इकाइर् तीन भारतीय अथर्व्यवस्था की वतर्मान चुनौतियाँ आज भारत की चुनौतियों में निधनर्ता, ग्रामीण भारत का विकास तथा आधारिक संरचना का निमार्ण प्रमुख है। हम सौ करोड़ लोगों की शक्ित से संपन्न राष्ट्र हैं तथा मानव पूँजी हमारी एक बड़ी संपिा है। इसमें श्िाक्षा तथा स्वास्थ्य में निवेश आवश्यक है। हमें रोजगार के स्वरूप को समझने की एवं देश में और अिाक रोजगार के अवसर के सृजन की शरूरत है। हम विकास के निहिताथो± को भी अपने पयार्वरण तथा धारणीय विकास की मांग के संदभर् में देखेंगे। इन मुद्दों को सुलझाने के क्रम में सरकार की नीतियों का आलोचनात्मक आकलन किए जाने की शरूरत है, जिस पर इस इकाइर् में अलग से चचार् की गइर् है। कोइर् भी ऐसा समाज कभी सुखी और संपन्न नहीं हो सकता है, जिसके अिाकांश सदस्य निधर्न और दयनीय हों। - ऐडम स्िमथ 4.1 प्रस्तावना पिछले अध्यायों में आपने साढ़े छः दशकों से भारत में अपनाइर् गइर् आथ्िार्क नीतियों तथा विभ्िान्न विकास सूचकों पर उनके प्रभावों का अध्ययन किया है। जन - जन की न्यूनतम मूलभूत आवश्यकताओं की संपूतिर् और निधर्नता निवारण स्वतंत्रा भारत का एक प्रमुख लक्ष्य रहा है। हमारी सभी पंचवषीर्य योजनाओं ने विकास के जिस स्वरूप को अंगीकार किया है, उसका उद्देश्य समाज के निधर्नतम और सबसे पिछड़े सदस्यों का उन्नयन ;अंत्योदयद्ध रहा है। साथ ही निधर्न वगार्ें को समाज की मुख्यधारा का अंग बना सभी के लिए एक न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्िचत कराने का ध्येय लेकर ही सारे विकास कायर्क्रमों की रचना की गइर् है। संविधान सभा को संबोिात करते हुए 1947 में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, ‘‘स्वतंत्राता की प्राप्ित तो एक कदम मात्रा है, एक सुअवसर का आरंभ मात्रा है - अभी और बहुत - सी महान उपलब्िधयाँ और विजयोत्सव हमारी प्रतीक्षा में हैं। ये होंगे निधर्नता, अज्ञान, रोग और अवसरों की असमानताओं के उन्मूलन के उत्सव।’’ ¯कतु आज हम कहाँ तक पहुँच पाए हैं, यह जानना भी आवश्यक है। आज विश्व के निधर्नों की वुफल संख्या के पाँचवें हिस्से से अिाक निधर्न केवल भारत में रहते हैं। यहाँ लगभग 30 करोड़ ऐसे लोग बसे हैं, जो अपनी मूलभूत शरूरतों को भी ढंग से पूरा नहीं कर पाते। निधर्नता के स्थान - स्थान पर तथा समय - समय पर अलग - अलग स्वरूप हैं। इनकी अनेक प्रकार से व्याख्या की गइर् है। मोटे तौर पर निधर्नता ऐसी दशा तो मानी ही जाती है, जिससे सभी व्यक्ित बचना चाहते हैं। अतः निधर्नता, निधर्न तथा धनी दोनों के लिए विश्व को बदलने का एक आह्नान है ताकि अिाक से अिाक लोगों को पेटभर भोजन नसीब हो सके, सिर छुपाने को बेहतर जगह मिल सके, चिकित्सा व श्िाक्षा की सुविधाएँ प्राप्त हो सके, हिंसा से उनका बचाव हो सके तथा अपने समाज के घटनाक्रम में उनकी आवाज की भी सुनवाइर् हो सके। यह जानने के लिए कि निधर्नता कम करने में कौन - सी नीतियाँ सपफल हो सकती हैं और कौन सी नहीं, समयानुसार किन बातों में बदलाव आ सकते हैं, हमें निधर्नता को परिभाष्िात करना तथा इसका मापन, अध्ययन और अनुभव भी करना होगा। निधर्नता के अनेक आयाम होते हैं, अतः अनेक सूचकों के माध्यम से उनका अवलोकन करना होगा। कहीं आय और उपभोग के स्तर, कहीं सामाजिक सूचकों और जोख्िाम के प्रति संवेदनशीलता के सूचकों, तो कहीं सामाजिक - राजनीतिक प्रियाओं तक पहुँच या उनमें भागीदारी पर विचार करना होगा। 4.2 निधर्न कौन हैं? आपने देखा होगा, प्रायः सभी क्षेत्रों - गाँवों और शहरों में वुफछ लोग धनी तो वुफछ निधर्न होते हैं। बाॅक्स 4.1 में अनु और सुधा की कहानी पढ़ें। उनके जीवन विषमताओं के चरम ¯बदुओं के उदाहरण कहे जा सकते हैं। ऐसे लोग भी हैं जो इन दोनों चरम ¯बदुओं के बीच जीवन निवार्ह कर रहे हैं। रेहड़ीवाले, गली में काम करने वाले मोची, मालाएँ गूँथने वाली महिलाएँ, कागश - कतरन बीनने वाले, पफेरी वाले, भ्िाखारी आदि शहरी क्षेत्रों के अति निधर्न और जोख्िाम भरा जीवन व्यतीत करने वाले वगर् हैं। निध्र्न लोगों की परिसंपिायाँ बहुत कम होती हैं और ये कच्चे घरों में रहते हैं, जिनकी दीवारें ;धूप में सूखीद्ध मिट्टðी की तो छतें घास, तिनकों, बाँस और कमजोर लकडि़यों की बनी होती हैं। इनमें से भी जो बहुत निधर्न हैं, उनके पास तो ऐसे घर भी नहीं होते। ग्रामीण क्षेत्रों में निधर्नों के पास बाॅक्स 4.1 अनु और सुधा अनु और सुधा का जन्म एक ही दिन हुआ था। अनु के माता - पिता निमार्ण कायर् पर लगे मजदूर थे तो सुधा के पिता एक व्यवसायी तथा माँ श्िाल्पकार ;डिजाइनरद्ध थी। अनु की माँ प्रसव पीड़ा आरंभ होने तक अपने सिर पर इर्ंटों का भार ढो रही थी। ददर् आरंभ होने पर वह निमार्ण स्थल पर ही औजार आदि रखने के स्थान पर चली गइर् और वहीं उसने अकेले ही अपनी बेटी को जन्म दिया। अपनी बच्ची को दूध पिलाया, पुरानी पफटी साड़ी के चीथड़ों में उसे लपेटा और बोरी के झूले में उसे एक पेड़ पर टाँग तुरंत काम पर लौट आइर्। उसे डर था, कहीं उसका रोजगार न छिन जाए। उसे इतनी आशा थी कि उसकी बेटी शाम तक सोती रहेगी। सुधा का जन्म शहर के सवर्श्रेष्ठ नसि±गहोम में हुआ। विशेषज्ञ डाॅक्टरों ने उसकी जाँच की, उसे नहला कर सापफ मुलायम कपड़े में लपेट कर उसकी माँ के पास ही एक पालने में लिटा दिया गया। जब भी उसे भूख लगी, उसकी माँ ने उसे दूध पिलाया, दुलारा, प्यार किया और लोरियाँ गुनगुनाते हुए उसे सुला दिया। उसके परिवार तथा पारिवारिक मित्रों ने उसके आगमन का जश्न मनाया। अनु और सुधा का बचपन भी बहुत ही अलग रहा। अनु ने बहुत कम आयु में ही अपनी देखभाल स्वयं करना सीख लिया। उसे भूख और अभाव की पूरी अनुभूति थी। उसने वूफड़े के ढेर से खाने योग्य चीजें बीनना तथा सदीर् की रातों में किसी तरह ‘गमर्’ रहना सीख लिया था। वह यह भी जान गइर् कि बरसात में कैसे सिर छिपाना है तो धागों, पत्थरों या तिनकों के खेल रचा कर किस प्रकार अपना मनोरंजन करना है। वह स्वूफल नहीं जा पाइर्, क्योंकि उसके माँ - बाप प्रवासी मजदूर थे जो काम की तलाश में एक शहर से दूसरे शहर में भटकते रहते थे। अनु को नाचना बेहद पसंद था। जब भी वह संगीत की धुन सुनती, थ्िारकने लगती। वह बहुत ही सुंदर थी, उसकी भाव भंगिमाएँंभी बहुत अथर्पूणर् थी। किसी दिन रंगमंच पर अपनी प्रतिभा का प्रदशर्न उसके जीवन की अभ्िालाषा थी। वह एक महान नृत्यांगना बन सकती थी। ¯कतु उसे बारह वषर् की आयु में काम करना शुरू करना पड़ा। उसे अपने माँ - बाप के साथ अमीरों के लिए भवन बनाने के काम से रोजी कमाने के लिए जुट जाना पड़ा, ऐसे मकान बनाने में जिनमें वह स्वयं कभी नहीं रह पाएगी। सुधा को एक श्रेष्ठ बाल विद्यालय में भेजा गया, जहाँ उसने खेल खेल में ही पढ़ना, लिखना और गिनना सीख लिया। वह नक्षत्राशालाओं, संग्रहालयों, राष्ट्रीय उद्यान आदि के भ्रमण - दशर्न पर भी गइर्। पिफर वह एक बहुत अच्छे स्वूफल गइर्। उसे चित्राकारी से लगाव था तो उसके लिए एक प्रख्यात चित्राकार से प्रश्िाक्षण की व्यवस्था की गइर्। उसने आगे चलकर एक ललित कला महाविद्यालय में प्रवेश पाया और आज वह एक प्रख्यात चित्राकार बन चुकी हैै। प्रायः भूमि भी नहीं होती। यदि किसी के पास भूमि हो भी तो वह सूखी और बंजर होती है। कितनों को ही दिन में दो बार भोजन भी नहीं मिल पाता। निधर्नतम परिवारों के जीवन का शाश्वत सत्य भूख और भुखमरी होती है। निधर्न बुनियादी साक्षरता तथा कौशल से भी वंचित रह जाते हैं। इसी कारण उनके लिए आथ्िार्क अवसर अत्यंत सीमित रह जाते हैं। निधर्न श्रमिकों के रोजगार भी निश्िचत नहीं होते। समाज के निधर्न वगार्ें में वुफपोषण बहुत ही गंभीर स्तर तक पहुँचा हुआ होता है। अस्वस्थता, अपंगता और गंभीर बीमारियाँ आदि उन्हें शारीरिक रूप से कमजोर बना देती हैं। वे साहूकारों से उधार लेने को विवश होते हैं तथा साहूकार जो उनसे ब्याज की ऊँची दरें वसूल करते हैं, उन्हें जीवनपय±त )ण ग्रस्तता से मुक्त नहीं होने देते। निधर्न का जीवन नित्त जोख्िाम भरा रहता है। नियोक्ताओं से अपनी कानून द्वारा निधार्रित मशदूरी बढ़ाने के बारे में बात नहीं कर पाते और इनका शोषण चलता रहता है। अिाकांश निधर्न परिवारों को बिजली उपलब्ध नहीं होती। वे प्रायः लकड़ी और उपलों की आग पर ही अपना खाना पकाते हैं। निधर्न वगार्ें में से अिाकांश को पीने का स्वच्छ सुरक्ष्िात पानी भी सुलभ नहीं होता। लाभपूणर् रोजगार में भागीदारी में स्त्राी - पुरुष के बीच बहुत बड़ी असमानता भी सापफ दिखाइर् देती है। श्िाक्षा सुविधाओं की उपलब्धता और परिवार की निणर्य प्रिया में भागीदारी भी इसी असमानता से ग्रस्त रहती है। निधर्न महिलाओं को मातृत्व काल में भी कम देखभाल ही प्राप्त हो पाती है। उनके बच्चों के स्वस्थ जन्म लेने और पिफर दीघर् जीवन धारण की संभावनाएँ भी क्षीण होती हैं।चाटर् 4.1ः निधर्नता रेखा पूणर्तः बहुत निधर्न इतने मध्य उच्च निधर्न निधर्न निधर्न वगर् मध्य नहीं वगर् निधर्न अथर्शास्त्राी निधर्नों की पहचान उनके व्यवसाय तथा संपिा स्वामित्व के आधार पर करते हैं। उनका कहना है कि ग्रामीण निधर्न प्रायः भूमिहीन कृष्िा श्रमिक होते हैं या पिफर वे बहुत ही छोटी जोतों के स्वामी किसान होते हैं। वे ऐसे भूमिहीन मजदूर भी हो सकते हैं, जो विभ्िान्न प्रकार के गैर - कृष्िा कायर् करते हैं या किसी और की जमीन पर आसामी काश्तकार की भाँति खेती करते हैं। शहरी क्षेत्रों में अिाकांश निधर्न वही हैं जो गाँवों से वैकल्िपक रोजगार और निवार्ह की तलाश में शहर चले आए हैं। ये लोग तरह - तरह के अनियमित काम करते हैं। यही स्वनियोजित लोग सड़कों के किनारे, गलियों में घूम - घूम कर वुफछ सामान बेचते दिखाइर् देते हैं। 4.3 निधर्नों की पहचान कैसे होती है? यदि भारत की निधर्नता की समस्या का समाधान करना है, तो उसे निधर्नता के कारणों का उन्मूलन करने के लिए व्यावहारिक और धारणीय रण - नीतियाँ बनानी होंगी तथा निधर्न जन - समुदाय को उनकी दारुण दशा से उबारने के लिए उपयुक्त योजनाएँ बनानी होंगी। ¯कतु इस प्रकार की योजनाओं के ियान्वयन के लिए सरकार को निधर्नों की पहचान करने योग्य होना होगा। इसके लिए निधर्नता और उसके कारकों को मापने का एक उपयुक्त स्केल बनाना होगा और उसके लिए कसौटियों व वििायों का बहुत ध्यानपूवर्क चयन करना होगा। धनी बहुत बहुलख बहु अमीर पति करोड़ पति धनी स्वतंत्राता पूवर् भारत में सबसे पहले दादा भाइर् नौरोजी ने निधर्नता - रेखा की अवधारणा पर विचार किया था। उन्होंने जेल में कैदियों को दिए जा रहे भोजन का बाशार कीमतों पर मूल्यांकन कर ‘जेल की निवार्ह लागत’ का आकलन किया था, ¯कतु बंदीगृहों मंे तो प्रायः वयस्क व्यक्ित ही होते हैं जबकि वास्तविक समाज में बच्चे भी सम्िमलित हैं। अतः इस जेल निवार्ह लागत में वुफछ परिवतर्न कर उन्होंने निधर्नता रेखा तक पहुँचने का प्रयास किया। इसके लिए उन्होंने यह माना कि वुफल जनसंख्या में एक तिहाइर् संख्या बच्चों की होती है, जिनमें से आधे बच्चों बाॅक्स 4.2 निधर्नता क्या है दो अध्येताओं, शाहीन रपफी खान और डैमियन किल्लेन ने निधर्नता की स्िथति को बहुत ही संक्षेप में व्यक्त किया हैः निधर्नता भूख है। निधर्नता बीमार होना है और डाॅक्टर से न दिखा पाने की विवशता है। निधर्नता स्वूफल में न जा पाने और निरक्षर रह जाने का नाम है। निधर्नता बेरोजगारी है। निधर्नता भविष्य के प्रति भय है, दिन में एक बार भोजन पाना है। निधर्नता अपने बच्चे को उस बीमारी से मरते देखने को कहते हैं, जो अस्वच्छ पानी पीने से होती है। निधर्नता शक्ित, प्रतिनििात्व हीनता और स्वतंत्राता की हीनता का नाम है। आपके क्या विचार हैं? का उपभोग बहुत कम होता है तथा शेष आधे का भोजन भी वयस्कों से आधा ही रहता है। इस प्रकार उन्होंने 3/4 के सूत्रा की रचना की। अथार्त्ः 1/6 × 0 $ 1/6 × 1/2 $ 2/3 × 1 = 1/12 $ 2/3 = 1$8/12 = 9/12 = 3/4। जनसंख्या के इन तीन खंडों के उपभोग के भारित औसत को औसत निधर्नता रेखा का मान माना गया था। यह जेल के वयस्कों की निवार्ह लागत का 3/4 अंश था। स्वतंत्राता प्राप्ित के बाद से भारत में निधर्न जनानुपात के आकलन के कइर् प्रयास हुए हैं। योजना आयोग द्वारा इस कायर् के लिए 1962 में एक अध्ययन दल का गठन किया गया था। वषर् 1979 में एक अन्य दल ‘प्रभावी उपभोग माँग और न्यूनतम आवश्यकता अनुमानन कायर् - बल’ गठित हुआ। एक ‘विशेषज्ञ दल’ का गठन इसी कायर् के लिए 1989 और 2005 में भी किया गया। योजना आयोग के अतिरिक्त अनेक अथर्शास्ित्रायों ने व्यक्ितगत रूप से भी ऐसी ही प्रियाओं के प्रयास किए। निधर्नता को परिभाष्िात करने की दृष्िट से हम जनसंख्या को दो वगार्ें में बाँट सकते हैं, निधर्न तथा गैर - निधर्न और निधर्नता रेखा इन दोनों वगार्ें को अलग करती है। यद्यपि निधर्न कइर् प्रकार के होते हैंः पूणर्तः निधर्न, बहुत निधर्न और निधर्न। इसी प्रकार गैर - निधर्न वगर् में भी कइर् उपवगर् हैः मध्यवगर्, उच्च मध्यवगर्, धनी, बहुत धनी और पूणर्तः धनी। इन सभी उप वगार्ें को एक निरंतर सरल रेखा पर बहुत निधर्न से लेकर पूणर्तः धनी के रूप में कल्पना करें जिसे निधर्नता रेखा निधर्न और गैर - निधर्न के बीच विभाजित करती है। निधर्नता का वगीर्करणः निधर्नता के वगीर्करण की भी कइर् वििायाँ हैं। एक वििा के अनुसार तो हम सदा निधर्न और सामान्यतः निधर्न व्यक्ितयों में भी भेद कर सकते हैं। इस सामान्यतः निधर्न वगर् में वे व्यक्ित आते हैं जिनके पास कभी - कभी वुफछ धन भी आ जाता है ;उदाहरणाथर्, अनियत मजदूरद्ध। इन दोनों वगार्ें को मिलाकर हम चिरकालिक निधर्न वगर् का नाम देते हैं। एक ऐसा वगर् भी है जो निरंतर निधर्न और गैर - निधर्न वगार्ें के बीच झूलता रहता है ;उदाहरणाथर्, छोटे किसान और मौसमी मजदूरद्ध तथा यदाकदा निधर्न जो अिाकांश समय धनी रहते हैं परंतु कभी - कभी उनका भाग्य साथ नहीं देता। इन्हें अल्पकालिक निधर्न कहते हैं। इसके अतिरिक्त वे लोग जो कभी निधर्न नहीं होते उन्हें गैर - निधर्न कहते हैं ;देखें चाटर् 4.2द्ध। निधर्नता