अध्याय छः न्यायपालिका परिचय आम तौर पर न्यायालय को विभ्िान्न व्यक्ितयों या निजी संस्थाओं के आपसी विवादों को सुलझाने वाले पंच के रूप में देखा जाता है। लेकिन न्यायपालिका वुफछ महत्त्वपूणर् राजनैतिक कामों को भी अंजाम देती है। न्यायपालिका सरकार का एक महत्त्वपूणर् अंग है। भारत का सवोर्च्च न्यायालय वास्तव में विश्व के सबसे शक्ितशाली न्यायालयों में से एक है। 1950 से ही न्यायपालिका ने संविधान की व्याख्या और सुरक्षा करने में महत्त्वपूणर् भूमिका निभाइर् है। मौलिक अिाकारों वाले अध्याय में हम पढ़ ही चुके हैं कि अिाकारों की सुरक्षा के लिए न्यायपालिका बहुत महत्त्वपूणर् है। इस अध्याय को पढ़ कर आप निम्नलिख्िात बातों को जान सवेंफगे - ऽ न्यायपालिका की स्वतंत्राता का अथर्, ऽ अिाकारों की सुरक्षा में भारतीय न्यायपालिका की भूमिका, ऽ संविधान की व्याख्या में न्यायपालिका की भूमिका और ऽ भारत की संसद और न्यायपालिका के आपसी संबंध। हमें स्वतंत्रा न्यायपालिका क्यों चाहिए? हर समाज में व्यक्ितयों के बीच, समूहों के बीच और व्यक्ित समूह तथा सरकार के बीच विवाद उठते हैं। इन सभी विवादों को ‘कानून के शासन के सि(ांत’ के आधार पर एक स्वतंत्रा संस्था द्वारा हल किया जाना चाहिए। ‘कानून के शासन’ का भाव यह है कि धनी और गरीब, स्त्राी और पुरुष तथा अगड़े और पिछड़े सभी लोगों पर एक समान कानून लागू हो। न्यायपालिका की प्रमुख भूमिका यह है कि वह ‘कानून के शासन’ की रक्षा और कानून की सवोर्च्चता को सुनिश्िचत करे। न्यायपालिका व्यक्ित के अिाकारों की रक्षा करती है, विवादों को कानून के अनुसार हल करती है और यह सुनिश्िचत करती है कि लोकतंत्रा की जगह किसी एक व्यक्ित या समूह की तानाशाही न ले ले। इसके लिए शरूरी है कि न्यायपालिका किसी भी राजनीतिक दबाव से मुक्त हो। स्वतंत्रा न्यायपालिका का क्या अथर् है? यह स्वतंत्राता वैफसे सुनिश्िचत की जाती है? न्यायपालिका की स्वतंत्राता सीधे - सरल शब्दों में, न्यायपालिका की स्वतंत्राता का अथर् है कि - ऽ सरकार के अन्य दो अंग - विधायिका और कायर्पालिका - न्यायपालिका के कायो± में किसी प्रकार की बाधा न पहुँचाए ताकि वह ठीक ढंग से न्याय कर सवेंफ। ऽ सरकार के अन्य अंग न्यायपालिका के निणर्यों में हस्तक्षेप न करें। ऽ न्यायाधीश बिना भय या भेदभाव के अपना कायर् कर सवेंफ। न्यायपालिका की स्वतंत्राता का अथर् स्वेच्छाचारिता या उत्तरदायित्त्व का अभाव नहीं है। न्यायपालिका देश की लोकतांत्रिाक राजनीतिक संरचना का एक हिस्सा है। न्यायपालिका देश के संविधान, लोकतांत्रिाक यह अदालत है। कृपया मुठ्ठी बाँधकर बहस न करें।परंपरा और जनता के प्रति जवाबदेह है। न्यायपालिका को स्वतंत्राता वैफसे दी जा सकती है और उसे सुरक्ष्िात वैफसे बनाया जा सकता है? भारतीय संविधान ने अनेक उपायों के द्वारा न्यायपालिका की स्वतंत्राता सुनिश्िचत की है। न्यायाधीशों की नियुक्ितयों के मामले में विधायिका को सम्िमलित नहीं किया गया है। इससे यह सुनिश्िचत किया गया कि इन नियुक्ितयों में दलगत राजनीति की कोइर् भूमिका नहीं रहे। न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए किसी व्यक्ित को वकालत का अनुभव या कानून का विशेषज्ञ होना चाहिए। उस व्यक्ित के राजनीतिक विचार या निष्ठाएँ उसकी नियुक्ित का आधार नहीं बनना चाहिए। न्यायाधीशों का कायर्काल निश्िचत होता है। वे सेवानिवृत्त होने तक पद पर बने रहते हैं। केवल अपवाद स्वरूप विशेष स्िथतियों में ही न्यायाधीशों को हटाया जा सकता है। इसके अलावा, उनके कायर्काल को कम नहीं किया जा सकता। कायर्काल की सुरक्षा के कारण न्यायाधीश बिना भय या भेदभाव के अपना काम कर पाते हैं। संविधान में न्यायाधीशों को हटाने के लिए बहुत कठिन प्रिया निधार्रित की गइर् है। संविधान निमार्ताओं का मानना था कि हटाने की प्रिया कठिन हो, तो न्यायपालिका के सदस्यों का पद सुरक्ष्िात रहेगा। न्यायपालिका विधायिका या कायर्पालिका पर वित्तीय रूप से निभर्र नहीं है। संविधान के अनुसार न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते के लिए विधायिका की स्वीकृति नहीं ली जाएगी। न्यायाध्ीशों के कायो± और निणर्यों की व्यक्ितगत आलोचना नहीं की जा सकती। अगर कोइर् न्यायालय की अवमानना का दोषी पाया जाता है, तो न्यायपालिका को उसे दंडित करने का अिाकार है। माना जाता है कि इस अिाकार से न्यायाधीशों को सुरक्षा मिलेगी और कोइर् उनकी नाजायज आलोचना नहीं कर सकेगा। संसद न्यायाधीशों के आचरण पर केवल तभी चचार् कर सकती है जब वह उनके विरु( महाभ्िायोग प्रस्ताव पर विचार कर रही हो। इससे न्यायपालिका आलोचना के भय से मुक्त होकर स्वतंत्रा रूप से निणर्य करती है। खुद करें खुद सीखें अपनी कक्षा में निम्नलिख्िात विषयों पर वाद - विवाद का आयोजन करें। आपकी राय में निम्नलिख्िात में से कौन - कौन न्यायाधीशों के निणर्य को प्रभावित करते हैं? क्या आप इन्हें ठीक मानते हैं? ऽ संविधान ऽ पहले लिए गए प़ैफसले ऽ अन्य अदालतों की राय ऽ जनमत ऽ मीडिया ऽ कानून की परंपराएँ ऽ कानून ऽ समय और कमर्चारियों की कमी ऽ सावर्जनिक आलोचना