अध्याय 2 ग्रामीण तथा नगरीय समाज में सामाजिक परिवतर्न तथा सामाजिक व्यवस्था ऐसा अकसर कहा जाता है कि परिवतर्न ही समाज का अपिरवतर्नीय पक्ष है। आधुनिक समाज में रहने वाले किसी भी व्यक्ित को यह याद दिलाने की आवश्यकता नहीं होती कि परिवतर्न हमारे समाज की एक विश्िाष्ट पहचान है। वास्तव में, समाजशास्त्रा का एक विषय के रूप में उद्भव, सत्राहवीं से उन्नीसवीं सदी के मध्य पश्िचमी यूरोपीय समाज में तीव्र गति से बदलते परिवेश को समझने के प्रयास में हुआ। सामाजिक परिवतर्न आधुनिक जीवन का एक आम तथा चिर - परिचित सत्य है। तुलनात्मक दृष्िटकोण से भी यह एक सवर्था नवीन तथा हाल की सच्चाइर् है। यह अनुमान लगाया जाता है कि मानव जाति का पृथ्वी पर अस्ितत्व तकरीबन 5,00,000 ;पाँच लाखद्ध वषो± से है, परंतु उनकी सभ्यता का अस्ितत्व मात्रा 6,000 वषो± से ही माना जाता रहा है। इन सभ्य माने जाने वाले वषो± में, पिछले मात्रा 400 वषो± से ही हमने लगातार एवं तीव्र परिवतर्न देखे हैं। इन परिवतर्नशील वषो± में भी, इसके परिवतर्न में तेशी मात्रा पिछले 100 वषो± में आइर् है। जिस गति से परिवतर्न होता है, वह चूँकि लगातार बढ़ता रहता है, शायद यह सही है कि पिछले सौ वषो± में, सबसे अिाक परिवतर्न प्रथम पचास वषो± की तुलना में अंतिम पचास वषो± में हुए और आख्िारी पचास वषो± के अंतगर्त, पहले तीस वषो± की तुलना में विश्व में परिवतर्न अंतिम बीस वषो± में अिाक आया..मनुष्य के इतिहास का परिवतिर्त चव्रफ पृथ्वी पर मनुष्य का अस्ितत्व पचास लाख वषो± से है। स्थायी जीवन की बुनियादी आवश्यकता वृफष्िा, मात्रा बारह हशार वषर् प्राचीन है। सभ्यता छह हशार वषा±े से अिाक प्राचीन नहीं है। यदि हम मनुष्य के संपूणर् अस्ितत्व को एक दिन मान लें ;अ(र्रात्रिा से अ(र्रात्रिा तकद्ध तो वृफष्िा 11ः56 मिनट तथा सभ्यता 11ः57 मिनट पर अस्ितत्व में आइर्। आधुनिक समाजों का विकास 11ः59 तथा 30 सेवंफड में हुआ। मनुष्य के दिन के अंतिम 30 सेवंफड में जितना परिवतर्न हुआ है, वह अब तक के पूरे समय के योग के बराबर है। ड्डोत: एन्थनी गिडेन्स, 2004, सोशयोलाॅजी, चैथा संस्करण, पृ. 40 वि्रफयाकलाप 1 अपने बड़ों से बात कीजिए तथा अपने जीवन से संबंिात चीशों के बारे में सूची बनाइए जो - ;कद्ध उस समय नहीं थीं, जब आपके माता - पिता आपकी उम्र के थे। ;खद्ध तब अस्ितत्व में नहीं थीं, जब आपके नाना - नानी/दादा - दादी आपकी उम्र के थे। उदाहरण - श्याम - श्वेत/रंगीन टी.वी.ऋ प्लास्िटक की थैली में दूधऋ कपड़ों में िाप का प्रयोगऋ ये प्लास्िटक की बाल्टी इत्यादि थे। क्या आपके माता - पिता के बचपन में भी अथवा उनके माता - पिता के बचपन में? क्या आप ऐसी चीशों की सूची बना सकते हैं, जो आपके माता - पिता/उनके माता - पिता के समय में थीं परंतु अब नहीं हैं? सामाजिक परिवतर्न ‘सामाजिक परिवतर्न’ एक सामान्य अवधारणा है जिसका प्रयोग किसी भी परिवतर्न के लिए किया जा सकता है, जो अन्य अवधारणा द्वारा परिभाष्िात नहीं किया जा सकता, जैसे आथ्िार्क अथवा राजनैतिक परिवतर्न। समाजशास्ित्रायों को इसके व्यापक अथर् को विश्िाष्ट बनाने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ा। ताकि यह सामाजिक सि(ांत के लिए महत्त्वपूणर् हो सके। अपने बुनियादी स्तर पर, सामाजिक परिवतर्न इंगित करता है, उन परिवतर्नों को जो महत्त्वपूणर् हैं - अथार्त, परिवतर्न जो ‘किसी वस्तु अथवा परिस्िथति की मूलाधार संरचना को समयाविा में बदल दें।’ ;गिडेन्स 2005ः42द्ध अतः सामाजिक परिवतर्न वुफछ अथवा सभी परिवतर्नों को सम्िमलित नहीं करते, मात्रा बड़े परिवतर्न जो, वस्तुओं को बुनियादी तौर पर बदल देते हैं। परिवतर्न का ‘बड़ा’ होना मात्रा इस बात से नहीं मापा जाता कि वह कितना परिवतर्न लाता है, बल्िक परिवतर्न के पैमाने से, अथार्त समाज के कितने बड़े भाग को उसने प्रभावित किया है। दूसरे शब्दों में, परिवतर्न दोनों, सीमित तथा विस्तृत तथा समाज के एक बड़े हिस्से को प्रभावित करने वाला होना चाहिए ताकि वह सामाजिक परिवतर्न के योग्य हो सके। इस प्रकार के मापदंडों के बावजूद सामाजिक परिवतर्न एक विस्तृत शब्द है। इसे और विशेष बनाने के लिए ड्डोतों अथवा कारकों को अिाकतर वगीर्वृफत करने की कोश्िाश की जाती है। प्रावृफतिक आधार पर अथवा समाज पर इसके प्रभाव अथवा इसकी गति के आधार पर इसका वगीर्करण किया जाता है। उदाहरण के लिए, ऐसे परिवतर्न को ‘उद्विकास’ का नाम दिया गया है जो कापफी लंबे़समय तक धीरे - धीरे होता है। यह शब्द, प्राणीशास्त्राी चाल्सर् डाविर्न द्वारा दिया गया। जिन्होंने उद्विकासीय सि(ांत के द्वारा यह प्रतिपादित किया कि वैफसे जीवित प्राणी विकसित होते हैं। कइर् शताब्िदयों अथवा कभी - कभी सहड्डाब्िदयों में धीरे - धीरे अपने आपको प्रावृफतिक वातावरण में ढाल कर बदलते रहते हैं। डाविर्न के सि(ांत ने ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ के विचार पर बल दिया - केवल वही जीवधारी जीवित रहने में सपफल होते हैं जो अपने पयार्वरण के अनुरूप अपने आपको ढाल लेते हैं, जो अपने आपको ढालने में सक्षम नहीं होते अथवा ऐसा धीमी गति से करते हैं, लंबे समय में नष्ट हो जाते हैं। डाविर्न ने यह सुझाया कि मनुष्य की उत्पिा समुद्री जीवों ;अथवा मछलियों के विभ्िान्न प्रकारोंद्ध से भूमि पर रहने वाले स्तनपायी, उससे विभ्िान्न अवस्थाओं को पार करते हुए उच्चतम अवस्था जहाँ बंदरों तथा गोरिल्लों के विभ्िान्न प्रकार से अंत में होमो सैपियंस अथवा मनुष्य के रूप में उसकी उत्पिा हुइर्। यद्यपि डाविर्न का सि(ांत प्रावृफतिक प्रवि्रफयाओं को दिखाता है, इसे शीघ्र सामाजिक विश्व में स्वीवृफत किया गया जिसे ‘सोशल डाविर्निश्म’ के नाम से जाना गया, ऐसा सि(ांत जिसने अनुवूफली परिवतर्न की महत्ता पर बल दिया। उद्विकासीय परिवतर्न के विपरीत, परिवतर्न जो तुलनात्मक रूप से शीघ्र अथवा अचानक होता है, कभी - कभी उसे ‘व्रफांतिकारी परिवतर्न’ कहते हैं। इसका प्रयोग मुख्यतः राजनीतिक संदभर् में होता है, जहाँ समाज में शक्ित की संरचना में शीघ्रतापूवर्क परिवतर्न लाकर इसे चुनौती देने वालों द्वारा पूवर् सत्ता वगर् को विस्थापित कर लाया जाता है। इसके उदाहरण हैं प्रफांसिसी व्रफांति ;1789 - 93द्ध अथवा सोवियत या 1917 की रूसी व्रफांति। सामान्य रूप से इस शब्द का प्रयोग तेश, आकस्िमक तथा अन्य प्रकार के संपूणर् परिवतर्नों के लिए भी, वुफछ शब्द जैसे ‘औद्योगिक व्रफांति’ अथवा ‘संचार व्रफांति’ इत्यादि के लिए होता है। वि्रफयाकलाप 2 प्रफांसिसी व्रफांति अथवा औद्योगिक व्रफांति जिसके बारे में आपने अपनी पाठ्यपुस्तकों में पढ़ा है, परिचचार् को देख्िाए। इनमें से प्रत्येक किस प्रकार के परिवतर्न लेकर आया? क्या ये परिवतर्न इतने तीव्र अथवा इतने दूरगामी थे कि ‘व्रफांतिकारी परिवतर्न’ के योग्य हो सवेंफ? समाज का बोध् विभ्िान्न प्रकार के परिवतर्न जो अपनी प्रवृफति अथवा परिणाम द्वारा पहचाने जाते हैं वे हैं, संरचनात्मक परिवतर्न एवं विचारों, मूल्यों तथा मान्यताओं में परिवतर्न। संरचनात्मक परिवतर्न समाज की संरचना में परिवतर्न को दिखाता है, इसकी संस्थाओं अथवा नियमों जिनसे इन संस्थाओं को चलाया जाता है ;पूवर् अध्याय के सामाजिक संरचना पर हुइर् परिचचार् को देखेंद्ध उदाहरण के लिए, कागशी रुपए का मुद्रा के रूप में प्रादुभार्व वित्तीय संस्थानों तथा लेन - देन में बड़ा भारी परिवतर्न लेकर आया। इस परिवतर्न के पहले, मुख्य रूप से सोने - चाँदी के रूप में मूल्यवान धातुओं का प्रयोग मुद्रा के रूप में होता था। सिक्के की कीमत उसमें पाए जाने वाले सोने अथवा चाँदी से मापी जाती थी। इसके विपरीत, कागशी नोट की कीमत का उस कागज से कोइर् संबंध नहीं होता था जिस पर वह छापा जाता था और न ही उसकी छपाइर् से। कागशी मुद्रा के पीछे यह विचार था कि सामान अथवा सुविधाओं के लेन - देन में जिस चीश का प्रयोग हो, उसका कीमती होना शरूरी नहीं। जब तक यह मूल्य को ठीक से दिखाता है अथार्त जब तक यह विश्वास को जगाए रखता है - तकरीबन कोइर् भी चीश पैसे के रूप में काम कर सकती है। यह विचार )ण बाशार की बुनियाद बना जिसने बैंविंफग तथा वित्त के ढाँचे को बदलने में मदद की। इन परिवतर्नों ने आगे चलकर आथ्िार्क जीवन में और परिवतर्न किए। मूल्यों तथा मान्यताओं में परिवतर्न भी सामाजिक परिवतर्न ला सकते हैं। उदाहरण के लिए, बच्चों तथा बचपन से संबंिात विचारों तथा मान्यताओं में परिवतर्न अत्यंत महत्त्वपूणर् प्रकार के सामाजिक परिवतर्न में सहायक सि( हुआ है। एक समय था जब बच्चों को साधारणतः ‘अवयस्क’ समझा जाता था - बचपन से संबंिात कोइर् विश्िाष्ट संकल्पना नहीं थी। जो इससे जुड़ी हो कि बच्चों के लिए क्या सही था अथवा क्या गलत। उदाहरण के लिए, उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में, यह ठीक माना जाने लगा कि बच्चे जितनी जल्दी काम करने के योग्य हो जाएँ, काम पर लग जाएँ। बच्चे अपने परिवारों की काम करने में मदद पाँच