रेखाः आइए, अब इसका परीक्षण करें कि निधर्नता - रेखा कैसे निधार्रित होती है। निधर्नता मापन की कइर् वििायाँ होती हैं। एक वििा तो न्यूनतम कैलोरी उपभोग के मौदि्रक मान ;प्रति व्यक्ित व्ययद्ध का निधार्रण करने की वििा है। इसके अनुसार ग्रामीण व्यक्ित को 2400 तथा शहरी व्यक्ित को 2100 कैलोरी का न्यूनतम उपभोग मिलना चाहिए। वषर् 2009 - 10 में निधर्नता - रेखा को ग्रामीण क्षेत्रों में 673ृ प्रतिव्यक्ित प्रति माह उपभोग के रूप में तथा शहरी क्षेत्रों में ृ860 प्रतिव्यक्ित प्रतिमाह के रूप में परिभाष्िात किया गया। यद्यपि हमारी सरकार निधर्न परिवारों की पहचान के लिए मासिक प्रतिव्यक्ित उपभोग व्यय ;डच्ब्म्द्ध को परिवार की आय के द्योतक के रूप में प्रयोग करती है, पर क्या आप इस वििा को देश में निधर्न परिवारों की पहचान का उपयुक्त तरीका मानेंगे? अनेक अथर्शास्ित्रायों का मत है कि इस तंत्रा में सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह सभी निधर्नों को एक वगर् में मान लेता है और अति निधर्नों और अन्य निधर्नों में कोइर् अंतर नहीं करता ;चाटर् 4.2 देखेंद्ध। यह वििा भी मुख्यतः भोजन और वुफछ चुनी हुइर् वस्तुओं पर व्यय को आय का प्रतीक मानती है, पर अथर्शास्ित्रायों को इस बात पर भी आपिा है। इससे सरकार की सहायता के पात्रा व्यक्ितयों के समूचे समूह का निधार्रण तो हो जाता है, पर इसकी पहचान नहीं हो पाती कि सबसे अिाक सहायता की आवश्यकता किन निधर्नों को है। आय और संपिा स्वामित्व के अतिरिक्त भी कइर् और कारक हैं जो निधर्नता से संबंिात माने जाते हैं, जैसे बुनियादी श्िाक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पेय जल और स्वच्छता आदि की सुलभता। वतर्मान में निधर्नता रेखा का निधार्रण करने वाला तंत्रा इन सामाजिक कारकों पर भी ध्यान नहीं देता जो निधर्नता को जन्म देकर इसे निरंतर बनाए रखते हैं जैसे, निरक्षता, अस्वस्थता, संसाधनों की अनुपलब्धता, भेदभाव या नागरिक और राजनीतिक स्वतंत्राताओं का अभाव। निधर्नता निवारण योजनाओं का ध्येय तो मानवीय जीवन में सवा±गीण सुधार होना चाहिए। उसमें ये बातें अवश्य होनी चाहिए कि मनुष्य क्या बन सकता है और क्या कर सकता है, अथार्त् अिाक स्वस्थ, सुपोष्िात तथा ज्ञान संपन्न हो सामाजिक जीवन में भागीदारी कर सके। इस दृष्िट से विकास का अथर् होगा व्यक्ित के कमर् पथ की बाधाओं का निवारण - जैसे उसे निरक्षरता, अस्वस्थता, संसाधनहीनता नागरिक और राजनीतिक स्वतंत्राता के अभाव आदि से मुक्ित दिलाना। इन्हें कीजिए ऽ खंड 4.2 तथा 4.3 में आपने पढ़ा है कि निधर्नों की पहचान केवल उनकी कम आय और व्यय ही नहीं है। इसके और कइर् लक्षण भी हैंः जैसे, भूमि, निवास, श्िाक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, स्वच्छता आदि के अभाव। साथ ही भेदभावपूणर् व्यवहार आदि भी निधर्नता का ही एक लक्षण है। चचार् करें कि ऐसी वैकल्िपक निधर्नता - रेखा, जो इन सभी कारकों को समाहित कर रही हो, की रचना वैफसे की जा सकेगी। ऽ निधर्नता - रेखा की परिभाषा के आधार पर यह जानने का प्रयास करें कि आपके आस - पास के क्षेत्रा में घरेलू नौकर, धोबी, अखबार वाले आदि निधर्नता रेखा से ऊपर हैं या नहीं। यद्यपि हमारी सरकार का दावा है कि संवृि की उच्च दर, कृष्िा उत्पादन में वृि, ग्रामीण क्षेत्रों में रोशगार और 1990 के दशक के आथ्िार्क सुधार कायर्क्रमों ने निधर्नता के स्तर में कापफी कमी की है, किंतु अनेक अथर्शास्ित्रायों को सरकार के इस दावे पर संदेह है। उनका मत है कि जिस प्रकार आँकड़े एकत्रा किए जाते हैं, अथार्त् जिन वस्तुओं को उपभोग समूह ;टोकरीद्ध में शामिल किया जाता है, निधर्नता रेखा के आकलन की कायर्वििा और निधर्नों की संख्या में भी ;भारत में निधर्नों की संख्या कम करके दिखाने के लिएद्ध हेरापेफरी की जाती है। निधर्नता के आकलन की सरकारी वििायों की सीमाओं के कारण अनेक विद्वानों ने वैकल्िपक वििायों का प्रयोग करने के प्रयास किए हैं। इनमें से नाॅबेल पुरस्कार से सम्मानित अमर्त्य सेन ने एक सूचकांक का विकास किया जिसे ‘सेन - सूचकांक’ का नाम दिया जाता है। इसके अतिरिक्त ‘निधर्नता अंतराल सूचकांक’ और ‘वगिर्त निधर्नता अंतराल’ उपकरणों का भी प्रयोग किया गया है। इनके विषय में आप आगे की कक्षाओं में विस्तार से जान पाएँगे। स्रोतः आ£थक सवेर्क्षण 2011 - 12, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार 4.4 भारत में निधर्नों की संख्या जब निधर्नों की संख्या का अनुमान निधर्नता - रेखा से नीचे के जनानुपात द्वारा किया जाता है तो उसे हम ‘व्यक्ित गणना अनुपात’ वििा कहते हैं। आप संभवतः, भारत में बसे निधर्नों की वुफल संख्या जानना चाहेंगे। वे कहाँ रहते हैं और क्या पिछले वुफछ वषार्ें में उनकी संख्या या अनुपात में कमी आइर् है या नहीं। जब इस प्रकार की तुलना सामान्यतः अनुपातों और प्रतिशतों के रूप में करते हैं, तब हमें व्यक्ितयों की निधर्नता के विभ्िान्न स्तरों और विभ्िान्न प्रांतों में समय - समय पर उनके प्रसार की जानकारी प्राप्त होती है। निधर्नता विषयक आिाकारिक आँकड़े योजना आयोग उपलब्ध कराता है। ये आँकड़े राष्ट्रीय प्रतिदशर् सवेर्क्षण संगठन द्वारा उपभोग व्यय के आधार पर आकलित किए जाते हैं। चाटर् 4.3 में 1973 - 2012 की अवध्ि में भारत में निध्र्नों की संख्या तथा जनसंख्या में उनका अनुपात दशार्या गया है। वषर् 1973 - 74 में 320 मिलियन से अध्िक व्यक्ित निध्र्नता की रेखा से नीचे थे। वषर् 2011 - 12 में यह संख्या कम होकर 270 मिलियन रह गइर्। आनुपातिक दृष्िट से, 1973 - 74 में वुफल जनसंख्या का 55 प्रतिशत निध्र्नता रेखा से नीचे था। यह अनुपात वषर् 2011 - 12 में 22 प्रतिशत रह गया। 1973 - 74 में 80 प्रतिशत से अध्िक निध्र्न ग्रामीण क्षेत्रों में बसे थे, यह स्िथति 2011 - 12 में भी नहीं बदली। इसका अथर् है कि भारत में तीन - चैथाइर् से अिाक निधर्न गाँवों में ही बसे हैं। इस स्िथति के बारे में आप क्या सोचते हैं? ग्रामीण क्षेत्रों की निधर्नता अब नोटः उत्तर प्रदेश के साथ उत्तराखंड, बिहार के साथ झारखंड तथा मध्य प्रदेश के साथ छत्तीसगढ़ के आँकड़े भी शामिल हैं। शहरों की ओर भी आ गइर् है। हम ऐसा वैफसे कह सकते हैं? 2000 दशक के आरंभ में जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में निधर्नों की निरपेक्ष संख्या में कमी आइर् है, वहीं शहरी क्षेत्रों में उनकी संख्या में वुफछ वृि दिखाइर् पड़ी है। वैसे शहरी और ग्रामीण, दोनों ही क्षेत्रों में निधर्नों का संख्या - अनुपात निरंतर कम हुआ है। आप देख सकते हैं कि 1973 - 2012 की अविा में निधर्नों की संख्या व अनुपात दोनों कम हुए हैं, किंतु इन दोनों परिमाणों की गिरावट का स्वरूप बहुत उत्साहवधर्क नहीं रहा है। देश में निधर्नता की निरपेक्ष संख्या की तुलना में यह अनुपात बहुत धीमी गति से नीचे आ रहा है। यहाँ आप यह भी देखेंगे कि जहाँ शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में निधर्नता की संख्याओं का अंतर बिल्वुफल कम नहीं हुआ, वहीं अनुपात में अंतर 1999 - 2000 तक निरंतर पूवर्वत् बना रहा। और 2011 - 12 मंे बढ़ गया। गरीबी में राज्य स्तर के रुझान चाटर् 4.4 में दिखाए गए हैं। चाटर् में दो पंक्ितयाँ राष्ट्रीय गरीबी के स्तर का संकेत करती हैं। नीचे से पहली पंक्ित 2011 - 12 के दौरान गरीबी के स्तर का संकेत है और दूसरी पंक्ित वषर् 1973 - 74। इसका मतलब है कि 1973 - 2012 के दौरान भारत में गरीबों का अनुपात 55 से 22 आ गया है, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, पश्िचम बंगाल और ओडिशा - 1973 - 74 में गरीबों का एक बड़ा वगर् छह राज्यों में है। 