महाकवि देव का जन्म इटावा, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनकापूरा नाम देवदत्त द्विवेदी था। औरंगशेब के पुत्रा आलमशाह के देव संपवर्फ में आने के बाद देव ने अनेक आश्रयदाता बदले, ¯वफतु उन्हें सबसे अिाक संतुष्िट भोगीलाल नाम के सहृदय आश्रयदाता के यहाँ प्राप्त हुइर्, जिसने उनके काव्य से प्रसन्न होकर उन्हेंलाखों की संपिा दान की। अनेक आश्रयदाता राजाओं, नवाबों, धनिकों से संब( रहने के कारण राजदरबारों का आडंबरपूणर् और चाटुकारिता भरा जीवन देव ने बहुत निकट से देखा था। इसीलिए उन्हें ऐसे जीवन से वितृष्णा हो गइर् थी। रीतिकालीन कवियों में देव बड़े प्रतिभाशाली कवि थे। दरबारी अभ्िारुचि से बँधे होने के कारण उनकी कविता में जीवन के विविध दृश्य नहीं मिलते, ¯कतु उन्होंने प्रेम और सौंदयर् के मामिर्क चित्रा प्रस्तुत किए हैं। अनुप्रास और यमक के प्रति देव में प्रबल आकषर्ण है। अनुप्रास द्वारा उन्होंने सुंदर ध्वनिचित्रा खींचे हैं। ध्वनि - योजना उनके छंदों में पग - पग पर प्राप्त होती है।श्ाृंगार के उदात्त रूप का चित्राण देव ने किया है।देव कृत वुफल गं्रथों की संख्या 52 से 72 तक मानी जाती है। उनमें रसविलास, भावविलास, भवानीविलास, वुफशलविलास, अष्टयाम, सुमिलविनोद, सुजानविनोद, काव्यरसायन, प्रेमदीपिका आदि प्रमुख हैं।देव के कवित्त - सवैयों में प्रेेम और सौंदयर् के इंद्रधनुषीचित्रा मिलते हैं। संकलित सवैयों और कवित्तों में एक ओर जहाँ रूप - सौंदयर् का आलंकारिक चित्राण हुआ है, वहीं रागात्मक भावनाओं की अभ्िाव्यक्ित भी संवेदनशीलता के साथ हुइर् है। यहाँ उनकी छोटी - छोटी तीन कविताएँ दी गइर् हैं। हँसी की चोट विप्रलंभ शृंगार का अच्छा उदाहरण है।कृष्ण के मुँह पेफर लेने से गोपियाँ हँसना ही भूल गइर् हैं। वेकृष्ण को खोज - खोज कर हार गइर् हैं। अब तो वे कृष्ण के 132 ध् अंतरा मिलने की आशा पर ही जीवित हैं। उनके शरीर के पंच तत्त्वों में से अब केवलआकाश तत्त्व ही शेष रह गया है। सपना में गोपी स्वप्न में कृष्ण के साथ झूला झूल रही है। तभी उसकी नींद टूट जाती है, और उसका स्वप्न खंडित हो जाता है। इसमें संयोग - वियोग का मामिर्क चित्राण हुआ है। दरबार में पतनशील और निष्िक्रय सामंती व्यवस्था पर देव ने अपनी तीखी प्रतििया व्यक्त की है। हँसी की चोट साँसनि ही सौं समीर गयो अरु, आँसुन ही सब नीर गयो ढरि। तेज गयो गुन लै अपनो, अरु भूमि गइर् तन की तनुता करि।। ‘देव’ जियै मिलिबेही की आस कि, आसहू पास अकास रह्यो भरि, जा दिन तै मुख पेफरि हरै हँसि, हेरि हियो जु लियो हरि जू हरि।। सपना झहरि - झहरि झीनी बूँद हैं परति मानो, घहरि - घहरि घटा घेरी है गगन में। आनि कह्यो स्याम मो सौं ‘चलौ झूलिबे को आज’ पूफली न समानी भइर् ऐसी हौं मगन मैं।। चाहत उठ्योइर् उठि गइर् सो निगोड़ी नींद, सोए गए भाग मेरे जानि वा जगन में। आँख खोलि देखौं तौ न घन हैं, न घनश्याम, वेइर् छाइर् बूँदैं मेरे आँसु ह्नै दृगन में।। 134 ध् अंतरा दरबार साहिब अंध, मुसाहिब मूक, सभा बहिरी, रंग रीझ को माच्यो। भूल्यो तहाँ भटक्यो घट औघट बूढि़बे को काहू कमर् न बाच्यो।। भेष न सूझ्यो, कह्यो समझ्यो न, बतायो सुन्यो न, कहा रुचि राच्यो। ‘देव’ तहाँ निबरे नट की बिगरी मति को सगरी निसि नाच्यो।। 3.नायिका सपने में क्यों प्रसन्न थी और वह सपना वैफसे टूट गया? 4.‘सपना’ कवित्त का भाव - सौंदयर् लिख्िाए। 5.‘दरबार’ सवैये में किस प्रकार के वातावरण का वणर्र्न किया गया है? 6.दरबार में गुणग्राहकता और कला की परख को किस प्रकार अनदेखा किया जाता है? 7.भाव स्पष्ट कीजिएμ ;कद्ध हेरि हियो जु लियो हरि जू हरि। ;खद्ध सोए गए भाग मेरे जानि वा जगन में। ;गद्ध वेइर् छाइर् बूँदैं मेरे आँसु ह्नै दृगन में। ;घद्ध साहिब अंध्, मुसाहिब मूक, सभा बहिरी। 8.देव ने दरबारी चाटुकारिता और दंभपूणर् वातावरण पर किस प्रकार व्यंग्य किया है? देव ध् 135 9.निम्नलिख्िात पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या करिएμ ;कद्ध साँसनि ही......तनुता करि। ;खद्ध झहरि......गगन में। ;गद्ध साहिब अंध्......बाच्यो। 10.देव के अलंकार प्रयोग और भाषा प्रयोग के कुछ उदाहरण पठित पदों से लिख्िाए। योग्यता - विस्तार 1.‘दरबार’ सवैये को भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक ‘अंध्ेर नगरी’ के समकक्ष रखकर विवेचना कीजिए। 2.देव के समान भाषा प्रयोग करने वाले किसी अन्य कवि की रचनाओं का संकलन कीजिए। शब्दाथर् और टिप्पणी तनुता - कृशता, दुबलापन हेरी - देखकर हरि - हरने वाला, कृष्ण झहरि - बरसाती बूँदों की झड़ी लगना निगोड़ी - निदर्यी मुसाहिब - राजा के दरबारी औघट - कठिन, दुगर्म मागर् निबरे नट - अपनी कला या प्रतिभा से भटका हुआ कलाकार मूक - चुप सगरी - संपूणर्

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