भारत में योजना का मुख्य उद्देश्य ..... विकास की एक ऐसी प्रिया प्रारंभ करना है जो रहन - सहन के स्तर को ऊँचा उठाए तथा लोगों के लिए समृ( एवं वैविध्यपूणर् जीवन के नये अवसर उपलब्ध करायेगी। - प्रथम पंचवषीर्य योजना 2.1 परिचय 15 अगस्त, 1947 के दिन भारत में स्वतंत्राता का एक नया प्रभात उदित हुआ। अंततः दो सौ वषो± के बि्रटिश शासन के बाद हम अपने भाग्य के विधाता बन गए। अब राष्ट्र के नव - निमार्ण का कायर् हमारे अपने हाथों में था। स्वतंत्रा भारत के नेताओं को अन्य बातों के साथ - साथ यह भी तय करना था कि हमारे देश में कौन - सी आथ्िार्क प्रणाली सबसे उपयुक्त रहेगी, जो केवल वुफछ लोगों के लिए नहीं बल्िक सवर्जन कल्याण के लिए कायर् करेगी। विभ्िान्न प्रकार की आथ्िार्क प्रणालियाँ हो सकती हैं ;देखें बाॅक्स 2.1द्ध, पर जवाहरलाल नेहरु को समाजवाद का प्रतिमान सबसे अच्छा लगा। ¯कतु वे भी भूतपूवर् सोवियत संघ की उस नीति के पक्षधर नहीं थे, जिसमें उत्पादन के सभी साधन ;खेत और कारखानेद्ध सरकार के स्वामित्व के अंतगर्त थे। कोइर् निजी संपिा नहीं थी। लोकतंत्रा के प्रति वचनब( भारत जैसे देश में सरकार के लिए पूवर् सोवियत संघ की तरह, अपने नागरिकों के भू - स्वामित्व के प्रतिमानों तथा अन्य संपिायों को परिवतिर्त कर पाना संभव नहीं था। नेहरु तथा स्वतंत्रा भारत के अनेक अन्य नेताओं और चिंतकों ने मिलकर नव - स्वतंत्रा भारत के लिए पूँजीवाद तथा समाजवाद के अतिवादी व्याख्या के किसी विकल्प की खोज की। बुनियादी तौर पर यद्यपि उन्हें समाजवाद से सहानुभूति थी, पिफर भी उन्होंने ऐसी आथ्िार्क प्रणाली अपनाइर् जो उनके विचार में समाजवाद की श्रेष्ठ विशेषताओं से युक्त, ¯कतु कमियोें से मुक्त थी। इसके अनुसार भारत एक ऐसा समाजवादी समाज होगा, जिसमें सावर्जनिक क्षेत्राक एक सशक्त क्षेत्राक होगा, जिसके अंतगर्त निजी संपिा और लोकतंत्रा का भी स्थान होगा। इन्हें कीजिए ऽ विश्व में प्रचलित विभ्िान्न आथ्िार्क प्रणालियों का एक चाटर् बनाइए। पूँजीवादी, समाजवादी तथा मिश्रित अथर्व्यवस्था वाले देशों की सूची बनाइए। ऽ किसी कृष्िा पफाॅमर् पर अपनी कक्षा के साथ भ्रमण की योजना बनाइए। कक्षा के सात समूह बनाएँ और प्रत्येक समूह को एक विशेष विषय में जानकारी एकत्रा करने का काम सौंप दंे। उदाहरण के लिए, इस भ्रमण का उद्देश्य, इसमें खचर् होने वाली धन राश्िा, लगने वाला समय तथा संसाधन, साथ जाने वाले ऐसे व्यक्ित जिनसे संपकर् स्थापित करना है, भ्रमण के स्थानों के नाम, पूछे जाने वाले संभावित प्रश्न आदि। अपने श्िाक्षक की सहायता से इन विश्िाष्ट उद्देश्यों का संग्रह कीजिए तथा ऐसे कृष्िा पफामर् के भ्रमण की सपफलता के दीघर्कालिक उद्देश्यों से उनकी तुलना कीजिए। बाॅक्स 2.1 आथ्िार्क प्रणालियों के प्रकार प्रत्येक समाज को तीन प्रश्नों के उत्तर देने होते हैंः ऽ देश में किन वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन किया जाए? ऽ वस्तुएँ और सेवाएँ किस प्रकार उत्पादित की जाएँ? उत्पादक इस कायर् में मानव श्रम का अिाक प्रयोग करे अथवा पूँजी ;मशीनोंद्ध का? ऽ उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का विभ्िान्न व्यक्ितयों के बीच किस प्रकार वितरण किया जाना चाहिए? इन सभी प्रश्नों का एक उत्तर तो माँग और पूतिर् का बाशार की शक्ितयों पर निभर्र करता है। बाशार अथर्व्यवस्था में, जिसे पँूजीवादी अथर्व्यवस्था भी कहते हंै, उन्हीं उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन होता है जिनकी बाशार में माँग है। इसमें, वही वस्तुएँ उत्पादित की जाती हैं जिन्हें देश के घरेलू या विदेशी बाशारों में सलाभ बेचा जा सके। यदि कारों की माँग है तो कारों का उत्पादन होगा और साइकिलों की माँग है तो साइकिलों का उत्पादन होगा। यदि श्रम, पूँजी की अपेक्षा सस्ता है तो अिाक श्रम प्रधान वििायों का प्रयोग होगा और यदि श्रम की अपेक्षा पूँजी सस्ती है, तो उत्पादन की अिाक पूँजी प्रधान वििायों का प्रयोग होगा। पँूजीवादी अथर्व्यवस्था में उत्पादित वस्तुओं का विभ्िान्न व्यक्ितयों के बीच वितरण उनकी आवश्यकताओं के अनुसार नहीं होता। अिाकांश विभाजन इस आधार पर होता है कि व्यक्ितयों की क्रय - क्षमता कितनी है और वे किन वस्तुओं और सेवाओं को खरीदने की क्षमता रखते हैं। अभ्िाप्राय यह है कि खरीदने के लिए जेब में रुपये होने चाहिए। कम कीमत पर गरीबों के लिए घर आवश्यक है किंतु इसकी गणना बाजार माँग को ध्यान में रखकर नहीं की जानी चाहिए क्योंकि मँाग के अनुसार गरीबों की क्रयशक्ित नहीं है। परिणामस्वरूप इस वस्तु की उत्पादन और पूतिर् बाजार शक्ित के अनुसार नहीं हो सकती है। हमारे प्रथम प्रधानमंत्राी जवाहरलाल नेहरु को ऐसी व्यवस्था पसंद नहीं थी, क्यांेकि ऐसी व्यवस्था को अपनाने से हमारे देश के अिाकांश लोगों को अपनी स्िथति सुधारने का अवसर ही नहीं मिल पाता। समाजवादी समाज इन तीनों प्रश्नों के उत्तर पूणर्तया भ्िान्न तरीके से देता है। समाजवादी समाज में सरकार ही यह निणर्य लेती है कि समाज की आवश्यकताओं के अनुसार भ्िान्न वस्तुओं का उत्पादन किया जाए। यह माना जाता है कि सरकार यह जानती है कि देश के लोगों के हित में क्या है, इसीलिए लोगों की वैयक्ितक इच्छाओं को कोइर् महत्त्व नहीं दिया जाता। सरकार ही यह निणर्य करती है कि वस्तुओं का उत्पादन तथा वितरण किस प्रकार किया जाए। सि(ांततः यह माना जाता है कि समाजवाद मंे वितरण लोगों की आवश्यकता के आधार पर होता है, उनकी क्रय क्षमता के आधार पर नहीं। इसके विपरीत एक समाजवादी राष्ट्र अपने सभी नागरिकों को निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाएँ सुलभ कराता है। समाजवादी व्यवस्था में निजी संपिा का कोइर् स्थान नहीं होता क्योंकि प्रत्येक वस्तु राज्य की होती है। उदाहरण के लिए चीन और क्यूबा में अध्िकतर आथ्िार्क गतिविध्ियाँ सामाजिक सि(ांत द्वारा निदेर्श्िात होती हैं। अिाकांश अथर्व्यवस्थाएँ मिश्रित अथर्व्यवस्थाएँ हैं, अथार्त् सरकार तथा बाशार एक साथ इन तीनों प्रश्नों के उत्तर देते हैं कि क्या उत्पादन किया जाए, किस प्रकार उत्पादन हो तथा किस प्रकार वितरण किया जाए। मिश्रित अथर्व्यवस्थाओं में बाशार उन्हीं वस्तुओं और सेवाओं को सुलभ कराता है, जिसका वह अच्छा उत्पादन कर सकता है तथा सरकार उन आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं को सुलभ कराती है, जिन्हें बाशार सुलभ कराने में विपफल रहता है। बाॅक्स 2.2 योजना क्या है? योजना इसकी व्याख्या करती है कि किसी देश के संसाधनों का प्रयोग किस प्रकार किया जाना चाहिए। योजना के वुफछ सामान्य तथा वुफछ विशेष उद्देश्य होते हैं, जिनको एक निदिर्ष्ट समयाविा में प्राप्त करना होता है। भारत में योजनाएँ पाँच वषर् की अविा की होती हैं और इसे पंचवषीर्य योजनाएँ कहा जाता है ;यह शब्दावली राष्ट्रीय नियोजन में अग्रणी देश पूवर् सोवियत स्ंाघ से ही ली गइर् हैद्ध। हमारे योजना के प्रलेखांे में केवल पाँच वषर् की योजना अविा मंे प्राप्त किये जाने वाले उद्देश्यों का ही उल्लेख नहीं किया गया, अपितु उनमें आगामी बीस वषार्ें मंे प्राप्त किए जाने वाले उद्देश्यों का भी उल्लेख होता है। इस दीघर्कालिक योजना को परिप्रेक्ष्यात्मक योजना कहते हंै। पंचवषीर्य योजनाओं द्वारा परिप्रेक्ष्यात्मक योजनाओं के लिए आधार प्राप्त होने की अपेक्षा की जाती है। यह तो संभव नहीं होगा कि सभी योजनाओं में उसके सभी लक्ष्यों को एक समान महत्त्व दिया जाए। वस्तुतः विभ्िान्न लक्ष्यों में वुफछ अंतद्वर्द्व भी हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि प्रौद्योगिकी श्रम की आवश्यकता को कम करती हैं तो आधुनिक प्रौद्योगिकी के शुरू करने के लक्ष्य तथा रोजगार बढ़ाने के लक्ष्य में विरोध हो सकता है। आयोजकों को इस प्रकार के विरोधों का संतुलन करना पड़ता है - यह कायर् इतना सहज नहीं है। भारत की विभ्िान्न योजनाओं में अलग - अलग लक्ष्यों पर बल दिया गया है। हमारी पंचवषीर्य योजनाएँ यह नहीं बतातीं कि प्रत्येक वस्तु और सेवा का कितना उत्पादन किया जाएगा। यह न तो संभव है और न ही आवश्यक ;पूवर् सोवियत संघ ने यह कायर् करने का प्रयास किया था और वह पूरी तरह विपफल रहाद्ध। अतः इतना ही पयार्प्त है कि योजनाएँ उन्हीं क्षेत्राकों के विषय में स्पष्ट लक्ष्य निधार्रित करें जिनमें उनकी महत्वपूणर् भूमिका हो, जैसे विद्युत् उत्पादन और सिंचाइर् आदि। शेष को बाशार पर छोड़ दिया जाना ही अिाक श्रेयस्कर रहता है। सरकार अथर्व्यवस्था के लिए योजना बनायेगी ;देेखें बाॅक्स 2.2द्ध। निजी क्षेत्राक को भी योजना प्रयास का एक अंग बनने के लिए प्रोत्साहित किया जायेगा। औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1948 तथा भारतीय संविधान के नीति निदेशक सि(ांतों का भी यही दृष्िटकोण है। वषर् 1950 में प्रधानमंत्राी की अध्यक्षता में योजना आयोग की स्थापना की गइर्। इस प्रकार पंचवषीर्य योजनाओं के युग का सूत्रापात हुआ। 2.2 पंचवषीर्य योजनाओं के लक्ष्य किसी योजना के स्पष्टतः निदिर्ष्ट लक्ष्य होने चाहिए। पंचवषीर्य योजनाओं के लक्ष्य हंैः संवृि, आधुनिकीकरण, आत्मनिभर्रता और समानता। इसका अथर् यह नहीं है कि प्रत्येक योजना में इन लक्ष्यों को एक समान महत्त्व दिया गया है। सीमित संसाधनों के कारण प्रत्येक योजना में ऐसे लक्ष्यों का चयन करना पड़ता है, जिनको प्राथमिकता दी जानी है। हाँ, योजनाकारों को यह सुनिश्िचत करना होता है कि जहाँ तक संभव हो, चारों उद्देश्यों में कोइर् अंतविर्रोध न हो। आइए, योजना के इन लक्ष्यों के विषय में विस्तार से जानने का प्रयास करें। संवृिः इसका अथर् है देश में वस्तुओं और सेवाओं की उत्पादन क्षमता में वृि। इसका अभ्िाप्राय उत्पादक पूँजी के अिाक भंडार या परिवहन, बैंकिग आदि सहायक सेवाओं का विस्तार या उत्पादक पूंँजी तथा सेवाओं की बाॅक्स 2.3 महालनोबिसः भारतीय योजनाओं के निमार्ता हमारी पंचवषीर्य योजनाओं के निमार्ण में अनेक प्रसि( विचारकों का योगदान रहा है। उनमें सांख्ियकीविद् प्रशांतचन्द्र महालनोबिस का नाम उल्लेखनीय है। द्वितीय पंचवषीर्य योजना का सामान्यतः विकासात्मक योजना में एक अति महत्वपूणर् योगदान है। योजना का काम सही मायने में द्वितीय पंचवषीर्य योजना से प्रारंभ हुआ। इसमें भारतीय योजना के लक्ष्यों से संबंिात आधारिक विचार दिये गये हैं। यह योजना महालनोबिस के विचारों पर आधारित थी। इस अथर् में, उन्हें भारतीय योजना का निमार्ता माना जा सकता है। महालनोबिस का जन्म 1983 में कलकत्ता ;कोलकाताद्ध में हुआ था। इनकी श्िाक्षा प्रेसीडेंसी काॅलेज कलकत्ता ;कोलकाताद्ध तथा सेंट्रल युनिवसिर्टी, इंग्लैंड में हुइर्। सांख्ियकी विषय में उनके योगदान के कारण उन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली। 1946 में उन्हें बि्रटेन की एक सोसाइटी का पफेलो ;सदस्यद्ध बनाया गया। यह वैज्ञानिकों का एक सवार्िाक प्रतिष्िठत संगठन हैऋ जिसका सदस्य केवल उत्कृष्ट वैज्ञानिकों को ही बनाया जाता है। महालनोबिस ने कोलकाता में भारतीय सांख्ियकी संस्थान ;आइर्.एस.आइर्द्ध स्थापना की तथा ‘सांख्य’ नामक एक जनर्ल निकाला, जो आज भी सांख्ियकीविदों के लिये परस्पर विचार - विमशर् के लिये एक प्रतिष्िठत मंच बना हुआ है। आज भी आइर्.एस.आइर्तथा सांख्य दोनों को ही समस्त विश्व में सांख्ियकीविदों और अथर्शास्ित्रायों द्वारा अतिसम्मान की दृष्िट से देखा जाता है। द्वितीय पंचवषीर्य योजना के दौरान महालनोबिस ने भारत के आथ्िार्क विकास के लिए भारत तथा विदेशों से प्रतिष्िठत अथर्शास्ित्रायों को आमंत्रिात किये जाने की सलाह दी। कालांतर में इनमें से वुफछ अथर्शास्ित्रायों को नोबेल पुरस्कार मिला। यह इस बात को दशार्ता है कि उन्हें प्रतिभाशाली व्यक्ितयों की पहचान थी। महालनोबिस द्वारा आमंत्रिात किये गये अथर्शास्ित्रायों में वे लोग भी थे, जो द्वितीय पंचवषीर्य योजना के समाजवादी सि(ांतों के कटु आलोचक थे। दूसरे शब्दोें में, वह अपने आलोचकों को सुनने के भी इच्छुक थे। यह उनकी महान विद्वता का द्योतक है। आज अनेक अथर्शास्त्राी महालनोबिस के योजना संबंधी दृष्िटकोण को अस्वीकार करते हैं। परंतु भारत को आथ्िार्क प्रगति के पथ पर अग्रसर करने में उनकी महत्वपूणर् भूमिका के लिये उन्हें सदैव स्मरण किया जायेगा। सांख्ियकीविद् सांख्ियकीय सि(ांत में उनके योगदान से लाभ उठाते रहेंगे। ड्डोतः सुखमय चक्रवतीर् महालनोबिस, प्रशांतचन्द्र इन जोन इर्टवैल इट.एल. दी न्यू पाल्ग्रेव डिक्शनरी, इकाॅनामिक डेवलपमेंट, डब्ल्यू.डब्ल्यू, नाटर्न न्यूयाकर् एंड लंदन। बाॅक्स 2.4 सेवा क्षेत्राक देश के विकास के साथ - साथ इसमें एक संरचनात्मक परिवतर्न आता है। भारत में तो यह परिवतर्न बहुत विचित्रा रहा है। सामान्यतः विकास के साथ - साथ सकल घरेलू उत्पाद में कृष्िा का अंश कम होता है और उद्योगों का अंश प्रधान होता है। विकास के उच्चतर स्तर पर पहुँच कर जी.डी.पी. में सेवाओं का अंशदान अन्य दोनों क्षेत्राकों से अिाक हो जाता है। भारत में, जैसा कि एक गरीब देश में अपेक्षा की जाती है, जी.डी.पी. में कृष्िा का अंश 50 प्रतिशत से अिाक था। ¯कतु, 1990 में सेवा क्षेत्राक का अंश बढ़कर 40.59 प्रतिशत हो गया - यह कृष्िा तथा उद्योग दोनों से ही अिाक था। ऐसी स्िथति तो प्रायः विकसित देशों में ही पायी जाती है। 1991 के बाद की अविा में तो सेवा क्षेत्राक के अंश की संवृि की यह प्रवृिा और बढ़ गइर्। इससे देश में वैश्वीकरण का प्रारंभ हुआ। इसकी चचार् अगले अध्याय में विस्तार से की जायेगी। दक्षता में वृि से है। अथर्शास्त्रा की भाषा में आथ्िार्क संवृि का प्रामाण्िाक सूचक सकल घरेलू उत्पाद ;जी.