तरौनी गाँव, िाला मध्ुबनी, बिहार के निवासी, नागाजुर्न का जन्म अपने ननिहाल सतलखा, िाला दरभंगा, बिहार में हुआ था। उनका मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। नागाजुर्न की प्रारंभ्िाकश्िाक्षा स्थानीय संस्कृत पाठशाला में हुइर्। बाद में इस निमित्त वाराणसी और कोलकाता भी गए। सन् 1936 में वे श्रीलंका गए और वहीं बौ( ध्मर् में दीक्ष्िात हुए। सन् 1938 में वे स्वदेश वापस आए। पफक्कड़पन और घुमक्कड़ी उनके जीवन की प्रमुख विशेषता रही है। उन्होंने कइर् बार संपूणर् भारत का भ्रमण किया। राजनीतिक कायर्कलापों के कारण कइर् बार उन्हें जेल भी जाना पड़ा। सन् 1935 में उन्होंने दीपक ;मासिकद्ध तथा 1942 - 43 में विश्वबंध्ु ;साप्ताहिकद्ध पत्रिाका का संपादन किया। अपनी मातृभाषा मैथ्िाली में वे यात्राी नाम से रचना करते थे। मैथ्िाली में नवीन भावबोध् की रचनाओं का प्रारंभ उनकेमहत्त्वपूणर् कविता - संग्रह चित्रा से माना जाता है। नागाजुर्न नेसंस्कृत तथा बांग्ला में भी काव्य - रचना की है।लोकजीवन, प्रकृति और समकालीन राजनीति उनकी रचनाओं के मुख्य विषय रहे हैं। विषय की विविध्ता और प्रस्तुति की सहजता नागाजुर्न के रचना संसार को नया आयाम देती है।छायावादोत्तर काल के वे अकेले कवि हैं जिनकी रचनाएँ ग्रामीण चैपाल से लेकर विद्वानों की बैठक तक में समान रूप से आदर पाती हैं। जटिल से जटिल विषय पर लिखी गईं उनकी कविताएँ इतनी सहज, संपे्रषणीय और प्रभावशाली होती हैं कि पाठकों के मानस लोक में तत्काल बस जाती हैं। नागाजुर्न की कविता मंे धरदार व्यंग्य मिलता है। जनहित के लिए प्रतिब(ता उनकी कविता की मुख्य विशेषता है। नागाजुर्न ;सन् 1911 - 1998द्ध नागाजुर्न ने छंदब( और छंदमुक्त दोनों प्रकार की कविताएँ रचीं। उनकीकाव्य - भाषा में एक ओर संस्कृत काव्य परंपरा की प्रतिध्वनि है तो दूसरी ओर बोलचाल की भाषा की रवानी और जीवंतता भी। पत्राहीन नग्न गाछ ;मैथ्िाली कविता संग्रहद्ध पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। उन्हें उत्तर प्रदेश के भारत - भारती पुरस्कार, मध्य प्रदेश के मैथ्िालीशरण गुप्त पुरस्कार और बिहार सरकार के राजेंद्र प्रसाद पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें दिल्ली की ¯हदी अकादमी का श्िाखर सम्मान भी मिला।उनकी प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं μ युगधरा, प्यासी पथराइर् आँखें, सतरंगे पंखों वाली, तालाब की मछलियाँ, हशार - हशार बाहों वाली, तुमने कहा था, पुरानी जूतियों का कोरस, आख्िार ऐसा क्या कह दिया मैंने, रत्नगभार्, ऐसे भी हम क्या: ऐसे भी तुम क्या, पका है कटहल, मैं मिलटरी का बूढ़ा घोड़ा, भस्मांवुफर । बलचनमा, रतिनाथ की चाची, वुंफभी पाक, उग्रतारा, जमनिया का बाबा, वरुण के बेटे जैसे उपन्यास