अध्याय दस संविधान का राजनीतिक दशर्न परिचय इस पुस्तक में अभी तक हमने संविधान के वुफछ मुख्य प्रावधानों का अध्ययन किया और जाना कि पिछली आधी सदी में इन प्रावधानों ने वैफसे काम किया। हमने इस बात का भी अध्ययन किया कि संविधान वैफसे बना। लेकिन, क्या कभी आपके मन में यह सवाल उठता है कि बि्रटिश - शासन से आशादी हासिल करने के बाद राष्ट्रीय स्वाधीनता - आंदोलन के नेताओं ने संविधान को अंगीकार करने की शरूरत क्यों महसूस की? उन्होंने खुद को और आने वाली पीढि़यों को संविधान से बाँधने का प़ैफसला क्यों किया? इस पुस्तक में बार - बार आपका सामना संविधान सभा की बहसों से हुआ है। यह पूछा जा सकता है कि संविधान के अध्ययन के सिलसिले में संविधान सभा की बहसों की गहरी परीक्षा करना क्यों शरूरी है? इस अध्याय में सबसे पहले इसी प्रश्न का उत्तर खोजा जाएगा। दूसरे, यह प्रश्न पूछना भी शरूरी है कि हमने जो संविधान अपनाया है वह वैफसा है? इस संविधान के सहारे हम किन उद्देश्यों को पाना चाहते हैं? क्या इन उद्देश्यों के साथ कोइर् नीति - बोध जुड़ा हुआ है? और अगर ऐसा है, तो यह नीति - बोध स्वयं में क्या है? हमारे संविधान के पीछे कौन - सी नैतिक दृष्िट काम कर रही है? इस दृष्िट की मजबूती और सीमाएँ क्या हैं और इसी के अनुसार संविधान की सपफलता और कमशोरियाँ क्या हंै? इन प्रश्नों के उत्तर खोजने के क्रम में हम अपने संविधान के दशर्न को जानने की कोश्िाश करेंगे। इस अध्याय को पढ़ने के बाद आप जान सकेंगे कि - ऽ संविधान के अंतनिर्हित दशर्न को समझना क्यों शरूरी हंै, ऽ भारतीय संविधान की मूलभूत विशेषताएँ क्या हैं, ऽ इस संविधान की आलोचनाएँ क्या हैं, और ऽ इस संविधान की सीमाएँ क्या हैं। संविधान के दशर्न का क्या आशय है? वुफछ लोग मानते हैं कि संविधान सिपर्फ कानूनों से बनता है और कानून एक बात है तथा मूल्य और नैतिकता बिलवुफल ही अलग बात, इसलिए संविधान के प्रति केवल कानूनी नशरिया अपनाया जा सकता है न कि नैतिक या राजनीतिक दशर्न का नशरिया। इस अध्याय में उक्त दावे का खंडन किया गया है। यह सच है कि हर कानून में नैतिक तत्त्व नहीं होता किंतु बहुत - से कानून ऐसे हैं जिनका हमारे मूल्यों और आदशो± से गहरा संबंध है। उदाहरण के लिए कोइर् कानून भाषा अथवा धमर् के आधार पर व्यक्ितयों के बीच भेदभाव की मनाही कर सकता है। इस तरह का कानून समानता के विचार से जुड़ा है। यह कानून इसलिए बना है क्योंकि हम लोग समानता को मूल्यवान मानते हैं। इस उदाहरण से स्पष्ट है कि कानून और नैतिक मूल्यों के बीच गहरा संबंध है। इसी कारण संविधान को एक ऐसे दस्तावेश के रूप में देखना शरूरी है जिसके पीछे एक नैतिक दृष्िट काम कर रही है। संविधान के प्रति राजनीतिक दशर्न का नशरिया अपनाने की शरूरत है। संविधान के प्रति राजनीतिक दशर्न के नशरिये से हमारा क्या आशय है? इसमें तीन बातें शामिल हैं - ऽ पहली बात, संविधान वुफछ अवधारणाओं के आधार पर बना है। इन अवधारणाओं की व्याख्या हमारे लिए शरूरी है। इसका मतलब क्या हुआ? इसका मतलब यह कि हम संविधान में व्यवहार किए गए पदों, जैसे - ‘अिाकार’, ‘नागरिकता’, ‘अल्पसंख्यक’ अथवा ‘लोकतंत्रा’ के संभावित अथर् के बारे में सवाल करें। ऽ इसके अतिरिक्त, हमारे सामने एक ऐसे समाज और शासन - व्यवस्था की तस्वीर सापफ - सापफ होनी चाहिए जो संविधान की बुनियादी अवधारणाओं की हमारी व्याख्या से मेल खाती है। संविधान का निमार्ण जिन आदशो± की बुनियाद पर हुआ है उन पर हमारी गहरी पकड़ होनी चाहिए। ऽ इस सिलसिले में हमारी अंतिम बात यह है कि भारतीय संविधान को संविधान सभा की बहसों के साथ जोड़कर पढ़ा जाना चाहिए ताकि सै(ांतिक रूप से हम बता सवेंफ कि ये आदशर् कहाँ तक और क्यों ठीक हैं तथा आगे उनमें कौन - से सुधार किए जा सकते हैं। किसी मूल्य को अगर हम संविधान की बुनियाद बनाते हैं, तो हमारे लिए यह बताना शरूरी हो जाता है कि यह मूल्य सही और सुसंगत क्यों है। इसके बगैर संविधान के निमार्ण में किसी मूल्य को आधार बनाना एकदम अधूरा कहा जाएगा। संविधान के निमार्ताओं ने जब भारतीय समाज और राज - व्यवस्था को अन्य मूल्यों के बदले किसी खास मूल्य - समूह से दिशा - निदेर्श्िात करने का प़्ौफसला किया, तो ऐसा इसलिए हो होता है? सका क्योंकि उनके पास इस मूल्य - समूह को जायज ठहराने के लिए वुफछ तवर्फ मौजूद थे, भले ही इनमें से बहुत से तवर्फ पूरी तरह से स्पष्ट न हों, चाहे संविधान निमार्ताओं के तवर्फ कितने भी कच्चे और अनगढ़ क्यों न हों, यह कल्पना करना मुश्िकल है कि संविधान में अंतनिर्हित मूल्यों को जायज ठहराने के लिए उनके पास तवर्फ नहीं थे। संविधान के अंतनिर्हित नैतिक तत्त्व को जानने और उसके दावे के मूल्यांकन के लिए संविधान के प्रति राजनीतिक दशर्न का नशरिया अपनाने की शरूरत है। ऐसा करना इस वजह से भी शरूरी है ताकि हम अपनी शासन व्यवस्था के बुनियादी मूल्यों की अलग - अलग व्याख्याओं को एक कसौटी पर जाँच सवेंफ। यह बात स्पष्ट है कि आज संविधान के बहुत - से आदशो± को चुनौती मिल रही है। इन आदशो± को संविधान में सूखे हुए पूफलों की भाँति सिपर्फ रख भर नहीं दिया गया बल्िक इन पर बार - बार अदालतों में जिरह होती है और ये हमारे राजनीतिक जीवन के अभ्िान्न अंग हैं। इन पर विविध राजनीतिक हलकों - विधायिका, राजनीतिक दल, मीडिया, स्वूफल तथा विश्वविद्यालयों में विचार - विमशर् होता है, बहस चलती है और इन पर सवाल उठाए जाते हैं। इन आदशो± की व्याख्या अलग - अलग ढंग से की जाती है और कभी - कभी अल्पकालिक क्षुद्र स्वाथो± के लिए इनके साथ चालबाजी भी की जाती है। इसी कारण से इस बात की परीक्षा की शरूरत पैदा होती है कि संविधान के आदशो± और अन्य हलकों में इन आदशो± की अभ्िाव्यक्ित के बीच कहीं कोइर् गंभीर खाइर् तो नहीं? कभी - कभी विभ्िान्न संस्थाएँ एक ही आदशर् की व्याख्या अलग - अलग ढंग से करती हैं। हमें इन व्याख्याओं की आपसी तुलना की शरूरत पड़ती है। संविधान के आदशर् अपने आप में परम न सही परंतु हैसियत के लिहाज