डी.पी.द्ध में निरंतर वृि है। जी.डी.पी. एक वषर् की अविा में देश में हुए सभी वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन का बाशार मूल्य होता है। यदि जी.डी.पीको एक ‘केक’ मान लिया जाए तो संवृि का अथर् इसके आकार में वृि होगा। यदि केक बड़ा होगा तो अिाक लोग उपभोग कर पाएँगे। यदि भारतीय जनता को अिाक समृ( और विविधतापूणर् जीवन यापन करना है, ;प्रथम पंचवषीर्य योजना के अनुसारद्ध, तो वस्तुओं और सेवाओं का अिाक उत्पादन करना आवश्यक है। देश का सकल घरेलू उत्पाद देश की अथर्व्यवस्था के विभ्िान्न क्षेत्राकों से प्राप्त होता है। ये क्षेत्राक हैं - कृष्िा क्षेत्राक, औद्योगिक क्षेत्राक और सेवा क्षेत्राक। इन क्षेत्राकों के योगदान से ही अथर्व्यवस्था का ढाँचा तैयार होता है। वुफछ देशों में सकल घरेलू उत्पाद की संवृि में कृष्िा का योगदान अिाक होता हैं तो वुफछ में सेवा क्षेत्राक की वृि इसमें अिाक योगदान करती है ;देखें बाॅक्स 2.4द्ध। आधुनिकीकरणः वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन बढ़ाने के लिए उत्पादकों को नइर् प्रौद्योगिकी अपनानी पड़ती है। उदाहरण के लिए, किसान पुराने बीजों के स्थान पर नइर् किस्म के बीजों का प्रयोग कर खेतों की पैदावार बढ़ा सकता है। उसी प्रकार, एक पफैक्ट्री नइर् मशीनों का प्रयोग कर उत्पादन बढ़ा सकती है। नइर् प्रौद्योगिकी को अपनाना ही आधुनिकीकरण है। आधुनिकीकरण केवल नवीन प्रौद्योगिकी के प्रयोग तक सीमित नहीं है, बल्िक इसका उद्देश्य सामाजिक दृष्िटकोण में परिवतर्न लाना भी है, जैसे यह स्वीकार करना कि महिलाओं वफा अिाकार भी पुरुषों के समान होना चाहिए। परंपरागत समाज में नारी का कायर्क्षेत्रा घर की सीमाओं तक सीमित मान लिया जाता है। आधुनिक समाज में नारी की प्रतिभाओं का घर से बाहर - बैंकों, कारखानों, विद्यालयों आदि स्थानों पर प्रयोग किया जाता है और इन्हें कीजिए ऽ निम्नलिख्िात के लिए प्रयुक्त प्रौद्योगिकी में आए परिवतर्नों पर अपनी कक्षा में चचार् कीजिए। ;कद्धखाद्यान्न उत्पादन ;खद्ध उत्पादन की पैकेजिंग ;गद्धजन संचार ऽ उन वस्तुओं को ज्ञात कीजिए तथा उन मुख्य वस्तुओं की सूची बनाइए, जिनका भारत 1990 - 91 तथा 2013 - 14 के दौरान आयात एवं नियार्त करता था। ;कद्ध अंतर बताइए। ;खद्ध क्या आपको आत्मनिभर्रता का प्रभाव दिखाइर् देता है? चचार् करें। उपयुर्क्त विषयों में विस्तृत जानकारी के लिए आप नवीनतम ‘आथ्िार्क सवेर्क्षण’ को देख सकते हैं। ऐसा करने वाला समाज ही अिाकांशतः समृ( होता है। आत्मनिभर्रताः कोइर् राष्ट्र आधुनिकीकरण और आथ्िार्क संवृि, अपने अथवा अन्य राष्ट्रों से आयातित संसाधनों के प्रयोग के द्वारा कर सकता है। हमारी प्रथम सात पंचवषीर्य योजनाओं में आत्मनिभर्रता को महत्त्व दिया गया, जिसका अथर् है कि उन चीशों के आयात से बचा जाए, जिनका देश में ही उत्पादन संभव था। इस नीति को, विशेषकर खाद्यान्न के लिए अन्य देशों पर निभर्रता कम करने के लिए आवश्यक समझा गया। हाल ही में विदेशी शासन से मुक्त हुए देश के लोगों की आत्मनिभर्रता की नीति को महत्त्व देना समझा जा सकता है। इसके अतिरिक्त, यह आशंका भी थी कि आयातित खाद्यान्न, विदेशी प्रौद्योगिकी और पूँजी पर निभर्रता किसी न किसी रूप में हमारे देश की नीतियांे में विदेशी हस्तक्षेप को बढ़ाकर हमारी संप्रभुता में बाधा डाल सकती थी। समानताः केवल संवृि, आधुनिकीकरण और आत्मनिभर्रता के द्वारा ही जनसामान्य के जीवन में सुधार नहीं आ सकता। किसी देश में उच्च संवृि दर और विकसित अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी का प्रयोग होने के बाद भी अिाकांश लोग गरीब हो सकते हैं। यह सुनिश्िचत करना आवश्यक है कि आथ्िार्क समृि के लाभ देश के निधर्न वगर् को भी सुलभ हों, केवल धनी लोगों तक ही सीमित न रहें। अतः संवृि, आधुनिकीकरण और आत्मनिभर्रता के साथ - साथ समानता भी महत्त्वपूणर् हैः प्रत्येक भारतीय को भोजन, अच्छा आवास, श्िाक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा कर पाने में समथर् होना चाहिए और धन संपिा के वितरण की असमानताएँ भी कम होनी चाहिए। आइए, अब यह जानने का प्रयास करें कि 1950 से 1990 तक की अविा में लागू की गइर् प्रथम सात पंचवषीर्य योजनाओं ने किस प्रकार इन चार लक्ष्यों की प्राप्ित के प्रयास किए तथा कृष्िा, उद्योग और व्यापार के संदभर् में ये प्रयास कहाँ तक सपफल रहे। वषर् 1991 के बाद बाॅक्स 2.5 स्वामित्व तथा प्रेरणाएँ ‘किसान को भूमि’ यह नीति इस विचारधारा पर आधारित है कि यदि किसानों को भूमि का स्वामी बना दिया जाए तो वे उत्पादन बढ़ाने में अिाक रुचि ;उन्हें अिाक प्रेरणा मिलेगीद्ध लेंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि भू - स्वामित्व से कृषक को अिाक उत्पादन का लाभ मिलता है। काश्तकारों को भूमि में सुधारों की कोइर् प्रेरणा नहीं होती, क्योंकि अिाक उत्पादन से जमींदार को ही लाभ मिलता है। प्रेरणा प्रदान करने में स्वामित्व के महत्त्व को बताने के लिये पूवर् सोवियत संघ के किसानों के द्वारा बिक्री हेतु पफलों की पैकिंग करने में लापरवाही का उदाहरण दिया जाता है। वे सड़े - गले पफलों और ताजे पफलों को एक ही बाॅक्स में पैक कर देते थे। आज प्रत्येक किसान यह जानता है कि सड़े - गले पफल ताजे पफलों को भी खराब कर देते हैं, यदि उन्हें एक साथ पैक किया जाये। इससे किसान को ही हानि होगी, क्योंकि पफल बिक नहीं पायेंगे। अतः प्रश्न उठता है कि सोवियत संघ के किसान ऐसा काम क्यों करते थे जो उनको सापफ तौर पर हानि पहुँचाये? इसका अथर् किसानों के सम्मुख प्रेरणाओं से है, क्योंकि पूवर् सोवियत संघ में किसान भूमि के स्वामी नहीं थे। अतः न उन्हें लाभ होता था और न हानि। स्वामित्व न होने के कारण, कृषकों को दक्ष होने की कोइर् प्रेरणा नहीं होती थी। इससे इस बात की भी जानकारी मिलती है कि अति उपजाऊ, विशाल कृष्िा क्षेत्रा के उपलब्ध होने के बावजूद सोवियत संघ में कृष्िा क्षेत्राक का उत्पादन कम क्यों था? ड्डोतः थामस सोवेल, बेसिक इकाॅनामिक्सः द सिटीजन्स गाइड टू दी इकाॅनामी, न्यूयाकर्ः बेसिक बुक्स, 2004, दूसरा संस्करण। अपनाइर् गइर् नीतियों और विकासात्मक मुद्दों के बारे में आप अगले अध्याय में पढ़ेंगे। 