का भय ऽ कायर्पालिका द्वारा कारर्वाइर् का भय न्यायाधीशों की नियुक्ित न्यायाधीशों की नियुक्ित कभी भी राजनीतिक रूप से निविर्वाद नहीं रही है। यह राजनीतिक प्रिया का एक हिस्सा है। यह बात अपने आप में महत्त्वपूणर् हो जाती है कि उच्च न्यायालय और सवोर्च्च न्यायालय में न्यायाधीश कौन हैं। इससे संविधान की व्याख्या पर पफवर्फ पड़ सकता है। न्यायाधीश का राजनीतिक दशर्न क्या है? सिय और मुखर न्यायपालिका के बारे में उसकी क्या राय है? नियंत्रिात और प्रतिब( न्यायपालिका के विषय में उसके क्या विचार हैं? इन सब बातों का प्रभाव लागू किए जाने वाले कानूनों पर पड़ता है। मंत्रिामंडल, राज्यपाल, मुख्यमंत्राी और भारत के मुख्य न्यायाधीश - ये सभी न्यायिक नियुक्ित की प्रिया को प्रभावित करते हैं। भारत के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ित के मामले में वषो± से परंपरा बन गइर् है कि सवोर्च्च न्यायालय के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को इस पद पर नियुक्त किया जाएगा। लेकिन इस परंपरा को दो बार तोड़ा भी गया है। 1973 में तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों को छोड़कर न्यायमूतिर् ए एन रे को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया। जाएगा? पिफर 1975 में न्यायमूतिर् एच आर खन्ना को पीछे छोड़ते हुए न्यायमूतिर् एम एच बेग की नियुक्ित की गइर्। सवोर्च्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ित राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश की सलाह से करता है। इसका अथर् यह हुआ कि नियुक्ितयों के संबंध में वास्तविक शक्ित मंत्रिापरिषद् के पास है। पिफर मुख्य न्यायाधीश से सलाह का क्या महत्त्व है? 1982 से 1998 के बीच यह विषय बार - बार सवोर्च्च न्यायालय के सामने आया। शुरू में न्यायालय का विचार था कि मुख्य न्यायाधीश की भूमिका पूरी तरह से सलाहकार की है। लेकिन बाद में न्यायालय ने माना कि मुख्य न्यायाधीश की सलाह राष्ट्रपति को शरूर माननी चाहिए। आख्िारकार सवोर्च्च न्यायालय ने एक नइर् व्यवस्था की। इसके अनुसार सवोर्च्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश अन्य चार वरिष्ठतम् न्यायाधीशों की सलाह से वुफछ नाम प्रस्तावित करेगा और इसी में से राष्ट्रपति नियुक्ितयाँ करेगा। इस प्रकार सवोर्च्च न्यायालय ने नियुक्ितयों की सिपफारिश के संबंध में सामूहिकता का सि(ांत स्थापित किया। इसी कारण आजकल नियुक्ितयों के संबंध में सवोर्च्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीशों के समूह का श्यादा प्रभाव है। इस तरह न्यायपालिका की नियुक्ित में सवोर्च्च न्यायालय और मंत्रिापरिषद् महत्त्वपूणर् भूमिका निभाते हैं। न्यायाधीशों को पद से हटाना सवोर्च्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को उनके पद से हटाना कापफी कठिन है। कदाचार साबित होने अथवा अयोग्यता की दशा में ही उन्हें पद से हटाया जा सकता है। न्यायाधीश के विरु( आरोपों पर संसद के एक विशेष बहुमत की स्वीकृति शरूरी होती है। क्या आप को याद है कि यह विशेष बहुमत क्या है? इसे हमने चुनाव वाले अध्याय में पढ़ा है। इससे स्पष्ट है कि न्यायाधीश को हटाने की प्रिया अत्यंत कठिन है और जब तक संसद के सदस्यों में आम सहमति न हो तब तक किसी न्यायाधीश को हटाया नहीं जा सकता। यह भी गौरतलब है कि जहाँ उनकी नियुक्ित में कायर्पालिका की महत्त्वपूणर् भूमिका है वहीं उनको हटाने की शक्ित विधायिका के पास है। इसके द्वारा सुनिश्िचत किया गया है कि न्यायपालिका की स्वतंत्राता बची रहे और शक्ित - संतुलन भी बना रहे। अब तक संसद के पास किसी न्यायाधीश को हटाने का केवल एक प्रस्ताव विचार के लिए आया है। इस मामले में हालाँकि दो - तिहाइर् सदस्यों ने प्रस्ताव के पक्ष में मत दिया, लेकिन न्यायाधीश को हटाया नहीं जा सका क्योंकि प्रस्ताव पर सदन की वुफल सदस्य संख्या का बहुमत प्राप्त न हो सका। न्यायाधीश के विरु( महाभ्िायोग असपफल 1991 में पहली बार संसद के 108 सदस्यों ने सवोर्च्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के विरु( महाभ्िायोग के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए। न्यायमूतिर् रामास्वामी पर आरोप था कि पंजाब उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में उन्होंने वित्तीय अनियमितता की। संसद ने महाभ्िायोग लगाने की प्रिया शुरू की। इसके एक वषर् बाद 1992 में सवोर्च्च न्यायालय के न्यायाधीशों की एक उच्च स्तरीय जाँच समिति ने न्यायमूतिर् वी रामास्वामी को पंजाब और हरियाणा के मुख्य न्यायाधीश रहते ’सावर्जनिक धन का निजी उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने और संवैधानिक नियमों की धज्जी उड़ाने के कारण नैतिक पतन...