से अत्यंत महत्त्वपूणर् हैं। मूल्यों या आदशो± की व्याख्या अलग - अलग ढंग से की जाए, तो इन व्याख्याओं के बीच विरोध पैदा होता है। यह जाँचने की शरूरत आ पड़ती है कि कौन - सी व्याख्या सही है। इस जाँच - परख में संविधान के आदशो± का इस्तेमाल एक कसौटी के रूप में होना चाहिए। इस लिहाज से हमारा संविधान एक पंच की भूमिका निभा सकता है। संविधान - लोकतांत्रिाक बदलाव का साधन पहले अध्याय में हमने संविधान के अथर् और एक अच्छे संविधान की शरूरत के बारे में पढ़ा। इस बात पर व्यापक सहमति है कि संविधान को अंगीकार करने का एक बड़ा कारण है सत्ता को निरंवुफश होने से रोकना। आधुनिक राज्य अति की हद तक ताकतवर हैं। बल प्रयोग और दंड - शक्ित पर राज्य का एकािाकार माना जाता है। यदि ऐसे राज्य की संस्थाएँ गलत हाथों में पड़ जाएँ तो क्या होगा? भले ही इन संस्थाओं का निमार्ण हमारी सुरक्षा और भलाइर् के लिए किया गया था, परंतु ये बड़ी आसानी से हमारे ही विरु( काम कर सकती हैं। राज्य की शक्ित का दुनियाभर का अनुभव बताता है कि अिाकांश राज्य वुफछ व्यक्ित अथवा समूहों के हित को नुकसान पहुँचाने की दिशा में काम कर सकते हैं। अगर ऐसा है, तो हमें सत्ता के खेल के नियमों को इस तरह बनाना चाहिए कि राज्य की इस प्रवृिा पर अंवुफश लगे। संविधान ये बुनियादी नियम प्रदान करता है और राज्य को निरंवुफश बनने से रोकता है। संविधान हमें गहरे सामाजिक बदलाव के लिए शांतिपूणर् लोकतांत्रिाक साधन भी प्रदान करता है। इन सबके अतिरिक्त, औपनिवेश्िाक दासता में रहे लोगों के लिए संविधान राजनीतिक आत्मनिणर्य का उद्घोष है और इसका पहला वास्तविक अनुभव भी। जवाहरलाल नेहरू इन दोनों बातों को अच्छी तरह समझते थे। उनका कहना था कि संविधान सभा की माँग पूणर् आत्मनिणर्य की सामूहिक माँग का प्रतिरूप है क्योंकि सिपर्फ भारतीय जनता के चुने हुए प्रतिनििायों से बनी संविधान सभा को ही बगैर बाहरी हस्तक्षेप के भारतीय संविधान बनाने का अिाकार है। दूसरे, नेहरू की दलील थी कि संविधान सभा सिपर्फ जन - प्रतिनििायों अथवा योग्य वकीलों का जमावड़ा भर नहीं है बल्िक यह स्वयं में ‘राह पर चल पड़ा एक राष्ट्र है जो अपने अतीत के राजनीतिक और सामाजिक ढँाचे के खोल से निकलकर अपने बनाए नए आवरण को पहनने की तैयारी कर रहा है।’ भारतीय संविधान का निमार्ण परंपरागत सामाजिक ऊँच - नीच के बंधनों को तोड़ने और स्वतंत्राता, समता तथा न्याय के नये युग में प्रवेश के लिए हुआ। इस नशरिए में संवैधानिक लोकतंत्रा के सि(ांत को पूरी तरह से बदलकर रख देने की क्षमता है। इस नशरिए के अनुसार संविधान की मौजूदगी सत्तासीन लोगों की शक्ित पर अंवुफश ही नहीं लगाती बल्िक जो लोग परंपरागत तौर पर सत्ता से दूर रहे हैं उनका सशक्ितकरण भी करती है। संविधान, कमशोर लोगों को उनका वािाब हक सामुदायिक रूप में हासिल करने की ताकत देता है। संविधान सभा की ओर मुड़कर क्यों देखें? पीछे क्यों मुड़ें और अपने को अतीत से क्यों बाँधकर रखें? कानून और राजनीतिक विचारों के इतिहासकार के लिए यह बात ठीक हो सकती है कि वह पीछे मुड़कर देखें कि कानूनी और राजनीतिक विचारों का आधार कहाँ छुपा है? किंतु, राजनीति के विद्याथीर् के लिए संविधान निमार्ताओं के सरोकार और मंशा को जानना क्यों शरूरी है? क्यों नहीं बदली हुइर् स्िथतियों पर गौर किया जाए और इस बात की नइर् परिभाषा बनाइर् जाए कि संविधान किन - किन बातों में सही - गलत का पैफसला दे सकता है? ़अमेरिका का उदाहरण लें। वहाँ संविधान 18 वीं सदी के उत्तरा(र् में लिखा गया। उस युग के मूल्य और मानक का इस्तेमाल 21 वीं सदी में करना बेतुका कहा जाएगा। बहरहाल, हिंदुस्तान की स्िथति अलग है। यहाँ संविधान - निमार्ताओं के समय जो स्िथति थी और हम लोग आज जिन स्िथतियों में रहते हैं - उसमें कोइर् क्रांतिकारी बदलाव नहीं आया है। मूल्यों, आदशो± और अवधारणाओं के लिहाज से हम लोग संविधान सभा की सोच और समय से अलग नहीं हो पाए। हमारे संविधान का इतिहास अब भी हमारे वतर्मान का इतिहास है। खुद करें खुद सीखें अध्याय दो और सात में दिए गए संविधान सभा की बहस के उ(रणों को एक बार पिफर पढ़ें। क्या आप मानते हैं कि इन अंशों में दिए गए तवर्फ आज के समय में प्रासंगिक हैं? क्यों? हो सकता है कि हमारे कानूनी और राजनीतिक व्यवहार - बरताव के पीछे जो असली बात है, हमने उसे भुला दिया हो। कालक्रम में हमने उन्हें स्वाभाविक मान लिया हो। हमारे बहुत से कानूनी और राजनीतिक व्यवहारों के पीछे जो असली बात है, वह पृष्ठभूमि में चली गइर् हो या हमारी चेतना के पदेर् से उतर गइर् हो, भले ही वही बात पहले हमारे व्यवहार - बरताव की बुनियाद के रूप में स्वीकार की गइर् हो। जब तक सब वुफछ ठीक - ठाक चलता रहे तब तक भूले रहना हानिकारक नहीं होता। लेकिन जब संवैधानिक व्यवहार - बरताव को चुनौती मिले, खतरा मंडराए या उपेक्षा हो, तब इन पर अपनी पकड़ बनाए रखना शरूरी हो जाता है। ऐसे में इन व्यवहारों - बरतावों के मूल्य और अथर् को समझने के लिए संविधान शंकर, © चिल्ड्रंस बुक ट्रस्ट सभा की बहसों को मुड़कर देखने के सिवा हमारे पास कोइर् चारा नहीं रहता। संभव है, इस क्रम में हमें और पीछे यानि औपनिवेश्िाक भारत में जाकर पड़ताल करनी पड़े। इसलिए अपने संविधान के मूल में निहित राजनीतिक दशर्न को बार - बार याद करना और उससे टटोलना हमारे लिए शरूरी है। हमारे संविधान का राजनीतिक दशर्न क्या है? इस दशर्न को एक शब्द में बताना कठिन है। हमारा संविधान किसी एक शीषर्क में अँटने से इनकार करता है क्योंकि यह उदारवादी, लोकतांत्रिाक, धमर्निरपेक्ष, संघवादी, सामुदायिक जीवन - मूल्यों का हामी, धामिर्क और भाषाइर् अल्पसंख्यकों के साथ - साथ ऐतिहासिक रूप से अिाकार, वंचित वगो± की शरूरतों के प्रति संवेदनात्मक तथा एक सवर् सामान्य राष्ट्रीय पहचान बनाने को प्रतिबद्व संविधान है। संक्षेप में यह संविधान स्वतंत्राता, समानता, लोकतंत्रा, सामाजिक न्याय तथा एक न एक किस्म की राष्ट्रीय एकता के लिए प्रतिब( है। इन सबके साथ एक बुनियादी चीश और है - संविधान का शोर इस बात पर है कि उसके दशर्न पर शांतिपूणर् तथा लोकतांत्रिाक तरीके से अमल किया जाए। समझेगा? इस खेल के मैदान में हर विचार को दौड़ लगाने की छूट है लेकिन ‘अंपायर’ लोकतंत्रा है। व्यक्ित की स्वतंत्राता संविधान के बारे में गौर करने वाली पहली बात है कि यह व्यक्ित की स्वतंत्राता के लिए प्रतिब( है। यह प्रतिब(ता किसी चमत्कार के रूप में मेज के इदर् - गिदर् चुपचाप बैठकर चिंतन - मनन करने से नहीं आइर्। यह प्रतिब(ता लगभग एक सदी तक निरंतर चली बौिक और राजनीतिक गतिवििायों का परिणाम है। 