अध्याय तीन चुनाव और प्रतिनिध्ित्व परिचय क्या आपने कभी शतंरज खेला है? यदि उसमें काला घोड़ा ढाइर् घर चलने के बजाय सीध चलने लगे तो क्या होगा? या, िकेट के खेल में यदि अंपायर न हो तो क्या होगा? प्रत्येक खेल में हमें वुफछ नियमों का पालन करना पड़ता है। उन नियमों को बदल दिया जाय तो खेल का परिणाम भी बदल जायेगा। इसी तरह, प्रत्येक खेल में एक निष्पक्ष अंपायर होना चाहिए जिसके निणर्यों को सभी ख्िालाड़ी स्वीकार कर लें। खेल शुरू करने से पहले ही हमें नियमों और अंपायर के बारे में सहमति बनानी पड़ेगी। जो खेल के बारे में सत्य है वही चुनाव के बारे में भी सत्य है। चुनाव संपन्न कराने के भ्िान्न - भ्िान्न नियम और व्यवस्थाएँ हंै। चुनाव का परिणाम इस पर निभर्र करता है कि हमने वैफसे नियम बनाये हैं। हमें चुनावों को निष्पक्ष ढंग से कराने के लिए एक मशीनरी भी चाहिये। चूँकि ये दोनों ही निणर्य चुनावी राजनीति का खेल शुरू होने से पहले ही लिए जाने चाहिये, इसलिए इन्हें सरकार पर नहीं छोड़ा जा सकता। अतः चुनाव के बारे में इन मूलभूत निणर्यों को लोकतांत्रिाक देश के संविधन में लिख दिया जाता है। इस अध्याय में हम चुनाव और प्रतिनिध्ित्व के बारे में संवैधनिक प्रावधनों का अध्ययन करेंगे। अपने संविधन में जिस चुनाव प(ति को स्वीकार किया गया है हम उसके महत्त्व और चुनाव कराने की निष्पक्ष मशीनरी से संबंध्ित संवैधनिक प्रावधनों के आशय पर प्रकाश डालेंगे। इस संबंध् में संविधन के प्रावधनों को संशोध्ित करने के लिए जो सुझाव दिये गये हैं हम उन्हें भी देखेंगे। इस अध्याय को पढ़ने से आपको निम्नलिख्िात बातों का पता चलेगा - ऽ चुनाव की विभ्िान्न विध्ियाँऋ ऽ अपने देश की चुनाव - व्यवस्था की विशेषताएँऋ ऽ स्वतंत्रा और निष्पक्ष चुनाव कराने के प्रावधनों का महत्त्वऋ और ऽ चुनाव सुधर पर होने वाली बहस। भारत का संविधन - सि(ांत और व्यवहार पहला प्रश्न हमें एक बड़े लोकतंत्रा में चुनाव की आवश्यकता के बारे में याद दिलाता है। कोइर् भी निणर्य लेने में सभी नागरिक प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं ले सकते। अतः लोग अपने प्रतिनििायों को चुनते हैं। इसलिए, चुनाव महत्त्वपूणर् हो जाता है। हम जब भी भारतीय लोकतंत्रा के बारे में सोचते हैं तो सहज ही हमारा ध्यान पिछले चुनावों पर चला जाता है। आज चुनाव पूरी लोकतांत्रिाक प्रिया के जाने - पहचाने प्रतीक हो गये हैं। हम प्रायः प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लोकतंत्रा में अंतर करते हैं। प्रत्यक्ष लोकतंत्रा में नागरिक रोजमरार् के प़्चुनाव और लोकतंत्रा आइये हम अपने से ही चुनाव और प्रजातंत्रा के बारे में दो प्रश्न पूछ कर अध्याय की शुरुआत करें। ऽ क्या बिना चुनाव के लोकतंत्रा कायम रह सकता है? ऽ क्या बिना लोकतंत्रा के चुनाव हो सकता है? पिछली कक्षाओं में हमने जो वुफछ भी पढ़ा उसके उदाहरणों का प्रयोग करते हुए हमें इन प्रश्नों पर चचार् करनी चाहिये। ौफसलों और सरकार चलाने में सीधे भाग लेते हैं। प्राचीन यूनान के नगर - राज्य प्रत्यक्ष लोकतंत्रा केकहा जाता है कि चुनाव लोकतंत्रा का त्यौहार है लेकिन इस काटूर्न में उसे एक आपफत के रूप में दिखाया गया है। क्या यह उदाहरण माने जाते हैं। अनेक लोगों लोकतंत्रा के लिए अच्छा है? की स्थानीय सरकारें, खास तौर से ग्राम सभाएँ, प्रत्यक्ष प्रजातंत्रा के निकटतम उदाहरण हैं। लेकिन जब लाखों और करोड़ों लोगों को निणर्य लेना हो, तो इस प्रकार के प्रत्यक्ष लोकतंत्रा को व्यवहार में नहीं लाया जा सकता। इसलिए जनता के शासन का अथर् सामान्यतः जनता के प्रतिनिध्ियों के द्वारा चलने वाले शासन से है। ऐसी व्यवस्था में नागरिक अपने प्रतिनिध्ियों को चुनते हैं जो देश के शासन और प्रशासन को चलाने में सिय रूप से भाग लेते हैं। इन प्रतिनििायों को चुनने की विध्ि को चुनाव या निवार्चन कहते हैं। अतः महत्त्वपूणर् निणर्य लेने और प्रशासन चलाने में नागरिकों की सीमित भूमिका है। वे इन नीतियों के निमार्ण में बहुत सिय रूप से सम्िमलित नहीं होते। नागरिक उसमें अप्रत्यक्ष रूप से, अपने निवार्चित प्रतिनिध्ियों के माध्यम से, सम्िमलित होते हैं। जिस व्याख्या में सभी प्रमुख निणर्य निवार्चित प्रतिनिध्ियों के माध्यम से लिए जाएँ उसमें प्रतिनिध्ियों के निवार्चन का तरीका बहुत महत्त्वपूणर् हो जाता है। दूसरा प्रश्न हमें इस बात की याद दिलाता है कि सभी चुनाव लोकतांत्रिाक नहीं होते। बहुत सारे गैर - लोकतांत्रिाक देशों में भी चुनाव होते हैं। वास्तव में गैर - लोकतांत्रिाक शासक स्वयं को लोकतांत्रिाक साबित करने के लिए बहुत आतुर रहते हैं। इसके लिए वे चुनावों को ऐसे ढंग से कराते हैं कि उनके शासन को कोइर् खतरा न हो। क्या आप ऐसे वुफछ गैर - लोकतांत्रिाक चुनावों के उदाहरण दे सकते हैं? आपकी राय में कौन - सी बात एक लोकतांत्रिाक चुनाव को एक गैर - लोकतांत्रिाक चुनाव से अलग करती है? किसी देश में चुनावों को लोकतांत्रिाक ढंग से संपन्न कराना सुनिश्िचत करने के लिए क्या करना चाहिये? इसी बिंदु पर संविधन की महत्त्वपूणर् भूमिका है। एक लोकतांत्रिाक देश का संविधन चुनावों के लिए वुफछ मूलभूत नियम बनाता है, और इस संबंध् में विस्तृत नियम - कानून बनाने का काम विधयिका पर छोड़ देता है। ये मूलभूत नियम सामान्यतः हमें बताते हैं कि - ऽ कौन मत देने के लिए योग्य है? ऽ कौन चुनाव लड़ने के लिए योग्य है? ऽ कौन चुनाव की देख - रेख करेगा? ऽ मतदाता अपना प्रतिनिध्ि वैफसे चुनेंगे? ऽ मतगणना वैफसे होगी और प्रतिनिध्ियों का चुनाव वैफसे होगा? अन्य लोकतांत्रिाक संविधनों की भाँति भारत का संविधन भी इन सभी प्रश्नों का उत्तर देता है। आप देख सकते है कि इसमें पहले तीन प्रश्नों का लक्ष्य एक स्वतंत्रा और निष्पक्ष चुनाव है, जिसे लोकतांत्रिाक चुनाव कहा जा सके। अंतिम दो प्रश्नों का लक्ष्य न्यायपूणर् प्रतिनिध्ित्व भारत का संविधन - सि(ांत और व्यवहार है। इस अध्याय में हम चुनाव के बारे में संवैधनिक प्रावधनों के इन दो पहलुओं की चचार् करेंगे। खुद करें खुद सीखें भारत तथा किसी अन्य देश के चुनावों के संबंध् में अखबारों