अध्याय दो भारतीय संविधन में अध्िकार परिचय संविधन हमें केवल सरकार के विभ्िान्न अंगों की संरचना और उनके परस्पर अंतस±बंधें के बारे में ही नहीं बताता, जैसा कि हमने पिछले अध्याय में पढ़ा, संविधन वह दस्तावेश है जो सरकार की शक्ितयों पर अंवुफश रख कर एक ऐसी प्रजातांत्रिाक व्यवस्था की स्थापना करता है जिसमें सभी व्यक्ितयों को वुफछ अध्िकार प्राप्त होते हैं। इस अध्याय में हम भारतीय संविधान में निहित मौलिक अध्िकारों का अध्ययन करेंगे। संविधन के तीसरे भाग में मौलिक अध्िकारों का वणर्न किया गया हैऋ उसमें प्रत्येक मौलिक अध्िकार के प्रयोग की सीमा का भी उल्लेख है। बीते हुए 50 वषो± में अध्िकारों का स्वरूप परिवतिर्त भी हुआ है और वुफछ विस्तृत भी। इस अध्याय में आपको निम्न बातों का ज्ञान होगाः ऽ भारतीय संविधन कौन - कौन से मौलिक अध्िकार प्रदान करता हैऋ ऽ उन अध्िकारों को वैफसे सुरक्ष्िात किया जाता हैऋ ऽ उन अध्िकारों की व्याख्या व सुरक्षा करने में न्यायपालिका की क्या भूमिका रही हैऋ और ऽ मौलिक अध्िकारों तथा राज्य के नीति - निदेर्शक तत्त्वों में क्या अंतर है। अध्िकारों का महत्त्व 1982 के एश्िायाइर् खेलों से पहले निमार्ण कायर् के लिए सरकार ने वुफछ ठेकेदारों की सेवाएँ ली। अनेक फ्रलाइर्ओवरों और स्टेडियमों का निमार्ण करना था और इसके लिए ठेकेदारों ने देश के विभ्िान्न भागों से बड़ी संख्या में गरीब मिस्त्राी और मशदूरों की भतीर् की। लेकिन उनके काम करने की शते± खराब थी। उन्हें सरकार द्वारा निधर्रित न्यूनतम मशदूरी से भी कम मशदूरी दी गइर्। समाज वैज्ञानिकों की एक टीम ने उनकी स्िथति का अध्ययन कर सवोर्च्च न्यायालय में एक याचिका दायर की। उन्होंने दलील दी कि तय की गइर् न्यूनतम मशदूरी से कम मशदूरी देना ‘बेगार’ या ‘बंध्ुआ मशदूरी’ जैसा है और नागरिकों को प्राप्त ‘शोषण के विरु(’ मौलिक अध्िकार का उल्लंघन है। न्यायालय ने इस दलील को स्वीकार कर लिया और सरकार को निदेर्श दिया कि वह उन हशारों मशदूरों को उनके काम के लिए तय मशदूरी दिलाए। मचल लालुँग को जब गिरफ्ऱतार किया गया तब वह 23 वषर् का था। लालुँग असम के मडि़गाँव जिले के चुबुरी गाँव का रहने वाला था। उस पर आरोप था कि उसने किसी को गंभीर चोट पहुँचाइर्। मुकदमें की सुनवाइर् के दौरान उसे मानसिक रूप से कापफी अस्वस्थ पाया गया और चिकित्सा के लिए तेजपुर के ‘लोकपि्रय गोपीनाथ बोरदोलोइर् अस्पताल’ में एक वैफदी के रूप में भतीर् करा दिया गया। वहाँ उसका सपफलतापूवर्क इलाज किया गया। डाॅक्टरों ने जेल अध्िकारियों को दो बार ;1967, 1996द्ध चिट्ठी भेजी कि लालुँग स्वस्थ है और उस पर मुकदमा चलाया जा सकता है। लेकिन किसी ने भी उस पर ध्यान नहीं दिया। लालुँग न्यायिक हिरासत में बना रहा। मचल लालुँग को जुलाइर्, 2005 में जेल से छोड़ा गया। उस समय वह 77 वषर् का हो चुका था। इस प्रकार वह 54 वषर् तक हिरासत में रहा और इस दौरान उसके मुकदमें की एक बार भी सुनवाइर् नहीं हुइर्। जब राष्ट्रीय मानवाध्िकार आयोग द्वारा नियुक्त एक टीम ने राज्य में बंदियों का निरीक्षण किया तब जाकर लालुँग को स्वतंत्रा होने का अवसर मिला। मचल का पूरा जीवन ही व्यथर् बीत गया क्योंकि उसके मुकदमे की सुनवाइर् ही न हो सकी। हमारा संविधन सभी नागरिकों को ‘जीवन और स्वतंत्राता का अध्िकार’ देता है। इसका अथर् है कि हर नागरिक को अपने मुकदमें की निष्पक्ष और त्त्वरित सुनवाइर् का अध्िकार है। मचल लालुँग का मामला उस स्िथति का संकेत करता है जब संविधन द्वारा दिये गये अध्िकार व्यवहार में प्राप्त नहीं होते। हनन होता? इसी प्रकार पहले उदाहरण में भी संवैधनिक अध्िकारों का उल्लंघन दिखाइर् देता है। लेकिन उसे न्यायालय में चुनौती दी गइर्। इससे मशदूरों को उचित मशदूरी मिली जिसके वे हकदार थे। ‘शोषण के विरु( संवैधनिक अध्िकार’ के कारण उन मशदूरों को न्याय मिल सका। अध्िकारों का घोषणापत्रा उपयुर्क्त दोनों उदाहरणों से अध्िकारों और उन्हें लागू किये जाने का महत्त्व पता चलता है। इसलिये, अध्िकतर लोकतांत्रिाक देशों में नागरिकों के अध्िकारों को संविधन में सूचीब( कर दिया जाता है। प्रजातंत्रा में यह सुनिश्िचत होना चाहिए कि व्यक्ितयों को कौन - कौन से अध्िकार प्राप्त हैं जिन्हें सरकार सदैव मान्यता देगी। संविधन द्वारा प्रदान किये गये और संरक्ष्िात अध्िकारों की ऐसी सूची को ‘अध्िकारों का घोषणापत्रा’ कहते हैं। अतः अध्िकारों का घोषणापत्रा सरकार को नागरिकों के अध्िकारों के विरु( काम करने से रोकता है और उसका उल्लंघन हो जाने पर उपचार सुनिश्िचत करता है। संविधन नागरिकों के अध्िकारों को किससे संरक्ष्िात करता है? नागरिक के अध्िकारों को किसी अन्य व्यक्ित या निजी संगठन से खतरा हो सकता है। ऐसी स्िथति में व्यक्ित को सरकार द्वारा सुरक्षा प्रदान किये जाने की आवश्यकता होती है। यह शरूरी है कि सरकार व्यक्ित के अध्ि कारों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्रतिब( हो। इसके अतिरिक्त सरकार के विभ्िान्न अंग ;विधयिका, कायर्पालिका, नौकरशाही या न्यायपालिकाद्ध अपने कायो± के संपादन में व्यक्ित के अध्िकारों का हनन कर सकते हैं। भारतीय संविधन में मौलिक अध्िकार स्वतंत्राता संघषर् के दौरान, स्वतंत्राता आंदोलन के नेताओं ने इन अिाकारों का महत्त्व समझा था और माँग की थी कि अंगे्रश शासकों को जनता के अध्िकारों का आदर करना चाहिये। 