1973 - 2012 के दौरान, कइर् भारतीय राज्यों ने कापफी हद तक गरीबी के स्तर को कम कर दिया। पिफर भी, चार राज्यों में गरीबी का स्तर - ओडिशा, मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश में अभी भी राष्ट्रीय गरीबी के स्तर से ऊपर है। पश्िचम बंगाल और तमिलनाडु ने अन्य राज्यों की तुलना में कापफी बेहतर गरीबी के स्तर को कम किया है। वैफसे वे अन्य राज्यों की तुलना में कापफी बेहतर करने के लिए सक्षम हुए हैं? 4.5 निधर्नता क्यों होती है? समग्र निधर्नता वैयक्ितक निधर्नता का योग ही है। निधर्नता की व्याख्या अथर्व्यवस्था में व्याप्त इन समस्याओं के कारण भी हो सकती हैः ;कद्ध निम्न पूँजी निमार्ण ;खद्ध आधारिक संरचनाओं का अभाव ;गद्ध माँग का अभाव ;घद्ध जनसंख्या का दबाव और ;घद्ध सामाजिक/कल्याण व्यवस्था का अभाव। आपने पहले अध्याय में भारत में बि्रटिश शासन के बारे में पढ़ा। वैसे तो उस शासन व्यवस्था के प्रभावों के विषय में अभी भी विवाद चल रहा है - पर भारत की अथर्व्यवस्था और जन सामान्य के जीवन स्तर पर उसके बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़े। अंग्रेजी राज के समय बड़े स्तर पर वि - औद्योगीकरण हुआ था। इंग्लैंड में लंकाशायर विनिमिर्त सूती कपड़े के आयात ने कापफी मात्रा में स्थानीय उत्पादन को विस्थापित कर दिया और भारत कपड़े के स्थान पर सूती धागों का नियार्तक होकर रह गया। अंग्रेशी राज की अविा के दौरान 70 प्रतिशत से अिाक भारतीय कृष्िा पर आश्रित थे, अतः उस क्षेत्राक में जीवन - निवार्ह पर, अन्य बातों की अपेक्षा अिाक महत्वपूणर् प्रभाव पड़ा। अंग्रेजी नीतियों ने ग्रामीण करों के भार को बहुत अिाक कर दिया था जिससे व्यापारी और महाजनों को बड़े भू - स्वामी बनने में सहायता मिली। बि्रटिश राज में भारत ने खाद्यान्नों का नियार्त आरंभ कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप 1875 से 1900 की अविा के अकालों के दौरान 260 लाख व्यक्ितयों की मृत्यु हो गइर्। भारत में अंग्रेशी राज का मुख्य उद्देश्य तो यही था कि उन्हें भारत में अपने नियार्त का बाशार मिल जाए, भारत अंग्रेशांे के )णों का भुगतान करता रहे तथा अंग्रेशी साम्राज्यवादी सेनाओं के लिए मानव - शक्ित प्रदान करता रहे। बि्रटिशराज ने करोड़ांे भारतीयों को निधर्न बना दिया। हमारे प्राकृतिक संसाधनांे को लूटा गया, उद्योगांे को सस्ते दामांे पर अपना उत्पादन अंग्रेशों के हाथांे बेचना पड़ा और हमारे खाद्यान्नों का भी नियार्त कर दिया गया। कितने ही लोग अकाल और भूख के कारण मर गए। 1857 - 58 में स्थानीय नेताओं को हटाने, किसानांे पर भारी कर थोपने तथा और अन्य आक्रोशों ने सिपाहियों द्वारा अंग्रेशी शासन के ख्िालापफ विद्रोह का रूप ले लिया। आज भी कृष्िा ही ग्रामीण जनता की जीविका का मुख्य आधार है तथा भूमि ही उनकी प्राथमिक परिसंपिा है, भू - स्वामित्व को ही भौतिक संपन्नता का प्रमुख निधार्रक माना जाता है और कहा जाता है कि जिसके पास जमीन है, वही जीवन स्तर सुधारने में समथर् हो सकता है। स्वतंत्राता के बाद से सरकार ने भूमि के पुनविर्तरण के प्रयास किए हैं। जिनके पास अिाक भूमि थी, उनसे भूमि ले कर उसे भूमिहीनों के बीच बाँटा गया जो अपनी ही भूमि पर मजदूरों के रूप में कायर् करते थे। किंतु इन प्रयासों को सीमित सपफलता ही मिल पायी है, क्योंकि अिाकांश किसानों के पास जो खेत थे वे बहुत छोटे थे। उनके पास भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए धन और योग्यता का अभाव था और जोतों का आकार व्यावहारिक रूप से बहुत छोटा था। अध्िकंाश भारतीय राज्य भूमि के पुनविर्तरण की नीती को लागू करने में भी असपफल रहे हैं। ग्रामीण भारत में बसे निधर्न अिाकांशतः जोतों का विखंडन हो रहा है। इन छोटी - छोटी जोतों से प्राप्त आय से परिवार की मूलभूत आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं हो पातीं। आपने सुना होगा कि कृष्िा और अन्य घरेलू आवश्यकताओं हेतु लिए गए )णों का भुगतान न कर पाने के कारण किसान आत्महत्या कर रहे हैं क्योंकि उनकी पफसलें सूखे या प्राकृतिक आपदाओं के कारण नष्ट हो गइर् हैं ;देखें बाॅक्स 4.3द्ध। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के अध्िकांश सदस्य उभरते हुए रोजगार के अवसरों में इसलिएबहुत छोटे किसान ही हैं। उनकी भूमि आमतौर भागीदारी नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि उनके पासपर कम उपजाउफ और वषार् पर निभर्र होती है। इसके लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल कीउनकी जीविका निवार्ह - पफसलों पर और कमी है। भारत में अिाकांश शहरी निधर्न काकभी - कभी पशुधन पर निभर्र होती है। जनसंख्या एक बड़ा वगर् वे हैं जिन्होंने रोजगार औरकी तीव्र वृि और रोजगार के वैकल्िपक ड्डोतों जीविकोपाजर्न की तलाश में शहरी क्षेत्रों मेंके अभाव में कृष्िा के लिए प्रति व्यक्ित भूमि प्रवसन किया है। औद्योगीकरण इन सबों को काम की उपलब्धता धीरे - धीरे घट रही है, जिससे दे पाने में विपफल रहा है। शहरी निधर्न या तो इन्हें कीजिए आप अपने पड़ोस के धेबी और नाइयों को देखते होंगे। यह जानने का प्रयास करें कि वे यह काम क्यांे कर रहे हैं। वे अपने परिवार के साथ कहाँ रहते हैं, दिन में कितनी बार उन्हें खाना मिल पाता है, उनकी भौतिक संपिा क्या है और वे नौकरी क्यांे नहीं कर पाते। इस तरह एकत्रा जानकारी पर कक्षा में चचार् करें। ग्रामीण और शहरी लोगांे के कायोर्ं की अलग - अलग सूचियाँ बनाइए। आप गैर - निधर्न वगोर्ं के सदस्यांे की गतिवििायांे की भी सूचियाँ बना सकते हैं। अपनी कक्षा में उन सूचियांे की तुलना कर यह जानने का प्रयास करें कि निधर्न लोग गैर - निधर्न लोगों द्वारा किए जाने वाले कायर् क्यांे नहीं कर पाते? बाॅक्स 4.3 कपास किसानांे की आपदा अनेक छोटे भूस्वामी किसान परिवार और बुनकर वैश्वीकरण से जुड़े आहतों के कारण )णपाश में पँफसते जा रहे हैं। भारत के अपेक्षाकृत प्रगतिशील प्रांतांे में भी आय उपाजर्न के अवसरांे का प्रायः अभाव ही है। यदि परिवार अपनी परिसंपिा बेचने, उधार लेने या अन्य रोजगारांे के सहारे आय सृजन करने मंे सपफल रहे तो कदाचित उनकी समस्याएँ भी अस्थाइर् सि( हो जाएंँ। ¯कतु यदि किसी के पास