राजस्थान की रजत बूँदंे - अनुपम मिश्र पसीने में तरबतर चेलवांजी वुंफइर् के भीतर काम कर रहे हैं। कोइर् तीस - पैंतीस हाथ गहरी खुदाइर् हो चुकी है। अब भीतर गरमी बढ़ती ही जाएगी। वुंफइर् का व्यास, घेरा बहुत ही संकरा है। उखरूँ1 बैठे चेलवांजी की पीठ और छाती से एक - एक हाथ की दूरी पर मि‘ी है। इतनी संकरी जगह में खोदने का काम वुफल्हाड़ी या पफावड़े से नहीं हो सकता। खुदाइर् यहाँ बसौली से की जा रही है। बसौली छोटी डंडी का छोटे पफावड़े जैसा औशार होता है। नुकीला पफल लोहे का और हत्था लकड़ी का। वुंफइर् की गहराइर् में चल रहे मेहनती काम पर वहाँ की गरमी का असर पड़ेगा। गरमी कम करने के लिए उफपर शमीन पर खड़े लोग बीच - बीच में मुऋी भर रेत बहुत शोर के साथ नीचे पेंफकते हैं। इससे उफपर की ताशी हवा नीचे पिफकाती है औरगहराइर् में जमा दमघोंटू गरम हवा ऊपर लौटती है। इतने उफपर से पेंफकी जा रही रेत के कण नीचे काम कर रहे चेलवांजी के सिर पर लग सकते हैं इसलिए वे अपने सिर पर कांसे, पीतल या अन्य किसी धातु का एक बतर्न टोप की तरह पहने हुए 1.उकडूँ़ बैठना, पंजे के बल घुटने मोड़ कर बैठना। हंै। नीचे थोड़ी खुदाइर् हो जाने के बाद चेलवांजी के पंजोें के आसपास मलबा जमा हो गया है। उफपर रस्सी से एक छोटा - सा डोल या बाल्टी उतारी जाती है। मि‘ी उसमें भर दी जाती है। पूरी सावधानी के साथ उफपर खींचते समय भी बाल्टी में से वुफछ रेत, वंफकड़ - पत्थर नीचे गिर सकते हैं। टोप इनसे भी चेलवांजी का सिर बचाएगा। चेलवांजी यानी चेजारो, वंुफइर् की खुदाइर् और एक विशेष तरह की चिनाइर् करने वाले दक्षतम लोग। यह काम चेजा कहलाता है। चेजारो जिस वुंफइर् को बना रहे हैं, वह भी कोइर् साधारण ढाँचा नहीं है। वुंफइर् यानी बहुत ही छोटा - सा वुफआँ। वुफआँ पं¯लग है, वुंफइर् स्त्राीलिंग। ु यह छोटी भी केवल व्यास में ही है। गहराइर् तो इस वुंफइर् की कहीं से कम नहीं। राजस्थान में अलग - अलग स्थानों पर एक विशेष कारण से वुंफइयों की गहराइर् वुफछ कम - श्यादा होती है। वुंफइर् एक और अथर् में वुफएँ से बिलवुफल अलग है। वुफआँ भूजल को पाने के लिए बनता है पर वुंफइर् भूजल से ठीक वैसे नहीं जुड़ती जैसे वुफआँ जुड़ता है। वुंफइर् वषार् के जल को बड़े विचित्रा ढंग से समेटती हैμ तब भी जब वषार् ही नहीं होती! यानी वुंफइर् में न तो सतह पर बहने वाला पानी है, न भूजल है। यह तो ‘नेति - नेति’ जैसा वुफछ पेचीदा मामला है। मरुभूमि में रेत का विस्तार और गहराइर् अथाह है। यहाँ वषार् अिाक मात्रा में भी हो तो उसे ामि में ंेर नहीभ्ूसमाजानमदें लगती। पर कहीं - कहीं मरुभूमि में रेत की सतह के नीचे प्रायः दस - पंद्रह हाथ से पचास - साठ हाथ नीचे खडि़या पत्थर की एक प‘ी चलती हैै। यह प‘ी जहाँ भी है, कापफी़लंबी - चैड़ी है पर रेत के नीचे दबी रहने के कारण उफपर से दिखती नहीं है। ऐसे क्षेत्रों में बड़े वुफएँ खोदते समय मि‘ी में हो रहे परिवतर्न से