की खबरों को काटें। उन कतरनों को निम्न वगो± में बाँटें - ;कद्ध प्रतिनिध्ित्व की व्यवस्था। ;खद्ध मतदाताओं की योग्यता। ;गद्ध चुनाव आयोग की भूमिका। यदि आपके पास इंटरनेट है, तो आप ‘इलेक्शन प्रोसेस इन्पफामेर्शन कलेक्शन प्रोजेक्ट’ की वेबसाइट ;ूूूण्मचपबचतवरमबजण्वतहद्ध पर जाएँ और इन विषयों पर चार देशों के बारे में सूचनाएँ एकत्रा करें। भारत में चुनाव व्यवस्था ऊपर आपने चुनावों की विभ्िान्न विध्ियों या व्यवस्थाओं पर गौर किया होगा। आपको आश्चयर् भी हुआ होगा कि यह सब क्या है? आपने, चुनावों के समय चुनाव - प्रचार के लिए अपनाये जाने वाले विभ्िान्न तरीकों के बारे में पढ़ा होगा। लेकिन चुनाव के विभ्िान्न तरीके क्या हैं? चुनाव संचालन करने की एक व्यवस्था है। इसके लिए प्राध्िकार ;ंनजीवतपजपमेद्ध और नियम भी हैं जो बताते हैं कि क्या करें और क्या न करें। क्या चुनाव व्यवस्था का यही अथर् है? आपको आश्चयर् हो सकता है कि क्यों संविधन में यह लिखने की शरूरत पड़ी कि मतगणना वैफसे होगी और प्रतिनिध्ि वैफसे चुने जायेंगे। क्या यह स्वयं ही स्पष्ट नहीं? लोग जाते हैं और वोट देते हैं। जिस प्रत्याशी को अध्िकतम वोट मिलते हैं, वह चुना जाता है। पूरे विश्व में ऐसे ही चुनाव होता है। हमें इसके बारे में क्यों सोचना चाहिये? हमें इसलिए सोचना चाहिये क्योंकि यह प्रश्न उतना सरल नहीं जितना हमें लगता है। हम अपनी चुनाव व्यवस्था में ही इतना लीन हैं कि हमें लगता है कि कोइर् और तरीका हो ही नहीं सकता। लोकतांत्रिाक चुनाव में जनता वोट देती है और उसकी इच्छा ही यह तय करती है कि कौन चुनाव जीतेगा। लेकिन लोगों के द्वारा अपनी रुचि को व्यक्त करने के अनेक तरीके हो सकते हैं और उनकी पसंद की गणना करने की भी बहुत सारी विध्ियाँ हो सकती हैं। खेल के इन अलग - अलग नियमों से इस बात का प़्ौफसला बदल सकता है कि जीत किसकी होगी। वुफछ नियम ऐसे हैं जिनमें बड़े दलों खुद करें खुद सीखें अपनी कक्षा में चुनाव सम्पन्न कर चार कक्षा - प्रतिनिध्ियों को चुनें। चुनाव निम्न तीन अलग - अलग तरीकों से करें: ऽ प्रत्येक छात्रा एक वोट दे सकता है। जिन चार छात्रों को सबसे अध्िक वोट मिले उन्हें चुना जाय। ऽ प्रत्येक छात्रा के पास चार वोट हैं, जिसे वे चाहें तो एक ही प्रत्याशी को दे दें या उसे अन्य प्रत्याश्िायों में बाँट दें। जिन चार छात्रों को सबसे अध्िक वोट मिले उन्हें चुना जाय। ऽ प्रत्येक छात्रा विभ्िान्न प्रत्याश्िायों को वरीयता क्रम में वोट दे और गणना की विध्ि वह हो जो राज्यसभा सदस्यों के निवार्चन में प्रयोग की जाती है ;इस विध्ि का आगे वणर्न किया गया हैद्ध। क्या इन सभी तरीकों से चुनाव कराने पर वही चार लोग चुनाव जीते ? यदि नहीं, तो क्या पफवर्फ पड़ा ? और क्यों? को लाभ पहुँचता हैऋ वुफछ नियमों से छोटे ख्िालाडि़यों ;दलोंद्ध को मदद मिलती है। वुफछ नियम बहुसंख्यक समुदाय के हित में जाते हैं, तो अन्य अल्पसंख्यकों को संरक्षण देते हैं। आइये हम एक नाटकीय उदाहरण से समझें कि ऐसा वैफसे होता है। ‘जो सबसे आगे वही जीते’ इस अखबार की कतरन को देख्िाये। यह भारतीय लोकतंत्रा के एक ऐतिहासिक क्षण के बारे में है। 1984 के लोक पाटीर् वोट ;ःद्ध सीट काँग्रेस 48.0 415 भाजपा 7.4 2 जनता पाटीर् 6.7 10 लोकदल 5.7 3 माकपा 5.7 22 तेलगु देशम 4.1 30 द्रमुक 2.3 2 अन्नाद्रमुक 1.6 12 अकाली दल 1.0 7 असम गण परिषद् 1.0 7 भारत का संविधन - सि(ांत और व्यवहार सभा चुनाव में काँग्रेस पाटीर् ने 543 में से 415 सीटें जीतीं - जो वुफल सीटों के 80 प्रतिशत से भी अध्िक है। लोक सभा चुनावों में किसी दल को ऐसी सपफलता कभी नहीं मिली। इस चुनाव से क्या पता चलता है? काँग्रेस पाटीर् को तीन - चैथाइर् सीटें मिलीं। क्या इसका यह अथर् है कि प्रत्येक पाँच भारतीय नागरिकों में से चार ने काँग्रेस को वोट दिया ? वास्तव में नहीं। नीचे दी गयी तालिका को देखें। काँग्रेस पाटीर् को 48 प्रतिशत वोट मिले। इसका अथर् यह हुआ कि वुफल मिलाकर जितने लोगों ने मतदान किया उसमें केवल 48 प्रतिशत लोगों ने काँग्रेस को वोट दिया, लेकिन पाटीर् को 80 प्रतिशत से भी अध्िक सीटें मिलीं। अन्य दलों के प्रदशर्न को देखें। भाजपा को 7.4 प्रतिशत वोट मिले लेकिन एक प्रतिशत से कम सीटें मिली। ऐसा वैफसे हुआ ? 1984 के लोकसभा चुनाव में प्रमुख दलों द्वारा प्राप्त वोट और सीटें ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हम अपने देश में चुनाव की एक विशेष विध्ि का पालन करते हैं। इस व्यवस्था में - ऽ पूरे देश को 543 निवार्चन क्षेत्रों में बाँट दिया गया हैऋ ऽ प्रत्येक निवार्चन क्षेत्रा से एक प्रतिनिध्ि चुना जाता हैऋ और ऽ उस निवार्चन क्षेत्रा में जिस प्रत्याशी को सबसे अध्िक वोट मिलते हैं उसे निवार्चित घोष्िात कर दिया जाता है। यह ध्यान रखना शरूरी है कि इस व्यवस्था में जिस प्रत्याशी को अन्य सभी प्रत्याश्िायों से अध्िक वोट मिल जाते हैं उसे ही निवार्चित घोष्िात कर दिया जाता है। विजयी प्रत्याशी के लिए यह शरूरी नहीं कि उसे वुफल मतों का बहुमत मिले। इस विध्ि को ‘जो सबसे आगे वही जीते’ प्रणाली ;पफस्र्ट - पास्ट - द - पोस्ट सिस्टमद्ध कहते हैं। चुनावी दौड़ में जो प्रत्याशी अन्य प्रत्याश्िायों के मुकाबले सबसे आगे निकल जाता है वही विजयी होता है। इसे बहुलवादी व्यवस्था भी कहते हैं। संविधन इसी विध्ि को स्वीकार करता है। आइये अपने उदाहरण की ओर लौटें। काँग्रेस पाटीर् को प्राप्त मतों के अनुपात से श्यादा सीटें इसलिए मिलीं क्योंकि अनेक निवार्चन क्षेत्रों में जहाँ उसके प्रत्याशी जीते उन्हें 50 प्रतिशत से कम वोट मिले। यदि चुनाव मैदान में कइर् प्रत्याशी हों तो जीतने वाले प्रत्याशी को प्रायः 50 प्रतिशत से कम वोट मिलते हैं। सभी हारने वाले प्रत्याश्िायों के वोट बेकार चले जाते हैं क्योंकि इन वोटों के आधर पर उन प्रत्याश्िायों या दलों को कोइर् सीट नहीं मिलती। मान लीजिये कि किसी पाटीर् को प्रत्येक निवार्चन क्षेत्रा में 25 प्रतिशत वोट मिलते हैं लेकिन अन्य प्रत्याश्िायों को उससे भी कम वोट मिलते हैं। उस स्िथति में केवल 25 प्रतिशत या उससे भी कम वोट पा कर