73 में प्राथमिक क्षेत्राक में 74 प्रतिशत श्रम बल लगा था, वहीं 2011 - 12 में यह अनुपात घटकर 50 प्रतिशत रह गया है। द्वितीयक और सेवा क्षेत्राक भारत के श्रमबल के लिए आशावादी भविष्य का संकेत दे रहे हैं। आप देखेंगे कि इन क्षेत्राकों की हिस्सेदारी क्रमशः 11 से बढ़कर 24 और 15 से बढ़कर 27 प्रतिशत हो गइर् है। विभ्िान्न स्िथतियों में श्रमबल के वितरण को देखें तो पिछले चार दशकों ;1972 - 2012द्ध में लोग स्वरोजगार और नियमित वेतन - रोजगार से हटकर अनियत श्रम की ओर बढ़ रहे हैं। पिफर भी स्वरोजगार, रोजगार का सबसे बड़ा ड्डोत बना हुआ है। विशेषज्ञ स्वरोजगार तथा नियमित वेतन से अनियत श्रम रोजगार की ओर जाने की प्रिया को श्रम बल के अनियतीकरण का नाम देते हैं। इससे मजदूरों बाॅक्स 7.1 औपचारिक क्षेत्राक में रोजगार संघीय श्रम मंत्रालय देश के विभ्िान्न भागों में स्िथत रोजगार कायार्लयों के माध्यम से औपचारिक क्षेत्रा में रोजगार संबंिात जानकारियाँ एकत्रा करता है। क्या आप जानते हैं कि औपचारिक क्षेत्राक में सबसे बड़ा रोजगारदाता कौन है? वषर् 2012 में इस क्षेत्राक में कायर् कर रहे 30 मिलियन कमर्चारियों में से 1.8 करोड़ कमर्चारी सावर्जनिक क्षेत्राक में कायर्रत थे। यहाँ भी पुरुषों का ही वचर्स्व है - महिलाएँ औपचारिक क्षेत्रा के कमर्चारियों की केवल 1/16 अंश ही थीं। अथर्शास्ित्रायों ने पाया है कि 1991 से आथ्िार्क सुधार प्रिया ने औपचारिक क्षेत्रा में कायर् कर रहे कमिर्यों की संख्या को कम किया है। आपका क्या मत है? की दशा बहुत नाजुक हो जाती है। यह वैफसे हो रहा है? सारणी 7.2 में वण्िार्त अहमदाबाद का विशेष अध्ययन देखें। 7.7 भारतीय श्रमबल का अनौपचारीकरण पिछले खंड में हमने पाया कि श्रमबल में अनियत श्रमिकों का अनुपात निरंतर बढ़ रहा है। स्वतंत्राता के बाद से विकास योजनाओं का एक ध्येय जनसामान्य के लिए सम्मानपूणर् आजीविका का प्रबंध सुनिश्िचत करना भी बताया गया है। यह कहा गया था कि औद्योगीकरण की रणनीति कृष्िा से अतिरिक्त श्रमिकों को उद्योगों में आकष्िार्त कर उन्हें विकसित देशों की भाँति उच्च जीवन स्तर सुलभ कराएगी। ¯कतु, हम यह पिछले अनुभाग में देख ही चुके हैं कि योजनाब( विकास के 55 वषर् बाद भी देश के श्रमबल के आध्े से अध्िक सदस्यों के लिए कृष्िा ही रोजी - रोटी का प्रमुख साधन बनी हुइर् है। अथर्शास्ित्रायों का यह भी तवर्फ है कि अनेक वषो± से रोजगार की गुणवत्ता में निरंतर Éास हो रहा है। आपको यह भी जानकारी होनी चाहिए कि भारत के सकल श्रमबल के बहुत छोटे से वगर् को ही नियमित आय मिल पा रही है। सरकार श्रम कानूनों के द्वारा उन्हें अपने अध्िकारों की रक्षा करने में समथर् बनाती है। यही वगर् अपने श्रमिक संघों को गठित कर रोजगारदाताओं से बेहतर मजदूरी और अन्य सामाजिक सुरक्षा उपायों के लिए सौदेबाजी भी करता है। ये कौन लोग हैं? इसी प्रश्न का उत्तर जानने के लिए हम श्रमबल आरेख 7.4 औपचारिक तथा अनौपचारिक क्षेत्रों में श्रमिक, 2009 - 12 आख्िार 10 - 20 वषो± तक 310 काम कर चुके न जाने कितने ही श्रमिक मातृत्व लाभ, भविष्यनििा, ग्रेच्युटी और 24 1336 पेंशन आदि से वंचित क्यों रह जाते हैं? निजी क्षेत्राक में कायर् करने वाला व्यक्ित सावर्जनिक क्षेत्राक में उसी औपचारिक अनौपचारिक काम को करने वाले से कम पुरुष