अथवा छह वषर् की आयु से ही प्रारंभ कर देते थेऋ प्रारंभ्िाक पैफक्ट्री व्यवस्था बच्चों के श्रम पर आश्रित थी। यह उन्नीसवीं तथा पूवर् बीसवीं शताब्िदयों के दौरान बचपन जीवन की एक विश्िाष्ट अवस्था है - यह संकल्पना प्रभावी हुइर्। तब छोटे बच्चों का काम करना अविचारणीय हो गया तथा अनेक देशों ने बाल श्रम को कानून द्वारा बंद कर दिया। उसी समय, अनिवायर् श्िाक्षा संबंधी विचारों का जन्म हुआ, तथा इससे संबंिात कइर् कानून भी पास किए गए। यद्यपि वुफछ ऐसे उद्योग हमारे देश में हैं, जो आज भी बाल श्रम पर कम से कम आंश्िाक रूप से आश्रित हैं ;जैसे - दरी बुनना, कक्षा में विद्याथीर् वुफशल कायर् करता हुआ बच्चा छोटी चाय की दुकानें तथा रेस्तराँ, माचिस बनाना इत्यादिद्ध। बाल श्रम गैर कानूनी है तथा मालिकों को मुजरिमों के रूप में सजा हो सकती है। परंतु अब तक सामाजिक परिवतर्न के वगीर्करण का सबसे सरल तरीका इसके कारक तत्व तथा ड्डोत हैं। कइर् बार कारक तत्व पूवर्वगीर्वृफत होते हैं - आंतरिक ;अंतजार्तद्ध और बाहरी ;बहिजार्तद्ध। सामाजिक परिवतर्न के पाँच बृहत प्रकार के ड्डोत अथवा कारण हैं - पयार्वरण, प्रभाव हमेशा से रहा है। विगत समय के संदभर् में यह विशेष रूप से सही है, जब मनुष्य प्रवृफति के प्रभावों को रोकने अथवा झेलने में अक्षम था। उदाहरण के लिए, मरुस्थलीय वातावरण में रहने वाले लोगों के लिए एक स्थान पर रहकर वृफष्िा करना संभव नहीं था, जैसे मैदानी भागों अथवा नदियों के किनारे इत्यादि। अतः जिस प्रकार का भोजन वे करते थे अथवा कपड़े पहनते थे, जिस प्रकार आजीविका चलाते थे तथा सामाजिक तकनीकी, आथ्िार्क, राजनैतिक तथा सांस्वृफतिक। अन्तःिया ये सब काप़्ाफी हद तक उनके पयार्वरण के भौतिक तथा जलवायु की स्िथतियों से पयार्वरण निधार्रित होता है। अत्यिाक ठंडी जलवायु मंे प्रवृफति, पारिस्िथतिकी तथा भौतिक पयार्वरण का रहने वालों के लिए भी यह सही था, अथवा समाज की संरचना तथा स्वरूप पर महत्त्वपूणर् बंदरगाह पर स्िथत नगरों, प्रमुख व्यापारिक मागो± भयंकर बाढ़ से भूमि के अंदर बनी गुपफा कारण, समय के साथ साथ घटता जा रहा है। प्रवृफति द्वारा खड़ी की गइर् समस्याओं का सामना और अपने आपको उनके अनुरूप ढालना और इस प्रकार भ्िान्न पयार्वरण के कारण समाजों के बीच आए अंतर को दूर करने में तकनीक हमारी मदद करती है। दूसरी तरपफ, तकनीक़प्रकृति को तथा इसके साथ हमारे संबंधों को नए तरीकों से बदलती है ;पयार्वरण पर इस पुस्तक में दिए गए अध्याय को देख्िाएद्ध। अतः यह कहना अिाक सही होगा कि समाज पर प्रवृफति का प्रभाव घटने की बजाए बदल रहा है। आप पूछ सकते हैं कि वैफसे यह सामाजिक परिवतर्न को प्रभावित करते हैं? पयार्वरण ने समूहों को आकार दिया होगा, परंतु इसने सामाजिक परिवतर्न में क्या भूमिका अदा की होगी? इस प्रश्न का सबसे आसान तथा बढि़या उत्तर प्रावृफतिक विपदाओं में मिलेगा। त्वरित तथा विध्वंसकारी घटनाएँऋ जैसे - भूकंप, ज्वालामुखी विस्पफोट, बाढ़ अथवा ज्वारभाटीय तरंगें ;जैसा दिसंबर 2004 में सुनामी की तरंगों से इंडोनेश्िाया, श्रीलंका, अंडमान द्वीप, तमिलनाडु के वुफछ भाग इसकी चपेट में आएद्ध समाज को पूणर्रूपेण बदलकर रख देते हैं। ये बदलाव अपरिवतर्नीय होते हैं, अथार्त, ये स्थायी होते हैं तथा चीशों को वापस अपनी पूवर्स्िथति मंे नहीं आने देते। उदाहरण के लिए, यह संभव हो सकता है कि उनमें से कइर् लोग जिनका व्यवसाय सुनामी के कारण नष्ट हो गया वे उसे पुनः नहीं पा सवेंफगे तथा अिाकांश तटीय गाँवों मंे सामाजिक संरचना पूणर्तः बदल जाएगी। प्रावृफतिक विपदाओं के अनेकानेक उदाहरण इतिहास में देखने को मिल जाएँगे, जो समाज को पूणर्रूपेण परिवतिर्त कर देते हैं अथवा पूणर्तः नष्ट कर देते हैं। इसका एक उत्वृफष्ट उदाहरण पश्िचमी एश्िाया ;अथवा खाड़ी देशद्ध के रेगिस्तानी प्रदेशों में तेल का मिलना है। जिस प्रकार 19वीं शताब्दी में वैफलिपफोनिर्या में सोने की खोज हुइर् थी, ठीक उसी प्रकार तेल के भंडारों ने खाड़ी देशों के समाज को बदल कर रख दिया। सउदी अरब, वुफवैत अथवा संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों की स्िथति आज तेल संपदा के बिना बिलवुफल अलग होती। तकनीक तथा अथर्व्यवस्था विशेषकर आधुनिक काल में, तकनीक तथा आथ्िार्क परिवतर्न के संयोग से समाज में तीव्र परिवतर्न आया है। तकनीक समाज को कइर् प्रकार से प्रभावित करती है। जैसा कि ऊपर देखा गया है, यह हमारी मदद, प्रवृफति को विभ्िान्न तरीकों से नियंत्रिात, उसके अनुरूप ढालने में अथवा दोहन करने में करती है। बाशार जैसी शक्ितशाली संस्था से जुड़कर तकनीकी परिवतर्न अपने सामाजिक प्रभाव की तरह ही प्रावृफतिक कारकोंऋ जैसे - सुनामी अथवा तेल की खोज की तरह प्रभावी हो सकते हैं। सामाजिक परिवतर्न के बृहत, दृष्िटगोचर तथा सवार्िाक महत्त्वपूणर् उदाहरण जो तकनीकी परिवतर्न द्वारा लाए गए वह था औद्योगिक क्रांति, जिसके बारे में आपने पहले पढ़ा है। आपने वाष्प इंजन द्वारा समाज पर छोड़े गए प्रभाव के बारे में सुना होगा। वाष्प शक्ित की खोज ने, उदीयमान विभ्िान्न प्रकार के बड़े उद्योगों को शक्ित की उस ताकत को जो न समाज का बोध् केवल पशुओं तथा मनुष्यों के मुकाबले कइर् गुना अिाक थी बल्िक बिना रुकावट के लगातार चलने वाली भी थी, से परिचित कराया। इसका दोहन जब यातायात के साधनोंऋ जैसे - वाष्पचलित जहाश तथा रेलगाड़ी के रूप में किया गया तो इसने दुनिया की अथर्व्यवस्था तथा सामाजिक भूगोल को बदल कर रख दिया। रेल ने उद्योग तथा व्यापार को अमेरिका महाद्वीप तथा पश्िचमी विस्तार को सक्षम किया। भारत में भी, रेल परिवहन ने अथर्व्यवस्था को आकार देने में महत्त्वपूणर् भूमिका निभाइर् है, विशेषकर 1853 में भारत में आने से लेकर मुख्यतः प्रथम शताब्दी तक। वाष्पचलित जहाशों ने समुद्री यातायात को अत्यिाक तीव्र तथा भरोसेमंद बनाया तथा इसने अंतरराष्ट्रीय व्यापार तथा प्रवास वफी गति को बदल कर रख दिया। दोनों परिवतर्नों ने विकास की विशाल लहर पैदा की, जिसने न केवल अथर्व्यवस्था को प्रभावित किया अपितु समाज के सामाजिक, सांस्वृफतिक तथा जनसांख्ियक रूप को बदल दिया। वाष्प शक्ित की छाप तथा महत्त्व अपेक्षाकृत तीव्र गति से दृष्िटगोचर हुआऋ हालाँकि कभी - कभी तकनीक का सामाजिक प्रभाव पूवर्व्यापी भी होता है। तकनीकी आविष्कार अथवा खोज का कभी - कभी तात्कालिक प्रभाव संवुफचित होता है, जो देखने पर लगता है, जैसे सुप्तावस्था में हो। बाद में होने वाले परिवतर्न आथ्िार्क संदभर् में उसी खोज की सामाजिक महत्ता को एकदम बदल देते हैं तथा उसे ऐतिहासिक घटना के रूप में मान्यता देते हैं। इसका उदाहरण चीन में बारूद तथा कागश की खोज है, जिसका प्रभाव सदियों तक संवुफचित रहा जब तक कि उनका प्रयोग पश्िचमी यूरोप के आधुनिकीकरण के संदभर् में नही हुआ। उसी बिंदु से दी गइर् परिस्िथतियों का लाभ उठा, बारूद द्वारा यु( वफी तकनीक में परिवतर्न तथा कागश की छपाइर् की क्रांति ने समाज को हमेशा के लिए परिवतिर्त कर दिया। दूसरा उदाहरण बि्रटेन के कपड़ा उद्योग में होने वाले तकनीकी प्रयोग से है। बाशारी ताकतों तथा साम्राज्यवादी शक्ितयों के मेल से नवीन सूत कातने तथा बुनने की मशीनों ने भारतीय उपमहाद्वीप में हथकरघा उद्योग को नष्ट कर दिया जो पूरी दुनिया में सबसे व्यापक तथा उच्चस्तरीय था। ियाकलाप 3 क्या आपने ऐसे अन्य तकनीकी परिवतर्नों पर ध्यान दिया है, जिसका आपके सामाजिक जीवन पर प्रभाव पड़ा हो? पफोटोकाॅपी मशीन तथा उसके प्रभाव के बारे में सोचिए। क्या आपने कभी सोचा है कि उसके पहले जीवन वैफसा होगा जब पफोटोकाॅपी इतनी सस्ती तथा आसानी से उपलब्ध नहीं थी। दूसरा उदाहरण एस.टी.डी. टेलीप़्ाफोन बूथ हो सकते हैं। यह पता कीजिए कि लोग वैफसे एक - दूसरे से संपवर्फ रखते थे, जब वुफछ ही घरों में टेलीप़्ाफोन की सुुविधाएँ थीं। ऐसे वुफछ अन्य उदाहरणों की सूची बनाइए। कइर् बार आथ्िार्क व्यवस्था में होने वाले परिवतर्न जो प्रत्यक्षतः तकनीकी नहीं होते हैं, भी समाज को बदल सकते हैं। जाना - पहचाना ऐतिहासिक उदाहरण, रोपण वृफष्िा - जहाँ बड़े पैमाने पर नकदी पफसलोंऋ जैसे - गन्ना, चाय अथवा कपास की खेती की जाती है, ने श्रम के लिए भारी माँग उत्पन्न की। इस माँग ने 17वीं - 19वीं शताब्दी के मध्य संस्था के रूप में दासता तथा अप्रफीका, यूरोप तथा अमेरिका के बीच दासों का व्यापार प्रारंभ किया। भारत में भी असम के चाय बगानों में काम करने वाले अिाकतर लोग पूवीर् भारत के थे ;विशेषकर झारखंड तथा छत्तीसगढ़ के आदिवासी भागों सेद्ध, जिन्हें बाध्य हो श्रम के लिए प्रवास करना पड़ा। आज विश्व के कइर् भागों में, अंतरराष्ट्रीय समझौतों तथा संस्थाओं जैसे वल्डर् ट्रेड आॅगर्ेनाइशेशन द्वारा आयात कर तथा शुल्कों में लाए गए परिवतर्न, संपूणर् उद्योग तथा रोशगार को खत्म करने अथवा ;काप़्ाफी कमद्ध त्वरित उछाल या प्रगति का समय वुफछ अन्य उद्योगों तथा रोशगारों के लिए ला सकते हैं। राजनीति इतिहास के लेखन तथा संस्मरण की पुरानी वििायों में, राजाओं तथा रानियों की ियाएँ सामाजिक परिवतर्न के लिए अत्यंत महत्त्वपूणर् मानी जाती थीं। परंतु जैसा कि अब हमंे पता है, राजा तथा रानियाँ विस्तृत राजनीतिक, सामाजिक तथा आथ्िार्क परिवतर्न का प्रतिनििात्व करते थे। व्यक्ित समाज में अपनी भूमिका निभा सकता था, परंतु बृहतर संदभर् में वह इसका एक भाग था। इस अथर् में, राजनैतिक शक्ितयाँ सामाजिक परिवतर्न के महत्त्वपूणर् कारण थे। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण यु(तंत्रा में देखा जा सकता है। जब एक समाज दूसरे समाज पर यु( घोष्िात करता है तथा जीतता है या हार जाता है, सामाजिक परिवतर्न इसका तात्कालिक परिणाम होता था। कभी विजेता परिवतर्न के बीज अपने साथ जहाँ कहीं भी जाता है, बोता है तो कभी विजित विजेताओं के समाज को परिवतिर्त करने तथा परिवतर्न के बीज बोने में सपफल होता है। यद्यपि इतिहास में इस तरह के कइर् उदाहरण हैं, लेकिन अमेरिका तथा जापान का आधुनिक उदाहरण देखना दिलचस्प होगा। दूसरे विश्वयु( में अमेरिका ने जापान पर महत्त्वपूणर् विजय हासिल की, आंश्िाक रूप से जननाशक हथ्िायार का प्रयोग हुआ जो मानव इतिहास में पहले कभी नहीं देखा गया था और यह था परमाणु बम। जापानियों द्वारा समपर्ण के बाद, अमेरिका ने जापान पर कब्शा कर कइर् वषो± तक उस पर शासन किया, जिससे जापान में भूमि सुधार के साथ ही साथ कइर् परिवतर्न आए। उस समय, जापान उद्योग की नकल करने तथा उससे सीखने की बेहद कोश्िाश कर रहा था। परंतु 1970 तक, हालाँकि, जापानी तकनीक, मुख्य रूप से कार निमार्ण के क्षेत्रा में, अमेरिका से काप़्ाफी आगे निकल गइर् थी। 1970 से 1990 के बीच, जापानी उद्योग ने पूरी दुनिया पर राज किया, विशेषतः यूरोप की औद्योगिक संस्थाओं तथा अमेरिका पर। अमेरिका की औद्योगिक पृष्ठभूमि विशेष रूप से, जापानी औद्योगिक तकनीक तथा उत्पादन संगठन से बृहद स्तर पर प्रभावित हुइर्। बड़े व परंपरागत रूप से शक्ितशाली उद्योगोंऋ जैसे - स्टील, वाहन तथा भारी अभ्िायांत्रिाकी को कापफी बड़ा झटका लगा तथा उन्हें अपने़आप को जापानी तकनीक तथा प्रबंधन के सि(ांतों के आधार पर बदलना पड़ा। मसलन नए उभरते क्षेत्रा जैसे इलेक्ट्राॅनिक्स का भी जापान ने सूत्रापात किया। कइर् दशकों में, जापान ने यु(तंत्रा की अपेक्षा आथ्िार्क तथा तकनीकी क्षेत्रा में अमेरिका समाज का बोध् को चुनौती दी। राजनैतिक परिवतर्न केवल अंतरराष्ट्रीय हो यह आवश्यक नहीं है बल्िक उनका बहुत बड़ा सामाजिक असर अपने देश पर भी पड़ा है। यद्यपि आपने इस प्रकार नहीं सोचा होगा, भारतीय स्वतंत्राता संग्राम सिप़्ार्फ राजनैतिक परिवतर्न, बि्रटिश शासन के अंत के रूप में ही नहीं आया बल्िक उसने भारतीय समाज को भी निश्िचत रूप से बदल डाला। इसका तात्कालिक उदाहरण 2006 में नेपाली जनता द्वारा राजवंश को पूरी तरह से नकार देना है। साधारण रूप से, राजनैतिक परिवतर्न, शक्ित के पुनः बँटवारे के रूप में विभ्िान्न सामाजिक समूहों तथा वगो± के बीच सामाजिक परिवतर्न लाता है। इस दृष्िटकोण से, सावर्भौमिक वयस्क मतािाकार अथवा ‘एक व्यक्ित एक मत’ सि(ांत, राजनैतिक परिवतर्न के इतिहास में अकेला सवार्िाक बड़ा परिवतर्न है। जब तक आधुनिक लोकतंत्रों ने पूणर् रूप से व्यक्ितयों को वोट का अिाकार नहीं दिया, जब तक चुनाव कानूनी शक्ित के लिए अिादेशात्मक नहीं हो गया, समाज की संरचना भ्िान्न प्रकार से हुइर् थी। राजा तथा रानियाँ दैविक अिाकार के अंतगर्त राज करते थे तथा वे आम आदमी के प्रति जवाबदेह नहीं थे। लोकतंात्रिाक सि(ांतों के रूप में मतािाकार को जब पहली बार प्रस्तावित किया गया, तो उसमें संपूणर् जनसंख्या को शामिल नहीं किया गया था - वास्तव में केवल एक अल्प संख्या ही वोट कर सकती थी अथवा सरकार के निमार्ण में उनका हाथ था। प्रारंभ में, वोट उन्हीं तक सीमित था जिनका जन्म समाज की किसी विश्िाष्ट प्रजाति या नृजाति में हुआ हो अथवा अमीर व्यक्ित जिनके पास संपिा हो अथवा जो इन उच्च सामाजिक वगो± से जुडे़ हों। सभी स्ित्रायाँ, निम्न वगर् के लोग अथवा अधीनस्थ नृजातियाँ तथा गरीब और कामकाजी व्यक्ित को सामान्यतः वोट देने की अनुमति नहीं थी। यह लंबे संघषो± से ही संभव हुआ कि सावर्भौमिक वयस्क मतािाकार एक मानदंड के रूप में स्थापित हुआ। हालाँकि इसने पूवर् काल की असमानताओं को समाप्त नहीं किया। आज भी प्रत्येक देश शासन के लोकतंत्रात्मक रूप को नहीं मानतेऋ और जहाँ कहीं भी चुनाव होते हैं, उन्हें बदलने के अनेक तरीके अपनाए जाते हैं जिसके कारण आम जनता अपनी सरकार के निणर्य को प्रभावित करने में शक्ितहीन रहती है, लेकिन इस सबके बावजूद, इसे नकारा नहीं जा सकता है कि सावर्भौमिक वयस्क मतािाकार एक शक्ितशाली मानदंड के रूप में काम करता है, जो प्रत्येक सरकार तथा प्रत्येक समाज को महत्त्व देता है। सरकारों को कानूनी वैधता पाने के लिए आवश्यक है कि वह कम से कम, व्यक्ितयों की आम सहमति लेता हुआ दिखाइर् दे। सामाजिक परिवतर्न के परिप्रेक्ष्य में यह व्यापक परिवतर्न लेकर आया है। संस्वृफति संस्वृफति को यहाँ विचारों, मूल्यों और मान्यताएँं जो मनुष्य के लिए आवश्यक होते हैं तथा उनके जीवन को आकार देने में मदद करते हैं, के छोटे से लेबल के रूप में प्रयुक्त किया गया है। इन विचारों तथा मान्यताओं में परिवतर्न प्रावृफतिक रूप से सामाजिक जीवन में परिवतर्न को दिखाते हैं। सामाजिक - सांस्वृफतिक संस्था का सबसे सामान्य उदाहरण धमर् है, जिसका समाज पर अत्यिाक प्रभाव पड़ा। धामिर्क मान्यताएँ तथा मानदंडों ने समाज को व्यवस्िथत करने में मदद दी तथा यह बिलवुफल आश्चयर्जनक नहीं है कि इन मान्यताओं में परिवतर्न ने समाज को बदलने में मदद की। धमर् इतना महत्त्वपूणर् है कि वुफछ विचारकों ने सभ्यता को धामिर्क परिप्रेक्ष्य में परिभाष्िात किया है तथा वे इतिहास को दो धमो± में अंतःसंबंध की प्रवि्रफया के रूप में देखते हैं। यद्यपि, सामाजिक परिवतर्न के अन्य महत्त्वपूणर् कारकों में, धमर् भी संदभर्गत होता है - यह सब संदभा±े को नहीं परंतु वुफछ को प्रभावित करता है। मैक्स वेबर का अध्ययन ‘द प्रोटेस्टेंट एथ्िाक एण्ड द स्पीरिट आॅपफ वैफपिटलिश्म’ दिखाता है कि पूँजीवादी सामाजिक प्रणाली की स्थापना में वुफछ प्रोटेस्टेंट इर्साइर् संवगर् ने किस प्रकार मदद की। आथ्िार्क तथा सामाजिक परिवतर्न के प्रभाव का यह एक महत्त्वपूणर् उदाहरण है। भारत में भी हम सामाजिक परिवतर्न के रूप में धमर् के कइर् उदाहरण देखते हैं। इनमें सबसे उत्वृफष्ट उदाहरण प्राचीन भारत के सामाजिक तथा राजनैतिक जीवन पर बौ( धमर् का प्रभाव, तथा मध्यकालीन सामाजिक संरचना में अंतनिर्हित जाति व्यवस्था के संदभर् में व्यापक प्रभाव के रूप में देखा जा सकता है। समाज में महिलाओं की स्िथति में जो सामाजिक परिवतर्न आए हैं, उसके वैचारिक उद्भव वफो सांस्वृफतिक उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। आधुनिक काल में महिलाओं ने समानता के लिए संघषर् किया है, उन्होंने समाज को कइर् रूपों में परिवतिर्त करने में सहायता की है। ऐतिहासिक परिस्िथतियाँ महिलाओं के संघषर् के लिए कहीं सहायक सि( हुइर् हैं तो कहीं बाधक। उदाहरण के लिए, द्वितीय विश्वयु( के समय पाश्चात्य देशों में महिलाओं ने कारखानों में काम करना प्रारंभ कर दिया जो पहले कभी नहीं हुआ था तथा जो पहले हमेशा पुरुषों द्वारा किए जाते थे। यह वास्तविकता थी कि महिलाएँ जहाश बना सकती थीं, भारी मशीनों को चला सकती थीं, हथ्िायारों का निमार्ण आदि कर सकती थीं, इसने समानता पाने के उनके दावे को मजबूत किया। पर यह भी सत्य है कि यदि यु( न हुआ होता तो उन्हें और लंबे समय तक इसके लिए संघषर् करना पड़ता। एक दूसरे प्रकार का उदाहरण, जहाँ महिलाएँ अपनी अस्िमता में परिवतर्न लाने में सपफल हुइर् हैं, वह क्षेत्रा है उपभोक्ता विज्ञापन। अिाकतर नगरीय समाजों में, महिलाएँ ही यह निणर्य लेती हैं कि घरेलू उपयोग के लिए कौन सी वस्तुएँ खरीदी जाएँ। इसने विज्ञापनों ने एक उपभोक्ता के रूप में महिलाओं की सोच वफो प्रति संवदेनशील बनाया है। विज्ञापन के खचो± का एक महत्त्वपूणर् अंश अब महिलाओं को मिलता है और इसका प्रभाव मीडिया पर पड़ा है। संक्षेप में, महिलाएँ आथ्िार्क भूमिका परिवतर्न की शंृखला की शुरुआत करती है जिसके बड़े सामाजिक परिणाम निकल सकते है। उदाहरण के तौर पर, विज्ञापन महिला को एक निणार्यक सदस्य के रूप में दिखा सकता है अथवा महत्त्वपूणर् व्यक्ित के रूप में, जिसके बारे में न तो पहले सोचा जा सकता था और न ही जिसे बढ़ावा दिया जा सकता था। सामान्यतः पहले श्यादातर विज्ञापन पुरुषों को संबोिात किए जाते थे, अब उतना ही महिलाओं को भी समाज का बोध् संबोिात किया जाता है अथवा वुफछ क्षेत्रों में जैसे घरेलू वस्तुएँ अथवा उपभोक्ता वस्तुओं में मुख्यतः महिलाओं को। अतः यह विज्ञापकों तथा निमार्ताओं के लिए आवश्यक हो गया है कि महिलाएँ क्या सोचती तथा महसूस करती हैं, उस पर ध्यान दिया