कोइर् दल सभी सीटें जीत सकता है। समानुपातिक प्रतिनिध्ित्व आइये इसकी तुलना इशराइल में होने वाले चुनावों से करें जहाँ एक बिलवुफल भ्िान्न चुनाव व्यवस्था का पालन किया जाता है। इशराइल में मतगणना के बाद, प्रत्येक पाटीर् को संसद में उसी अनुपात में सीटें दे दी जाती हैं जिस अनुपात में उन्हें वोटों में हिस्सा मिलता है ;आगे बाॅक्स देखेंद्ध। प्रत्येक पाटीर् चुनावों से पहले अपने प्रत्याश्िायों की एक प्राथमिकता सूची जारी कर देती है और अपने उतने ही प्रत्याश्िायों को उस प्राथमिकता सूची से चुन लेती है जितनी सीटों का कोटा उसे दिया जाता है। चुनावों की इस व्यवस्था को ‘समानुपातिक प्रतिनिध्ित्व प्रणाली’ कहते हैं। इस प्रणाली में किसी पाटीर् को उतनी ही प्रतिशत सीटें मिलती हैं जितने प्रतिशत उसे वोट मिलते हैं। समानुपातिक प्रतिनिध्ित्व के दो प्रकार होते हैं। वुफछ देशों जैसे इशराइल या नीदरलैंड में पूरे देश को एक निवार्चन क्षेत्रा माना जाता है और प्रत्येक पाटीर् को राष्ट्रीय चुनावों में प्राप्त वोटों के अनुपात में सीटें दे दी जाती हैं। दूसरा तरीका अजे±टीना व पुतर्गाल में देखने को मिलता है जहाँ पूरे देश को भारत का संविधन - सि(ांत और व्यवहार बहु - सदस्यीय निवार्चन क्षेत्रों में बाँट दिया जाता है। प्रत्येक पाटीर् प्रत्येक निवार्चन क्षेत्रा के लिए अपने प्रत्याश्िायों की एक सूची जारी करती है जिसमें उतने ही नाम होते हैं जितने प्रत्याश्िायों को उस निवार्चन क्षेत्रा से चुना जाना होता है। इन दोनों ही रूपों में मतदाता राजनीतिक दलों को वोट देते हैं न कि उनके प्रत्याश्िायों को। एक पाटीर् को किसी निवार्चन क्षेत्रा में जितने मत प्राप्त होते हैं उसी आधर पर उसे उस निवार्चन क्षेत्रा में सीटें दे दी जाती हैं। अतः किसी निवार्चन क्षेत्रा के प्रतिनिध्ि वास्तव में राजनीतिक इशराइल में समानुपातिक प्रतिनिध्ित्व इशराइल में चुनावों के लिए समानुपातिक प्रतिनिध्ित्व प्रणाली अपनाइर् गइर् है। वहाँ विधयिका ;नेसेटद्ध के चुनाव प्रत्येक चार वषर् पर होते हैं। प्रत्येक पाटीर् अपने प्रत्याश्िायों की एक सूची जारी करती है लेकिन मतदाता प्रत्याश्िायों को नहीं वरन् पाटिर्यों को वोट देते हैं। प्रत्येक पाटीर् को प्राप्त वोटों के अनुपात में ही विधयिका में सीटें मिलती हैं। इससे सीमित जनाधर वाली छोटी पाटिर्यों को भी विधयिका में वुफछ प्रतिनिध्ित्व मिल जाता है ;शतर् यह है कि विधयिका में सीट पाने के लिए न्यूनतम 1.5 प्रतिशत वोट मिलना चाहियेद्ध। इससे प्रायः बहुदलीय गठबंध्न सरकारें बनती हैं। निम्नलिख्िात सारणी में 2003 के नेसेट के चुनाव - परिणाम दिये गये हैं। इसके आधर पर आप यह पता लगा सकते हैं कि विभ्िान्न पाटिर्यों को कितने प्रतिशत वोट मिले । दलों के प्रतिनिध्ि होते हैं। भारत में हमने समानुपातिक प्रतिनिध्ित्त्व प्रणाली को केवल अप्रत्यक्ष चुनावों के लिए ही सीमित रूप में अपनाया है। हमारा संविधन राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्य सभा और विधन परिषदों के चुनावों के लिए समानुपातिक प्रतिनिध्ित्व प्रणाली का एक तीसरा और जटिल स्वरूप प्रस्तावित करता है। समानुपातिक प्रतिनिध्ित्व किसी बड़े भौगोलिक क्षेत्रा को एक निवार्चन क्षेत्रा मान लिया जाता है। पूरा का पूरा देश एक निवार्चन क्षेत्रा गिना जा सकता है। एक निवार्चन क्षेत्रा से कइर् प्रतिनिध्ि चुने जा सकते हैं। मतदाता पाटीर् को वोट देता है। हर पाटीर् को प्राप्त मत के अनुपात में विधयिका में सीटें हासिल होती हैं। विजयी उम्मीदवार को वोटों का बहुमत हासिल होता है। जैसे कि इशराइल और नीदरलैंड भारत का संविधन - सि(ांत और व्यवहार राज्य सभा के चुनावों में समानुपातिक प्रतिनिध्ित्व की प्रणाली समानुपातिक प्रतिनिध्ित्व का एक तीसरा स्वरूप हमें भारत में राज्य सभा चुनावों में देखने को मिलता है: इसे ‘एकल संक्रमणीय मत प्रणाली’ कहते हैं। प्रत्येक राज्य को राज्य सभा में सीटों का निश्िचत कोटा प्राप्त है। राज्यों की विधन सभा के सदस्यों द्वारा इन सीटों के लिए चुनाव किया जाता है। इसमें राज्य के विधयक ही मतदाता होते हैं। मतदाता चुनाव में खड़े सभी प्रत्याश्िायों को अपनी पसंद के अनुसार एक वरीयता क्रम में मत देता है। जीतने के लिए किसी प्रत्याशी को मतों का एक कोटा प्राप्त करना पड़ता है। जो निम्नलिख्िात पफामूर्ले के आधर पर निकाला जाता है। ⎛ वुफल मतदान ⎞ ⎜ ⎟़ 1 ⎝ वु1फल विजयी उम्मीदवार ़⎠ उदाहरण के लिए यदि राजस्थान के 200 विधयकों को राज्य सभा के लिए चार सदस्य ⎛ 200 ⎞ 200 1 ⇒़1 ⇒ 40 ़ 1 ⇒ 41 चुनना है तो विजयी उम्मीदवार को ⎜ ⎟़ वोटों4 ़ 15⎝⎠ की शरूरत पड़ेगी। जब मतगणना होती है तब उम्मीदवारों को प्राप्त ‘प्रथम वरीयता’ वोट गिना जाता है। प्रथम वरीयता वोटों की गणना के बाद, यदि प्रत्याश्िायों की वांछित संख्या वोटों का कोटा नहीं प्राप्त कर पाती तो पुनः मतगणना की जाती है। ऐसे उस प्रत्याशी को मतगणना से निकाल दिया जाता है जिसे प्रथम वरीयता वाले सबसे कम वोट मिले हों। उसके वोटों को अन्य प्रत्याश्िायों में बाँट दिया जाता हैऋ ऐसा करने में प्रत्येक मत पत्रा पर अंकित द्वितीय वरीयता वाले प्रत्याशी को वह मत हस्तांतरित कर दिया जाता है। इस प्रिया को तब तक जारी रखा जाता है जब तक वांछित संख्या ;4द्ध के बराबर प्रत्याश्िायों को विजयी घोष्िात नहीं कर दिया जाता। भारत में ‘सवार्ध्िक वोट से जीत की’ प्रणाली क्यों स्वीकार की गइर्? इस प्रश्न के उत्तर का अनुमान लगाना बहुत कठिन नहीं है। यदि आपने ऊपर बाॅक्स में राज्य सभा के चुनाव प्रिया के बारे में पढ़ा होगा, तो आपकी समझ में आ गया होगा कि यह प्रिया कापफी जटिल है जो किसी छोटे देश में तो लागू हो सकती है पर उपमहाद्वीप जैसे विशाल देश भारत में नहीं। सवार्ध्िक वोट से जीत वाली व्यवस्था की सपफलता इसकी लोकपि्रयता का कारण है। उन सामान्य मतदाताओं के लिए जिन्हें राजनीति और चुनाव का विशेष ज्ञान नहीं है, इस पूरी चुनाव व्यवस्था को समझना अत्यंत सरल है। इसके अतिरिक्त चुनाव के समय मतदाताओं के पास स्पष्ट विकल्प होते हैं। शंकर, © चिल्डंªस बुक ट्रस्ट