अध्याय 1 समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रियाएँ परिचय आपको याद होगा कि आपकी प्रारंभ्िाक समाजशास्त्रा की पुस्तक समाजशास्त्रा परिचय, कक्षा ग्प् ;एन.सी.इर्.आर.टी. 2006द्ध की शुरुआत निजी समस्याओं तथा सामाजिक मुद्दों के आपसी संबंधों पर परिचचार् से हुइर् थी। हमने यह भी देखा कि किस प्रकार व्यक्ित विभ्िान्न सामूहिकताओं से जुड़ा होता है जैसे - समूह, वगर्, ल्िंाग, जाति तथा जनजाति। वास्तव में आप में से प्रत्येक किसी एक समूह से ही नहीं बल्िक कइर् समूहों से जुड़े होते हैं। उदाहरणतः आप अपने दोस्तों, अपने परिवार और नातेदारी, वगर् तथा लिंग, अपने देश तथा प्रदेश के सदस्य हैं। अतः प्रत्येक व्यक्ित का सामाजिक संरचना तथा स्तरीकरण में एक विशेष स्थान होता हैै ;समाजशास्त्रा परिचय पृष्ठ 28 - 35 देख्िाएद्ध। इसका यह अथर् भी निकलता है कि प्रत्येक व्यक्ित के पास सामाजिक संसाधनों को प्राप्त करने के विभ्िान्न तरीके हैं। उदाहरण के लिए एक विद्याथीर् किस विद्यालय में पढ़ने जाए यह उसके सामाजिक स्तर पर निभर्र करता है। ठीक इसी प्रकार वह किस प्रकार के वस्त्रा पहनती/पहनता हैऋ किस प्रकार का भोजन करती/करता हैऋ अपने खाली समय में वह क्या करती/करता हैऋ किस तरह की स्वास्थ्य सुविधाएँ उसे प्राप्त हैंऋ अथार्त सामान्य तौर पर उसकी संपूणर् जीवनशैली। जैसेकि सामाजिक संरचना के संदभर् में सामाजिक स्तरीकरण, व्यक्ित वफो कायर् करने हेतु बाध्य करता है। समाजशास्त्राीय परिप्रेक्ष्य का एक मुख्य उद्देश्य व्यक्ित तथा समाज के द्वंद्वात्मक संबंधों को समझना है। आपको सी.राइट मिल की समाजशास्त्राीय कल्पना की व्याख्या याद होगी जहाँ उन्होंने व्यक्ित के जीवनवृत्त तथा समाज के इतिहास के आपसी संबंधों को स्पष्ट किया है। इस पाठ में, समाज और व्यक्ित के द्वंद्वात्मक संबंध को समझने के लिए यह आवश्यक है कि तीन मुख्य संकल्पनाओं ;अवधारणाओंद्ध यथा सामाजिक संरचना, सामाजिक स्तरीकरण तथा सामाजिक प्रियाओं पर चचार् की जाए। अगले वुफछ अध्यायों में हम यह जानेंगे कि नगरीय तथा ग्रामीण समाज की सामाजिक संरचना किस प्रकार भ्िान्न है, और पयार्वरण तथा समाज के बीच व्यापक संबंधों का रूप क्या है? आख्िारी के दो अध्यायों में हम पाश्चात्य सामाजिक विचारकों तथा भारतीय सामाजशास्ित्रायों तथा उनके विचारों को समझेंगे जो हमें आगे सामाजिक संरचना, सामाजिक स्तरीकरण तथा सामाजिक प्रियाओं को समझने में मदद करेंगे। मुख्य प्रश्न जिस पर इस पाठ में विचार किया जाना है कि किस हद तक व्यक्ित सामाजिक संरचना से बाध्य होता है और किस हद तक वह सामाजिक संरचना के अंतगर्त स्वतंत्रा होता है? समाज में व्यक्ित की स्िथति अथवा सामाजिक स्तरीकरण की व्यवस्था में उसका स्थान, उसकी व्यक्ितगत रुचियों को किस सीमा तक निधार्रित करती है। क्या सामाजिक संरचना तथा सामाजिक स्तरीकरण व्यक्ित की कायर्प्रणाली को प्रभावित करते हैं? किस प्रकार से व्यक्ित एक दूसरे से सहयोग, प्रतियोगिता तथा संघषर् करते हंै तथा उसे वे क्या रूप देते हैं? इस अध्याय में हम संक्षेप में सामाजिक संरचना तथा सामाजिक स्तरीकरण पर चचार् करेंगे। आपने सामाजिक स्तरीकरण पर विस्तारपूवर्क चचार् पिछली पुस्तक ;समाजशास्त्रा परिचयद्ध के अध्याय 2 में की है। अब हम आगे बढ़ते हुए तीन मुख्य सामाजिक प्रियाओं यथा सहयोग, प्रतियोगिता तथा संघषर् पर चचार् करेंगे। इनमें से प्रत्येक प्रिया को समझने के लिए हम यह समझने तथा देखने की कोश्िाश करेंगे कि सामाजिक संरचना तथा सामाजिक स्तरीकरण किस प्रकार सामाजिक प्रियाओं पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं। दूसरे शब्दों में, किस प्रकार व्यक्ितयों के मध्य समाज का बोध् तथा समूहों के मध्य सहयोग, प्रतियोगिता तथा संघषर् होते हैं। यह सब वुफछ सामाजिक संरचना तथा स्तरीकरण व्यवस्था में व्यक्ितयों एवं समूह की स्िथति पर निभर्र करता है। सामाजिक संरचना तथा सामाजिक स्तरीकरण ‘सामाजिक संरचना’ शब्द इस तथ्य को दशार्ता है कि समाज संरचनात्मक है अथार्त अपने विश्िाष्ट रूप में वह क्रमवार तथा नियमित है। जिस सामाजिक वातावरण में हम रहते हैं वह मात्रा वुफछ ियाओं एवं प्रघटनाओं का अनियमित मिश्रण नहीं है। लोगों का आचरण किस प्रकार का होता है तथा एक - दूसरे के प्रति उनके संबंध किस प्रकार के होते हैं - इसमें एक प्रकार की अंतनिर्हित नियमितता अथवा प्रतिमान ;पैटनर्द्ध होता है। सामाजिक संरचना की संकल्पना इन्हीं नियमितताओं को इंगित करती है। एक बिंदु तक, समाज की संरचनात्मक विशेषताओं को एक इमारत की संरचनात्मक विशेषताओं के समकक्ष रखकर समझा जा सकता है। एक इमारत की दीवारें, शमीन तथा छत, सब मिलकर उस इमारत को एक विशेष आकार देती हैं। पर यदि इस तुलना का प्रयोग श्यादा सख्ती से किया जाए तो यह रूपक अपने आप में गलतप़्ाफहमी पैदा करने वाला हो सकता है। सामाजिक संरचना मानवीय ियाओं तथा संबंधों से बनती है। जो पक्ष इन्हें नियमितता प्रदान करता है, वह है अलग - अलग काल अविा में एवं भ्िान्न - भ्िान्न स्थानों में इन ियाओं एवं संबंधों का लगातार दोहराया जाना। अतः सामाजिक विश्लेषण की प्रिया में सामाजिक पुनरूत्पादन ग्रामीण तथा नगरीय क्षेत्रों की विभ्िान्न प्रकार की इमारतें तथा सामाजिक संरचना एक - दूसरे से जुड़े हुए हैं। उदाहरण के लिए, एक विद्यालय तथा एक परिवार की संरचना को लेते हैं। विद्यालय में वुफछ विश्िाष्ट प्रकार के ियाकलाप वषा±े से दोहराए जाते हैं जो आगे चलकर संस्थाएँ बनते हैं जैसे विद्यालय में दाख्िाले के तरीके, आचरण संबंधी नियम, वाष्िार्कोत्सव, प्रातःकालीन सभा और कहीं - कहीं विद्यालयी गीत। ठीक इसी प्रकार से परिवार में आचरण के वुफछ मानक स्तर जैसे, विवाह के तौर - तरीके, संबंधों के अथर् उम्मीदें तथा उत्तरदायित्व होते हैं। परिवार में वृ( सदस्यों की मृत्यु एवं विद्यालय से पुराने विद्याथ्िार्यों का चले जाना एवं इनके स्थान पर नए सदस्यों का प्रवेश होता रहता है और यह संस्था चलती रहती है। पर हम यह भी जानते हैं कि परिवार तथा विद्यालय के अंदर परिवतर्न होते रहते हैं। उपरोक्त परिचचार् तथा ियाकलाप हमें यह समझने में मदद करता है कि मानव द्वारा निमिर्त समाज का बोध् समाज उस इमारत की तरह होता है जिसकी प्रत्येक क्षण उन्हीं ईंटों से पुनरर्चना होती है जिनसे उसे बनाया गया है। जैसा कि हमने स्वयं देखा है कि मनुष्य विद्यालय तथा परिवार में संरचना की पुनरर्चना हेतु परिवतर्न करते हुए समूचे परिवतर्न को प्रस्तुत करता है। वे प्रतिदिन विभ्िान्न स्तरों पर पुनरर्चना के लिए सहयोग करते हैं। यह भी कम सच नहीं हैै कि उनमें एक दूसरे के साथ दूष्िात तथा व्रूफर प्रतियोगिता भी होती है। सच्चाइर् यह है कि सहयोगात्मक व्यवहार के साथ ही साथ हम गंभीर प्रकृति के संघषो± को भी देखते हैं और जैसा कि हम आगे देखेंगे कि सहयोग को शबरदस्ती लागू भी किया जाता है ताकि संघषो± को छिपाया जा सके। एमिल दुखार्इम द्वारा आगे बढ़ाया जाने वाला एक मुख्य विषय यह ;और उनके बाद में कइर् अन्य समाजशास्ित्रायों