2.3 कृष्िा आपने पहले अध्याय में पढ़ा कि औपनिवेश्िाक शासन काल में कृष्िा क्षेत्राक में न तो संवृि हुइर् और न ही समता रह पाइर्। स्वतंत्रा भारत के नीति - निमार्ताओं को इन मुद्दों पर विचार करना पड़ा तथा उन्होंने भू - सुधारों तथा उच्च पैदावार वाली किस्म के बीजों के प्रयोग द्वारा भारतीय कृष्िा में एक क्रांति का संचार किया। भू - सुधारः स्वतंत्राता प्राप्ित के समय देश की भू - धारण प(ति में जमींदार - जागीरदार आदि का वचर्स्व था। ये खेतों में कोइर् सुधार किये बिना, मात्रा लगान की वसूली किया करते थे। भारतीय कृष्िा क्षेत्राक की निम्न उत्पादकता के कारण भारत को संयुक्त राज्य अमेरिका ;यू.एस.ए.द्ध से अनाज का आयात करना पड़ा। कृष्िा में समानता लाने के लिये भू - सुधारों की आवश्यकता हुइर्, जिसका मुख्य ध्येय जोतों के स्वामित्व में परिवतर्न करना था। स्वतंत्राता के एक वषर् बाद ही देश में बिचैलियों के उन्मूलन तथा वास्तविक कृषकों को ही भूमि का स्वामी बनाने जैसे कदम उठाये गयेे। इसका उद्देश्य यह था कि भूमि का स्वामित्व किसानों को निवेश करने की प्रेरणा देगा ;बाॅक्स 2.5द्ध, बशतर्े उन्हें पयार्प्त पूँजी उपलब्ध कराइर् जाए। दरअसल समानता को बढ़ाने के लिये भूमि की अिाकतम सीमा निधार्रण एक दूसरी नीति थी। इसका अथर् हरित क्रांति के बाद अब तुम्हारी पेशकश में कौन रुचि लेगा? है - किसी व्यक्ित की कृष्िा भूमि के स्वामित्व की अिाकतम सीमा का निधार्रण करना। इस नीति का उद्देश्य वुफछ लोगों में भू - स्वामित्व के संवेंफद्रण को कम करना था। बिचैलियों के उन्मूलन का नतीजा यह था कि लगभग 200 लाख काश्तकरों का सरकार से सीधा संपकर् हो गया तथा वे जमींदारों के द्वारा किये जा रहे शोषण से मुक्त हो गए। भू - स्वामित्व से उन्हें उत्पादन में वृि के लिए प्रोत्साहन मिला। इससे कृष्िा उत्पादन में वृि हुइर्। ¯कतु बिचैलियों के उन्मूलन कर समानता के लक्ष्य की पूणर् प्राप्ित नहीं हो पाइर्। कानून की कमियों का लाभ उठाकर वुफछ भूतपूवर् जमींदारों ने वुफछ क्षेत्रों में बहुत बड़े - बड़े भूखंडों पर अपना स्वामित्व बनाए रखा। वुफछ मामलों में काश्तकारों को बेदखल कर दिया गया और भू - स्वामियों ने अपने किसान भू - स्वामी ;वास्तविक कृषकद्ध होने का दावा किया। कृषकों को भूमि का स्वामित्व मिलने के बाद भी निधर्नतम कृष्िा श्रमिकों ;जैसे बटाइर्दार तथा भूमिहीन श्रमिकद्ध को भूमि - सुधारों से कोइर् लाभ नहीं हुआ। अिाकतम भूमि सीमा निधार्रण कानून में भी बाधाएँ आइर्ं। बड़े जमीदारों ने इस कानून को न्यायालयों में चुनौती दी, जिसके कारण इसे लागू करने में देर हुइर्। इस अविा में वे अपनी भूमि निकट संबंिायों आदि के नाम कराकर कानून से बच गये। कानून में भी अनेक कमियाँ थी, जिनके द्वारा बड़े जमीदारों ने भूमि पर अिाकार बनाए रखने के लिए लाभ उठाया। केरल और पश्िचम बंगाल की सरकारें वास्तविक किसान को भूमि देने की नीति के प्रति प्रतिब( थीं, इसी कारण इन प्रांतों में भू - सुधार कायर्क्रमों को विशेष सपफलता मिली। दुभार्ग्यवश, अन्य प्रांतों की सरकारों में इस स्तर की प्रतिब(ता नहीं थी, अतएव आज तक जोतों में भारी असमानता बनी हुइर् है। हरित क्रांतिः स्वतंत्राता के समय देश की 75 प्रतिशत जनसंख्या कृष्िा पर आश्रित थी। इस क्षेत्राक में उत्पादकता बहुत ही कम थी, क्योंकि पुरानी प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जाता था और अिासंख्य किसानों के पास आधारिक संरचना का भी नितांत अभाव था। भारत की कृष्िा मानसून पर निभर्र है। यदि मानसून स्तर कम होता था तो किसानों को कठिनाइर् होती थी, क्योंकि उन्हें सिंचाइर्ं सुविधाएँ उपलब्ध न थीं। यह सुविधा वुफछ ही किसानों के पास थीं। औपनिवेश्िाक काल का कृष्िा गतिरोध हरित क्रांति से स्थायी रूप से समाप्त हो गया। इसका तात्पयर् उच्च पैदावार वाली किस्मों के बीजों ;भ्ल्टद्ध के प्रयोग से है, विशेषकर गेहूँ तथा चावल उत्पादन में वृि से। इन बीजों के प्रयोग के लिए पयार्प्त मात्रा में उवर्रकों, कीटनाशकों तथा निश्िचत जल पूतिर् की भी आवश्यकता थी। इन आगतों का सही अनुपात में प्रयोग होना भी महत्त्वपूणर् है। बीजों की अिाक पैदावार वाली किस्मों से लाभ उठाने वाले किसानों को सिंचाइर् की विश्वसनीय सुविधाओं और उवर्रकों तथा कीटनाशकों आदि की खरीदारी के लिए वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता थी। अतः हरित क्रांति के पहले चरण में ;लगभग 1960 के दशक के मध्य से 1970 के दशक के मध्य तकद्ध भ्ल्ट बीजों का प्रयोग पंजाब, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु जैसे अिाक समृ( राज्यों तक ही सीमित रहा। इसके अतिरिक्त, भ्ल्ट बीजों का लाभ केवल गेहूँ पैदा करने वाले क्षेत्रों को ही मिल पाया। हरित क्रांति के द्वितीय चरण ;1970 के दशक के मध्य से 1980 के दशक के मध्य तकद्ध में भ्ल्ट बीजों की प्रौद्योगिकी का विस्तार कइर् राज्यों तक पहुँचा और कइर् पफसलों को लाभ हुआ। इस प्रकार, हरित क्रांति प्रौद्योगिकी के प्रसार से भारत को खाद्यान उत्पादन में आत्मनिभर्रता प्राप्त हुइर्। अब हम अपने राष्ट्र की खाद्य संबंधी आवश्यकताओं की पूतिर् के लिए अमेरिका या किसी अन्य देश की कृपा पर निभर्र नहीं थे। यदि किसान बाशार में बेचने की जगह इस उत्पादन का अिाकांश भाग स्वयं ही उपभोग करें, तो अिाक उत्पादन से अथर्व्यवस्था पर वुफल मिलाकर कोइर् पफकर् नहीं पड़ेगा। दूसरी ओर, यदि किसान पयार्प्त मात्रा में अपना उत्पादन बाशार में बेच सवेंफ, तो अिाक उत्पादन का निश्िचय ही अथर्व्यवस्था पर प्रभाव पड़ सकता है। किसानों द्वारा उत्पादन का बाशार में बेचा गया अंश ही ‘विपण्िात अिाशेष’ कहलाता है। हरित क्रांति काल में किसान अपने गेहूँ और चावल के अतिरिक्त उत्पादन का अच्छा खासा भाग बाशार में बेच रहे थे। इसके पफलस्वरूप खाद्यानों की कीमतों में, उपभोग की अन्य वस्तुओं की अपेक्षा, कमी आइर्। अपनी वुफल आय के बहुत बड़े प्रतिशत का भोजन पर खचर् करने वाले निम्न आय वगार्ें को कीमतों में इस सापेक्ष कमी से बहुत लाभ हुआ। हरित क्रांति के कारण सरकार पयार्प्त खाद्यान्न प्राप्त कर सुरक्ष्िात स्टाॅक बना सकी जिसे खाद्यान्नों की कमी के समय प्रयोग किया जा सकता था। यद्यपि हरित क्रांति से देश बहुत लाभांवित हुआ है पर यह प्रौद्योगिकी पूरी तरह निरापद नहीं है। एक जोख्िाम यह था कि इससे छोटे और बड़े किसानों के बीच असमानताएँ बढ़ने की संभावनाएँ थी, क्योंकि केवल बड़े किसान अपेक्ष्िात आगतों को खरीदने में सक्षम थे, जिससे उन्हें हरित क्रांति का अिाकांश लाभ प्राप्त हो जाता था। इसके अतिरिक्त, इन पफसलों में कीटनाशकों के आक्रमण की भी संभावनाएं अिाक होती हंै। ऐसी दशा में, इस प्रौद्योगिकी को अपनाने वाले छोटे किसानों की पफसल का सब वुफछ नष्ट हो जाता है। सौभाग्यवश, सरकार द्वारा किए गये वुफछ उपायों के कारण ये आशंकाएँ सत्य साबित नहीं हुईं। सरकार ने निम्न ब्याज दर पर छोटे किसानों को )ण दिये और उवर्रकों पर आथ्िार्क सहायता दी, ताकि छोटे किसानों को ये आवश्यक आगत उपलब्ध हो