मतदाताओं को वोट करते समय किसी प्रत्याशी या दल को केवल स्वीकृति प्रदान करना होता है। राजनीति की वास्तविकता को ध्यान में रखकर मतदाता किसी प्रत्याशी को भी वरीयता दे सकता है और किसी दल को भी। वह चाहे तो इन दोनों में, मतदान के समय, संतुलन बनाने की कोश्िाश भी कर सकता है। यह प्रणाली मतदाताओं को केवल दलों में ही नहीं वरन् उम्मीदवारों में भी चयन का स्पष्ट विकल्प देती है। अन्य चुनावी व्यवस्थाओं में खासतौर से समानुपातिक प्रतिनिध्ित्व प्रणाली में, मतदाताओं को किसी एक दल को चुनने का विकल्प दिया जाता है लेकिन प्रत्याश्िायों का चयन पाटीर् द्वारा जारी की गयी सूची के अनुसार होता है। इस प्रकार, किसी क्षेत्रा विशेष का प्रतिनिध्ित्व करने वाला और उसके प्रति उत्तरदायी, कोइर् एक प्रतिनिध्ि नहीं होता। लेकिन सवार्ध्िक वोट से जीत वाली व्यवस्था पर आधरित निवार्चन क्षेत्रों में मतदाता जानते हैं कि उनका प्रतिनिध्ि कौन है और उसे उत्तरदायी ठहरा सकते हैं। इस काटूर्न में भीमकाय काँग्रेस के आगे विपक्ष एक बौने के रूप में दिखाया गया है। क्या यह हमारे निवार्चन प्रणाली का परिणाम था? लेकिन सबसे महत्त्वपूणर् बात यह है कि संविधन निमार्ता समझते थे कि समानुपातिक प्रतिनिध्ित्व प्रणाली पर आधरित चुनाव संसदीय प्रणाली में सरकार के स्थायित्व के लिए उपयुक्त नहीं हांेगे। अगले अध्याय में हम संसदीय प्रणाली की प्रकृति के बारे में पढ़ेंगे। इस व्यवस्था की माँग है कि कायर्पालिका को विधयिका में बहुमत प्राप्त हो। आप देखेंगे कि समानुपातिक प्रतिनिध्ित्व प्रणाली से स्पष्ट बहुमत मिलने में कठिनाइर् होगी क्योंकि मतों के प्रतिशत के अनुपात में विधयिका में सीटें बँट जायेंगी। सवार्ध्िक पाटीर् द्रमुक अन्नाद्रमुक 21.5 4 काँग्रेस 5.6 भाकपा 2.1 8 माकपा 1.7 1 टी एम सी 9.3 39 पी एम के 3.8 4 अन्य व स्वतंत्रा 13.9 5 मत से जीत वाली प्रणाली में अमूमन बड़े दलों या गठबंध्नों को बोनस के रूप में वुफछ अतिरिक्त सीटें मिल जाती हैं। ये सीटें उन्हें प्राप्त मतों के अनुपात से अध्िक होती हैं। अतः यह प्रणाली एक स्थायी सरकार बनाने का मागर् प्रशस्त कर संसदीय सरकार को सुचारू और प्रभावी ढंग से काम करने का अवसर देती है। अंत में, सवार्ध्ि क मत से जीत वाली प्रणाली एक निवार्चन क्षेत्रा में विभ्िान्न सामाजिक वगो± को एकजुट होकर चुनाव जीतने में मदद करती है। भारत जैसे विविध्ताओं वाले देश में, समानुपातिक प्रतिनिध्ित्व प्रणाली प्रत्येक समुदाय को अपनी एक राष्ट्रव्यापी पाटीर् बनाने को प्रेरित करेगी। संभवतः यह बात भी हमारे संविधन बनाने वालों के दिमाग में रही होगी। संविधन का अब तक का कामकाज संविधन - निमार्ताओं की अपेक्षाओं को प्रमाण्िात करता है। संविधन निमार्ताओं की उम्मीदों को संविधन की कायर्प्रणाली से प्राप्त अनुभव प्रमाण्िात करता है। सवार्ध्िक मत से जीत वाली प्रणाली आम मतदाता के लिए सरल और सुपरिचित सि( हुइर् है। इसने वेंफद्र और राज्यों में बड़े दलों को स्पष्ट बहुमत प्राप्त करने में मदद की है। इस प्रणाली ने उन दलों को भी हतोत्साहित किया है जो किसी एक जाति या समुदाय से ही अपने सभी वोट प्राप्त करते हैं। समान्यतः सवार्ध्िक मत से जीत वाली प्रणाली से द्विदलीय व्यवस्था उभरती है। इसका मतलब है कि सत्ता के लिए दो प्रमुख प्रतियोगी हैं और यही दोनों बारी - बारी से सत्ता प्राप्त करते हैं। नये दलों या किसी तीसरी पाटीर् को इस प्रतियोगिता में सम्िमलित होने और सत्ता प्राप्त करने में कठिनाइर् होती है। इस संदभर् में भारत में इस प्रणाली का अनुभव वुफछ अलग है। स्वतंत्राता के बाद, यद्यपि हमने सवार्ध्िक मत से जीत वाली प्रणाली अपनायी, पिफर भी एक दल का वचर्स्व उभर कर सामने आया इसके साथ - साथ अनेक छोटे दल भी अस्ितत्व में रहे। 1989 के बाद, भारत में बहुदलीय - गठबंध्नों की कायर्प्रणाली को देखा जा सकता है। इसी के साथ, अनेक राज्यों में ध्ीरे - ध्ीरे द्वि - दलीय प्रतियोगिता उभर रही है। लेकिन भारतीय दलीय प्रणाली की प्रमुख विशेषता यह है कि गठबंध्न सरकारों के आने से नये और छोटे दलों को सवार्ध्िक मत से जीत वाली प्रणाली के बावजूद चुनावी प्रतियोगिता में प्रवेश करने का मौका मिला है। निवार्चन क्षेत्रों का आरक्षण हमने पहले पढ़ा कि सवार्ध्िक मत से जीत वाली प्रणाली में किसी निवार्चन क्षेत्रा में जिस किसी उम्मीदवार को सबसे अध्िक वोट मिल जाता है उसे ही चुना हुआ घोष्िात कर दिया जाता है। इससे छोटे - छोटे सामाजिक समूहों का अहित हो जाता है। यह भारतीय सामाजिक परिवेश में और अध्िक महत्त्वपूणर् है। हमारे यहाँ जाति आधरित भेदभाव का इतिहास रहा है। ऐसी सामाजिक व्यवस्था में, सवार्ध्िक मत से जीत वाली प्रणाली का परिणाम यह होगा कि दबंग सामाजिक समूह और जातियाँ हर जगह जीत जायेंगी और दलित - उत्पीडि़त सामाजिक समूहों को कोइर् प्रतिनिध्ित्व प्राप्त नहीं हो पायेगा। हमारे संविधन निमार्ता इस कठिनाइर् से वाकिप़फ थे और ऐसे दलित - उत्पीडि़त सामाजिक समूहों के लिए उचित और न्यायपूणर् प्रतिनिध्ित्व सुनिश्िचत करने की आवश्यकता समझते थे। पृथक निवार्चन मंडल की व्यवस्था भारत के लिए अभ्िाशाप रही है, इसने देश की अपूरणीय क्षति की है। पृथक निवार्चन मंडल ने हमारी प्रगति को रोक दिया है। ...हम ;मुसलमानद्ध राष्ट्र में मिल जाना चाहते हैं खुदा के वास्ते मुस्िलम समुदाय के लिए किसी प्रकार के आरक्षण पर विचार न करें ..