द्वारा भी कायर् किया गयाद्ध है कि समाज अपने सदस्यों वफी ियाओं पर सामाजिक प्रतिबंध लगाते हैं। दुखार्इम ने तवर्फ ियाकलाप 1 अपने बड़े - बुजुगा±े ;दादा/नानाद्ध अथवा उनकी पीढ़ी के अन्य लोगों से बातचीत कर यह पता कीजिए कि परिवारों/विद्यालयों में किस प्रकार का परिवतर्न आया है तथा किन किन पक्षों में वे आज भी वैसे ही हैं। पुराने चलचित्रों/धारावाहिकों/उपन्यासों में परिवारों के प्रस्तुतिकरण की तुलना समकालीन प्रस्तुतियों से कीजिए। क्या आप अपने परिवार में सामाजिक आचरण के प्रतिमानों ;पैटनर्स्द्ध और नियमितताओं को समझते हैं? दूसरे शब्दों में, क्या आप अपने परिवार वफी संरचना का वणर्न कर सकते हैं? विद्यालय को एक संरचना के रूप में आपके श्िाक्षक वैफसे लेते हैं? इस पर उनसे विचार - विमशर् कीजिए। क्या छात्रों, श्िाक्षकों तथा कमर्चारियों को इस संरचना को बनाए रखने के लिए वुफछ विशेष रूप में काम करना पड़ता है? क्या आप अपने विद्यालय अथवा परिवार में किसी प्रकार के परिवतर्न के बारे में सोच सकते हैं? क्या इन परिवतर्नों का विरोध हुआ? किसने इनका विरोध किया और क्यों? दिया कि व्यक्ित पर समाज का प्रभुत्व होता है। समाज व्यक्ित की वुफल ियाओं से कहीं अिाक हैऋ इसमें ‘दृढ़ता’ अथवा ‘कठोरता’ है जो भौतिक पयार्वरण वफी संरचना के समान है। सोचिए कि एक व्यक्ित ऐसे कमरे में खड़ा है जहाँ बहुत सारे दरवाशे हैं। कमरे की संरचना व्यक्ित की संभावित ियाओं को बाध्य करती है। उदाहरण के तौर पर दीवारों तथा दरवाशों की स्िथति, प्रवेश तथा निकास के रास्तों को दशार्ती है। दुखार्इम के अनुसार, सामाजिक संरचना, हमारी ियाओं को समानांतर रूप से बाध्य करती है, इसकी सीमा तय करती है कि हम एक व्यक्ित के रूप में क्या कर सकते हैं? यह हमसे ‘बाह्य’ है ठीक उसी प्रकार से जैसे कमरे की दीवारें होती हैं। अन्य सामाजिक चिंतक जैसे कालर् माक्सर् भी सामाजिक संरचना की बाध्यता पर बल देते हैं लेकिन साथ ही मनुष्य की सृजनात्मकता को महत्त्वपूणर् मानते हैं जो सामाजिक संरचना को परिवतिर्त भी करती है और उसे पुनः उत्पादित भी करती है। माक्सर् ने यह तकर् दिया कि मनुष्य इतिहास बनाता है, परंतु वह इतिहास निमार्ण न तो उसकी इच्छा पर और न ही उसकी मनपसंद शता±े पर आधारित होता है। अपनी इच्छानुसार नहीं और न ही अपनी मनपसंद शता±े पर, बल्िक इतिहास का निमार्ण उन ऐतिहासिक तथा संरचनात्मक स्िथति की उन बाध्यताओं तथा संभावनाओं के अंतगर्त होता है जहाँ वह जीवनयापन कर रहा है। ियाकलाप 2 ऐसे वुफछ उदाहरण सोचिए जो दोनों स्िथतियों को प्रकट करते हों - किस प्रकार मनुष्य सामाजिक संरचना से बाध्य होता है तथा जहाँ व्यक्ित सामाजिक संरचना की अवहेलना करता है और उसे बदल देता है। अपनी पूवर् पुस्तक में समाजीकरण पर हुइर् परिचचार् को याद कीजिए ;पृष्ठ 88 - 89द्ध। दुखार्इम के इस दृष्िटकोण को उनके प्रसि( विवरण में दिया गया है - जब मैं अपने कतर्व्यों का निवर्हन एक भाइर्, एक पति अथवा देश के नागरिक के रूप में करता हूँ तथा दिए गए अपने वचन को पूणर् करता हूँ। मैं अपने दायित्वों को पूरा करता हूँ जिन्हें कानून तथा प्रथा में परिभाष्िात किया गया है तथा जो मुझसे तथा मेरी ियाओं से परे या बाह्य है . . . . . . ठीक इसी प्रकार, भक्त जन्म से ही, पूवर् स्वीकृत, अपने धामिर्क जीवन की मान्यताओं तथा ियाओं को पहचान लेता हैऋ अगर उनका अस्ितत्व उसके जन्म से पूवर् था, तो इसका अथर् है कि उनका अस्ितत्व उसके बाहर है। मैं अपने विचारों को प्रेष्िात करने के लिए जिन चिह्मों का प्रयोग करता हूँ, मैं अपने कजा±े को चुकाने के लिए जिस मुद्रा का प्रयोग करता हूँ, मैं अपने व्यापारिक संबंधों के लिए जिन व्रेफडिट उपकरणों का प्रयोग करता हूँ, मैं अपने पेशे में जिन कमा±े का अनुनयन करता हूँ इत्यादि - इनका मेरे द्वारा उपयोग किए जाने पर भी ये स्वतंत्रा रूप से कायर् करते हैं। समाज के प्रत्येक व्यक्ित को ध्यान में रखते हुए इस प्रकार की टिप्पणी इनमें से प्रत्येक के लिए की जा सकती है। अब हम इस स्तर पर सामाजिक स्तरीकरण की उस संकल्पना की पुनरावृिा करना चाहेंगे जो प्रारंभ्िाक पुस्तक के अध्याय 2 का भाग है। सामाजिक स्तरीकरण से अभ्िाप्राय समाज में समूहों के बीच संरचनात्मक असमानताओं के अस्ितत्व, भौतिक अथवा प्रतीकात्मक पुरस्कारों की पहुँच से है। हालाँकि प्रत्येक समाज में किसी न किसी रूप में सामाजिक स्तरीकरण विद्यमान है, परंतु आधुनिक समाज धन तथा शक्ित की असमानताओं के कारण पहचाने जाते हैं। एक तरप़्ाफ जहाँ आधुनिक समाज में स्तरीकरण के सवार्िाक प्रचलित रूपों में वगर् - विभाजन है, वहीं दूसरी ओर प्रजाति तथा जाति, क्षेत्रा तथा समुदाय, जनजाति तथा लिंग इत्यादि सामाजिक स्तरीकरण के आधार बने हैं। आपको याद होगा कि सामाजिक संरचना में सामाजिक व्यवहार के निश्िचत प्रतिमान ;पैटनर्द्ध निहित होते हैं। सामाजिक स्तरीकरण एक विस्तृत सामाजिक संरचना के भाग के रूप में असमानता के निश्िचत प्रतिमान द्वारा पहचाना जाता है। असमानता कोइर् ऐसा अवयव नहीं है जो समाज में विभ्िान्न व्यक्ितयों के बीच आकस्िमक रूप से वितरित हो। यह तो व्यवस्िथत रूप से विभ्िान्न प्रकार के सामाजिक समूहों की सदस्यता से जुड़ी हुइर् है। एक समूह के सदस्यों की विशेषताएँ समान होती हैं, और यदि वे उच्च स्िथति में हैं तो उनका प्रयत्न होगा कि उनवफी विशेषािाकृत स्िथति उनके बच्चों को मिल जाए। स्तरीकरण की संकल्पना, तब उस विचार को संदभ्िार्त करती है जहाँ समाज का विभाजन एक निश्िचत प्रतिमान के रूप में समूहों में होता है, तथा यह समाज का बोध् संरचना पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है ;जयराम 1987ः22द्ध। असमान रूप से बाँटे गए लाभों के अंतर को समझना भी आवश्यक है। लाभ के तीन बुनियादी प्रकार हैं जिसका विशेषािाकार प्राप्त समूहों द्वारा उपभोग किया जाता हैः ;अद्धजीवन अवसर - वे सभी भौतिक लाभ जो प्राप्तकतार् के जीवन की गुणवत्ता को सुधारते हैं - उनमंे केवल संपिा तथा आय जैसे आथ्िार्क लाभों को ही शामिल नहीं किया जाता बल्िक अन्य सुविधाओंऋ जैसे - स्वास्थ्य, रोशगार, सुरक्षा तथा मनोरंजन को भी शामिल किया जाता है। ;बद्धसामाजिक प्रस्िथति - मान - सम्मान तथा समाज के अन्य व्यक्ितयों की नशरों में उच्च स्थान। ;सद्ध राजनैतिक प्रभाव - एक समूह द्वारा दूसरे समूह अथवा समूहों पर प्रभुत्व जमाना अथवा निणर्य निधार्रण में प्रमाणािाक्य प्रभाव अथवा निणर्यों से अत्यिाक लाभ उठाना। आगे होने वाली चचार् में हम उपरोक्त तीन सामाजिक प्रियाओं की तरपफ आपका ध्याऩआकष्िार्त करेंगे और बताएँगे कि किस प्रकार सामाजिक स्तरीकरण के विभ्िान्न आधारऋ जैसे - लिंग अथवा वगर् सामाजिक प्रियाओं को बािात करते हैं। व्यक्ित तथा वगो± को मिलने वाले अवसर तथा संसाधन जो प्रतियोगिता, सहयोग अथवा संघषर् के रूप में सामने आते हैं - इन्हें सामाजिक संरचना तथा सामाजिक स्तरीकरण के द्वारा आकार दिया जाता है। साथ ही मनुष्य पूवर्स्िथत संरचना तथा स्तरीकरण में परिवतर्न लाने का प्रयास करता