इकाइर् एक विकास नीतियाँ और अनुभव ;1947 - 90द्ध इस इकाइर् के दो अध्यायों के द्वारा हम स्वतंत्राता पूवर् से लेकर नियोजित विकास के चार दशकों तक के भारत द्वारा चुने गये पथ का समग्र रूप से अवलोकन करेंगे। तात्पयर् यह है कि भारत सरकार ने इसके लिए जो कठोर उपाय किये - जैसे - योजना आयोग का निमार्ण तथा पंचवषीर्य योजनाओं की घोषणा आदि का अध्ययन। पंचवषीर्य योजनाओं के समग्र अवलोकन तथा नियोजित विकास की विशेषताओं तथा परिसीमाओं के मूल्यांकन का अध्ययन इस इकाइर् में किया गया है। भारत हमारे साम्राज्य की धुरी है। यदि हमारे साम्राज्य का कोइर् राज्य अलग हो जाता है तो हम जीवित रह सकते हैं, यदि हम भारत को खो देते हैं तो हमारे साम्राज्य का सूयर् अस्त हो जायेगा। - विक्टर एलेक्जेंडर वू्रस, 1894 में बि्रटिश इंडिया के वायसराय 1.1 परिचय ‘भारत का आथ्िार्क विकास’ विषयक इस पुस्तक का मूल उद्देश्य आपको भारतीय अथर्व्यवस्था की मूलभूत विशेषताओं की जानकारी देना और स्वतंत्राता प्राप्ित के बाद से हुए विकास से अवगत कराना है। यद्यपि, देश की वतर्मान अवस्था तथा भविष्य की संभावनाओं की चचार् करते समय उसके आथ्िार्क अतीत पर ध्यान देना भी उतना ही महत्त्वपूणर् होगा, इसलिए हम अपनी चचार् का आरंभ स्वतंत्राता से पूवर् देश की अथर्व्यवस्था की स्िथति से कर रहे हैं। इसी क्रम में हम उन सब बातों की भी स्पष्ट पहचान करेंगे, जिन्होंने स्वतंत्रा भारत के विकास की रणनीतियों का निधार्रण करने में महत्त्वपूणर् योगदान दिया है। भारतीय अथर्व्यवस्था की वतर्मान संरचना कोइर् आज की नहीं है। इसके मूल सूत्रा तो इतिहास में बहुत गहरे हैं, विशेष रूप से उस अविा में जब भारत 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्राता प्राप्ित के पूवर् दौ सौ वषार्ें तक बि्रटिश शासन के अधीन था। भारत में बि्रटिश औपनिवेश्िाक शासन का मुख्य उद्देश्य इंग्लैंड में तेशी से विकसित हो रहे औद्योगिक आधार के लिए भारतीय अथर्व्यवस्था को केवल एक कच्चा माल प्रदायक तक ही सीमित रखना था। उस शासन की अधीनता के शोषक स्वरूप को समझे बिना स्वतंत्राता के बाद के पिछले छह दशकों में, भारत में हुए विकास का सही मूल्यांकन कर पाना संभव नहीं। 1.2 औपनिवेश्िाक शासन के अंतगर्त निम्न - स्तरीय आथ्िार्क विकास अंग्रेशी शासन की स्थापना से पूवर् भारत की अपनी स्वतंत्रा अथर्व्यवस्था थी। यद्यपि जनसामान्य की आजीविका और सरकार की आय का मुख्य स्रोत कृष्िा था, पिफर भी देश की अथर्व्यवस्था में विभ्िान्न प्रकार की विनिमार्ण गतिवििायाँ हो रही थीं। सूती व रेशमी वस्त्रों, धातु आधारित तथा बहुमूल्य मण्िा - रत्न आदि से जुड़ी श्िाल्पकलाओं के उत्कृष्ट वेंफद्र के रूप में भारत विश्व भर में सुविख्यात हो चुका था। भारत में बनी इन चीशों की विश्व के बाशारों में बाॅक्स 1.1 बंगाल का सूती उद्योग मलमल एक विशेष प्रकार का सूती कपड़ा है। इसका मूल निमार्ण क्षेत्रा बंगाल, विशेषकर ढाका के आस - पास का क्षेत्रा रहा है ;यह नगर अब बांग्लादेश की राजधानी हैद्ध। ढाका के मलमल ने उत्कृष्ट कोटि के सूती वस्त्रा के रूप में विश्व भर में बहुत ख्याति अजिर्त की थी। यह बहुत ही महीन कपड़ा होता था। विदेशी यात्राी इसे शाही मलमल या मलमल ख़ास भी कहते थे। इसका आशय यही था कि वे इस कपडे़ को शाही परिवारों के उपयोग के योग्य मानते थे। अच्छी सामग्री के प्रयोग तथा उच्च स्तर की कलात्मकता के आधार पर बड़ी प्रतिष्ठा थी। औपनिवेश्िाक शासकों द्वारा रची गइर् आथ्िार्क नीतियों का ध्येय भारत का आथ्िार्क विकास नहीं बल्िक अपने मूल देश के आथ्िार्क हितों का संरक्षण और संवधर्न ही था। इन नीतियों ने भारत की अथर्व्यवस्था के स्वरूप के मूल रूप को बदल डाला। भारत, इंग्लैंड को कच्चे माल की पूतिर् करने तथा वहाँ के बने तैयार माल का आयात करने वाला देश बन कर रह गया। स्वाभाविक ही था कि औपनिवेश्िाक शासकों ने कभी इस देश की राष्ट्रीय तथा प्रतिव्यक्ित आय का आकलन करने का भी इर्मानदारी से कोइर् प्रयास नहीं किया। वुफछ लोगों ने निजी स्तर पर आकलन किए, पर उनके अनुमानों में बहुत विसंगतियाँ और आपसी मतभेद भी रहे हैं। इन आकलनकत्तार्ओं में दादा भाइर् नौरोजी, विलियम डिग्बी, ¯पफडले श्िाराज, डाॅ.वी.के.आर.वी.राव तथा आर.सी. देसाइर् प्रमुख रहे हैं। औपनिवेश्िाक काल के दौरान डाॅ. राव द्वारा लगाए गए अनुमान बहुत महत्त्वपूणर् माने जाते हैं। पिफर भी, सभी अध्ययनकत्तार् एक बात पर सहमत रहे हैं कि 20वीं शताब्दी के पूवार्(र् में भारत की राष्ट्रीय आय की वाष्िार्क संवृि दर 2 प्रतिशत से कम ही रही है तथा प्रतिव्यक्ित उत्पाद वृि दर तो मात्रा आधा प्रतिशत ही रह गइर्। 1.3 कृष्िा क्षेत्राक बि्रटिश औपनिवेश्िाक शासन के अंतगर्त भारत मूलतः एक कृष्िा अथर्व्यवस्था ही बना रहा। देश की लगभग 85 प्रतिशत जनसंख्या, जो गाँवों में बसी थी, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृष्िा के माध्यम से ही अपनी रोजी - रोटी कमा रही थी। एक बड़ी जनसंख्या का व्यवसाय होने के बाद भी कृष्िा क्षेत्राक में गतिहीन विकास की प्रिया चलती ही रही - यही नहीं अनेक अवसरों पर उसमें अप्रत्याश्िात ”ास या गिरावट भी अनुभव की गइर्। भले ही कृष्िा अधीन क्षेत्रा के प्रसार के कारण वुफल कृष्िा उत्पादन में वृि हुइर् हो, किंतु कृष्िा उत्पादकता में कमी आती रही। कृष्िा क्षेत्राक की गतिहीनता का मुख्य कारण औपनिवेश्िाक शासन द्वारा लागू की गइर् भू - व्यवस्था प्रणालियों को ही माना जा सकता है। आज के समस्त पूवीर् भारत में, जो उस समय बंगाल पे्रसीडेंसी कहा जाता था, लागू की गइर् जमींदारी व्यवस्था में तो कृष्िा कायो± से होने वाले समस्त लाभ को जमींदार ही हड़प जाते थे, इन्हें कीजिए किसानों के पास वुफछ नहीं बच पाता था। यही नहीं, अिाकांश जमींदारों तथा सभी औपनिवेश्िाक शासकों ने कृष्िा क्षेत्राक की दशा को सुधारने के लिए वुफछ नहीं किया। जमींदारों की रुचि तो किसानों की आथ्िार्क दुदर्शा की अनदेखी कर, उनसे अिाक से अिाक लगान संग्रह करने तक सीमित रहती थी। इसी कारण, कृषक वगर् को नितांत दुदर्शा और सामाजिक तनावों को झेलने को बाध्य होना पड़ा। राजस्व व्यवस्था की शतार्ें का भी जमींदारों के इस व्यवहार के विकास में बहुत योगदान रहा है। राजस्व की निश्िचत राश्िा सरकार के कोष में जमा कराने की तिथ्िायाँ पूवर् निधार्रित थीं - उनके अनुसार रकम जमा नहीं करा पाने वाले जमींदारों से उनके अिाकार छीन लिए जाते थे। साथ ही, प्रौद्योगिकी के निम्न स्तर, सिंचाइर् सुविधाओं के अभाव और ऽ स्वतंत्रा भारत के मानचित्रा की, अंग्रेशी शासन के भारत के मानचित्रा