सवेंफ। छोटे किसानों को, इन आगतों के प्राप्ित से छोटे खेतों की उपज और उत्पादकता भी समय के साथ बड़े खेतों की पैदावार के बराबर हो गइर्। इस प्रकार, हरित क्रांति से छोटे - बड़े सभी किसानों को लाभ मिला। सरकार द्वारा स्थापित अनुसंधान संस्थानों की सेवाओं के कारण, छोटे किसानों के जोख्िाम भी कम हो गए, जो कीटनाशकों के आक्रमण से उनकी पफसलों की बबार्दी का कारण थे। यदि सरकार ने इस प्रौद्योगिकी का लाभ छोटे किसानों को उपलब्ध कराने के लिए व्यापक प्रयास नहीं किये होते, तो इस क्रांति का लाभ केवल धनी किसानों को ही मिलता। सहायिकी पर बहसः आजकल कृष्िा क्षेत्राक को दी जा रही आथ्िार्क सहायिकी का आथ्िार्क औचित्य एक गरमा - गरम बहस का मुद्दा बन गया है। इस बात से तो सभी सहमत हैं कि किसानों द्वारा और सामान्यतः छोटे किसानों द्वारा विशेष रूप से नइर् भ्ल्ट प्रौद्योगिकी को अपनाने के लिए प्रोत्साहन प्रदान करने हेतु सहायिकी दी जानी आवश्यक थी। किसान प्रायः किसी भी नइर् प्रौद्योगिकी को जोख्िाम पूणर् समझते हैं। अतः किसानों द्वारा नइर् प्रौद्योगिकी की परख के लिये सहायिकी आवश्यक थी। वुफछ अथर्शास्ित्रायों का मत है कि एक बार प्रौद्योगिकी का लाभ मिल जाने तथा उसके व्यापक प्रचलन के बाद सहायिकी धीरे - धीरे समाप्त कर देनी चाहिए, क्योंकि उनका उद्देश्य पूरा हो गया है। यही नहीं, यद्यपि सहायिकी का ध्येय तो किसानों को लाभ पहुँचाना है, ¯कतु उवर्रक - सहायिकी का लाभ बड़ी मात्रा में प्रायः उवर्रक उद्योग तथा अिाक समृ( क्षेत्रा के किसानों को ही पहुँचता है। अतः यह तकर् दिया जाता है कि उवर्रकों पर सहायिकी जारी रखने का कोइर् औचित्य नहीं है। इनसे लक्ष्िात समूह को लाभ नहीं होता और सरकारी कोष पर अनावश्यक भारी बोझ पड़ता है ;देखें बाॅक्स 2.6द्ध। दूसरी ओर वुफछ विशेषज्ञों का मत है कि सरकार को कृष्िा - सहायिकी जारी रखनी चाहिए, क्योंकि भारत में कृष्िा एक बहुत ही जोख्िाम भरा व्यवसाय है। अिाकांश किसान बहुत गरीब हैं और सहायिकी को समाप्त करने से वे अपेक्ष्िात आगतों का प्रयोग नहीं कर पाएँगे। सहायिकी समाप्त करने से गरीब और अमीर किसानों के बीच असमानता और बढ़ेगी तथा समता के लक्ष्य का उल्लंघन होगा। इन विशेषज्ञों का तकर् है कि यदि सहायिकी बाॅक्स 2.6 कीमतें - संकेतकों के रूप में आपने पिछली कक्षा में पढ़ा होगा कि बाशार में कीमतों का निधार्रण किस प्रकार होता है? यह समझना आवश्यक है कि कीमतें वस्तुओं की उपलब्धता का संकेतक हंै। यदि कोइर् वस्तु दुलर्भ हो जाती है तो इसकी कीमत बढ़ जाती है और कीमतों के आधार पर, उसके प्रयोग के संबंध में सही निणर्य लेने की इसके उपभोक्तओं को प्रेरणा मिलती है। यदि निम्न पूतिर् के कारण पानी की कीमत बढ़ जाती है तो लोग इसका उपयोग सावधानीपूवर्क करेंगेऋ उदाहरण के लिए, पानी संरक्षण के लिए वे बगीचे में पानी देना बंद कर सकते हैं। जब भी पेट्रोल की कीमतें बढ़ती हैं तो हम श्िाकायत करते है और सरकार पर दोषारोपण करते हैं। परंतु, पेट्रोल की कीमत में वृि इसकी अिाक कमी को दशार्ती है और कीमत वृि इस बात का संकेतक है कि पेट्रोल कम मात्रा में उपलब्ध है - यह पेट्रोल का कम उपयोग करने और वैकल्िपक इर्ंधनों की तलाश की पे्ररणा देता है। वुफछ अथर्शास्ित्रायों का कहना है कि सहायिकी, कीमतों को वस्तु की पूतिर् का संकेतक नहीं होने देती है। जब बिजली और पानी को सहायिकीयुत्तफ दरों पर या निःशुल्क प्रदान किया जाता है तो उनकी कमी का ध्यान रखे बिना, उनका पिफजूल उपयोग किया जाएगा। यदि पानी निःशुल्क प्रदान किया जाएगा तो किसान पानी प्रधान पफसलें उगाएँगे, भले ही उस क्षेत्रा में जल संसाधनों की कमी हो और इन पफसलों से दुलर्भ संसाधन भी कम हो जाएँगे। यदि पानी की कीमत दुलर्भता के अनुसार निधार्रित की जाए, तो किसान क्षेत्रा के अनुकूल उपयुक्त पफसलें उगाएँगे। उवर्रक कीटनाशकों पर सहायिकी संसाधनों का प्रयोग बढ़ाएगी, जो पयार्वरण के लिए हानिकारक हो सकता है। सहायिकी से पिफजूल उपयोग को बढ़ावा मिलता है। प्रेरणा की दृष्िट से सहायिकी पर विचार करें और स्वयं से यह पूछें कि क्या किसानों को निःशुल्क बिजली प्रदान करना आथ्िार्क दृष्िट से उचित है? से बड़े किसानों तथा उवर्रक उद्योग को अिाक लाभ हो रहा है, तो सही नीति सहायिकी समाप्त करना नहीं, बल्िक ऐसे कदम उठाना है जिनसे कि केवल निधर्न किसानों को ही इनका लाभ मिले। 1960 के दशक के अंत तक देश में कृष्िा उत्पादकता की वृि से भारत खाद्यान्नों में आत्मनिभर्र हो गया। यह निश्चय ही गौरवपूणर् उपलब्िध रही है। इसके बावजूद, नकारात्मक पहलू यह रहा है कि 1990 तक भी देश की 65 प्रतिशत जनसंख्या कृष्िा में लगी थी। अथर्शास्त्राी इस निष्कषर् पर पहुँचे है कि जैसे - जैसे देश संपन्न होता है, सकल घरेलू उत्पाद में, कृष्िा के योगदान में और उस पर निभर्र जनसंख्या में पयार्प्त कमी आती है। भारत में 1950 - 90 की अविा में यद्यपि जी.डी.पी. में कृष्िा के अंशदान में तो भारी कमी आइर् है, पर कृष्िा पर निभर्र जनसंख्या के अनुपात में नहीं ;जो 1950 में 67.50 प्रतिशत थी और 1990 तक घटकर 64.90 प्रतिशत ही हो पाइर्द्ध। इस क्षेत्राक में इतनी उत्पादन वृि तो न्यूनतम श्रम के प्रयोग द्वारा भी संभव थी, पिफर इस क्षेत्राक में इतनी बड़ी संख्या में लोगों के लगे रहने की क्या आवश्यकता थी? इसका उत्तर यही है कि इन्हें कीजिए ऽ एक छात्रा समूह को किसी कृष्िा पफामर् पर ले जाएँ और प्रयुक्त कृष्िा वििायों का अध्ययन करें, अथार्त बीजों की किस्में, उवर्रक, मशीनें, सिंचाइर् के साधन, संब( लागतें, विपणीय अिाशेष तथा अजिर्त आय तैयार करें। यदि वििायों में परिवतर्न की जानकारी कृषक परिवार के किसी बुजुगर् वृ( सदस्य से प्राप्त की जाएगी, तो अिाक अच्छा रहेगा। उसके बादः - ;कद्ध निष्कषार्ें पर अपनी कक्षा में चचार् करें। ;खद्ध विभ्िान्न उप - समूहों का एक चाटर् बनाएँ जिनमें उत्पादन लागत में परिवतर्न, उत्पादकता, बीज़ों के प्रयोग, उवर्रकों, सिचांइर् के साधनों, समय के प्रयोग, विपणीय अिाशेष और परिवार की आय में परिवतर्नों को दशार्या गया हो। ऽ विश्व बैंक, अंतरार्ष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन, ;ळदृ7ए ळ.8 और ळ.10 देशोंद्ध की बैठकों के बारे में समाचार पत्रों की कतरनें एकत्रा करें। कृष्िा सहायिकी पर विकसित और विकासशील देशों द्वारा व्यक्त विचारों पर चचार् करंे। ऽ इस तालिका में उपलब्ध जानकारी का प्रयोग कर भारत की अथर्व्यवस्था के व्यावसायिक ढाँचे का एक पाइर् - चाटर् बनाएँ। ऽ कृष्िा सहायिकी के पक्ष - विपक्ष में तको± का अध्ययन करें। आपका इस विषय में क्या मत है? क्षेत्राक 1950 - 51 1990 - 91 कृष्िा 70.1 66.8 उद्योग 10.7 12.7 सेवाएँ 17.2 20.5 ऽ वुफछ अथर्शास्ित्रायों का तवर्फ है कि अन्य देशों विशेषकर विकसित देशों के किसानों को अिाक सहायिकी देकर अपना उत्पादन अन्य देशों को नियार्त करने को प्रोत्साहित किया जाता है। क्या आप समझते हैं कि हमारे किसान उन देशों के किसानों से मुकाबला कर पाएँगे? चचार् करें। उद्योग क्षेत्राक और सेवा क्षेत्राक, कृष्िा क्षेत्राक में काम करने वाले लोगों को नहीं खपा पाए। अनेक अथर्शास्त्राी इसे 1950 - 90 के दौरान अपनाइर् गइर् नीतियों की विपफलता मानते हैं। 