श्रीकांत वमार् का जन्म बिलासपुर, मध्य प्रदेश में हुआ। उनकी आरंभ्िाक श्िाक्षा बिलासपुर में ही हुइर्। सन् 1956 में नागपुर विश्वविद्यालय से ¯हदी में एम.ए. करने के बाद उन्होंने एक पत्राकार के रूप में अपना साहित्ियक जीवन शुरू किया। वे श्रमिक, कृति, दिनमान और वण्िर्ाका आदि पत्रों से संब( रहे। मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें तुलसी पुरस्कार, आचायर् नंददुलारे वाजपेयी पुरस्कार और श्िाखर सम्मान से सम्मानित किया। उन्हें केरल का वुफमारन आशान राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्रदान किया गया। श्रीकांत वमार् की कविताओं में समय और समाज की विसंगतियों एवं विद्रूपताओं के प्रति क्षोभ का स्वर प्रकट हुआ है। भटका मेघ दिनारंभ, मायादपर्ण, जलसाघर और मगध उनके चचिर्त काव्य संग्रह हंै। इन कविताओं से गुशरते हुए यह महसूस होता है कवि का अपने परिवेश और संघषर्रत मनुष्य से गहरा लगाव है। उसके आत्मगौरव और भविष्य को लेकर वे लगातार ¯चतित हैं। उनमेें यदि परंपरा का स्वीकार है, तो उसे तोड़ने और बदलने की बेचैनी भी। प्रारंभ में उनकी कविताएँ अपनी शमीन और ग्राम्य - जीवन की गंध को अभ्िाव्यक्त करती हैं ¯कतु जलसा घर तक आते - आते महानगरीय बोध का प्रक्षेपण करने लगती हैं या कहना चाहिए,़शहरीकृत अमानवीयता के ख्िालापफ एक संवेदनात्मक बयान में बदल जाती हैं। इतना ही नहीं इनके दायरे में शोष्िात - उत्पीडि़त और बबर्रता के आतंक में जीती पूरी - की - पूरी दुनिया सिमट आती है। उनकी कविताओं में अभ्िाव्यक्त यथाथर् हमें अनेक स्तरों पर प्रभावित करता है। उनका अंतिम कविता संग्रह मगध तत्कालीन शासक वगर् के त्रास और उसके अंधकारमय भविष्य को बहुत प्रभावी ढंग से रेखांकित करता है।उनकी प्रकाश्िात अन्य महत्त्वपूणर् रचनाएँ हैं μ झाड़ी संवाद ;कहानी - संग्रहद्ध, दूसरी बार ;उपन्यासद्ध, जिरह ;आलोचनाद्ध, श्रीकांत वमार् अपोलो का रथ ;यात्रा - वृत्तांतद्ध, प़्ौफसले का दिन ;अनुवादद्ध, बीसवीं शताब्दी के अँधेरे में ;साक्षात्कार और वातार्लापद्ध। पाठ्यपुस्तक में संकलित कविता हस्तक्षेप में सत्ता की व्रूफरता और उसके कारण पैदा होनेवाले प्रतिरोध को दिखाया गया है। व्यवस्था को जनतांत्रिाक बनाने के लिए समय - समय पर उसमें हस्तक्षेप की शरूरत होती है वरना व्यवस्था निरंवुफश हो जाती है। इस कविता में ऐसे ही तंत्रा का वणर्न है जहाँ किसी भी प्रकार के विरोध के लिए गुंजाइश नहीं छोड़ी गइर् है। कवि सवाल खड़ा करता है कि जहाँ मुदेर् का भी हस्तक्षेप करना संभव है उस समाज में जीता - जागता मनुष्य चुप क्यों? हस्तक्षेप कोइर् छींकता तक नहीं इस डर से कि मगध् की शांति भंग न हो जाए, मगध् को बनाए रखना है, तो, मगध् में शांति रहनी ही चाहिए मगध् है, तो शांति है कोइर् चीखता तक नहीं इस डर से कि मगध् की व्यवस्था में दखल न पड़ जाए मगध् में व्यवस्था रहनी ही चाहिए मगध् में न रही तो कहाँ रहेगी? क्या कहेंगे लोग? लोगों का क्या? लोग तो यह भी कहते हैं मगध् अब कहने को मगध् है, रहने को नहीं कोइर् टोकता तक नहीं इस डर से कि मगध् में टोकने का रिवाज न बन जाए एक बार शुरू होने पर कहीं नहीं रफकता हस्तक्षेपμ वैसे तो मगध्निवासियों कितना भी कतराओ तुम बच नहीं सकते हस्तक्षेप सेμ जब कोेइर् नहीं करता तब नगर के बीच से गुशरता हुआ मुदार् यह प्रश्न कर हस्तक्षेप करता हैμ मनुष्य क्यों मरता है? श्रीकांत वमार् ध् 173 3.मगध् निवासी किसी भी प्रकार से शासन व्यवस्था में हस्तक्षेप करने से क्यों कतराते हंै? 4.‘मगध् अब कहने को मगध् है, रहने को नहीं’ μ के आधर पर मगध् की स्िथ्ति का अपने शब्दों में वणर्न कीजिए। 5.मुदेर् का हस्तक्षेप क्या प्रश्न खड़ा करता है? प्रश्न की साथर्कता को कविता के संदभर् में स्पष्ट कीजिए। 6.‘मगध् को बनाए रखना है, तो, मगध् में शांति रहनी ही चाहिए’ μ भाव स्पष्ट कीजिए। 7.‘हस्तक्षेप’ कविता सत्ता की क्रूरता और उसके कारण पैदा होनेवाले प्रतिरोध् की कविता है μ स्पष्ट कीजिए। 8.निम्नलिख्िात लाक्षण्िाक प्रयोगों को स्पष्ट कीजिए μ ;कद्ध कोइर् छींकता तक नहीं ;खद्ध कोइर् चीखता तक नहीं ;गद्ध कोइर् टोकता तक नहीं 9.निम्नलिख्िात पद्यांशों की संदभर् सहित व्याख्या कीजिए μ ;कद्ध मगध् को बनाए रखना है, तो, ..........मगध् है, तो शांति है ;खद्ध मगध् में व्यवस्था रहनी ही चाहिए ..........क्या कहेंगे लोग? ;गद्ध जब कोेइर् नहीं करता ..........मनुष्य क्यों मरता है? योग्यता - विस्तार 1.‘एक बार शुरू होने पर कहीं नहीं रुकता हस्तक्षेप’ इस पंक्ित को वेंफद्र में रखकर परिचचार् आयोजित करें। 2.‘व्यक्ितत्व के विकास में प्रश्न की भूमिका’ विषय पर कक्षा में चचार् कीजिए।

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