बेचने को वुफछ नहीं बचा हो, कहीं उधार पा सकने की संभावना भी नहीं हो - या पिफर कोइर् बहुत ही उच्च दर के ब्याज पर उधार लेकर )ण पाश मंे पफँस चुका हो, तो ये परिवार को निधर्नता की रेखा से नीचे धकेल देते हैं। इसी संकट का गंभीरतम आयाम किसानांे की बड़े स्तर पर आत्महत्याएँ हैं। केवल आंध्रप्रदेश में ही 3000 से अिाक किसान प्राण दे चुके हैं और अभी यह संख्या बढ़ रही है। दिसंबर 2005 में ही महाराष्ट्र सरकार ने स्वीकार किया कि 2001 से उस प्रांत में भी 1000 से अिाक किसानांे ने अपने जीवन का अंत किया है। भारत विश्व का सबसे बड़ा कपास उत्पादक क्षेत्रा है, जहाँ वषर् 2002 - 2003 मंे 8300 हेक्टेयर भूमि पर खेती होती थी। ¯कतु यहाँ कपास की पैदावार मात्रा 300 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। इस नाते भारत विश्व के कपास उत्पादकांे की गणना में तीसरे क्रम पर आता है। उच्च उत्पादन लागतें, निम्न एवं अस्िथर उत्पादकता, विश्व कीमतों में गिरावट, संयुक्त राज्य अमेरिका तथा अन्य देशों द्वारा अपने कपास उत्पादकों को दी जाने वाली सहायिकी के कारण विश्व उत्पादन में गिरावट, वैश्वीकरण के कारण घरेलू बाशार के खुलने के कारण आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के कपास उत्पादक किसानों को कृष्िा के क्षेत्रा में निराशा और आत्महत्या की विवशता की ओर ले गइर्। यहाँ प्रश्न लाभ कमाने या उच्च प्रतिपफल का नहीं है। ये तो कृष्िा पर आधारित लाखांे छोटे और सीमांत किसानांे के लिए आजीविका कमाने और जीवित रह पाने की समस्या बन गइर् है। विद्वानों ने किसानांे की आत्महत्या के लिए विवश करने वाले अनेक कारकांे की व्याख्या की है। ये कारक हैं ;कद्ध परंपरागत कृष्िा से हटकर उच्च उत्पादकता व्यावसायिक खेती की ओर उस समय अग्रसर होना जब कि पयार्प्त तकनीकी सुविधाआंे का नितांत अभाव है और सरकार भी अपनी तकनीक प्रसार योजनाआंे के माध्यम से किसानांे की सहायता के कायर्क्रमांे को समाप्त कर चुकी है, ;खद्ध पिछले दो दशकांे में कृष्िा में सावर्जनिक निवेश मंे निरंतर गिरावट, ;गद्धअंतरार्ष्ट्रीय कंपनियांे के बीशांे में प्रस्पुफटन की निम्न दर और निजी दलालांे द्वारा नकली बीजांे व कीटानाशकांे की पूतिर्, ;घद्ध कीट संक्रमण, अकाल और पफसल का विनाश, ;घद्ध महाजनांे से 36 से लेकर 120 प्रतिशत ब्याज की ऊँची दरों पर लिए गए )ण, ;चद्ध सस्ते आयात के कारण कीमत और लाभों में गिरावट तथा ;छद्ध सिंचाइर् की सुविधाआंे का अभाव जिसने किसानांे को बहुत गहराइर् से पानी निकालने वाले पंप लगाने के लिए ;जो असपफल रहाद्ध अति उच्च ब्याज पर उधार लेने को विवश किया है। स्रोतः ए. के. मेहता, सौरभ घोष, ‘रितु एलावड़ी के सहयोग से किए गए अध्ययन’ वैश्वीकरण, आजीविका की हानि और निधर्नता के पाश में पफँसनाऋ आॅल्टरनेटिव इकनाॅमिक सवेर्, भारत 2004 - 05, आॅल्टरनेटिव सवेर् ग्रुप, दानिश बुक्स, दिल्ली तथा पी साइर्नाथऋ स्वैलींग रजिस्टर आॅपफ डेथ्स, द हिन्दू, 29 दिसंबर, 2005। बेरोजगार हैं या अनियत मजदूर हैं, जिन्हें कभी - कभी रोजगार मिलता है। ये अनियत मजदूर समाज के बहुत ही दयनीय सदस्य हैं क्योंकि इनके पास रोजगार सुरक्षा, परिसंपिायाँ, वांछित कायर् कौशल, पयार्प्त अवसर तथा निवार्ह के लिए अिाशेष नहीं होते हैं। अतः निधर्नता का संबंध व्यक्ित के रोजगार के स्वरूप से भी रहता है। बेरोजगारी, अल्परोजगार, कभी - कभी काम मिलना आदि। शहरी व ग्रामीण मजदूरों को ट्टण लेने को विवश कर देते हैं उससे उनकी निधर्नता और बढ़ जाती है। ट्टण - ग्रस्तता निधर्नता का एक महत्वपूणर् कारक है। खाद्य पदाथो± और आवश्यक वस्तुओं के दाम विलासिता की वस्तुओं से कहीं अिाक तेजी से बढ़ रहे हैं। इससे भी निम्न आय वगो± की कठिनाइयाँ और अभाव और बढ़ जाते हैं। आय और परिसंपिायों के वितरण की विषमताएँ भी निधर्नता की समस्या को बनाए रखने में अपना योगदान दे रही हैं। इन सभी कारकों ने वुफल मिलाकर समाज को दो वगो± में विभाजित कर दिया हैः वे जो उत्पादक संसाधनों के स्वामी हैं और बहुत अच्छी आय कमाते हैं तथा वे जिनके पास जीवित रहने के लिए केवल अपना श्रम है। भारत में निधर्न - धनी के बीच की खाइर् निरंतर विस्तृत होती जा रही है। निधर्नता देश के समक्ष एक ऐसी बहुआयामी चुनौती है, जिसका यु( स्तर पर सामना करने की आवश्यकता है। 4.6 निधर्नता निवारण के लिए नीतियाँ और कायर्क्रम भारतीय संविधान और पंचवषीर्य योजनाओं ने सामाजिक न्याय को सरकार की विकास रण - नीतियों का प्राथमिक उद्देश्य माना है। पहली पंचवषीर्य योजना ;1951 - 56द्ध के अनुसार वतर्मान परिस्िथतियों में आथ्िार्क और सामाजिक परिवतर्न की अंतः प्रेरणा का उदय तो निधर्नता और आय, संपिा तथा अवसरों की असमानताओं से होता है। दूसरी योजना ;1956 - 61द्ध में भी कहा गया है, ‘‘आथ्िार्क विकास के अिाकािाक लाभ समाज के अपेक्षाकृत कम भाग्यशाली वगो± तक पहुँचने चाहिए’’। प्रायः सभी नीति विषयक दस्तावेजों में निधर्नता निवारण और इस दिशा में सरकार द्वारा अपनाइर् जाने वाली रण - नीतियों की चचार् हुइर् है। सरकार ने निधर्नता निवारण के लिए त्रिा - आयामी नीति अपनाइर्। पहली संवृि आधारित रण - नीति है। यह इस आशा पर आधारित है कि आथ्िार्क संवृि के ;अथार्त् सकल घरेलू उत्पाद और प्रतिव्यक्ित आय मंे तीव्र वृि केद्ध प्रभाव समाज के सभी वगोर् तक पहुँच जाएँगे - ये समाज के निधर्नतम वगो± तक भी धीरे - धीरे पहुँच पायेंगे। 1950 से 1960 के दशक के पूवार्(र् में हमारी योजनाओं का मुख्य उद्देश्य यही था। यह माना जा रहा था कि तीव्र दर से औद्योगिक विकास और चुने हुए क्षेत्रांे में हरित क्रांति के माध्यम से कृष्िा का पूणर् काया - कल्प निश्चय ही समाज के अिाक पिछडे़ वगोंर् को लाभान्िवत चित्रा 4.6 ‘काम के बदले अनाज’ कायर्क्रम के अंतगर्त रोजगार करेगा। आपने अध्याय 2 तथा 3 में पढ़ा था कि संवृि और कृष्िा तथा उद्योग क्षेत्रांे में सवा±गीण वृि अिाक प्रभावशाली नहीं रही हैं। जनसंख्या वृि के परिणामस्वरूप प्रतिव्यक्ित आय में बहुत कमी हुइर्, इन्हीं कारणांे से धनी और निधर्न के बीच की खाइर् और भी बढ़ गइर्। हरित क्रांति ने विभ्िान्न भौगोलिक क्षेत्रांे के बीच तथा छोटे और बड़े किसानों के बीच का पफासला बहुत बढ़ा दिया है। भूमि के पुनविर्तरण की इच्छा तथा योग्यता का अभाव था। अथर्शास्ित्रायों के कथनानुसार आथ्िार्क संवृि के लाभ निधर्नों तक नहीं पहुँच पाए। निधर्नों के विकास के लिए विकल्पों की खोज के क्रम में नीति निधार्रकों को ऐसा लगा कि अतिरिक्त परिसंपिायों और कायर् - सृजन के साधनों द्वारा निधर्नों के लिए आय और रोजगार को बढ़ाया जा सकता है। ऐसा विशेष निधर्नता निवारण कायर्क्रमांे के माध्यम से ही हो पाएगा। इस दूसरी नीति को तीसरी पंचवषीर्य योजना ;1961 - 66द्ध से आरंभ किया गया और तब से धीरे - धीरे बढ़ाया गया। इसी क्रम में 1970 के दशक में चलाया गया ‘काम के बदले अनाज’ एक महत्वपूणर् कायर्क्रम रहा। इस दिशा में