1928 में ही ‘मोतीलाल नेहरू समिति’ ने ‘अध्िकारों के एक घोषणापत्रा’ की माँग उठाइर् थी। अतः यह स्वाभाविक था कि स्वतंत्राता के बाद संविधन निमार्ण के दौरान संविधन में अध्िकारों का समावेश करने व उन्हें सुरक्ष्िात करने पर सभी की राय एक थी। संविधन में उन अध्िकारों को सूचीब( किया गया जिन्हें सुरक्षा देनी थी और उन्हें ‘मौलिक अिाकारों’ की संज्ञा दी गइर्। जैसा कि नाम से स्पष्ट है ‘मौलिक अध्िकार’ अत्यंत महत्त्वपूणर् हैं और इसीलिए उन्हें संविधन में सूचीब( किया गया है और उनकी सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधन बनाये गये हैं। वे इतने महत्त्वपूणर् हैं कि संविधन स्वयं यह सुनिश्िचत करता है कि सरकार भी उनका उल्लंघन न कर सके। मौलिक अध्िकार हमारे अन्य अध्िकारों से भ्िान्न हैं। जहाँ साधरण कानूनी अध्िकारों को सुरक्षा देने और लागू करने के लिए साधरण कानूनों का सहारा लिया जाता है, वहीं मौलिक अध्िकारों की गारंटी और उनकी सुरक्षा स्वयं संविधन करता है। सामान्य अध्िकारों को संसद कानून बना कर परिवतिर्त कर सकती है लेकिन मौलिक अध्िकारों में परिवर्तन के लिए संविधन में संशोध्न करना पड़ता है। इसके अलावा सरकार का कोइर् भी अंग मौलिक अध्िकारों के विरु( कोइर् कायर् नहीं कर सकता। इस अध्याय में हम आगे पढ़ेंगे कि सरकार के कायो± से मौलिक अध्िकारों के हनन को दक्ष्िाण अप्रफीका के संविधन में अध्िकारों का घोषणापत्रा दक्ष्िाण अप्रफीका का संविधन दिसंबर 1996 में लागू हुआ। इसे तब बनाया और लागू किया गया जब रंगभेद वाली सरकार के हटने के बाद दक्ष्िाण अप्रफीका गृहयु( के खतरे से जूझ रहा था। दक्ष्िाण अप्रफीका के संविधन के अनुसार ‘‘उसके अध्िकारों का घोषणापत्रा दक्ष्िाण अप्रफीका में प्रजातंत्रा की आधरश्िाला है।’’ यह नस्ल, लिंग, गभर्धरण, वैवाहिक स्िथति, जातीय या सामाजिक मूल, रंग, आयु, अपंगता, ध्मर्, अंतरात्मा, आस्था, संस्कृति, भाषा और जन्म के आधर पर भेदभाव वजिर्त करता है। यह नागरिकों को संभवतः सबसे ज्यादा व्यापक अध्िकार देता है। संवैधनिक अध्िकारों को एक विशेष संवैधनिक न्यायालय लागू करता है। दक्ष्िाण अप्रफीका के संविधन में सम्िमलित वुफछ प्रमुख अध्िकार निम्न हैं - ऽ गरिमा का अध्िकार ऽ निजता का अध्िकार ऽ श्रम - संबंध्ी समुचित व्यवहार का अध्िकार ऽ स्वस्थ पयार्वरण और पयार्वरण संरक्षण का अध्िकार ऽ समुचित आवास का अध्िकार ऽ स्वास्थ्य सुविधएँ, भोजन, पानी और सामाजिक सुरक्षा का अध्िकार ऽ बाल - अध्िकार ऽ बुनियादी और उच्च श्िाक्षा का अध्िकार ऽ सांस्कृतिक, धमिर्क और भाषाइर् समुदायों का अध्िकार ऽ सूचना प्राप्त करने का अध्िकार ये भेदभाव के स्पष्ट उदाहरण हैं। एक में जाति व दूसरे में लिंग के आधर पर भेदभाव किया गया। आपकी राय में क्या ऐसा भेदभाव उचित है?‘समता का अध्िकार’ ऐसे और अन्य प्रकार के भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास करता है। यह सावर्जनिक स्थलों - जैसे दुकान, होटल, मनोरंजन - स्थल, वुफआँ, स्नान - घाट और पूजा - स्थलों में समानता के आधर पर प्रवेश देता है। केवल ध्मर्, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म - स्थान या इनमें से किसी के आधर पर प्रवेश में कोइर् भेदभाव नहीं हो सकता। यह उपयुर्क्त आधरों पर लोक सेवाओं में भी कोइर् भेदभाव वजिर्त करता है। यह अध्िकार बहुत महत्त्वपूणर् है क्योंकि पहले हमारे समाज में समानता के आधर पर प्रवेश नहीं दिया जाता था। छुआछूत की प्रथा असमानता का सबसे भद्दा रूप है। ‘समता के अध्िकार’ के द्वारा इसे समाप्त कर दिया गया। उसी अध्िकार के अंतगर्त यह भी व्यवस्था की गइर् है कि केवल उन लोगों को छोड़कर जिन्होंने सेना या श्िाक्षा के क्षेत्रा में गौरवपूणर् उपलब्िध् प्राप्त की है राज्य किसी भी व्यक्ित को कोइर् उपाध्ि प्रदान नहीं करेगा। इस प्रकार समता का अध्िकार भारत को एक सच्चे लोकतंत्रा के रूप में स्थापित करने का प्रयास करता है जिसमें सभी नागरिकों को समान प्रतिष्ठा व गरिमा प्राप्त हो सके। क्या आपने अपने संविधन की प्रस्तावना पढ़ी है? यह समानता अनुच्छेद 16 ;4द्ध - ‘‘इस अनुच्छेद की कोइर् बात राज्य को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वगर् के पक्ष में, जिनका प्रतिनिध्ित्त्व राज्य की राय में राज्य के अध्ीन सेवाओं में पयार्प्त नहीं है, नियुक्ितयों या पदों के आरक्षण का प्रावधन करने से नहीं रोकेगी’’ को वैफसे परिभाष्िात करता है? आप पाएँगे कि प्रस्तावना में समानता के बारे में