तजम्मुल हुसैन संविधन सभा के वाद - विवाद, खंड टप्प्प्, पृष्ठ 333, 26 मइर् 1949 भारत का संविधन - सि(ांत और व्यवहार स्वतंत्राता के पूवर् भी इस विषय पर बहस हुइर् थी और बि्रटिश सरकार ने ‘पृथक - निवार्चन मंडल’ की शुरूआत की थी। इसका अथर् यह था कि किसी समुदाय के प्रतिनिध्ि के चुनाव में केवल उसी समुदाय के लोग वोट डाल सवेंफगे। संविधन सभा के अनेक सदस्यों को इस पर शंका थी। उनका विचार था कि यह व्यवस्था हमारे उद्देश्यों को पूरा नहीं करेगी। इसलिए, आरक्ष्िात निवार्चन क्षेत्रों की व्यवस्था को अपनाया गया। इस व्यवस्था के अंतगर्त, किसी निवार्चन क्षेत्रा में सभी मतदाता वोट तो डालेंगे लेकिन प्रत्याशी केवल उसी समुदाय या सामाजिक वगर् का होगा जिसके लिए वह सीट आरक्ष्िात है। अनेक ऐसे सामाजिक समूह हैं जो पूरे देश में पैफले हुए हैं। किसी एक निवार्चन क्षेत्रा में उनकी इतनी संख्या नहीं होती कि वे किसी प्रत्याशी की जीत को प्रभावित कर सवेंफ। लेकिन पूरे देश पर नशर डालने पर वे अच्छे खासे बड़े समूह के रूप में दिखाइर् देते हैं। उन्हें समुचित प्रतिनिध्ित्व देने के लिए आरक्षण की व्यवस्था शरूरी हो जाती है। संविधन अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए लोक सभा और राज्य की विधन सभाओं में आरक्षण की व्यवस्था करता है। प्रारंभ में यह व्यवस्था 10 वषर् के लिए की गइर् थी पर अनेक संवैधनिक संशोध्नों द्वारा इसे बढ़ा कर 2020 तक कर दिया गया है। आरक्षण की अवध्ि खत्म होने पर संसद इसे और आगे बढ़ाने का निणर्य ले सकती है। इन दोनों समूहों की आरक्ष्िात सीटों का वही अनुपात है जो भारत की जनसंख्या में इनका अनुपात है। लोकसभा की 543 निवार्चित सीटों में 84 अनुसूचित जाति और 47 अनुसूचित जनजाति ;1 सितंबर 2012 की स्िथतिद्ध के लिए आरक्ष्िात हैं। ...लेकिन मैं भारत के आदिवासियों की ओर से वुफछ कहना चाहता हूँ। बि्रटिश सरकार, प्रमुख राजनैतिक दलों और हर प्रबु( भारतीय नागरिक को ध्न्यवाद कि उनके ही कारण हमें अब तक ऐसे अलग - थलग करके रखा गया था। जैसे किसी को चिडि़याघर में रखा जाता है। ...हम आपके साथ घुलने - मिलने को तैयार हैं और इसी कारण ...हमने व्यवस्थापिकाओं में सीटों के आरक्षण की माँग पर शोर दिया है। हमने पृथक प्रतिनिध्ित्व की माँग नहीं की है। 1935 के अध्िनियम के अंतगर्त, पूरे भारत की सभी विधन सभाओं में 1585 में वुफल 24 विधयक आदिवासी थे, ...और वेंफद्र में तो एक भी नहीं था। जयपाल सिंह संविधन सभा के वाद - विवाद, खंड ट, पृष्ठ 226, 27 अगस्त 1947 कौन से निवार्चन क्षेत्रा आरक्ष्िात होंगे, यह कौन तय करता है? किस आधर पर यह निणर्य लिया जाता है? यह निणर्य एक स्वतंत्रा संस्था द्वारा लिया जाता है जिसे परिसीमन आयोग कहते हैं। राष्ट्रपति परिसीमन आयोग का गठन करते हैं। यह चुनाव आयोग के साथ मिल कर काम करता है। इसका गठन पूरे देश में निवार्चन क्षेत्रों की सीमा खींचने के उद्देश्य से किया जाता है। प्रत्येक राज्य में आरक्षण के लिए निवार्चन क्षेत्रों का एक कोटा होता है जो उस राज्य में अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति की संख्या के अनुपात में होता है। परिसीमन के बाद, परिसीमन आयोग प्रत्येक निवार्चन क्षेत्रा में जनसंख्या की संरचना देखता है। जिन निवार्चन क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या सबसे श्यादा होती है उसे उनके लिए आरक्ष्िात कर दिया जाता है। अनुसूचित जातियों के मामले में, परिसीमन आयोग दो बातों पर ध्यान देता है। आयोग उन निवार्चन क्षेत्रों को चुनता है जिसमें अनुसूचित जातियों का अनुपात श्यादा होता है। लेकिन वह इन निवार्चन क्षेत्रों को राज्य के विभ्िान्न भागों में पैफला भी देता है। ऐसा इसलिए कि अनुसूचित जातियों का पूरे देश में विखराव समरूप है। जब कभी भी परिसीमन का काम होता है, इन आरक्ष्िात निवार्चन क्षेत्रों में वुफछ परिवतर्न कर दिया जाता है। संविधन अन्य उपेक्ष्िात या कमशोर वगो± के लिए इस प्रकार के आरक्षण की कोइर् व्यवस्था नहीं करता। इध्र, लोकसभा और राज्यों की विधन सभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण की शोरदार माँग उठी है। यह देखते हुये कि प्रतिनिध्ि संस्थाओं में बहुत कम महिलाएँ चुनी जाती हैं, उनके लिए एक - तिहाइर् सीटें आरक्ष्िात करने की बात हो रही है। शहरी और ग्रामीण स्थानीय सरकारों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्ष्िात कर दी गइर् हैं। इसे हम स्थानीय सरकार वाले अध्याय में पढ़ेंगे। लोकसभा और विधन सभा में ऐसी ही व्यवस्था करने के लिए संविधन का संशोध्न करना पड़ेगा। इसके लिए लोकसभा में कइर् बार संशोध्न प्रस्ताव लाया गया, पर उसे पारित नहीं किया जा सका। स्वतंत्रा और निष्पक्ष चुनाव किसी भी चुनाव प्रणाली की कसौटी यह है कि वह एक स्वतंत्रा और निष्पक्ष चुनाव प्रिया सुनिश्िचत कर सके। यदि हम लोकतंत्रा को एक जमीनी हकीकत बनाना चाहते हैं, तो यह शरूरी है कि चुनाव प्रणाली निष्पक्ष और पारदशीर् हो। चुनाव प्रणाली ऐसी होनी चाहिये जिससे मतदाताओं की आकांक्षाएँ चुनाव परिणामों में न्यायपूणर् ढंग से व्यक्त हो सवेंफ। 1989 तक, 21 वषर् से ऊपर के भारतीय नागरिकों को वयस्क भारतीय माना जाता था। 1989 में संविधन के एक संशोध्न के द्वारा इसे घटा कर 18 वषर् कर दिया गया। वयस्क मताध्िकार सभी नागरिकों को अपने प्रतिनिध्ियों की चयन प्रिया में भाग लेने का अवसर प्रदान करता है। यह समानता और गैर - भेदभाव के सि(ांत के अनुरूप है, जिसका अध्ययन हमने अध्िकारों वाले अध्याय में किया है। अनेक लोग पहले और आज भी ऐसा मानते हैं कि बिना शैक्षण्िाक योग्यता के सभी को वोट देने का अध्िकार देना सही निणर्य नहीं था। लेकिन हमारे संविधन निमार्ताओं को सभी नागरिकों की योग्यता और महत्त्व में समान रूप से विश्वास था कि वे समाज, देश और अपने निवार्चन क्षेत्रा के हित में निणर्य ले सकते हैं। जो वोट देने के अध्िकार के बारे में सच है, वही चुनाव लड़ने के अध्िकार के बारे में भी सच है। सभी नागरिकों को चुनाव में खड़े होने और जनता का प्रतिनिध्ि होने का अध्िकार है। लेकिन विभ्िान्न पदों पर चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु अहर्ता भ्िान्न - भ्िान्न होती है। उदाहरण के लिए लोक सभा या विधन सभा चुनाव में खड़े होने के लिए उम्मीदवार को कम से कम 25 वषर् का होना चाहिए। वुफछ 21 अक्तूबर 1951 और भी प्रतिबंध् हैं। जैसे एक कानूनी सावर्भौमिक वयस्क मताध्िकार को हाथी के रूप में क्यों दिखायाप्रतिबंध् यह है कि यदि किसी व्यक्ित गया है। क्या यह संभालने योग्य नहीं है? या यह उस कहानी की तरह को किसी अपराध् के लिए दो या दो से है जिसमें कइर् अंध्े हाथी के अलग - अलग अंगों के आधर पर उसे अध्िक वषो± के लिए जेल हुइर् हो, तो बताने की कोश्िाश करते