चल रहे अध्िकतर गरीबी उन्मूलन कायर्क्रम दसवीं पंचवषीर्य योजना की विकास दृष्िट पर आधारित हैं। अब स्वरोजगार तथा मजदूरी पर आधारित रोजगार कायर्क्रमों को निधर्नता निवारण का मुख्य माध्यम माना जा रहा है। स्वरोजगार कायर्क्रमों के उदाहरण हैं, ग्रामीण रोजगार सृजन कायर्क्रम ;त्म्ळच्द्ध, प्रधानमंत्राी की रोजगार योजना ;च्डत्ल्द्ध तथा स्वणर्जयंती शहरी रोजगार योजना ;ैश्रैत्ल्द्ध। पहले कायर्क्रम का उद्देश्य शहरों में स्वरोजगार के अवसरों का सृजन है। इसे खादी ग्रामोद्योग आयोग के माध्यम से ियान्िवत किया जा रहा है। इसके अंतगर्त छोटे उद्योग लगाने के लिए बैंक ट्टणों के माध्यम से वित्तीय सहयोग उपलब्ध कराया जाता है। प्रधानमंत्राी रोजगार योजना के अंतगर्त ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में निम्न आय वगर् परिवारों के श्िाक्ष्िात बेरोजगार किसी भी प्रकार के उद्यम को शुरू करने के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त कर सकते हैं। स्वणर् जयंती शहरी रोजगार योजना का ध्येय शहरी क्षेत्रों में स्वरोजगार तथा मजदूरी पर रोजगार के अिाक अवसरों का सृजन है। यह अब राष्ट्रीय ग्रामीण जीविका मिशन ;रा.ग्रा.जी.मि.द्ध के रूप में पुनस्थार्पित है। पहले के स्वरोजगार कायर्क्रमों के अंतगर्त परिवारों और व्यक्ितयों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती थी। पर 1990 के दशक से इस नीति में बदलाव आया है। अब इन कायर्क्रमों का लाभ चाहने वालों को स्वयं सहायता समूहों का गठन करने के लिए प्रेरित किया जाता है। प्रारंभ में उन्हें अपनी ही बचतों को एकत्रा कर परस्पर उधार देने को प्रोत्साहित किया जाता है। बाद में सरकार बैंकों के माध्यम से उन स्वयं - सहायता समूहों को आंश्िाक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है। ये समूह इसका निश्चय करते हैं कि स्वरोजगार कायर्क्रम के लिए किसे )ण दिया जाय। स्वणर्जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना ऐसा ही एक कायर्क्रम है। इसी तरह का एक कायर्क्रम राष्ट्रीय शहरी स्वरोजगार योजना है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अवुफशल निधर्न लोगों के लिए मजदूरी पर रोजगार के सृजन के लिए भी सरकार के पास अनेक कायर्क्रम हैं। अगस्त, 2005 में संसद में एक विधेयक पारित कर प्रत्येक ग्रामीण परिवार के एक इच्छुक वयस्क को वषर् में 100 दिनों तक के लिए अवुफशल शारीरिक श्रम कायर् उपलब्ध कराने की गारंटी देने का निणर्य किया गया है। इसे महात्मा गाँध्ी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अिानियम 2005 का नाम दिया गया है। इस अिानियम के अंतगर्त जो भी निधर्न निधार्रित न्यूनतम मजदूरी पर काम करने को तैयार हो, वह जहाँ यह कायर्क्रम चलाया जा रहा हो, वहाँ रिपोटर् कर सकता है। 2013 - 14 में, लगभग 5 करोड़ परिवारों को इस अध्िनियम के अंतगर्त रोजगार के अवसर दिये गये। निधर्नता निवारण की दिशा में तीसरा आयाम लोगों को न्यूनतम आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराना है। भारत विश्व के उन प्रथम देशों में से एक है जहाँ ऐसा सोचा गया। सस्ता अनाज, श्िाक्षा, स्वास्थ्य, जल पूतिर् और स्वच्छता आदि सामाजिक उपयोग आवश्यकताओं पर सावर्जनिक व्यय लोगों के जीवन स्तर को सुधार सकता है। इस वििा के अंतगर्त निधर्नों के उपभोग, रोजगार अवसरों का सृजन तथा स्वास्थ्य और श्िाक्षा में सुधार की संपूतिर् की जायेगी। यह वििा पाँचवीं पंचवषीर्य योजना मंे अपनाइर् गइर् है। उस योजना के दस्तावेज में कहा गया है ‘‘रोजगार के अवसरों में विस्तार के बाद भी निधर्न व्यक्ित अपने लिए सभी आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं को नहीं खरीद पाएँगे। एक निश्िचत सामाजिक न्यूनतम स्तर तक उनके उपभोग और निवेश को समथर्न देना निम्नलिख्िात रूपों में अनिवायर् रहेगा - अनिवायर् खाद्यान्न, पेय - जल, श्िाक्षा, पोषण - स्वास्थ्य सेवाएँ, संचार और विद्युत पूति±।’’ इन्हें कीजिए ऽ तटीय, रेगिस्तानी, पहाड़ी जनजातीय क्षेत्रांे और जनजातीय क्षेत्रों में संभव तीन प्रकार के ऐसे रोजगार अवसरांे पर चचार् कर उन्हें सूचीब( करें जो ;कद्ध काम के बदले अनाज तथा ;खद्ध स्वरोजगार कायर्क्रम के अंतगर्त आ सकते हों। ऽ योजना आयोग की वेबसाइट ;ूूूण्चसंददपदहबवउपेेपवदण्दपबण्पदद्ध पर अनेक नीति दस्तावेज, पंचवषीर्य योजनाएँ, आथ्िार्क सवर्ेक्षण आदि उपलब्ध हैं। इनमें से वुफछ आपके स्वूफल के पुस्तकालय या आस - पास किसी सावर्जनिक पुस्तकालय में भी मिल सकते हैं। इन दस्तावेजांे में सरकार द्वारा चलाए गए कायर्क्रम और उनकी समीक्षाएँ सुलभ हैं। उनमंे से वुफछ को पढ़कर उन पर कक्षा में चचार् करें। ऽ आपको अपने क्षेत्रा में या आस - पास सड़क निमार्ण, किसी सरकारी अस्पताल या स्वूफल आदि के भवन का निमार्ण होता अवश्य दिख जाएगा। ऐसे निमार्ण स्थलों पर जाकर वहाँ चल रहे काम, उन कामों में लगाए गए श्रमिकांे की संख्या, उन्हें दी जा रही मजदूरी आदि के बारे मंे दो - तीन पृष्ठांे की रिपोटर् तैयार करें। ऽ विकास कायोर्ं की रिपोटर् के आधर पर ;उदाहरणास्वरूप एन.आर.इ.जी.ए.द्धइससे संबंध्ित सरकारी नीतियों के दस्तावेज की आलोचनात्मक समीक्षा करें। निधर्नों के खाद्य उपभोग और पोषण स्तर को प्रभावित करने वाले तीन प्रमुख कायर्क्रम ये हैंः सावर्जनिक वितरण व्यवस्था, एकीकृत बाल विकास योजना तथा मध्यावकाश भोजन योजना। प्रधानमंत्राी ग्राम सड़क योजना, प्रधानमंत्राी ग्रामोदय योजना और वाल्मीकि अंबेडकर आवास योजना भी इसी दिशा मंे किए जा रहे प्रयास हैं। अब हम संक्षेप में यह तो कह ही सकते हैं कि भारत में अनेक दिशाओं में संतोषजनक प्रगति हुइर् है। सरकार के पास विशेष समूहांे की सहायता के लिए वुफछ अन्य सामाजिक सुरक्षा कायर्क्रम भी हंै। वेंफद्र सरकार इसी शृंखला मंे राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कायर्क्रम चला रही है। इसके अंतगर्त निराश्रित वृ(जनांे को निवार्ह के लिए पेंशन दी जाती है। अति निधर्न महिलाएँ और अकेली विधवाएँ भी इसी योजना के अंतगर्त आती हैं। सरकार ने गरीब लोगों को स्वास्थ्य बीमा प्रदान करने की वुफछ योजनाएँ आरंभ की हैं। 