2.4 उद्योग और व्यापार अथर्शास्ित्रायों ने ऐसा पाया है कि निधर्न राष्ट्र तभी प्रगति कर पाते हैं जब उनमें अच्छे औद्योगिक क्षेत्राक होते हैं। उद्योग रोजगार उपलब्ध कराते हैं और यह कृष्िा में रोजगार की अपेक्षा अिाक स्थाइर् होते हैं। इनसे आधुनिकीकरण और समग्र समृि को बढ़ावा मिलता है। इन्हीं कारणों से हमारी पंचवषीर्य योजनाओं में औद्योगिक विकास पर अत्यिाक बल दिया गया है। आपने पिछले अध्याय में पढ़ा होगा कि स्वतंत्राता के समय भारत में बहुत कम उद्योग थे। अिाकांश उद्योग सूती वस्त्रा, पटसन आदि तक ही सीमित थे। जमशेदपुर और कोलकाता में लोहा व इस्पात की सुप्रबंिात पफमर्ें थीं। यदि अथर्व्यवस्था का विकास करना था, तो हमें ऐसे औद्योगिक आधार का विस्तार करने की आवश्यकता थी जिसमें विविध प्रकार के उद्योग हों। भारतीय औद्योगिक विकास में सावर्जनिक और निजी क्षेत्राकः हमारे नीति - निमार्ताओं के समक्ष एक बहुत बड़ा प्रश्न यह था कि औद्योगिक विकास में सरकार और निजी क्षेत्राक की क्या भूमिका होनी चाहिए? स्वतंत्राता प्राप्ित के समय भारत के उद्योगपतियों के पास हमारी अथर्व्यवस्था के विकास हेतु उद्योगों में निवेश करने के लिए अपेक्ष्िात पूँजी नहीं थी। स्वतंत्राता प्राप्ित के समय इतना बड़ा बाशार भी नहीं था, जिसमें उद्योगपतियों को मुख्य परियोजनाएँ शुरू करने के लिए प्रोत्साहन मिलता। यद्यपि उनके पास ऐसा करने के लिए पूँजी भी थी। इन्हीं कारणों से राज्य को औद्योगिक क्षेत्रा को प्रोत्साहन देने में व्यापक भूमिका निभानी पड़ी। इसके अतिरिक्त, भारतीय अथर्व्यवस्था को समाजवाद के पथ पर अग्रसर करने के लिए द्वितीय पंचवषीर्य योजना में यह निणर्य लिया गया कि सरकार अथर्व्यवस्था में बड़े तथा भारी उद्योगों का नियंत्राण करेगी। इसका अथर् यह था कि राज्य उन उद्योगों पर पूरा नियंत्राण रखेगा, जो अथर्व्यवस्था के लिए महत्वपूणर् थे। निजी क्षेत्राक की नीतियाँ सावर्जनिक क्षेत्राक की नीतियों की अनुपूरक होंगी और सावर्जनिक क्षेत्राक अग्रणी भूमिका निभायेगा। औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956ः भारी उद्योगों पर नियंत्राण रखने के राज्य के लक्ष्य के अनुसार औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956 को अंगीकार किया गया। इस प्रस्ताव को द्वितीय पंचवषीर्य योजना का आधार बनाया गया। द्वितीय योजना में ही समाज के समाजवादी स्वरूप का आधार तैयार करने का प्रयास किया गया। इस प्रस्ताव के अनुसार, उद्योगों को तीन वगो± में वगीर्कृत किया गया। प्रथम वगर् में वे उद्योग शामिल थे, जिन पर राज्य का अनन्य स्वामित्व था। दूसरे वगर् में वे उद्योग शामिल थे, जिनके लिए निजी क्षेत्राक, सरकारी क्षेत्राक के साथ मिल कर प्रयास कर सकते थे, परंतु जिनमें नइर् इकाइयों को शुरू करने की एकमात्रा जिम्मेदारी राज्य की होती। तीसरे वगर् में वे उद्योग शामिल थे, जो निजी क्षेत्राक के अंतगर्त आते थे। यद्यपि निजी क्षेत्राक में आने वाले उद्योगों का भी एक वगर् था, लेकिन इस क्षेत्राक को लाइसेंस प(ति के माध्यम से राज्य के नियंत्राण में रखा गया। नये उद्योगों को तब तक अनुमति नहीं दी जाती थी, जब तक सरकार से लाइसेंस नहीं प्राप्त कर लिया जाता था। इस नीति का प्रयोग पिछड़े क्षेत्रों में उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए किया गया। यदि उद्योग आथ्िार्क रूप से पिछड़े क्षेत्रों में लगाए गए, तो लाइसेंस प्राप्त करना आसान था। इसके अतिरिक्त, उन इकाइयों को वुफछ रियायतें जैसे, कर लाभ तथा कम प्रशुल्क पर बिजली दी गइर्। इस नीति का उद्देश्य क्षेत्राीय समानता को बढ़ावा देना था। वतर्मान उद्योग को भी उत्पादन बढ़ाने या विविध प्रकार के उत्पादन ;वस्तुओं की नइर् किस्मों का उत्पादनद्ध करने के लिए लाइसेंस प्राप्त करना होता था। इसका अथर् यह सुनिश्िचत करना था कि उत्पादित वस्तुओं की मात्रा अथर्व्यवस्था द्वारा अपेक्ष्िात मात्रा से अिाक न हो। उत्पादन बढ़ाने का लाइसेंस केवल तभी दिया जाता था, जब सरकार इस बात से आश्वस्त होती थी कि अथर्व्यवस्था में बड़ी मात्रा में वस्तुओं की आवश्यकता है। लघु उद्योगः 1955 में ग्राम तथा लघु उद्योग समिति, जिसे कवेर् समिति भी कहा जाता था, ने इस बात की संभावना पर विचार किया कि ग्राम विकास को प्रोत्साहित करने के लिए लघु उद्योगों का प्रयोग किया जाए। लघु उद्योग की परिभाषा किसी इकाइर् की परिसंपिायों के लिए दिये जाने वाले अिाकतम निवेश के संदभर् में दी जाती है। समय के साथ - साथ निवेश की सीमा भी बदलती रही है। 1950 में लघु औद्योगिक इकाइर् उसे कहा जाता था, जो पाँच लाख रु. का अिाकतम निवेश करती थीं। इस समय, एक करोड़ रु का अिाकतम निवेश किया जा सकता है। ऐसा माना जाता था कि लघु उद्योग अिाक श्रम - प्रधान होते हैं, अथार्त् उनमें बड़े पैमाने के उद्योगों की अपेक्षा श्रम का प्रयोग अिाक किया जाता है। अतः वे अिाक रोजगारों का सृजन करते हैं। लेकिन, ये बड़ी औद्योगिक पफमो± के साथ प्रतिस्पधार् नहीं कर सकते। यह स्पष्ट है कि लघु उद्योगांे के विकास के लिए बड़ी पफमो± से उनकी रक्षा किये जाने की आवश्यकता है। इस उद्देश्य के लिए, अनेक उत्पादों को लघु उद्योग के लिए आरक्ष्िात कर दिया गया। ऐसे आरक्षण की कसौटी यह थी कि ये इकाइयाँ उन वस्तुओं के विनिमार्ण के योग्य हैं। उन्हें अन्य रियायतें भी दी गइर् थीं जैसे, कम उत्पाद शुल्क तथा कम ब्याज दरों पर बैंक - )ण। 