से तुलना कर पता लगाइए कि देश का कौन - सा क्षेत्रा पाकिस्तान का हिस्सा बन गया? यह क्षेत्रा आथ्िार्क दृष्िट से भारत के लिए क्यों महत्त्वपूणर् था? ;इस संदभर् में डॅा. राजेंद्र प्रसाद की पुस्तक ‘इंडिया डिवाइडेड’ का अध्ययन उपयोगी होगाद्ध। ऽ अंग्रेशों ने भारत में किस प्रकार की राजस्व व्यवस्था लागू की? देश के किस क्षेत्रा में कौन - सी राजस्व व्यवस्थाएँ लागू की गइर्ं और वहाँउसके क्या प्रभाव रहे? आपको उन राजस्व व्यवस्थाओं की आज के भारत में कृष्िा परिदृश्य पर क्या छाप दिखाइर् देती है? इन प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए आप रमेशचंद्र दत्त की दो खंडों में प्रकाश्िात पुस्तक ‘इकनाॅमिक हिस्ट्री आॅपफ इंडिया’ का सहारा ले सकते हैं। बी.एच. बेडेन पावेल की पुस्तकः ‘द लैंड सिस्टम आॅपफ बि्रटिश इंडिया’ भी उपयोगी रहेगी। इसके भी दो खंड हैं। इस विषय को अिाक अच्छी तरह से समझने के लिए आप बि्रटिश भारत का एक कृष्िा - मानचित्रा बनाने का प्रयास करें। अपने विद्यालय में लगे कंप्यूटर का भी आप इस कायर् में प्रयोग कर सकते हैं। स्मरण रख्िाए, किसी भी विषय को भली प्रकार समझने - समझाने में मानचित्रा का अंकन बहुत ही उपयोगी सि( होता है। उवर्रकों का नगण्य प्रयोग भी कृष्िा उत्पादकता के स्तर को बहुत निम्न रखने के लिए उत्तरदायी था। किसानों की दुदर्शा को और बढ़ाने में इसका भी बड़ा योगदान रहा है। देश के वुफछ क्षेत्रों में कृष्िा के व्यावसायीकरण के कारण नकदी - पफसलों की उच्च उत्पादकता के प्रमाण भी मिलते हैं। ¯कतु, उस उच्च उत्पादकता के लाभ भारतीय किसानों को नहीं मिल पाते थे। क्योंकि, उन्हें तो खाद्यान्न की खेती के स्थान पर नकदी पफसलों का उत्पादन करना पड़ता था, जिनका प्रयोग अंततः इंग्लैंड में लगे कारखानों में किया जाता था। सिंचाइर् व्यवस्था में वुफछ सुधर के बावजूद भारत बाढ़ नियंत्राण एवं भूमि की उपजाऊ शक्ित के मामले में पिछड़ा हुआ था। जबकि किसानों के एक छोटे से वगर् ने अपने पफसल पैटनर् को परिवतिर्त कर खाद्यान्न पफसलों की जगह वाण्िाज्ियक पफसलें उगाना आरंभ किया। काश्तकारों के एक बड़े वगर् तथा छोटे किसानों के पास वृफष्िा क्षेत्रा में निवेश करने के लिए न ही संसाध्न थे न तकनीक थी और न ही कोइर् प्रेरणा। 1.4 औद्योगिक क्षेत्राक कृष्िा की ही भाँति औपनिवेश्िाक व्यवस्था के अंतगर्त भारत एक सुदृढ़ औद्योगिक आधार का विकास भी नहीें कर पाया। देश की विश्व प्रसि( श्िाल्पकलाओं का पतन हो रहा था, ¯कतु उस प्रतिष्िठत परंपरा का स्थान ले सकने वाले किसी आधुनिक औद्योगिक आधार की रचना नहीं होने दी गइर्। भारत के इस वि - औद्योगीकरण के पीछे विदेशी शासकों का दोहरा उद्देश्य था। एक तो वे भारत को इंग्लैंड में विकसित हो रहे आधुनिक उद्योगों के लिए कच्चे माल का नियार्तक बनाना चाहते थे। दूसरे, वे उन उद्योगों के उत्पादन के लिए भारत को ही एक विशाल बाशार भी बनाना चाहते थे। इस प्रकार, उन उद्योगों के प्रसार के सहारे वे अपने देश ;बि्रटेनद्ध के लिए अिाकतम लाभ सुनिश्िचत करना चाहते थे। ऐसे आथ्िार्क परिदृश्य में भारतीय श्िाल्पकलाओं के पतन से जहाँ एक ओर भारी स्तर पर बेरोजगारी पैफल रही थी, वहीं स्थानीय उत्पाद से वंचित भारतीय बाशारों में माँग का भी प्रसार हो रहा था। इस माँग को