तथा पद का जान - बूझकर गंभीर दुरुपयोग करने का दोषी पाया। इतने कठोर आरोपों के बाद भी रामास्वामी पर संसद में महाभ्िायोग सि( न हो सका। महाभ्िायोग के प्रस्ताव के पक्ष में सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों के शरूरी दो - तिहाइर् मत तो पड़े लेकिन काँग्रेस पाटीर् ने सदन में मतदान में भाग नहीं लिया। अतः प्रस्ताव को सदन की वुफल सदस्य संख्या के आधे का समथर्न नहीं मिल पाया। कहाँ पहँुचे? क्या समझे? ऽ न्यायपालिका की स्वतंत्राता क्यों महत्त्वपूणर् है? ऽ क्या आपकी राय में कायर्पालिका के पास न्यायाध्ीशों न्यायपालिका की संरचना भारतीय संविधान एकीकृत न्यायिक व्यवस्था की स्थापना करता है। इसका अथर् यह है कि विश्व के अन्य संघीय देशों के विपरीत भारत में अलग से प्रांतीय स्तर के न्यायालय नहीं हैं। भारत में न्यायपालिका की संरचना पिरामिड की तरह है जिसमें सबसे ऊपर सवोर्च्च न्यायालय पिफर उच्च न्यायालय तथा सबसे नीचे जिला और अधीनस्थ न्यायालय है। ;नीचे चित्रा में देखेंद्ध नीचे के न्यायालय अपने ऊपर के न्यायालयों की देखरेख में काम करते हैं। सवोर्च्च न्यायालय का क्षेत्रािाकार भारत का सवोर्च्च न्यायालय विश्व के सवार्िाक शक्ितशाली न्यायालयों में से एक है। लेकिन वह संविधान द्वारा तय की गइर् सीमा के अंदर ही काम करता है। सवोर्च्च न्यायालय के कायर् और उत्तरदायित्व संविधान में दजर् हैं। सवोर्च्च न्यायालय को खास किस्म का क्षेत्रािाकार प्राप्त है। मौलिक क्षेत्रािाकार मौलिक क्षेत्रािाकार का अथर् है कि वुफछ मुकदमों की सुनवाइर् सीधे सवोर्च्च न्यायालय कर सकता है। ऐसे मुकदमों में पहले निचली अदालतों में सुनवाइर् शरूरी नहीं। ऊपर के चित्रा में आपने देखा कि संघीय संबंधों से जुड़े मुकदमे सीधे सवोर्च्च न्यायालय में जाते हैं। सवोर्च्च न्यायालय का मौलिक क्षेत्रािाकार उसे संघीय मामलों से संबंिात सभी विवादों में एक अंपायर या निणार्यक की भूमिका देता है। किसी भी संघीय व्यवस्था में वेंफद्र और राज्यों के बीच तथा विभ्िान्न राज्यों में परस्पर कानूनी विवादों का उठना स्वाभाविक है। इन विवादों को हल करने की िाम्मेदारी सवोर्च्च न्यायालय की है। इसे मौलिक क्षेत्रािाकार इसलिए कहते हैं क्योंकि इन मामलों को केवल सवोर्च्च न्यायालय ही हल कर सकता है। इनकी सुनवाइर् न तो उच्च न्यायालय और न ही अध्ीनस्थ न्यायालयों में हो सकती है। अपने इस अिाकार का प्रयोग कर सवोर्च्च न्यायालय न केवल विवादों को सुलझाता है बल्िक संविधान में दी गइर् संघ और राज्य सरकारों की शक्ितयों की व्याख्या भी करता है। ‘रिट’ संबंधी क्षेत्रािाकार जैसा कि आपने मौलिक अिाकारों वाले अध्याय में पढ़ा कि मौलिक अिाकारों के उल्लंघन पर कोइर् भी व्यक्ित इंसापफ पाने के लिए सीधे सवोर्च्च न्यायालय जा सकता है। सवोर्च्च न्यायालय अपने विशेष आदेश रिट के रूप में दे सकता है। उच्च न्यायालय भी रिट जारी कर सकते हैं। लेकिन जिस व्यक्ित के मौलिक अिाकारों का उल्लंघन हुआ है उसके पास विकल्प है कि वह चाहे तो उच्च न्यायालय या सीधे सवोर्च्च न्यायालय जा सकता है। इन रिटों के माध्यम से न्यायालय कायर्पालिका को वुफछ करने या न करने का आदेश दे सकता है। अपीली क्षेत्रािाकार सवोर्च्च न्यायालय अपील का उच्चतम न्यायालय है। कोइर् भी व्यक्ित उच्च न्यायालय के निणर्य के विरु( सवोर्च्च न्यायालय में अपील कर सकता है। लेकिन उच्च न्यायालय को यह प्रमाणपत्रा देना पड़ता है कि वह मुकदमा सवोर्च्च न्यायालय में अपील करने लायक है अथार्त् उसमें संविधान या कानून की व्याख्या करने जैसा कोइर् गंभीर मामला उलझा है। अगर प़्ाफौजदारी के मामले में निचली अदालत किसी को पफाँसी की सशा दे दे, तो उसकी अपील सवोर्च्च या उच्च न्यायालय में की जा सकती है। यदि किसी मुकदमे में उच्च न्यायालय अपील की आज्ञा न दे तब भी सवोर्च्च न्यायालय के पास यह शक्ित है कि वह उस मुकदमे में की गइर् अपील को विचार के लिए स्वीकार कर ले। अपीली क्षेत्रािाकार का मतलब यह है कि सवोर्च्च न्यायालय पूरे मुकदमे पर पुनविर्चार करेगा और उसके कानूनी मुद्दों की दुबारा जाँच करेगा। यदि न्यायालय को लगता है कि कानून या संविधान का वह अथर् नहीं है जो निचली अदालतों ने समझा तो सवोर्च्च न्यायालय उनके निणर्य को बदल सकता है तथा इसके साथ उन प्रावधानों की नइर् व्याख्या भी दे सकता है। उच्च न्यायालयों को भी अपने नीचे की अदालतों के निणर्य के विरु( अपीली क्षेत्रािाकार है। सलाह संबंधी क्षेत्रािाकार मौलिक और अपीली क्षेत्रािाकार के अतिरिक्त सवोर्च्च न्यायालय का परामशर् संबंधी क्षेत्रािाकार भी है। इसके अनुसार, भारत का राष्ट्रपति लोकहित या संविधान की व्याख्या से संबंिात किसी विषय को सवोर्च्च न्यायालय के पास परामशर् के लिए भेज सकता है। लेकिन न तो सवोर्च्च न्यायालय ऐसे किसी विषय पर सलाह देने के लिए बाध्य है और न ही राष्ट्रपति न्यायालय की सलाह मानने को। पिफर सवोर्च्च न्यायालय के परामशर् देने की शक्ित की क्या उपयोगिता है? इसकी दो मुख्य उपयोगिताएँ हैं - पहली, इससे सरकार को छूट मिल जाती है कि किसी महत्त्वपूणर् मसले पर कारर्वाइर् करने से पहले वह अदालत की कानूनी राय जान ले। इससे बाद में कानूनी विवाद से बचा जा सकता है। दूसरी, सवोर्च्च न्यायालय की सलाह मानकर सरकार अपने प्रस्तावित निणर्य या विधेयक में समुचित संशोधन कर सकती है। अनुच्छेद 144 ‘‘भारत के राज्य - क्षेत्रा के सभी सिविल और न्यायिक प्रािाकारी उच्चतम न्यायालय की सहायता से कायर् करेंगे।’’ क्या आप जानते हैं कि हाल के दिनों में न्यायपालिका ने ‘बंद‘ और ‘हड़ताल‘ को अपने प़्ौफसले में अवैध करार दिया है। ‘जनहित याचिका’ है क्या? कब और वैफसे इसकी शुरुआत हुइर्? कानून की सामान्य प्रिया में कोइर् व्यक्ित तभी अदालत जा सकता है जब उसका कोइर् व्यक्ितगत नुकसान हुआ हो। इसका मतलब यह है कि अपने अिाकार का उल्लंघन होने पर या किसी विवाद में पफँसने पर कोइर् व्यक्ित इंसापफ पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। 1979 में इस अवधारणा में बदलाव आया। 1979 में इस बदलाव की शुरुआत करते हुए न्यायालय ने एक ऐसे मुकदमे की सुनवाइर् करने का निणर्य लिया जिसे पीडि़त लोगों ने नहीं बल्िक उनकी ओर से दूसरों ने दाख्िाल किया था। चूँकि इस मामले में जनहित से संबंिात एक मुद्दे पर विचार हो रहा था अतः इसे और ऐसे ही अन्य अनेक मुकदमों को जनहित याचिकाओं का नाम दिया गया। उसी समय सवोर्च्च न्यायालय ने वैफदियों के अिाकार से संबंिात मुकदमे पर भी विचार किया। इससे ऐसे मुकदमों की बाढ़ - सी आ गइर् जिसमें जन सेवा की भावना रखने वाले नागरिकों तथा स्वयंसेवी संगठनों ने अिाकारों की रक्षा, गरीबों के जीवन को और बेहतर बनाने, पयार्वरण की सुरक्षा और लोकहित से जुड़े अनेक मुद्दों पर न्यायपालिका से हस्तक्षेप की माँग की। जनहित याचिका न्यायिक सियता का सबसे प्रभावी साधन हो गइर् है। इरपफाऩकिसी के द्वारा मुकदमा करने पर उस मुद्दे पर विचार करने के बजाय न्यायपालिका ने अखबार में छपी खबरों और डाक से प्राप्त श्िाकायतों को आधार बना कर उन पर विचार करना शुरू कर दिया। इस तरह न्यायपालिका की यह नइर् भूमिका न्यायिक सियता के रूप में लोकपि्रय हुइर्। जनहित याचिकाओं के माध्यम से न्यायालय ने अिाकारों का दायरा बढ़ा दिया। शु( हवा - पानी और अच्छा जीवन पाना पूरे समाज का अिाकार है। न्यायालय का मानना था कि समाज के अिाकारों के उल्लंघन पर व्यक्ितयों को इंसापफ की गुहार लगाने का अिाकार है। इसके अतिरिक्त 1980 के बाद जनहित याचिकाओं और न्यायिक सियता के द्वारा न्यायपालिका ने उन मामलों में भी रूचि दिखाइर् जहाँ समाज के वुफछ वगो± के लोग आसानी से अदालत की शरण नहीं ले सकते। इस उद्देश्य की पूतिर् के लिए न्यायालय ने जन सेवा की भावना से भरे नागरिक, सामाजिक संगठन और वकीलों को समाज के शरूरतमंद और गरीब लोगों की ओर से याचिकाएँदायर करने की इशाशत दी। यह बात शरूर याद रहे कि गरीबों की समस्याएँ ऐसे लोगों की समस्याओं से गुणात्मक रूप से अलग हैं जिन पर अब तक अदालत का ध्यान रहा है। ...गरीबों के प्रति इंसापफ का अलग नशरिया अपनाने की शरूरत है। यदि हम गरीबों के मामले में आँख मूँदकर इंसापफ की कोइर् प्रतिवूफल प्रिया अपनाते हैं, तो वे कभी भी अपने मौलिक अिाकारों का इस्तेमाल नहीं कर सवेंफगे। ;न्यायमूतिर् भगवती - बंधुआ मुक्ित मोचार् बनाम भारत सरकार, 1984द्ध खुद करें खुद सीखें जनहित याचिका के माध्यम से दायर कम - से - कम एक मुकदमे का ब्यौरा जुटाएँ और पता करें कि किस प्रकार उस मामले से जनता के हित की रक्षा हुइर्। न्यायिक सियता का हमारी राजनीतिक व्यवस्था पर बहुत प्रभाव पड़ा। इससे न केवल व्यक्ितयों बल्िक विभ्िान्न समूहों को भी अदालत जाने का अवसर मिला। इसने न्याय व्यवस्था को लोकतांत्रिाक बनाया और कायर्पालिका उत्तरदायी बनने पर बाध्य हुइर् चुनाव प्रणाली को भी इसने श्यादा मुक्त और निष्पक्ष बनाने का प्रयास किया। न्यायालय ने चुनाव लड़ने वाले प्रत्याश्िायों को अपनी संपिा, आय और शैक्षण्िाक योग्यताओं के संबंध में शपथपत्रा देने का निदेर्श दिया, जिससे लोग सही जानकारी के आधार पर अपने प्रतिनििायों का चुनाव कर सवेंफ। जनहित याचिकाओं की बढ़ती संख्या और सिय न्यायपालिका के विचार का एक नकारात्मक पहलू भी है। इससे न्यायालयों में काम का बोझ बढ़ा है। दूसरे, न्यायिक सियता से विधायिका, कायर्पालिका और न्यायपालिका के कायो± के बीच का अंतर धुँधला हो गया है। न्यायालय उन समस्याओं में उलझ गया जिसे कायर्पालिका को हल करना चाहिए। क्या होगा? उदाहरण के लिए, वायु और ध्वनि प्रदूषण दूर करना, भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच करना या चुनाव सुधार करना वास्तव में न्यायपालिका के काम नहीं है। ये सभी कायर् विधायिका की देखरेख में प्रशासन को करना चाहिए। इसलिए वुफछ लोगों का मानना है कि न्यायिक सियता से सरकार के तीनों अंगों के बीच पारस्परिक संतुलन रखना बहुत मुश्िकल हो गया है। लोकतांत्रिाक शासन का आधार यह है कि सरकार का हर अंग एक - दूसरे की शक्ितयों और क्षेत्राध्िकार का सम्मान करें। न्यायिक सियता से इस लोकतांत्रिाक सि(ांत को आघात पहुँच सकता है। आप एक न्यायाधीश हैं नागरिकों का एक समूह जनहित याचिका के माध्यम से न्यायालय जाकर प्राथर्ना करता है कि वह शहर की नगरपालिका के अिाकारियों को झुग्गी - झोपडि़याँ हटाने और शहर को सुंदर बनाने का काम करने के आदेश दे, ताकि शहर में पूँजी निवेश करने वालों को आकष्िार्त किया जा सके। उनका तवर्फ है कि ऐसा करना जनहित में है। झुग्गी - झोपड़ी में रहने वालों का पक्ष है कि ऐसा करने पर उनके ‘जीवन के अिाकार’ का हनन होगा। उनका तवर्फ है कि जनहित के लिए सापफ - सुथरे शहर के अिाकार से श्यादा जीवन का अिाकार महत्त्वपूणर् है। कल्पना करें कि आप एक न्यायाधीश हैं। आप एक निणर्य लिखें और तय करें कि इस ‘जनहित याचिका’ में जनहित का मुद्दा है या नहीं ? न्यायपालिका और अिाकार हम पहले ही देख चुके हैं कि न्यायपालिका को व्यक्ित के अिाकारों की रक्षा करने का दायित्व सौंपा गया है। संविधान ऐसी दो वििायों का वणर्न करता है जिससे सवोर्च्च न्यायालय अिाकारों की रक्षा कर सके - ऽ पहला, यह अनेक रिटऋ जैसे - बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश आदि जारी करके मौलिक अिाकारों को पिफर से स्थापित कर सकता है। ;अनुच्छेद 32द्ध। उच्च न्यायालयों को भी ऐसी रिट जारी करने की शक्ित है ;अनुच्छेद 226द्ध। ऽ दूसरा, सवोर्च्च न्यायालय किसी कानून को गैर - संवैधनिक घोष्िात कर उसे लागू होने से रोक सकता है ;अनुच्छेद 13द्ध। ये दोनों प्रावधान एक ओर सवोर्च्च न्यायालय को नागरिकों के मौलिक अिाकार के संरक्षक तथा दूसरी ओर संविधान के व्याख्याकार के रूप में स्थापित करते हैं। उपयुर्क्त प्रावधानों में दूसरा प्रावधान न्यायिक पुनरावलोकन की व्यवस्था करता है। सवोर्च्च न्यायालय की सबसे महत्त्वपूणर् शक्ित संभवतया न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ित है। न्यायिक पुनरावलोकन का अथर् है कि सवोर्च्च न्यायालय किसी भी कानून की संवैधानिकता जाँच सकता है और यदि वह संविधान के प्रावधानों के विपरीत हो, तो न्यायालय उसे गैर - संवैधानिक घोष्िात कर सकता है। संविधान में कहीं भी न्यायिक पुनरावलोकन शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। लेकिन भारत में संविधान लिख्िात है और इसमें दजर् है कि मूल अिाकारों के विपरीत होने पर सवोर्च्च न्यायालय किसी भी कानून को निरस्त कर सकता है। इन तथ्यों के कारण भारत के संविधान में ‘न्यायिक पुनरावलोकन’ शब्द का प्रयोग न होने पर यह शक्ित सवोर्च्च न्यायालय को प्राप्त है। इसके अलावा हमने सवोर्च्च न्यायालय के क्षेत्रािाकार का अध्ययन करते समय देखा कि संघीय संबंधों के मामले में भी सवोर्च्च न्यायालय अपनी न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ित का प्रयोग कर सकता है। ऐसा करके वह किसी भी कानून को संविधान में निहित शक्ित के बँटवारे की योजना के विरु( होने से रोकता है। मान लीजिए कि वेंफद्र सरकार कोइर् कानून बनाए और वुफछ राज्यों को ऐसा लगे कि इस कानून का विषय तो राज्य सूची में है। तब वे सवोर्च्च न्यायालय जा सकते हैं और यदि न्यायालय उनसे सहमत हो, तो वह उस कानून को असंवैधानिक घोष्िात कर सकता है। इस प्रकार सवोर्च्च न्यायालय न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ित के द्वारा ऐसे किसी भी कानून का परीक्षण कर सकता है, जो मौलिक अिाकारों का उल्लंघन करता हो या संविधान में शक्ित - विभाजन योजना के प्रतिवूफल हो। न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ित राज्यों की विधायिका द्वारा बनाए कानूनों पर भी लागू होती है। रिट जारी करने की और न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ितयाँ सवोर्च्च न्यायालय को अत्यंत शक्ितशाली बना देती है। न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ित का मतलब यह हुआ कि न्यायपालिका विधायिका द्वारा पारित कानूनों की और संविधान की व्याख्या कर सकती है। अनेक लोगों का मानना है कि इसके द्वारा न्यायपालिका प्रभावी ढंग से संविधान की रक्षा करती है और नागरिकों के अिाकारों की भी रक्षा करती है। जनहित याचिकाओं ने नागरिकों के अिाकारों की रक्षा करने की न्यायपालिका की शक्ित में बढ़ोत्तरी की है। शक्ितयाँ होंगी! ऐसे और भी अनेक उदाहरण हैं जिसमें सवोर्च्च न्यायालय ने न्याय की स्थापना के लिए कायर्पालिका की संस्थाओं को निदेर्श दिए। जैसे उसने हवाला मामले, नरसिंह राव मामले और पेट्रोल पंपों के अवैध आबंटन जैसे अनेक मामलों में सीबीआइर् ;वंेफद्रीय जाँच ब्यूरोद्ध को निदेर्श दिया कि वह भ्रष्ट राजनेताओं और नौकरशाहों के विरु( जाँच करे। आपने इनमें से वुफछ के बारे में सुना होगा। इनमें से कइर् उदाहरण न्यायिक सियता के परिणाम हैं। भारतीय संविधान शक्ित के सीमित बँटवारे, अवरोध तथा संतुलन के एक सुंदर सि(ांत पर आधारित है। इसका मतलब यह है कि सरकार के प्रत्येक अंग का एक स्पष्ट कायर् क्षेत्रा है। संसद कानून बनाने और संविधान का संशोधन करने में सवोर्च्च है, कायर्पालिका उन्हें लागू करने तथा न्यायपालिका विवादों को सुलझाने और यह सुनिश्िचत करने में सवोर्च्च है कि क्या बनाए गए कानून संविधान के अनुवूफल हैं। इस स्पष्ट कायर् विभाजन के बावजूद संसद और न्यायपालिका तथा कायर्पालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव भारतीय राजनीति की विशेषता रही है। हमने संपिा के अिाकार और संसद की संविधान को संशोिात करने की शक्ित के संबंध में संसद और न्यायपालिका