महादेवी वमार् महादेवी वमार् का जन्म पफरर्फखाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ औऱप्रारंभ्िाक श्िाक्षा इंदौर में हुइर्। मात्रा 12 वषर् की उम्र में ही उनकाविवाह हो गया। प्रयाग विश्वविद्यालय से उन्होंने संस्कृत में एम.ए. किया। तत्पश्चात् उनकी नियुक्ित प्रयाग महिला विद्यापीठ में हो गइर्, जहाँ वे लंबे समय तक प्राचायर् के पद पर कायर् करती रहीं। उनके जीवन और ¯चतन पर स्वाधीनता आंदोलन और गांधी जी के विचारों के साथ - साथ गौतम बु( के दशर्न का गहरा प्रभाव पड़ा है। महादेवी जी भारतीय समाज और ¯हदी साहित्य में स्ित्रायों को उचित स्थान दिलाने के लिए विचार और व्यवहार के स्तर पर जीवनभर प्रयत्नशील रहीं। उन्होंने वुफछ वषो± तक चाँद नाम की पत्रिाका का संपादन भी किया था, जिसके संपादकीय लेखों के माध्यम से उन्होंने भारतीय समाज में स्ित्रायों की पराधीनता के यथाथर् और स्वाधीनता की आकांक्षा का विवेचन किया है। महादेवी वमार् के काव्य में जागरण की चेतना के साथ स्वतंत्राता की कामना है और दुःख की अनुभूति के साथ करुणा का बोध भी। दूसरे छायावादी कवियों की तरह उनके गीतों में भीप्रकृति - सौंदयर् के कइर् रूप मिलते हैं। महादेवी वमार् के प्रगीतों में भक्ितकाल के गीतों की प्रतिध्वनि और लोकगीतों की अनुगूँज है, इसके साथ ही उनके गीत आधुनिक बौिक मानस के द्वंद्वों को भी अभ्िाव्यक्त करते हैं। महादेवी वमार् के गीत अपने विश्िाष्ट रचाव और संगीतात्मकता के कारण अत्यंत आकषर्क हैं। लाक्षण्िाकता, चित्रामयता और रहस्याभास उनके गीतों की विशेषता है। महादेवी जी ने नए ¯बबों और प्रतीकों के माध्यम से प्रगीत की अभ्िाव्यक्ित शक्ित का नया विकास किया। उनकी काव्य - भाषा प्रायः तत्सम शब्दों से निमिर्त है। भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। यामा के लिए उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। महादेवी वमार् की प्रमुख काव्य - कृतियाँ हैं μ नीहार, रश्िम, नीरजा, संाध्यगीत, यामा और दीपश्िाखा। कविता के अतिरिक्त उन्होंने सशक्त गद्य भी रचा है, जिसमें रेखाचित्रा तथा संस्मरण प्रमुख हैं। पथ के साथी, अतीत के चलचित्रा तथा स्मृति की रेखाएँ उनकी कलात्मक गद्य रचनाएँ हैं। शृंखला की कडि़याँ में महादेवी वमार् ने भारतीय समाज में स्त्राी जीवन वेफ अतीत, वतर्मान और भविष्य का मूल्यांकन किया है। पाठ्यपुस्तक में उनके दो गीत संकलित किए गए हैं। पहला गीत स्वाधीनता आंदोलन की प्रेरणा से रचित जागरण गीत है। इसमें भीषण कठिनाइयों की ¯चता न करते हुए कोमल बंधनों के आकषर्ण से मुक्त होकर अपने लक्ष्य की ओर निंरतर बढ़ते रहने का आह्नान है। मोह - माया के बंध्न में जकड़े मानव को जगाते हुए महादेवी ने कहा है μ जाग तुझको दूर जाना। दूसरा गीत सब आँखों के आँसू उजले में प्रकृति के उस स्वरूप की चचार् हुइर् है जो सत्य है, यथाथर् है और जो लक्ष्य तक पहुँचने में मनुष्य की मदद करताहै। प्रकृति के इस परिवतर्नशील यथाथर् से जुड़कर मनुष्य अपने सपनों को साकार करने की राहें चुन सकता है। जाग तुझको दूर जाना चिर सजग आँखें उनींदी आज वैफसा व्यस्त बाना!जाग तुझको दूर जाना! अचल हिमगिरि के हृदय में आज चाहे वंफप हो ले,या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो लेऋ आज पी आलोक को डोले तिमिर की घोर छाया,जागकर विद्युत - श्िाखाओं में निठुर तूप़्ाफान बोले! पर तुझे है नाश - पथ पर चिÉ अपने छोड़ आना!जाग तुुझको दूर जाना! बाँध् लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंध्न सजीले? पंथ की बाध बनेंगे तितलियों के पर रंगीले? विश्व का व्रंफदन भुला देगी मध्ुप की मध्ुर गुनगुन, क्या डुबा देंगे तुझे यह पूफल के दल ओस - गीले? तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना!जाग तुझको दूर जाना! वज्र का उर एक छोटे अश्रु - कण में धे गलाया, दे किसे जीवन सुध दो घूँट मदिरा माँग लाया? सो गइर् आँध्ी मलय की वात का उपधन ले क्या? विश्व का अभ्िाशाप क्या चिर नींद बनकर पास आया? अमरता - सुत चाहता क्यों मृत्यु को उर में बसाना? जाग तुझको दूर जाना! कह न ठंडी साँस में अब भूल वह जलती कहानी, आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानीऋ हार भी तेरी बनेगी मानिनी जय की पताका, राख क्षण्िाक पतंग को है अमर दीपक की निशानी! है तुझे अंगार - शÕया पर मृदुल कलियाँ बिछाना! जाग तुझको दूर जाना! सब आँखों के आँसू उजले सब आँखों के आँसू उजले सबके सपनों में सत्य पला! जिसने उसको ज्वाला सौंपी उसने इसमें मकरंद भरा, आलोक लुटाता वह घुल - घुल देता झर यह सौरभ बिखरा! दोनों संगी, पथ एक ¯कतु कब दीप ख्िाला कब पूफल जला? वह अचल ध्रा को भेंट रहा शत - शत निझर्र में हो चंचल, चिर परिध्ि बना भू को घेरे इसका नित उमिर्ल करफणा - जल कब सागर उर पाषाण हुआ, कब गिरि ने निमर्म तन बदला? नभ तारक - सा खंडित पुलकित यह क्षुर - धरा को चूम रहा, वह अंगारों का मध्ु - रस पी केशर - किरणों - सा झूम रहा, अनमोल बना रहने को कब टूटा वंफचन हीरक पिघला? नीलम मरकत के संपुट दो जिनमें बनता जीवन - मोती, इसमें ढलते सब रंग - रूप उसकी आभा स्पंदन होती! जो नभ में विद्युत - मेघ बना वह रज में अंवुफर हो निकला! संसृति के प्रति पग में मेरी साँसों का नव अंकन चुन लो, मेरे बनने - मिटने में नित अपनी साधें के क्षण गिन लो! जलते ख्िालते बढ़ते जग में घुलमिल एकाकी प्राण चला! सपने - सपने में सत्य ढला! 2.‘मोम के बंध्न’ और ‘तितलियों के पर’ का प्रयोग कवयित्राी ने किस संदभर् में किया है और क्यों? 3.कवयित्राी किस मोहपूणर् बंध्न से मुक्त होकर मानव को जागृति का संदेश दे रही है? 4.कविता में ‘अमरता - सुत’ का संबोध्न किसके लिए और क्यों आया है? 5.‘जाग तुझको दूर जाना’ स्वाध्ीनता आंदोलन की प्रेरणा से रचित एक जागरण गीत है। इस कथन के आधर पर कविता की मूल संवेदना को लिख्िाए। 6.निम्नलिख्िात पंक्ितयों का काव्य - सौंदयर् स्पष्ट कीजिए μ ;कद्ध विश्व का क्रंदन ..............अपने लिए कारा बनाना! ;खद्ध कह न ठंडी साँस ..............सजेगा आज पानी। ;गद्ध है तुझे अंगार - शÕया..............कलियाँ बिछाना! 7.कवयित्राी ने स्वाध्ीनता के मागर् में आनेवाली कठिनाइयों को इंगित कर मुनष्य के भीतर किन गुणों का विस्तार करना चाहा है? कविता के आधर पर स्पष्ट कीजिए। सब आँखों के आसूँ उजले 8.महादेवी वमार् ने ‘आसूँ’ के लिए ‘उजले’ विशेषण का प्रयोग किस संदभर् में किया है और क्यों? 9.सपनों को सत्य रूप में ढालने के लिए कवयित्राी ने किन यथाथर्पूणर् स्िथतियों का सामना करने को कहा है? 10.‘नीलम मरकत के संपुट दो, जिनमें बनता जीवन - मोती’ पंक्ित में ‘नीलम मरकत’ और ‘जीवन - मोती’ के अथर् को कविता के संदभर् में स्पष्ट कीजिए। 11.प्रवृफति किस प्रकार मनुष्य को उसके लक्ष्य तक पहुँचाने में सहायक सि( होती है? कविता के आधर पर स्पष्ट कीजिए। 12.निम्नलिख्िात पंक्ितयों का भाव स्पष्ट कीजिए μ ;कद्ध आलोक लुटाता वह ..........कब पूफल जला? ;खद्ध नभ तारक - सा ..........हीरक पिघला? 13.काव्य - सौंदयर् स्पष्ट कीजिए। संसृति के प्रति पग मेें मेरी..........एकाकी प्राण चला! 14.‘सपने - सपने में सत्य ढला’ पंक्ित के आधर पर कविता की मूल संवेदना को स्पष्ट कीजिए। योग्यता - विस्तार 1.स्वाधीनता आंदोलन के वुफछ जागरण गीतों का एक संकलन तैयार कीजिए।2. महादेवी वमार् और सुभद्रा कुमारी चैहान की कविताओं को पढि़ए और महादेवी वमार् की पुस्तक ‘पथ के साथी’ से सुभद्रा कुमारी चैहान का संस्मरण पढि़ए तथा उनके मैत्राी - संबंधों पर निबंध् लिख्िाए। शब्दाथर् और टिप्पणी व्यस्त बाना - बिखरा या अस्त - व्यस्त वेश कारा - बंधन, वैफद सजग - सावधन उनींदी - नींद से भरी हुइर् व्योम - आकाश मलय - पवर्त जहाँ चंदन का वन है वात का उपधान - हवा का सहारा मृदुल - कोमल मकरंद - पूफलों का रस नभ - तारक - आकाश का तारा पाषाण - पत्थर मरकत - पन्ना संसृति - सृष्िट, संसार

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