2.5 व्यापार नीतिऋ आयात प्रतिस्थापन हमारे द्वारा अपनाइर् गइर् औद्योगिक नीति व्यापार नीति से घनिष्ठ रूप से संब( थी। प्रथम सात पंचवषीर्य योजनाओं में व्यापार की विशेषता अंतमुर्खी व्यापार नीति थी। तकनीकी रूप से इस नीति को आयात - प्रतिस्थापन कहा जाता है। इस नीति का उद्देश्य आयात के बदले घरेलू उत्पादन द्वारा पूतिर् करना है। उदाहरण के लिए, विदेश में निमिर्त वाहनों का आयात करने के स्थान पर उन्हें भारत में ही निमिर्त करने के लिए उद्योगों को प्रोत्साहित किया जाय। इस नीति के अनुसार, सरकार ने विदेशी प्रतिस्पधार् से घरेलू उद्योगों की रक्षा की। आयात संरक्षण के दो प्रकार थेः प्रशुल्क और कोटा। प्रशुल्क, आयातित वस्तुओं पर लगाया गया कर है। प्रशुल्क लगाने पर आयातित वस्तुएँ अिाक महँगी हो जाती हैं, जो वस्तुओं के प्रयोग को हतोत्साहित करती हैं। कोटे में वस्तुओं की मात्रा निदिर्ष्ट की होती है, जिन्हें आयात किया जा सकता है। प्रशुल्क और कोटे का प्रभाव यह होता है कि उनसे आयात प्रतिबंिात हो जाते हैं और उनसे विदेशी प्रतिस्पधार् से देशी पफमो± की रक्षा होती है। संरक्षण की नीति इस धारणा पर आधारित है कि विकासशील देशों के उद्योग अिाक विकसित देशों द्वारा उत्पादित वस्तुओं से प्रतिस्पधार् करने की स्िथति में नहीं हैं। यह माना जाता है कि यदि घरेलू उद्योगों का संरक्षण किया जाता है, तो समय के साथ वे प्रतिस्पधार् करना भी सीख लेंगे। हमारे योजनाकारों को भी यह आशंका थी इन्हें कीजिए सकल घरेलू उत्पाद के लिए क्षेत्राकवार योगदान से संबंिात निम्नलिख्िात सारणी के लिए एक पाइर् चाटर् बनाइए और 1990 - 91 के दौरान विकास के प्रयासों को ध्यान में रखते हुए क्षेत्राकों के योगदान में हुए अंतर पर चचार् कीजिए। कक्षा के छात्रों को दो समूहों में विभाजित करते हुए सावर्जनिक क्षेत्राक के उपक्रमों की उपयोगिता के बारे में अपनी कक्षा में एक वाद - विवाद आयोजित कीजिए। एक समूह सावर्जनिक क्षेत्राकों के उपक्रमों के पक्ष में बोलेगा और दूसरा समूह इसके विपक्ष में बोलेगा ;यथासंभव इसमें अिाक - से - अिाक छात्रों को शामिल कीजिए और उन्हें उदाहरण देने के लिए प्रोत्साहित कीजिएद्ध। क्षेत्राक 1950 - 51 1990 - 91 कृष्िा 59.0 34.9 उद्योग 13.0 24.6 सेवाएँ 28.0 40.5 कि यदि आयातों पर प्रतिबंध लगाया जाता है तो विलासिता की वस्तुओं के आयात पर विदेशी - मुद्रा खचर् होने की संभावना बढ़ जायेगी। 1980 के दशक के मध्य तक नियार्त - संवधर्न पर कोइर् गंभीर विचार नहीं किया गया था। औद्योगिक विकास पर नीतियों का प्रभावः प्रथम सात पंचवषीर्य योजनाओं के दौरान भारत के औद्योगिक क्षेत्राक की उपलब्िधयाँ वस्तुतः उल्लेखनीय रही हैं। औद्योगिक क्षेत्राक द्वारा प्रदत्त जी.डी.पी. का अनुपात 1950 - 51 में 11.8 प्रतिशत से बढ़कर 1990 - 91 में 24.6 प्रतिशत हो गया। जी.डी.पी. से उद्योगों मंें हिस्सेदारी में बढ़ोतरी विकास का एक महत्वपूणर् सूचक है। इस अविा के दौरान औद्योगिक क्षेत्राक की 6 प्रतिशत वाष्िार्क संवृि दर प्रशंसनीय है। भारतीय उद्योग सूती वस्त्रा और पटसन तक ही सीमित नहीं थे। वस्तुतः औद्योगिक क्षेत्राक प्रायः सावर्जनिक क्षेत्राक के कारण विविधतापूणर् बन गया था। लघु उद्योगों के संवधर्न से उन लोगों को अवसर प्राप्त हुए जिनके पास व्यवसाय में प्रवेश करने के लिए बड़े पफमो± को प्रारंभ करने हेतु पूँजी नहीं थी। विदेशी प्रतिस्पधार् के प्रति संरक्षण से उन इलेक्ट्रोनिकी व आॅटोमोबाइल क्षेत्राकों में देशी उद्योगों का विकास हुआ, जिनका विकास अन्यथा संभव नहीं था। भारतीय अथर्व्यवस्था की संवृि में सावर्जनिक क्षेत्राक द्वारा किए गए योगदान के बावजूद वुफछ अथर्शास्ित्रायों ने सावर्जनिक क्षेत्राक के अनेक उद्यमों के निष्पादन की कड़ी आलोचना की है। इस अध्याय के प्रारंभ में यह प्रस्तावित किया गया था कि शुरू में सावर्जनिक क्षेत्राक की आवश्यकता अिाक थी। अब यह व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है कि सरकारी उद्यमों ने वुफछ वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन ;प्रायः उन पर एकािाकार रखते हुएद्ध जारी रखा, जिनकी कोइर् आवश्यकता नहीं थी। दूरसंचार सेवा का प्रावधान किया जाना दूसरा उदाहरण है। इस उद्योग को सावर्जनिक क्षेत्राक में आरक्षण प्रदान किया गया जबकि देखा गया कि निजी क्षेत्राक के पफमर् भी उपलब्ध् करा सकते हैं। 1990 के दशक के अंत तक भी प्रतिस्पधार् न होने के कारण व्यक्ित को टेलीपफोन कनेक्शन लेने में लंबे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। इसका दूसरा उदाहरण माॅडनर् ब्रेड की स्थापना है, जो ब्रेड विनिमार्ण करने वाली एक पफमर् है जैसे कि निजी क्षेत्राक ब्रेड का निमार्ण ही नहीं कर सकता था। 2001 में यह पफमर् निजी क्षेत्राक को बेच दी गइर्। मुख्य बात यह है कि भारतीय अथर्व्यवस्था को योजना विकसित करने के चार दशक बाद भी इन दोनों के बीच कोइर् अंतर नहीं किया गया कि ;कद्ध केवल सावर्जनिक क्षेत्राक क्या कर सकता है और ;खद्ध निजी क्षेत्राक भी क्या कर सकता है? उदाहरण के लिए, आज भी केवल सावर्जनिक क्षेत्राक ही राष्ट्रीय सुरक्षा प्रदान करता है। यद्यपि सावर्जनिक क्षेत्राक होटलों की भी व्यवस्था कर सकता है, तथापि सरकार होटल चलाती है। इस आधार पर वुफछ विद्वानों ने यह तकर् दिया है कि राज्य को उन क्षेत्रों से हट जाना चाहिए जिनमें निजी क्षेत्राक कायर् कर सकते हैं। सरकार ऐसी महत्वपूणर् सेवाओं पर संसाधनों का संवेंफद्रण कर सकती है, जिन्हें निजी क्षेत्राक उपलब्ध नहीं करा सकते। अनेक सावर्जनिक क्षेत्राक की पफमोर्ं ने भारी नुकसान उठाया था, लेकिन उन्होंने काम जारी रखा क्योंकि किसी सरकारी उपक्रम का बंद किया जाना कठिन है। भले ही इसके कारण राष्ट्र के सीमित संसाधनों का निकास होता रहे। इसका अथर् यह नहीं है कि निजी पफमोर्ं को सदैव लाभ होता ही हो ;वास्तव में वुफछ सावर्जनिक क्षेत्राक की पफमे± मूलतः निजी पफमे± थीं, जो हानि के कारण बंद होने को थीं।द्ध उसके बाद कामगारों की नौकरियों की संरक्षा के लिए उनका राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। बहरहाल, नुकसान उठाने वाली निजी पफमे±, अपने को बनाए रखने के लिए, संसाधनों का अपव्यय नहीं होने देंगी। किसी उद्योग को शुरू करने के लिए आवश्यक लाइसेंस का वुफछ औद्योगिक घरानों द्वारा दुरुपयोग किया गया। बड़े उद्योगपति नइर् पफमर् शुरू करने के लिए नहीं, बल्िक नए प्रतिस्पिार्यों को रोकने के लिए लाइसेंस प्राप्त कर लेते थ।ेपरमिट लाइसेंस राज के अत्यिाक नियमन के कारण वुफछ पफमे± कायर्वुफशल नहीं बन पाइर्ं। उद्योगपति अपने उत्पादन के विषय में विचार करने की अपेक्षा लाइसेंस प्राप्त करने की कोश्िाश में और संबंिात मंत्रालयों में लाॅबी बनाने में समय व्यतीत करते थे। विदेशी प्रतिस्पधार् से संरक्षण की आलोचना भी इस आधार पर की जा रही है कि यह उस स्िथति के बाद भी जारी रहा, जब यह सि( हो चुका था कि इससे लाभ के स्थान पर नुकसान अिाक होगा। आयातों पर प्रतिबंधों के कारण भारतीय उपभोक्ताओं को उन वस्तुओं को खरीदना पड़ता था, जिनका उत्पादन भारतीय उत्पादक करते थे। उत्पादक इस बात से अवगत थे कि उनके पास एक आब( बाशार है, अतः उन्हें अपनी वस्तुओं की गुणवत्ता सुधारने हेतु कोइर् प्रेरणा नहीं थी। जब वे घटिया वस्तुओं को ऊँची कीमतों पर बेच सकते थे, तब वे उनकी गुणवत्ता में सुधार करने की क्यों सोचते! आयातों की प्रतिस्पधार् ने हमारे उत्पादकों को और अिाक दक्ष बनने को बाध्य किया। वुफछ अथर्शास्ित्रायों का भी मत है कि सावर्जनिक क्षेत्राक का प्रयोजन लाभ कमाना नहीं हैै, बल्िक राष्ट्र के कल्याण को बढ़ावा देना है। इस दृष्िट से सावर्जनिक क्षेत्राक की पफमोंर् का मूल्यांकन जनता के कल्याण के आधार पर किया जाना चाहिए। उनका मूल्यांकन उनके द्वारा कमाये गये लाभो के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। संरक्षण के संबंध में वुफछ अथर्शास्ित्रायों का यह मत है कि हमें विदेशी प्रतिस्पधार् से उत्पादनों का संरक्षण तब तक करना चाहिए, जब तक धनी राष्ट्र ऐसा करते रहें। इन सभी विरोधों के कारण अथर्शास्ित्रायों ने हमारी नीति में परिवतर्न करने का आग्रह किया। अन्य समस्याओं सहित इस समस्या के कारण सरकार ने 1991 में नइर् आथ्िार्क नीति प्रारंभ की। 