दो बातों का उल्लेख हैः प्रतिष्ठा की समानता और अवसर की समानता। अवसर की समानता का अथर् है कि समाज के सभी वगो± को समान अवसर मिले। लेकिन जब समाज में अनेक सामाजिक विषमताएँ व्याप्त हों, तो वहांँ समान अवसरों का क्या मतलब हो सकता है? संविधन स्पष्ट करता है कि सरकार बच्चों, महिलाओं तथा सामाजिक व शैक्षण्िाक रूप से पिछड़े वगो± की बेहतरी के लिए विशेष योजनाएँ व निणर्य लागू कर सकती है। आपने नौकरियों और स्कूलों में प्रवेश के लिए ‘आरक्षण’ के बारे में अवश्य सुना होगा। आपको संभवतया आश्चयर् भी हुआ होगा कि समानता के सि(ांत का पालन करने के बावजूद यहाँ ‘आरक्षण’ क्यों है? वास्तव में संविधन का अनुच्छेद 16 ;4द्ध सापफ - सापफ कहता है कि आरक्षण जैसी नीति को समानता के अध्िकार के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा जा सकता। यदि आप संविधन की भावना देखें तो ‘अवसर की समानता’ के अध्िकार को पूरा करने के लिए यह शरूरी है। आप एक न्यायाध्ीश हैं आप को उड़ीसा के पुरी जिले के ‘दलित समुदाय के एक सदस्य’ हादिबंध्ु से एक पोस्टकाडर् मिलता है। उसमें लिखा है कि उसके समुदाय के पुरुषों ने उस प्रथा का पालन करने से इंकार कर दिया जिसके अनुसार उन्हें उच्च जातियों के विवाहोत्त्सव में दूल्हे और सभी मेहमानों के पैर धेने पड़ते थे। इसके बदले उस समुदाय की चार महिलाओं को पीटा गया और उन्हें निवर्स्त्रा करके घुमाया गया। पोस्टकाडर् लिखने वाले के अनुसार, ‘‘हमारे बच्चे श्िाक्ष्िात हैं और वे उच्च जातियों के पुरुषों के पैर धेने, विवाह में भोज के बाद जूठन हटाने और बतर्न माँजने का परंपरागत काम करने को तैयार नहीं हैं।’’ यह मानते हुए कि उपयुर्क्त तथ्य सही है, आपको निणर्य करना है कि क्या इस घटना में मौलिक अध्िकारों का उल्लंघन हुआ है? आप इसमें सरकार को क्या करने का आदेश देंगे? स्वतंत्राता का अध्िकार किसी भी लोकतंत्रा में समता और स्वतंत्राता सबसे महत्त्वपूणर् अध्िकार है। इनमें से एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती। स्वतंत्राता का अथर् है चिंतन, अभ्िाव्यक्ित और कायर् करने की स्वतंत्राता। लेकिन स्वतंत्राता का यह अथर् नहीं है कि हम जैसा चाहें वैसा करने लगें। यदि ऐसा करने की इशाशत दे दी जाय तो बहुत सारे लोग अपनी स्वतंत्राता का आनंद उठाने से वंचित हो जाएंगे। अतः स्वतंत्राता को इस प्रकार परिभाष्िात किया जाता है कि बिना किसी अन्य की स्वतंत्राता को नुकसान पहुँचाए और बिना कानून - व्यवस्था को ठेस पहुँचाए, प्रत्त्येक व्यक्ित अपनी - अपनी स्वतंत्राता का आनंद ले सके। जीवन और व्यक्ितगत स्वतंत्राता का अध्िकार स्वतंत्राता के सबसे महत्त्वपूणर् अध्िकारों में ‘जीवन और व्यक्ितगत स्वतंत्राता का अध्िकार’ है। किसी भी नागरिक को कानून द्वारा निधर्रित प्रिया का पालन किये बिना उसके जीवन और व्यक्ितगत स्वतंत्राता से वंचित नहीं किया जा सकता। इसका अथर् यह है कि किसी भी व्यक्ित को बिना कारण बताये गिरफ्ऱतार नहीं किया जा सकता। गिरफ्ऱतार किये जाने पर उस व्यक्ित को अपनी इच्छा के वकील के माध्यम से अपना बचाव करने का अध्िकार है। इसके अलावा, पुलिस के लिए यह आवश्यक है कि वह अभ्िायुक्त को 24 घंटे के अंदर निकटतम न्यायाध्ीश के सामने पेश करे। न्यायाध्ीश ही इस बात फ्रतारउचित है या नहीं। ़का निणर्य करेगा किगिरइस अध्िकार द्वारा किसी व्यक्ित के जीवन को मनमाने ढंग से समाप्त करने के विरु( ही गारंटी नहीं मिलती बल्िक इसका दायरा और भी व्यापक है। सवोर्च्च न्यायालय के पिछले अनेक निणर्यों द्वारा इस अध्िकार का दायरा बढ़ा है। सवोर्च्च न्यायालय के निणर्य के अनुसार इसमें शोषण से मुक्त और मानवीय गरिमापूणर् जीवन जीने का अध्िकार अंतनिर्हित है। न्यायालय ने माना कि ‘जीवन के अध्िकार’ का अथर् है कि व्यक्ित को एक झोपड़ी और रोशी - रोटी का भी अध्िकार हो क्योंकि उसके बिना कोइर् व्यक्ित ¯शदा नहीं रह सकता। निवारक नशरबंदी फ्रतार करते हैं जब उसने अपराध् किया हो। पर इसवेफ़सामान्यतः किसी व्यक्ित को तब गिरफ्रतार किया जा सकता़अपवाद भी हैं। कभी - कभी किसी व्यक्ित को इस आशंका पर भी गिरहै कि वह कोइर् गैर - कानूनी कायर् करने वाला है और पिफर उसे वण्िार्त प्रिया का पालन किये बिना ही वुफछ समय के लिए जेल भेजा जा सकता है। इसे ही निवारक नशरबंदी कहते हैं। इसका अथर् यह हुआ कि यदि सरकार को लगे कि कोइर् व्यक्ित देश की कानून - व्यवस्था या शांति और सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है, तो वह उसे बंदी बना सकती है। लेकिन निवारक नशरबंदी अध्िकतम 3 महीने के लिए ही हो सकती है। तीन महीने के बाद ऐसे मामले समीक्षा के लिए एक सलाहकार बोडर् के समक्ष लाए जाते हैं। प्रत्यक्ष रूप से निवारक नशरबंदी सरकार के हाथ में असामाजिक तत्त्वों और राष्ट्र विद्रोही तत्त्वों से निपटने का एक हथ्िायार है। लेकिन सरकार ने प्रायः इसका दुरुपयोग किया है। अनेक लोग यह मानते हैं