19वीं सदी के शुरुआती समय में ही राममोहन राय ने प्रेस की आशादी की काट - छाँट का विरोध किया था। अंग्रेजी सरकार प्रेस की आशादी पर प्रतिबंध लगा रही थी। राममोहन राय का तवर्फ था कि जो राज्य व्यक्ित की शरूरतों का ख्याल रखता है, उसे चाहिए कि वह व्यक्ित को अपनी शरूरतों की अभ्िाव्यक्ित का साधन प्रदान करे। इसलिए, राज्य के लिए शरूरी है कि वह प्रकाशन की असीमित आशादी प्रदान करे। पूरे बि्रटिश - शासन के दौरान भारतीय प्रेस की आशादी की माँग निरंतर उठाते रहे। आश्चयर् नहीं कि आज अभ्िाव्यक्ित की स्वतंत्राता हमारे संविधान का फ्रतारी के विरु( हमें स्वतंत्राता प्रदान की गइर् है।़अभ्िान्न अंग है। इसी तरह, मनमानी गिर आख्िार वुफख्यात रौलेट एक्ट ने हमारी इसी स्वतंत्राता के अपहरण का प्रयास किया था और राष्ट्रीय स्वतंत्राता - संग्राम ने इसके विरु( जमकर लोहा लिया। इसके अतिरिक्त अन्य वैयक्ितक स्वतंत्राताएँ मसलन अंतरात्मा का अिाकार उदारवादी विचारधारा का अभ्िान्न हिस्सा है। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि भारतीय संविधान का चरित्रा मजबूत उदारवादी बुनियाद पर प्रतिष्िठत है। मौलिक अिाकारों से संबंिात अध्याय में हम देख चुके हैं कि भारतीय संविधान व्यक्ित की स्वतंत्राता को कितना महत्त्व देता है। यहाँ इस बात को भी हम याद करें कि संविधान को अंगीकार करने के चालीस वषर् पहले भी भारतीय राष्ट्रीय कांगे्रस के प्रत्येक प्रस्ताव, योजना, विधेयक और रिपोटर् में व्यक्ित की स्वतंत्राता की चचार् रहती थी। इसे यों ही लिखने भर के लिए नहीं लिखा जाता था बल्िक इसे एक ऐसा मूल्य माना जाता था जिस पर समझौता नहीं किया जा सकता। सामाजिक न्याय जब भारतीय संविधान को उदारवादी कहा जाता है, तो इसका अथर् इतना भर नहीं होता कि यह संविधान योरोपीय शास्त्राीय परंपरा के अथर् में उदारवादी है। राजनीतिक सि(ांत की अपनी किताब में आप ‘उदारवाद’ के बारे में और समझेंगे। शास्त्राीय उदारवाद ;बसंेेपबंस सपइमतंसपेउद्ध सामाजिक न्याय और सामुदायिक जीवन मूल्यों के ऊपर हमेशा व्यक्ित को तरजीह देता है। भारतीय संविधान का उदारवाद इससे दो मायनों में अलग है। पहली बात तो यह कि हमारा संविधान सामाजिक न्याय से जुड़ा है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण का प्रावधान इसका सवोर्त्तम उदाहरण है। संविधान निमार्ताओं का विश्वास था कि मात्रा समता का अिाकार दे देना इन वगो± के साथ सदियों से हो रहे अन्याय का रिश्ता होता है जैसा कि हम जाति के मामले में देखते हैं। दूसरे, जब समुदाय एक - दूसरे को बराबरी का मानते हैं तब बहुधा प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं जैसा कि हम धामिर्क समुदायों के मामले में देखते हैं। संविधान निमार्ताओं के सामने इस बात की कठिन चुनौती थी कि ऊँच - नीच अथवा गहरी प्रतिद्वंद्विता की मौजूदा स्िथति के बीच समुदायों में बराबरी का रिश्ता वैफसे कायम किया जाए? समुदायों को उदार वैफसे बनाया जाए? समुदायों को मान्यता न देकर इस समस्या का समाधान आसानी से किया जा सकता था। अिाकांश पश्िचमी राष्ट्रों के उदारवादी संविधान में ऐसा ही किया गया है। लेकिन ऐसा करना न तो अपने देश में कारगर होता और न ही वांछनीय। इसका कारण यह नहीं कि भारतीय अन्य लोगों की तुलना में समुदायों से कहीं श्यादा जुड़े हैं। हर जगह के व्यक्ित संास्कृतिक समुदाय से जुड़े होते हैं और ऐसे हर समुदाय की अपनी परंपरा, मूल्य, रीति - रिवाज तथा भाषा होती है। समुदाय का सदस्य इसमें भागीदार होता है। उदाहरण के लिए, Úांस और जमर्नी में व्यक्ित भाषाइर् समुदाय का सदस्य होता है और इससे वह बड़ी गहराइर् से जुड़ा होता है। हम लोग सामुदायिक जीवन - मूल्यों को श्यादा खुले तौर पर स्वीकार करते हैं और यही बात हमें खास बनाती है। इससे भी श्यादा महत्त्वपूणर् बात यह है कि भारत में अनेक सांस्कृतिक समुदाय हैं। जमर्नी अथवा Úांस के विपरीत भारत में बहुत से भाषाइर् और धामिर्क समुदाय हैं। कोइर् समुदाय दूसरे पर प्रभुत्व न जमाए - इस बात को सुनिश्िचत करना शरूरी था। इसी कारण हमारे संविधान के लिए समुदाय आधारित अिाकारों को मान्यता देना शरूरी हो गया। ऐसे ही अिाकारों में एक है धामिर्क समुदाय का अपनी श्िाक्षा संस्था स्थापित करने और चलाने का अिाकार। ऐसी संस्थाओं को सरकार धन दे सकती है। इस प्रावधान से पता चलता है कि भारतीय संविधान धमर् को सिपर्फ व्यक्ित का निजी मामला नहीं मानता। धमर्निरपेक्षता माना जाता है कि धमर्निरपेक्ष राज्य धमर् को ‘निजी मामला’ के रूप में स्वीकार करते हैं। कहने का अथर् यह कि धमर्निरपेक्ष राज्य धमर् को आिाकारिक अथवा सावर्जनिक मान्यता नहीं प्रदान करते। क्या इसका अथर् यह हुआ कि भारतीय संविधान धमर्निरपेक्ष नहीं है? ऐसी बात नहीं हैं। यद्यपि शुरुआत में ‘धमर्निरपेक्ष’ शब्द का जिक्र संविधान में नहीं हुआ था लेकिन भारतीय संविधान हमेशा धमर्निरपेक्ष रहा। हाँ, यह भी है कि मुख्यधारा की पश्िचमी धारणा में व्यक्ित की स्वतंत्राता और व्यक्ित की नागरिकता से संबंिात अिाकारों की रक्षा के लिए धमर्निरपेक्षता को धमर् और राज्य के पारस्परिक निषेध के रूप में देखा गया है। इसके बारे में आप राजनीतिक सि(ांत में विस्तार से पढ़ेंगे। पारस्परिक निषेध ;उनजनंस मगबसनेपवदद्ध शब्द का अथर् होता है - धमर् और राज्य दोनों एक - दूसरे के अंदरूनी मामले से दूर रहेंगे। राज्य के लिए शरूरी है कि वह धमर् के क्षेत्रा में हस्तक्षेप न करे। ठीक इसी तरह धमर् को चाहिए कि वह राज्य की नीति में दखल न दे और न ही राज्य - संचालन को प्रभावित करे। दूसरे शब्दों में, पारस्परिक - निषेध का अथर् है कि धमर् और राज्य परस्पर एकदम अलग होने चाहिए। धमर् और राज्य को एकदम अलग रखने के इस मुख्यधारा के नशरिए का उद्देश्य क्या है? इसका उद्देश्य है व्यक्ित की स्वतंत्राता की सुरक्षा। जो राज्य संगठित धमर् को समथर्न देता है वह पहले से ही मजबूत धमर् को और ताकतवर बनाता है। जब धामिर्क संगठन व्यक्ित के धामिर्क जीवन का नियंत्राण करने लगते हैं, जब वे यह तक बताने लगें कि किसी व्यक्ित को इर्श्वर से किस तरह जुड़ाव रखना चाहिए, वैफसे पूजा - प्राथर्ना करनी चाहिए, तो व्यक्ित के पास इस स्िथति में अपनी गइर् है?