जाए। एक अन्य उदाहरण जहाँ सांस्वृफतिक परिवतर्न सामाजिक परिवतर्न लाता है, खेलवूफद के इतिहास में देखा जा सकता है। खेलवूफद हमेशा से लोकपि्रय संस्वृफति की अभ्िाव्यक्ित रहे हैं, जो कभी - कभी अिाक महत्त्वपूणर् हो जाते हैं। वि्रफकेट का प्रारंभ बि्रटिश राजशाही वगर् के शौक के रूप में हुआ, बि्रटेन के मध्यम तथा कामकाजी वगो± में पैफला और वहाँ से पूरी दुनिया के अंग्रेशी साम्राज्य में। जैसे ही इस खेल ने भारत से बाहर अपनी जड़ें जमाईं, यह अिाकतर राष्ट्रीय अथवा प्रजातीय गवर् का प्रतीक बना। वि्रफकेट में तीव्र प्रतियोगिता का भ्िान्न इतिहास है, जो खेलवूफद की सामाजिक महत्ता को कथात्मक रूप में दिखाता है। इंग्लैंड तथा आॅस्ट्रेलिया की प्रतियोगिता सामाजिक अधीनस्थ उपनिवेश ;आॅस्ट्रेलियाद्ध का शासन के वेंफद्र में प्रभावशाली उच्च वगर् ;इंग्लैंडद्ध के प्रति रोष दशार्ती है। इसी प्रकार 1970 तथा 80 में पूरी दुनिया पर वेस्ट इंडीज वि्रफकेट टीम का वचर्स्व भी औपनिवेश्िाक व्यक्ितयों के प्रजातीय गवर् को दिखाता है। भारत द्वारा, वि्रफकेट में इंग्लैंड को हराना हमेशा से वुफछ खास रहा है, विशेषकर स्वाधीनता से पूवर्। दूसरे स्तर पर, वि्रफकेट की भारतीय उपमहाद्वीप में लोकपि्रयता ने इस खेल के व्यावसायिक प्रारूप को बदल दिया है जो अब दक्ष्िाणी एश्िायाइर् प्रशंसकों की रुचियों से प्रभावित होता है, विशेषकर भारतीय। जैसा कि उफपरी परिचचार् से साप़्ाफ होता है, कोइर् एक सि(ांत अथवा कारक सामाजिक परिवतर्न के लिए िाम्मेवार नहीं होता है। सामाजिक परिवतर्न के कारक आंतरिक अथवा बाह्य हो सकते हैं, सोची - समझी वि्रफया अथवा आकस्िमक कारकों के परिणाम हो सकते हैं। सामाजिक परिवतर्न के कारक अिाकांशतः परस्पर संबंिात होते हैं। आथ्िार्क तथा तकनीकी कारक के सांस्वृफतिक संघटक भी हो सकते हैं, राजनीति पयार्वरण द्वारा हो सकती है अतः यह आवश्यक है कि सामाजिक परिवतर्न तथा उसके विभ्िान्न प्रकार की विधाओं से परिचित रहा जाए। परिवतर्न हमारे लिए एक मुख्य विषय है क्योंकि परिवतर्न की गति आधुनिक समय में मुख्यतः समकालीन समय में पहले की तुलना में काप़्ाफी तेश हो गइर् है। यद्यपि सामाजिक परिवतर्न को विगत समय में अच्छी तरह से समझा जा सकता है - जब यह घटित हो चुका होता है - हमें इसके होने के समय से परिचित होना चाहिए तथा उसके लिए जो भी तैयारी हो सके करनी चाहिए। सामाजिक व्यवस्था सामाजिक घटना अथवा प्रवि्रफयाओं का अथर् ़लगता है जब वुफछ चीशें ऐसी भी होती हैं जो बदलती नहीं हैं, ताकि वे साम्य तथा वैषम्य की संभावना दिखा सवेंफ। दूसरे शब्दों में, सामाजिक परिवतर्न, सामाजिक व्यवस्था के साथ ही समझा जा सकता है, जो सुस्थापित सामाजिक प्रणालियाँ परिवतर्न का प्रतिरोध तथा उसे विनियमित करती हैं। सामाजिक परिवतर्न तथा सामाजिक व्रफम के अंतस±बंधों को देखने का दूसरा तरीका है, यह सोचना कि समाज परिवतर्न को रोकना, हतोत्साहित अथवा नियंत्रिात क्यों करना चाहता है। अपने आपको एक शक्ितशाली तथा प्रासंगिक सामाजिक व्यवस्था के रूप में सुव्यवस्िथत करने के लिए प्रत्येक समाज को अपने आपको समय के साथ पुनउर्त्पादित करना तथा उसके स्थायित्व को बनाए रखना पड़ता है। स्थायित्व के लिए आवश्यक है कि चीशें कमोबेश वैसी ही बनी रहें जैसी वे हैं - अथार्त व्यक्ित लगातार समान नियमों का पालन करता रहे, समान वि्रफयाएँ एक ही प्रकार के परिणाम दें और साधारणतः व्यक्ित तथा संस्थाएँ पूवार्नुमानित रूप मंे आचरण करें। ियाकलाप 4 हम एक समान स्िथति को उबाउफ तथा परिवतर्नविषमताओं में ही सापफ उभर कर आता है, ठीक उसी प्रकार से जैसे पन्ने पर लिखे गए अक्षर जिसे को प्रसन्नतादायक मानते हैं, वैसे यह सही भी है - कि परिवतर्न दिलचस्प होता है तथा परिवतर्न आप पढ़ रहे हैं, सुवाच्य हैं क्योंकि वे पृष्ठभूमि वफी विषमता में हैं। ठीक इसी प्रकार, एक प्रवि्रफया के रूप में, सामाजिक परिवतर्न अथर् ग्रहण करता है, निरंतरता की पृष्ठभूमि में अथवा परिवतर्न के अभाव में। यह अजीब लग सकता है, परंतु परिवतर्न एक संकल्पना के रूप में तभी अथर्वान में कमी वाकइर् बेकार होती है। परंतु सोचिए कि जीवन वैफसा होगा अगर आपको मजबूरन हमेशा बदलना पड़े... क्या होगा यदि आपको भोजन में वही खाना हमेशा न मिले, प्रत्येक दिन वुफछ अलग, एक ही चीश दोबारा न मिले, चाहे आप पसंद करते हों या नहीं। कल्पना करें इस डरावनी सोच का - क्या हो जब आप स्वूफल से वापस आएँ तो घर में अलग - अलग लोग हों, अलग माता - पिता, अलग भाइर् - बहन.....? क्या हो यदि आप अपना पसंदीदा खेल खेलें - पुफटबाॅल, वि्रफकेट, बाॅलीवाॅल, हाॅकी इत्यादि - और हर बार नियम अलग हों? आप अपने जीवन के वुफछ पक्षों के बारे में सोचिए जहाँ आप चीशों को जल्दी बदलना नहीं चाहेंगे। क्या ये आपके जीवन के वे क्षेत्रा हैं जहाँ आप चीशों में जल्दी परिवतर्न चाहेंगे? कारण सोचने की कोश्िाश कीजिए कि क्यों आप वुफछ विशेष स्िथतियों में परिवतर्न चाहेंगे या नहीं? समाज परिवतर्न के प्रति विरोधी भाव क्यों रखता है, उपरोक्त तवर्फ इसका अमूतर् तथा सामान्य कारण है। परंतु इसके ठोस तथा विश्िाष्ट कारण हैं कि समाज क्यों परिवतर्न का विरोध करता है। याद कीजिए, आपने सामाजिक संरचना तथा सामाजिक स्तरीकरण के बारे में प्रथम अध्याय में क्या पढ़ा था। अिाकतर समय, अिाकतर समाज असंगत रूप में संस्तरित होते हैं, अथार्त आथ्िार्क संसाधनों, सामाजिक स्तर तथा राजनैतिक शक्ित के संदभर् में विभ्िान्न वगा±े की स्िथति भ्िान्न है। यह आश्चयर्जनक नहीं है कि जिनकी स्िथति अनुवूफल है वे यथास्िथति चाहते हैं तथा जो विपरीत परिस्िथतियों में हैं परिवतर्न चाहते हैं। अतः समाज के शासक अथवा प्रभावशाली वगर् अिाकांशतः सामाजिक परिवतर्न का प्रतिरोध करते हैं जो उनकी स्िथति को बदल सकते हैं क्योंकि स्थायित्व में उनका अपना हित होता है। वहीं दूसरी तरप़्ाफ, अधीनस्थ अथवा शोष्िात वगो± का हित परिवतर्न में होता है। ‘सामान्य’ स्िथतियाँ समाज का बोध् अिाकांशतः अमीर तथा शक्ितशाली वगो± की तरप़्ाफदारी करती हैं तथा वे परिवतर्न के प्रतिरोध में सपफल होती हैं। यह समाज के स्िथर रहने का दूसरा विस्तृत कारण है। सामान्यतः यह माना जाना कि सामाजिक व्यवस्था परिवतर्न के विचारों से प्रतिबंिात नहीं है, इसका अथर् सकारात्मक अिाक है। यह सामाजिक संबंधों के विश्िाष्ट प(ति तथा मूल्यों एवं मानदंडों के सवि्रफय अनुरक्षण तथा उत्पादन को निदेर्श्िात करता है। विस्तृत रूप में, सामाजिक व्यवस्था इन दो में से किसी एक तरीके से प्राप्त की जा सकती है - जहाँ व्यक्ित नियमों तथा मानदंडों को स्वतः मानते हों अथवा जहाँ व्यक्ितयों को मानदंडों को मानने के लिए बाध्य किया जाता हो। प्रत्येक समाज इन दोनों तरीकों का मिश्रित प्रयोग सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए करता है। सामाजिक व्यवस्था के सहज संवेंफद्रन का ड्डोत मूल्यों तथा मानदंडों की साझेदारी से निधार्रित होता है। यह समाजीकरण की प्रवि्रफया में अपनाया जाता है ;समाजीकरण पर परिचचार् समाजशास्त्रा की प्रस्तावना में देखेंद्ध। समाजीकरण भ्िान्न परिस्िथतियों में अिाक या न्यूनतः वुफशल हो सकता है, परंतु वह कितना ही वुफशल क्यों न हो, यह व्यक्ित की दृढ़ता को पूणर् रूप से समाप्त नहीं कर सकता है। दूसरे शब्दों में, समाजीकरण मनुष्य को रोबोट नहीं बना सकता। यह हर समय प्रत्येक मानदंड के लिए पूणर् तथा स्थायी सहमति तैयार नहीं कर सकता। इसका अनुभव आपने भी अपने जीवन में किया होगा, नियम तथा विश्वास जो एक समय में प्रावृफतिक तथा सही लगते हैं, दूसरे समय में उतने सही नहीं लगते हैं। हम अपनी बीती धारणाओं पर प्रश्न करते हैं तथा हम किसे सही अथवा गलत मानते हैं - इस पर अपनी सोच बदल देते हैं। कइर् बार, हम अपने विश्वासों को वापस मान लेते हैं जिन्हें हमने पहले माना तथा पिफर छोड़ दिया। कालांतर में भ्िान्न परिस्िथतियों में जीवन की किसी आगामी अवस्था में हम उन्हें पुनः नए रूप में पाते हैं। अतः समाजीकरण, सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अथक प्रयास करता है परंतु यह प्रयास भी अपने आप में पूणर् नहीं होता। अतः अिाकतर आधुनिक समाज वुफछ रूपों में संस्थागत तथा सामाजिक मानदंडों को बनाए रखने के लिए शक्ित अथवा दबाव पर निभर्र करते हैं। यह आवश्यक है। सत्ता की परिभाषा अिाकांशतः इस रूप में दी जाती है कि सत्ता स्वेच्छानुसार एक व्यक्ित से मनचाहे कायर् को करवाने की क्षमता रखती है। जब सत्ता वफा संबंध स्थायित्व तथा स्िथरता से होता है तथा इससे जुड़े पक्ष अपने सापेक्ष्िाक स्थान के अभ्यस्त हो जाते हैं, तो हमारे सामने प्रभावशाली स्िथति उत्पन्न होती है। यदि सामाजिक तथ्य ;व्यक्ित, संस्था अथवा वगर्द्ध नियमपूवर्क अथवा आदतन सत्ता की स्िथति में होते हैं, तो इसे प्रभावी माना जाता है। साधारण समय में, प्रभावशाली संस्थाएँ, समूह तथा व्यक्ित समाज में निणार्यक प्रभाव रखते हैं। ऐसा नहीं है कि उन्हें चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ता, परंतु यह विपरीत तथा विश्िाष्ट परिस्िथतियों में होता है। हालाँकि इसका मतलब हो सकता है कि व्यक्ित को वुफछ कायर् जबरन करना पड़ता है। आम स्िथतियों में इसका प्रभाव काप़्ाफी ‘सुगम’ होता है, अथार्त बिना किसी घषर्ण अथवा परेशानी के दिखाइर् देता है। ;‘बाध्य सहयोग’ की संकल्पना अध्याय - 1 में देख्िाए। उदाहरणतः महिलाएँ अपने जन्म के परिवार में संपिा के अिाकार का दावा क्यों नहीं करतीं? वे पितृसत्तात्मक मानदंड से सहमति क्यों रखती हैं?