कि इस कानून में वुफछ ऐसे सुरक्षात्मक उपाय किए जाने चाहिए जिससे सामान्य नागरिकों के विरु( अन्य किसी कारण से इसके दुरुपयोग को रोका जा सके। वास्तव में जीवन और व्यक्ितगत स्वतंत्राता के अध्िकारों तथा निवारक नशरबंदी के प्रावधनों में परस्पर विरोधभास है। अन्य स्वतंत्राताएँ आप देख सकते हैं कि ‘स्वतंत्राता के अध्िकार’ के अंतगर्त वुफछ और अध्िकार भी हैं। पर इनमें से कोइर् भी अध्िकार निरंवुफश नहीं है। इनमें से प्रत्त्येक के प्रयोग पर सरकार वुफछ प्रतिबंध् लगा सकती है। उदाहरण के तौर पर ‘भाषण और अभ्िाव्यक्ित की स्वतंत्राता’ पर कानून - व्यवस्था, शांति और नैतिकता के आधर पर प्रतिबंध् लगाये जा सकते हैं। सभा और सम्मेलन करने की स्वतंत्राता का प्रयोग करने पर यह शतर् है कि वह शांतिपूणर् तथा बिना हथ्िायारों के हो। सरकार किसी क्षेत्रा में पाँच या पाँच से अध्िक लोगों की सभा पर प्रतिबंध् लगा सकती है। प्रशासन इस शक्ित का आसानी से दुरुपयोग कर सकता है। वह सरकार के किसी कायर् या नीति के विरु( जनता को न्यायोचित विरोध् - प्रदशर्न करने की अनुमति देने से मना कर सकता है। लेकिन जनता अपने अध्िकारों के प्रति सजग और सतकर् हो और प्रशासन के ऐसे कायो± का विरोध् करे तो इसके दुरुपयोग की संभावना कम हो जाती है। संविधन सभा में भी वुफछ सदस्यों ने अध्िकारों को प्रतिबंध्ित करने पर अपना असंतोष जताया था। ....आप देखेंगे कि आरोपी या अभ्िायुक्त के अध्िकार हमारा संविधन इसका भी प्रावधन करता है कि उन लोगों को भी पयार्प्त सुरक्षा मिले जिन पर विभ्िान्न अपराधें के आरोप हों। हम प्रायः ऐसा विश्वास कर लेते हैं कि जिस पर भी किसी अपराध् का आरोप लगता है वह दोषी है। लेकिन जब तक न्यायालय किसी व्यक्ित को किसी अपराध् का दोषी नहीं ठहराता तब तक उसे दोषी नहीं माना जा सकता। यह भी शरूरी है कि किसी अपराध् के आरोपी को स्वयं को बचाने का समुचित अवसर मिलना चाहिये। न्यायालय में निष्पक्ष मुकदमे के लिए संविधन तीन अध्िकारों की व्यवस्था करता है - ऽ किसी भी व्यक्ित को एक ही अपराध् के लिए एक बार से ज़्यादा सशा नहीं मिलेगीऋ ऽ कोइर् भी कानून किसी भी कायर् को पिछली तारीख से अपराध् घोष्िात नहीं कर सकेगाऋ और ऽ किसी भी व्यक्ित को स्वयं अपने विरु( साक्ष्य देने के लिए नहीं कहा जा सकेगा। संविधन के अनुसार 14 वषर् से कम उम के बच्चों को किसी कारखाने, खदान या अन्य किसी खतरनाक काम में नियोजित नहीं किया जाएगा। इस प्रकार बाल श्रम को अवैध् बना कर और श्िाक्षा को बच्चों का मौलिक अध्िकार बनाकर ‘शोषण के विरु( संवैधनिक अध्िकार’ को और अथर्पूणर् बनाया गया है। धमिर्क स्वतंत्राता का अध्िकार अपने संविधन के अनुसार प्रत्त्येक व्यक्ित को अपनी पसंद के ध्मर् का पालन करने का अध्िकार है। इस स्वतंत्राता को लोकतंत्रा का प्रतीक माना जाता है। इतिहास गवाह है कि दुनिया के अनेक देशों के शासकों और राजाओं ने अपने - अपने देश की जनता को ध्मर् की स्वतंत्राता का अध्िकार नहीं दिया। शासकों से अलग ध्मर् को मानने वाले लोगों को या तो मार डाला गया या विवश किया गया कि वे शासकों द्वारा मान्य ध्मर् को स्वीकार कर लें। अतः लोकतंत्रा में अपनी इच्छा के अनुसार ध्मर् पालन करने की स्वतंत्राता को हमेशा एक बुनियादी सि(ांत के रूप में स्वीकार किया गया है। आस्था और प्राथर्ना की स्वतंत्राता भारत में प्रत्त्येक व्यक्ित को अपना ध्मर् चुनने और उसका पालन करने का अध्िकार है। धमिर्क स्वतंत्राता में अंतःकरण की स्वतंत्राता भी समाहित है। इसका अथर् है कि कोइर् व्यक्ित किसी भी ध्मर् को चुन सकता है या यह निणर्य भी ले सकता है कि वह किसी भी ध्मर् का पालन नहीं करेगा। धमिर्क स्वतंत्राता का यह भी अथर् है कि सभी व्यक्ितयों को अपने ध्मर् को अबाध् रूप से मानने, उसके अनुसार आचरण करने और प्रचार करने का समान हक होगा। लेकिन धमिर्क स्वतंत्राता पर वुफछ प्रतिबंध् भी हैं। लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधर पर सरकार धमिर्क स्वतंत्राता पर प्रतिबंध् लगा सकती है। धमिर्क स्वतंत्राता का अध्िकार असीमित नहीं है। वुफछ सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए सरकार धमिर्क मामलों में हस्तक्षेप कर सकती है। उदाहरण के तौर पर सरकार ने सती प्रथा, एक से अध्िक विवाह और मानव - बलि जैसी वुफप्रथाओं पर प्रतिबंध् के लिए अनेक कदम उठाए हैं। ऐसे प्रतिबंधों को धमिर्क स्वतंत्राता के अध्िकार में हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता। धमिर्क स्वतंत्राता के अध्िकार पर नियंत्राण लगाने से विभ्िान्न ध्मर् के मानने वालों और सरकार के बीच अक्सर ही तनावपूणर् स्िथतियाँ पैदा होती हैं। जब भी किसी धमिर्क समुदाय के वुफछ ियाकलापों पर सरकार नियंत्राण लगाती है, तो उस समुदाय के लोग यह महसूस करते हैं कि वह उनके ध्मर् में एक हस्तक्षेप है। एक अन्य कारण से भी धमिर्क स्वतंत्राता राजनीतिक विवाद का विषय बन जाती