176 ध् अंतरा परिवार की व्यथा - कथा है। मनुष्य संसार की भागमभाग भरे जीवन से राहत पाने के लिए स्नेह, ममत्व, अपनत्व और सुरक्षा भरे माहौल में घर बनाता है और उसमें रहता है। यहाँ विडंबना यह है कि तमाम रिश्ते - नातों, स्नेह और अपनत्व के बीच गरीबी की दीवार खड़ी है। गरीबी से लड़ते - लड़ते अब इतनी भी ताकत नहीं रही किरिश्तों में ऊजार् का संचार पैदा करने हेतु कोइर् चाबी बनाइर् जा सके और इस जटिल ताले को खोला जा सके। कविता में एक ऐसे घर की आकांक्षा है जहाँ गरीबी दीवार की तरह बाध्क न हो। माँ - पिता, बेटी, पत्नी आदि का स्नेहिल वातावरण हो ताकि जीवन - संघषर् में घर का सुख प्राप्त हो सके। घर में वापसी मेरे घर में पाँच जोड़ी आँखें हैं माँ की आँखें पड़ाव से पहले ही तीथर् - यात्रा की बस के दो पंचर पहिए हैं। पिता की आँखें μ लोहसाँय की ठंडी शलाखें हैं बेटी की आँखें मंदिर मंें दीवट पर जलते घी के दो दिए हैं। पत्नी की आँखें आँखें नहीं हाथ हैं, जो मुझे थामे हुए हैं वैसे हम स्वजन हैं, करीब हैं बीच की दीवार के दोनों ओर क्योंकि हम पेशेवर गरीब हैं। 178 ध् अंतरा रिश्ते हैंऋ लेकिन खुलते नहीं हैं और हम अपने खून में इतना भी लोहा नहीं पाते, कि हम उससे एक ताली बनवाते और भाषा के भुन्ना - सी ताले को खोलते, रिश्तों को सोचते हुए आपस में प्यार से बोलते, कहते कि ये पिता हैं, यह प्यारी माँ है, यह मेरी बेटी है पत्नी को थोड़ा अलग करते μ तू मेरी हमसपफर है,़हम थोड़ा जोख्िाम उठाते दीवार पर हाथ रखते और कहते यह मेरा घर है। 3.‘वैसे हम स्वजन हैं, करीब हैं ....क्योंकि हम पेशेवर गरीब हैं’ से कवि का क्या आशय है? अगर अमीर होते तो क्या स्वजन और करीब नहीं होते? ध्ूमिल ध् 179 4.‘रिश्ते हैंऋ लेकिन खुलते नहीं’ μ कवि के सामने ऐसी कौन सी विवशता है जिससे आपसी रिश्ते भी नहीं खुलते हैं? 5.निम्नलिख्िात का काव्य सौंदयर् स्पष्ट कीजिए μ ;कद्ध माँ की आँखें पड़ाव से पहले ही तीथर् - यात्रा की बस के दो पंचर पहिए हैं। ;खद्ध पिता की आँखें लोहसाँय की ठंडी शलाखें हैं। योग्यता - विस्तार 1.घर में रहनेवालों से ही घर, घर कहलाता है। पारिवारिक रिश्ते खून के रिश्ते हैं पिफर भी उन रिश्तों को न खोल पाना वैफसी विवशता है! अपनी राय लिख्िाए। 2.आप अपने पारिवारिक रिश्तों - संबंधें के बारे में एक निबंध् लिख्िाए। दीवट - दीया रखने के लिए बनाया गया स्थान भुन्ना - सी - जटिल टिप्पणी

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