के बीच हुए टकराव का पीछे उल्लेख किया है। आइए इसे एक बार पिफर दुहरा लें। संविधान लागू होने के तुरंत बाद संपिा के अिाकार पर रोक लगाने की संसद की शक्ित पर विवाद खड़ा हो गया। संसद संपिा रखने के अिाकार पर वुफछ प्रतिबंध लगाना चाहती थी जिससे भूमि - सुधारों को लागू किया जा सके। न्यायालय ने निणर्य दिया कि संसद मौलिक अध्िकारों को सीमित नहीं कर सकती। संसद ने तब संविधान को संशोध्ित करने का प्रयास किया। लेकिन न्यायालय ने कहा कि संविधान के संशोध्न के द्वारा भी मौलिक अिाकारों को सीमित नहीं किया जा सकता। संसद और न्यायपालिका के बीच विवाद के वेंफद्र में निम्नलिख्िात मुद्दे थे - ऽ निजी संपिा के अिाकार का दायरा क्या है? ऽ मौलिक अिाकारों को सीमित, प्रतिबंिात और समाप्त करने की संसद की शक्ित का दायरा क्या है? ऽ संसद द्वारा संविधान संशोधन करने की शक्ित का दायरा क्या है ? ऽ क्या संसद नीति निदेर्शक तत्त्वों को लागू करने के लिए ऐसे कानून बना सकती है जो मौलिक अिाकारों को प्रतिबंिात करे? भारत का संविधन - सि(ांत और व्यवहार जहाँ न्यायिक स्वतंत्राता को बनाए रखने की शरूरत पर कोइर् दो राय नहीं हो सकती ... वहीं हमारे लिए एक महत्त्वपूणर् सि(ांत को भी याद रखना जरूरी है। स्वतंत्राता के सि(ांत को उस स्तर तक नहीं ले जाया जाना चाहिए जहाँ वह आस्था का स्थान ले ले। अन्यथा न्यायपालिका, विधायिका और कायर्पालिका के काम भी अपने हाथ में ले लेने वाली एक अतिवादी संस्था की तरह काम करने लगेगी। न्यायपालिका का काम संविधान की व्याख्या करना या अिाकारों के बारे में चल रहे विवादों को हल करना है ..अलादि कृष्णास्वामी अÕयर संविधान सभा के वाद - विवाद, खंड ग्प् , पृष्ठ 837, 23 नवंबर 1949 1967 से 1973 के बीच यह विवाद कापफी गहरा गया। भूमि - सुधार कानूनों के अतिरिक्त निवारक नशरबंदी कानून, नौकरियों में आरक्षण संबंधी कानून, सावर्जनिक उद्देश्य के लिए निजी संपिा के अिाग्रहण संबंधी नियम और अिाग्रहीत निजी संपिा के मुआवशे संबंधी कानून आदि ऐसे वुफछ उदाहरण हैं जिन पर विधायिका और न्यायपालिका के बीच विवाद हुए। 1973 में सवोर्च्च न्यायालय ने एक निणर्य दिया जो संसद और न्यायपालिका के संबंधों के नियमन में बहुत ही महत्त्वपूणर् हो गया है। यह केशवानंद भारती मुकदमे के रूप में प्रसि( है। इस मुकदमें में न्यायालय ने निणर्य दिया कि संविधान का एक मूल ढाँचा है और संसद सहित कोइर् भी उस मूल ढाँचे से छेड़ - छाड़ नहीं कर सकता। संविधान संशोधन द्वारा भी इस मूल ढाँचे को नहीं बदला जा सकता। न्यायालय ने दो और काम किए। संपिा के अिाकार के विवादास्पद मुद्दे के बारे में न्यायालय ने कहा कि यह मूल ढाँचे का हिस्सा नहीं है और इसलिए उस पर समुचित प्रतिबंध लगाया जा सकता है। दूसरा, न्यायालय ने यह निणर्य करने का अिाकार अपने पास रखा कि कोइर् मुद्दा मूल ढाँचे का हिस्सा है या नहीं। यह निणर्य न्यायपालिका द्वारा संविधान की व्याख्या करने की शक्ित का सवोर्त्तम उदाहरण है। इस निणर्य ने विधायिका और न्यायपालिका के बीच विवादों की प्रकृति ही बदल दी। जैसा कि हम पहले पढ़ चुके हैं संपिा के अिाकार को मौलिक अिाकारों की सूची से 1979 में हटा दिया गया और इससे शासन के इन दो अंगों के बीच संबंधों की प्रकृति बदल गइर्। पिफर भी इन दोनों के बीच विवाद के वुफछ बिंदु बचे हैं। जैसे क्या न्यायपालिका विधायिका की कायर्वाही का नियमन और उसमें हस्तक्षेप कर उसे नियंत्रिात कर सकती है? संसदीय व्यवस्था में संसद को अपना संचालन खुद करने तथा अपने सदस्यों का व्यवहार नियंत्रिात करने की शक्ित है। संसदीय - व्यवस्था में विधायिका को विशेषािाकार के हनन का दोषी पाए जाने पर अपने सदस्य को दंडित करने का अिाकार है। जो व्यक्ित विधायिका के विशेषािाकार हनन का दोषी हो क्या वह न्यायालय की शरण ले सकता है? सदन के किसी सदस्य के विरु( स्वयं सदन द्वारा यदि कोइर् अनुशासनात्मक कारर्वाइर् की जाती है तो क्या वह सदस्य न्यायालय से सुरक्षा प्राप्त कर सकता है? ये मुद्दे अभी भी सुलझ नहीं पाए हैं और दोनों के बीच विवाद का विषय बने रहते हैं। इसी प्रकार संविधान यह व्यवस्था करता है कि न्यायाधीशों के आचरण पर संसद में चचार् नहीं हो सकती। लेकिन अनेक अवसरों पर संसद और राज्यों की विधन सभाओं में न्यायपालिका के आचरण पर अंगुली उठाइर् गइर्। इसी प्रकार न्यायपालिका ने भी अनेक अवसरों पर विधायिका की आलोचना की है और उन्हें उनके विधायी कायो± के संबंध में निदेर्श दिए हैं। विधायिका इसे संसदीय संप्रभुता के सि(ांत के उल्लंघन के रूप में देखती है। इन मुद्दों से यह स्पष्ट होता है कि सरकार के किन्हीं दो अंगों के बीच संतुलन कितना संवेदनशील है और लोकतंत्रा में सरकार के एक अंग का दूसरे अंग की सत्ता के प्रति सम्मान बरतना कितना शरूरी है। कहाँ पहुँचे? क्या समझे? ढ़ाँचा’ कहा जाता है। निष्कषर् इस अध्याय में आपने अपनी लोकतांत्रिाक संरचना में न्यायपालिका की भूमिका का अध्ययन किया है। न्यायपालिका, विधायिका और कायर्पालिका के बीच समय - समय पर उठने वाले विवादों के बावजूद न्यायपालिका की साख