महिलावेतन क्यों पाता है? श्रमिकों की संख्या;मिलियन मेंद्धबाॅक्स 7.2 अहमदाबाद मंे अनौपचारीकरण अहमदाबाद एक समृ( नगर है। यहाँ की समृि का आधार 60 से अिाक कपड़े के कारखाने का उत्पाद है, जिनमंे 1,50,000 श्रमिक काम करते हैं। पिछली एक शताब्दी मंे इन श्रमिकांे ने एक निश्िचत सीमा में आय की सुरक्षा हासिल कर ली थी। इनके निश्िचत रोजगार थे और इन्हें मिल रहे वेतन निवार्ह के लिए पयार्प्त थे। साथ ही इन्हें अनेक प्रकार के सामाजिक सुरक्षा लाभ भी मिलने लगे, जो उनकी स्वास्थ्य और वृ(ावस्था की सुरक्षा सुनिश्िचत करते थे। उनका एक सशक्त श्रमिक संघ भी था जो न केवल श्रम विवादांे में उनका प्रतिनििात्व करता था, बल्िक श्रमिकांे और उनके परिवारांे के लिए अनेक जनहितकारी ियाओंे का संचालन भी करता था। ¯कतु, 1980 दशक के प्रारंभ मंे संपूणर् देश में वुफछ कपड़ा मिले बंद होने लगीं। मुम्बइर् जैसी वुफछ जगहों मंे मिलें तेजी से बंद हो गइर्ं। अहमदाबाद मंे मिल बंदी की यह प्रिया वुफछ धीमी रही और दस वषो± तक ख्िांच गइर्। इस अविा मंे, कम से कम 80,000 स्थायी तथा 50,000 गैर स्थायी कपड़ा मजदूरांे का रोजगार छिन एक घर में शक्ित संतुलन में परिवतर्न: एक बेरोजगारगया और वे अनौपचारिक क्षेत्रा का सहारा कारखाना श्रमिक घर में लहसुन छीलता हुआ, जबकि उसकीलेने को विवश हो गए। इन्हीं परिस्िथतियांे मंे पत्नी को बीड़ी बनाने का एक काम मिल गया।नगर में आथ्िार्क मंदी और जन आक्रोश के साथ - साथ सांप्रदायिक दंगे भी भड़क उठेे। श्रमिकांे के एक पूरे वगर् को मध्ययवगीर्य सुरक्ष्िात जीवन शैली से उखाड़ कर अनौपचारिक क्षेत्राक की निधर्नता झेलने के लिए छोड़ दिया गया। कितने ही कपड़ा श्रमिक शराब की लत के सहारे अपने कष्ट भुलाने के प्रयास करने लगे, वुफछ ने शराब के माध्यम से आत्महत्या का रास्ता चुना और कितने ही परिवारांे को बच्चांे की श्िाक्षा अधूरी रोक कर उन्हेें भी काम की तलाश के लिए भेजना पड़ा। स्रोतः रेनाना झालवालांे, रत्ना एम. सुदशर्न एंड जी मील उन्नी ;एडि.द्ध इंपफोमर्ल इकाॅनामी एट सेंटर स्टेजऋ न्यू स्ट्रक्चसर् आॅपफ एंपलायमेंट, सेज पब्िलकेशंस, नइर् दिल्ली 2003, पृष्ठ 265। को औपचारिक तथा अनौपचारिक वगो± में विभाजित कर रहे हैं। इन्हीं को संगठित और असंगठित क्षेत्राक भी कहा जाता है। सभी सावर्जनिक क्षेत्राक प्रतिष्ठान तथा 10 या अिाक कमर्चारियों को रोजगार देने वाले निजी क्षेत्राक प्रतिष्ठान संगठित क्षेत्राक माने जाते हैं। इन प्रतिष्ठानों में काम करने वालों को संगठित क्षेत्राक के कमर्चारी कहा जाता है। अन्य सभी उद्यम और उनमें कायर् कर रहे श्रमिक मिल कर अनौपचारिक क्षेत्राक की रचना करते हैं। इस प्रकार इस अनौपचारिक क्षेत्राक में करोड़ों किसान, कृष्िा श्रमिक, छोटे - छोटे काम - धंधे चलाने वाले और उनके इन्हें कीजिए इनमंे से असंगठित क्षेत्राकों की ियाओंे में लगे व्यक्ितयांे के सामने चिन्ह अंकित करेंः ऽ एक ऐसे होटल का कमर्चारी, जिसमें सात भाड़े के श्रमिक एवं तीन पारिवारिक सदस्य हैं। ऽ एक ऐसे निजी विद्यालय का श्िाक्षक, जहाँ 25 श्िाक्षक कायर्रत हैं। ऽ एक पुलिस सिपाही ऽ सरकारी अस्पताल की एक नसर् ऽ एक रिक्शाचालक ऽ कपड़े की दुकान का मालिक, जिसके यहाँ नौ श्रमिक कायर्रत हैं। ऽ एक ऐसी बस वंफपनी का चालक, जिसमें 10 से अिाक बसंे और 20 