है। समाजशास्त्रा में सामाजिक प्रियाओं को समझने के दो तरीके अपनी प्रारंभ्िाक पुस्तक में आपने सामान्य ज्ञान की सीमाओं को समझा है। समस्या यह नहीं है कि सामान्य ज्ञान आवश्यक रूप से गलत ही हो परंतु यह इसका परीक्षण नहीं हुआ है तथा इसे हलके रूप में लिया जाता है। इसके विपरीत, सामाजिक परिप्रेक्ष्य में प्रत्येक मुद्दे पर सवाल किए जाते हैं और किसी भी मुद्दे को ऐसे ही नहीं मान लिया जाता है। अतः यह केवल ऐसी व्याख्या से संतुष्ट होकर शांत नहीं होगा जिससे पता चलता है कि मनुष्यों में प्रतियोगिता अथवा सहायता या संघषर् जैसा भी मामला हो - क्योंकि ऐसा करना मनुष्य का स्वभाव होता है। इस प्रकार की मान्यता के पीछे यह व्याख्या है कि आंतरिक तथा सावर्भौमिक रूप से यह मनुष्य की प्रकृति है कि इस प्रकार की प्रियाओं का लेखा - जोखा रखा जाए। हालाँकि, जैसा हमने पहले देखा है, समाजशास्त्रा मनोवैज्ञानिक अथवा प्रकृतिवादी व्याख्याओं से संतुष्ट नहीं होता है। ;देखें पृष्ठ 8 - 9, पहली पुस्तकद्ध समाजशास्त्रा सहयोग, प्रतिस्पधार् तथा संघषर् की प्रियाओं की व्याख्या समाज की वास्तविक संरचना के अंतगर्त करना चाहता है। हमने पिछली पुस्तक में चचार् की थी कि समाज में किस प्रकार विभेद तथा बहुलता की समझ व्याप्त है। ;पृष्ठ 27 - 28, 41द्ध। विभ्िान्न संस्थाओं की समझ, चाहे वह परिवार हो, अथर्व्यवस्था अथवा सामाजिक स्तरीकरण या सामाजिक नियंत्राण हो। हमने देखा कि किस प्रकार प्रकायर्वादी तथा संघषर् के परिप्रेक्ष्य के अनुसार संस्थाओं की समझ में भ्िान्नता है। अतः कोइर् आश्चयर् नहीं कि ये दोनों संदभर् इन प्रियाओं को थोड़ा हट कर समझना चाहते हैं। परंतु दोनों, कालर् माक्सर् ;सामान्यतः संघषर् के परिप्रेक्ष्य से जुड़े हुएद्ध तथा एमिल दुखार्इम ;सामान्यतः प्रकायर्वादी संदभर् में पहचाने जाते हैंद्ध यह मानकर चलते हैं कि मनुष्यों को अपनी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सहयोग करना होता है तथा अपने और अपनी दुनिया के लिए उत्पादन और पुनः उत्पादन करना पड़ता है। संघषर् के परिप्रेक्ष्य में इस बात पर बल दिया गया कि किस प्रकार सहयोग के प्रकारों ने एक ऐतिहासिक समाज को दूसरे ऐतिहासिक समाज में परिवतिर्त कर दिया। उदाहरणतः यह देखा जा सकता है कि सामान्यतः सरल समाजों में जहाँ अतिरिक्त उत्पादन नहीं होता था, वहाँ व्यक्ितयों तथा समूहों में आपसी सहयोग था और वे वगर्, जाति अथवा प्रजाति में नहीं बँटे थे। परंतु जिस समाज में अतिरिक्त उत्पादन होता था, चाहे वे जमींदार हो अथवा पूँजीपति, प्रभावशाली वगर् का अतिरिक्त उत्पादन पर अिाकार होता था तथा सहयोग भी संभावित संघषर् तथा प्रतियोगिता से जुड़ा होता था। संघषर् का दृष्िटकोण इस बात पर बल देता है कि समूहों तथा व्यक्ितयों का स्थान उत्पादन प्रणाली के संबंधों में भ्िान्न तथा असमान होता है। अतः कारखाने के मालिक तथा मशदूर अपने प्रतिदिन समाज का बोध् विभ्िान्न प्रकार की प्रियाएँ के काया±े में सहयोग करते हैं परंतु वुफछ हद तक उनके हितों में संघषर् उनके संबंधों को परिभाष्िात करते हैं। हमारी संघषर् के परिप्रेक्ष्य संबंधी समझ यह बताती है कि जहाँ समाज जाति, वगर् अथवा पित्तृसत्ता के आधार पर बँटा होता है वहीं वुफछ समूह सुविधावंचित हैं तथा एक दूसरे के प्रति भेदभावमूलक स्िथति बरतते हैं। इससे भी आगे, प्रभावशाली समूहों में यह स्िथति सांस्कृतिक मानदंडों, श्यादातर शबरदस्ती अथवा हिंसा द्वारा भी उत्पन्न की जाती है। जैसा कि आप आगे आनेवाले अनुच्छेदों में देखेंगे कि प्रकायर्वादी परिप्रेक्ष्य इस प्रकार के मानदंडों अथवा संस्तुतियों की भूमिका की प्रशंसा करने में नहीं चूकता। परंतु इन सबके प्रकाया±े को समाज की संपूणर्ता के रूप में समझाता है, न कि उस संदभर् में जहाँ प्रभावशाली समूहों द्वारा समाज को नियंत्रिात किया जाता है। प्रकायर्वादी परिप्रेक्ष्य का सरोकार मुख्य रूप से समाज में ‘व्यवस्था की आवश्यकता’ से है - जिन्हें वुफछ प्रकायार्त्मक अनिवायर्ताएँ, प्रकायार्त्मक अपेक्षा तथा पूवार्पेक्षाएँ कहा जाता है। ये विस्तृत रूप में उन शता±े को पूरा करती हैं जो व्यवस्था के अस्ितत्व के लिए आवश्यक हैं ;इसलिए इन्हें अस्ितत्व में बनाए रखा जाता है तथा इनको नष्ट होने से बचाया जाता हैद्ध, जैसे - - नए सदस्यों का समाजीकरण - संचार की साझा प्रिया - व्यक्ित की भूमिका निधार्रण के तरीके आप अच्छी तरह से जानते हैं कि किस प्रकार प्रकायर्वादी परिप्रेक्ष्य इस तथ्य पर आधारित है कि समाज के विभ्िान्न भागों का एक प्रकायर् अथवा भूमिका होती है जो संपूणर् समाज की प्रकायार्त्मकता के लिए जरूरी होती है। इस संदभर् में सहयोग, प्रतियोगिता तथा संघषर् को प्रत्येक समाज की सावर्भौमिक विशेषता के रूप में देखा जा सकता है, जो समाज में रहने तथा इच्छापूतिर् करने वाले विभ्िान्न व्यक्ितयों वफी अनिवायर् अन्तःियाओं का परिणाम है। चूँकि इस परिप्रेक्ष्य का मुख्य बिंदु व्यवस्था को बनाए रखना है, प्रतिस्पधार् तथा संघषर् डोली में बैठकर ससुराल जाते हुए दुल्हन को इस दृष्िट से भी समझा जाता है कि अिाकतर स्िथतियों में ये बिना श्यादा हानि एवं कष्ट के सुलझ जाते हैं तथा साथ ही ये समाज की भी विभ्िान्न प्रकार से मदद करते हैं। समाजशास्त्राीय अध्ययनों ने यह भी दिखाया है कि किस प्रकार मानदंडों तथा समाजीकरण के प्रतिरूप अिाकतर इस बात का ध्यान रखते हैं कि एक विशेष सामाजिक प्रणाली सतत बनी रहे, चाहे वह एक विशेष समूह के हितों की विरोधी ही क्यों न हो। दूसरे शब्दों में, सहयोग, प्रतिस्पधर् एवं संघषर् के आपसी संबंध अिाकतर जटिल होते हैं तथा ये आसानी से अलग नहीं किए जा सकते। यह समझने के लिए कि सहयोग और संघषर् किस प्रकार अनुलग्िनत हैं, तथा ‘बाध्य’ एवं ‘स्वैच्िछक’ सहयोग में क्या अंतर है, आइए, अपने जन्म ;नेटलद्ध के परिवार में संपिा पर स्त्राी का अिाकार जैसे विवादास्पद मुद्दे पर नशर डालें। समाज के विभ्िान्न हिस्सों में यह जानने के लिए कि जन्म की संपिा के संबंध में उनका क्या दृष्िटकोण है, एक अध्ययन किया गया ;पृष्ठ 47, 52 - 53 समाजशास्त्रा समाज का बोध् परिचय देख्िाएद्ध। स्ित्रायों की एक अच्छी खासी संख्या ने ;41.7»द्ध संपिा के अपने अिाकार पर बोलते हुए अपनी बेटी के प्रेम तथा बेटी के लिए अपने प्रेम के विषय को उठाया। परंतु इस विषय पर भावात्मक न होकर आशंका पर बल देते हुए कहा कि वे संपूणर् अथवा अंशतः किसी भी प्रकार का अपनी जन्म की संपिा पर दावा नहीं करेंगी क्योंकि वे डरती थीं कि ऐसा करने से भाइयों के साथ उनके संबंधों में कड़वाहट आ जाएगी या भाभ्िायाँ उनसे घृणा करने लगेंगी और परिणामस्वरूप अपने पिता के घर उनका आना - जाना बंद हो जाएगा। यह दृष्िटकोेण एक प्रभावशाली रूपक को दिखाता है जहाँ एक ओर स्त्राी संपिा से इनकार करती है . . . तो दूसरी ओर एक स्त्राी संपिा पर अपना ‘हक जमाने वाली’, कंजूस तथा चालाक समझी जाती है। संवेदनाओं में एक करीबी संपवर्फ होता है तथा प्रतिवतीर् रूप में अपने जन्म के परिवार का एक भाग बने रहने तथा उसकी