सुमित्रानंदन पंत का जन्म अल्मोड़ा, उत्तरांचल के कौसानी गाँव में हुआ था। उनकी प्रारंभ्िाक श्िाक्षा अल्मोड़ा में तथा उच्च श्िाक्षा बनारस और इलाहाबाद में हुइर्। सन् 1919 में गांधी जी के एक भाषण से प्रभावित होकर उन्होंने बिना परीक्षा दिए ही अपनी श्िाक्षा अधूरी छोड़ दी और स्वाध्ीनता आंदोलन में सिय हो गए। पंत जी ने बचपन से ही काव्य - रचना शुरू कर दी थी। लेकिन उनका वास्तविक कविकमर् बाद में प्रारंभ हुआ। उनका काव्य - संग्रह पल्लव और उसकी भूमिका ¯हदी कविता मेंयुगांतकारी महत्त्व रखते हैं। उन्होंने सन् 1938 में रूपाभ नामक पत्रिाका निकाली, जिसकी प्रगतिशील साहित्य - चेतना के विकासमें महत्त्वपूणर् भूमिका है। पंत जी प्रकृति - प्रेम और सौंदयर् के कवि हैं। छायावादी कवियों में वे सबसे अिाक भावुक तथा कल्पनाशील कवि के रूप में चचिर्त रहे हैं। उनकी कविताओंमें पल - पल परिवतिर्त होने वाली प्रकृति के गत्यात्मक, मूतर् औरसजीव चित्रा मिलते हैं। प्राकृतिक सौंदयर् के साथ ही पंत मानव सौंदयर् के भी वुफशल चितेरे हैं। कल्पनाशीलता के साथ - साथ रहस्यानुभूति और मानवतावादी दृष्िट उनके काव्य की मुख्य विशेषताएँ हैं। पंत का संपूणर् साहित्य आधुनिक चेतना का वाहक है। उन्होंने आधुनिक ¯हदी कविता को अभ्िाव्यंजना की नयी प(ति और काव्य - भाषा को नवीन दृष्िट से समृ( किया है। पंत की कविता में भाषा और संवेदना के सूक्ष्म और अंतरंग संबंधों की पहचान है, जिससे ¯हदी काव्य - भाषा में नए सौंदयर् - बोध का विकास हुआ है। उन्होंने खड़ी बोली ¯हदी की काव्य - भाषा की व्यंजना शक्ित का विकास किया और उसे भावों तथा विचारों की अभ्िाव्यक्ित के लिए अिाक सक्षम बनाया, इसीलिए उन्हें शब्द - श्िाल्पी कवि भी कहा जाता है। सुमित्रानंदन पंत ;सन् 1900 - 1978द्ध सुमित्रानंदन पंत अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हुए थे, जिनमें μ सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रमुख हैं।पंत जी की महत्त्वपूणर् काव्य कृतियाँ हैं μ वीणा, ग्रंथ्िा, पल्लव, गंुजन, युगांत,युगवाणी, ग्राम्या, स्वणर् किरण, उत्तरा, कला और बूढ़ा चाँद, चिदंबरा आदि। पंत जी ने छोटी कविताओं और गीतों के साथ परिवतर्न जैसी लंबी कविता और लोकायतन नामक महाकाव्य की रचना भी की है। पाठ्यपुस्तक में संकलित कविता संध्या के बाद उनके ग्राम्या संकलन से ली गइर् है। ग्राम्या का मूल स्वर ग्रामीण जन - जीवन के विविध् सामाजिक यथाथर् से जुड़ता है। इस कविता में ढलती हुइर् साँझ के समय गाँव के वातावरण, जनजीवनऔर प्रकृति का सुंदर चित्राण हुआ है, जिसमें वृ(ाएँ, विध्वाएँ, खेत से घर लौटते किसान और पशु - पक्ष्िायों का चित्राण उल्लेखनीय है। संध्या के बाद सिमटा पंख साँझ की लाली जा बैठी अब तरु श्िाखरों पर ताम्रपणर् पीपल से, शतमुख झरते चंचल स्वण्िार्म निझर्र! ज्योति स्तंभ - सा धँस सरिता में सूयर् क्ष्िातिज