इंग्लैंड से सस्ते निमिर्त उत्पादों के लाभपूणर् आयात द्वारा पूरा किया गया। यद्यपि उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरा(र् में भारत में वुफछ आधुनिक उद्योगों की स्थापना होने लगी थी, विंफतु उनकी उन्नति बहुत धीमी ही रही। प्रारंभ में तो यह विकास केवल सूती वस्त्रा और पटसन उद्योगों को आरंभ करने तक ही सीमित था। सूती कपड़ा मिलें प्रायः भारतीय उद्यमियों द्वारा ही लगाइर् गइर् थीं और ये देश के पश्िचमी क्षेत्रों ;आज के महाराष्ट्र और गुजरातद्ध में ही अवस्िथत थीं। पटसन उद्योग की स्थापना का श्रेय विदेश्िायों को दिया जा सकता है। यह उद्योग केवल बंगाल प्रांत तक ही सीमित रहा। बीसवीं शताब्दी के आरंभ्िाक वषोर्ं में लोहा और इस्पात उद्योग का विकास प्रारंभ हुआ। टाटा आयरन स्टील कंपनी ;ज्प्ैब्व्द्ध की स्थापना 1907 में हुइर्। दूसरे विश्व यु( के बाद चीनी, सीमेंट, कागश आदि के वुफछ कारखाने भी स्थापित हुए। ¯कतु, भारत में भावी औद्योगीकरण को प्रोत्साहित करने हेतु पूँजीगत उद्योगों का प्रायः अभाव ही बना रहा। पंूँजीगत उद्योग वे उद्योग होते हैं जो तत्कालिक उपभोग में काम आने वाली वस्तुओं के उत्पादन के लिए मशीनों और कलपुजोर्ं का निमार्ण करते हैं। यत्रा - तत्रा वुफछ कारखानों की स्थापना से देश की पारंपरिक श्िाल्प कला आधारित निमार्णशालाओं के पतन की भरपाइर् नहीं हो पाइर्ं। यही नहीं, नव औद्यागिक क्षेत्राक की संवृि दर बहुत ही कम थी और सकल घरेलूू ;देशीयद्ध उत्पाद में इसका योगदान भी बहुत कम रहा। इस नए उत्पादन क्षेत्राक की एक अन्य महत्त्वपूणर् कमी यह थी कि इसमें सावर्जनिक क्षेत्राक का कायर्क्षेत्रा भी बहुत कम रहा। वास्तव में, ये क्षेत्राक प्रायः रेलों, विद्युत उत्पादन, संचार, बंदरगाहों और वुफछ विभागीय उपक्रमों तक ही सीमित थे। 1.5 विदेशी व्यापार प्राचीन समय से ही भारत एक महत्त्वपूणर् व्यापारिक देश रहा है, ¯कतु औपनिवेश्िाक सरकार द्वारा अपनाइर् गइर् वस्तु उत्पादन, व्यापार और सीमा शुल्क की प्रतिबंधकारी नीतियों का भारत के विदेशी व्यापार की संरचना, स्वरूप और आकार पर बहुत प्रतिवूफल प्रभाव पड़ा। परिणामस्वरूप भारत कच्चे उत्पाद जैसे रेशम, कपास, ऊन, चीनी, नील और पटसन आदि का नियार्तक होकर रह गया। साथ ही यह सूती, रेशमी, ऊनी वस्त्रों जैसी अंतिम उपभोक्ता वस्तुओं और इंग्लैंड के कारखानों में बनी हल्की मशीनों आदि का आयातक भी हो गया। व्यावहारिक रूप से इंग्लैंड ने भारत के आयात - नियार्त व्यापार पर अपना एकािाकार जमाए रखा। भारत का आधे से अिाक व्यापार तो केवल इंग्लैंड तक सीमित रहा। शेष वुफछ व्यापार चीन, श्रीलंका और इर्रान से भी होने दिया जाता था। स्वेज नहर का व्यापार मागर् खुलने से तो भारत के व्यापार पर अंग्रेशी नियंत्राण और भी सख्त हो गया ;देखंें बाॅक्स 1.3द्ध। विदेशी शासन के अंतगर्त भारतीय आयात - नियार्त की सबसे बड़ी विशेषता नियार्त अिाशेष का बड़ा आकार रहा। ¯कतु, इस अिाशेष की भारतीय अथर्व्यवस्था को बहुत भारी लागत चुकानी पड़ी। देश के आंतरिक बाशारों में अनाज, कपड़ा और मिट्टðी का तेल जैसी अनेक आवश्यक वस्तुएँ मुश्िकल से उपलब्ध् हो पाती थीं। यही नहीं, इस नियार्त अिाशेष का देश में सोने और चाँदी के प्रवाह पर भी कोइर् प्रभाव नहीं पड़ा। वास्तव में, इसका प्रयोग तो अंग्रेजों की भारत पर शासन करने के लिए गढ़ी गइर् व्यवस्था का खचर् उठाने में ही हो जाता था। अंग्रेशी सरकार के यु(ों पर व्यय तथा अदृश्य मदों के आयात पर व्यय के द्वारा भारत की संपदा का दोहन हुआ। 