बढ़ी है। न्यायपालिका से वुफछ और भी अपेक्षाएँ हैं। आम आदमी को आश्चयर् होता है कि किस आसानी से अनेक दोषी लोग न्यायपालिका से बेदाग बरी हो जाते हैं और वैफसे धनी और दबंगों के असर में गवाह अपने बयान से मुकर जाते हैं। ये वुफछ ऐसे मुद्दे हैं जिनके बारे में स्वयं न्यायपालिका भी ¯चतित है। इस अध्याय में आपने देखा कि भारत में न्यायपालिका बहुत शक्ितशाली संस्था है। इस शक्ित ने बड़े आश्चयर् और बहुत - सी आशाओं को जन्म दिया है। भारतीय न्यायपालिका अपनी स्वतंत्राता के लिए भी जानी जाती है। अनेक निणर्यों के माध्यम से न्यायपालिका ने संविधान की नइर् व्याख्याएँ दीं और नागरिकों के अिाकारों की रक्षा की। जैसा कि हमने इस अध्याय में देखा लोकतंत्रा वास्तव में विधायिका और न्यायपालिका के बीच एक अत्यंत संवेदनशील संतुलन पर आधारित है और इन दोनों को संविधान की सीमाओं के अंदर ही रहकर कायर् करना पड़ता है। प्रश्नावली 1 न्यायपालिका की स्वतंत्राता को सुनिश्िचत करने के विभ्िान्न तरीके कौन - कौन से हैं? निम्नलिख्िात में जो बेमेल हो उसे छाँटें। ;कद्ध सवोर्च्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ित में सवोर्च्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से सलाह ली जाती है। ;खद्ध न्यायाधीशों को अमूमन अवकाश प्राप्ित की आयु से पहले नहीं हटाया जाता। ;गद्ध उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का तबादला दूसरे उच्च न्यायालय में नहीं किया जा सकता। ;घद्ध न्यायाधीशों की नियुक्ित में संसद की दखल नहीं है। 2 क्या न्यायपालिका की स्वतंत्राता का अथर् यह है कि न्यायपालिका किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है। अपना उत्तर अिाकतम 100 शब्दों में लिखें। 3 न्यायपालिका की स्वतंत्राता को बनाए रखने के लिए संविधान के विभ्िान्न प्रावधान कौन - कौन से हैं? 4 नीचे दी गइर् समाचार - रिपोटर् पढ़ें और उनमें निम्नलिख्िात पहलुओं की पहचान करें। ;कद्ध मामला किस बारे में है? ;खद्ध इस मामले में लाभाथीर् कौन है? ;गद्ध इस मामले में पफरियादी कौन है? ;घद्ध सोचकर बताएँ कि कंपनी की तरपफ से कौन - कौन से तवर्फ दिए जाएँगे? ;घद्ध किसानों की तरपफ से कौन - से तवर्फ दिए जाएँगे? सवोर्च्च न्यायालय ने रिलायंस से दहानु के किसानों को 300 करोड़ रुपए देने को कहा - निजी कारपोरेट ब्यूरो, 24 माचर् 2005 मुंबइर् - सवोर्च्च न्यायालय ने रिलायंस एनजीर् से मुंबइर् के बाहरी इलाके दहानु में चीवूफ पफल उगाने वाले किसानों को 300 करोड़ रुपए देने के लिए कहा है। चीवूफ उत्पादक किसानों ने अदालत में रिलायंस के ताप - ऊजार् संयंत्रा से होने वाले प्रदूषण के विरु( अजीर् दी थी। अदालत ने इसी मामले में अपना प़्ौफसला सुनाया है। दहानु मंुबइर् से 150 कि.मी. दूर है। एक दशक पहले तक इस इलाके की अथर् व्यवस्था खेती और बागवानी के बूते आत्मनिभर्र थी और दहानु की प्रसिि यहाँ के मछली - पालन तथा जंगलों के कारण थी। सन् 1989 में इस इलाके में ताप - ऊजार् संयंत्रा चालू हुआ और इसी के साथ शुरू हुइर् इस इलाके की बबार्दी। अगले साल इस उपजाऊ क्षेत्रा की पफसल पहली दपफा मारी गइर्। कभी ़़़महाराष्ट्र के लिए पफलों का टोकरा रहे दहानु की अब 70 प्रतिशत पफसल समाप्त हो चुकी है। मछली पालन बंद हो गया है और जंगल विरल होने लगे हैं। किसानों और पयार्वरणविद्ों का कहना है कि ऊजार् संयंत्रा से निकलने वाली राख भूमिगत जल में प्रवेश कर जाती है और पूरा पारिस्िथतिकी - तंत्रा प्रदूष्िात हो जाता है। दहानु तालुका पयार्वरण सुरक्षा प्रािाकरण ने ताप - ऊजार् संयंत्रा को प्रदूषण - नियंत्राण की इकाइर् स्थापित करने का आदेश दिया था ताकि सल्पफर का उत्सजर्न कम हो सके। सवोर्च्च न्यायालय ने भी प्रािाकरण के आदेश के पक्ष में अपना प़्ौफसला सुनाया था। इसके बावजूद सन् 2002 तक प्रदूषण - नियंत्राण का संयंत्रा स्थापित नहीं हुआ। सन् 2003 में रिलायंस ने ताप - ऊजार् संयंत्रा को हासिल किया और सन् 2004 में उसने प्रदूषण - नियंत्राण संयंत्रा लगाने की योजना के बारे में एक खाका प्रस्तुत किया। प्रदूषण - नियंत्राण संयंत्रा चूँकि अब भी स्थापित नहीं हुआ था इसलिए दहानु तालुका पयार्वरण सुरक्षा प्रािाकरण ने रिलायंस से 300 करोड़ रुपए की बैंक - गारंटी देने को कहा। 5.नीचे की समाचार - रिपोटर् पढ़ें और, चिित करें कि रिपोटर् में किस - किस स्तर की सरकार सिय दिखाइर् देती है। ;कद्ध सवोर्च्च न्यायालय की भूमिका की निशानदेही करें। ;खद्ध कायर्पालिका और न्यायपालिका के कामकाज की कौन - सी बातें आप इसमें पहचान सकते हैं? ;गद्ध इस प्रकरण से संब( नीतिगत मुद्दे, कानून बनाने से संबंिात बातें, ियान्वयन तथा कानून की व्याख्या से जुड़ी बातों की पहचान करें। सीएनजी - मुद्दे पर केंद्र और दिल्ली सरकार एक साथ स्टापफ रिपोटर्र, द हिंदू, सितंबर 23, 2001 राजधानी के सभी ग़्ौर - सीएनजी व्यावसायिक वाहनों को यातायात से बाहर करने के लिए वेंफद्र और दिल्ली सरकार संयुक्त रूप से सवोर्च्च न्यायालय का सहारा लेंगेे। दोनों सरकारों में इस बात की सहमति हुइर् है। दिल्ली