चालक, संवाहक तथा अन्य कमर्चारी हंै। ऽ दस कमर्चारियांे वाली निमार्ण वंफपनी का सिविल अभ्िायंता ऽ राज्य सरकारी कायार्लय मंे अस्थायी आधार पर नियुक्त कंप्यूटर आॅपरेटर ऽ बिजली दफ्रतर का एक क्लवर्फ कमर्चारी तथा सभी स्वनियोजित व्यक्ित, जिनके पास भाड़े का श्रमिक नहीं है, सम्िमलित हैं। इसमें सभी गैर - वृफष्िा दैनिक वेतनभोगी मजदूर जैसे विनिमार्ण मजदूर तथा सिरपर बोझा ढोने वाले मजदूर जो एक से अध्िक नियोक्ता के लिए कायर् करते हैं, उन्हें भी शामिल किया जाता है। सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के लाभ संगठित क्षेत्राक के कमर्चारियों को मिलते हैं। इनकी कमाइर् भी असंगठित क्षेत्राक के कमर्चारियों से अिाक होती है। विकास योजनाओं में सै(ांतिक रूप से यह माना गया था कि जैसे - जैसे अथर्व्यवस्था विकसित होगी, अिाकािाक श्रमिक औपचारिक क्षेत्राक में सम्िमलित होते जाएँगे और अनौपचारिक क्षेत्राक के श्रमिकों का अनुपात बहुत कम रह जाएगा। ¯कतु, वास्तव में भारत में क्या हुआ? नीचे दिये गये आरेख को देखंे जिसमें संगठित तथा असंगठित क्षेत्राकों में श्रमबल का वितरण दशार्या गया है। खंड 7.2 में हमने जाना था कि भारत में 473 मिलियन श्रमिक हैं। केवल 30 मिलियन श्रमिक ही औपचारिक क्षेत्राक में कायर् कर रहे हैं। क्या आप इनका प्रतिशत अनुपात आकलित कर पाएँगे?ये मात्रा 6 प्रतिशत हंै ;30/473×100द्ध। दूसरे शब्दों में, देश के 94 प्रतिशत श्रमिक अनौपचारिक क्षेत्राक में काम कर रहे हैं। यही नहीं, औपचारिक क्षेत्राक के श्रमिकों में महिलाओं की संख्या केवल 6 मिलियन अथार्त् 20 प्रतिशत ;30/6×100द्ध मात्रा है। आरेख 7.4 देखें। अनौपचारिक क्षेत्राक में पुरुषों का अंश वुफल श्रमबल का 69 प्रतिशत पाया गया है। 1970 के दशक के अंत में भारत सहित अनेक विकासशील देशों ने पाया कि औपचारिक क्षेत्राक में रोजगार वृि नहीं हो पा रही। इसीलिए उन्होंने अनौपचारिक क्षेत्राक पर ध्यान देना आरंभ किया। ¯कतु, अनौपचारिक क्षेत्राक के उद्यमों और उनके श्रमिकों की आय नियमित नहीं होती और उन्हें सरकार से भी किसी प्रकार का संरक्षण और नियमन नहीं मिल पाता। श्रमिकांे को बिना क्षति पूतिर् के ही काम से निकाल दिया जाता है। अनौपचारिक क्षेत्राक उपक्रमों मंे प्रयुक्त प्रौद्योगिकी पुरानी हो चुकी है तथा ये किसी प्रकार के लेखा - खाते भी नहीं रखते हंै। इस क्षेत्राक के श्रमिक प्रायः गंदी बस्ितयांे मंे तथा झुग्िगयों में रहते हैं। वुफछ समय से अंतरार्ष्ट्रीय श्रम संगठन के प्रयासांे के पफलस्वरूप भारत सरकार ने अनौपचारिक क्षेत्रा के आधुनिकीकरण और इस क्षेत्राक के कमर्चारियांे के लिए सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था का प्रावधान किया है। 7.8 बेरोजगारी आपने समाचार - पत्रों में रोजगार की तलाश करते हुए व्यक्ियांे को देखा होगा। वुफछ लोग अपने मित्रांे और सगे संबंिायांे के माध्यम से रोजगार तलाशते हंै। कइर् शहरांे मंे वुफछ चुने हुए स्थानांे पर ऐसे अनेक लोग खड़े दिखाइर् दे जाते हैं, जिन्हें उस दिन के लिए काम देने वाले की प्रतीक्षा रहती हैं। वुफछ लोग दफ्रतरांे - कारखानांे में अपना जीवन - वृत्त सौंप कर वहाँ पता लगा रहे होते हैं कि क्या उनके योग्य कोइर् स्थान रिक्त है। कइर् लोग ग्रामीण क्षेत्रांे मंे बाहर जाकर काम