खडि़या प‘ी का पता चल जाता है। बड़े कुओं में पानी तो डेढ़ सौ - दो सौ हाथ पर निकल ही आता है पर वह प्रायः खारा होता है। इसलिए पीने के काम में नहीं आ सकता। बस तब इन क्षेत्रों में कुंइयाँ बनाइर् जाती हैं। प‘ी खोजने में पीढि़यों का अनुभव भी काम आता है। बरसात का पानी किसी क्षेत्रा में एकदम ‘बैठे’ नहीं तो पता चल जाता है कि रेत के नीचे ऐसी प‘ी चल रही है। यह प‘ी वषार् के जल को गहरे खारे भूजल तक जाकर मिलने से रोकती हैै। ऐसी स्िथति में प्रवृफति की उदारता पर खड़ी वुंफइर् उस बड़े क्षेत्रा में बरसा पानी भूमि की रेतीली सतह और नीचे चल रही पथरीली प‘ी के बीच अटक कर नमी की तरह पैफल जाता है। तेश पड़ने वाली गरमी में इस नमी की भापबनकर उड़ जाने की आशंका उठ सकती है। पर ऐसे क्षेत्रों में प्रकृति की एक आरैअनोखी उदारता काम करती है। रेत के कण बहुत ही बारीक होते हैं। वे अन्यत्रा मिलने वाली मि‘ी के कणों की तरह एक दूसरे से चिपकते नहीं। जहाँ लगाव है, वहाँ अलगाव भी होता है। जिस मि‘ी के कण परस्पर चिपकते हैं, वे अपनी जगह भी छोड़ते हैं और इसलिए वहाँ वुफछ स्थान खाली छूट जाता है। जैसे दोमट या काली मि‘ी के क्षेत्रा में गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार आदि में वषार् बंद होने के बाद धूप निकलने पर मि‘ी के कण चिपकने लगते हैं और धरती में, खेत और आँगन में दरारें पड़ जाती हैं। धरती की संचित नमी इन दरारों से गरमी पड़ते ही वाष्प बनकर वापस वातावरण में लौटने लगती है। पर यहाँ बिखरे रहने में ही संगठन है। मरफभूमि में रेत के कण समान रूप से बिखरे रहते हैं। यहाँ परस्पर लगाव नहीं, इसलिए अलगाव भी नहीं होता। पानी गिरने पर कण थोड़े भारी हो जाते हैं पर अपनी जगह नहीं छोड़ते। इसलिए मरफभूमि में धरती पर दरारें नहीं पड़तीं। भीतर समाया वषार् का जल भीतर ही बना रहता है। एक तरपफ थोड़े नीचे चल रही़प‘ी इसकी रखवाली करती है तो दूसरी तरपफ उफपर रेत वेफ़असंख्य कणों का कड़ा पहरा बैठा रहता है। इस हिस्से में बरसी बूँद - बूँद रेत में समा कर नमी में बदल जाती है। अब यहाँ वुंफइर् बन जाए तो उसका पेट, उसकी खाली जगह चारों तरप़्ाफ रेत में समाइर् नमी को पिफर से बूँदों में बदलती है। बूँद - बूँद रिसती है और कंुइर् मंे पानी जमा होने लगता हैμ खारे पानी के सागर में अमृत जैसा मीठा पानी। इस अमृत को पाने के लिए मरफभूमि के समाज ने खूब मंथन किया है। अपने अनुभवों को व्यवहार में उतारने का पूरा एक शास्त्रा विकसित किया है। इस शास्त्रा ने समाज के लिए उपलब्ध पानी को तीन रूपों में बाँटा है। पहला रूप है पालरपानी। यानी सीधे बरसात से मिलने वाला पानी। यह धरातल पर बहता है और इसे नदी, तालाब आदि में रोका जाता है। यहाँ आदि शब्द में भी बहुत वुफछ छिपा है। उसका पूरा विवरण आगे कहीं और मिलेगा। पानी का दूसरा रूप पातालपानी कहलाता है। यह वही भूजल है जो कुओं में से निकाला जाता है। पालरपानी