है। संविधन ने सभी को अपने ध्मर् का प्रचार करने की स्वतंत्राता दी है। इसमें लोगों को एक ध्मर् से दूसरे ध्मर् में परिवतर्न के लिए मनाने का अध्िकार भी शामिल है। लेकिन वुफछ लोग ध्मर् परिवतर्न का विरोध् करते हैं। उनका मानना है कि ध्मा±तरण भय या लालच के आधर पर कराए जाते हैं। संविधन भी जबरन ध्मर् - परिवतर्न की इशाशत नहीं देता। वह हमें केवल अपने ध्मर् के बारे में सूचनाएँ प्रसारित करने का अध्िकार देता है जिससे हम दूसरों को अपने ध्मर् की ओर आकष्िार्त कर सकें। सभी ध्मो± की समानता अनेक ध्मो± को मानने वाले लोगों का देश होने के कारण यह शरूरी है कि सरकार विभ्िान्न ध्मो± के साथ समानता का बतार्व करे। इसका अथर् यह भी है कि सरकार किसी विशेष ध्मर् का पक्ष नहीं लेगी। भारत का कोइर् राजकीय ध्मर् नहीं है। भारत के राष्ट्रपति, प्रधनमंत्राी, न्यायाध्ीश या अन्य किसी सावर्जनिक पद पर कायर् करने के लिए हमें किसी ध्मर् - विशेष का सदस्य होना शरूरी नहीं है। ‘समानता के अध्िकार’ के अंतगर्त भी हमने देखा कि सभी नागरिकों को इस बात की गारंटी दी गइर् है कि सरकारी नौकरियों में नियुक्ित के संबंध् में सरकार ध्मर् के आधर पर भेदभाव नहीं करेगी। राज्य द्वारा संचालित शैक्षण्िाक संस्थाओं में न तो किसी ध्मर् का प्रचार किया जाएगा, न ही कोइर् धमिर्क श्िाक्षा दी जाएगी और न ही उसमें प्रवेश के लिए किसी ध्मर् को वरीयता दी जाएगी। इन प्रावधनों से ध्मर् निरपेक्षता को जीवन और बल मिलता है। खुद करें खुद सीखें अपने गाँव या शहर में होने वाले सावर्जनिक धमिर्क गतिविध्ियों की सूची बनाएँ। इनमें से कौन - कौन - सी गतिविध्ियाँ धमिर्क स्वतंत्राता के अध्िकार का प्रयोग दिखलाती हैं? इस पर चचार् करें कि यदि आपके क्षेत्रा में लोगों को यह अध्िकार नहीं होता, तो क्या होता? सांस्कृतिक और शैक्ष्िाक अध्िकार जब हम भारतीय समाज की बात करते हैं तो हमारे मन में विविध्ता की छवि उभरती है। भारतीय समाज कोइर् समरूप समाज नहीं है वरन् उसमें कापफी विविध्ता है। ऐसे विविधता भरे समाज में वुफछ समुदाय छोटे और वुफछ बड़े हैं। क्या ऐसी स्िथति में अल्पसंख्यक समुदाय को बहुसंख्यक समुदाय की संस्कृति स्वीकार करनी पड़ेगी? हमारा संविधन मानता है कि ‘विविध्ता’ हमारे समाज की मशबूती है। अतः अल्पसंख्यकों का अपनी संस्कृति को बनाये रखने का अध्िकार भी एक मौलिक अध्िकार बहुसख्ंयकों पर एक गंभीर उत्तरदायित्व है कि वे देखें कि अल्पसंख्यक सुरक्ष्िात महसूस करें। ..केवल एक ध्मर्निरपेक्ष शासन में ही अल्संख्यक सुरक्ष्िात रहेंगे। उनके लिए राष्ट्रवादी होना लाभकारी है। बहुसंख्यकों को अपने राष्ट्रीय दृष्िटकोण का दिखावा नहीं करना चाहिये। ...उन्हें स्वयं को अल्पसंख्यकों की स्िथति में रखकर उनकी आशंकाओं को समझना चाहिये। सुरक्षा की सभी माँगे उसी आशंका पर आधरित हैं, जो अल्पसंख्यकों के मन में अपनी भाषा, लिपि और नौकरियों के अवसर के संबंध् में हैं। संविधन सभा के वाद - विवाद, खंड टप्प्प्, पृष्ठ 322, 26 मइर् 1949 है। किसी समुदाय को केवल ध्मर् के आधर पर नहीं बल्िक भाषा और संस्कृति के आधर पर भी अल्पसंख्यक माना जाता है। अल्पसंख्यक वह समूह है जिनकी अपनी एक भाषा या ध्मर् होता है और देश के किसी एक भाग में या पूरे देश में संख्या के आधर पर वे किसी अन्य समूह से छोटा है, ऐसे अल्पसंख्यक समूहों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को सुरक्ष्िात रखने और उसे विकसित करने का अध्िकार है। भाषाइर् या धमिर्क अल्पसख्ंयक अपने श्िाक्षण संस्थान खोल सकते हैं। ऐसा करके वे अपनी संस्कृति को सुरक्ष्िात और विकसित कर सकते हैं। श्िाक्षण संस्थाओं को वित्तीय अनुदान देने के मामले में सरकार इस आधर पर भेदभाव नहीं करेगी कि उस श्िाक्षण संस्थान का प्रबंध् किसी अल्पसंख्यक समुदाय के हाथ में है। संवैधनिक उपचारों का अध्िकार इस बात से हर - कोइर् सहमत होगा कि हमारे संविधन में मौलिक अध्िकारों की सूची बड़ी आकषर्क है। लेकिन अध्िकारों की विस्तृत सूची देना ही कापफी नहीं। कोइर् ऐसा तरीका होना चाहिए जिससे उन्हें व्यवहार में लाया जा सके और उल्लंघन होने पर अिाकारों की रक्षा की जा सके। ‘संवैधनिक उपचारों का अध्िकार’ वह साध्न है जिसके द्वारा ऐसा किया जा सकता है। डाॅ. अंबेडकर ने इस अध्िकार को ‘संविधन का हृदय और आत्मा’ की संज्ञा दी। इसके अंतगर्त हर नागरिक को यह अध्िकार प्राप्त है कि वह अपने मौलिक अध्िकारों के उल्लंघन किए जाने पर सीध्े उच्च न्यायालय या सवोर्च्च न्यायालय जा सकता है। सवोर्च्च न्यायालय या उच्च न्यायालय मौलिक अध्िकारों को लागू करने के लिए सरकार को आदेश और निदेर्श दे सकते हैं। न्यायालय कइर् प्रकार के विशेष आदेश जारी करते हैं जिन्हें प्रादेश या रिट कहते हैं। ऽ बंदी प्रत्यक्षीकरण - बंदी प्रत्यक्षीकरण के द्वारा न्यायालय किसी गिरफ्ऱतार व्यक्ित को न्यायालय के सामने प्रस्तुत करने का आदेश देता फ्रतारी का तरीका या कारण गैरकानूनी या असंतोषजनक़है। यदि गिरफ्रतार व्यक्ित को छोड़ने का आदेश दे सकता है।