द्ध प्रभाव, सत्ता तथा कानून यह वैफसे हो सकता है कि प्रभाव अप्रतिरोधक हो जबकि यह सीधे तौर पर असंतुलित संबंधों पर आधारित है जहाँ कीमतें तथा सुविधाएँ अनियमित रूप से बाँटे हुए हैं। उत्तर का आंश्िाक भाग हमें पूवर् अध्याय की परिचचार् से प्राप्त हो चुका है - प्रभावशाली वगर् असंतुलित संबंधों में अपनी शक्ित के बल पर सहयोग प्राप्त करते हैं। परंतु यह शक्ित काम क्यों करती है? क्या यह कायर् केवल शक्ित के भय से करता है? यहाँ हम समाजशास्त्रा की मुख्य संकल्पना ‘वैधता’ पर आते हैं। सामाजिक संदभर् में, वैधता इंगित करती है स्वीवृफति की स्िथति जो शक्ित संतुलन में अंतनिर्हित है। ऐसी चीशें जो वैध हैं वह उचित, सही तथा ठीक मानी जाती हैं। बृहत स्तर पर, यह सामाजिक संविदा का अभ्िास्वीवृफत भाग है जो सामयिक रूप से प्रचलित है। संक्षेप में, ‘वैधता’ अिाकार, संपिा तथा न्याय के प्रचलित मानदंडों की अनुरूपता में निहित है। हमने पहले ही देखा है कि शक्ित समाज में किस प्रकार से परिभाष्िात होती है, शक्ित अपने आप में एक सच्चाइर् है - यह कानूनी हो सकती है अथवा नहीं। मैक्स वैबर के अनुसार सत्ता कानूनी शक्ित है - अथार्त शक्ित न्यायसंगत तथा ठीक समझी जाती है। उदाहरण के लिए, एक पुलिस आॅप्ि़ाफसर, एक जज अथवा एक स्वूफल श्िाक्षक - सब अपने कायर् में निहित सत्ता का प्रयोग करते हैं। ये शक्ित उन्हें विशेषकर उनके सरकारी कायो± की रूपरेखा को देखते हुए प्रदान की गइर् है - लिख्िात कागशातों द्वारा सत्ता क्या कर सकती है तथा क्या नहीं, का बोध होता है। सत्ता का अथर् है कि समाज के अन्य सदस्य जो इसके नियमों तथा नियमावलियों को मानने को तैयार हैं, इस सत्ता को एक सही क्षेत्रा में मानने को बाध्य हों। मसलन, एक जज का कायर् क्षेत्रा कोटर्रूम होता है, और जब नागरिक कोटर् में होते हैं, उन्हें जज की आज्ञा का पालन करना पड़ता है अथवा उनकी शक्ित से वे असहमति जता सकते हैं। कोटर्रूम के बाहर जज किसी भी अन्य नागरिक की तरह हो सकता है। अतः सड़क पर उसे पुलिस की कानूनी सत्ता को मानना पड़ेगा। अपनी ड्यूटी पर, पुलिस सभी नागरिकों की वि्रफयाओं की निगरानी करती है केवल अपने बड़े आॅपिफसर को छोड़कर। परंतु नागरिकों का निजी जीवन उनके अिाकार क्षेत्रा की सीमा से तब तक बाहर रहता है जब तक वे संदिग्ध अथवा गैरकानूनी कायर् न करें। अलग तरीके से - अलग इसलिए क्योंकि जिस प्रकार की शक्ित निहित है वह कम सख्ती के साथ परिभाष्िात की गइर् है - श्िाक्षक की सत्ता अपने छात्रों पर कक्षा के अंदर होती है। उसकी सत्ता का क्षेत्रा उसके छात्रों के घर तक विस्तृत नहीं है जहाँ माता - पिता अथवा अभ्िाभावकों के कतर्व्य तथा शक्ित बच्चों के लिए महत्वपूणर् होते हैं। समाज का बोध् वुफछ अन्य प्रकार की सत्ता होती है जिनको सख्ती से परिभाष्िात नहीं किया गया है, परंतु सहयोग तथा सहमति बनाने में वे बेहद प्रभावी होते हैं। इसका एक अच्छा उदाहरण धामिर्क नेता की शक्ित है। यद्यपि वुफछ संस्थागत धमो± ने आंश्िाक रूप में इस सत्ता को औपचारिक बनाया है परंतु एक धामिर्क वगर् के नेता अथवा छोटी संस्थाओं के अल्पसंख्यक धामिर्क वगर् औपचारिक हुए बिना भी अत्यंत ताकतवर होते हैं। ठीक इसी प्रकार श्िाक्षाविद्, कलाकार, लेखक तथा अन्य बुिजीवी अपने - अपने क्षेत्रों में, बिना औपचारिक हुए, कापफी शक्ितशाली हैं। यह अपराधी गिरोह के मुख्िाया के लिए भी सही है कि उसके पास बिना किसी औपचारिक मानदंडों के पूणर् सत्ता होती है। सुस्पष्ट संहिता तथा अनौपचारिक सत्ता में अंतर कानून के बोध में प्रासंगिक है। कानून सुस्पष्ट संहिताब( मानदंड अथवा नियम होते हैं। यह ज्यादातर लिखे जाते हैं तथा नियम किस प्रकार बनाए अथवा बदले जाने चाहिए, अथवा कोइर् उनको तोड़ता है तो क्या करना चाहिए, इसके लिए भी कानून है। आधुनिक लोकतांत्रिाक समाज में कानून विधायिका द्वारा तैयार किए जाते हैं जिनका निमार्ण चुने हुए प्रतिनििायों द्वारा होता है। राष्ट्र का कानून वहाँ की जनता के नाम पर उनके द्वारा चुने गए प्रतिनििायों द्वारा चलाया जाता है। ये कानून नियमों को बनाते हैं जिनके द्वारा समाज पर शासन किया जाता है। कानून प्रत्येक नागरिक पर लागू होता है। चाहे एक व्यक्ित के रूप में ‘मैं’ कानून विशेष से सहमत हूँ या नहीं, यह नागरिक के रूप में ‘मुझे’ जोड़ने वाली ताकत है, तथा अन्य सभी नागरिकों को उनकी मान्यताओं से हटकर। अतः प्रभाव, शक्ित के तहत कायर् करता है, परंतु इनमें से अिाकांश शक्ित वास्तव में कानूनी शक्ित अथवा सत्ता होती है, जिसका एक बृहत्तर भाग कानून द्वारा संहिताब( होता है। कानूनी संरचना तथा संस्थागत मदद के कारण सहमति तथा सहयोग नियमित रूप से तथा भरोसे के आधार पर लिया जाता है। यह शक्ित के प्रभाव क्षेत्रा अथवा प्रभावितों को समाप्त नहीं करता। यह उल्लेखनीय है कि कइर् प्रकार की शक्ितयाँ हैं जो समाज में प्रभावी हैं हालाँकि वे गैरकानूनी हैं, और यदि कानूनी हैं तब कानूनी रूप से संहिताब( नहीं हैं। यह कानूनी, कानूनी सत्ता तथा अन्य प्रकार की शक्ितयाँ हैं जो सामाजिक व्यवस्था की प्रवृफति तथा उसकी गतिशीलता को निधार्रित करती हैं। विवाद ;संघषर्द्ध, अपराध तथा हिंसा प्रभाव, शक्ित, कानूनी सत्ता तथा कानून के अस्ितत्व का यह अथर् नहीं है कि हमेशा उनका पालन हो या उन्हें माना जाए। आपने पहले ही समाज में संघषर् तथा प्रतियोगिता के बारे में पढ़ा है। ठीक इसी प्रकार, समाज में विवाद के सामान्य प्रकार को जानने की आवश्यकता है। विवाद विस्तृत रूप में असहमति के लिए एक शब्द के रूप में प्रयुक्त हुआ है। प्रतियोगिता तथा संघषर् इससे अिाक विश्िाष्ट हैं तथा असहमति के अन्य प्रकारों को छोड़ देते हैं, जिनका इस प्रकार की परिभाषा में वणर्न न किया जा सके। इसका एक उदाहरण है युवाओं में पाइर् जाने वाली ‘दोहरी - संस्वृफति’ अथवा युवा असंतोष। यह प्रचलित सामाजिक मानदंडों का विरोध अथवा अस्वीवृफति है। इन विरोधों की विषयवस्तु बाल अथवा वस्त्रों के पैफशन से लेकर भाषा अथवा जीवनशैली वुफछ भी हो सकता है। अत्यिाक मानक अथवा परंपरागत प्रतिद्वंद्विता का रूप चुनाव होता है - जो राजनैतिक प्रतियोगिता का एक रूप है। विवाद, कानून अथवा कानूनी सत्ता से असहमति अथवा विद्रोह भी होता है। खुले तथा लोकतांत्रिाक समाज इस प्रकार की असहमति को भ्िान्न स्तरों तक छूट देते हैं। इस प्रकार की असहमति के लिए स्पष्ट तथा अस्पष्ट दोनों प्रकार की सीमाएँ परिभाष्िात की गइर् हैं। इन सीमाओं का उल्लंघन किसी - न - किसी रूप में समाज की प्रतिवि्रफया को जानना चाहते हैं, विशेषकर कानून प्रवतर्न अिाकारियों की। जैसा कि आप जानते हैं, भारतीयों की तरह एक रहने पर भी हमें एक - दूसरे को एक दूसरे से असहमत होने से नहीं रोक सकते। विभ्िान्न राजनैतिक दलों की भ्िान्न कायर्सूचियाँ होती हैं यद्यपि वे एक ही संविधान का आदर करते हैं। एक जैसे ट्रैपिफक नियमों का ज्ञान सड़क पर जोरदार बहस को रोक नहीं पाता। दूसरी तरपफ, महत्त्वपूणर् प्रश्न यह है कि समाज में कितने अंतर अथवा असहमति को सहन किया जाता है। इस प्रश्न का उत्तर सामाजिक तथा ऐतिहासिक स्िथतियों पर निभर्र करता है परंतु यह समाज में एक महत्त्वपूणर् सीमा अंकित करता है, कानूनी तथा गैर कानूनी, वैध तथा अवैध, माननीय तथा अमाननीय सीमाएँ। यद्यपि, सामान्य रूप से उनमें एक शक्ितशाली नैतिक आरोप होता है, माना जाता है कि अपराध की व्युत्पिा कानून से होती है। अपराध एक ऐसा कमर् है जो विद्यमान कानून को तोड़ता है - न ज्यादा, न कम। किसी भी वि्रफया की नैतिकता केवल इस बात से ही निधार्रित नहीं होती कि इसने विद्यमान कानून को तोड़ा है। यदि विद्यमान कानून न्यायपूणर् नहीं है, उदाहरण के तौर पर एक व्यक्ित इसे तोड़ने में उँफचे नैतिक कारणों का दावा करता है। ऐसा ही सविनय अवज्ञा आंदोलन के तहत भारतीय स्वतंत्राता संग्राम के नेता कर रहे थे। जब गांधीजी ने, दाँडी में, बि्रटिश सरकार का नमक कानून तोड़ा, तो वे एक अपराध कर रहे थे फ्रतार भी किया गया।.