1.6 जनांकिकीय परिस्िथति बि्रटिश भारत की जनसंख्या के विस्तृत ब्यौरे सबसे पहले 1881 की जनगणना के तहत एकत्रिात किए गए। यद्यपि इसकी वुफछ सीमाएँ थीं, पिफर भी इसमें भारत की जनसंख्या संवृि की विषमता बहुत स्पष्ट थी। बाद में, प्रत्येक दस वषर् बाद जनगणना होती रही। वषर् 1921 के पूवर् का भारत जनांकिकीय संक्रमण के प्रथम सोपान में था। द्वितीय सोपान का आरंभ 1921 के बाद माना जाता है। ¯कतु, उस समय तक न तो भारत की जनसंख्या बहुत विशाल थी और न ही उसकी संवृि दर बहुत अिाक थी। चित्रा 1.2 स्वेज नहरः भारत और इंग्लैंड के बीच राजमागर् के रूप में प्रयुक्त स्वेज नहर बाॅक्स 1.3 स्वेज नहर के माध्यम से व्यापार स्वेज नहर उत्तर - पूवीर् मिस्र में स्वेज स्थल - संिा के आर - पार उत्तर से दक्ष्िाण की ओर प्रवाहित होने वाला कृत्रिाम जलमागर् है। यह भूमध्य सागर की मिस्र पत्तन पोटर् सइर्द को लाल सागर की एक प्रशाखा स्वेज की खाड़ी से जोड़ता है। इस नहर से अमेरिका और यूरोप से आने वाले जलयानों को दक्ष्िाण एश्िाया, पूवीर् अप्रफीका तथा प्रशांत महासागर तटवतीर् देशों के लिए एक छोटा और सीधा जलमागर् सुलभ हो गया है। अब उन्हें अप्रफीका के दक्ष्िाणी छोर की परिक्रमा नहीं करनी पड़ती। स्वेज नहर आज आथ्िार्क और सामरिक दृष्िट से विश्व का सबसे महत्त्वपूणर् जलमागर् है। वषर् 1869 में इसके खुल जाने से परिवहन लागतें बहुत कम हो गईं और भारतीय बाशार तक पहुँचना सुगम हो गया। सामाजिक विकास के विभ्िान्न सूचक भी बहुत उत्साहवधर्क नहीं थे। वुफल मिलाकर साक्षरता दर तो 16 प्रतिशत से भी कम ही थी। इसमें महिला साक्षरता दर नगण्य, केवल 7 प्रतिशत आँकी गइर् थी। जन - स्वास्थ्य सेवाएँ तो अिाकांश को सुलभ ही नहीं थीं। जहाँ ये सुविधाएँ उपलब्ध थीं भी, वहाँ नितांत ही अपयार्प्त थीं। परिणामस्वरूप, जल और वायु के सहारे पैफलने वाले संक्रमण रोगों का प्रकोप था, उनसे व्यापक जन - हानि होना एक आम बात थी। कोइर् आश्चयर् नहीं कि उस समय सकल मृत्यु दर बहुत ऊँची थी। विशेष रूप से श्िाशु मृत्यु दर अिाक चांैकाने वाली थी। आज भले ही हमारे देश में श्िाशु मृत्यु दर 63 प्रति हजार हो गइर् है, पर उस समय तो ये दर 218 प्रति हजार थी। जीवन प्रत्याशा स्तर भी आज के 63 वषर् की तुलना में केवल 32 वषर् ही था। विश्वस्त आँकड़ों के अभाव में यह कह पाना कठिन है कि उस समय गरीबी का प्रसार कितना था। इसमें कोइर् संदेह नहीं है कि औपनिवेश्िाक शासन के दौरान भारत में अत्यिाक गरीबी व्याप्त थी, परिणामस्वरूप भारत की जनसंख्या की दशा और भी बदतर हो गइर्। चित्रा 1.3 भारत की जनसंख्या का एक बड़ा भाग मूल आवश्यकता जैसे कि घर से वंचित था। इन्हें कीजिए क्या आप स्वतंत्राता पूवर् भारत में बारंबार अकाल पड़ने का कारण बता सकते हैं? इस विषय में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अथर्शास्त्राी अमत्यर् सेन की पुस्तक ‘गरीबी और अकाल’ बहुत उपयोगी होगी। स्वतंत्राता के समय भारत की जनसंख्या के व्यावसायिक विभाजन का पाइर् चाटर् बनाइए। 