उन्नति में सहायक होने और मुसीबत की घड़ी में काम आने की इच्छा बनी थी। ियाकलाप 4 विचार कीजिए - क्या विस्तृत मानक बाध्यताओं के कारण महिलाएँ अपने आपको संघषर् अथवा प्रतिस्पधर् से अलग रखती हंै अथवा सहयोग देती हैं। क्या वे पुरुषों के उत्तरािाकार के मानदंड से सहयोग इसलिए करती हैं कि यदि वे ऐसा नहीं करेंगी तो भाइयों के प्रेम से वंचित हो जाएँगी? अगले पृष्ठ पर बाॅक्स में दिया गया गीत एक विशेष प्रांत का है परंतु आज भी पितृवंशीय परिवार में एक औरत के जन्म के परिवार के परित्याग के सामान्य भय की भावना को दिखाता है। फ्बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाएय् ¹पिता का घर मेरे लिए छूट गया हैह् जन्म के गृह के परित्याग का भय बाबुल की दुआएँ लेती जा जा तुझको सुखी संसार मिले मैके की कभी न याद आए ससुराल में इतना प्यार मिले ;बासु 2001: 128द्ध ियाकलाप 2 आपको समझने में मदद करेगा कि सहयोगात्मक व्यवहार को समाज के गहरे संघषो± की उपज के रूप में भी देखा जा सकता है। परंतु जब इन संघषो± की खुलकर अभ्िाव्यक्ित नहीं होती अथवा इन्हें खुली चुनौती नहीं दी जाती तो यह छवि बनती है कि कहीं कोइर् संघषर् नहीं है, केवल सहयोग ही विद्यमान है। उपरोक्त परिस्िथतियों को समझाने के लिए प्रकायर्वादी ‘व्यवस्थापन’ शब्द का प्रयोग करते हैं, जहाँ महिला अपने पितृ परिवार में संपिा के अपने अिाकार पर किसी प्रकार का दावा करना पसंद नहीं करेगी। संघषो± के रहते हुए भी समझौता एवं सह - अस्ितत्व की कोश्िाश के रूप में इसे देखा जा सकता है। ियाकलाप 5 वुफछ अन्य सामाजिक व्यवहारों के बारे में सोचिए जो सहयोगात्मक दिखाइर् देते हों परंतु समाज के गहरे संघषो± को अपने अंदर छिपाए हों। सहयोग तथा श्रम विभाजन सहयोग का विचार मानव व्यवहार की वुफछ मान्यताओं पर आधारित है। यह तवर्फ दिया जाता है कि मनुष्य के सहयोग के बिना मानव जाति वफा अस्ितत्व कठिन हो जाएगा। आगे यह तवर्फ दिया जाता है कि यहाँ तक कि जानवरों की दुनिया में भी हम सहयोग के प्रमाण देख सकते हैं, चाहे वे चींटियाँ हों, मधुमक्िखयाँ हों अथवा स्तनपायी पशु। परंतु पशुओं की दुनिया से तुलना सावधानीपूवर्क की जानी चाहिए। हम समाजशास्त्रा की दो भ्िान्न सै(ांतिक परंपराओं का प्रयोग इस बिंदु के विश्लेषण के लिए करेंगे जिनका एमिल दुखार्इम तथा कालर् माक्सर् ने प्रतिनििात्व किया। अिाकतर समय समाजशास्त्रा में इस मान्यता को सहमति नहीं मिली कि मनुष्य का स्वभाव घ्िानौना तथा व्रूफर होता है। एमिल दुखार्इम ने इस दृष्िटकोण कि, फ्आदिम मानव जाति की एकमात्रा उत्तेजना यही थी कि उनकी भूख तथा प्यास की हमेशा पूरी संतुष्िट होय्, के विपक्ष में इस प्रकार के तकर् दिए - ऐसे विचारकों ने नैतिक जीवन के आवश्यक अवयवों को नशरअंदाज किया, वे हैं, संयमित प्रभाव का प्रयोग जो समाज अपने सदस्यों पर करता है, जो उनके अस्ितत्व तथा चुनाव के संघषर् की पाश्िवक िया को संयमित तथा शून्य कर देता है। जहाँ कहीं भी समाज है, वहाँ पर पराथर्वाद है, क्योंकि वहाँ एकता है। अतः हम पराथर्वाद को मनुष्यता के प्रारंभ से ही देखते हैं और यहाँ तक कि असंयमित रूप में भी ;दुखार्इम 1933द्ध। दुखार्इम के लिए एकता समाज का नैतिक बल है, तथा यह सहयोग और इस तरह समाज के प्रकाया±े को समझने के लिए बुनियादी अवयव है। श्रम विभाजन की भूमिका जिसमें सहयोग निहित है, यथाथर् रूप से समाज की आवश्यकताओं की पूतिर् करती है। श्रम विभाजन एक ही समय में जहाँ प्रकृति का नियम है वही दूसरी ओर मनुष्य व्यवहार का नैतिक नियम भी है। दुखार्इम ने यांत्रिाक तथा सावयवी एकता में अंतर स्पष्ट किया जो क्रमशः पूवर् औद्योगिक तथा जटिल औद्योगिक समाजों की विशेषता थी। यांत्रिाक एकता संहति का एक रूप है जो बुनियादी रूप से एकरूपता पर आधारित है। इस समाज के अिाकांश सदस्य एक जैसा जीवन व्यतीत करते हैं, कम से कम विश्िाष्टता अथवा श्रम - विभाजन को हमेशा आयु तथा लिंग से जोड़ा जाता है, यह समाज की मुख्य विशेषता है। इस समाज के सदस्य परस्पर अपनी मान्यताओं तथा संवेदनाओं, अंतरविवेक तथा चेतना से जुड़े होते हैं। सावयवी एकता सामाजिक संहति का वह रूप है जो श्रम - विभाजन पर आधारित है तथा जिसके पफलस्वरूप समाज के सदस्यों में सह निभर्रता है। जैसे - जैसे व्यक्ित विश्िाष्टता हासिल करता है वैसे - वैसे दूसरों पर अिाक निभर्र होता जाता है। कृष्िा आधारित जीविका में लगा एक परिवार अपने जैसा काम करने वालों की थोड़ी या बगैर किसी मदद के जीवित रह सकता है परंतु कपड़ा अथवा कार उद्योग में लगा व्यापारी अन्य विश्िाष्ट कमर्चारियों के बिना जीवित नहीं रह सकता जो उनकी बुनियादी शरूरतों को पूरा करते हैं। कालर् माक्सर् भी मनुष्य जीवन तथा पशु जीवन में अंतर स्पष्ट करते हैं। जहाँ दुखार्इम पराथर्वाद तथा एकता को मानव दुनिया का समाज का बोध् विश्िाष्ट लक्षण मानते हैं वहीं माक्सर् चेतना पर बल देते हैं। वे लिखते हैं - मनुष्यों तथा पशुओं में अंतर चेतना, धमर् तथा किसी अन्य वस्तु के आधार पर किया जा सकता है। जैसे ही वे अपनी आजीविका के साधन उत्पन्न करने लगते हैं, वे स्वयं को पशुओं से भ्िान्न समझना प्रारंभ कर देते हैं - यह प्रयास उनके भौतिक संगठन द्वारा निश्िचत होता है। आजीविका के साधनों के उत्पादन से मनुष्य परोक्ष रूप से अपने भौतिक जीवन को प्रजनित करता है ;माक्सर् 1972ः37द्ध। माक्सर् का उपयुर्क्त कथन कठिन लग सकता है परंतु सहयोग मनुष्य जीवन को पशु जीवन से किस प्रकार अलग करता है, कोे समझने में मदद करेगा। मनुष्य केवल सहयोग के लिए समायोजन तथा सामंजस्य ही नहीं करते बल्िक इस प्रिया में समाज को बदलते भी हैं। उदाहरण के लिए, सदियों से पुरुषों तथा महिलाओं ने प्राकृतिक बाध्यताओं में अपने आप को समायोजित किया है। विभ्िान्न तकनीकी आविष्कारों ने मनुष्य के जीवन को ही नहीं बदला है बल्िक समय के साथ प्रकृति को भी बदल दिया है। इस प्रकार से मनुष्य सहयोग करते हुए निष्िक्रय रूप से केवल समायोजन और सामंजस्य ही नहीं करते बल्िक उस प्राकृतिक तथा सामाजिक संसार को भी बदल देते हैं जहाँ वे समायोजन करते हैं। हमने पिछली पुस्तक समाजशास्त्रा परिचय में संस्कृति पर एक अध्याय में देखा कि किस प्रकार भारतीयों को बि्रटिश साम्राज्यवाद के अनुभवों के कारण अंग्रेशी भाषा के साथ समायोजन, सामंजस्य तथा सहयोग करना पड़ा था। लेकिन इस प्रिया में ‘हिंगलिश’ का उद्भव एक जीवित सामाजिक यथाथर् है ;पृष्ठ 81 - 82द्ध। यद्यपि दुखार्इम ने प्रकायर्वादी संदभर् पर तथा माक्सर् ने संघषर् के परिप्रेक्ष्य में सहयोग पर बल दिया, परंतु दोनों के विचार अलग हैं। माक्सर् के अनुसार ऐसे समाज में जहाँ वगर् विद्यमान है वहाँ सहयोग स्वैच्िछक नहीं होता। उनका तवर्फ है, फ्सामाजिक शक्ित अथार्त बहुस्तरीय उत्पादक शक्ितयाँ, जिनका उद्भव विभ्िान्न व्यक्ितयों के सहयोग तथा श्रम विभाजन द्वारा होता है, इन व्यक्ितयों को लगता है कि उनका सहयोग स्वैच्िछक न होकर स्वाभाविक होता है, यह स्वयं की सम्िमलित ताकत का परिणाम न होकर एक अनजान ताकत का परिणाम है