तथा उन्हें इसके लिए गिरसमाज का बोध् तौर पर हिंसा की प्रत्येक वि्रफया को राज्य के ख्िालापफ देखा जा सकता है। यदि मैं किसी व्यक्ित पर हमला अथवा उसे जान से मार दूँ तो राज्य मुझे ¯हसा के वैध प्रयोग के एकािाकार का हनन करने पर अभ्िायोजित करेगा। यह सापफ है कि हिंसा सामाजिक व्यवस्था की शत्राु है तथा विरोध का उग्र रूप है जो मात्रा कानून का ही नहीं बल्िक महत्त्वपूणर् सामाजिक मानदंडों का भी अतिव्रफमण करती है। समाज में हिंसा सामाजिक तनाव का प्रतिपफल है तथा गंभीर समस्याओं की उपस्िथति को दशार्ती है। यह राज्य की सत्ता को चुनौती भी है। इस अथर् लेकिन उन्होंने इस अपराध को जानबूझकर तथा गवर् के साथ किया तथा भारतीय भी इस पर तथा जिन मूल्यों का वे प्रतिनििात्व कर रहे थे, उस पर गवर् करते थे। वास्तव में, केवल एक यही अपराध नहीं था जो किया जा रहा था। यहाँ कइर् दूसरे प्रकार के अपराध थे जो नैतिकता का दावा नहीं कर सकते। मुख्य बिंदु यह है कि - अपराध कानून को तोड़ना है - कानून द्वारा परिभाष्िात वैध सीमाओं के बाहर जाना है। हिंसा का प्रश्न अपने विस्तृत स्तर पर राज्य की बुनियादी परिभाषा से जुड़ता है। आधुनिक राज्य की एक प्रमुख विशेषता है कि वह अपने कायर्क्षेत्रा में वैध हिंसा के प्रयोग पर एकािाकार समझता है। दूसरे शब्दों में, राज्य ;सत्तावादी कायर्कारियों द्वाराद्ध कानूनी तौर पर हिंसा का प्रयोग कर सकता है - परिभाषा के तौर पर अन्य सभी उदाहरण हिंसा के लिए गैर कानूनी हैं ;वुफछ अपवादों जैसे असाधारण स्िथतियों में अपने आप को बचाने की स्िथतिद्ध। अतः तकनीकी में वैध शासन की असपफलता, सहमति तथा खुले तौर पर संघषो± का होना है। गाँव, कस्बों और नगरों में सामाजिक व्यवस्था तथा सामाजिक परिवतर्न अिाकांश समाजों का वगीर्करण ग्रामीण तथा नगरीय क्षेत्रों में किया जाता है। इसलिए जीवन की दशाएँ तथा सामाजिक संगठन के रूप, इन क्षेत्रों में एक - दूसरे से कापफी अलग होते हैं। अतः, सामाजिक व्यवस्था के रूप जो इन क्षेत्रों में विद्यमान होते हैं, तथा विभ्िान्न प्रकार के सामाजिक परिवतर्न के प्रकार पाए जाते हंै जिन्हें समझना कापफी महत्त्वपूणर् है।़हम सब मानते हैं कि एक गाँव, कस्बा अथवा नगर का अथर् क्या है। परंतु क्या हम ठीक तरह से इनमें अंतर स्पष्ट करते हैं? ;अध्याय 5 में ग्रामीण अध्ययन के अंतगर्त एम.एन. श्रीनिवास पर हुइर् परिचचार् देखेंद्ध समाजशास्त्राीय दृष्िटकोण से, गाँवों का उद्भव सामाजिक संरचना में आए महत्त्वपूणर् परिवतर्नों से हुआ जहाँ खानाबदोशी जीवन की प(ति जो श्िाकार, भेाजन संकलन तथा अस्थायी वृफष्िा पर आधारित थी, का संक्रमण स्थायी जीवन में हुआ। स्थानीय वृफष्िा - अथवा वृफष्िा का वह रूप जहाँ जीविकोपाजर्न के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं घूमना पड़ता - के साथ सामाजिक संरचना में भी परिवतर्न आया। भूमि निवेश तथा तकनीकी खोजों ने वृफष्िा में अतिरिक्त उत्पादन की संभावना को जन्म दिया जो उसके सामाजिक अस्ितत्व के लिए अपरिहायर् है। अतः स्थायी वृफष्िा का अथर् हुआ संपिा का जमाव संभव था जिसके कारण सामाजिक विषमताएँ भी आईं। अत्यिाक उच्च श्रम - विभाजन ने व्यावसायिक विश्िाष्टता की आवश्यकता को जन्म दिया। इन सब परिवतर्नों ने मिलकर गाँव के उद्भव को एक आकार दिया जहाँ लोगों का निवास एक विश्िाष्ट प्रकार के सामाजिक संगठन पर आधारित था। आथ्िार्क तथा प्रशासनिक शब्दों में, ग्रामीण तथा नगरीय बसावट के दो मुख्य आधार हैंः जनसंख्या का घनत्व तथा वृफष्िा - आधारित आथ्िार्क ियाओं का अनुपात। ;बाह्य आवृफति के विपरीत, आकार हमेशा निणार्यक नहीं होतेऋ बडे़ गाँव तथा छोटे शहरों को मात्रा उनकी जनसंख्या के आधार पर एक - दूसरे से अलग करना कठिन होता है।द्ध अतः शहरों तथा नगरों में जनसंख्या का घनत्व अिाक होता है - अथवा प्रति इकाइर् क्षेत्रा में लोगों की संख्या, जैसे वगर् किलोमीटर तुलना में गाँव। यद्यपि लोगों की संख्या की दृष्िट से वे छोटे होते हैं, परंतु गाँवों का विस्तार तुलनात्मक रूप में अिाक बडे़ क्षेत्रा में होता है। शहरों तथा नगरों से गाँव को उनके आथ्िार्क प्रारूप में वृफष्िाजन्य ियाकलापों में एक बडे़ भाग के आधार पर भी अलग किया जाता है। दूसरे शब्दों में, गाँवों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा वृफष्िा संबंिात व्यवसाय से जुड़ा है। अिाकांश वस्तुएँ वृफष्िा उत्पाद ही होती हैं जो इनकी आय का प्रमुख ड्डोत होता है। मुख्यतः कस्बे तथा नगर में अंतर, प्रशासनिक परिभाषा का विषय है। एक कस्बा तथा नगर मुख्यतः एक ही प्रकार के व्यवस्थापन होते हैं, जहाँ अंतर उनके आकार के आधार पर होता है। एक ‘शहरी संवुफल’ ;शब्द जो जनगणना तथा कायार्लयी रिपोटर् में इस्तेमाल किए जाते हैंद्ध एक ऐसे नगर के संदभर् में प्रयुक्त होता है जिसके चारों ओर उप - नगरीय क्षेत्रा तथा उपाश्रित व्यवस्थापन होेते हैं। ‘महानगरीय क्षेत्रा’ के अंतगर्त एक से अिाक नगर आते हैं अथवा एक क्रमवार शहरी व्यवस्थापन जो एक अकेले शहर के कइर् गुना के बराबर होते हैं। जिस दिशा में आधुनिक समाज का विकास हुआ है, नगरीकरण की प्रिया अिाकतर देशों में देखी जा रही है। यह ऐसी प्रिया है जहाँ क्रमशः नगरीय जनसंख्या का बड़े से बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा नगरों में रहता है। अिाकांश विकसित देश श्यादातर नगरीय हैं। विकासशील देशों में भी नगरीकरण के प्रति रुझान देखा जा रहा है। यह तीव्र अथवा मिम हो सकता है, अगर कोइर् विशेष कारण न हो तो इसे अवरु( नहीं किया जा सकता। अिाकांश संदभा±े में यह प्रिया घटित हो रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ की 2007 वफी रिपोटर् के अनुसार, मानव इतिहास में पहली बार, संसार की नगरीय जनसंख्या ग्रामीण जनसंख्या को पीछे छोड़ देगी। भारतीय समाज में भी नगरीकरण की प्रिया देखी जा सकती है। ;स्वतंत्राता के तुरंत बाद नगरीय क्षेत्रों में निवास करने वाली जनसंख्या का प्रतिशत 1901 में 11» से थोड़ा कम तथा 1951 में 17» से थोड़ा श्यादा था।द्ध 2001 की जनगणना के अनुसार अब 28» के करीब जनसंख्या नगरीय क्षेत्रों में रहती है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की लगभग 35» जनसंख्या नगरों में निवास करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक व्यवस्था तथा सामाजिक परिवतर्न चूँकि गाँवों की वस्तुनिष्ठ स्िथति भ्िान्न होती है। अतः यह अपेक्षा की जाती है कि सामाजिक व्यवस्था तथा सामाजिक परिवतर्न की प्रवृफति में भी भ्िान्नता होगी। गाँवों का आकार छोटा होता है। अतः ये अिाकांशतः व्यक्ितगत संबंधों का अनुमोदन करते हैं। गाँव के लोगोें द्वारा तकरीबन गाँव के ही दूसरे लोगों को देखकर पहचान लेना असामान्य नहीं है। अिाकांशतः गाँव की सामाजिक संरचना परंपरागत तरीकों से चालित होती हैः इसलिए संस्थाएँ जैसे जाति, धमर् तथा सांस्वृफतिक एवं परंपरागत सामाजिक प्रथाओं के दूसरे स्वरूप यहाँ अिाक प्रभावशाली हैं। इन कारणों से, जब तक कोइर् विश्िाष्ट परिस्िथतियाँ न हों, गाँवों में परिवतर्न नगरों की अपेक्षा धीमी गति से होता है। इसके लिए अलग से भी कइर् कारण जिम्मेदार हैं। विभ्िान्न परिस्िथतियाँ यह सुनिश्िचत करती हैं कि समाज के अधीनस्थ समूहों के पास ग्रामीण इलाके में अपने नगरीय भाइयों की तुलना में समाज का बोध् अभ्िाव्यक्ित के दायरे बहुत कम होते हैं। गाँव में व्यक्ित एक दूसरे से सीधा संब( होता है। इसलिए व्यक्ित विशेष का समुदाय के साथ असहमत होना कठिन होता है और इसका उल्लंघन करने वालों को सबक सिखाया जा सकता है। इसके साथ ही, प्रभावशाली वगो± की शक्ित सापेक्ष्िाक रूप से कहीं श्यादा होती है क्योंकि वे रोशगार के साधनों तथा अिाकांशतः अन्य संसाधनों को नियंत्रिात करते हैं। अतः गरीबों को प्रभावशाली वगो± पर निभर्र होना पड़ता है क्योंकि उनके पास रोशगार के अन्य साधन अथवा सहारा नहीं होता। कम जनसंख्या के कारण, अिाक व्यक्ितयों को संगठित करना कठिन कायर् होता है, विशेषकर इस प्रकार की कोश्िाशों को बलशाली वगर् से छिपाया नहीं जा सकता तथा जल्दी ही उसे दबा दिया जाता है। अतः संक्षेप में, यदि गाँव में पहले से ही मजबूत शक्ित संरचना होती तो उसे उखाड़ पेंफकना बहुत कठिन होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में शक्ित संरचना के संदभर् में होने वाला परिवतर्न और भी धीमा होता है क्योंकि वहाँ की सामाजिक व्यवस्था अिाक मशबूत और स्िथर होती है। किसी क्षेत्रा में परिवतर्न आने में भी समय लगता है क्यांेकि गाँव बिखरे होते हैं तथा पूरी दुनिया से एकीकृत नहीं होते जैसे नगर तथा कस्बे होते हैं। यह सही है, संचार के नए साधन, विशेषकर टेलीपफोन तथा टेलीविजन से कापफी परिवतर्न आया है। अतः अब सांस्वृफतिक ‘पिछड़ापन’ गाँवों तथा नगरों के बीच कापफी कम या न के बराबर हो गया है। अन्य संचार के साधनों ;सड़वेंफ, रेलद्ध में भी समय के साथ सुधार आया है इसके कारण मात्रा वुफछ एक गाँव ‘एकांत’ तथा ‘पिछड़ा’ होने का दावा कर सकते हैं। ऐसे शब्द जो बिना सोचे - समझे भूतकाल में गाँवों के साथ जुडे़ थे। इसने समाज को और भी गतिशील किया है। निःसंदेह वृफष्िा से संबंिात परिवतर्न अथवा वृफषकों के सामाजिक संबंधों का ग्रामीण समाजों पर गहरा प्रभाव पड़ा है। अतः भू - स्वामित्व की संरचना में आए परिवतर्नों पर भूमि सुधर जैसे कदमों का सीध प्रभाव पड़ा। भारत में स्वतंत्राता के बाद भूमि सुधार के पहले चरण मंे, दूरवासी शमीदारों से स्वामित्व के हक लेकर उन समूहों को दे दिए गए जो वास्तव में भूमि की देख - भाल तथा खेती कर रहे थे। इनमें से अिाकांश समूह मध्यवतीर् जातियों से संबंिात थे और यद्यपि वे स्वयं श्यादातर वृफषक नहीं थे, पर उन्होंने भूमि पर आिापत्य जमा लिया। उनकी संख्या के अनुरूप, इस तथ्य ने उनके सामाजिक स्तर तथा राजनैतिक शक्ित को बढ़ाया क्योंकि चुनाव जीतने के लिए उनके वोट आवश्यक थे। एम.