धामिर्क स्वतंत्राता की रक्षा के लिए राज्य से अपेक्षा रखने का विकल्प होना चाहिए। लेकिन, जिस राज्य ने स्वयं इन संगठनों से हाथ मिला लिया हो वह क्या सहायता देगा? इसलिए, व्यक्ित की धामिर्क स्वतंत्राता की रक्षा के लिए शरूरी है कि राज्य धामिर्क संगठनों की सहायता न करे। लेकिन इसके साथ - साथ यह भी शरूरी है कि राज्य जैसी ताकतवर संस्था धामिर्क संगठनों को यह न बताने लगे कि उन्हें अपना काम वैफसे करना चाहिए। इससे भी धामिर्क स्वतंत्राता बािात होती है। इसी कारण, राज्य के लिए भी शरूरी है कि वह धामिर्क संगठनों को बाधा न पहुँचाए। संक्षेप में, राज्य को चाहिए कि वह न तो धमर् की मदद करे और न ही उसे बाधा पहुँचाए। इसके बदले, राज्य के लिए धमर् से एक सम्मानजनक दूरी बनाए रखना शरूरी है। ठीक इसी तरह, राज्य को चाहिए कि नागरिकों को अिाकार प्रदान करते हुए वह धमर् को आधार न बनाए। पश्िचमी दुनिया में इर्साइर् धमर् कइर् शाखाओं में बँट गया और प्रत्येक शाखा का अपना चचर् था। इसी कारण ऐसा करना अनिवायर् हो गया। यदि राज्य की निष्ठा इनमें से किसी एक चचर् के साथ होती, तो वह इस चचर् के सदस्यों को दूसरे के सदस्यों से श्यादा तरजीह देता। इस संभावित असमानता से बचने के लिए धमर् और राज्य के बीच गठजोड़ को तोड़ना आवश्यक था। माना गया कि राज्य को व्यक्ित के अिाकारों की रक्षा करनी चाहिए चाहे उस व्यक्ित का धमर् कोइर् भी हो। भारत में स्िथतियाँ अलग थीं और इन स्िथतियों से उत्पन्न चुनौती से निबटने के लिए संविधान निमार्ताओं ने धमर्निरपेक्षता की वैकल्िपक धारणा का विकास किया। संविधान निमार्ता धमर्निरपेक्षता के पश्िचमी माॅडल से दो रूपों में अलग हुए और इसके दो अलग - अलग कारण थे। ऽ धमिर्क समूहों के अध्िकार पहली बात, जैसा कि बताया जा चुका है, संविधान निमार्ता विभ्िान्न समुदायों के बीच बराबरी के रिश्ते को उतना ही शरूरी मानते थे जितना विभ्िान्न व्यक्ितयों के बीच बराबरी को। इसका कारण यह कि किसी व्यक्ित की स्वतंत्राता और आत्म - सम्मान का भाव सीधे - सीधे उसके समुदाय की हैसियत पर निभर्र करता है। यदि एक समुदाय दूसरे के प्रभुत्व में हो, तो उसके सदस्य भी कम स्वतंत्रा होंगे। दूसरी तरपफ, अगर दो समुदायों के बीच बराबरी का संबंध हो, एक का दूसरे पर प्रभुत्व न हो, तो इन समुदायों के सदस्य आत्म - सम्मान और आशादी के भाव से भरे होंगे। इसलिए, भारतीय संविधान सभी धामिर्क समुदायों को श्िाक्षा - संस्थान स्थापित करने और चलाने का अिाकार प्रदान करता है। भारत में धामिर्क स्वतंत्राता का अथर् व्यक्ित और समुदाय दोनों की धामिर्क स्वतंत्राता होता है। ऽ राज्य का हस्तक्षेप करने का अिाकार दूसरी बात, धमर् और राज्य के अलगाव का अथर् भारत में पारस्परिक - निषेध नहीं हो सकता। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए कि धमर् से अनुमोदित रिवाज मसलन छुआछूत व्यक्ित को उसकी बुनियादी गरिमा और आत्म - सम्मान से वंचित करते हैं। इन रिवाजों की पैठ इतनी गहरी और व्यापक थी कि राज्य के सिय हस्तक्षेप के बिना इनके खात्मे की उम्मीद नहीं थी। राज्य को धमर् के अंदरूनी मामले में हस्तक्षेप करना ही पड़ा। ऐसे हस्तक्षेप हमेशा नकारात्मक नहीं होते। राज्य ऐसे में धामिर्क समुदायों की मदद भी कर सकता है। मिसाल के तौर पर धामिर्क संगठन द्वारा चलाए जा रहे श्िाक्षा - संस्थान को वह धन दे सकता है। इस तरह, राज्य धामिर्क समुदायों की मदद भी कर सकता है और बाधा भी पहुँचा सकता है। यह इस बात पर निभर्र है कि राज्य के किन कदमों से स्वतंत्राता और समता जैसे मूल्यों को बढ़ावा मिलता है। भारत में धमर् और राज्य के अलगाव का अथर् पारस्परिक - निषेध नहीं बल्िक राज्य की धमर् से सि(ांतगत दूरी है। यह एक जटिल विचार है। इससे राज्य को सभी धमो± से दूरी रखने की छूट मिलती है ताकि वह अवसर के अनुवूफल धमर् के मामलों में हस्तक्षेप कर सके अथवा ऐसे मामलों में दखल देने से बचा रहे। यह इस बात पर निभर्र है कि इन दोनों में से किस कदम से स्वतंत्राता, समता और सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिलता है। हमने अभी तक तीन वेंफद्रीय विशेषताओं के बारे में पढ़ा। इन्हें हमारे संविधान की उपलब्िधयाँ भी कहा जा सकता है। ऽ पहली बात तो यह कि हमारे संविधान ने उदारवादी व्यक्ितवाद को एक शक्ल देकर उसे मजबूत किया है। यह एक महत्त्वपूणर् उपलब्िध है क्योंकि यह सब एक ऐसे समाज में किया गया जहाँ सामुदायिक जीवन - मूल्य व्यक्ित की स्वायत्तता को कोइर् महत्व नहीं देते अथवा शत्राुता का भाव रखते हैं। ऽ दूसरे, हमारे संविधान ने व्यक्ितगत स्वतंत्राता पर आँच लाए बगैर सामाजिक न्याय के सि(ांत को स्वीकार किया है। जाति आधारित ‘सकारात्मक कायर् - योजना ;।