के बारे मंे पूछताछ नहीं करते हैं और घर पर ही बैठे रहते हैं, जब उन्हें कोइर् काम नहीं होता। वुफछ व्यक्ित रोजगार कायार्लयांे मंे उनके माध्यम से अनुसूचित रिक्ितयांे के लिए अपने नाम पंजीकृत कराते हैं। राष्ट्रीय प्रतिदशर् सवेर्क्षण संगठन ने बेरोजगारी को इस प्रकार परिभाष्िात किया है कि यह वह अवस्था है, जिसमंे व्यक्ित काम के अभाव के कारण बिना काम के रह जाते हैं। वे कायर्रत व्यक्ित नहीं हैं, परंतु रोजगार कायार्लयांे, मध्यस्थों, मित्रांे, संबंिायांे आदि के माध्यम से या संभावित रोजगारदाताआंे को आवेदन देकर या वतर्मान परिस्िथतियांे और प्रचलित मजदूरी दर पर काम करने की अपनी इच्छा प्रकट कर कायर् तलाशते हैं। किसी बेरोजगार व्यक्ित की पहचान विभ्िान्न तरीकों से की जाती हैै। अथर्शास्त्राी उसे बेरोजगार कहते हैं, जो आधे दिन की अविा मंे एक घंटे का रोजगार भी नहीं पा सकता। भारत मंे बेरोजगारी के आँकड़ांे के तीन स्रोत हैंऋ भारत की जनगणना रिपोटर्, राष्ट्रीय प्रतिदशर् सवेर्क्षण संगठन की रोजगार और बेरोजगारी की अवस्था संबंधी रिपोटर् तथा रोजगार और प्रश्िाक्षण महानिदेशालय के रोजगार कायार्लय में पंजीकृत आँकड़े। यद्यपि इन ड्डोतों से बेरोजगारी के भ्िान्न - भ्िान्न अनुमान किए हैं, येे हमें बेरोजगारी के लक्षणांे तथा देश मंे प्रचलित बेरोजगारी के प्रकारों के विषय मंे जानकारियाँ उपलब्ध कराते हैं। क्या हमारी अथर्व्यवस्था में बेरोजगारी भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार की हैं? इस अनुच्छेद के प्रथम गद्यांश में वण्िार्त स्िथति को, खुली बेरोजगारी कहते हंै। भारत के कृष्िा में पफैली बेरोजगारी को अथर्शास्त्राी प्रच्छन्न बेरोजगारी कहते हैं। प्रच्छन्न बेरोजगारी क्या होती है? मान लीजिए कि किसी एक किसान के पास चार एकड़ का भूखंड है और उसे अपने खेत में विभ्िान्न प्रकार की ियाओं को निष्पादित करने में दो श्रमिकों की आवश्यकता है, ¯कतु यदि वह अपने परिवार के पाँच सदस्यांे ;पत्नी, बच्चांे आदिद्ध को कृष्िा कायर् मंे लगा ले तो यह स्िथति प्रच्छन्न बेरोजगारी के नाम से जानी जाती है। 1950 के दशक के अंत मंे किए गए एक अध्ययन के द्वारा भारत मंे एक तिहाइर् कृष्िा श्रमिकों को प्रच्छन्न रूप से बेरोजगार दिखाया गया था। आपने यह भी देखा होगा कि बड़ी संख्या में लोग शहरों की ओर प्रवसन करते हैं, वहाँ नौकरी करते हंै और सीमित अविा तक वहाँ रहते हंै। पर, वषार् )तु आरंभ होते ही वे अपने गाँव लौट आते हैं। वे ऐसा क्यों करते हैं? कारण यही है कि कृष्िा का कायर् मौसमी होता है - वषर् भर गाँव में रोजगार के अवसर नहीं होते हैं। जब खेत में काम नहीं होता है तो लोग शहर की ओर जाते हैं और काम खोजते हैं। ऐसी बेरोजगारी की अवस्था को मौसमी बेरोजगारी कहते हैं। भारत में बेरोजगारी का ये प्रकार भी बहुत बड़े स्तर पर प्रचलित है। यद्यपि हमने देखा है कि रोजगार संवृि दर बहुत धीमी रही है - पर क्या आपने लोगों को बहुत लंबे समय तक रोजगार से वंचित देखा है? विद्वानों का कहना है कि भारत में व्यक्ित बहुत लंबे समय तक पूणर्तः बेरोजगार नहीं बैठे रह पाते, क्योंकि उनकी आथ्िार्क दशा इतनी निराशाजनक होती है कि कोइर् भी काम स्वीकार करना पड़ जाता है। आप उन्हें ऐसे काम भी करते हुए देख सकते हैं जिन्हें कोइर् अन्य व्यक्ित नहीं कर सकता। इनमें बहुत ही असुविधाजनक, अस्वास्थ्यकर, अस्वच्छ तथा जोख्िाम भरे कायर् भी होते हैं। केंद्र तथा राज्य सरकारों ने निम्न आय परिवारों के बेहतर रहन - सहन के लिए विभ्िान्न रोजगार सृजित किए हैं और इसके लिए पहल की है। इस विषय में अगले परिच्छेद में चचार् की जायेगी। 