़हो, तो न्यायालय गिरऽ परमादेश - यह आदेश तब शारी किया जाता है जब न्यायालय को लगता है कि कोइर् सावर्जनिक पदाध्िकारी अपने कानूनी और संवैध् ानिक दायित्वों का पालन नहीं कर रहा है और इससे किसी व्यक्ित का मौलिक अध्िकार प्रभावित हो रहा है। ऽ निषेध् आदेश - जब कोइर् निचली अदालत अपने अध्िकार क्षेत्रा का अतिक्रमण करके किसी मुकदमे की सुनवाइर् करती है तो उफपर की अदालतें ;उच्च न्यायालय या सवोर्च्च न्यायालयद्ध उसे ऐसा करने से रोकने के लिए ‘निषेध् आदेश’ शारी करती है। ऽ अध्िकार पृच्छा - जब न्यायालय को लगता है कि कोइर् व्यक्ित ऐसे पद पर नियुक्त हो गया है जिस पर उसका कोइर् कानूनी हक नहीं है तब न्यायालय ‘अध्िकार पृच्छा आदेश’ के द्वारा उसे उस पद पर कायर् करने से रोक देता है। ऽ उत्प्रेषण रिट - जब कोइर् निचली अदालत या सरकारी अध्िकारी बिना अध्िकार के कोइर् कायर् करता है, तो न्यायालय उनके समक्ष विचाराध्ीन मामले को उनसे लेकर उत्प्रेषण द्वारा उसे ऊपर की अदालत या अध्िकारी को हस्तांतरित कर देता है। बाद में इन अध्िकारों की रक्षा के लिए न्यायपालिका के अलावा वुफछ और संरचनाओं का भी निमार्ण किया गया। आपने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अल्पसंख्यक नहीं हैं? आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग आदि के बारे में सुना होगा। ये संस्थाएँ क्रमशः अल्पसंख्यकों, महिलाओं और दलितों के अध्िकारों की रक्षा करती हैं। इसके अतिरिक्त, मौलिक अध्िकारों और अन्य अध्िकारों की रक्षा करने के लिए कानून द्वारा राष्ट्रीय मानवाध्िकार आयोग का भी गठन किया गया है। राष्ट्रीय मानवाध्िकार आयोग किसी भी संविधन द्वारा प्रदान किए गए अध्िकारों की असली पहचान तब होती है जब उन्हें लागू किया जाता है। समाज के गरीब, अश्िाक्ष्िात और कमशोर तबके के लोगांे को अपने अध्िकारों को प्रयोग करने की स्वतंत्राता होनी चाहिए। पीपुल्स यूनियन पफाॅर सिविल लिबटीर्श ;पी.यू.सी.एल.द्ध या पीपुल्स यूनियन पफाॅर डेमोक्रेटिक राइट्स ;पी.यू.डी.आर.द्ध जैसी संस्थाएँ अध्िकारों के हनन के विरु( चैकसी करती हैं। इस परिप्रेक्ष्य में वषर् 1993 में सरकार ने राष्ट्रीय मानवाध्िकार आयोग का गठन किया। राष्ट्रीय मानवाध्िकार आयोग में सवोर्च्च न्यायालय का एक पूवर् मुख्य न्यायाध्ीश, किसी उच्च न्यायालय का एक पूवर् मुख्य न्यायाध्ीश तथा मानवाध्िकारों के संबंध् में ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले दो और सदस्य होते हैं। मानवाध्िकारों के उल्लंघन की श्िाकायतें मिलने पर राष्ट्रीय मानवाध्िकार आयोग स्वयं अपनी पहल पर या किसी पीडि़त व्यक्ित की याचिका पर जाँच कर सकता है। जेलों में बंदियों की स्िथति का अध्ययन करने जा सकता हैऋ मानवाध्िकार के क्षेत्रा में शोध् कर सकता है या शोध् को प्रोत्साहित कर सकता है। आयोग को प्रतिवषर् हजारों श्िाकायतें मिलती हैं। इनमें से अध्िकतर हिरासत में मृत्यु, हिरासत के दौरान बलात्त्कार, लोगों के गायब होने, पुलिस की श्यादतियों, कायर्वाही न किये जाने, महिलाओं के प्रति दुव्यर्वहार आदि से संबंध्ित होती हैं। मानवाध्िकार आयोग का सबसे प्रभावी हस्तक्षेप पंजाब में युवकों के गायब होने तथा गुजरात दंगों के मामले में जाँच के रूप में रहा। आयोग को स्वयं मुकदमा सुनने का अध्िकार नहीं है। यह सरकार या न्यायालय को अपनी जाँच के आधर पर मुकदमें चलाने की सिपफारिश कर सकता है। राज्य के नीति - निदेर्शक तत्त्व संविधन निमार्ताओं को ज्ञात था कि स्वतंत्रा भारत को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। इसमें सभी नागरिकों में समानता लाना और सबका कल्याण करना सबसे बड़ी चुनौती थी। उनके अनुसार इन समस्याओं को हल करने के लिए वुफछ नीतिगत निदेर्श शरूरी थे। लेकिन वहीं संविधन इन नीतियों को भावी सरकारों के लिए बाध्यकारी भी नहीं बनाना चाहता था। संविधन में वुफछ निदेर्शक तत्त्वों का समावेश तो किया गया लेकिन उन्हें न्यायालय के माध्यम से लागू करवाने की व्यवस्था नहीं की गइर्। इसका अथर् यह हुआ कि यदि सरकार किसी निदेर्श को लागू नहीं करती तो हम न्यायालय में जाकर यह माँग नहीं कर सकते कि उसे लागू कराने के लिए न्यायालय सरकार को आदेश दे। इसीलिए कहा जाता है कि नीति निदेर्शक तत्त्व ‘वाद योग्य नहीं’ हैं। अथर् यह है कि यह संविधन का एक हिस्सा है जिसे न्यायपालिका द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता। संविधन निमार्ताओं का मानना था कि इन निदेर्शक तत्त्वों के पीछे जो नैतिक शक्ित है वह सरकार को बाध्य करेगी कि सरकार नीति निदेर्शक तत्त्वों को गंभीरता से ले। इसके अलावा वे ऐसा भी समझते थे कि जनता उन्हें लागू करने की जिंमेदारी भावी सरकारों पर डालेगी। अतः संविधन में ऐसी नीतियों की एक निदेर्शक सूची रखी गइर् है। निदेर्शों की उसी सूची को