पिितउंजपअम ंबजपवद चतवहतंउउमद्ध के प्रति संवैधानिक वचनब(ता से प्रकट होता है कि भारत दूसरे राष्ट्रों की तुलना में कहीं आगे है। क्या कोइर् इस बात को भूल सकता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में सकारात्मक कायर् - योजना सन् 1964 के नागरिक अिाकार आंदोलन के बाद आरंभ हुइर् जबकि भारतीय संविधान ने इसे लगभग दो दशक पहले ही अपना लिया था। ऽ तीसरे, विभ्िान्न समुदायों के आपसी तनाव और झगड़े की पृष्ठभूमि में भी भारतीय संविधान ने समूहगत अिाकार ;ळतवनच तपहीजेद्ध ;जैसे - सांस्कृतिक विश्िाष्टता की अभ्िाव्यक्ित का अिाकारद्ध प्रदान किए हैं। इससे पता चलता है कि संविधान निमार्ता उस चुनौती से निपटने के लिए बहुत पहले से तैयार थे जो चार दशक बाद बहु - संस्कृतिवाद के नाम से जानी गइर्। सावर्भौम मतािाकार दो अन्य वेंफद्रीय विशेषताओं को उपलब्िध के रूप में गिना जा सकता है। सावर्भौम मतािाकार के प्रति वचनब(ता अपने आप में कोइर् कम बड़ी उपलब्िध नहीं, खासतौर पर उस स्िथति में जब माना जाता हो कि भारत में परंपरागत आपसी ऊँच - नीच का व्यवहार बहुत मजबूत है और उसे समाप्त कर पाना लगभग असंभव है। सावर्भौम मतािाकार को अपनाना इसलिए भी महत्त्वपूणर् कहा जाएगा क्योंकि पश्िचम के उन देशों में भी जहाँ लोकतंत्रा की जड़ स्थायी रूप से जम चुकी थी, कामगार तबके और महिलाओं को मतदान का अिाकार कापफी देर से दिया गया था। एक बार राष्ट्र के विचार ने समाज के अभ्िाजात्य तबके में जगह बना ली, तो इसके परिणामस्वरूप लोकतांत्रिाक स्व - शासन का विचार भी पनपा। इस प्रकार, भारतीय राष्ट्रवाद की धारणा में हमेशा एक ऐसी राजव्यवस्था की बात मौजूद रही जो समाज के प्रत्येक सदस्य की इच्छा पर आधारित हो। सावर्भौम मतािाकार का विचार भारतीय राष्ट्रवाद के बीज - विचारों में एक है। भारत के लिए अनौपचारिक रूप से संविधान तैयार करने का पहला प्रयास ‘कंस्िटट्यूशन आॅपफ इंडिया बिल’ के नाम से सन् 1895 में हुआ था। इस पहले प्रयास में भी इसके लेखक ने घोषणा की थी कि प्रत्येक नागरिक अथार्त् भारत में जन्मे व्यक्ित को देश के मामलों में भाग लेने तथा सरकारी पद हासिल करने का हक है। मोतीलाल नेहरू रिपोटर् ;1928 इर्.द्ध में भारत का संविधन - सि(ांत और व्यवहार सभा ने आम आदमी और लोकतांत्रिाक नियमों की पूरी सपफलता पर भरपूर भरोसा करते हुए तथा इस विश्वास के साथ वयस्क मतािाकार के सि(ांत को अपनाया है कि वयस्क मतािाकार पर आधारित लोकतांत्रिाक शासन की यह शुरुआत, सबका भला करेगी। अलादि कृष्णस्वामी अय्यर संविधन सभा के वाद - विवाद, खंड ग्प्, पृष्ठ 835, 23 नवंबर 1949 नागरिकता की इसी धारणा की पुष्िट करते हुए कहा गया कि 24 वषर् की आयु के हर व्यक्ित को ;स्त्राी हो या पुरुषद्ध लोकसभा के लिए मतदान करने का अिाकार होगा। इस रिपोटर् में ऐसे हर व्यक्ित को नागरिक का दजार् प्रदान किया गया जो राष्ट्रमंडल की भू - सीमा में पैदा हुआ है और जिसने किसी अन्य राष्ट्र की नागरिकता नहीं ग्रहण की है अथवा जिसके पिता इस भू - सीमा में जन्म हों या बस गए हों। इस तरह, शुरुआती दौर से ही सावर्भौम मतािाकार को अत्यंत महत्त्वपूणर् और वैधानिक साधन माना गया जिसके सहारे राष्ट्र की जनता अपनी इच्छा का इशहार करती है। संघवाद जम्मू - कश्मीर और पूवोर्त्तर से संबंिात अनुच्छेदों को जगह देकर भारतीय संविधान ने ‘असमतोल संघवाद’ जैसी अत्यंत महत्त्वपूणर् अवधारणा को अपनाया। संघवाद से संबंिात अध्याय में हमने देखा कि संविधान में एक मजबूत वेंफद्रीय सरकार की बात मानी गइर् है। संविधान का झुकाव वेंफद्र सरकार की मजबूती की तरपफ तो है लेकिन इसके बावजूद भारतीय संघ की विभ्िान्न इकाइयों की कानूनी हैसियत और विशेषािाकार में महत्त्वपूणर् अंतर है। अमेरिकी संघवाद की संवैधानिक बनावट समतोल है लेकिन भारतीय संघवाद संवैधानिक रूप से असमतोल है। वुफछ एक इकाइयों की विशेष शरूरतों को ध्यान में रखते हुए संविधान की रचना में बराबर इस बात का ख्याल रखा गया कि इन इकाइयों के साथ संबंध अनूठे रहें अथवा इन्हें विशेष दजार् प्रदान किया जाय। मसलन, भारतीय संघ में जम्मू - कश्मीर का विलय इस आधार पर किया गया कि संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत इस प्रदेश की स्वायत्तता की रक्षा की जाएगी। यह एकमात्रा प्रदेश है जिसका अपना संविधान है। ठीक इसी तरह अनुच्छेद 371 ये के तहत पूवोर्त्तर के प्रदेश नगालैंड को विशेष दजार् प्रदान किया गया। यह अनुच्छेद न सिपर्फ नगालैंड में पहले से लागू नियमों को मान्यता प्रदान करता है बल्िक आप्रवास पर रोक लगाकर स्थानीय पहचान की रक्षा भी करता है। बहुत से अन्य प्रदेशों को भी ऐसे विशेष प्रावधानों का लाभ मिला है। भारतीय संविधान के अनुसार विभ्िान्न प्रदेशों के साथ इस असमान बरताव में कोइर् बुराइर् नहीं है। हालाँकि संविधान में मूल रूप से यह बात नहीं कही गइर् है परंतु आज भारत एक बहु - भाष्िाक संघ है। हर बड़े भाषाइर् समूह की राजनीतिक मान्यता है और इन्हें परस्पर बराबरी का दजार् प्राप्त है। इस तरह भारत के लोकतांत्रिाक और भाषाइर् संघवाद ने सांस्कृतिक पहचान के दावे को एकता के दावे के साथ जोड़ने में सपफलता पाइर् है। भारत में एक भरा - पूरा राजनीतिक मैदान मौजूद है जिसमें परस्पर प्रतिस्पधीर् बहुविध अस्िमताओं को राजनीतिक दावेदारी करने की छूट है। राष्ट्रीय पहचान संविधान में समस्त भारतीय जनता की एक राष्ट्रीय पहचान पर निरंतर शोर दिया गया है। इस संबंध में हम यहाँ वुफछ बातों पर गौर करें। ऊपर की चचार् से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हमारी एक राष्ट्रीय पहचान का भाषा या धमर् के आधार पर बनी अलग - अलग पहचानों से कोइर् विरोध नहीं है। भारतीय संविधान में इन दो पहचानों के बीच संतुलन बनाने की कोश्िाश की गइर् है। पिफर भी, विफन्हीं विशेष परिस्िथतियों में राष्ट्रीय पहचान को वरीयता प्रदान की गइर् है। इसे धमर् के आधार पर पृथक निवार्चन - मंडल बनाने के संबंध में हुइर् बहस में स्पष्ट किया गया। संविधान में ऐसे निवार्चन - मंडल की बात नकार दी गइर्। पृथक निवार्चन - मंडल की बात को नकारने का कारण यह नहीं था कि इसको मानने पर विभ्िान्न धामिर्क समुदायों में भेद पैदा होता है अथवा इससे राष्ट्रीय एकता की धारणा पर खतरा उत्पन्न होता है। इसको नकारने का कारण यह था कि इससे राष्ट्रीय - जीवन सहजता में बाधा पहुँचती है। प्रियागत उपलब्िध ऊपर बताइर् गइर् पाँच वेंफद्रीय विशेषताओं को हमारे संविधान की आधरभूत महत्व की उपलब्िध कहा जा सकता है। इसके अतिरिक्त वुफछ उपलब्िधयाँ प्रियागत भी हैं। ऽ अव्वल तो यह कि भारतीय संविधान का विश्वास राजनीतिक विचार - विमशर् में है। हम इस बात को जानते हैं कि बहुत - से समूहों और हितों की संविधान सभा में समुचित नुमाइंदगी न हो सकी। लेकिन, इस सभा की बहसों से यह बात सापफ छाप छोड़ी है। जाहिर हो जाती है कि संविधान निमार्ताओं का नशरिया यथा संभव सबको शामिल करने का था। यह खुलापन इस बात का संकेत है कि भारतीय जनता परिणामों को अपने स्वाथो± की तुला पर नहीं बल्िक तवर्फबुि की तुला पर तौलकर परखने के लिए तैयार है। इससे यह भी पता चलता है कि संविधान निमार्ता असहमति और विभेद को एक सकारात्मक मूल्य के रूप में देखते थे। लेकिन आगे चलकर यह भूलना सबके हित में होगा कि इस देश में अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक जैसी कोइर् चीश है। भारत में सिपर्फ एक समुदाय है..सरदार पटेल संविधन सभा के वाद - विवाद, खंड टप्प्प्, पृष्ठ 272, 25 मइर् 1949 ऽ दूसरे, इससे सुलह और समझौते के जश्बे का भी पता चलता है। सुलह और समझौते जैसे शब्द को हमेशा नकार के भाव से नहीं देखना चाहिए। हर समझौता बुरा नहीं होता। यदि स्वाथर् के वशीभूत होकर किसी मूल्यवान चीश का सौदा कर लिया जाता है, तो यह समझौता बुरा है। लेकिन किसी एक मूल्य के थोड़े से सौदे के बदले दूसरा मूल्य हासिल हो और यह सौदा दो बराबरी के लोगों के बीच खुली प्रिया में होता है, तो ऐसे समझौते पर आपत्ित नहीं उठाइर् जा सकती। हम इस बात का अपफसोस कर सकते हैं कि हमारे पास हर चीश होनी चाहिए परंतु है नहीं। पिफर भी, हर चीश को थोड़ा - थोड़ा हासिल कर लेना नैतिक दृष्िट से अंगुली उठाने लायक नहीं है। संविधान सभा इस बात पर अडिग थी कि किसी महत्त्वपूणर् मुद्दे पर पैफसला बहुमत के बजाय सवार्नुमति से लिया जाय। यह ़दृढ़ता अपने आप में प्रशंसनीय है। आलोचना भारतीय संविधान की कइर् आलोचनाएँ हैं। इनमें से तीन पर यहाँ संक्षेप में चचार् की जाएगी - ;कद्धयह संविधान अस्त - व्यस्त है। ;खद्ध इसमें सबकी नुमाइंदगी नहीं हो सकी है। ;गद्धयह संविधान भारतीय परिस्िथतियों के अनुवूफल नहीं है। भारतीय संविधान को अस्त - व्यस्त या ढीला - ढाला बताया जाता है। इसके पीछे यह धारणा काम करती है कि किसी देश का संविधान एक कसे हुए दस्तावेश के रूप में मौजूद होना चाहिए। लेकिन यह बात संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देश के लिए भी सच नहीं है जहाँ संविधान एक कसे हुए दस्तावेश के रूप में है। सच बात यह है कि किसी देश का संविधान एक दस्तावेश तो होता ही है इसमें संवैधानिक हैसियत वाले अन्य दस्तावेशों को भी शामिल किया जाता है। इस तरह, इस बात की पूरी संभावना है कि वुफछ महत्त्वपूणर् संवैधानिक वक्तव्य तथा कायदे उस कसे हुए दस्तावेश से बाहर मिलें जिसे ‘संविधान’ कहा जाता है। जहाँ तक भारत का सवाल है - संविधान हैसियत के ऐसे बहुत - से वक्तव्यों, ब्यौरों और कायदों को एक ही दस्तावेश के अंदर समेट लिया गया है। मिसाल के तौर पर, बहुत - से देशों के संवैधनिक दस्तावेश में चुनाव आयोग या लोक सेवा आयोग के संबंध में कोइर् प्रावधान नहीं है। लेकिन भारत के संविधान में ऐसे अनेक प्रावधान मौजूद हैं। क्या आपको याद है कि संविधान सभा का निमार्ण वैफसे हुआ था? उस वक्त सावर्भौम मतािाकार प्रदान नहीं किया गया था और संविधान सभा के अिाकांश सदस्य समाज के अगड़े तबके के थे। क्या इससे लगता है कि देश के सभी लोगों की नुमाइंदगी हमारे संविधान में नहीं हो सकी? यहाँ शरूरी है कि हम नुमाइंदगी के दो हिस्सों में पफवर्फ करें। इसमें एक को हम चाहें तो ‘आवाश’ कह सकते हैं और दूसरे को ‘राय’। नुमाइंदगी में ‘आवाश’ अपने आप में महत्त्वपूणर् हैं। लोगों की पहचान खुद उनकी जुबान और आवाश से होनी चाहिए न कि उनके मालिकों की जुबान और आवाश से। अगर हम इस दृष्िट से विचार करें तो हमारे संविधान में गैर - नुमाइंदगी मौजूद मिलेगी क्योंकि संविधान सभा के सदस्य सीमित मतािाकार से चुने गए थे न कि सावर्भौम मतािाकार से। बहरहाल, अगर हम नुमाइंदगी के दूसरे पहलू यानी ‘राय’ पर गौर करें तो हमारे संविधान में गैर - नुमाइंदगी नहीं मिलेगी। यह कहना तो खैर अपने आप में एक अतिशयोक्ित है कि संविधान सभा में हर किस्म की राय रखी गइर् लेकिन इसमें सच्चाइर् का एक पुट शरूर है। यदि हम संविधान सभा में हुइर् बहसों को पढ़ें तो जाहिर होगा कि सभा में बहुत - से मुद्दे उठाए गए और बड़े पैमाने पर राय रखी गइर्। सदस्यों ने अपने व्यक्ितगत और सामाजिक सरोकार पर आधारित मसले ही नहीं बल्िक समाज के विभ्िान्न तबके के सरोकारों और हितों पर आधारित मसले भी उठाए। क्या यह संयोग मात्रा है कि आज हर शहर के नुक्कड़ पर हमें हाथ में संविधान लिए अंबेडकर की प्रतिमा मिलती है? यह अंबेडकर के प्रति महज सांकेतिक श्र(ांजलि नहीं है। यह प्रतिमा दलितों की इस भावना का इशहार करती है कि संविधान में उनकी अनेक आकांक्षाओं की अभ्िाव्यक्ित हुइर् है। जा सकता है? एक अंतिम आलोचना यह है कि भारतीय संविधान एक विदेशी दस्तावेश है। इसका हर अनुच्छेद पश्िचमी संविधानों की नकल है और भारतीय जनता के सांस्कृतिक भावबोध से इसका मेल नहीं बैठता। संविधान सभा में भी बहुत - से सदस्यों ने यह बात उठाइर् थी। इस दृष्िट से भारतीय संविधान अत्यंत भ्रामक है क्योंकि इस संविधान की सांस्कृतिक और मूल्यपरक गति - मति भारत की असली जनता और उसके आचार - विचार के सांस्कृतिक तथा मूल्यपरक गति - मति के अनुवूफल नहीं है। यह आरोप कितना सच है? यह बात सच है कि भारतीय संविधान आधुनिक और अंशतः पश्िचमी है। लेकिन इससे यह पूरी तरह विदेशी नहीं हो जाता? पहली बात तो यह कि अनेक भारतीयों ने चिंतन का न सिपर्फ आधुनिक तरीका अपना लिया है बल्िक उसे आत्मसात भी कर लिया है। इन लोगों के लिए