7.9 सरकार और रोजगार सृजन हाल ही में, भारत की संसद ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अिानियम, 2005 पारित किया है। यह देश के ग्रामीण परिवारों के सदस्यों को अवुफशल श्रमिक के रूप में कायर् करने को 100 दिन का दिहाड़ी उपलब्ध कराने की गारंटी देता है। ग्रामीण क्षेत्रों में जिन्हें नौकरी की आवश्यकता है, उनके लिए रोजगार के अवसरों का सृजन करने के लिए यह सरकार द्वारा संचालित अनेक उपायों में से एक है। स्वतंत्राता प्राप्ित के बाद से संघीय और राज्य सरकारें रोजगार सृजन हेतु अवसरों की रचना करने में बहुत महत्वपूणर् भूमिका निभाती आ रही हैं। इनके प्रयासों को दो वगो± में विभाजित किया जा सकता हैः प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष। जैसा कि आपने पिछले अनुभाग में पढ़ा कि प्रथम श्रेणी में सरकार अपने विभ्िान्न विभागों में प्रशासकीय कायो± के लिए नियुक्ितयाँ करती है। सरकार अनेक उद्योग, होटल, और परिवहन कंपनियाँ भी चला रही है। इन सबमें भी यह प्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्रदान करती हैं। जब सरकारी उद्यमों में उत्पादन स्तर में वृि होती है, तो उन उद्यमों को सामगि्रयों की पूतिर् करने वाले निजी उद्यमों को भी अपना उत्पादन बढ़ाने का अवसर मिलता है। इससे भी अथर्व्यवस्था में नए रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। उदाहरण के लिए, एक सरकारी इस्पात मिल में उत्पादन वृि से उस सरकारी कंपनी में रोजगार में प्रत्यक्ष वृि होती है। साथ ही, उस इस्पात मिल को उत्पादनों की पूतिर् करने वाली और उससे इस्पात खरीदने वाली निजी कंपनियों को भी अपने - अपने उत्पादन और रोजगार बढ़ाने का अवसर मिल जाता है। यह सरकार द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से अथर्व्यवस्था में रोजगार के अवसरों का सृजन है। आपने अध्याय 4 में ध्यान दिया होगा कि सरकारों द्वारा गरीबी निवारण के लिए चलाए जा रहे अनेक कायर्क्रमों का ियान्वयन भी रोजगार सृजन के माध्यम से ही होता है। उन्हें रोजगार सृजन कायर्क्रम भी कहा जाता है। इस तरह के कायर्क्रम केवल रोजगार ही उपलब्ध नहीं कराते, इनके सहारे प्राथमिक जनस्वास्थ्य, प्राथमिक श्िाक्षा, ग्रामीण आवास, ग्रामीण जलापूतिर्, पोषण, लोगों की आय तथा रोजगार सृजन करने वाली परिसंपिायाँ खरीदने में सहायता, दिहाड़ी रोजगार के सृजन के माध्यम से सामुदायिक परिसपंिायों का विकास, गृह और स्वच्छता सुविधाओं का निमार्ण, गृह - निमार्ण के लिए सहायता, ग्रामीण सड़कों का निमार्ण और बंजर भूमि आदि के विकास के कायर् पूरे किए जाते हैं। 