राज्य के नीति - निदेर्शक तत्त्व कहते हैं। नीति - निदेर्शक तत्त्व क्या है? नीति - निदेर्शक तत्त्वों की सूची में तीन प्रमुख बातें हैं - ऽ वे लक्ष्य और उद्देश्य जो एक समाज के रूप में हमें स्वीकार करने चाहिएऋ ऽ वे अध्िकार जो नागरिकों को मौलिक अध्िकारों के अलावा मिलने चाहिए, और ऽ वे नीतियाँ जिन्हें सरकार को स्वीकार करना चाहिए। नीति - निदेर्शक तत्त्वों को देखने से आपको संविधन निमार्ताओं की ‘भारत की कल्पना’ का आभास होगा। समय - समय पर सरकार ने वुफछ नीति - निदेर्शक तत्त्वों को लागू करने का प्रयास किया। अनेक शमींदारी उन्मूलन कानून, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, कइर् पफैक्ट्री - अध्िनियम, न्यूनतम मशदूरी निधर्रण, वुफटीर और लघु उद्योगों को प्रोत्साहन तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के उन्नयन के लिए आरक्षण आदि इन प्रयासों को दशार्ते हैं। नीति - निदेर्शक तत्त्वों को लागू करने के प्रयास में श्िाक्षा का अध्िकार, पूरे देश में पंचायती - राज व्यवस्था लागू करना, रोशगार गारंटी योजना के अंतगर्त काम का सीमित अध्िकार, स्कूली बच्चों के लिए दोपहर के भोजन की योजना आदि संिमलित हैं। नागरिकों के मौलिक कत्तर्व्य ऽ वषर् 1976 में संविधन का 42वाँ संशोध्न किया गया। अन्य प्रावधनों के अलावा इस संशोध्न से संविधन में नागरिकों के मौलिक कत्तर्व्यों की एक सूची का समावेश किया गया जिसमें वुफल दस कत्तर्व्यों का उल्लेख किया गया। लेकिन इन्हें लागू करने के संबंध् में संविधन मौन है। ऽ नागरिक के रूप में हमें अपने संविधन का पालन करना चाहिए, देश की रक्षा करना चाहिए, सभी नागरिकों में भाइर्चारा बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए तथा पयार्वरण की रक्षा करनी चाहिए। ऽ परंतु यह ध्यान देने की बात है कि संविधन मौलिक कत्तर्व्यों के अनुपालन के आधर पर या उनकी शतर् पर हमें मौलिक अध्िकार नहीं देता। इस दृष्िट से संविधन में मौलिक कत्तर्व्यों के समावेश से हमारे मौलिक अध्िकारों पर कोइर् प्रतिवूफल असर नहीं पड़ा। कहाँ पहुँचे? क्या समझे? ऐसा अनुमान है कि भारत में लगभग 30 लाख लोग शहरों में बेघर हैं। इनमें से 5 प्रतिशत लोगों के लिए रात में सोने की जगह भी नहीं है। इनमें सैकड़ों बूढ़े और बीमार बेघर लोगों की जाड़े में शीतलहर से मृत्त्यु हो जाती है। उन्हें ‘निवास का प्रमाण’ न दे पाने के कारण राशन काडर् या मतदाता पहचान पत्रा नहीं मिल पाते। इसके अभाव में उन्हें शरूरतमंद तौर से व्यक्ित के अध्िकारों को संरक्ष्िात करते हैं, पर नीति - निदेर्शक तत्त्व पूरे समाज के हित की बात करते हैं। लेकिन कभी - कभी जब सरकार नीति - निदेर्शक तत्त्वों को लागू करने का प्रयास करती है, तो वे नागरिकों के मौलिक अध्िकारों से टकरा सकते हैं। ौफसला किया। इसका विरोध् इस आधर पर किया गया कि उससे संपिा के मौलिक अध्िकार का हनन होता है। लेकिन यह सोचकर कि सामाजिक आवश्यकताएँ वैयक्ितक हित से ऊपर हैं सरकार ने नीति - निदेर्शक तत्त्वों को लागू करने के लिए संविधन का संशोध्न किया। इससे एक लंबी कानूनी लड़ाइर् शुरू हुइर्। कायर्पालिका और न्यायपालिका ने इस पर परस्पर विरोध्ी दृष्िटकोण अपनाया। सरकार की मान्यता थी कि नीति - निदेर्शक तत्त्वों को लागू करने के लिए मौलिक अध्िकारों पर प्रतिबंध् लगाए जा सकते हैं। इसके पीछे यह धरणा थी कि लोक कल्याण के मागर् में अध्िकार बाध्क हैं। दूसरी ओर न्यायालय की यह मान्यता थी कि मौलिक अध्िकार इतने महत्त्वपूणर् और पावन हैं कि नीति - निदेर्शक तत्त्वों को लागू करने के लिए भी उन्हें प्रतिबंध्ित नहीं किया जा सकता। संपिा का अध्िकार मौलिक अध्िकारों और नीति - निदेर्शक तत्त्वों के मध्य संबंधें पर उठे विवाद के पीछे एक महत्त्वपूणर् कारण था - मूल संविधन में संपिा अजर्न, स्वामित्व और संरक्षण का मौलिक अध्िकार दिया गया था। लेकिन संविधन में स्पष्ट कहा गया था कि सरकार लोक - कल्याण के लिए संपिा का अध्िग्रहण कर सकती है। 1950 से ही सरकार ने अनेक ऐसे कानून बनाए जिससे संपिा के अध्िकार पर प्रतिबंध् लगा। मौलिक अध्ि कारों और नीति - निदेर्शक तत्त्वों के मध्य विवाद के वेंफद्र में यही अध्िकार था। आख्िारकार 1973 में सवोर्च्च न्यायालय ने अपने निणर्य में ‘संपिा के अध्िकार’ को ‘संविधन के मूल - ढाँचे’ का तत्त्व नहीं माना और कहा कि संसद को संविधन का संशोध्न करके इसे प्रतिबंध्ित करने का अध्िकार है। 