जो उनके बाहर स्िथत हैय् ;माक्सर् 1972ः53द्ध। माक्सर् ने ‘अलगाव’ शब्द का प्रयोग श्रम वफी मूतर् अन्तवर्स्तु तथा श्रम के उत्पाद पर मशदूरों के नियंत्राण में कमी के संदभर् में किया है। दूसरे शब्दों में, मशदूर अपने कायर् को किस प्रकार व्यवस्िथत करे, इस पर उनका नियंत्राण नहीं होताऋ और इसी प्रकार वे अपने श्रम के उत्पादन पर से भी अपना नियंत्राण खो देते हैं। हम यहाँ दो विपरीत उदाहरणों की चचार् कर सकते हैं। सन्तुष्िट तथा सृृजनात्मकता का भाव जो एक बुनकर या वुफम्हार या लुहार को अपने काम से मिलता है तथा दूसरी ओर एक पैफक्ट्री में काम करने वाले मशदूर जिसका एकमात्रा कायर् पूरे दिन में लीवर खींचना या बटन दबाना होता है। इन हालातों में सहयोग आरोपित होता है। प्रतिस्पधर् - अवधारणा एवं व्यवहार के रूप में जैसा कि सहयोग के विषय में हुआ, प्रतियोगिता की संकल्पना इस विचार के साथ आगे बढ़ती है कि प्रतिस्पधर् विश्वव्यापी तथा स्वाभाविक है। हम यह जान चुके हंै कि किस प्रकार समाजशास्त्रा की व्याख्या प्रकृतिवादी व्याख्या से भ्िान्न है, अतः यहाँ यह आवश्यक है कि एक सामाजिक तत्व के रूप में प्रतिस्पधर् को समझा जाए जिसका समाज में उद्भव हुआ है तथा एक निश्िचत ऐतिहासिक समय में यह प्रभावी रही है। समकालीन समय में यह सवर्प्रमुख विचार है तथा अिाकतर यह समझना मुश्िकल होता है कि कहीं ऐसा समाज हो सकता है जहाँ प्रतिस्पधर् एक मागर्दशर्क ताकत न हो। यह दंतकथा एक स्वूफल अध्यापक, जो अपने अनुभवों को अपने बच्चों के साथ अप्रफीका के एक पिछड़े स्थान से बता रहा है, हमारा ध्यान उस तथ्य की ओर आकष्िार्त करता है जहाँ प्रतिस्पधर् को स्वयं समाजशास्त्राीय रूप में न कि स्वाभाविक वृिा के रूप में समझाना था। यह दंतकथा अध्यापक की इस मान्यता पर आधारित है कि बच्चे दौड़ने की प्रतिस्पधर् के विचार से प्रसन्न होंगे, जहाँ विजेता को एक चाॅकलेट इनाम के रूप में दिया जाएगा। आश्चयर्, उनके इस सुझाव ने बच्चों में किसी प्रकार के उत्साह का संचरण नहीं किया बल्िक दूसरी तरपफ दु¯श्चता और दुख को बढ़ा दिया। जाँच, पड़ताल करने पर आगे बताया कि उनकी ऐसे खेलों में अरुचि है जहाँ ‘विजेता’ तथा ‘पराजित’ होंगे। यह उनके आनंद करने के विचार के विरु( है उनके लिए आनंद का विचार आवश्यक तौर पर सहयोग तथा सामूहिक अनुभव है न कि प्रतिस्पधर् जहाँ पुरस्कार वुफछ लोगों को वंचित करता है तथा एक अथवा वुफछ को पुरस्कृत करता है। समकालीन विश्व में प्रतिस्पधर् एक प्रमुख मानदंड तथा परिपाटी है। शास्त्राीय समाजवैज्ञानिकों जैसे एमिल दुखार्इम तथा कालर् माक्सर् ने आधुनिक समाजों में व्यक्ितवाद तथा प्रतिस्पधर् के विकास को एक साथ आधुनिक समाजों में देखा है। आधुनिक पूँजीवादी समाज जिस प्रकार कायर् करते हैं वहाँ दोनों का एक साथ विकास सहज है। यहाँ अत्यिाक कायर्वुफशलता तथा लाभ के कमाने पर बल दिया जाता है। पँूजीवाद की मौलिक मान्यताएँ हैं - ;कद्ध व्यापार का विस्तार, ;खद्ध श्रम विभाजन, ;गद्ध विशेषीकरण, और ;घद्ध बढ़ती उत्पादकता। स्व - धारणीय संवृि की ये प्रियाएँ पूँजीवाद के वंेफद्रीय विचार से बढ़ावा प्राप्त करती हैं। बाशार क्षेत्रा में विद्यमान मुक्त प्रतिस्पधर् में ताविर्फक व्यक्ित, अपने लाभों को अिाक बढ़ाने की कोश्िाश में लगा रहता है। प्रतिस्पधर् की विचारधारा पूँजीवाद की सशक्त विचाराधारा है। इस विचारधारा का तवर्फ है कि बाशार इस प्रकार से कायर् करता है कि अिाकतम कायर्वुफशलता सुनिश्िचत हो सके। उदाहरण के लिए, प्रतिस्पधर् यह सुनिश्िचत करती है कि सवार्िाक कायर्वुफशल पफमर् बची रहे। प्रतिस्पधर् समाज का बोध् यह सुनिश्िचत करती है कि अिाकतम अंक पाने वाला छात्रा अथवा बेहतरीन छात्रा को प्रसि( काॅलेजों में दाख्िाला मिल सके और पिफर बेहतरीन रोशगार प्राप्त हो सके। इन सभी स्िथतियों में ‘बेहतरीन’ होना सबसे बड़ा भौतिक पुरस्कार सुनिश्िचत करता है। ियाकलाप 6 27 पफीसदी आरक्षण अन्य पिछड़े वगा±े को देने के सरकार के निणर्य पर भारत में शोरदार वाद - विवाद हुए। अखबारों, पत्रिाकाओं तथा टी.वी. पर इस विषय के पक्ष तथा विपक्ष में दिए गए विभ्िान्न तका±े को एकत्रिात कीजिए। विद्यालयों में ‘ड्राॅप आउट’ की दर, विशेषकर प्राइमरी विद्यालयों में, पर जानकारी हासिल कीजिए। ;पिछली पुस्तक की पृष्ठ संख्या 65 - 67 देख्िाएद्ध अिाकतर निम्न जाति के विद्याथीर् स्वूफल से ड्राॅप आउट होते हैं तथा श्िाक्षा के उच्च संस्थानों में अिाकतर उच्च जातियों का वचर्स्व है, इस संदभर् में सहयोग, प्रतिस्पधर् तथा संघषर् की संकल्पना पर परिचचार् करें। ऐसे विचार कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से प्रतिस्पधर् करना चाहता है, को अन्य प्रकृतिवादी व्याख्याओं की भाँति आलोचनात्मक दृष्िट से समझा जाना चाहिए। ;प्रारंभ्िाक पुस्तक का पृष्ठ 9 देख्िाएद्ध प्रतिस्पधर्, पूँजीवाद के जन्म के साथ ही प्रबल इच्छा के रूप में पफली - पूफली। अगले पृष्ठ पर बाॅक्स में दिए गए गद्यांश को पढि़ए तथा परिचचार् कीजिए। प्रतिस्पधर् तथा पूँजीवाद के तहत उन्नीसवीं शताब्दी की संपूणर् मुक्त व्यापार अथर्व्यवस्था, आथ्िार्क विकास को आगे बढ़ाने में आवश्यक हो सकती है। अमेरीकी अथर्व्यवस्था के अत्यंत तीव्र गति से विकास को वहाँ प्रतिस्पधर् की अिाकतम उपस्िथति के गुण के रूप में देखा जा सकता है। परंतु पिफर भी हम प्रतिस्पधर् के दायरे या प्रतियोगी भावना की तीव्रता को विभ्िान्न समाजों में आथ्िार्क विकास की दर के साथ सकारात्मक सह संबंध का रूप देने में कठिनाइर् महसूस करते हैं। वहीं दूसरी तरप़्ाफ यह माने जाने के भी कारण हैं कि प्रतिस्पधर् के वुफछ बुरे प्रभाव भी हैं ;बोटोमोर 1975ः174 - 5द्ध। यह विचारधारा मान कर चलती है कि व्यक्ित बराबरी के स्तर पर प्रतिस्पधर् करता है, अथार्त प्रत्येक व्यक्ित के लिए प्रस्िथति, श्िाक्षा, रोशगार अथवा प्रतिस्पधर् हेतु समान संसाध्न रहते हैं। परंतु जैसा कि स्तरीकरण अथवा असमानता पर की गइर् पूवर् चचार् दिखाती है, व्यक्ित को समाज में भ्िान्न प्रकार से अवस्िथत किया गया है। यदि भारत में बच्चों की अिाकतम संख्या विद्यालय में नहीं जाती अथवा वे आज या कल पढ़ाइर् छोड़ देते हैं तो ऐसी स्िथति में वे हमेशा के लिए प्रतिस्पधर् से बाहर हो जाते हैं। संघषर् तथा सहयोग संघषर् शब्द का अथर् है हितों में टकराहट। हमने पहले ही देखा है कि किस प्रकार से संब( सि(ांतवादी विश्वास करते हैं कि संसाधनों की कमी समाज में संघषर् उत्पन्न करती है क्योंकि उन संसाधनों को पाने तथा उस पर कब्शा करने के लिए प्रत्येक समूह संघषर् करता है। संघषर् के आधार भ्िान्न - भ्िान्न होते हैं। ये वगर् अथवा जाति, जनजाति अथवा लिंग, नृजातीयता अथवा धामिर्क समुदायों में हो सकते हैं। एक नौजवान छात्रा के नाते आप समाज में विद्यमान संघषो± की विविधता से परिचित हैं। विभ्िान्न संघषो± के पैमाने तथा प्रकृति यद्यपि भ्िान्न होती है। ियाकलाप 9 सोचिए, आज विश्व में वे कौन से विभ्िान्न प्रकार के संघषर् हैं जो विद्यमान हैं। व्यापारिक स्तर पर