1.7 व्यावसायिक संरचना औपनिवेश्िाक काल में विभ्िान्न औद्योगिक क्षेत्राकों में लगे कायर्शील श्रमिकों के आनुपातिक विभाजन में कोइर् परिवतर्न नहीं आया। कृष्िा सबसे बड़ा व्यवसाय था, जिसमें 70 - 75 प्रतिशत जनसंख्या लगी थी। विनिमार्ण तथा सेवा क्षेत्राकों में क्रमशः 10 प्रतिशत तथा 15 - 20 प्रतिशत जन - समुदाय को रोजगार मिल पा रहा था। क्षेत्राीय विषमताओं में वृि एक बड़ी विलक्षणता रही। उस समय की मद्रास प्रेसीडेंसी ;आज के तमिलनाडु, आंध्र, कनार्टक और केरल प्रांतों के क्षेत्रोंद्ध, मुंबइर् और बंगाल के वुफछ क्षेत्रों में कायर्बल की कृष्िा क्षेत्राक पर निभर्रता में कमी आ रही थी, विनिमार्ण तथा सेवा क्षेत्राकों का महत्त्व तदनुरूप बढ़ रहा था। ¯कतु उसी अविा में पंजाब, राजस्थान और उड़ीसा के क्षेत्रों में कृष्िा में लगे श्रमिकों के अनुपात में वृि आँकी गइर्। 1.8 आधारिक संरचना औपनिवेश्िाक शासन के अंतगर्त देश में रेलों, पत्तनों, जल परिवहन व डाक - तार आदि का विकास हुआ। इसका ध्येय जनसामान्य को अिाक सुविधाएँ प्रदान करना नहीं था। ये कायर् तो औपनिवेश्िाक हित साधन के ध्येय से किए गए थे। अंगे्रशी शासन से पहले बनी सड़वेंफ आधुनिक यातायात साधनों के लिए उपयुक्त नहीं थीं। जो सड़वंेफ उन्होंने बनाइर्ं, उनका ध्येय भी देश के भीतर उनकी सेनाओं के आवागमन की सुविधा तथा देश के भीतरी भागों से कच्चे माल को निकटतम रेलवे स्टेशन या पत्तन तक पहुँचाने में सहायता करना मात्रा था। इस प्रकार, माल को इंग्लैंड या अन्य लाभकारी बाशारों तक पहुँचाना आसान हो जाता था। ग्रामीण क्षेत्रों तक माल पहुँचाने में सक्षम सभी मौसम में उपयोग होने वाले सड़क मागोर्ं का अभाव निरंतर बना ही रहा। वषार्काल मंे तो यह अभाव और भी भीषण हो जाता था। स्वाभाविक ही था कि प्राकृतिक आपदाओं और अकाल आदि की स्िथति में ग्रामीण क्षेत्रों में बसे देशवासियों का जीवन कठिनाइयों के कारण दूभर हो जाता था। अंग्रेशों ने 1850 में भारत में रेलों का आरंभ किया। यही उनका सबसे महत्त्वपूणर् योगदान माना जाता है। रेलों ने भारत की अथर्व्यवस्था की संरचना को दो महत्त्वपूणर् तरीकों से प्रभावित किया। एक तो इससे लोगों को भूक्षेत्राीय एवं सांस्कृतिक व्यवधानों को कम कर आसानी से लंबी यात्राएँ करने के अवसर प्राप्त हुए, तो दूसरी ओर भारतीय कृष्िा के व्यावसायीकरण को बढ़ावा मिला। किंतु, इस व्यावसायीकरण का भारतीय ग्रामीण अथर्व्यवस्थाओं के आत्मनिभर्रता के स्वरूप पर विपरीत प्रभाव चित्रा 1.4 मुंबइर् तथा थाणे को जोड़ने वाला पहला रेल पुल, 1854 पड़ा। भारत के नियार्त में निःसंदेह विस्तार हुआ, परंतु इसके लाभ भारतवासियों को मुश्िकल से ही प्राप्त हुए। इस प्रकार जनसामान्य को मिले सांस्कृतिक लाभ, व्यापक होते हुए भी देश की आथ्िार्क हानि की भरपाइर् नहीं कर पाए। सड़कों तथा रेलों के विकास के साथ - साथ औपनिवेश्िाक व्यवस्था ने आंतरिक व्यापार तथा समुद्री जलमागोर्ं के विकास पर भी ध्यान दिया। किंतु ये उपाय बहुत संतोषजनक नहीं थे। उस समय के आंतरिक जलमागर् अलाभकारी सि( हुए। उड़ीसा की तटवतीर् नहर इसका विशेष उदाहरण है। यद्यपि इस नहर का निमार्ण सरकारी कोष से किया गया था, तथापि यह रेलमागर् से स्पधार् नहीं कर पाइर्। नहर के समानांतर रेलमागर् विकसित होने के बाद अंततः उस जलमागर् को छोड़ दिया गया। भारत में विकसित की गइर् मँहगी तार व्यवस्था का मुख्य ध्येय तो कानून व्यवस्था को बनाए रखना ही था। दूसरी ओर डाक सेवाएँ अवश्य जनसामान्य को सुविधा प्रदान कर रही थीं, ¯कतु वे बहुत ही अपयार्प्त थीं। आधारिक संरचनाओं की वतर्मान अवस्था के विषय में आपको अध्याय - 8 में विस्तृत जानकारी दी जाएगी। 