और पातालपानी के बीच पानी का तीसरा रूप है, रेजाणीपानी। धरातल से नीचे उतरा लेकिन पाताल में न मिल पाया पानी रेजाणी है। वषार् की मात्रा नापने में भी इंच या सेंटीमीटर नहीं बल्िक रेजा शब्द का उपयोग होता है। और रेजा का माप धरातल पर हुइर् वषार् को नहीं, धरातल में समाइर् वषार् को नापता है। मरफभूमि में पानी इतना गिरे कि पाँच अंगुल भीतर समा जाए तो उस दिन की वषार् को पाँच अंगुल रेजो कहेंगे। रेजाणीपानी खडि़या प‘ी के कारण पातालीपानी से अलग बना रहता है। ऐसी प‘ी के अभाव में रेजाणीपानी धीरे - धीरे नीचे जाकर पातालीपानी में मिलकर अपना विश्िाष्ट रूप खो देता है। यदि किसी जगह भूजल, पातालीपानी खारा है तो रेजाणीपानी भी उसमें मिलकर खारा हो जाता है। इस विश्िाष्ट रेजाणीपानी को समेट सकने वाली वुंफइर् बनाना सचमुच एक विश्िाष्ट कला है। चार - पाँच हाथ के व्यास की वुंफइर् को तीस से साठ - पैंसठ हाथ की गहराइर् तक उतारने वाले चेजारो वुफशलता और सावधानी की पूरी उँफचाइर् नापते हैं। चेजो यानी चिनाइर् का श्रेष्ठतम काम वुंफइर् का प्राण है। इसमें थोड़ी - सी भी चूक चेजारो के प्राण ले सकती है। हर दिन थोड़ी - थोड़ी खुदाइर् होती है, डोल से मलबा निकाला जाता है और पिफर आगे की खुदाइर् रोक कर अब तक हो चुके काम की से नहीं। बीस - पच्चीस हाथ की गहराइर् तक जाते - जाते गरमी बढ़ती जाती है और हवा भी कम होने लगती है। तब उफपर से मुऋी भर - भर कर रेत नीचे तेशी से पेंफकी जाती है - मरफभूमि में जो हवा रेत के विशाल टीलों तक को यहाँ से वहाँ उड़ा देती है, वही हवा यहाँ वुंफइर् की गहराइर् में एक मुऋी रेत से उड़ने लगती है और पसीने में नहा रहे चेलवांजी को राहत दे जाती है। वुफछ जगहों पर वुंफइर् बनाने का यह कठिन काम और भी कठिन हो जाता है। किसी - किसी जगह ईंट की चिनाइर् से मि‘ी को रोकना संभव नहीं हो पाता। तब वुंफइर् को रस्से से ‘बाँधा’ जाता है। पहले दिन वुंफइर् खोदने के साथ - साथ खींप1 नाम की घास का ढेर जमा कर लिया जाता है। चेजारो खुदाइर् शुरू करते हैं और बाकी लोग खींप की घास से कोइर् तीन अंगुल मोटा रस्सा बटने लगते हैं। पहले दिन वुंफइर् पर सजगता का पहरा 1.एक प्रकार की घास जिसके रेशों से रस्सी बनाइर् जाती है। चिनाइर् की जाती है ताकि मि‘ी भसके, धँगहरी हो जाती है। इसके तल पर दीवार के साथ सटा कर रस्से का पहला गोला बिछाया जाता है और पिफर उसके उफपर दूसरा, तीसरा, चैथाμ इस तरह उफपर आते जाते हैं। खींप घास से बना खुरदरा मोटा रस्सा हर घेरे पर अपना वशन डालता है और बटी हुइर् लडि़याँ एक दूसरे में पँफस कर मशबूती से एक के उफपर एक बैठती जाती हैं। रस्से का आख्िारी छोर उफपर रहता है। अगले दिन पिफर वुफछ हाथ मि‘ी खोदी जाती है और रस्से की पहले दिन जमाइर् गइर् वंुफडली दूसरे दिन खोदी गइर् जगह में सरका दी जाती है। उफपर छूटी दीवार में अब नया रस्सा बाँधा जाता है। रस्से की वुंफडली को टिकाए