विभ्िान्न राष्ट्रों तथा राष्ट्रों के समूह के बीच संघषर् हैं। एक ही राष्ट्र के अंदर कइर् प्रकार के संघषर् विद्यमान हैं। इन सबकी एक सूची बनाइए और चचार् कीजिए कि किस रूप में वे समान तथा किस रूप में वे भ्िान्न हैं। अिाकतर सामान्य ज्ञान की सोच के अनुसार समाज में संघषो± की स्िथति नयी है। समाजशास्ित्रायों ने इस तथ्य की ओर ध्यान आकष्िार्त किया है कि सामाजिक विकास की विभ्िान्न अवस्थाओं में संघषर् की प्रकृति तथा रूप सदैव परिवतिर्त होते रहे हैं। परंतु संघषर् किसी भी समाज का एक महत्त्वपूणर् हिस्सा सदैव से रहा है। सामाजिक परिवतर्न तथा लोकतांत्रिाक अिाकारों पर सुविधावंचित तथा भेदभाव का सामना कर रहे समूहों द्वारा हक जताना संघषो± को और उभारता है। लेकिन इसका यह अथर् नहीं है कि संघषर् पहले विद्यमान नहीं थे। बाॅक्स में दिए गए उ(रण इस पर बल देते हैं। नए तथा पुराने के बीच संघषर् आज विकासशील देशों के मंच बने हैं। प्राचीन प्रणाली नवीन ताकतों का मुकाबला नहीं कर पा रही है, न ही लोगों की नवीन आशाओं तथा आकांक्षाओं का प्रतिनिधत्व करती है। परंतु यह स्िथति समाज का बोध् मृतप्राय नहीं हैं - सच्चाइर् यह है कि ये अभी भी जीवित हैं। संघषर् बेकार की बहस, विभ्रांति, विसंगति, तथा कइर् मौकों पर खून - खराबे को जन्म देता है। इन परिस्िथतियों में समाजशास्ित्रायों के लिए यह बेहद आवश्यक होता है कि वे अपने पुराने - अच्छे दिनों को याद करें। परंतु एक पल वफा परावतर्न उन्हें यह विश्वास दिला देगा कि पुरानी प(ति संघषर् से वंचित नहीं थी और उसने जनसंख्या के व्यापक भाग पर अमानुष्िाक अत्याचार किए। सै(ांतिक दृष्िटकोण, जहाँ संघषर् को व्यािाकीय माना जाता है अथवा जहाँ विज्ञान के नाम पर एक विशेष मूल्य के रूप में संतुलन का निवेश किया जाता है, परंतु यह स्िथति विकासशील समाजों के अध्ययन में रुकावट सि( होती है। ;ड्डोतः श्रीनिवास, एम.एन., 1972, सोशल चेंज इन माॅडनर् इंडिया, पृष्ठ 159 - 160, ओरियण्ट लोंगमैंन, नयी दिल्ली।द्ध यहाँ यह समझना आवश्यक है कि संघषर् विसंगति अथवा प्रत्यक्ष झड़प के रूप में दिखाइर् देते हैं जहाँ ये खुल कर प्रकट किए जाते हैं। उदाहरण के तौर पर भूमि संसाधनों पर गहरे संघषो± की प्रत्यक्ष प्रतििया का परिणाम है कृषक आंदोलन। आंदोलन की अनुपस्िथति का अथर् संघषर् की अनुपस्िथति नहीं है। अतः इस अध्याय में संघषर्, अनिवायर् सहयोग तथा प्रतिरोध के संबंधों पर बल दिया गया है। आइए, वुफछ संघषो± पर जो समाज में विद्यमान हैं तथा प्रतिस्पधर्, सहयोग और संघषर् के आपसी सहसंबंधों पर भी विचार करें। हम यहाँ केवल दो उदाहरणों को लेंगे। प्रथम, परिवार तथा घर है और दूसरा, भूमि - आधारित संघषर्। पारंपरिक तौर पर परिवार तथा घर सामंजस्यपूणर् इकाइर् के रूप में देखे जाते रहे हैं जहाँ सहयोग प्रमुख प्रिया थी तथा पराथर्वाद मनुष्य के आचरण के प्रेरणात्मक सि(ांत थे। पिछले तीन दशकों से महिलावादी विश्लेषकों द्वारा इस मान्यता पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं। अमत्यर् सेन जैसे विद्वानों ने भी बलात् सहयोग की संभावना को माना है। सिपर्फ विभ्िान्न दलों को ही सहयोग से प़्ाफायदा नहीं हैऋ उनके व्यक्ितगत ियाकलापों को भी प्रत्यक्ष सहयोग के रूप में लेना होगा, छोटे - मोटे संघषो± के विद्यमान होने पर भी ... यद्यपि ‘सामाजिक तकनीकी’ के चुनाव में हितों का संजीदा संघषर् हो सकता है, पारिवारिक संगठनों की प्रकृति के लिए यह आवश्यक है कि इन संघषा±े को आपसी सहयोग द्वारा निबटाया जाए, साथ ही संघषर् को विचलित व्यवहार के रूप में देखा जाए। चूँकि संघषो± को प्रत्यक्ष रूप से संप्रेष्िात नहीं किया जाता अतः यह देखा गया है कि भौतिक दवाब तथा प्रेरणा का सहयोग तथा उससे बढ़कर वितरण तथा वितरण प्रिया में प्रत्यक्ष संघषर् के बहुत कम साक्ष्य हैं। इसके बदले निणर्य लेने, आवश्यकताएँ तथा प्राथमिकताएँ ;आयु, लिंग तथा जीवन चक्रद्ध सोपानिक हैं, ऐसे सोपान जिसका स्त्राी तथा पुरुष दोनों समथर्न करते हैं। अतः स्ित्रायाँ अनेक विशेषताओं को सतत रूप से अजिर्त करती हुइर् दिखाइर् देती हैं - घरेलू वस्तुओं के वितरण में विभेदीकृत कायर्, अपने आने वाले समय में सुरक्षा के लिए अन्य घरेलू संबंधों तथा संसाधनों तक पहुँच न मिलने के कारण, यह उनके भौतिक हित में होता है कि वे बेटे को मान्यता दें, जो इस संस्कार की महत्त्वपूणर् विशेषता है, तथा अपने अनियमित भविष्य के बीमा के लिए अपने बेटों को सहयोगी रूप मेें जीतने के लिए, उनके लिए ‘स्वाथर्रहित’ समपर्ण ही उनका निवेश होता है। ‘मातृ परहितवादिता’, उत्तरी भारत के मैदानों में, बेटों को लेकर पूवार्ग्रहित है तथा इसे स्त्राी के पितृसत्तात्मक जोख्िाम के प्रत्युत्तर के रूप में देखा जा सकता है। स्त्राी पूरी तरह से शक्ितहीन नहीं है, परंतु, पुरुष के निणर्य लेने की ताकत के समक्ष वह अप्रत्यक्ष ही रहती है। विश्वसनीय दोस्तों का उपयोग ;रिश्तेदार या पड़ोसीद्ध अपनी मध्यवगर् तथा अधीनस्थ वगर्, चाहे घर में महिलाएँ तरप़्ाफ से छोटे - मोटे व्यापार करने में, पैसों काहों या कृषक समाज में किसान, संघषो± में छुपकर लेन - देन, परदा तथा मातृत्व जैसी लैंगिक समायोजन तथा सहयोग पाने के लिए व्यक्ित एवं समूह विभ्िान्न प्रकार की रणनीति बनाते हैं। अनेक समाजशास्त्राीय अध्ययन अप्रत्यक्ष संघषर् तथा प्रत्यक्ष सहयोग को दिखाते हैं जो सामान्य हैं। नीचे दिया गया उ(रण घर में महिलाओं के व्यवहार तथा अंतःिया पर किए गए कइर् अध्ययनों से लिया गया है। विचारधारा पर बातचीत करना वे रणनीतियाँ हैं जिनके आधार पर स्ित्रायों ने पुरुष की शक्ित का प्रतिरोध किया है ;अब्दुल्ला तथा जीडेंस्टीन, 1982ऋ वाइर्ट 1992द्ध। उनके प्रतिरोध का यह गोपनीय रूप घर के बाहर सहयोग के विकल्पों की कमी तथा खुले संघषर् से जुड़े सहवतीर् शोख्िामों को दिखाता है ;कबीर 1996ः129द्ध। समाजशास्त्राीय प्रश्नात्मक परंपरा को ध्यान में रखते हुए मान लिए जाने वाले तथ्यों पर इस अध्याय में परीक्षण किए गए तथा इस पाठ में सहयोग, प्रतिस्पधर् तथा संघषर् की प्रियाओं की आलोचनात्मक रूप से जाँच की गइर्। समाजशास्त्राीय दृष्िटकोण से ये प्रियाएंँ ‘स्वाभाविक’ नहीं मानी जातीं। यह उन्हें आगे अन्य सामाजिक विकास से जोड़ता है। नीचे दिए गए अनुच्छेद में आप भूमि संबंधों तथा भारत के भूदान - ग्रामदान आंदोलन के विषय में पढ़ेंगे। बाॅक्स को पढि़ए और देख्िाए कि समाज में सहयोग किस प्रकार समाजशास्त्राीय रूप में तकनीक तथा उत्पादन की आथ्िार्क व्यवस्था से जुड़ा है। ियाकलाप 10 नीचे दिए गए भूमि संघषर् से संबंिात विवरण को ध्यानपूवर्क पढि़ए। इसके विभ्िान्न सामाजिक वगो± को पहचानिए तथा शक्ित तथा संसाधनों की भूमिका पर ध्यान दीजिए। समाज का बोध् उपसंहार इस पाठ का मुख्य उद्देश्य एक ओर सामाजिक तथा स्तरीकरण के संबंधों को समझना है तो दूसरी ओर सामाजिक प्रिया के रूप में सहयोग, प्रतिस्पधर् तथा संघषर् को। आपने देखा होगा कि तीनों सामाजिक प्रियाएँ भ्िान्न हैंऋ लेकिन अिाकांशतः वे एक साथ मौजूद होती हैंऋ तथा