1.9 निष्कषर् स्वतंत्राता प्राप्ित तक, 200 वषोंर् के विदेशी शासन का प्रभाव भारतीय अथर्व्यवस्था के प्रत्येक आयाम पर अपनी पैठ बना चुका था। कृष्िा क्षेत्राक पहले से ही अत्यिाक श्रम - अिाशेष के भार से लदा था। उसकी उत्पादकता का स्तर भी बहुत कम था। औद्योगिक क्षेत्राक भी आधुनिकीकरण वैविध्य, क्षमता संवधर्न और सावर्जनिक निवेश में वृि की माँग कर रहा ियात्मक गतिवििायाँ अभी भी वुफछ क्षेत्रों में यह धारणा व्याप्त है कि बि्रटिश शासन भारत के लिए लाभकारी ही था। इस धारणा के बारे में जानकारियों पर आधारित चचार् की आवश्यकता है। आपका इस धारणा के प्रति क्या दृष्िटकोण होगा? अपनी कक्षा में इस विषय पर चचार् आयोजित करेंः क्या अंगे्रशी शासन भारत के लिए अच्छा था? था। विदेशी व्यापार तो केवल इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति को पोष्िात कर रहा था। प्रसि( रेलवे नेटवकर् सहित सभी आधारिक संरचनाओं में उन्नयन, प्रसार तथा जनोन्मुखी विकास की आवश्यकता थी। व्यापक गरीबी और बेरोजगारी भी सावर्जनिक आथ्िार्क नीतियों को जनकल्याणोन्मुखी बनाने का आग्रह कर रही थीं। संक्षेप में, देश में सामाजिक और आथ्िार्क चुनौतियाँ बहुत अिाक थीं। पुनरावतर्न ऽ स्वतंत्राता के बाद की आथ्िार्क विकास की उपलब्िधयों को सही रूप में समझ पाने के लिए स्वतंत्राता पूवर् की अथर्व्यवस्था की सही जानकारी की आवश्यकता है। ऽ औपनिवेश्िाक शासकों की आथ्िार्क नीतियाँ शासित देश और वहाँ के लोगों के आथ्िार्क विकास से प्रेरित नहीं थीं, उनका ध्येय तो इंग्लैंड के आथ्िार्क हितों का संरक्षण और संवधर्न था। ऽ भले ही भारत की जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग कृष्िा से ही अपनी आजीविका पाता था, ¯कतु कृष्िा क्षेत्राक गतिहीन ही रहा - इसमें ”ास के ही प्रमाण मिले हैं। ऽ भारत की अंग्रेशी सरकार द्वारा अपनाइर् गइर् नीतियों के कारण भारत के विश्व प्रसि( हस्तकला उद्योगों का पतन होता रहा और उनके स्थान पर किसी आधुनिक औद्योगिक आधार की रचना नहीं हो पाइर्। ऽ पयार्प्त सावर्जनिक स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव, बार - बार प्राकृतिक आपदाओं और अकाल ने जनसामान्य को बहुत ही निधर्न बना डाला और इसके कारण उच्च मृत्युदर का सामना करना पड़ा। ऽ यद्यपि अपने औपनिवेश्िाक हितों से प्रेरित होकर विदेशी शासकों ने आधारिक सरंचना सुविधाओं को सुधारने के प्रयास किए थे, परंतु इन प्रयासों में उनका निहित स्वाथर् था। यद्यपि स्वतंत्रा भारत की सरकार ने योजनाओं के द्वारा यह आधर बनाया। अभ्यास 1.भारत में औपनिवेश्िाक शासन की आथ्िार्क नीतियों का वंेफद्र ¯बदु क्या था? उन नीतियों के क्या प्रभाव हुए? 2.औपनिवेश्िाक काल में भारत की राष्ट्रीय आय का आकलन करने वाले प्रमुख अथर्शास्ित्रायों के नाम बताइए। 3.औपनिवेश्िाक शासनकाल में कृष्िा की गतिहीनता के मुख्य कारण क्या थे? 4.