और केंद्र की सरकार ने पूरी परिवहन व्यवस्था को एकल ईंधन प्रणाली से चलाने के बजाय दोहरे ईंधन - प्रणाली से चलाने के बारे में नीति बनाने का प़्ौफसला किया है क्योंकि एकल ईंधन प्रणाली खतरों से भरी है और इसके परिणामस्वरूप विनाश हो सकता है। राजधानी के निजी वाहन धारकों ने सीएनजी के इस्तेमाल को हतोत्साहित करने का भी प़्ौफसला किया गया है। दोनों सरकारें राजधानी में 0.05 प्रतिशत निम्न सल्पफर डीजल से बसों को चलाने की अनुमति देने के बारे में दबाव डालेंगी। इसके अतिरिक्त अदालत से कहा जाएगा कि जो व्यावसायिक वाहन यूरो - दो मानक को पूरा करते हैं उन्हें महानगर में चलने की अनुमति दी जाए। हालाँकि वंेफद्र और दिल्ली सरकार अलग - अलग हलपफनामा दायर करेंगे लेकिन इनमें समान बिंदुओं को उठाया जाएगा। वेंफद्र सरकार सीएनजी के मसले पर दिल्ली सरकार के पक्ष को अपना समथर्न देगी। दिल्ली की मुख्यमंत्राी शीला दीक्ष्िात और वेंफद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्राी श्री राम नाइर्क के बीच हुइर् बैठक में ये पैफसले लिए गए। श्रीमती शीला दीक्ष्िात ने कहा कि वेंफद्र सरकार अदालत से विनती करेगी कि डाॅ. आरए मशेलकर की अगुआइर् में गठित उच्चस्तरीय समिति को ध्यान में रखते हुए अदालत बसों को सीएनजी में बदलने की आख्िारी तारीख आगे बढ़ा दे क्योंकि 10,000 बसों को निधर्रित समय में सीएनजी में बदल पाना असंभव है। डाॅमशेलकर की अध्यक्षता में गठित समिति पूरे देश के आॅटो ईंधन नीति का सुझाव देगी। उम्मीद है कि यह समिति छः माह में अपनी रिपोटर् पेश करेगी। मुख्यमंत्राी ने कहा कि अदालत के निदेर्शों पर अमल करने के लिए समय की शरूरत है। इस मसले पर समग्र दृष्िट अपनाने की बात कहते हुए श्रीमती दीक्ष्िात ने बताया - सीएनजी से चलने वाले वाहनों की संख्या, सीएनजी की आपूतिर् करने वाले स्टेशनों पर लगी लंबी कतार की समाप्ित, दिल्ली के लिए पयार्प्त मात्रा में सीएनजी ईंधन जुटाने तथा अदालत के निदेर्शों को अमल में लाने के तरीके और साधनों पर एक साथ ध्यान दिया जाएगा। सवोर्च्च न्यायालय ने ...सीएनजी के अतिरिक्त किसी अन्य ईंधन से महानगर में बसों को चलाने की अपनी मनाही में छूट देने से इन्कार कर दिया था लेकिन अदालत का कहना था कि टैक्सी और आॅटो - रिक्शा के लिए भी सिपर्फ सीएनजी इस्तेमाल किया जाए, इस बात पर उसने कभी शोर नहीं डाला। श्री राम नाइर्क का कहना था कि वेंफद्र सरकार सल्पफर की कम मात्रा वाले डीजल से बसों को चलाने की अनुमति देने के बारे में अदालत से कहेगी, क्योंकि पूरी यातायात व्यवस्था को सीएनजी पर निभर्र करना खतरनाक हो सकता है। राजधानी में सीएनजी की आपूतिर् पाइर्पलाइन के शरिए होती है और इसमें किसी किस्म की बाधा आने पर पूरी सावर्जनिक यातायात प्रणाली अस्त - व्यस्त हो जाएगी। 6.देश के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ित में राष्ट्रपति की भूमिका को आप किस रूप में देखते हैं? ;एक काल्पनिक स्िथति का ब्यौरा दें और छात्रों से उसे उदाहरण के रूप में लागू करने को कहेंद्ध। 7.निम्नलिख्िात कथन इक्वाडोर के बारे में है। इस उदाहरण और भारत की न्यायपालिका के बीच आप क्या समानता अथवा असमानता पाते हैं? सामान्य कानूनों की कोइर् संहिता अथवा पहले सुनाया गया कोइर् न्यायिक पैफसला़मौजूद होता तो पत्राकार के अिाकारों को स्पष्ट करने में मदद मिलती। दुभार्ग्य से इक्वाडोर की अदालत इस रीति से काम नहीं करती। पिछले मामलों में उच्चतर ़अदालत के न्यायाधीशों ने जो पैफसले दिए हैं उन्हें कोइर् न्यायाधीश उदाहरण के रूप में मानने के लिए बाध्य नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका के विपरीत इक्वाडोर ;अथवा दक्ष्िाण अमेरिका में किसी और देशद्ध में जिस न्यायाधीश के सामने ौफसला और उसका कानूनी आधर लिख्िात रूप में ़अपील की गइर् है उसे अपना प्नहीं देना होता। कोइर् न्यायाध्ीश आज एक मामले में कोइर् प़्ौफसला सुनाकर कल उसी मामले में दूसरा प़्ौफसला दे सकता है और इसमें उसे यह बताने की शरूरत नहीं कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। 8.निम्नलिख्िात कथनों को पढि़ए और सवोर्च्च न्यायालय द्वारा अमल में लाए जाने वाले विभ्िान्न क्षेत्रािाकारऋ मसलन - मूल, अपीली और परामशर्कारी - से इनका मिलान कीजिए। ;कद्ध सरकार जानना चाहती थी कि क्या वह पाकिस्तान - अिाग्रहीत जम्मू - कश्मीर के निवासियों की नागरिकता के संबंध में कानून पारित कर सकती हैै। ;खद्ध कावेरी नदी के जल विवाद के समाधान के लिए तमिलनाडु सरकार अदालत की शरण लेना चाहती है। ;गद्ध बांध स्थल से हटाए जाने के विरु( लोगों द्वारा की गइर् अपील को अदालत ने ठुकरा दिया। 9.जनहित याचिका किस तरह गरीबों की मदद कर सकती है? 10.क्या आप मानते हैं कि न्यायिक सियता से न्यायपालिका और कायर्पालिका में विरोध पनप सकता है? क्यों ? 11.न्यायिक सियता मौलिक अिाकारों की सुरक्षा से किस रूप में जुड़ी है? क्या इससे मौलिक अिाकारों के विषय - क्षेत्रा को बढ़ाने में मदद मिली है?

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