एक दूसरे से कभी छिपे और कभी खुले रूप में संब( और विद्यमान होती हंैऋ जैसा कि बलात् सहयोग के संदभर् में हुइर् चचार् से पता चलता है। हम इसे दिए गए दो ियाकलापों से समाप्त करते हैं जो जीवन की सही घटनाओं पर आधारित हैं, जो आपकी समाजशास्त्राीय सोच को यह खोजने में मदद करेंगी कि सामाजिक संरचना तथा स्तरीकरण व्यवस्था में तीनों प्रियाएँ जो भ्िान्न रूप में स्िथत हैं किस प्रकार से सामाजिक समूहों के लिए कायर् करती हैं। भूमि संघषर् सन् 1956 में हरबक्श, एक राजपूत ने नत्थू अहीर ;पटेलद्ध से सौ रुपए अपने दो एकड़ शमीन को गिरवी ;अनौपचारिकद्ध रख कशर् लिया। उसी वषर् हरबक्श की मृत्यु हो गइर् और उसके उत्तरािाकारी गनपत ने सन् 1958 में शमीन को वापस लेने का दावा किया। इसके लिए उसने दो सौ रुपए देने की पेशकश की। नत्थू ने गनपत को शमीन वापस करने से मना कर दिया। गनपत इसके लिए कानूनी कारर्वाइर् का सहारा नहीं ले सका क्योंकि यह लेन - देन आय - व्यय रिकाॅडर् में कहीं दशर् नहीं था। इन परिस्िथतियों के अधीन गनपत ने ¯हसा का सहारा ले सन् 1959 ;ग्रामदान के एक वषर् पश्चात्द्ध में शबरन भूमि पर अिाकार कर लिया। गनपत, चूँकि स्वयं एक पुलिस कांस्टेबल था, अतः इस मामले में उसने अपफसरों पर कापफी प्रभाव डाला। जब पटेल पुफलेरा गया ;पुलिस थाना हेडक्वाटर्रद्ध तो उसे पुलिस स्टेशन ले जाया गया और शबरन उसे इस बात पर राशी किया गया कि वह शमीन गनपत को वापिस लौटा देगा। इसके पश्चात् ग्रामवासियों की एक सभा बुलाइर् गइर् तब पटेल को पैसा दिया गया और गणपत को अपनी शमीन वापिस मिली। ड्डोतः ओम्मेन, टी.के., 1972: करिश्मा, स्टेबिलिटी एण्ड चेंज - एन एनालिसिस आॅपफ भूदान - ग्राम दान मूवमेंट इन इंडिया, पेज - 88., थाॅमसन प्रेस, नयी दिल्ली। तकनीक के विस्तार ने भी सहयोग की आवश्यकता को कम किया है। उदाहरण के लिए, चरस चलाने के लिए ;वुफओं से ¯सचाइर् करने वाली एक घरेलू विद्याद्ध, दो जोड़ी बैल तथा चार व्यक्ितयों की आवश्यकता होती है। एक साधारण किसान चार बैलों का खचर् नहीं उठा सकता अथवा एक औसत घर में शायद शरूरत जितने आदमी न हों। ऐसी स्िथति में वे बैल तथा आदमी दूसरे घरों ;रिश्तेदार, पड़ोसी, दोस्त आदिद्ध से मंगवाते हैं। वैसी ही सेवाओं को देने के बदले में। परंतु यदि चरस को रहट ;प£शयन व्हीलद्ध से बदल दिया जाए तो रहट, जिस पर भारी पूँजी निवेश की आवश्यकता पड़ती है, तब मात्रा एक जोड़ी बैल तथा एक व्यक्ित की आवश्यकता इसे चलाने में पड़ती है। ¯सचाइर् के संदभर् में सहयोग की आवश्यकता को, भारी पूँजी निवेश तथा सक्षम तकनीक के कारण कम कर दिया। अतः किसी प्रणाली में तकनीकी स्तर व्यक्ितयों तथा समूहों के बीच सहयोग की आवश्यकता को निधार्रित करता है। ;ओम्मेन 1972ः88द्ध ड्डोतः ओम्मेन, टी.के., 1972: करिश्मा, स्टेबिलिटी एण्ड चेंज - एन एनालिसिस आॅपफ भूदान - ग्राम दान मूवमेंट इन इंडिया, पेज - 88., थाॅमसन प्रेस, नयी दिल्ली। ियाकलाप 11 नीचे दी गइर् रिपोटर् को ध्यानपूवर्क पढि़ए तथा सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रिया के आपसी संबंधों पर परिचचार् करिए। किस प्रकार संतोष और पुष्पा सामाजिक संरचना तथा स्तरीकरण के कारण बाध्य हैं - इस पर विवेचना कीजिए। क्या यह संभव है कि उनके जीवन में तीन सामाजिक प्रियाओं यथा - सहयोग, प्रतिस्पधर् तथा संघषर् को पहचाना जा सके? क्या इन विवादों को सहयोग की प्रिया के रूप में देखा जा सकता है? क्या इन विवादों को ऐसी िया के रूप में देखा जा सकता है जिसे व्यक्ित समझ बूझकर अपनाता है ताकि वह प्रतियोगी रोशगार बाशार में जीवित रह सके क्योंकि विवाहित जोड़ों को यहाँ प्रमुखता दी जाती है? क्या यहाँ संघषर् के कोइर् लक्षण दिखते है? आउटलुक 8 मइर् 2006 फ्मिलिए माता - पिता से - किशोर विवाह, प्रवासी मशदूर तथा गन्ना कारखानों में संवैधानिक संकट - एक दुष्चक्रय् वुफछ बदलाव के साथ यह वही पुरानी कहानी है। संतोष श्िांदे ;14द्ध भूमिहीन मशदूर के बेटे, ने 8000 रुपए पढ़ाइर् के लिए )ण लिए। अब साहूकार चाहता है कि )ण की आपूतिर् की जाए। अतः ¯शदे जिसके पास पैसे के नाम पर वुफछ भी नहीं हैऋ एक गन्ने की पैफक्ट्री के ठेकेदार से वुफछ अगि्रम राश्िा आय के रूप में लेता है। समस्या यह है कि वे, पति - पत्नी तथा उनका एक लड़का है। अतः श्िंादे परिवार जल्दबाशी में संतोष के लिए एक दुल्हन ढूँढ़ते हैंऋ जिसकी उम्र भी 14 वषर् है। उसका नाम पुष्पा है, जो महाराष्ट्र के एक गाँव की रहनेवाली हैऋ वह उनके साथ कनार्टक के समाज का बोध् ओसामाबाद िाले में जाती है। वे रास्ते में एक साधारण से विवाह के लिए मंदिर में रुकते हैं। ... इसके लिए एक नाम भी है, ‘गेटकीन’। शायद इस शब्द का उद्भव वैंफप में रहने वाले प्रवासी मशदूरों से हुआ है, जो पैफक्ट्री के बाहर गन्नों की कटाइर् के मौसम में रहा करते थे। ठेकेदार अकेले लड़कों के बजाए विवाहित दंपति को काम देना पसंद करते हैं क्योंकि वे लड़कों के मुकाबले पैफक्ट्री में श्यादा महीनों तक रुक कर काम करते हैं। ... पश्िचमी महाराष्ट्र के गन्ने की पैफक्िट्रयाँ जहाँ एक समय में भारत के एक - तिहाइर् चीनी का उत्पादन होता था - आपदा की स्िथति में, प्रवासी मशदूरों के लिए रोशगार के अवसर खत्म हो गए। अनुमानतः पैफक्िट्रयों ने 1,900 करोड़ रुपए से अिाक का नुकसान उठाया है, और इस वषर् 177 चीनी मिलों में से 120 मिलों को मजबूरन वेंफद्र की 1,650 करोड़ रुपए वित्तीय पैकेज की सहायता लेनी पड़ी। लेकिन छह महीने की लंबी अविा में खेतों में गन्नों की कटाइर् करने वाले प्रवासी मशदूरों की स्िथति और भी बदतर हो गइर्। उनके रोशगार पाने के अवसर और कम हो गए और वेतन बद से बदतर। ... संतोष, एक नौजवान, जिसकी उम्र 16 वषर् की हो गइर् हैऋ ने अभी - अभी दसवीं कक्षा की पढ़ाइर् खत्म की है और उसकी पत्नी पुष्पा ने बारहवीं कक्षा की परीक्षा दी है। पुष्पा जो पढ़ने में अच्छी छात्रा हैंऋ अपनी पढ़ाइर् तथा अपने डेढ़ वषर् के बच्चे की देखभाल दोनों कायो± के बीच संतुलन बनाकर उन्हें करती हैं। इसके अलावा घर - परिवार तथा खेतों में काम भी होता है। जैसा कि वे स्वयं कहती हैं, फ्मेरी शादी इतनी जल्दी हुइर्, कि कभी - कभी मैं सोचती हूँ - मेरी शादी कब हुइर् - यह सब कब हुआ?य् पूछने पर कि क्या उनके स्वास्थ्य में वुफछ कमी आइर् है, इस नौजवान माँ का कहना है, फ्मेरी कोश्िाश रहती है कि मैं उन चीशों के बारे में न सोचूँ, जिनके ऊपर मेरा कोइर् बस नहीं है। इसकी अपेक्षा मैं उन चीशों पर ध्यान देती हूँ जो अब मैं कर सकती हूँ।