पर होता ओझल, बृहद् जिह्म विश्लथ वेंफचुल - सा लगता चितकबरा गंगाजल! धूपछाँह के रंग की रेतीअनिल ऊमिर्यों से सपा±कित नील लहरियों में लोडि़त पीला जल रजत जलद से ¯बबित! सिकता, सलिल, समीर सदा से स्नेह पाश में बँधे समुज्ज्वल, अनिल पिघलकर सलिल, सलिल ज्यों गति द्रव खो बन गया लवोपल शंख घंट बजते मंदिर में लहरों में होता लय वंफपन, दीप श्िाखा - सा ज्वलित कलश नभ में उठकर करता नीराजन! तट पर बगुलों - सी वृ(ाएँ विधवाएँ जप ध्यान में मगन, मंथर धारा में बहता जिनका अदृश्य, गति अंतर - रोदन! दूर तमस रेखाओं - सी, उड़ती पंखों की गति - सी चित्रिात सोन खगों की पाँति आद्रर् ध्वनि से नीरव नभ करती मुखरित! स्वणर् चूणर् - सी उड़ती गोरज किरणों की बादल - सी जलकर, सनन् तीर - सा जाता नभ में ज्योतित पंखों वंफठांे का स्वर! लौटे खग, गायें घर लौटींलौटे कृषक श्रांत श्लथ डग धर छिपे गृहों में म्लान चराचर छाया भी हो गइर् अगोचर, लौट पैंठ से व्यापारी भी जाते घर, उस पार नाव पर,ऊँटों, घोड़ों के संग बैठे खाली बोरों पर, हुक्का भर! जाड़ों की सूनी द्वाभा में झूल रही निश्िा छाया गहरी, डूब रहे निष्प्रभ विषाद में खेत, बाग, गृह, तरु, तट, लहरी! बिरहा गाते गाड़ी वाले, भूँक - भँूककर लड़ते वूफकर, हुआँ - हुआँ करते सियार देते विषण्ण निश्िा बेला को स्वर! माली की मँड़इर् से उठ, नभ के नीचे नभ - सी धूमाली मंद पवन में तिरती नीली रेशम की - सी हलकी जाली!बत्ती जला दुकानों में बैठे सब कस्बे के व्यापारी, मौन मंद आभा में हिम की ऊँघ रही लंबी अँिायारी! धुआँ अिाक देती है टिन की ढबरी, कम करती उजियाला, मन से कढ़ अवसाद श्रंाति आँखों के आगे बुनती जाला! छोटी - सी बस्ती के भीतर लेन - देन के थोथे सपने दीपक के मंडल में मिलकर मँडराते घ्िार सुख - दुख अपने! कँप - कँप उठते लौ के संग कातर उर व्रंफदन, मूक निराशा, क्षीण ज्योति ने चुपके ज्यों गोपन मन को दे दी हो भाषा! लीन हो गइर् क्षण में बस्ती, मि‘ी खपरे के घर अँागन, भूल गये लाला अपनी सुिा, भूल गया सब ब्याज, मूलधन! सवुफची - सी परचून किराने की ढेरी लग रहीं ही तुच्छतर, इस नीरव प्रदोष में आवुफल उमड़ रहा अंतर जग बाहर! अनुभव करता लाला का मन, छोटी हस्ती का सस्तापन, जाग उठा उसमें मानव, औ’ असपफल जीवन का उत्पीड़न! दैन्य दुःख अपमान ग्लानि चिर क्षुिात पिपासा, मृत अभ्िालाषा, बिना आय की क्लांति बन रही उसके जीवन की परिभाषा! जड़ अनाज के ढेर सदृश ही वह दिन - भर बैठा गद्दी पर बात - बात पर झूठ बोलता कौड़ी - की स्पधार् में मर - मर! पिफर भी क्या वुफटुंब पलता है? रहते स्वच्छ सुघर सब परिजन? बना पा रहा वह पक्का घर? मन में सुख है? जुटता है धन? ख्िासक गइर् वंफधों से कथड़ी ठिठुर रहा अब सदीर् से तन, सोच रहा बस्ती का बनिया घोर विवशता का निज कारण! शहरी बनियों - सा वह भी उठ क्यों बन जाता नहीं महाजन? रोक दिए हैं किसने उसकी जीवन उन्नति के सब साधन? यह