एन. श्रीनिवास ने इन वगो± को ‘प्रभावी जातियों’ के नाम से पुकारा है। कइर् क्षेत्राीय संदभो± में, प्रभावी जातियाँ आथ्िार्क दृष्िट से बेहद शक्ितशाली हो गइर् थीं तथा गाँवों में उनवफा वचर्स्व होने के कारण उन्होंने चुनावी राजनीति को प्रभावित किया। आज के संदभर् में ये प्रभावी जातियाँ स्वयं अपने से निम्न जातियों - निम्नतर तथा अत्यिाक पिछड़ी जातियों द्वारा दृढ़तापूवर्क किए गए विद्रोहों से स्वयं भी जूझ रही हैं। इस कारण, कइर् राज्योंऋ जैसे - आंध्रप्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश तथा तमिलनाडु में प्रमुख सामाजिक आंदोलनों की प्रवृिा देखी जा रही है। इसी प्रकार, वृफष्िा की तकनीकी प्रणाली में परिवतर्न ने भी ग्रामीण समाज पर व्यापक तथा तात्कालिक प्रभाव डाला है। नयी मशीनरी के प्रयोग से श्रम में बचत होती है तथा पफसलों वफी नवीन प(ति इत्यादि के कारण मजदूर की माँग में परिवतर्न अपेक्ष्िात होगा तथा इसके कारण विभ्िान्न सामाजिक समूहोंऋ जैसे - जमींदार तथा मशदूरों के बीच मोलभाव की सापेक्ष्िाक ताकतों में परिवतर्न आएगा। यदि वे प्रत्यक्ष रूप से मशदूरों की माँग को प्रभावित न भी करते हों, तकनीकी तथा आथ्िार्क परिवतर्न विभ्िान्न समूहों की आथ्िार्क शक्ित को परिवतिर्त कर सकते हैं और इस प्रकार परिवतर्नों की शृंखला को प्रारंभ करते हैं। वृफष्िा की कीमतों में आकस्िमक उतार - चढ़ाव, सूखा अथवा बाढ़ ग्रामीण समाज में विप्लव मचा देते हैं। भारत में किसानों द्वारा हाल ही में की गइर् आत्महत्या की संख्या में वृि इसके उदाहरण हैं। वहीं दूसरी तरपफ, बड़े स्तर पर विकास कायर्व्रफम जो निधर्न ग्रामीणों को ध्यान में रखकर चलाए जाते हैं, उनका भी कापफी असर पड़ता है। इसका एक बढि़या उदाहरण 2005 का राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अिानियम है। वि्रफयाकलाप 5 राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अिानियम के बारे में जानकारी हासिल कीजिए। इसका उद्देश्य क्या है? यह एक प्रमुख विकास योजना क्यों मानी जाती है? इसे कौन - कौन सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है? अगर यह सपफल हो जाता है तो इसके क्या प्रभाव हो सकते हैं? नगरीय क्षेत्रों में सामाजिक व्यवस्था तथा सामाजिक परिवतर्न यह सवर्विदित है कि नगर अपने आप में बेहद प्राचीन हैं - ये प्राचीन समाज में भी थे। नगरवाद, जनसमूह के एक बड़े भाग की जीवन प(ति के रूप में आधुनिक घटना है। आधुनिक काल से पहले व्यापार, धमर् तथा यु( वुफछ महत्त्वपूणर् कारक थे जो नगरों की महत्ता तथा स्िथति तय करते थे। ऐसे नगर जो मुख्य व्यापार मागर् अथवा पत्तन और बंदरगाहों के किनारे बसे थे, प्रावृफतिक रूप में लाभ की स्िथति में थे। इसी प्रकार वह नगर जो सामरिक दृष्िट से बेहतरीन रूप में स्िथत थे। आख्िारी में, धामिर्क स्थल अिाक संख्या में भक्तों को आकष्िार्त करते थे और इस प्रकार नगर अथर्व्यवस्था को सहारा देते थे। भारत में भी समाज का बोध् प्राचीन नगरों के उदाहरण देखे जा अन्य सकते हैं, जैसे असम में ब्रह्मपुत्रा नदी के किनारे बसा मध्यकालीन व्यावसायिक नगर तेजपुर अथवा कोशीकोट ;पहले कालीकट नाम से जाना जाता थाद्ध जो उत्तरी केरल में अरब महासागर पर स्िथत है। हमारे पास मंदिर, नगरों तथा धमर्स्थानों के कइर् उदाहरण हैंऋ जैसे - राजस्थान में अजमेर, उत्तर प्रदेश में वाराणसी ;बनारस तथा काशी के नाम से भी जाना जाता हैद्ध तथा तमिलनाडु में मदुरइर्। जैसा कि समाजशास्ित्रायों ने स्पष्ट किया है, नगरीय जीवन तथा आधुनिकता दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।, वास्तव में प्रत्येक को दूसरे की अंतर अभ्िाव्यक्ित माना जाता है। हालाँकि, यहाँ बहुत अिाक तथा सघन जनसंख्या निवास करती है तथा चूँकि ये इतिहास में जन राजनीति के रोगी की जाँच करते हुए चिकित्सक स्थल के रूप में जाने जाते हैं, नगर को आधुनिक व्यक्ित का प्रभावक्षेत्रा भी माना जाता है। अज्ञानता तथा सुविधाओं का सम्िमश्रण तथा साथ ही एक ऐसी संस्था जिसे बड़ी संख्या में लोग अपना सके, नगर व्यक्ित को संतुष्ट करने के लिए अंतहीन संभावनाएँ प्रदान करता है। गाँव जहाँ व्यक्ितवादिता को हतोत्साहित करता है तथा अिाक दे नहीं सकता, नगर व्यक्ित का पोषण करता है। यद्यपि अिाकांश कलाकारों, लेखकों तथा मनीष्िायों ने जब नगर को व्यक्ित का स्वगर् कहा तो वे गलत नहीं थे, लेकिन यह भी सत्य है कि स्वतंत्राता तथा अवसर केवल वुफछ व्यक्ितयों को ही प्राप्त है। उपयुक्त तरीके से, केवल सामाजिक तथा आथ्िार्क विशेषािाकार प्राप्त अल्पसंख्यक ही विलासी, पूणर्रूपेण उन्मुक्त तथा संतुष्ट जीवन जी सकते हैं। अिाकतर व्यक्ित, जो नगरों में रहते हैं, बाध्यताओं में ही सीमित रहते हैं तथा उन्हें सापेक्ष्िाक स्वतंत्राता प्राप्त नहीं होती है। ये परिचित सामाजिक तथा आथ्िार्क बाध्यताएँ, विभ्िान्न प्रकार के सामाजिक समूहों की सदस्यता द्वारा लगाइर् जाती हैं जैसा कि आप पूवर् अध्याय में पढ़ चुके हैं। नगर भी, समूह - पहचान के विकास को प्रतिपालित करते हैं - जो विभ्िान्न कारकोंऋ जैसे - प्रजाति, धमर्, नृजातीय, जाति, प्रदेश तथा समूह प्रत्येक कस्बे के शहरी जीवन का पूणर् प्रतिनििात्व करते हैं। वास्तव में, कम स्थान में अत्यिाक लोगों का जमाव, पहचान को और तीव्र करता है तथा उन्हें अस्ितत्व, प्रतिरोध तथा दृढ़ता की रणनीति का अभ्िान्न अंग बनाता है। नगरों तथा कस्बों के अिाकांश महत्त्वपूणर् मुद्दे तथा समस्याओं का संबंध स्थान के प्रश्न से जुड़ा है। जनसंख्या का उच्च घनत्व स्थान के अिामूल्य पर अत्यिाक जोर देता है तथा रहने छोटे भाइर् - बहन की देखभाल करती हुइर् बालिका शहर का एक व्यावसायिक वेंफद्र कपास के खेत में काम करती हुइर् महिलाएँ के स्थान की बहुत जटिल समस्या उत्पन्न करता है। नगरीय सामाजिक व्यवस्था का प्राथमिक कायर् है कि नगर वफी स्थानिक जीवनक्षमता को आश्वस्त करे। इसका अथर् है कि संगठन तथा प्रबंधन वुफछ चीजों को जैसे - निवास तथा आवासीय प(तिऋ जन यातायात के साधन उपलब्ध् करा सवेंफ ताकि कमर्चारियों की बड़ी संख्या को कायर्स्थल से लाया तथा ले जाया जा सकेऋ आवासीय, सरकारी तथा औद्योगिक भूमि उपयोग क्षेत्रा के सह - अस्ितत्व की व्यवस्था तथा अन्त में जनस्वास्थ्य, स्वच्छता, पुलिस, जन सुरक्षा तथा कस्बे के शासन पर नियंत्राण की आवश्यकता। इनमें से प्रत्येक कायर् अपने आप में एक बृहत उपव्रफम है तथा योजना, वि्रफयान्िवति और रखरखाव को दुजर्य चुनौती देता है। इसे और जटिल बनाते हैं वे कायर् जो समूह, नृजातीयता, धमर्, जाति इत्यादि के विभाजन तथा तनाव से न केवल जुड़े बल्िक सवि्रफय भी होते हैं। उदाहरण के तौर पर कस्बे में आवास का प्रश्न अपने साथ कइर् अन्य समस्याएँ भी लाता है। गरीबों के लिए आवास की समस्या ‘बेघर’ तथा ‘सड़क पर चलने वाले लोग’ इस प्रवि्रफया को जन्म देते हैं - जो सड़कों, पुफटपाथों, पुलों तथा फ्रलाइर्ओवर के नीचे, खाली बि¯ल्डग तथा अन्य खाली स्थानों नगरीय क्षेत्रा में विभ्िान्न प्रकार के यातायात नगर में खरीदारी पर रहते तथा जीवनयापन करते हैं। यह इन बस्ितयों के जन्म का एक महत्त्वपूणर् कारण भी है। यद्यपि कायार्लयी परिभाषा भ्िान्न हो सकती है, एक बस्ती में भीड़ - भाड़ तथा घ्िाच - पिच वाला रिहायशी इलाका होता है, जहाँ जनसुविधाओं ;सपफाइर्, पानी, बिजली इत्यादिद्ध का अभाव तथा घरों के निमार्ण में प्लास्िटक वफी चादर तथा काडर्बोडर् से लेकर बहु - मंजिली ढाँचों में प्रयुक्त काँव्रफीट का प्रयोग होता है क्योंकि यहाँ ‘स्थायी’ संपिा का अिाकार दूसरे स्थानों की तरह नहीं होता है। अतः बस्ितयाँ ‘दादाओं’ की जन्म भूिम होती हैं, जो उन लोगों पर अपना बलात् अिाकार दिखाते हैं जो वहाँ रहते हैं। बस्ती क्षेत्रा पर अिाकार प्रावृफतिक रूप से दूसरे तरीकों के गैर - कानूनी धंधों, अपराधों तथा भूमि संबंिात गैंग के अंे बन जाते हैं। नगरों में मनुष्य कहाँ और वैफसे रहेंगे - यह प्रश्न सामाजिक - सांस्वृफतिक पहचान पर आधारित होता है। पूरे विश्व में नगरीय आवासीय क्षेत्रा प्रायः समूह तथा अिाकतर प्रजाति नृजातीयता, धमर् तथा अन्य कारकों द्वारा विभाजित होते हंै। इन पहचानों के बीच तनाव के प्रमुख परिणाम पृथकीकरण की प्रिया के रूप में भी उजागर होता हैं। उदाहरण के लिए, भारत में विभ्िान्न धमा±े के बीच