य् उनके ससुराल वालों का कहना है कि वे आगे की पढ़ाइर् तभी कर सकती हैं जब उन्हें कोइर् छात्रावृिा मिले। नहीं तो ये नौजवान दंपिा मुंबइर् के किसी निमार्ण क्षेत्रा में काम करने चले जाएँगे। ियाकलाप 12 नीचे दी गइर् रिपोटर् को ध्यानपूवर्क पढि़ए। विक्रम और नितिन तथा ियाकलाप 11 के संतोष तथा पुष्पा में जिस प्रकार की प्रतिस्पधर् हैऋ उनकी असमानताओं को दशार्इए। जिस प्रकार 8 पफीसदी दर से भारतीय अथर्व्यवस्था, पुराने सभी रिकाॅडर् तोड़ती हुइर् तीव्र गति से आगे बढ़ रही है, दिन - प्रतिदिन व्यापार के क्षेत्रा में हशारों नौकरियाँ रोश जन्म लेती हैंऋ जिसका असर लोगों के बदलते हुए काम के प्रति दृष्िटकोण तथा कायर् - प्रणाली में देखा जा सकता है। ये नया कामकाजी वगर् तुरंत अपने किए गए काया±े के लिए इर्नाम चाहता है। उन्नति जल्दी से जल्दी मिलनी चाहिए और पैसा - अच्छी तनख्वाह, अतिरिक्त भत्ता, तथा ऊँची वृि - मुख्य उत्तेजक के रूप में कायर् करते हैं। विक्रम सामंत, 27 वषर् जिन्होंने अभी - अभी बी.पी.ओ. में कायर्भार सँभाला हैऋ अपनी पिछली नौकरी को छोड़ देने का मुख्य कारण बेहतरीन तनख्वाह को मानते हैं। फ्पैसा शरूरी है परंतु मेरे नए मालिकों को यह अच्छी तरह से पता है कि मैं हर उस एक रुपए के काबिल हूँ जो मुझे वे देते हैं,य् ऐसा उनका मानना है। ... इन नए कमार्ेन्मत्त को जो चीज आगे बढ़ाती है वह है काॅरपोरेट जगत की सीढ़ी पर छलाँगें मारते हुए आगे बढ़ना न कि एक - एक सीढ़ी पर तोलते हुए अपने कदमों को आगे बढ़ाना। फ्जी हाँ, मैं अगला पद जल्दी से जल्दी पाना चाहता हूँ, न कि अपने बुढ़ापे तक उसका इंतशार करना।य् ऐसा कहना है नितिन का जो अपनी अगली बड़ी छलाँग के लिए बिलवुफल इंतशार नहीं करना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने आइर्.सी.आइर्.सी.आइर्. को छोड़ एक तरक्की ले अपने - आपको स्टैंडडर् चाटर्डर् से जोड़ा तथा इसके बाद आॅप्िटमिक्स से क्षेत्राीय मैनेजर की हैसियत से जुड़ गया। ड्डोतः ‘द वीक’ ;मइर् 7, 2006द्ध ने एक विशेषांक निकाला जिसका शीषर्क था, ‘नए कमार्ेन्मत्ता: उनके लक्ष्य, दौलत, खतरा सेहत’। शब्दावली परहितवाद - सि(ांततः बिना किसी लाभ के दूसरों के हित के लिए काम करना। अलगाव - माक्सर् ने इस अवधारणा का प्रयोग मशदूरों का अपने श्रम तथा श्रम उत्पाद पर किसी प्रकार के अिाकार न होने के संदभर् में किया है। इससे मजदूरों की कायर् के प्रति रुचि समाप्त होने लगती है। प्रतिमानहीनता - दुखार्इम के लिए, सामाजिक स्िथति जहाँ व्यवहार को पथप्रदश्िार्त करने वाले मानदंड नष्ट हो जाते हैंऋ व्यक्ित बिना सामाजिक बाध्यता अथवा पथप्रदशर्न के रह जाता है। पूँजीवाद - वह आथ्िार्क प्रणाली, जहाँ उत्पादन के साधन पर निजी अिाकार होता है तथा जिसका प्रयोग बाशार व्यवस्था में लाभ कमाना है, जहाँ श्रम मजदूरों द्वारा किया जाता है। श्रम विभाजन - कायर् का विश्िाष्टीकरण, जिसके माध्यम से विभ्िान्न रोशगार उत्पादन प्रणाली से जुड़े होते हैं। प्रत्येक समाज में किसी न किसी रूप में श्रम विभाजन होता है विशेषकर पुरुषों को दिए गए कायर् तथा महिलाओं द्वारा किए गए कायर्। औद्योगीकरण के विकास के साथ श्रम विभाजन और जटिल हो गया, अन्य किसी भी प्रकार के उत्पादन की तुलना में। आधुनिक विश्व में श्रम विभाजन का क्षेत्रा अंतरराष्ट्रीय हो गया है। प्रभुत्वशाली विचारधारा - विचार तथा मान्यताएँ जो प्रभुत्वशाली समूहों के हितों की रक्षा करते हैं। ऐसी विचारधारा प्रत्येक समाज में पाइर् जाती है जहाँ विभ्िान्न वगो± में असमानताएँ हों। विचारधारा की समाज का बोध् संकल्पना शक्ित से जुड़ती है, चूँकि वैचारिक प्रणाली भ्िान्न शक्ितयों को वैध बनाती है जो विभ्िान्न समूहों में सन्िनहित होते हैं। व्यक्ितवाद - वह सि(ांत अथवा ¯चतन जो समूह के स्थान पर व्यक्ितयों की स्वायत्तता को महत्त्व देता है। मुक्त व्यापार/उदारवाद - वह राजनैतिक तथा आथ्िार्क नशरिया, जो इस सि(ांत पर आधारित है कि सरकार द्वारा अथर्व्यवस्था में अहस्तक्षेपीय नीति अपनाइर् जाए तथा बाशार एवं संपिा मालिकों को पूरी छूट दे दी जाए। यांत्रिाक एकता - दुखार्इम के अनुसार, परंपरागत संस्कृति में सरल श्रम विभाजन इसकी विशेषता है। चूँकि समाज के अिाकतर सदस्य एक जैसे काया±े में लगे रहते हैं अतः वे एक - दूसरे के साथ सामान्यतः समान प्रकार के अनुभव तथा मान्यताओं से बँधे होते हैं। आधुनिकता - 18वीं तथा 19वीं शताब्दी की सामाजिक प्रिया जो विश्िाष्टता, जटिलता तथा गत्यात्मकता के गुणों के कारण प्रसि( हुइर् और जो वास्तव में परंपरागत जीवन से अलग थी। सावयवी एकता - दुखार्इम के अनुसार, एकता के अंतगर्त समाज व्यक्ित की आथ्िार्क निभर्रता तथा दूसरों के काया±े की महत्ता से बँधा होता है। चूँकि यहाँ श्रम - विभाजन अत्यंत जटिल होता है अतः लोग एक - दूसरे पर अिाक से अिाक आश्रित होते हैं क्योंकि प्रत्येक व्यक्ित को वह उत्पाद चाहिए जिसका उत्पादन दूसरे व्यक्ित करते हैं। आथ्िार्क बदलाव तथा अंतनिर्भर्रता के सहसंबंध इस प्रकार की स्िथति में सामाजिक एकमतता बनाने में मदद करते हैं। सामाजिक बाध्यता - हम जिस समूह अथवा समाज के भाग होते हैं वे हमारे व्यवहार पर प्रभाव छोड़ते हैं। दुखार्इम के अनुसार सामाजिक बाध्यता सामाजिक तथ्य का एक विश्िाष्ट लक्षण है। संरचना - मुख्य रूप से किसी संगठन की बनावट एवं प्रतिमान ;पैटनर्द्ध को इंगित करना है, जो वुफछ हद तक मानव व्यवहार को निदर्ेश्िात या बाध्य करता है। अभ्यास 1 कृष्िा तथा उद्योग के संदभर् में सहयोग के विभ्िान्न काया±े की आवश्यकता की चचार् कीजिए। 2 क्या सहयोग हमेशा स्वैच्िछक अथवा बलात् होता है? यदि बलात् है, तो क्या मंजूरी प्राप्त होती है अथवा मानदंडों की शक्ित के कारण सहयोग करना पड़ता है? उदाहरण सहित चचार् करें। 3 क्या आप भारतीय समाज से संघषर् के विभ्िान्न उदाहरण ढूँढ़ सकते हैं? प्रत्येक उदाहरण में वे कौन से कारण थे जिसने संघषर् को जन्म दिया? चचार् कीजिए। 4 संघषर् को किस प्रकार कम किया जाता है इस विषय पर उदाहरण सहित निबंध लिख्िाए। 5.ऐसे समाज की कल्पना कीजिए जहाँ कोइर् प्रतिस्पधर् नहीं है, क्या यह संभव है? अगर नहीं तो क्यों? 6.अपने माता - पिता, बड़े - बुजुगा±े तथा उनके समकालीन व्यक्ितयों से चचार् कीजिए कि क्या आधुनिक समाज सही मायनों में प्रतिस्पधर् है अथवा पहले की अपेक्षा संघषो± से भरा है और अगर आपको ऐसा लगता है तो आप समाजशास्त्राीय परिप्रेक्ष्य में इसे वैफसे समझाएँगे? संदभर् अब्दुल्लाह, टी. तथा एस. जीडेंस्टीन, 1982.विलेज मेन आॅप़़्ाफ बांग्लादेशःप्राॅस्पेक्टस पफाॅर चेंजपरगामाॅन प्रेस, आॅक्सपफोडर्। बासु, श्रीमती, 2001.शी कम्स टू टेक हर राइट्सःइंडियन वूमैन प्रोपटीर् एण्ड प्रोप्राइटी.काली पफाॅर वूमैन, नयी दिल्ली। बाॅटोमोर, टी.बी., 1975.सोशयोलाॅजी एश सोशल िटीसीश्म. जाॅजर् एलेन एण्ड अनविन लि., लंदन। दुखार्इम एमिल, 1933.द डिवीशन आॅप़्ाफ लेबर इन सोसायटी.ए प्रफी प्रेस ;पेपरबैकद्ध, द मैकमिलन कंपनी, न्यूयावर्फ। जयराम, एन., 1987.इंट्रोडक्टरी सोशयोलाॅजी.मैकमिलन इंडिया लि., दिल्ली। हेल सिल्िवया, एम. 1990.काॅट्रोवसिर्स इन सोशयोलाॅजीःए कनेडियन इंट्रोडक्शन, लोंगमैन ग्रुप्स, लंदन। माक्सर् कालर् तथा प्रेफडरिक ऐंजेल्स. 1974.द जमर्न आइडियोलाॅजी, सिलेक्टेड वक्सर्, भाग - 1, पीपुल्स पब्िलश्िांग हाउस, मास्को। सेन, अमत्यर्, 1990. ‘जेंडर एण्ड कोआॅपरेटिव काॅनिलक्ट्स’ इन परसिस्टेन्ट इनइक्िवेलिटीश ;संपा.द्ध, प्प्ए टिंकर, पी.पी. 123 - 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