क्या संभव नहीं व्यवस्था में जग की वुफछ हो परिवतर्न? कमर् और गुण के समान ही सकल आय - व्यय का हो वितरण? घुसे घरौंदों में मि‘ी के अपनी - अपनी सोच रहे जन, क्या ऐसा वुफछ नहीं, पूँफक दे जो सबमें सामूहिक जीवन? मिलकर जन निमार्ण करे जग, मिलकर भोग करें जीवन का, जन विमुक्त हो जन - शोषण से, हो समाज अिाकारी धन का? दरिद्रता पापों की जननी, मिटें जनों के पाप, ताप, भय, सुंदर हों अिावास, वसन, तन, पशु पर पिफर मानव की हो जय? व्यक्ित नहीं, जग की परिपाटी दोषी जन के दुःख क्लेश की, जन का श्रम जन में बँट जाए, प्रजा सुखी हो देश देश की! टूट गया वह स्वप्न वण्िाक का, आइर् जब बुढि़या बेचारी, आध - पाव आटा लेने लो, लाला ने पिफर डंडी मारी! चीख उठा घुघ्घू डालों में लोगों ने पट दिए द्वार पर, निगल रहा बस्ती को धीरे, गाढ़ अलस निद्रा का अजगर! 4.संध्या के दृश्य में किस - किसने अपने स्वर भर दिए? 5.बस्ती के छोटे से गाँव के अवसाद को किन - किन उपकरणों द्वारा अभ्िाव्यक्त किया गया है? 6.लाला के मन में उठनेवाली दुविध को अपने शब्दों में लिख्िाए। 7.सामाजिक समानता की छवि की कल्पना किस तरह अभ्िाव्यक्त हुइर् है?8.‘कमर् और गुण के समान...........हो वितरण’ पंक्ित के माध्यम से कवि वैफसे समाज की ओर संकेत कर रहा है? 9.निम्नलिख्िात पंक्ितयों का काव्य - सौंदयर् स्पष्ट कीजिए μ ;कद्ध तट पर बगुलों - सी वृ(ाएँ विध्वाएँ जप ध्यान में मगन, मंथर धरा में बहता जिनका अदृश्य, गति अंतर - रोदन! 10.आशय स्पष्ट कीजिए - ;कद्ध ताम्रपणर्, पीपल से, शतमुख/झरते चंचल स्वण्िार्म निझर्र! ;खद्ध दीप श्िाखा - सा ज्वलित कलश/ नभ में उठकर करता नीराजन! ;गद्ध सोन खगों की पाँति/आदर्र्र््र ध्वनि से नीरव नभ करती मुखरित! ;घद्ध मन से कढ़ अवसाद श्रांति/आँखों के आगे बुनती जाला! ;ड.द्ध क्षीण ज्योति ने चुपके ज्यों/गोपन मन को दे दी हो भाषा! ;चद्ध बिना आय की क्लांति बन रही/उसके जीवन की परिभाषा! ;छद्ध व्यक्ित नहीं, जग की परिपाटी/दोषी जन के दुःख क्लेश की। योग्यता - विस्तार 1.ग्राम्य जीवन से संबंध्ित कविताओं का संकलन कीजिए। 2.कविता में निम्नलिख्िात उपमान किसके लिए आए हैं, लिख्िाए μ ;कद्ध ज्योति स्तंभ - सा μ ;खद्ध वेंफचुल - सा μ ;गद्ध दीपश्िाखा - सा μ ;घद्ध बगुलों - सी μ ;घद्ध स्वणर् चूणर् - सी μ ;चद्धसनन् तीर - सा μ शब्दाथर् और टिप्पणी तरुश्िाखर - वृक्ष का उफपरी हिस्सा ताम्रपणर् - ताँबे की तरह लाल रंग के पत्ते विश्लथ - थका हुआ सा जिह्म - मंद उफमिर्यों - लहरों लोडि़त - मथ्िात ;मथा हुआद्ध सिकता - रेत, बालू आद्रर् - नम गोरज - गोध्ूलि मँड़इर् - झोपड़़ी, कुटिया ढिबरी - मि‘ी के तेल से जलनेवाला छोटा - सा दीपक खपरा - छत बनाने के लिए पकाइर् हुइर् मि‘ी की आकृति कथड़ी - पुराने कपड़े से बनाया गया लेवा, गुदड़ी अध्िवास - निवास - स्थान, घर

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