पश्िचमीकरण अपनी परंपरा की बुराइयों के विरोध का एक तरीका था। राम मोहन राय से इस प्रवृिा की शुरुआत हुइर् थी और आज भी यह प्रवृिा दलितों द्वारा जारी है। वस्तुतः बहुत पहले यानी सन् 1841 में ही यह बात जाहिर हो गइर् थी। उत्तर भारत के तिरस्कृत और अछूत कहलाने वाले ‘दलित’ नए कानूनों का इस्तेमाल करने में शरा भी नहीं हिचकिचाए और इन लोगों ने नइर् वििा व्यवस्था का सहारा लेकर अपने जमींदारों के ख्िालापफ मुकदमे दायर किए। इस तरह आधुनिक कानून का सहारा लेकर लोगों ने गरिमा और इंसापफ के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। दूसरे, जब पश्िचमी आधुनिकता का स्थानीय सांस्कृतिक व्यवस्था से टकराव हुआ तो एक किस्म की संकर - संस्कृति उत्पन्न हुइर्। यह संकर - संस्कृति पश्िचमी आध्ुनिकता से वुफछ लेने और वुफछ छोड़ने की रचनात्मक प्रिया का परिणाम थी ऐसी प्रिया को न तो पश्िचमी आधुनिकता में ढँूढा जा सकता है और न ही देशी परंपरा में। पश्िचमी आधुनिकता और देशी सांस्कृतिक व्यवस्था के संयोग से उत्पन्न इस बहुमुखी परिघटना में वैकल्िपक आधुनिकता का चरित्रा है। गैर - पश्िचमी मुल्कों में, लोगों ने सिपर्फ अपने अतीत के आचारों से ही छुटकारा पाने की कोश्िाश नहीं की बल्िक अपने ऊपर थोपी गइर् पश्िचमी आधुनिकता के एक खास रूप के बंधनों को भी तोड़ना चाहा। इस तरह, जब हम अपना संविधान बना रहे थे तो हमारे मन में परंपरागत भारतीय और पश्िचमी मूल्यों के स्वस्थ मेल का भाव था। यह संविधान सचेत चयन और अनुवूफलन का परिणाम है न कि नकल का। ...हम वीणा या सितार का संगीत सुनना चाहते थे लेकिन यहाँ तो अंग्रेजी बैंड बज रहा है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हमारे संविधान निमार्ता इसी रूप में श्िाक्ष्िात हुए थे।... यह ठीक वैसा ही संविधान है जैसा महात्मा गांधी नहीं चाहते थे और जिसके बारे में उन्होंने सोचा तक न था। के. हनुमन्थैया संविधन सभा के वाद - विवाद, खंड ग्प्, पृष्ठ 616 - 617, 17 नवंबर 1949 सीमाएंँ इन बातों का यह मतलब नहीं कि भारत का संविधान हर तरह से पूणर् और त्राुटिहीन दस्तावेश है। जिन सामाजिक परिस्िथतियों में इसका निमार्ण हुआ उसे देखते हुए यह बात स्वाभाविक है कि इसमें वुफछ विवादास्पद मुद्दे रह जाएँ - ऐसी बातें बच जाएँ जिनके पुनरावलोकन की शरूरत हो। इस संविधान की बहुत - सी ऐसी बातें समय के दबाव में पैदा हुईं। पिफर भी, हमें स्वीकार करना चाहिए कि इस संविधान की वुफछ सीमाएँ हैं। अब हम संक्षेप में संविधान की सीमाओं की चचार् कर लें। पहली बात यह कि भारतीय संविधान में राष्ट्रीय एकता की धारणा बहुत वेंफद्रीकृत है। दूसरे, इसमें लिंगगत - न्याय के वुफछ महत्त्वपूणर् मसलों खासकर परिवार से जुड़े मुद्दों पर ठीक से ध्यान नहीं दिया गया है। तीसरे, यह बात स्पष्ट नहीं है कि एक गरीब और विकासशील देश में वुफछ बुनियादी सामाजिक - आथ्िार्क अिाकारों को मौलिक अिाकारों का अभ्िान्न हिस्सा बनाने के बजाय उसे राज्य के नीति - निदेर्शक तत्त्व वाले खंड में क्यों डाल दिया गया? संविधन की इन सीमाओं के कारण को समझना और दूर करना संभव है। लेकिन यहाँ यह बात महत्त्वपूणर् नहीं है। हमारा तवर्फ यह है कि संविधन की ये सीमाएँ इतनी गंभीर नहीं हैं कि ये संविधन के दशर्न के लिए ही खतरा पैदा कर दें। निष्कषर् इस अध्याय में हमने जाना कि संविधान एक जीवंत दस्तावेश है। संविधान की वेंफद्रीय विशेषताएँ उसे जीवंत बनाती हैं। कानूनी प्रावधान और संस्थानिक - व्यवस्था समाज की शरूरत तथा समाज द्वारा अपनाए गए दशर्न पर निभर्र हैं। इस पुस्तक में हमने जिस संस्थानिक - व्यवस्था का अध्ययन किया है उसके मूल में है भविष्य के प्रति एक दृष्िट। इस दृष्िट को सबकी सहमति हासिल है। यह दृष्िट ऐतिहासिक रूप से स्वतंत्राता संग्राम के दौरान उत्पन्न हुइर्। संविधान सभा ने इस दृष्िट का परिष्कार किया और उसे वििाक संस्थानिक रूप प्रदान किया। इस तरह संविधान में यह दृष्िट रूपायित हुइर्। ँ ही नहीं? बहुत से लोगों का कहना है कि इस दृष्िट अथवा संविधान के दशर्न का सवोर्त्तम सार - संक्षेप संविधान की प्रस्तावना में है। क्या आपने ध्यानपूवर्क संविधान की प्रस्तावना को पढ़ा है? इसमें बहुत से उद्देश्यों का जिक्र तो है ही, साथ में एक विनम्र दावेदारी भी है। इस संविधान को महान व्यक्ितयों के एक समूह ने नहीं प्रदान किया। इसकी रचना और इसका अंगीकार ‘हम भारत के लोग’ के द्वारा हुआ। इस तरह जनता स्वयं अपनी नियति की नियंता है और लोकतंत्रा एक साधन है जिसके सहारे लोग अपने वतर्मान और भविष्य को आकार देते हैं। आज प्रस्तावना के इस उद्घोष को पचास साल से श्यादा हो चुके हैं। हम बहुत से मसलों पर लड़े हैं। हमने देखा है कि अदालतों और सरकारों के बीच अनेक व्याख्याओं पर असहमति है। वेंफद्र और प्रादेश्िाक सरकारों के बीच मत - वैभ्िान्न है। राजनीतिक दल संविधान की विविध व्याख्याओं के आधार पर पूरे शोर - शोर से लड़ते हैं। अगले साल आप पढ़ेंगे कि हमारी राजनीति में बहुत सी समस्याएँ और कमियाँ हैं। पिफर भी, अगर आप किसी राजनेता अथवा आम नागरिक से पूछें तो पाएँगे कि हर कोइर् संविधान के अंतनिर्हित दशर्न में विश्वास करता है। हम सब साथ रहना चाहते हैं और समता, स्वतंत्राता तथा बंधुता की भावना के आधार पर समृि करना चाहते हैं। संविधान की दृष्िट अथवा दशर्न में यह साझेदारी संविधान को अमल में लाने का महत्त्वपूणर् परिणाम है। सन् 1950 में इस संविधान का निमार्ण एक महत्त्वपूणर् उपलब्िध थी। आज, इस संविधान के दशर्न को जीवंत रखना हमारे लिए महत्त्वपूणर् उपलब्िध होगी। प्रश्नावली 1.नीचे वुफछ कानून दिए गए हैं। क्या इनका संबंध किसी मूल्य से है? यदि हाँ, तो वह अंतनिर्हित मूल्य क्या है? कारण बताएँ। ;कद्ध पुत्रा और पुत्राी दोनों का परिवार की संपिा में हिस्सा होगा। ;खद्ध अलग - अलग उपभोक्ता वस्तुओं के बिक्री - कर का सीमांकन अलग - अलग होगा। ;गद्ध किसी भी सरकारी विद्यालय में धामिर्क श्िाक्षा नहीं दी जाएगी। ;घद्ध ‘बेगार’ अथवा बंधुआ मजदूरी नहीं कराइर् जा सकती। 