1978 में जनता पाटीर् की सरकार ने 44वें संविधन संशोध्न के द्वारा संपिा के अध्िकार को मौलिक अध्िकारों की सूची से निकाल दिया और संविधन के अनुच्छेद 300 ;कद्ध के अंतगर्त उसे एक सामान्य कानूनी अध्िकार बना दिया। आपकी राय में ‘संपिा के अध्िकार’ को मौलिक अध्िकार से कानूनी अध्िकार बनाने से क्या पफकर् पड़ता है? यह समस्या तब पैदा हुइर् जब सरकार ने शमींदारी उन्मूलन कानून बनाने का प़्इसने एक और भी जटिल वाद - विवाद को जन्म दिया। वह संविधन के संशोध्न से संबंध्ित था। सरकार का मत था कि संसद संविधन के किसी भी अंश या प्रावधन में संशोध्न कर सकती है। न्यायपालिका का कहना था कि संसद कोइर् ऐसा संशोध्न नहीं कर सकती जो मौलिक अध्िकारों का उल्लंघन करता हो। यह विवाद सवोर्च्च न्यायालय द्वारा एक महत्त्वपूणर् केशवानन्द भारती मुकदमें में दिए गए निणर्य से समाप्त हुआ। उसमें निणर्य देते हुए न्यायालय ने यह कहा कि संविधन की वुफछ ‘मूल - ढाँचागत’ विशेषताएँ हैं और संसद उनमें कोइर् परिवतर्न नहीं कर सकती। इसे हम नवें अध्याय ‘संविधन: एक जीवंत दस्तावेश’ में विस्तार से पढ़ेंगे। कहाँ पहुँचे? क्या समझे? प्रश्नावली 1.निम्नलिख्िात प्रत्येक कथन के बारे में बताएँ कि वह सही है या गलत ;कद्ध अध्िकार - पत्रा में किसी देश की जनता को हासिल अध्िकारों का वणर्न रहता है। ;खद्ध अध्िकार - पत्रा व्यक्ित की स्वतंत्राता की रक्षा करता है। ;गद्ध विश्व के हर देश में अध्िकार - पत्रा होता है। 2.निम्नलिख्िात में कौन मौलिक अध्िकारों का सबसे सटीक वणर्न है? ;कद्ध किसी व्यक्ित को प्राप्त समस्त अध्िकार ;खद्ध कानून द्वारा नागरिक को प्रदत्त समस्त अध्िकार ;गद्ध संविधन द्वारा प्रदत्त और सुरक्ष्िात समस्त अध्िकार ;घद्ध संविधन द्वारा प्रदत्त वे अध्िकार जिन पर कभी प्रतिबंध् नहीं लगाया जा सकता। 3.निम्नलिख्िात स्िथतियों को पढ़ें। प्रत्येक स्िथति के बारे में बताएँ कि किस मौलिक अध्िकार का उपयोग या उल्लंघन हो रहा है और वैफसे? ;कद्ध राष्ट्रीय एयरलाइर्न के चालक - परिचालक दल ;ब्ंइपद.ब्तमूद्ध के ऐसे पुरुषों को जिनका वजन श्यादा है - नौकरी में तरक्की दी गइर् लेकिन उनकी ऐसी महिला - सहकमिर्यों को, दंडित किया गया जिनका वजन बढ़ गया था। ;खद्ध एक निदेर्शक एक डाॅक्यूमेंट्री पिफल्म बनाता है जिसमें सरकारी नीतियों की आलोचना है। ;गद्ध एक बड़े बाँध् के कारण विस्थापित हुए लोग अपने पुनवार्स की माँग करते हुए रैली निकालते हैं। ;घद्ध आंध््र - सोसायटी आंध््र प्रदेश के बाहर तेलुगु माध्यम के विद्यालय चलाती है। 4.निम्नलिख्िात में कौन सांस्कृतिक और शैक्ष्िाक अध्िकारों की सही व्याख्या है? ;कद्ध शैक्ष्िाक - संस्था खोलने वाले अल्पसंख्यक वगर् के ही बच्चे इस संस्थान में पढ़ाइर् कर सकते हैं। ;खद्ध सरकारी विद्यालयों को यह सुनिश्िचत करना चाहिए कि अल्पसंख्यक - वगर् के बच्चों को उनकी संस्कृति और ध्मर् - विश्वासों से परिचित कराया जाए। ;गद्ध भाषाइर् और धमिर्क - अल्पसंख्यक अपने बच्चों के लिए विद्यालय खोल सकते हैं और उनके लिए इन विद्यालयों को आरक्ष्िात कर सकते हैं। ;घद्ध भाषाइर् और धमिर्क - अल्पसंख्यक यह माँग कर सकते हैं कि उनके बच्चे उनके द्वारा संचालित शैक्षण्िाक - संस्थाओं के अतिरिक्त किसी अन्य संस्थान में नहीं पढ़ेंगे। 5.इनमें कौन - मौलिक अध्िकारों का उल्लंघन है और क्यों? ;कद्ध न्यूनतम देय मशदूरी नहीं देना। ;खद्ध किसी पुस्तक पर प्रतिबंध् लगाना। ;गद्ध 9 बजे रात के बाद लाऊड - स्पीकर बजाने पर रोक लगाना। ;घद्ध भाषण तैयार करना। 6.गरीबों के बीच काम कर रहे एक कायर्कत्तार् का कहना है कि गरीबों को मौलिक अध्िकारों की शरूरत नहीं है। उनके लिए शरूरी यह है कि नीति - निदेर्शक सि(ांतों को कानूनी तौर पर बाध्यकारी बना दिया जाए। क्या आप इससे सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण बताएँ। 7.अनेक रिपोटो± से पता चलता है कि जो जातियाँ पहले झाड़ू देने के काम में लगी थीं उन्हें मशबूरन यही काम करना पड़ रहा है। जो लोग अध्िकार - पद पर बैठे हैं वे इन्हें कोइर् और काम नहीं देते। इनके बच्चों को पढ़ाइर् - लिखाइर् करने पर हतोत्साहित किया जाता है। इस उदाहरण में किस मौलिक - अध्िकार का उल्लंघन हो रहा है। 8.एक मानवाध्िकार - समूह ने अपनी याचिका में अदालत का ध्यान देश में मौजूद भूखमरी की स्िथति की तरपफ खींचा। भारतीय खाद्य - निगम के गोदामों में 5 करोड़ टन से श्यादा अनाज भरा हुआ था। शोध् से पता चलता है कि अध्िकांश राशन - काडर्धरी यह नहीं जानते कि उचित - मूल्य की दुकानों से कितनी मात्रा में वे अनाज खरीद सकते हैं। मानवाध्िकार समूह ने अपनी याचिका में अदालत से निवेदन किया कि वह सरकार को सावर्जनिक - वितरण - प्रणाली में सुधर करने का आदेश दे। ;कद्ध इस मामले में कौन - कौन से अध्िकार शामिल हैं? ये अध्िकार आपस में किस तरह जुड़े हैं? ;खद्ध क्या ये अध्िकार जीवन के अध्िकार का एक अंग हैं? 9.इस अध्याय में उ(ृत सोमनाथ लाहिड़ी द्वारा संविधन - सभा में दिए गए वक्तव्य को पढ़ें। क्या आप उनके कथन से सहमत हैं? यदि हाँ तो इसकी पुष्िट में वुफछ उदाहरण दें। यदि नहीं तो उनके कथन के विरु( तकर् प्रस्तुत करें। 10.आपके अनुसार कौन - सा मौलिक अध्िकार सबसे श्यादा महत्त्वपूणर् है? इसके प्रावधनों को संक्षेप में लिखें और तकर् देकर बताएँ कि यह क्यों महत्त्वपूणर् है?

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