हैं? वह चुनाव लड़ने के योग्य नहीं है। लेकिन चुनाव लड़ने के लिए आय, श्िाक्षा, वगर् या लिंग के आधर पर कोइर् प्रतिबंध् नहीं है। इस रूप में, हमारी चुनाव व्यवस्था सभी नागरिकों के लिए खुली हुइर् है। भारत का संविधन - सि(ांत और व्यवहार स्वतंत्रा निवार्चन आयोग भारत में चुनाव प्रिया को स्वतंत्रा और निष्पक्ष बनाने के लिए कइर् प्रयास किए गए हैं। एक स्वतंत्रा निवार्चन आयोग की स्थापना इनमें सबसे महत्त्वपूणर् कदम है, जो चुनावों के संचालन और देख - रेख के लिए बनाया गया है। क्या आप जानते हैं कि अनेक देशों में चुनाव कराने के लिए किसी स्वतंत्रा मशीनरी का अभाव है। अनुच्छेद 324;1द्ध - ‘‘इस संविधन के अध्ीन संसद और प्रत्येक राज्य के विधन मंडल के लिए कराये जाने वाले सभी निवार्चनों के लिए तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के निवार्चनों के लिए निवार्चक नामावली तैयार कराने का और उन सभी निवार्चनों के संचालन का अध्ीक्षण, निदेर्शन और नियंत्राण एक आयोग में निहित होगा ;जिसे इस संविधन में निवार्चन आयोग कहा गया हैद्ध।’’ भारतीय संविधन का अनुच्छेद 324 ‘निवार्चनों के लिए मतदाता सूची तैयार कराने और चुनाव के संचालन का अध्ीक्षण, निदेर्शन और नियंत्राण’ का अध्िकार एक स्वतंत्रा निवार्चन आयोग को देता है। संविधन के ये शब्द बहुत ही महत्त्वपूणर् हैं क्योंकि ये निवार्चन आयोग को चुनावों से संबंध्ित हर बात पर अंतिम निणर्य करने की भूमिका सौंपते हैं। सवोर्च्च न्यायालय ने भी संविधन की इस व्याख्या से सहमति व्यक्त की है। भारत के निवार्चन आयोग की सहायता करने के लिए प्रत्येक राज्य में एक मुख्य निवार्चन अध्िकारी होता है। निवार्चन आयोग स्थानीय निकायों के चुनाव के लिए िाम्मेदार नहीं होता। जैसा कि हम स्थानीय सरकारों वाले अध्याय में पढ़ेगे, इसके लिए राज्यों में राज्य निवार्चन आयुक्त होते हैं, जो निवार्चन आयोग से अलग कायर् करते हैं और इनमें से प्रत्येक का काम करने का अपना अलग दायरा है। भारत का निवार्चन आयोग एक सदस्यीय या बहु - सदस्यीय भी हो सकता है। 1989 तक, निवार्चन आयोग एक - सदस्यीय था। 1989 के आम चुनावों के ठीक पहले, दो अन्य निवार्चन आयुक्तों को नियुक्त कर इसे बहु - सदस्यीय बना दिया गया। चुनावों के बाद उसे पिफर एक सदस्यीय बना दिया गया। 1993 में पुनः दो निवार्चन आयुक्तों की नियुक्ित हुइर् और निवार्चन आयोग बहु - सदस्यीय हो गयाऋ तब से यह बहु - सदस्यीय बना हुआ है। शुरू में बहु - सदस्यीय निवार्चन आयोग को लेकर तरह - तरह की शंकाएँ थीं। मुख्य निवार्चन आयुक्त और अन्य आयुक्तों के बीच इस बात पर घोर मतभेद था कि किसको कितनी शक्ित प्राप्त है। इसका समाधान सवोर्च्च न्यायालय को करना पड़ा। अब इस बात पर सामान्य सहमति है कि बहु - सदस्यीय निवार्चन आयोग श्यादा उपयुक्त है क्योंकि इससे आयोग की शक्ितयों में साझेदारी हो गइर् है और आयोग पहले से कहीं श्यादा जवाबदेह बन गया है। मुख्य निवार्चन आयुक्त निवार्चन आयोग की अध्यक्षता करता है, लेकिन अन्य दोनों निवार्चन आयुक्तों की तुलना में उसे श्यादा शक्ितयाँ प्राप्त नहीं हैं। एक सामूहिक संस्था के रूप में चुनाव संबंध्ी सभी निणर्य में मुख्य निवार्चन आयुक्त और अन्य दोनों निवार्चन आयुक्तों की शक्ितयाँ समान हैं। उनकी नियुक्ित राष्ट्रपति द्वारा मंत्रिा परिषद् के परामशर् पर की जाती है। ऐसे में संभव है कि सरकार के द्वारा किसी ऐसे हितैषी की नियुक्ित निवार्चन आयोग में कर दी जाए जो चुनावों में सरकार का समथर्न करे। इस शंका के चलते अनेक लोगों ने इस प्रिया को बदलने का सुझाव दिया है। उनका सुझाव है कि इसके लिए एक भ्िान्न प्रिया का पालन किया जाना चाहिये, जिसमें मुख्य निवार्चन आयुक्तों की नियुक्ित में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाध्ीश से परामशर् करना शरूरी होना चाहिए। संविधन मुख्य निवार्चन आयुक्त और निवार्चन आयुक्तों के कायर्काल की सुरक्षा देता है। उन्हें 6 वषो± के लिए अथवा 65 वषर् की आयु तक ;जो पहले खत्म होद्ध के लिए नियुक्त किया जाता है। मुख्य निवार्चन आज्ञा देता है?आयुक्त को कायर्काल समाप्त होने के पूवर् राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता हैऋ पर इसके लिए संसद के दोनों सदनों को विशेष बहुमत से विशेष बहुमत विशेष बहुमत का अथर् है - ऽ उपस्िथत और मतदान करने वाले सदस्यों का दो - तिहाइर् बहुमतऋ और ऽ सदन की वुफल सदस्य संख्या का साधरण बहुमत मान लीजिए कि आपको अपनी कक्षा में विशेष बहुमत से एक प्रस्ताव पास करना है। कल्पना करें कि आप की कक्षा में 75 विद्याथीर् हैं। लेकिन मतदान के दिन केवल 51 विद्याथीर् उपस्िथत हैं और उनमें केवल 50 ने ही मतदान में भाग लिया। इस परिस्िथति में आप कब कह सवेंफगे कि प्रस्ताव ‘विशेष बहुमत’ से पास हो गया है? इस पुस्तक के कम से कम तीन अध्यायों में आपको ‘विशेष बहुमत’ का उल्लेख मिलेगा। एक तो कायर्पालिका से संबंध्ित अगले ही अध्याय में है जहाँ राष्ट्रपति पर महाभ्िायोग का उल्लेख किया गया है। अन्य उन दो स्थानों को ढूढ़ेँं जहाँ पर विशेष बहुमत की चचार् की गइर् है। भारत का संविधन - सि(ांत और व्यवहार पारित कर इस आशय का एक प्रतिवेदन राष्ट्रपति को भेजना होगा। ऐसा यह सुनिश्िचत करने के लिए किया गया है कि कोइर् भी सरकार उस मुख्य निवार्चन आयुक्त को न हटा सके जो चुनावों में उसकी तरपफदारी करने से मना करे। निवार्चन आयुक्तों को भारत का राष्ट्रपति हटा सकता है। भारत के निवार्चन आयोग के पास कापफी सारे काम हैं। ऽ वह मतदाता सूचियों को नया करने के काम की देख - रेख करता है। पूरा प्रयास करता है कि मतदाता सूचियों में गलतियाँ न हो अथार्त् पंजीकृत मतदाताओं के नाम न छूट जाएँ और न ही उसमें ऐसे लागों के नाम हों जो मतदान के अयोग्य हों या जीवित ही न हों। ऽ वह चुनाव का समय और चुनावों का पूरा कायर्क्रम तय करता है। इस कायर्क्रम में निम्न बातों का उल्लेख होता है - चुनाव की अध्िघोषणा, नामांकन प्रिया शुरू करने की तिथ्िा, मतदान की तिथ्िा, मतगणना की तिथ्िा और चुनाव परिणामों की घोषणा। ऽ इस पूरी प्रिया में, निवार्चन आयोग