भी विशेष महत्त्व के हैं। उनकी समस्त रचनाएँ नागाजुर्न रचनावली ;सात खंडद्ध में संकलित हैं। यहाँ उनकी बादल को घ्िारते देखा है कविता संकलित की गइर् है। इस कविता में उन्होंने बादल के कोमल और कठोर दोनों रूपों का वणर्न किया है जिसमें हिमालय की बरप़्ाफीली घाटियों, झीलों, झरनों तथा देवदार के जंगलों के साथ - साथ किन्नर - किन्नरियों के जीवन का यथाथर् चित्रा भी शामिल है। भाव और भाषा की दृष्िट से कविता कालिदास और निराला की परंपरा से जुड़ती है। बादल को घ्िारते देखा है अमल ध्वल गिरि के श्िाखरांे पर, बादल को घ्िारते देखा है। छोटे - छोटे मोती जैसे उसके शीतल तुहिन कणों को, मानसरोवर के उन स्वण्िार्म कमलों पर गिरते देखा है। बादल को घ्िारते देखा है। तुंग हिमालय के कंधें पर छोटी - बड़ी कइर् झीलंे हैं, उनके श्यामल नील सलिल मंे समतल देशों से आ - आकर पावस की उफमस से आवुफल तिक्त - मध्ुर विसतंतु खोजते हंसों को तिरते देखा है। बादल को घ्िारते देखा है। ट्टतु वसंत का सुप्रभात था मंद - मंद था अनिल बह रहा बालारफण की मृदु किरणें थीं अगल - बगल स्वण्िार्म श्िाखर थे एक दूसरे से विरहित हो अलग - अलग रहकर ही जिनको सारी रात बितानी होती, निशा काल से चिर - अभ्िाशापित बेबस उस चकवा - चकइर् का बंद हुआ व्रंफदन, पिफर उनमें उस महान सरवर के तीरे शैवालों की हरी दरी पर प्रणय - कलह छिड़ते देखा है। बादल को घ्िारते देखा है। दुगर्म बरप़्ाफानी घाटी में शत - सहस्र पुफट उफँचाइर् पर अलख नाभ्िा से उठनेवाले निज के ही उन्मादक परिमलμ के पीछे धवित हो - होकर तरल तरफण कस्तूरी मृग को अपने पर चिढ़ते देखा है। बादल को घ्िारते देखा है। कहाँ गया ध्नपति वुफबेर वह कहाँ गइर् उसकी वह अलका नहीं ठिकाना कालिदास के व्योम - प्रवाही गंगाजल का, ढूँढ़ा बहुत परंतु लगा क्या मेघदूत का पता कहीं पर, कौन बताए वह छायामय बरस पड़ा होगा न यहीं पर, जाने दो, वह कवि - कल्िपत था, मैंने तो भीषण जाड़ों में नभ - चुंबी वैफलाश शीषर् पर, महामेघ को झंझानिल से गरज - गरज भ्िाड़ते देखा है। बादल को घ्िारते देखा है। शत - शत निझर्र - निझर्रणी - कल मुखरित देवदारफ कानन में, शोण्िात ध्वल भोज पत्रों से छाइर् हुइर् वुफटी के भीतर, रंग - बिरंगे और सुगंध्ित पूफलों से वुंफतल को साजे, इंद्रनील की माला डाले शंख - सरीखे सुघढ़ गलों में, कानों में वुफवलय लटकाए, शतदल लाल कमल वेणी मंे, रजत - रचित मण्िा - खचित कलामय पान पात्रा द्राक्षासव पूरित रखे सामने अपने - अपने लोहित चंदन की त्रिापदी पर, नरम निदाग बाल - कस्तूरी मृगछालों पर पलथी मारे मदिरारुण आँखोंवाले उन उन्मद किन्नर - किन्नरियों की मृदुल मनोरम अँगुलियों को वंशी पर पिफरते देखा है। बादल को घ्िारते देखा है। 3.कस्तूरी मृग के अपने पर ही चिढ़ने के क्या कारण हैं? 