रखने के लिए बीच - बीच में कहीं - कहीं चिनाइर् भी करते जाते हैं। लगभग पाँच हाथ के व्यास की वुंफइर् में रस्से की एक ही वुंफडली का सिप़्ार्फ एक घेरा बनाने के लिए लगभग पंद्रह हाथ लंबा रस्सा चाहिए। एक हाथ की गहराइर् में रस्से के आठ - दस लपेटे खप जाते हैं और इतने में ही रस्से की वुफल लंबाइर् डेढ़ सौ हाथ हो जाती है। अब यदि तीस हाथ गहरी वुंफइर् की मि‘ी को थामने के लिए रस्सा बाँधना पड़े तो रस्से की लंबाइर् चार हशार हाथ के आसपास बैठती है। नए लोगों को तो समझ में भी नहीं आएगा कि यहाँ वुंफइर् खुद रही है कि रस्सा बन रहा है! कहीं - कहीं न तो श्यादा पत्थर मिलता है न खींप ही। लेकिन रेजाणीपानी है तो वहाँ भी वुंफइयाँ शरूर बनती हैं। ऐसी जगहों पर भीतर की चिनाइर् लकड़ी के लंबे लऋों से की जाती है। लऋे अरणी, बण ;वैफरद्ध, बावल या वुंफबट के पेड़ों की डगालों1 से बनाए जाते हैं। इस काम के लिए सबसे उम्दा लकड़ी अरणी की ही है पर उम्दा या मध्यम दरजे की लकड़ी न मिल पाए तो आक तक से भी काम लिया जाता है। लऋे नीचे से ऊपर की ओर एक दूसरे में पँफसा कर सीध्े खड़े किए जाते हैं। पिफर इन्हें खींप की रस्सी से बाँध जाता है। कहीं - कहीं चग की रस्सी भी काम में े सापण्ँाी भी कहते हं।ैतना या मोटी टहनियाँ नीचे खुदाइर् और चिनाइर् का काम कर रहे चेलवांजी को मि‘ी की खूब परख रहती है। खडि़या पत्थर की प‘ी आते ही सारा काम रुक जाता है। इस क्षण नीचेधार लग जाती है। चेजारो ऊपर आ जाते हैं। वुंफइर् की सपफलता यानी सजलता उत्सव का अवसर बन जाती है। यों तो पहले दिन से काम करने वालों का विशेष ध्यान रखना यहाँ की परंपरा रही है, पर काम पूरा होने पर तो विशेष भोज का आयोजन होता था। चेलवांजी को विदाइर् के समय तरह - तरह की भेंट दी जाती थी। चेजारो के साथ गाँव का यह संबंध् उसी दिन नहीं टूट जाता था। आच प्रथा1 से उन्हें वषर् - भर के तीज - त्योहारों में, विवाह जैसे मंगल 1.इस प्रथा के अंतगर्त वुंफइर् खोदने वालों को वषर् भर सम्मानित किया जाता है अवसरों पर नेग, भेंट दी जाती और प़्ाफसल आने पर खलियान में उनके नाम से अनाज का एक अलग ढेर भी लगता था। अब सिप़्ार्फ मशदूरी देकर भी काम करवाने का रिवाज आ गया है। कइर् जगहों पर चेजारो के बदले सामान्य गृहस्थ भी इस विश्िाष्ट कला में वुफशल बन जाते थे। जैसलमेर के अनेक गाँवों में पालीवाल ब्राह्मणों और मेघवालों ;अब अनुसूचित जाति के अंतगर्तद्ध के हाथों से सौ - दो सौ बरस पहले बनी पार या वुंफइयाँ आज भी बिना थके पानी जुटा रही हैं। वुंफइर् का मुँह छोटा रखने के तीन बड़े कारण हैं। रेत में जमा नमी से पानी की बूँदें बहुत ध्ीरे - ध्ीरे रिसती हैं। दिन भर में एक वुंफइर् मुश्िकल से इतना ही पानी जमा कर पाती है कि उससे दो - तीन घड़े भर सवेंफ। वंुफइर् के तल पर पानी की मात्रा इतनी कम होती है कि यदि वुंफइर् का व्यास बड़ा हो तो कम मात्रा का पानी श्यादा पैफल जाएगा और