7.10 निष्कषर् भारत की श्रमबल संरचना में परिवतर्न आ चुका है। सेवा क्षेत्राक में रोजगार के नये अवसरों का सृजन हो रहा है। सेवा क्षेत्राक का विस्तार तथा इसमें नयी प्रौद्योगिकी के प्रादुभार्व का कारण अब निबार्ध रूप से लघु उद्योग तथा वुफछ विश्िाष्ट उपक्रम तथा विशेषज्ञ श्रमिक ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों से प्रतिस्पधार् में टिक सकते हंै। कायर् की आउटसोसि±ग एक सामान्य बात हो गयी है। इसका तात्पयर् यह है कि एक बड़ी पफमर् के लिए यह लाभप्रद है कि वह अपने विश्िाष्ट विभागों ;जैसे, वििा, कंप्यूटर प्रोग्रामिंग या ग्राहक सेवा - अनुभागद्ध को बंद कर छोटे उद्यमियों को बड़े पैमाने पर छोटे - छोटे रोजगार उपलब्ध कराए, जो कि दूसरे देशों में भी स्िथत हो सकता है। आधुनिक कारखाने की परंपरागत अवधारणा इस प्रकार बदल रही है कि घर ही कायर् - स्थलों में परिवतिर्त हो रहे हैं। यह समस्त परिवतर्न व्यक्ितगत श्रमिक के पक्ष में नहीं हो रहा है। श्रमिकों को न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा की उपलब्धता के कारण रोजगार का स्वरूप और अिाक अनौपचारिक हो गया है। इसके बावजूद, पिछले दो दशकों में सकल घरेलू उत्पाद में तीव्र वृि हुइर् है। लेकिन, इसके साथ ही रोजगार के अवसरों का सृजन नहीं होने के कारण सरकार को विशेष, तौर से ग्रामीण क्षेत्रों में, रोजगार के अवसरों का सृजन करने के लिए बाध्य होना पड़ा है। पुनरावतर्न ऽ वैसे व्यक्ित जो आथ्िार्क ियाओंे मंे संलग्न हैं और इस प्रकार सकल राष्ट्रीय उत्पादन मंे योगदान कर रहे हंैै, उन्हें हम श्रमिक कहते हैं। ऽ देश की जनसंख्या के पाँच मंे से दो व्यक्ित विभ्िान्न आथ्िार्क ियाओंे मंे लगे हैं। ऽ मुख्यतः ग्रामीण पुरुष, देश के श्रमबल का सबसे बड़ा वगर् हैं। ऽ भारत मंे अिाकांश श्रमिक स्वनियोजक हैं। अनियत दिहाड़ी मजदूर तथा नियमित वेतनभोगी कमर्चारी मिलकर भी भारत की समस्त श्रम शक्ित के अनुपात के आधे से भी कम ही रह जाते हैं। ऽ भारत के वुफल श्रमबल का लगभग पाँच में से तीन श्रमिक कृष्िा और संब( कायो± से ही अपनी आजीविका प्राप्त करता है। ऽ हाल के वुफछ वषो± से रोजगार वृि मंे श्िाथ्िालता आइर् है। ऽ सुधारोपरांत भारत मंे सेवा क्षेत्राक मंे नए रोजगार के अवसरांे का उदय हुआ है। ये नए रोजगार मुख्यतः अनौपचारिक क्षेत्रा के ही अंतगर्त आते हैं तथा इनके कायर् की प्रकृति अिाकांशतः अनियत है। ऽ सरकार देश मंे सबसे बड़ा औपचारिक क्षेत्राक नियोत्तफा है। ऽ प्रच्छन्न बेरोजगारी ग्रामीण बेरोजगारी का आम प्रकार है। ऽ भारत की श्रमबल की संरचना मंे बड़ा परिवतर्न आया है। ऽ अपनी विभ्िान्न योजनाआंे और नीतियांे द्वारा सरकार प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप मंे रोजगार सृजन के लिए प्रयास करती है। अभ्यास 1.श्रमिक किसे कहते हैं?2.श्रमिक - जनसंख्या अनुपात की परिभाषा दें।3.क्या ये भी श्रमिक हंैः एक भ्िाखारी, एक चोर, एक तस्कर, एक जुआरी? क्यों?4.इस समूह मंे कौन असंगत प्रतीत होता हैः ;कद्ध नाइर् की दुकान का मालिक ;खद्ध एक मोची ;गद्ध मदर डेयरी का कोषपाल ;घद्ध ट्यूशन पढ़ाने वाला श्िाक्षक, ;घद्ध परिवहन कंपनी संचालक ;चद्ध निमार्ण मजदूर। 5.नये उभरते रोजगार मुख्यतः.............................क्षेत्राक में ही मिल रहे हैं। ;सेवा / विनिमार्णद्ध 6.चार व्यक्ितयांे को मजदूरी पर काम देने वाले प्रतिष्ठान को क्षेत्राक कहा जाता है। ;औपचारिक/अनौपचारिकद्ध 7.राज स्वूफल जाता है। पर जब वह स्वूफल मंे नहीं होता, तो प्रायः अपने खेत मंे काम करता दिखाइर् देता है। क्या आप उसे श्रमिक मानेंगे? क्यों? 8.शहरी महिलाआंे की अपेक्षा अिाक ग्रामीण महिलाएँ काम करती दिखाइर् देती हैं। क्यांे? 