र् नरेंद्र शमार् का जन्म उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर िाले के जहाँगीरपुर गँाव में हुआ था। उनकी प्रारंभ्िाक श्िाक्षा गाँव में हुइर्, बाद में प्रयाग विश्वविद्यालय से उन्होंने एम.ए. किया। वे शुरू से ही राजनीतिक गतिवििायों मंे सिय रहे। इसी सियता के कारण उन्हें सन् 1940 से 1942 तक जेल में रहना पड़ा। 1943 में वे मुंबइर् चले गए और प्ि़ाफल्मों के लिए गीत और संवाद लिखने लगे तथा अंतिम समय तक प्िाफल्मों से ही जुड़े रहे।़नरेंद्र शमार् के प्रसि( काव्य - संग्रह μ प्रभात पेफरी, प्रवासी के गीत, पलाशवन, मि‘ी और पूफल, हंसमाला, रक्तचंदन आदि हैं। नरेंद्र शमार् मूलतः गीतकार हैं। उनके अध्िकांश गीत यथाथर्वादी दृष्िटकोण से लिखे गए हैं। वे प्रगतिवादी चेतना से प्रभावित थे। उन्होंने प्रवृफति के सुंदर चित्रा उकेरे हैं। व्यावुफलप्रेम की अभ्िाव्यक्ित और प्रकृति के कोमल रूप के चित्राण में उन्हें विशेष सपफलता मिली है। अंतिम दौर की रचनाएँ आध्यात्िमक और दाशर्निक पृष्ठभूमि लिए हुए हैं। प्ि़ाफल्मों के लिए लिखे गए उनके गीत साहित्ियकता के कारण अलग से पहचाने जाते हैं। नरेंद्र शमार् की भाषा सरल एवं प्रवाहपूणर् है। संगीतात्मकता और स्पष्टता उनके गीतों की विशेषता है। पाठ्यपुस्तक में नरेंद्र शमार् की कविता नींद उचट जाती है दी गइर् है। इस कविता में कवि ने एक ऐसी लंबी रात का वणर्न किया है जो समाप्त होने का नाम नहीं ले रही है और कवि को प्रकाश की कोइर् किरण भी नहीं दिखाइर् दे रही है। कविता का यह अँध्ेरा दो स्तरों पर है, व्यक्ित के स्तर पर यह दुःस्वप्न और निराशा का अँध्ेरा है तथा समाज के स्तर पर विकास, चेतना और जागृति के न होने का अँधेरा है। कवि जागरण के द्वारा इन दोनों अँध्ेरों से मुक्त होने और प्रकाश का कपाट खोलने की बात करता है। नरेंद्र शमार् ;सन् 1923 - 1989द्ध नींद उचट जाती है जब - तब नींद उचट जाती है पर क्या नींद उचट जाने से रात किसी की कट जाती है? देख - देख दुःस्वप्न भयंकर, चैंक - चैंक उठता हूँ डरकरऋ पर भीतर के दुःस्वप्नों से अध्िक भयावह है तम बाहर! आती नहीं उषा, बस केवल आने की आहट आती है! देख अँध्ेरा नयन दूखते, दु¯श्चता में प्राण सूखते! सन्नाटा गहरा हो जाता, जब - जब श्वान शृगाल भूँकते! भीत भावना, भोर सुनहली नयनों के न निकट लाती है! नरेंद्र शमार् ध्159 मन होता है पिफर सो जाउँफ, गहरी निद्रा में खो जाउँफऋ जब तक रात रहे ध्रती पर, चेतन से पिफर जड़ हो जाउँफ! उस करवट अवुफलाहट थी, पर नींद न इस करवट आती है! करवट नहीं बदलता है तम, मन उतावलेपन में अक्षम! जगते अपलक नयन बावले, थ्िार न पुतलियाँ, निमिष गए थम! साँस आस में अटकी, मन को आस रात भर भटकाती है! जागृति नहीं अनिद्रा मेरी, नहीं गइर् भव - निशा अँध्ेरी! अंध्कार वंेफदि्रत ध्रती पर, देती रही ज्योति चकपेफरी! अंतनर्यनों के आगे से श्िाला न तम की हट पाती है! 2.अंदर का भय कवि के नयनों को सुनहली भोर का अनुभव क्यों नहीं होने दे रहा है? 160 ध् अंतरा 3.कवि को किस प्रकार की आस रातभर भटकाती है और क्यों? 4.कवि चेतन से पिफर जड़ होने की बात क्यों कहता है? 5.अंध्कार भरी ध्रती पर ज्योति चकपेफरी क्यों देती है? स्पष्ट कीजिए। 6.निम्नलिख्िात पंक्ितयों का भाव स्पष्ट कीजिए μ ;कद्ध आती नहीं उषा, बस केवल आने की आहट आती है! ;खद्ध करवट नहीं बदलता है तम, मन उतावलेपन में अक्षम! 7.जागृति नहीं अनिद्रा मेरी, नहीं गइर् भव - निशा अँध्ेरी! उक्त पंक्ितयों में ‘जागृति’, ‘अनिद्रा’ और ‘भव - निशा अँध्ेरी’ से कवि का सामाजिक संदभो± में क्या अभ्िाप्राय है? 8.‘अंतनर्यनों के आगे से श्िाला न तम की हट पाती है’ पंक्ित में ‘अंतनर्र्र्यन’ और ‘तम की श्िाला’ से कवि का क्या तात्पयर् है? योग्यता - विस्तार चकपेफरी - चारों ओर चक्कर काटना अंतनर्यन - अंतदर्ृष्िट

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