स्वतंत्राता के समय देश में कायर् कर रहे वुफछ आधुनिक उद्योगों के नाम बताइए। 5.स्वतंत्राता पूवर् अंगे्रशों द्वारा भारत के व्यवस्िथत वि - औद्योगीकरण के दोहरे ध्येय क्या थे? 6.अंगे्रशी शासन के दौरान भारत के परंपरागत हस्तकला उद्योगों का विनाश हुआ। क्या आप इस विचार से सहमत हैं? अपने उत्तर के पक्ष में कारण बताइए। 7.भारत में आधारिक सरंचना विकास की नीतियों से अंग्रेश अपने क्या उद्देश्य पूरा करना चाहते थे? 8.बि्रटिश औपनिवेश्िाक प्रशासन द्वारा अपनाइर् गइर् औद्योगिक नीतियों की कमियों की आलोचनात्मक विवेचना करें। 9.औपनिवेश्िाक काल में भारतीय संपिा के निष्कासन से आप क्या समझते हैं? 10.जनांकिकीय संक्रमण के प्रथम से द्वितीय सोपान की ओर संक्रमण का विभाजन वषर् कौन - सा माना जाता है? 11.औपनिवेश्िाक काल में भारत की जनांकिकीय स्िथति का एक संख्यात्मक चित्राण प्रस्तुत करें। 12.स्वतंत्राता पूवर् भारत की जनसंख्या की व्यावसायिक सरंचना की प्रमुख विशेषताएँ समझाइए। 13.स्वतंत्राता के समय भारत के समक्ष उपस्िथत प्रमुख आथ्िार्क चुनौतियों को रेखांकित करें। 14.भारत में प्रथम सरकारी जनगणना किस वषर् में हुइर् थी? 15.स्वतंत्राता के समय भारत के विदेशी व्यापार के परिमाण और दिशा की जानकारी दें। 16.क्या अंगे्रशों ने भारत में वुफछ सकारात्मक योगदान भी दिया था? विवेचना करें। आॅक्सपफोडर् क्लेरेंडन प्रेस, आॅक्सपफोडर्। की सूची बनाइए। उस सूची की आज के उपभोग स्वरूप से तुलना करें। इस प्रकार जन - सामान्य के जीवन स्तर में आए परिवतर्नों का आकलन करें। 2 अपने आस - पास के गाँवों और शहरों के स्वतंत्राता पूवर् के चित्रा संग्रहित करें। उन्हें आज के परिदृश्यों से मिला कर देखें। आप उसमें क्या परिवतर्न देखते हैं? क्या इनमें आए परिवतर्न सुखद हैं या दुखद? चचार् करें। 3 अपने श्िाक्षक के सहयोग से इस विषय पर परिचचार् करें: क्या भारत में जमींदारी प्रथा का सचमुच उन्मूलन हो गया है? यदि आपका सामान्य मत नकारात्मक है, तो आपके विचार से इसे समाप्त करने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए और क्यों? 4 स्वतंत्राता के समय हमारे देश की जनता अपनी आजीविका के लिए क्या - क्या कायर् करती थी? आज जनता के मुख्य व्यवसाय क्या हैं? देश में चल रहे आथ्िार्क सुधारों को ध्यान में रखकर वषर् 2020 में आप किस प्रकार के व्यावसायिक परिदृश्य की कल्पना करेंगे? बचन्न डेनियल एच 1966. डेवलपमेंट आॅपफ वैफपिटलिस्ट एंटरप्राइज इन इंडिया, पैंफक कास एंड वंफ, लंदन। चंद्र बिपिन 1993.द कालोनियल लीगेसी, संकलित बिमल जालान ;संपादकद्ध। द इंडियन इकाॅनोमीः प्राॅबलम्स एंड प्राॅस्पेक्ट्स, पेंग्िवन बुक्स, नयी दिल्ली। दत्त रमेश चंद्र 1963.इकनाॅमिक हिस्ट्री आॅपफ इंडिया, खंड 1ए2 सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, नयी दिल्ली। वुफमार धमर् एंड मेघनाद देसाइर् ;संपादकद्ध 1983.वैंफबि्रज इकनाॅमिक हिस्ट्री आॅपफ इंडिया, वैंफबि्रज यूनिवसिर्टी प्रेस, वैंफबि्रज। मिल जेम्ज 1972.हिस्ट्री आॅपफ बि्रटिश इंडिया, ऐसोसिएटिड प्रेस, नयी दिल्ली। प्रसाद राजेंद्र 1946.इंडिया डिवाइडेड, ¯हद किताब, मुंबइर्। सेन अमत्यर् 1999.पाॅवटीर् एंड पैफमीन्स, आॅक्सपफोडर् यूनिवसिर्टी प्रेस, नयी दिल्ली।

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