4.7 निधर्नता निवारण कायर्क्रम - एक समीक्षा स्वतंत्राता के बाद निधर्नता निवारण के प्रयासों के परिणाम तब सामने आए, जब वुफछ राज्यों में निधर्नों की निरपेक्ष संख्या तथा उनका प्रतिशत निधर्नता के राष्ट्रीय औसत के कापफी नीचे आ गए। निधर्नता, भूख, वुफपोषण, निरक्षरता और बुनियादी सुविधाआंे के अभाव को दूर करने की अनेक नीतियों को चलाने के बाद भी देश के कइर् भाग में ये अभी भी पाए जाते हैं। यद्यपि निधर्नता निवारण नीतियों का पिछले साढ़े पाँच बाॅक्स 4.4 रामदास कोड़वा की मंजिल विहीन सड़क रचकेठा गांव के रामदास कोड़वा को शायद ही यह जान कर खुशी हुइर् हो कि सरकार के लिए उसका मूल्य 17.44 लाख रुपये था। वषर् 1993 के अंत में आदिवासी विकास के नाम पर सरकार ने रचकेठा गाँव तक 3 किलोमीटर लंबी सड़क का निमार्ण 17.44 लाख रुपयों की लागत से करने का निश्चय किया। भारत के एक निधर्नतम जनपद सरगुशा में 55 प्रतिशत आबादी जनजातीय वगो± की ही है। पहाड़ी कोड़वा वगर् को तो सरकार ने आदिम जनजाति माना हुआ है और ये निधर्नों के भी सबसे नीचे वाले 5 प्रतिशत अंश में आते हैं। उनके विकास के लिए विशेष प्रयास चल रहे हैं और उनके नाम पर बड़ी - बड़ी धन राश्िायों का प्रावधान किया जा रहा है। पहाड़ी कोड़वा नामक एक वेंफद्र प्रायोजित योजना पर ही पाँच वषो± में 42 करोड़ की धनराश्िा व्यय की जा रही है। देश मे पहाड़ी कोड़वा जनजाति की संख्या लगभग 15,000 है, जिसका सबसे बड़ा समुदाय सरगुजा में बसा है। किंतु किन्हीं राजनीतिक कारणों से इस पहाड़ी कोड़वा विकास प्रकल्प का आधार रायगढ़ जिले में बनाया गया है। रचकेठा गाँव में पहाड़ी कोड़वा मागर् के निमार्ण में बस एक ही छोटी सी समस्या थी - वहाँ कोइर् भी पहाड़ी कोड़वा नहीं रहता था। रामदास का परिवार ही एक मात्रा अपवाद है। एक गैर - सरकारी संगठन के कायर्कतार् का कहना है कि इस बात का कोइर् मतलब नहीं है कि पहाड़ी कोड़वों को किसी काम से कोइर् लाभ होता है या नहीं। यहाँ तो बंगलों और तरण तालों का निमार्ण भी जनजाति विकास के नाम पर होगा। रामदास के पुत्रा रामावतार कोड़वा का कहना है कि किसी ने ये जानने की कोश्िाश ही नहींे की कि इस गाँव में कितने परिवार पहाड़ी कोड़वा हैं - एक कच्ची सड़क तो पहले ही यहाँ मौजूद थी। उन्होंने उसी कच्ची सड़क पर वुफछ लाल मिट्टðी और डाल दी, बस। आज भी वह सड़क कच्ची ही है - पक्की नहीं बनी है। हाँ, 17.44 लाख रुपये अवश्य खचर् हो गए हैं। रामदास की माँग तो बहुत ही साधारण सी है। उसे तो बस थोड़ा - सा पानी चाहिए। हम पानी के बिना खेती वैफसे करें? बार - बार शोर डालने पर उसने बस यही कहा कि उस सड़क पर 17.44 लाख रुपये खचर् करने के स्थान पर मेरी जमीन के पास के जीणर् अवस्था में पड़े वुफएँ का वुफछ हजार रुपये लगाकर उ(ार कर दिया जाता, तो कहीं अिाक अच्छा रहता। जमीन की दशा में भी सुधार की जरूरत है, पर अगर वे वुफछ पानी देने से ही शुरुआत कर दें, तो भी बहुत है। रामदास की समस्याओं पर ध्यान देने की किसे पुफरसत थी। सरकार को तो अपना एक लक्ष्य पूरा करना था। यदि सारी धन राश्िा को एक बैंक में साविा जमा खाते में डाल दिया जाए तो इन पहाड़ी कोड़वा व्यक्ितयों को कभी जीविका के लिए काम करने की शरूरत नहीं रहे, ब्याज से ही इनका सरगुजा के स्तर पर गुजर बसर हो जाएगा। किसी सरकारी अपफसर ने मजाक में ऐसा कहा। किसी ने रामदास से नहीं पूछा कि उसकी समस्या क्या थी, उसकी जरूरत क्या थी। न ही किसी ने उसे उन समस्याओं के समाधान में शामिल करना आवश्यक माना। बस उसके नाम पर 17.44 लाख रुपये की एक सड़क बना दी, जिस पर वह कभी पाँव भी नहीं रखता। जैसे ही हमने उस कहीं भी न पहुंचाने वाली सड़क पर चलने के लिए पाँव उठाए, वह गिड़गिड़ाता हुआ कहने लगा, साहब हमारी पानी की समस्या के लिए वुफछ कीजिए ना। ड्डोत पी साईंनाथ: एवरीबाॅडी लब्ज ए गुड ड्राउट स्टोरीज, प्रफाॅम इंडियाज पुअरेस्ट डिस्िट्रक्ट्स, पेंग्िवन बुक्स, नइर् दिल्ली से संकलित। दशकांे से निरंतर विकास होता रहा है, पिफर भी इसमंे वुफल मिला कर कोइर् क्रांतिकारी परिवतर्न नहीं आया है। कायर्क्रमों के नाम बदलते रहे हैं - कहीं कइर् कायर्क्रमों को मिलाकर एक बना दिया गया तो कहीं अलग - अलग कायर्क्रम रहे। ¯कतु, किसी भी कायर्क्रम से न तो उत्पादन परिसंपिायों के स्वामित्व में कोइर् परिवतर्न आया, न उत्पादन प्रिया में और न ही जरूरतमंदों की बुनियादी सुविधाओं की उपलब्िध में ही सुधार आ पाया। इन कायर्क्रमों की समीक्षा कर रहे विद्वानों ने इनके सपफल ियान्वयन से जुडे़ तीन बड़े पक्षों को स्पष्ट किया है, जो इनको सपफलतापूवर्क लागू करने में बाधा डालते हैं। भूमि और अन्य परिसंपिायों के वितरण की विषमताओं के कारण प्रत्यक्ष निधर्नता निवारण कायर्क्रमों का लाभ प्रायः गैर निधर्न वगर् के लोग ही उठा पाए। निधर्नता की गहनता की तुलना में इन कायर्क्रमों के लिए आबंटित संसाधन नितांत ही अपयार्प्त रहे हैं। यही नहीं, ये कायर्क्रम सरकार और बैंक अिाकारियों के सहारे ही चलाए जाते हैं। इन अिाकारियों में उपयुक्त चेतना के अभाव, अपयार्प्त प्रश्िाक्षण और भ्रष्टाचार के साथ - साथ स्थानीय सशक्त वगो± के अनेक प्रकार के दबावों के कारण प्रायः संसाधनों का दुरुपयोग और बबार्दी ही होती है। इन कायर्क्रमों के ियान्वयन में स्थानीय स्तर की संस्थाओं की भागीदारी भी शून्य होती है। सरकारी नीतियों ने दयनीय दशा से ग्रस्त उस विशाल जन समुदाय की सुध भी नहीं ली है जो निधर्नता - रेखा या उससे जरा सा ही ऊपर रह रहे हैं। इससे यह भी स्पष्ट है कि केवल उच्च संवृि ही निधर्नता कम करने में पयार्प्त नहीं होती। निधर्नों की सिय भागीदारी के बिना किसी भी कायर्क्रम का सपफल ियांवयन असंभव है। निधर्नता का वास्तविक अंत तो तभी होगा जब निधर्न भी अपनी सिय भागीदारी के माध्यम से आथ्िार्क संवृि में योगदान देना आरंभ करेंगे। ऐसा सामाजिक संघटन के माध्यम से निधर्नों द्वारा विकास प्रियाओं में उनकी भागीदारी सुनिश्िचत करने से और उनके सशक्त होने से ही संभव हो पाएगा। इससे रोजगार के अवसरों की रचना होगी, जिससे आय के स्तर में सुधार होगा, कौशल का विकास होगा, तथा स्वास्थ्य और साक्षरता के स्तर ऊँचे उठेंगे। साथ ही निधर्नता ग्रस्त क्षेत्रों की सही पहचान कर वहाँ स्वूफल, सड़वेंफ, विद्युत, संचार, सूचना, प्रौद्योगिकी सेवाएँ तथा प्रश्िाक्षण संस्थानों जैसी आधारिक संरचनाएँ उपलब्ध कराना भी आवश्यक है। 4.8 निष्कषर् हम स्वतंत्राता के बाद से लगभग 6 दशकों की यात्रा कर चुके हैं। हमारी सभी नीतियों का ध्येय समता और सामाजिक न्याय सहित तीव्र और संतुलित आथ्िार्क विकास बताया गया है। चाहे जो भी सरकार सत्ता में रही हो, सभी ने निधर्नता निवारण को ही भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती माना है। देश में निधर्नों की निरपेक्ष संख्या में कमी आइर् है और वुफछ राज्यों में राष्ट्रीय औसत से निधर्नों का अनुपात कम है। यद्यपि इस काम के लिए बहुत विशाल धन राश्िायाँ आबंटित और खचर् की जा चुकी हैं किंतु पिफर भी हम लक्ष्य से बहुत दूर हैं। प्रति व्यक्ित आय और औसत जीवन स्तर में सुधार हुए हैं, बुनियादी आवश्यकताओं की पूतिर् की दिशा में भी वुफछ प्रगति अवश्य हुइर् है। किंतु अन्य देशों की तुलना में हमारी यह प्रगति प्रभावहीन प्रतीत होती है। यही नहीं, विकास के लाभ हमारी जनता के सभी वगो± तक नहीं पहुँच पाए हैं। वैसे सामाजिक और आथ्िार्क विकास की कसौटियों पर हमारे देश के वुफछ क्षेत्राक, अथर्व्यवस्था के वुफछ वगर् और समाज के वुफछ अंश तो अनेक विकसित देशों से भी स्पधार् कर सकते हैं, पिफर भी ऐसा बहुत बड़ा समुदाय है जो अभी निधर्नता के दुष्चक्र से मुक्ित नहीं पा सका है। पुनरावतर्न ऽ भारत की विकासात्मक रण - नीतियों का एक प्रमुख उद्देश्य निधर्नता को कम करना है। ऽ न्यूनतम गैर - खाद्य व्यय के साथ औसत प्रति व्यक्ित दैनिक आवश्यकता को पूरा करने लायक प्रति व्यक्ित उपभोग व्यय स्तर ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों में 2100 कैलोरी को ही निधर्नता रेखा या निरपेक्ष निधर्नता कहते हैं। ऽ जब निधर्नों की संख्या और उनके अनुपात की तुलना की जाती है, तो हमें विभ्िान्न राज्यों में और विभ्िान्न समयों पर लोगों की निधर्नता के विभ्िान्न स्तरों के बारे में पता चलता है। ऽ भारत में निधर्नों की संख्या और वुफल जनसंख्या में उनका अनुपात पयार्प्त मात्रा में कम हुआ है। 