को स्वतंत्रा और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए निणर्य लेने का अध्िकार है। वह पूरे देश, किसी राज्य या किसी निवार्चन क्षेत्रा में चुनावों को इस आधर पर स्थगित या रद्द कर सकता है कि वहाँ मावूफल माहौल नहीं है तथा स्वतंत्रा और निष्पक्ष चुनाव कराना संभव नहीं है। निवार्चन आयोग राजनीतिक दलों और उनके उम्मीदवारों के लिए एक आदशर् आचार संहिता लागू करता है। वह किसी भी निवार्चन क्षेत्रा में दोबारा चुनाव कराने की आज्ञा दे सकता है। यदि उसे लगे कि मतगणना प्रिया पूरी तरह से उचित और न्यायपूणर् नहीं थी तो वह वह दोबारा मतगणना कराने की भी आज्ञा दे सकता है। ऽ निवार्चन आयोग राजनीतिक दलों को मान्यता देता है और उन्हें चुनाव चिह्न आबंटित करता है। निवार्चन आयोग के पास बहुत ही सीमित कमर्चारी होते हैं। वह प्रशासनिक मशीनरी की मदद से चुनाव कराता है। लेकिन एक बार चुनाव प्रिया शुरू हो जाने पर चुनाव संबंध्ी कायो± के संबंध् में आयेाग का पूरी प्रशासनिक मशीनरी पर नियंत्राण हो जाता है। चुनाव प्रिया के दौरान राज्य और वेंफद्र सरकार के प्रशासनिक अध्िकारियों को चुनाव संबंध्ी कायर् दिये जाते हैंऋ और इस संबंध् में निवार्चन आयोग का उन पर पूरा नियंत्राण होता है। निवार्चन आयोग इन अध्िकारियों का तबादला कर सकता है या उनके तबादले को रोक सकता हैऋ अध्िकारी निष्पक्ष ढंग से काम करने में विपफल रहे तो आयोग उसके विरु( कारर्वाइर् भी कर सकता है। विगत वषो± में, निवार्चन आयोग एक स्वतंत्रा सत्ता के रूप में उभरा है जिसने चुनाव प्रिया की निष्पक्षता सुनिश्िचत करने के लिए अपनी शक्ितयों का प्रयोग किया है। उसने चुनाव प्रिया की गरिमा बनाये रखने के लिए निष्पक्ष और न्यायपूणर् ढंग से काम किया है। निवार्चन आयोग का इतिहास इस बात का गवाह है कि संस्थाओं की कायर्प्रणाली में प्रत्येक सुधर के लिए कानूनी या संवैधनिक परिवतर्न आवश्यक नहीं। यह आम धरणा है कि 20 वषर् पहले के मुकाबले आज निवार्चन आयोग श्यादा स्वतंत्रा और प्रभावी है। ऐसा इसलिए नहीं कि निवार्चन आयोग की शक्ितयाँ या उसकी संवैधनिक सुरक्षा बढ़ा दी गइर् है। दरअसल निवार्चन आयोग ने केवल उन शक्ितयों का और प्रभावशाली ढंग से प्रयोग करना शुरू कर दिया है जो उसे संविधन में पहले से ही प्राप्त थीं। पिछले पचपन वषो± में लोकसभा के चैदह चुनाव हो चुके हैं। निवार्चन आयोग के द्वारा विधन सभाओं के अनेक चुनाव और उप - चुनाव कराये गये। निवार्चन आयोग को असम, पंजाब तथा जम्मू और कश्मीर जैसे हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में चुनाव कराने में अनेक कठिन परिस्िथतियों का सामना करना पड़ा है। उसे 1991 में पूरी चुनाव प्रिया को बीच में ही रोकना पड़ा क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान 2002 में पूवर् प्रधनमंत्राी राजीव गांध्ी की हत्या कर दी गइर्। निवार्चन आयोग को एक अन्य गंभीर समस्या का सामना करना पड़ा जब गुजरात विधन सभा भंग कर दी गइर् और चुनाव कराना पड़ा। लेकिन निवार्चन आयोग ने पाया कि राज्य में अप्रत्याश्िात हिंसा के कारण स्वतंत्रा और निष्पक्ष चुनाव कराना तुरंत संभव न था। निवार्चन आयोग ने राज्य में विधन सभा चुनावों को वुफछ महीनों के लिए नेताजी चुनाव आयोग से डर गये हैं, वे कह रहे हैं कि हमें ‘निष्पक्ष स्थगित करने का निणर्य लिया। सवोर्च्च और स्वतंत्रा चुनाव’ की चुनौती झेलनी है। नेता चुनाव आयोग से डरते न्यायालय ने निवार्चन आयोग के इस निणर्य क्यों हैं? क्या यह स्िथति लोकतंत्रा के लिए अच्छी है? को वैध् ठहराया। ऽ संसद और विधन सभाओं में एक तिहाइर् सीटों पर महिलाओं को चुनने के लिए विशेष प्रावधन बनाये जाएँ। ऽ चुनावी राजनीति में ध्न के प्रभाव को नियंत्रिात करने के लिए और अध्िक कठोर प्रावधन होने चाहिये। सरकार को एक विशेष निध्ि से चुनावी खचो± का भुगतान करना चाहिये। ऽ जिस उम्मीदवार के विरु( पफौशदारी का मुकदमा हो उसे चुनाव लड़ने से रोक दिया जाना चाहिये, भले ही उसने इसके विरु( न्यायालय में अपील कर रखी हो। ऽ चुनाव - प्रचार में जाति और ध्मर् के आधर पर की जाने वाली किसी भी अपील को पूरी तरह से प्रतिबंध्ित कर देना चाहिये। ऽ राजनीतिक दलों की कायर् प्रणाली को नियंत्रिात करने के लिए तथा उनकी कायर्विध्ि को और अिाक पारदशीर् तथा लोकतांत्रिाक बनाने के लिए एक कानून होना चाहिये। ये वुफछ सीमित सुझाव हैं। इन सुझावों पर कोइर् आम राय नहीं है। लेकिन यदि उन पर आम राय बन भी जाये तो भी कानून और औपचारिक प्रावधन एक सीमा तक ही कारगर हो सकते हैं। वास्तव में स्वतंत्रा और निष्पक्ष चुनाव तभी हो सकते हैं जब सभी उम्मीदवार, राजनीतिक दल और वे सभी लोग जो चुनाव प्रिया में भाग लेते हैं - लोकतांत्रिाक प्रतिस्पधर् की भावना का क्या गंभीर अपराध् में संलिप्त अपराध्ी के चुनाव लड़ने पर सम्मान करें। प्रतिबंध् होना चाहिए? कानूनी सुधरों के अतिरिक्त, दो और तरीके हैं जिनसे यह सुनिश्िचत किया जा सकता है कि चुनाव जनता की अपेक्षाओं और लोकतांत्रिाक आकांक्षाओं को व्यक्त करे। पहला तो यह कि जनता को स्वयं ही और अध्िक सतवर्फ रहना चाहिये तथा राजनीतिक कायो± में और सियता से भाग लेना भारत का संविधन - सि(ांत और व्यवहार चाहिये। लेकिन आम आदमी के लिए नियमित रूप से राजनीति में भाग लेने की अपनी सीमाएँ हैं। इसलिए, यह शरूरी है कि अनेक राजनीतिक संस्थाओं और राजनीतिक संगठनों का विकास किया जाय जो स्वतंत्रा और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्िचत कराने के लिए पहरेदारी करें। निष्कषर् जिन देशों में प्रतिनिध्ित्व वाला लोकतंत्रा है वहाँ चुनाव और चुनाव का प्रतिनिध्ित्व वाला स्वरूप लोकतंत्रा को प्रभावी और विश्वसनीय बनाने में निणार्यक भूमिका निभाता है। भारत में चुनाव व्यवस्था की सपफलता अनेक आधरों पर मापी जा सकती है। ऽ एक, हमारी चुनाव व्यवस्था ने मतदाताओं को न केवल अपने प्रतिनिध्ियों को चुनने की स्वतंत्राता दी है, बल्िक उन्हें वेंफद्र और राज्यों में शांतिपूणर् ढंग से सरकारों को बदलने का अवसर भी दिया है। ऽ दो, मतदाताओं ने चुनाव प्रिया में लगातार रुचि ली है