पद्माकर रीतिकाल के कवियों में पद्माकर का महत्त्वपूणर् स्थान हैै। वेबाँदा, उत्तर प्रदेश के निवासी थे। उनके परिवार का वातावरण कवित्वमय था। उनके पिता के साथ - साथ उनके वुफल के अन्य लोग भी कवि थे, अतः उनके वंश का नाम ही ‘कवीश्वर’ पड़ गया था। वे अनेक राज - दरबारों में रहे। बूँदी दरबार की ओर से उन्हें बहुत सम्मान, दान आदि मिला। पन्ना महाराज ने उन्हें बहुत से गाँव दिए। जयपुर नरेश ने उन्हें कविराज श्िारोमण्िा की उपािा दी और साथ में जागीर भी। उनकी रचनाओं में हिम्मतबहादुर विरुदावली, पद्माभरण, जगद्विनोद, रामरसायन, गंगा लहरी आदि प्रमुख हैं। पद्माकर ने सजीव मूतर् विधान करने वाली कल्पना के द्वारा प्रेम और सौंदयर् का मामिर्क चित्राण किया है। जगह - जगह लाक्षण्िाक शब्दों के प्रयोग द्वारा वे सूक्ष्म - से - सूक्ष्म भावानुभूतियों को सहज ही मूतिर्मान कर देते हैं। उनके )तु वणर्न में भी इसी जीवंतता और चित्रात्मकता के दशर्न होते हैं। उनके आलंकारिक वणर्न का प्रभाव परवतीर् कवियों पर भी पड़ा है। पद्माकर की भाषा सरस, सुव्यवस्िथत और प्रवाहपूणर् है। काव्य - गुणों का पूरा निवार्ह उनके छंदों में हुआ है। गतिमयताऔर प्रवाहपूणर्ता की दृष्िट से सवैया और कवित्त पर जैसा अध्िकार पद्माकर का था, वैसा अन्य किसी कवि का नहीं दिखाइर् पड़ता। भाषा पर पद्माकर का अद्भुत अिाकार था। अनुप्रास द्वारा ध्वनिचित्रा खड़ा करने में वे अद्वितीय हैं।पाठ्यपुस्तक में संकलित पहले कवित्त में कवि नेप्रकृति - सौंदयर् का वणर्न किया है। प्रकृति का संबंध् विभ्िान्नट्टतुओं से है। वसंत ट्टतुओं का राजा है। वसंत के आगमन परप्रकृति, विहग और मनुष्यों की दुनिया में जो सौंदयर् संबंध्ी परिवतर्न आते हैं, कवि ने इसमें उसी को लक्ष्िात किया है। पद्माकर ध्137 दूसरे कवित्त में गोपियाँ लोक - ¯नदा और सखी - समाज की कोइर् परवाह किए बिनाकृष्ण के प्रेम में डूबे रहना चाहती हैं। अंतिम कवित्त में कवि ने वषार् ट्टतु के सौंदयर् को भौंरों के गुंजार, मोरों के शोर और सावन के झूलों में देखा है। मेघ के बरसने में कवि नेह को बरसते देखता है। औरै भाँति वुंफजन में गुंजरत भीर भौंर, औरे डौर झौरन पैं बौरन के ह्नै गए। कहैं पद्माकर सु औरै भाँति गलियानि, छलिया छबीले छैल औरै छबि छ्वै गए। औरै भाँति बिहग - समाज में अवाज होति, ऐसे रितुराज के न आज दिन द्वै गए। औरै रस औरै रीति औरै राग औरै रंग, औरै तन औरै मन औरै बन ह्नै गए।। 2 गोवुफल के वुफल के गली के गोप गाउन के जौ लगि कछू - को - कछू भाखत भनै नहीं। कहंै पद्माकर परोस - पिछवारन के, द्वारन के दौरि गुन - औगुन गनैं नहीं।तौ लौं चलित चतुर सहेली याहि कौऊ कहूँ, नीके वैफ निचैरे ताहि करत मनै नहीं। हौं तो स्याम - रंग में चुराइर् चित चोराचोरी, बोरत तौं बोर्यौ पै निचोरत बनै नहीं।। पद्माकर ध्139 भौंरन को गुंजन बिहार बन वुंफजन में, मंजुल मलारन को गावनो लगत है। कहैं पद्माकर गुमानहूँ तंे मानहुँ तैं, प्रानहूँ तैं प्यारो मनभावनो लगत है। मोरन को सोर घनघोर चहुँ ओरन, ¯हडोरन को बृंद छवि छावनो लगत है। नेह सरसावन में मेह बरसावन में, सावन में झूलिबो सुहावनो लगत है।। 3.‘औरै’ की बार - बार आवृिा से अथर् में क्या विश्िाष्टता उत्पन्न हुइर् है? 4.‘पद्माकर के काव्य में अनुप्रास की योजना अनूठी बन पड़ी है।’ उक्त कथन को प्रथम छंद के आधर पर स्पष्ट कीजिए। 5.होली के अवसर पर सारा गोवुफल गाँव किस प्रकार रंगों के सागर में डूब जाता है? दूसरे छंद के आधर पर लिख्िाए। 6.‘बोरत तौं बोर्यौ पै निचोरत बनै नहीं’ इस पंक्ित में गोपिका के मन का क्या भाव व्यक्त हुआ है? 7.पद्माकर ने किस तरह भाषा श्िाल्प से भाव - सौंदयर् को और अध्िक बढ़ाया है? सोदाहरण लिख्िाए। 140 ध् अंतरा 8.तीसरे छंद में कवि ने सावन )तु की किन - किन विशेषताओं की ओर ध्यान आकष्िार्त किया है? 9.‘गुमानहँू तें मानहँु तैं’ में क्या भाव - सौंदयर् छिपा हैं? 10.संदभर् सहित व्याख्या कीजिएμ ;कद्ध औरै भाँति वुंफजन ................छबि छ्वै गए। ;खद्ध तौ लौं चलित ................बनै नहीं। ;गद्ध कहैं पद्माकर ................लगत है। योग्यता - विस्तार 1.वसंत एवं सावन संबंध्ी अन्य कवियों की कविताओं का संकलन कीजिए। 2.पद्माकर के भाषा - सौंदयर् को प्रकट करनेवाले अन्य कवित्त, सवैये भी संकलित कीजिए। शब्दाथर् और टिप्पणी औरै - और ही प्रकार का वुंफजन - झाडि़यों में भीर - भौंर - भौंरों का समूह छबीले - छैल - सुंदर नवयुवक भाखत भनै नहीं - कहा नहीं जा सकता, वणर्न करते नहीं बनता बोरत - डुबोना निचैरे - निचोड़ना मंजुल - संुदर मलारन - मल्हार राग ¯हडोरन - झूला

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