4.बादलों का वणर्न करते हुए कवि को कालिदास की याद क्यों आती है? 5.कवि ने ‘महामेघ को झंझानिल से गरज - गरज भ्िाड़ते देखा है’ क्यों कहा है? 6.‘बादल को घ्िारते देखा है’ पंक्ित को बार - बार दोहराए जाने से कविता में क्या सौंदयर् आया है? अपने शब्दों में लिख्िाए। 7.निम्नलिख्िात का भाव स्पष्ट कीजिएμ ;कद्ध निशा काल से चिर - अभ्िाशापित / बेबस उस चकवा - चकइर् का बंद हुआ व्रंफदन, पिफर उनमें / उस महान सरवर के तीरे शैवालों की हरी दरी पर / प्रणय - कलह छिड़ते देखा है। ;खद्ध अलख नाभ्िा से उठनेवाले / निज के ही उन्मादक परिमलμ के पीछे धवित हो - होकर / तरल तरफण कस्तूरी मृग को अपने पर चिढ़ते देखा है। 8.संदभर् सहित व्याख्या कीजिएμ ;कद्ध छोटे - छोटे मोती जैसे ..........कमलों पर गिरते देखा है। ;खद्ध समतल देशों से आ - आकर ..........हंसों को तिरते देखा है। ;गद्ध )तु वसंत का सुप्रभात था ..........अगल - बगल स्वण्िार्म श्िाखर थे। ;घद्ध ढूँढ़ा बहुत परंतु लगा क्या ..........जाने दो, वह कवि - कल्िपत था। योग्यता - विस्तार 1.अन्य कवियों की )तु संबंध्ी कविताओं का संग्रह कीजिए। 2.कालिदास के ‘मेघदूत’ का संक्ष्िाप्त परिचय प्राप्त कीजिए। 3.बादल से संबंध्ित अन्य कवियों की कविताएँ यादकर अपनी कक्षा में सुनाइए। 4.एन.सी.इर्.आर.टी. ने कइर् साहित्यकारों, कवियों पर प्िाफल्में तैयार की हैं। नागाजुर्न पर भी़प्िाफल्म बनी है। उसे देख्िाए और चचार् कीजिए।़शब्दाथर् और टिप्पणी अमल - ध्वल - निमर्ल और सप़्ोफद तुहिन कण - ओस की बूँद तुंग - उफँचा तिक्त - मध्ुर - कड़वे और मीठे विसतंतु - कमलनाल के भीतर स्िथत कोमल रेशे या तंतु चिर - अभ्िाशापित - सदा से ही शापग्रस्त, दुखी, अभागे शैवाल - काइर् की जाति की एक घास प्रणय - कलह - प्यार - भरी छेड़छाड़ उन्मादक परिमल - नशीली सुगंध् वुफबेर - ध्न का स्वामी, देवताओं का कोषाध्यक्ष अलका - वुफबेर की नगरी व्योम प्रवाही - आकाश में घूमनेवाला मेघदूतप - कालिदास का प्रसि( खंडकाव्य इंद्रनील - नीलम, नीले रंग का कीमती पत्थर वुफवलय - नील कमल शतदल - कमल रजत - रचित - चाँदी से बना हुआ मण्िा - खचित - मण्िायों से जड़ा हुआ पान - पात्रा - मदिरा पीने का पात्रा, सुराही द्राक्षासव - अंगूरों से बनी सुरा लोहित - लाल त्रिापदी - तिपाइर् निदाग - दाग रहित उन्मद - मदमस्त मदिरारुण आँखें - मदिरा पीने से लाल हुइर् आँखें किन्नर - देवलोक की एक कलापि्रय जाति प मेघदूत संस्कृत के महाकवि कालिदास का प्रसि( खंडकाव्य है, जिसके नायक यक्ष और नायिका यक्ष्िाणी शाप के कारण अलग रहने को बाध्य होते हैं। यक्ष मेघ को दूत बनाकर यक्ष्िाणी केलिए संदेश भेजता है। इस काव्य में प्रकृति का मनोरम चित्राण हुआ है।

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