सांप्रदायिक तनाव, विशेषकर ¯हदुओं तथा मुसलमानों में देखा जा सकता है जिसके परिणामस्वरूप मिश्रित प्रतिवेशी एकल - समुदाय में बदल गए। सांप्रदायिक दंगों को ये एक विश्िाष्ट देश्िाक रूप दे देते हैं, जो ‘बस्तीकरण’ की नवीन प्रवि्रफया घैटोआइजेशन को और बढ़ाते हैं। भारत के कइर् शहरों में ऐसा हुआ है, हाल ही में 2002 के दंगों के दौरान गुजरात में देखा गया। पूरे विश्व में व्याप्त ‘गेटेड समुदाय’ जैसी वृिा भारतीय शहरों में भी देखी जा सकती है। इसका अथर् है एक समृ( प्रतिवेशी ;पड़ौसीद्ध का निमार्ण जो अपने परिवेश से दीवारों तथा प्रवेशद्वारों से अलग होता है जहाँ प्रवेश तथा निकास नियंत्रिात होता है। अिाकांश ऐसे समुदायों की अपनी समानांतर नागरिक सुविधाएँऋ जैसे - पानी और बिजली सप्लाइर्, पुलिस तथा सुरक्षा भी होती हैं। वि्रफयाकलाप 6 क्या आपने अपने कस्बे अथवा नगर में इस प्रकार के ‘गेटेड समुदाय’ को देखा/सुना है, अथवा कभी उनके घर गए हैं? बड़ों से इस समुदाय के बारे में पता कीजिए। चारदीवारी तथा गेट कब बने? क्या इसका विरोध किया गया, यदि हाँ तो किसके द्वारा? ऐसे स्थानों पर रहने के लिए लोगों के पास कौन से कारण हैं? आपकी समझ से - शहरी समाज तथा प्रतिवेशी पर इसका क्या असर पड़ेगा? अंततः, आवासीय प्रतिमान नगरीय अथर्व्यवस्था से निणार्यक रूप से जुड़े है। नगरी परिवहन व्यवस्था प्रत्यक्ष तथा गंभीर रूप से आवासीय क्षेत्रों के सापेक्ष औद्योगिक तथा वाण्िाज्ियक कायर्स्थलों से प्रभावित हुइर् है। अगर ये दूर - दराज स्िथत होते हैं जैसा कि अक्सर होता है, ऐसी स्िथति में बृहत जन परिवहन प्रणाली के निमार्ण तथा उसके रख - रखाव की आवश्यकता है। सपफर करना जीवन की एक शैली हो जाती है तथा विच्छेदन का हमेशा के लिए जरिया बन जाता है। परिवहन व्यवस्था का नगर में काम करने वालों की ‘जीवन की गुणवत्ता’ पर सीधा प्रभाव पड़ता है। सड़क परिवहन पर भरोसा, सरकार के बजाए निजी साधनों ;जैसे - बस की अपेक्षा कारद्ध के प्रयोग से ट्रैपिफक के जमाव तथा वाहन प्रदूषण की समस्या पैदा होती है। उपरोक्त चचार् से यह होगा कि रहने के स्थान के आवंटन जैसा सरल मुद्दा वास्तव में बेहद जटिल तथा नगरीय समाज के बहुआयामी पक्ष को दशार्ता है। प्रतिदिन लंबी दूरी का सपफर तय करने वाले लोग एक प्रभावशाली राजनीतिक निवार्चन क्षेत्रा बन जाते हैं तथा कइर् बार वृहत उप - संस्वृफति को बढ़ाते हैं। उदाहरणाथर्: मुंबइर् की उपनगरीय ट्रेन जो ‘लोकल’ के नाम से लोकपि्रय है - में सपफर करने वालों के बीच संबंध अनौपचारिक रूप ले लेते हैं। ट्रेन के सामूहिक वि्रफयाकलापों में भजन गाना, त्योहार मनाना, सब्जी काटना, ताश तथा बोडर् खेलना ;टूनार्मेंट भी शामिल हैद्ध अथवा सामान्यतः समाजीकरण की प्रिया देखी जा सकती है। नगरीय क्षेत्रों में सामाजिक परिवतर्न के रूप तथा तत्व को स्थान के वेंफद्रीय प्रश्न के संदभर् में बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। परिवतर्न का एक प्रत्यक्ष व प्रचलित तत्व किसी विशेष प्रतिवेशी तथा स्थान द्वारा उच्चता तथा निम्नता का अनुभव है। पूरे विश्व में, नगरीय वेंफद्र अथवा मूल नगर का वेंफद्रीय क्षेत्रा के जीवन में बहुत से परिवतर्न आए। नगर के ‘शक्ित वेंफद्र’ 19वीं तथा 20वीं शताब्दी के प्रारंभ तक बने रहने के पश्चात नगरी वेंफद्र का पतन 20वी शताब्दी के उतरा(र् तक हुआ। यह उपनगर के विकास का समय भी था समाज का बोध् क्योंकि कइर् विभ्िान्न कारणों से संपन्न वगर् ने नगरों के अंदरूनी भाग से पलायन किया था। आज पश्िचम के अिाकांश देशों में नगरीय वेंफद्रों का पुनरुत्थान हो रहा है तथा यह सामुदायिक जीवन को पुनः प्रारंभ करने की कोश्िाश के रूप में देखा जा रहा है। इससे संबंिात घटना ‘भद्रीकरण’ से है, जो प्रतिवेश के पूवर्वत निम्न वगर् का मध्यम अथवा उच्च वगर् के परिवतिर्त स्वरूप को इंगित करता है। जैसे - जैसे भूमि की कीमतों में वृि हुइर् यह उद्यमियों के लिए अिाक लाभदायक साबित हुआ, तथा उन्होंने इस परिवतर्न को प्रभावित करने का प्रयत्न किया। किसी बिंदु पर प्रचार संतुष्िट देने वाला होता है क्योंकि जैसे किराए की दर बढ़ती है तथा उपबस्ती ने एक न्यूनतम निणार्यक व्यापार तथा निवासी का रूप अपना लिया। परंतु कभी - कभी यह कोश्िाश बेकार भी जाती है जिससे प्रतिवेश का स्तर गिर जाता है तथा वह अपनी पुरानी स्िथति में पहुँच जाता है। वि्रफयाकलाप 7 क्या आपने अपने पड़ोस में ‘भद्रीकरण’ देखा है? क्या आप इस तरह की घटना से परिचित हैं? पहले उपबस्ती वैफसी थी जब यह घटित हुआ। पता कीजिए। किस रूप में परिवतर्न आया है? विभ्िान्न सामाजिक समूहों को इसने वैफसे प्रभावित किया है? किसे पफायदा तथा किसे नुकसान हुआ है? इस प्रकार के परिवतर्न का निणर्य कौन लेता है - क्या इस पर मतदान होता है अथवा किसी प्रकार की परिचचार् होती है? जन - परिवहन के साधनों में परिवतर्न नगरों में सामाजिक परिवतर्न ला सकते हैं। समथर्, कायर्वुफशल तथा सुरक्ष्िात जन - परिवहन शहरी जीवन में भारी परिवतर्न लाते हैं तथा नगर की आथ्िार्क स्िथति को प्रभावित करने के साथ ही साथ उसके सामाजिक रूप को भी आकार प्रदान करते हैं। कइर् विद्वानों ने जन - परिवहन पर आधारित नगर जैसे लंदन अथवा न्यूयाॅवर्फ तथा वे नगर जो निजी परिवहन पर मुख्यतः निभर्र करते हैं, जैसे लाॅस एंजेल्स, के अंतर पर कापफी वुफछ लिखा है। यह देखा जाना बाकी है, उदाहरण के लिए दिल्ली की नयी मेट्रो रेल इस शहर के सामाजिक जीवन में कितना परिवतर्न ला रही है। परंतु मुख्य मुद्दा, जो नगरों के सामाजिक परिवतर्न से संबंिात है वह है तीव्र गति से नगरीकरण की ओर अग्रसित भारत जैसे देश, यहाँ जो ध्यान देने की बात होगी वह यह कि नगर जनसंख्या में लगातार वृि के आगे किस तरह से टिक सवेंफगे, विशेष तौर पर जब प्रवासियों द्वारा यहाँ की जनसंख्या की प्रावृफतिक वृि सघन हो रही है। शब्दावली सीमा शुल्क ;आयात करद्ध - किसी देश में वस्तुओं के आने और जाने पर लगाया जाने वाला कर, इससे वस्तु का मूल्य बढ़ जाता है और इसकी तुलना में स्वउत्पादित वस्तुओं की इससे प्रतियोगिता कम हो जाती है। प्रभुत्व जातियाँ - इस शब्द को देने का श्रेय एम.एन. श्रीनिवास को जाता है। इसमें वे जमींदार बिचैली जातियाँ आती हैं जो संख्या में अध्िक होने के कारण अपने क्षेत्रा में राजनीतिक प्रभुतासंपन्न होती हैं। संरक्ष्िात समुदाय - नगरीय क्षेत्रों में ;सामान्यतः उच्च अथवा संपन्न वगर्द्ध अपने चारों ओर एक घेराबंदी कर लेते हंै जिससे आने - जाने पर नियंत्राण रखा जा सके। भद्रीकरण ;जैंट्रीपिफकेशनद्ध - इस शब्द का प्रयोग निम्न वगर् ;नगरद्ध प्रतिवेश का मध्यम अथवा उच्चवगीर्य प्रतिवेश में बदल जाने के लिए किया जाता है। घैटो, घैटोकरण - सामान्यतः यह शब्द मध्य यूरोपीय शहरों में यहूदियों की बस्ती के लिए प्रयोग किया जाता है। आज के संदभर् में यह विश्िाष्ट ध्मर्, नृजाति, जाति या समान पहचान वाले लोगों के साथ रहने को इंगित करता है। घैटोकरण की प्रिया में मिश्रित विशेषताओं वाले पड़ौस के स्थान पर एक समुदाय पड़ौस में बदलाव का होना है। वैधता - वैधानिक बनाने की प्रिया अथवा किसी आधार पर किसी वस्तु को वैध मानना जैसे - संगत, सही, न्यायिक, ठीक इत्यादि। समूह संक्रमण ;मास ट्रांजिटद्ध - शहरों में आवागमन का साधन जिसमें बड़ी संख्या में लोगों का आना - जाना होता है। जन परिवहन - तीव्र गति से चलने वाले परिवहन के साधन जिससे लोग अिाक संख्या में सपफर कर सवेंफ। अभ्यास 1.क्या आप इस बात से सहमत हैं कि तीव्र सामाजिक परिवतर्न मनुष्य के इतिहास में तुलनात्मक रूप से नवीन घटना है? अपने उत्तर के लिए कारण दें। 2.सामाजिक परिवतर्न को अन्य परिवतर्नों से किस प्रकार अलग किया जा सकता है? 3.संरचनात्मक परिवतर्न से आप क्या समझते हैं? पुस्तक से अलग उदाहरणों द्वारा स्पष्ट कीजिए। 4.पयार्वरण संबंिात वुफछ सामाजिक परिवतर्नों के बारे में बताइए। 5.वे कौन से परिवतर्न हैं जो तकनीक तथा अथर्व्यवस्था द्वारा लाए गए हैं? 6.सामाजिक व्यवस्था का क्या अथर् है तथा इसे वैफसे बनाए रखा जा सकता है? 7.सत्ता क्या है तथा यह प्रभुता तथा कानून से वैफसे संबंिात है? 8.गाँव, कस्बा तथा नगर एक दूसरे से किस प्रकार भ्िान्न हैं? 9.ग्रामीण क्षेत्रों वफी सामाजिक व्यवस्था वफी वुफछ विशेषताएँ क्या हैं? 10.नगरी क्षेत्रों की सामाजिक व्यवस्था के सामने कौन सी चुनौतियाँ हैं? संदभर् गिडेंस, एंटनी. 2002. सोशयोलाॅजी ;चैथा संस्करणद्ध गथर्, हैंस तथा सी.राइर्ट मिल्स ;संपा.द्ध प्रफाॅम मैक्स वेबर। ख्िालनानी, सुनील. 2002.द आइडिया आॅपफ इंडिया़, पेंगविन बुक्स, नयी दिल्ली। पटेल, सुजाता तथा वुफशलदेव ;संपा.द्ध. 2006.अबर्न सोशयोलाॅजी ;आॅक्सपफोडर् इन इंडिया रीडिंग्स इन सोशयोलाॅजी एंड एंथ्रोपाॅलोजी सीरीशद्ध आॅक्सपफोडर् यूनिवसिर्टी प्रेस, नयी दिल्ली। श्रीनिवास एम.एन.सोशल चेंज इन माॅडनर् इंडिया।

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