तब उसे उफपर निकालना संभव नहीं होगा। छोटे व्यास की वुंफइर् में धीरे - धीरे रिस कर आ रहा पानी दो - चार हाथ की उफँचाइर् ले लेता है। कइर् जगहों पर वुंफइर् से पानी निकालते समय छोटी बाल्टी के बदले छोटी चड़स का उपयोग भी इसी कारण से किया जाता है। धातु की बाल्टी पानी में आसानी से डूबती नहीं। पर मोटे कपड़े या चमड़े की चड़स के मुँह पर लोहे का वशनी कड़ा बँधा होता है। चड़स पानी से टकराता है, उफपर का वशनी भाग नीचे के भाग पर गिरता है और इस तरह कम मात्रा के पानी में भी ठीक से डूब जाता है। भर जाने के बाद उफपर उठते ही चड़स अपना पूरा आकार ले लेता है। पिछले दौर में ऐसे वुफछ गाँवों के आसपास से सड़वेंफ निकली हैं, ट्रक दौड़े हैं। ट्रकों की पफटी ट्यूब से भी छोटी चड़सी बनने लगी हैं। वुंफइर् के व्यास का संबंध् इन क्षेत्रों में पड़ने वाली तेश गरमी से भी है। व्यास बड़ा हो तो वुंफइर् के भीतर पानी श्यादा पैफल जाएगा। बड़ा व्यास पानी को भाप बनकर उड़ने से रोक नहीं पाएगा। वुंफइर् को, उसके पानी को सापफ रखने के लिए उसे ढँककर रखना शरूरी है।़छोटे मँुह को ढँकना सरल होता है। हरेक वुंफइर् पर लकड़ी के बने ढक्कन ढँके मिलेंगे। कहीं - कहीं खस की ट‘ी की तरह घास - पूफस या छोटी - छोटी टहनियों से बने ढक्कनों का भी उपयोग किया जाता है। जहाँ नइर् सड़वेंफ निकली हैं और इस तरह नए और अपरिचित लोगों की आवक - जावक भी बढ़ गइर् है, वहाँ अमृत जैसे इस मीठे पानी की सुरक्षा भी करनी पड़ती है। इन इलाकों में कइर् वुंफइयों के ढक्कनों पर छोटे - छोटे ताले भी लगने लगे हैं। ताले वुंफइर् के उफपर पानी खींचने के लिए लगी घ्िारनी, चकरी पर भी लगाए जाते हैं। वंुफइर् गहरी बने तो पानी खींचने की सुविध के लिए उसके उफपर घ्िारनी या चकरी भी लगाइर् जाती है। यह गरेड़ी, चरखी या पफरेड़ी भी कहलाती है। पफरेड़ी लोहे की दो भुजाओं पर भी लगती है। लेकिन प्रायः यह गुलेल के आकार के एक मशबूत तने को काट कर, उसमें आर - पार छेद बना कर लगाइर् जाती है। इसे ओड़ाक कहते हैं। ओड़ाक और चरखी के बिना इतनी गहरी और संकरी वंुफइर् से पानी निकालना बहुत कठिन काम बन सकता है। ओड़ाक और चरखी चड़सी को यहाँ - वहाँ बिना टकराए सीध्े उफपर तक लाती है, पानी बीच में छलक कर गिरता नहीं। वशन खींचने में तो इससे सुविधा रहती ही है। खडि़या पत्थर की प‘ी एक बड़े भाग से गुशरती है इसलिए उस पूरे हिस्से में एक के बाद एक वुंफइर् बनती जाती है। ऐसे क्षेत्रा में एक बड़े सापफ - सुथरे मैदान में़तीस - चालीस वुंफइयाँ भी मिल जाती हैं। हर घर की एक वुंफइर्। परिवार बड़ा हो तो एक से अध्िक भी।