1990 के दशक में पहली बार निधर्नों की निरपेक्ष संख्या में कमी आइर् है। ऽ अिाकतर निधर्न ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं और अनियत और अवुफशल कायार्ें में लगे होते हैं। ऽ आय तथा व्यय आधारित वििा निधर्न लोगों के अन्य गुणों पर विचार नहीं करती। ऽ कइर् वषार्ें से सरकार निधर्नता कम करने के लिए तीन वििायों का प्रयोग कर रही हैः संवृि - उन्मुख विकास, विशेष निधर्नता निवारण कायर्क्रम और निधर्नों की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूतिर्। ऽ परिसंपिायों के स्वामित्व, उत्पादन की प्रियाएँ तथा निधर्नों की आधारभूत सुविधाओं में अभी भी सरकार द्वारा पहल किया जाना बाकी है। अभ्यास 1.वैफलोरी आधरित तरीका निध्र्नता की पहचान के लिए क्यों उपयुक्त नहीं है? 2.‘काम के बदले अनाज’ कायर्क्रम का क्या अथर् है? 3.भारत में निध्र्नता से मुक्ित पाने के लिए रोजगार सृजन करने वाले कायर्क्रम क्यों महत्त्वपूणर् हैं? 4.आय अजिर्त करने वाली परिसंपिायों के सृजन से निधर्नता की समस्या का समाधान किस प्रकार हो सकता है? 5.भारत सरकार द्वारा निधर्नता पर त्रिा - आयामी प्रहार निध्र्नता दूर करने में सपफल नहीं रहा है। चचार् करें। 6.सरकार ने बुजुगो±, निधर्नों और असहाय महिलाओं के सहायताथर् कौन से कायर्क्रम अपनाए हैं? 7.क्या निधर्नता और बेरोजगारी के बीच कोइर् संबंध है? समझाइए? 8.मान लीजिए कि आप एक निधर्न परिवार से हैं और छोटी सी दुकान खोलने के लिए सरकारी सहायता पाना चाहते हैं। आप किस योजना के अंतगर्त आवेदन देंगे और क्यों? 9.ग्रामीण और शहरी बेरोजगारी में अंतर स्पष्ट करें। क्या यह कहना सही होगा कि निधर्नता गाँवों से शहरों में आ गइर् है? अपने उत्तर के पक्ष में निधर्नता अनुपात प्रवृिा का प्रयोग करें। 10.मान लीजिए कि आप किसी गाँव के निवासी हैं। अपने गाँव से निधर्नता निवारण के वुफछ सुझाव दीजिए। अतिरिक्त गतिवििायाँ 1 अपने आस - पास के तीस व्यक्ितयों से विभ्िान्न वस्तुओं के दैनिक उपभोग के आँकड़े एकत्रा करें। सापेक्ष निधर्नता के मान को निधार्रित करने के लिए उन व्यक्ितयों को सापेक्ष रूप से बेहतर और बदतर के अनुसार क्रमब( करें। 2 चार परिवारों द्वारा विभ्िान्न वस्तुओं पर किए गए व्यय से संबंिात आंकड़े एकत्रिात करें और निम्न सारणी की पूतिर् करें। इस अनुसंधान का विश्लेषण करें और पता करें कि कौन - सा परिवार अन्य परिवारों की तुलना में अिाक निधर्न है। यदि निधर्नता - रेखा का स्तर 500 रुपये प्रतिव्यक्ित हो तो कौन - सा परिवार पूणर् रूप से निधर्न होगा? वस्तुएँ परिवार क गेहूँ / चावल वनस्पति तेल चीनी बिजली/प्रकाश घी कपड़े मकान का किराया परिवार ख परिवार ग परिवार घ 3.निम्न सारणी भारत में तथा दिल्ली की झुग्गी - झोंपडि़यों में उपभोग पर प्रतिव्यक्ित प्रतिमाह व्यय को प्रतिशत के रूप में व्यक्त करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में 25 प्रतिशत चावल और गेहूँ का अथर् है प्रति सौ रुपये के व्यय पर, 25 रुपये केवल चावल और गेहूँ पर खचर् हो जाते हैं। ये आँकड़े वुुफल व्यय में उन पदाथार्ें के प्रतिशत अंश को दिखाते हैं। इस सारणी को पढ़कर इस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर देंः मदें ग्रामीण शहरी दिल्ली की झुग्गी झोपडि़याँ चावल और गेहूँदाल और दाल उत्पाददूध और दूध उत्पादपफल सब्िजयाँमाँस, मछली, अंडेचीनीनमक और मसालेअन्य खाद्य वस्तुएँ 25.0 5.7 17.4 15.1 6.3 3.3 10.8 16.5 35.4 6.1 14.1 12.7 5.3 3.8 10.8 11.3 28.7 9.9 10.3 19.6 13.1 4.0 8.1 6.4 वुफल खाद्य पदाथर् 100 100 100 सवफल व्यय में खाद्य पदाथो± का अंश 62.9 72.2 72.8 ऽ विभ्िान्न वगो± के खाद्य पदाथो± पर व्यय के अनुपात और उनकी प्राथमिकताओं की तुलना करें। ऽ क्या आप ऐसा सोचते हैं कि झुग्गी - झोंपडि़यों के परिवार अनाजों और दालों पर अिाक निभर्र हैं? ऽ विभ्िान्न क्षेत्रों में रहने वाले लोग किस मद पर सबसे कम खचर् करते हैं? उनमें तुलना करें। ऽ क्या आप ऐसा सोचते हैं कि झुग्गी - झोंपडि़यों में रहने वाले माँस, मछलियों और अंडों को अिाक महत्व देते हैं। पुस्तवेंफ दांडेकर वी. एम. एं ंड नीलकाथ रथ 1971. पावटीर् इन इडिया, इंडियन स्वूफल आॅपफ पोलिटिकल अकाॅनामी, पुणे। ड्रेश जीन, अमत्यर् सेन एंॅॅड अख्तर हुसैन ;ए.ड.द्ध 1995. दी पोलिटिकल इकानामी आपफ हंगर, कैलेंडान प्रेस, आॅक्सपफोडर्। नौरोजी दादाभाइर् 1996. पावटीर् एं ंड अनबि्रटिश रूल इन इडिया, पब्िलकेशन डिविशन मिनिस्ट्री आॅपफ इनपफाॅरमेशन एंंड ब्राॅडकास्िटंग, गवन्मर्ेंट आॅपफ इडिया, सेकेड एडीशन। साईंंनाथ पी. 1996. एवरीबाॅडी लव्ज ए गुड ड्राॅटः स्टोरीश फ्रराॅम इडियाश पूअरेस्ट डिस्िट्रक्ट्स, पेंग्िवन बुक्स, नइर् दिल्ली। सेन अमत्यर् 1999.पावटीर् एं ंड पफेमीस, एन. एसे. आॅन एनटाइटलमेट एड डिप्राइवेशन, आॅक्सपफाॅडर् युनिवसिर्टी प्रेस, नइर् दिल्ली। सुब्रमण्िायम, एस. ;ऐडद्ध 2001, इंडियन डेवेलपमेंट एक्सपीरिएंस सिलेक्िटड राइटिंग्स आॅपफ एस गुहा. आॅक्सपफोडर् यूनिवसिर्टी प्रेस, दिल्ली। निबंध नवीन वुफमार एं ंड एस. सी. अग्रवाल ;2003द्ध, पैटनर् आॅपफ वंफसंेप्शन एड पावटीर् इन दिल्ली स्लम्स, इकाॅनाॅमिक एंड पाॅलिटिकल वीकली, दिसबर 13, पृष्ठ 5294 - 5300बी. एस. मिनहाल, एल. आर. जैन एंंड एड. डी. तेदुलकर ;1991द्ध, डिक्लाइनिंग इसिडेंस आॅपफ पावटीर् इन दी 1980, एविडेंस बसर्स आट्रीर्पफैक्ट्स, इकाॅनामिक एड पोलिटिकल वीकली, जुलाइर् 6 - 13सरकारी रिपोटर् आदि 1.योजना आयोग ;1993द्ध, निधर्न लोगों की संख्या और अनुपात के अनुमान पर विशेषज्ञ दल की रिपोटर्, पसर्पेक्िटव प्लानिंग डिवीजन, भारत सरकार। 2.एस. सुब्रह्मण्यम ;संद्ध 2001, इंडियन डेवेलपमेंट एक्सपीरियंस सिलेक्िटड राइटिग्ंस आॅपफ एस. गुहान, आॅक्सपफोडर् यूनि. प्रेस, नइर् दिल्ली। 3.आ£थक सवेर्क्षण ;2013 - 14द्ध वित्त मंत्रालय, भारत सरकार। 4.दसवीं पंचवषीर्य योजना ;2002 - 07द्ध खंड दो ए क्षेत्राीय नीतियां और कायर्क्रम, योजना आयोग, भारत सरकार, नइर् दिल्ली। 5.बारहवीं पंचवषीर्य योजना ;2012 - 17द्ध वोल्यूम - प्एप्प्एप्प्प्ए सेज पब्िलकेशन्स प्राइवेट लिमिटेड, नयी दिल्ली ;योजना आयोग, भारत सरकार के लिएद्ध।

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