और उसमें भाग लिया है। चुनावों में भाग लेने वाले उम्मीदवारों और दलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऽ तीन, चुनाव व्यवस्था में सभी को स्थान मिला है और यह सभी को साथ लेकर चली है। हमारे प्रतिनिध्ियों की सामाजिक पृष्ठभूमि भी ध्ीरे - ध्ीरे बदली है। अब हमारे प्रतिनिध्ि विभ्िान्न सामाजिक वगो± से आते हैं, यद्यपि इनमें अभी महिलाओं की संख्या में संतोषजनक वृि नहीं हुइर् है। ऽ चार, देश के अध्िकतर भागों में चुनाव परिणाम चुनावी अनियमितताओं और धँध्ली से प्रभावित नहीं होते यद्यपि चुनाव में धँध्ली करने के अनेक प्रयास किये जाते हैं। आपने चुनावों में हिंसा, मतदाता सूचियों से वोटरों के नाम गायब होने की श्िाकायतें, डराये - ध्मकाए जाने आदि की श्िाकायतें अकसर सुनी होंगी। पिफर भी, ऐसी घटनाओं से शायद ही कोइर् चुनाव परिणाम प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होता हो। ऽ अंतिम और सबसे महत्त्वपूणर् बात यह है कि चुनाव हमारे लोकतांत्रिाक जीवन के अभ्िान्न अंग हो गये हैं। कोइर् इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकता कि कभी कोइर् सरकार चुनावों में जनादेश का उल्लंघन भी करेगी। इसी तरह, कोइर् यह भी कल्पना नहीं कर सकता कि बिना चुनावों के कोइर् सरकार बन सकेगी। वास्तव में, भारत में निश्िचत अंतराल पर होने वाले नियमित चुनावों को एक महान लोकतांत्रिाक प्रयोग के रूप में ख्याति मिली है। ऽ इन सभी बातों से हमारी चुनाव व्यवस्था को देश - विदेश में आदर से देखा जाता है। भारत में मतदाता के अंदर आत्मविश्वास बढ़ा है। मतदाताओं की निगाह में निवार्चन आयोग का कद बढ़ा है। यह हमारे संविधन निमार्ताओं के मूल निणर्यों को उचित ठहराता है। यदि चुनाव प्रिया को वुफछ और दोषरहित बनाया जा सके तो हम मतदाता और नागरिक के रूप में लोकतंत्रा के इस महोत्सव का और अच्छी तरह आनंद उठा सवेंफगे तथा इसे और अथर्पूणर् बना सवेंफगे। प्रश्नावली 1 निम्नलिख्िात में कौन प्रत्यक्ष लोकतंत्रा के सबसे नजदीक बैठता है? ;कद्ध परिवार की बैठक में होने वाली चचार् ;खद्ध कक्षा - संचालक ;क्लास - माॅनीटरद्ध का चुनाव ;गद्ध किसी राजनीतिक दल द्वारा अपने उम्मीदवार का चयन ;घद्ध मीडिया द्वारा करवाये गये जनमत - संग्रह 2 इनमें कौन - सा कायर् चुनाव आयोग नहीं करता? ;कद्ध मतदाता - सूची तैयार करना ;खद्ध उम्मीदवारों का नामांकन ;गद्ध मतदान - केंद्रों की स्थापना ;घद्ध आचार - संहिता लागू करना ;डद्ध पंचायत के चुनावों का पयर्वेक्षण 3 निम्नलिख्िात में कौन - सी राज्य सभा और लोक सभा के सदस्यों के चुनाव की प्रणाली में समान है? ;कद्ध 18 वषर् से श्यादा की उम्र का हर नागरिक मतदान करने के योग्य है। ;खद्ध विभ्िान्न प्रत्याश्िायों के बारे में मतदाता अपनी पसंद को वरीयता क्रम में रख सकता है। भारत का संविधन - सि(ांत और व्यवहार ;गद्ध ;घद्ध प्रत्येक मत का समान मूल्य होता है विजयी उम्मीदवार को आध्े से अध्िक मत प्राप्त होने चाहिए। 4 पफस्टर् पास्ट द पोस्ट प्रणाली में वही प्रत्याशी विजेता घोष्िात किया जाता है जो - ;कद्ध सवार्ध्िक संख्या में मत अजिर्त करता है। ;खद्ध देश में सवार्ध्िक मत प्राप्त करने वाले दल का सदस्य हो। ;गद्ध चुनाव - क्षेत्रा के अन्य उम्मीदवारों से श्यादा मत हासिल करता है। ;घद्ध 50 प्रतिशत से अध्िक मत हासिल करके प्रथम स्थान पर आता है। 5 पृथक निवार्चन - मंडल और आरक्ष्िात चुनाव - क्षेत्रा के बीच क्या अंतर है? संविधन निमार्ताओं ने पृथक निवार्चन - मंडल को क्यों स्वीकार नहीं किया? 6 निम्नलिख्िात में कौन - सा कथन गलत है? इसकी पहचान करें और किसी एक शब्द अथवा पद को बदलकर, जोड़कर अथवा नये क्रम में सजाकर इसे सही करें। ;कद्ध एक पफस्टर् - पास्ट - द - पोस्ट प्रणाली ;‘सबसे आगे वाला जीते प्रणाली’द्ध का पालन भारत के हर चुनाव में होता है। ;खद्ध चुनाव आयोग पंचायत और नगरपालिका के चुनावों का पयर्वेक्षण नहीं करता। ;गद्ध भारत का राष्ट्रपति किसी चुनाव आयुक्त को नहीं हटा सकता। ;घद्ध चुनाव आयोग में एक से श्यादा चुनाव आयुक्त की नियुक्ित अनिवायर् है। 7 भारत की चुनाव - प्रणाली का लक्ष्य समाज के कमशोर तबके की नुमाइंदगी को सुनिश्िचत करना है। लेकिन अभी तक हमारी विधयिका में महिला सदस्यों की संख्या 10 प्रतिशत तक भी नहीं पहँुचती। इस स्िथति में सुधर के लिए आप क्या उपाय सुझायेंगे? 8 एक नये देश के संविधन के बारे में आयोजित किसी संगोष्ठी में वक्ताओं ने निम्नलिख्िात आशाएँ जतायीं। प्रत्येक कथन के बारे में बतायें कि उनके लिए पफस्टर् - पास्ट - द - पोस्ट ;सवार्ध्िक मत से जीत वाली प्रणालीद्ध उचित होगी या समानुपातिक प्रतिनिध्ित्व वाली प्रणाली? ;कद्ध लोगों को इस बात की सापफ - सापफ जानकारी होनी चाहिए कि उनका प्रतिनिध्ि कौन है ताकि वे उसे निजी तौर पर जिम्मेदार ठहरा सवेंफ। ;खद्ध हमारे देश में भाषाइर् रूप से अल्पसंख्यक छोटे - छोटे समुदाय हंै और देश भर में पैफले हैं, हमें इनकी ठीक - ठीक नुमाइंदगी को सुनिश्िचत करना चाहिए। ;गद्ध विभ्िान्न दलों के बीच सीट और वोट को लेकर कोइर् विसंगति नहीं रखनी चाहिए। ;घद्ध लोग किसी अच्छे प्रत्याशी को चुनने में समथर् होने चाहिए भले ही वे उसके राजनीतिक दल को पसंद न करते हों। 9.एक भूतपूवर् मुख्य चुनाव आयुक्त ने एक राजनीतिक दल का सदस्य बनकर चुनाव लड़ा। इस मसले पर कइर् विचार सामने आये। एक विचार यह था कि भूतपूवर् मुख्य चुनाव आयुक्त एक स्वतंत्रा नागरिक है। उसे किसी राजनीतिक दल में होने और चुनाव लड़ने का अध्िकार है। दूसरे विचार के अनुसार, ऐसे विकल्प की संभावना कायम रखने से चुनाव आयोग की निष्पक्षता प्रभावित होगी। इस कारण, भूतपूवर् मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। आप इसमें किस पक्ष से सहमत हैं और क्यों? 10.भारत का लोकतंत्रा अब अनगढ़ ‘पफस्टर् पास्ट द पोस्ट’ प्रणाली को छोड़कर समानुपातिक प्रतिनिध्यात्मक प्रणाली को अपनाने के लिए तैयार हो चुका है’ क्या आप इस कथन से सहमत हैं? इस कथन के पक्ष अथवा विपक्ष में तवर्फ दें।

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