2.नीचे वुफछ विकल्प दिए जा रहे हैं। बताएँ कि इसमें किसका इस्तेमाल निम्नलिख्िात कथन को पूरा करने में नहीं किया जा सकता? लोकतांत्रिाक देश को संविधान की शरूरत..;कद्ध सरकार की शक्ितयों पर अंवुफश रखने के लिए होती है। ;खद्ध अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों से सुरक्षा देने के लिए होती है। ;गद्ध औपनिवेश्िाक शासन से स्वतंत्राता अजिर्त करने के लिए होती है। ;घद्ध यह सुनिश्िचत करने के लिए होती है कि क्षण्िाक आवेग में दूरगामी के लक्ष्यों से कहीं विचलित न हो जाएँ। ;घद्ध शांतिपूणर् ढंग से सामाजिक बदलाव लाने के लिए होती है। 3.संविधान सभा की बहसों को पढ़ने और समझने के बारे में नीचे वुफछ कथन दिए गए हैं - ;अद्ध इनमें से कौन - सा कथन इस बात की दलील है कि संविधान सभा की बहसें आज भी प्रासंगिक हैं? कौन - सा कथन यह तवर्फ प्रस्तुत करता है कि ये बहसें प्रासंगिक नहीं हैं। ;बद्ध इनमें से किस पक्ष का आप समथर्न करेंगे और क्यों? ;कद्ध आम जनता अपनी जीविका कमाने और जीवन की विभ्िान्न परेशानियों के निपटारे में व्यस्त होती हैं। आम जनता इन बहसों की कानूनी भाषा को नहीं समझ सकती। ;खद्ध आज की स्िथतियाँ और चुनौतियाँ संविधान बनाने के वक्त की चुनौतियों और स्िथतियों से अलग हैं। संविधान निमार्ताओं के विचारों को पढ़ना और अपने नए जमाने में इस्तेमाल करना दरअसल अतीत को वतर्मान में खींच लाना है। ;गद्ध संसार और मौजूदा चुनौतियों को समझने की हमारी दृष्िट पूणर्तया नहीं बदली है। संविधान सभा की बहसों से हमें यह समझने के तवर्फ मिल सकते हैं कि वुफछ संवैधानिक व्यवहार क्यों महत्त्वपूणर् हैं। एक ऐसे समय में जब संवैधानिक व्यवहारों को चुनौती दी जा रही है, इन तको± को न जानना संवैधानिक - व्यवहारों को नष्ट कर सकता है। 4.निम्नलिख्िात प्रसंगों के आलोक में भारतीय संविधान और पश्िचमी अवधारणा में अंतर स्पष्ट करें - ;कद्ध धमर्निरपेक्षता की समझ ;खद्ध अनुच्छेद 370 और 371 ;गद्ध सकारात्मक कायर् - योजना या अपफरमेटिव एक्शन ;घद्ध सावर्भौम वयस्क मतािाकार 5.निम्नलिख्िात में धमर्निरपेक्षता का कौन - सा सि(ांत भारत के संविधान में अपनाया गया है? ;कद्ध राज्य का धमर् से कोइर् लेना - देना नहीं है। ;खद्ध राज्य का धमर् से नजदीकी रिश्ता है। ;गद्ध राज्य धमो± के बीच भेदभाव कर सकता है। ;घद्ध राज्य धामिर्क समूहों के अिाकार को मान्यता देगा। ;घद्ध राज्य को धमर् के मामलों में हस्तक्षेप करने की सीमित शक्ित होगी। 6.निम्नलिख्िात कथनों को सुमेलित करें - ;कद्ध विधवाओं के साथ किए जाने वाले बरताव की आलोचना की आशादी। ;खद्ध संविधान - सभा में प़्ौफसलों का स्वाथर् के आधार पर नहीं बल्िक तवर्फबुि के आधार पर लिया जाना। ;गद्ध व्यक्ित के जीवन में समुदाय के महत्त्व को स्वीकार करना। ;घद्ध अनुच्छेद 370 और 371 ;घद्ध महिलाओं और बच्चों को परिवार की संपिा में असमान अिाकार। आधरभूत महत्व की उपलब्िध प्रियागत उपलब्िध लैंगिक - न्याय की उपेक्षा उदारवादी व्यक्ितवाद धमर् - विशेष की शरूरतों के प्रति ध्यान देना 7.यह चचार् एक कक्षा में चल रही थी। विभ्िान्न तको± को पढ़ें और बताएँ कि आप इनमें किस - से सहमत हैं और क्यों? जएश - मैं अब भी मानता हूँ कि हमारा संविधान एक उधार का दस्तावेश है। सबा - क्या तुम यह कहना चाहते हो कि इसमें भारतीय कहने जैसा वुफछ है ही नहीं? क्या मूल्यों और विचारोें पर हम ‘भारतीय’ अथवा ‘पश्िचमी’ जैसा लेबल चिपका सकते हैं? महिलाओं और पुरुषों की समानता का ही मामला लो। इसमें ‘पश्िचमी’ कहने जैसा क्या है? और, अगर ऐसा है भी तो क्या हम इसे महज पश्िचमी होने के कारण खारिज कर दें? जएश - मेरे कहने का मतलब यह है कि अंग्रेजों से आशादी की लड़ाइर् लड़ने के बाद क्या हमने उनकी संसदीय - शासन की व्यवस्था नहीं अपनाइर्? नेहा - तुम यह भूल जाते हो कि जब हम अंग्रेजों से लड़ रहे थे तो हम सिपर्फ अंग्रेजों के ख्िालाप़फ थे। अब इस बात का, शासन की जो व्यवस्था हम चाहते थे उसको अपनाने से कोइर् लेना - देना नहीं, चाहे यह जहाँ से भी आइर् हो। 8 ऐसा क्यों कहा जाता है कि भारतीय संविधान को बनाने की प्रिया प्रतिनििामूलक नहीं थी? क्या इस कारण हमारा संविधान प्रतिनिध्यात्मक नहीं रह जाता? अपने उत्तर के कारण बताएँ। 9 भारतीय संविधान की एक सीमा यह है कि इसमें लैंगिक - न्याय पर पयार्प्त ध्यान नहीं दिया गया है। आप इस आरोप की पुष्िट में कौन - से प्रमाण देंगे। यदि आज आप संविधान लिख रहे होते, तो इस कमी को दूर करने के लिए उपाय के रूप में किन प्रावधानों की सिपफारिश करते? 10.क्या आप इस कथन से सहमत हैं कि - ‘एक गरीब और विकासशील देश में वुफछ एक बुनियादी सामाजिक - आथ्िार्क अिाकार मौलिक अिाकारों की केंद्रीय विशेषता के रूप में दजर् करने के बजाए राज्य की नीति - निदेर्शक तत्त्वों वाले खंड में क्यों रख दिए गए - यह स्पष्ट नहीं है।’ आपके जानते सामाजिक - आथ्िार्क अिाकारों को नीति - निदेर्शक तत्त्व वाले खंड में रखने के क्या कारण रहे होंगे? अपनी राय शरूर दें - आपको यह किताब वैफसी लगी? इसे पढ़ने या इसका प्रयोग करने का आपका अनुभव वैफसा रहा? आपको इसमें क्या - क्या परेशानियाँ हुईं? पुस्तक के अगले संस्करण में आप इसमें क्या - क्या बदलाव चाहेंगे? इन सबके बारे में या किसी भी नए सुझाव के संबंध् में हमें अवश्य लिखें। आप अध्यापक हों, अभ्िाभावक हों, छात्रा हों या सामान्य पाठक, हर कोइर् सलाह दे सकता है। किताबों में बदलाव की प्रवि्रफया में आपके सुझाव अमूल्य हैं। हम हर सुझाव का सम्मान करते हैं। वृफपया हमें इस पते पर लिखेंः समन्वयक ;राजनीति विज्ञानद्ध सामाजिक विज्ञान श्िाक्षा विभाग राष्ट्रीय शैक्ष्िाक अनुसंधन और प्रश्िाक्षण परिषद् श्री अरविंद मागर्, नयी दिल्ली - 110016 आप हमें इस पते पर इर् - मेल भी कर सकते हैं - चवसपजपबेण्दबमतज/हउंपसण्बवउ

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