2.6 निष्कषर् प्रथम सात पंचवषीर्य योजनाओं के दौरान भारतीय अथर्व्यवस्था की प्रगति उल्लेखनीय रही। हमारे उद्योग स्वतंत्राता प्राप्ित के समय की स्िथति की तुलना में विविधतापूणर् हो गये। हरित क्रांति के परिणामस्वरूप भारत खाद्य उत्पादन में आत्मनिभर्र बन गया। भूमि सुधारों का परिणाम यह हुआ कि घृण्िात जमींदारी प्रथा का उन्मूलन हो गया, लेकिन अनेक अथर्शास्त्राी सावर्जनिक क्षेत्राक के उद्यमों के निष्पादन से असंतुष्ट थे। अतिशय सरकारी नियमन के कारण उद्यमवृिा अवरु( हो गइर्। आत्मनिभर्रता के नाम पर हमारे उत्पादकों का संरक्षण विदेशी प्रतिस्पधार् से किया गया और इससे उन्हें, उनके द्वारा उत्पादित वस्तुओं की गुणवत्ता में सुधार करने की प्रेरणा नहीं मिली। हमारी नीतियाँ अंतमुर्खी थीं, अतः हम एक सशक्त नियार्त क्षेत्राक विकसित करने में विपफल रहे। बदलते हुए वैश्िवक आथ्िार्क परिदृश्य के प्रसंग में यह सवर्त्रा महसूस किया जा रहा था कि आथ्िार्क नीति में सुधार करने की आवश्यकता है। हमारी अथर्व्यवस्था को और अिाक सपफल बनाने के लिए 1991 में एक नइर् आथ्िार्क नीति शुरू की गइर्। इस विषय पर अगले अध्याय में चचार् की जायेगी। पुनरावतर्न ऽ स्वतंत्राता प्राप्ित के बाद भारत ने एक आथ्िार्क प(ति की कल्पना की, जिसमें समाजवाद और पूँजीवाद की विशेषताएँ सम्िमलित थीं। इसकी परिणति मिश्रित अथर्व्यवस्था माॅडल के रूप में हुइर्। ऽ सभी आथ्िार्क योजनाएँ पंचवषीर्य योजनाओं के माध्यम से ही निमिर्त की गइर् हैं। ऽ पंचवषीर्य योजनाओं के लक्ष्य हैं - संवृि, आधुनिकीकरण, आत्मनिभर्रता और समानता। ऽ कृष्िा क्षेत्राक में मुख्य नीतिगत पहल थे - भूमि सुधार तथा हरित क्रांति। ऽ इन पहलों से भारत को खाद्यान्नों के उत्पादन में आत्मनिभर्र बनने में सहायता मिली। ऽ कृष्िा पर निभर्र रहने वाले लोगों का अनुपात कम नहीं हुआ, जैसी कि आशा थी। ऽ औद्योगिक क्षेत्रों में नीतिगत पहलों ने सकल घरेलू उत्पाद के लिए इसके योगदान में वृि की। ऽ औद्योगिक क्षेत्राक में एक बड़ी कमी यह थी की सावर्जनिक क्षेत्राक की कायर् प(ति वुफशल नहीं थी क्योंकि यह घाटे की ओर उन्मुख थी, जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्र के सीमित संसाधनों का बहिगर्मन और नुकसान हुआ। अभ्यास 1 योजना की परिभाषा दीजिए। 2 भारत ने योजना को क्यों चुना? 3 योजनाओं के लक्ष्य क्या होने चाहिए? 4 उच्च पैदावारवाली किस्म ;भ्ल्टद्धबीज क्या होते हैं? 5 विक्रय अिाशेष क्या है? 6 कृष्िा क्षेत्राक में लागू किये गये भूमि सुधार की आवश्यकता और उनके प्रकारों की व्याख्या कीजिए। 7 हरित क्रांति क्या है? इसे क्यों लागू किया गया और इससे किसानों को कैसे लाभ पहुँचा? संक्षेप में व्याख्या कीजिए। 8 योजना उद्देश्य के रूप में ‘समानता के साथ संवृि’ की व्याख्या कीजिए। 9.‘क्या रोजगार सृजन की दृष्िट से योजना उद्देश्य के रूप में आधुनिकीकरण विरोधाभास पैदा करता है?’ व्याख्या कीजिए। 10.भारत जैसे विकासशील देश के रूप में आत्मनिभर्रता का पालन करना क्यों आवश्यक था? 11.किसी अथर्व्यवस्था का क्षेत्राक गठन क्या होता है? क्या यह आवश्यक है कि अथर्व्यवस्था के जी.डी.पी. में सेवा क्षेत्राक को सबसे अिाक योगदान करना चाहिए? टिप्पणी करें। 12.योजना अविा के दौरान औद्योगिक विकास में सावर्जनिक क्षेत्राक को ही अग्रणी भूमिका क्यों सौंपी गइर् थी? 13.इस कथन की व्याख्या करेंः ‘हरित क्रांति ने सरकार को खाद्यान्नों के प्रापण द्वारा विशाल सुरक्ष्िात भंडार बनाने के योग्य बनाया, ताकि वह कमी के समय उसका उपयोग कर सके’। 14.सहायिकी किसानों को नइर् प्रौद्योगिकी का प्रयोग करने को प्रोत्साहित तो करती है पर उसका सरकारी वित्त पर भारी बोझ पड़ता है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर सहायिकी की उपयोगिता पर चचार् करें। 15.हरित क्रांति के बाद भी 1990 तक हमारी 65 प्रतिशत जनसंख्या कृष्िा क्षेत्राक में ही क्यों लगी रही? 16.यद्यपि उद्योगों के लिए सावर्जनिक क्षेत्राक बहुत आवश्यक रहा है, पर सावर्जनिक क्षेत्रा के अनेक उपक्रम ऐसे हैं जो भारी हानि उठा रहे हैं और इस क्षेत्राक के अथर्व्यवस्था के संसाधनों की बबार्दी के साधन बने हुए हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सावर्जनिक क्षेत्राक के उपक्रमों की उपयोगिता पर चचार् करें। 17.आयात प्रतिस्थापन किस प्रकार घरेलू उद्योगों को संरक्षण प्रदान करता है? 18.औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956 में निजी क्षेत्राक का नियमन क्यों और कैसे किया गया था? 19.निम्नलिख्िात युग्मों को सुमेलित कीजिए। नइर् दिल्ली। 1.प्रधानमंत्राी 2.सकल घरेलू उत्पाद 3.कोटा 4.भूमि - सुधार 5.उच्च उत्पादकता वाले बीज 6.सहायिकी ;कद्ध अिाक अनुपात में उत्पादन देने वाले बीज ;खद्ध आयात की जा सकने वाली मात्रा ;गद्ध योजना आयोग के अध्यक्ष ;घद्ध किसी अथर्व्यवस्था में एक वषर् में उत्पादित की गइर् सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मौदि्रक मूल्य। ;ड.द्ध कृष्िा क्षेत्रा की उत्पादकता वृि के लिए किए गए सुधार। ;चद्ध उत्पादक कायार्ें के लिए सरकार द्वारा दी गइर् मौदि्रक सहायता। डांडेकर वी.एम. 2004.ः पफोटीर् इर्यसर् आपफटर इंडिपेंडेंस, बिमल जालान ;संद्ध इंडियन इकाॅनोमीः प्रोबलम्स एंड प्रोस्पेक्ट्स, पेंगुइन, नइर् दिल्ली। जोशी, विजय, एंड आइर्, एम.डी.टिप्ल 1996.इंडियाज इकानाॅमिक रिपफोम्सर्, 1991 - 2001. ए आॅक्सपफोडर् यूनीवसिर्टी प्रेस, नइर् दिल्ली। मोहन, राकेश 2004.इंडस्ट्रीयल पाॅलिसी एंड कंट्रोल्स, देखें बिमल जालान ;संद्ध इंडियन इकाॅनोमीः प्रोबलम्स एंड प्रोस्पेक्ट्स, पेंगुइन, नइर् दिल्ली। राव, सी.एच.हनुमंथा 2004. एग्रीकल्चरः पाॅलिसी एंड पपफोर्मेंस, इन बिमल जालन ;संद्ध, द इंडियन इकोनाॅमीः प्रोब्लम एंड प्रोस्पेक्ट. पेंगुइन, दिल्ली।

RELOAD if chapter isn't visible.