9.मीना एक गृहिणी है। घर के कामांे के साथ - साथ वह अपने पति की कपड़े की दुकान के काम मंे भी हाथ बँटाती है। क्या उसे एक श्रमिक माना जा सकता है? क्यांे? 10.यहाँ किसे असंगत माना जाएगाः ;कद्ध किसी अन्य के अधीन रिक्शा चलाने वाला ;खद्ध राजमिस्त्राी ;गद्ध किसी मेकेनिक की दुकान पर काम करने वाला श्रमिक ;घद्ध जूते पालिश करने वाला लड़का। 11. निम्न सारणी मंे 1972 - 73 मंे भारत के श्रमबल का वितरण दिखाया गया है। इसे ध्यान से पढ़कर श्रमबल के वितरण के स्वरूप के कारण बताइए। ध्यान रहे कि ये आँकडे 30 वषर् से भी अिाक पुराने हैं। निवास स्थान श्रमबल ;करोड़ मंेद्ध पुरुष महिलाएँ वुफल योग ग्रामीण 12.5 6.9 419.5 शहरी 3.2 0.7 3.9 12. इस सारणी मंे 1999 - 2000 मंे भारत की जनसंख्या और श्रमिक जनानुपात दिखाया गया है। क्या आप भारत के ;शहरी और सकलद्ध श्रमबल का अनुमान लगा सकते हैं? क्षेत्रा अनुमानित श्रमिक जनसंख्या श्रमिकों की जनसंख्या अनुपात अनुमानित संख्या ;करोड़ मेंद्ध ;करोड़ मेंद्ध ग्रामीण 71.88 41.9 71.88×41.9/100=30.12 शहरी 28.52 33.7 ? योग 100.40 39.5 ? 13. शहरी क्षेत्रांे मंे नियमित वेतनभोगी कमर्चारी ग्रामीण क्षेत्रा से अिाक क्यांे होते हैं? 14. नियमित वेतनभोगी कमर्चारियांे मंे महिलाएँ कम क्यांे हैं? 15. भारत मंे श्रमबल के क्षेत्राकवार वितरण की हाल की प्रवृिायांे का विश्लेषण करें। 16. 1970 से अब तक विभ्िान्न उद्योगांे मंे श्रमबल के वितरण मंे शायद ही कोइर् परिवतर्न आया है। टिप्पणी करें। 17. क्या आपको लगता है पिछले 50 वषोर् मंे भारत मंे रोजगार के सृजन मंे भी सकल घरेलू उत्पाद के अनुरूप वृि हुइर् है? कैसे? 18. क्या औपचारिक क्षेत्राक मंे ही रोजगार का सृजन आवश्यक है? अनौपचारिक मंे नहीं? कारण बताइए। 19. विक्टर को दिन मंे केवल दो घंटे काम मिल पाता है। बाकी सारे समय वह काम की तलाश मंे रहता है। क्या वह बेराजगार है? क्यों? विक्टर जैसे लोग क्या काम करते होंगे? 20.क्या आप गाँव में रह रहे हैं? यदि आपको ग्राम - पंचायत को सलाह देने को कहा जाय तो आप गाँव की उन्नति के लिए किस प्रकार के ियाकलाप का सुझाव देंगे, जिससे रोजगार सृजन भी हो। 21. अनियत दिहाड़ी मजदूर कौन होते हंै? 22. आपको यह कैसे पता चलेगा कि कोइर् व्यक्ित अनौपचारिक क्षेत्राक मंे काम कर रहा है? अतिरिक्त गतिवििायाँ एक क्षेत्राक का चयन करें जैसे, गली या काॅलोनी और उसे तीन - चार उपक्षेत्राकों में बाँटें। एक सवेर्क्षण का आयोजन करें। उसमें प्रत्येक व्यक्ित की सभी ियाओं का ब्यौरा एकत्रा कर लें। पिफर सभी उपक्षेत्राकों के लिए अलग - अलग श्रमिक जनसंख्या अनुपात का आकलन करें। अपनेे परिणामों के आधार पर विभ्िान्न उपक्षेत्राकों में श्रमिक - जनसंख्या अनुपात में अंतरों की व्याख्या करें। 2.प्रदेश के अलग - अलग क्षेत्रों के अध्ययन का दायित्व छात्रों के तीन - चार समूहों को बाँट दें। एक क्षेत्रा में मुख्यतः धान की खेती होती है। दूसरे में नारियल के बाग ही मुख्य कायर् हैं। तीसरे क्षेत्रा में मछलियाँ पकड़ना मुख्य व्यवसाय है। चैथे क्षेत्रा में नदी बहती है और वहाँ पशुपालन की बहुतायत है। छात्रों के समूहों को उन क्षेत्रों के अनुरूप रोजगार सृजन की आवश्यकता पर अपनी - अपनी रिपोटे± तैयार करने के लिए कहें। 3.