निजी और सावर्जनिक संपिा का विभाजन करने वाली मोटी रेखा वुंफइर् के मामले में बड़े विचित्रा ढंग से मिट जाती है। हरेक की अपनी - अपनी वुंफइर् है। उसे बनाने और उससे पानी लेने का हक उसका अपना हक है। लेकिन वुंफइर् जिस क्षेत्रा में बनती है, वह गाँव - समाज की सावर्जनिक शमीन है। उस जगह बरसने वाला पानी ही बाद में वषर् - भर नमी की तरह सुरक्ष्िात रहेगा और इसी नमी से साल - भर वुंफइयों में पानी भरेगा। नमी की मात्रा तो वहाँ हो चुकी वषार् से तय हो गइर् है। अब उस क्षेत्रा में बनने वाली हर नइर् वुंफइर् का अथर् है, पहले से तय नमी का बँटवारा। इसलिए निजी होते हुए भी सावर्जनिक क्षेत्रा में बनी वुंफइयों पर ग्राम समाज का अंवुफश लगा रहता है। बहुत शरूरतपड़ने पर ही समाज नइर् वुंफइर् के लिए अपनी स्वीकृति देता है। हर दिन सोने का एक अंडा देने वाली मुगीर् की चिरपरिचित कहानी को शमीन पर उतारती है वुंफइर्। इससे दिन भर में बस दो - तीन घड़ा मीठा पानी निकाला जा सकता है। इसलिए प्रायः पूरा गाँव गोध्ूलि बेला में वुंफइयों पर आता है। तब मेला - सा लग जाता है। गाँव से सटे मैदान में तीस - चालीस वुंफइयों पर एक साथ घूमती घ्िारनियों का स्वर गोचर से लौट रहे पशुओं की घंटियों और रंभाने की आवाश में समा जाता है। दो - तीन घड़े भर जाने पर डोल और रस्िसयाँ समेट ली जाती हैं। वुुंफइयों के ढक्कन वापस बंद हो जाते हैं। रात - भर और अगले दिन - भर वुंफइयाँ आराम करेंगी। रेत के नीचे सब जगह खडि़या की प‘ी नहीं है, इसलिए वुंफइर् भी पूरे राजस्थान में नहीं मिलेगी। चुरू, बीकानेर, जैसलमेर और बाड़मेर के कइर् क्षेत्रों में यह प‘ी चलती है और इसी कारण वहाँ गाँव - गाँव में वुंफइयाँ ही वुंफइयाँ हैं। जैसलमेर िाले के एक गाँव खड़ेरों की ढाणी में तो एक सौ बीस वुंफइयाँ थीं। लोग इस क्षेत्रा को छह - बीसी ;छह गुणा बीसद्ध के नाम से जानते थे। कहीं - कहीं इन्हें पार भी कहते हैं। जैसलमेर तथा बाड़मेर के कइर् गाँव पार के कारण ही आबाद हैं और इसीलिए उन गाँवों के नाम भी पार पर ही हैं। जैसे जानरे आलो पार और सिरगु आलो पार। अलग - अलग जगहों पर खडि़या प‘ी के भी अलग - अलग नाम हैं। कहीं यह चारोली है तो कहीं धाधड़ो, धड़धड़ो, कहीं पर बि‘ रो बल्िलयो के नाम से भी जानीूजाती है तो कहीं इस प‘ी का नाम केवल ‘खड़ी’ भी है। और इसी खडी रहती है वुंफइर्। ी के बल पर खारे पानी के बीच मीठा पानी देती खड़़वितान अभ्यास 1.राजस्थान में वुंफइर् किसे कहते हैं? इसकी गहराइर् और व्यास तथा सामान्य वुफओं की गहराइर् और व्यास में क्या अंतर होता है? 2.दिनोदिन बढ़ती पानी की समस्या से निपटने में यह पाठ आपकी वैफसे मदद कर सकता है तथा देश के अन्य राज्यों में इसके लिए क्या उपाय हो रहे हंै? जानंे और लिखें? 3.चेजारो के साथ गाँव समाज के व्यवहार में पहले की तुलना में आज क्या प़्ाफवर्फ आया है पाठ के आधार पर बताइए? 4.निजी होते हुए भी सावर्जनिक क्षेत्रा में वंुफइयों पर ग्राम समाज का अंवुफश लगा रहता है। लेखक ने ऐसा क्यों कहा होगा? 5.वंुफइर् निमार्ण से संबंिात निम्न शब्दों के बारे में जानकारी प्राप्त करें - पालरपानी, पातालपानी, रेजाणीपानी

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