स्थानीय पुस्तकालय में जाकर भारत सरकार द्वारा प्रकाश्िात साप्ताहिक रोजगार समाचार की मांग करें तथा पिछले दो महीनों के अंक देखें। ये सात अंक होंगे। इनमें 25 विज्ञापनों का चयन करें तथा निम्न सारणी को भरें ;सारणी की आवश्यकता के अनुसार इसे बनायेंद्ध। उसके बाद, कक्षा में उपलब्ध रोजगारों की प्रकृति बारे में चचार् करें। मदें विज्ञापन संख्या 1 विज्ञापन संख्या 2 1. कायार्लय का नाम 2. विभाग/कंपनी 3. निजी/सावर्जनिक/संयुक्त उपक्रम 4. पद का नाम 5. क्षेत्राक - प्राथमिक/द्वितीयक/ तृतीयक 6. पदों/रिक्ितयों की संख्या 7. आवश्यक योग्यताएंँ 4.आपने अपने घर के आस - पास सरकार द्वारा किए जा रहे कइर् काम देखे होंगे। ये सड़क निमार्ण, तालाबों की सपफाइर्, स्वूफल भवनों का निमार्ण, अस्पताल व अन्य सरकारी कायार्लय, जलरोधक बाँधों का निमार्ण, गरीबों के लिए गृह निमार्ण आदि के काम हो सकते हैं। किसी एक कायर् की समालोचनात्मक रिपोटर् तैयार करें। इसमें इन विषयों पर चचार् हो सकती हैः ;कद्ध काम की पहचान किस प्रकार की गइर् ;खद्ध कितनी धन राश्िा स्वीकृत हुइर् ;गद्ध स्थानीय जनता का योगदान, यदि हो तो ;घद्ध कायर् में लगे व्यक्ितयों की संख्या, पुरुष और महिलाएँ ;घद्ध भुगतान की गइर् मजदूरी ;चद्ध क्या उस कायर् की उस क्षेत्रा में वास्तव में आवश्यकता थी, जिस योजना के अंतगर्त यह कायर् हो रहा है, उस पर भी आलोचनात्मक टिप्पणी की जा सकती है। 5.हाल के वषो± में आपने पहाड़ी और शुष्क क्षेत्रों में रोजगार सृजन की पहल करते हुए कइर् स्वयंसेवी संस्थाओं को देखा होगा। यदि आपके क्षेत्रा में भी ऐसी कोइर् संस्था काम कर रही है, तो उसके प्रकल्प को देखने जाइए और उस पर अपनी रिपोटर् तैयार कीजिए। चढ्ढा जी. के. एंड पी. पी. साहू 2002. ‘पोस्ट रिपफाॅमर् सेटबैंक्स इन रूरल अनइम्प्लाइमेंटः इश्यू दैट नीड पफदर्र सिक्यूरिटी’ इकोनाॅमिक एंड पाॅलिटिकल वीकली, मइर् 25, पी.पी. 1998 - 2006। देसाइर् सोनाली एंड मैत्रिाय वोडिर्या दास 2004. ‘‘इज इंप्लाइमेंट ड्राइविंग इण्िडयाज सजर्’’, इकोनाॅमिक एंड पाॅलिटिक वीकली, जुलाइर् 3, पी.पी. 3045 - 3051। घोष, अनिल रे 1999. करेंट इश्यूज आॅपफ इंप्लाॅयमेंट पालिसी इन इंडिया, इकाॅनाॅमिक एंड पालिटिकल वीकली, सितंबर 4, पी.पी. 2592 - 2608। हिरवे इंदिरा 2002. ‘इंप्लाइमेंट एंड अनइंप्लाइमेंट सिचुएशन इन 1990ः हाउ गुड आर.एन.एस.एस.डाटा’ इकोनाॅमिक एंड पाॅलिटिकल विकली, मइर् 25, पी.पी. - 2027 - 2036। जैकव पाॅल 1986. ‘कांस्पेट आॅपफ वकर् एंड एस्टीमेट्स आॅपफ वकर्पफोसर् - एन एप्राइजल आॅपफ द ट्रीटमेंट आॅपफ एक्िटविटीज रिलेटिंग टू नन माकर्ेटेड आउटपुट’ सवर्ेक्षण, वोल्यूम 9, नं. 4, अप्रैल1 वुफलश्रेष्ठ ए. सी. गुलाब सिंह, आलोक कर एंड आर. एल. मिश्रा ;200द्ध, ‘वकर्पफोसर् इन द इंडियन नेशनल एकाउंट्स स्टेटिक्स,’ द जनर्ल आॅपफ इनकम एंड वेल्थ, वोल्यूम 22, न. 2, जुलाइर्, पी.पी.3 - 39। प्रधान के.के. एंड एम.आर. सलूजा. 1996. ‘लेबर स्टेटिस्िटक्स इन इंडियाः अ रिव्यू’ माजिर्न, जुलाइर् - सितबंर, वोल्यूम 28, नबंर 4, पी.पी. 319 - 347 रथ, नीलाकांत. 2001 ‘डेट आॅन इंप्लाइमेंट, अनइंप्लाइमेंट एंड एजुकेशनः ‘‘व्हेयर टू गो प्रफॅाम हेयर?’ इकोनाॅमिक एंड पाॅलिटिकल वीकली, जून, पी.पी. 2081 - 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