सूरदास सूरदास का जन्म - स्थान रुनकता या रेणुका क्षेत्रा, िालाआगरा, उत्तर प्रदेश माना जाता है। वुफछ विद्वानों ने दिल्ली के निकट सीही ग्राम को उनका जन्म - स्थान माना है। सूरदास मथुराऔर वृंदावन के बीच गऊघाट पर रहते थे। वे महाप्रभु वल्लभाचायर् के श्िाष्य थे तथा पुष्िटमागीर् संप्रदाय के ‘अष्टछाप’ कवियों में उनकी सवार्िाक प्रसिि थी। सूरदास के बारे में कहा जाता है कि वे जन्मांध थे, परंतुउनके काव्य में प्रकृति और श्रीकृष्ण की बाल - लीलाओं आदि का वणर्न देखकर ऐसा नहीं प्रतीत होता कि वे जन्मांध् थे।सूरदास सगुणोपासक कृष्णभक्त कवि हैं। उन्होंने कृष्ण के जन्मसे लेकर मथुरा जाने तक की कथा और कृष्ण की विभ्िान्न लीलाओं से संबंिात अत्यंत मनोहर पदों की रचना की है।श्रीकृष्ण की बाल - लीलाओं का वणर्न अपनी सहजता, मनोवैज्ञानिकता और स्वाभाविकता के कारण अद्वितीय है। वे मुख्यतः वात्सल्य और शृंगार के कवि हैं।सूर का अलंकार - विधान उत्कृष्ट है। उसमें शब्द - चित्रा उपस्िथत करने एवं प्रसंगों की वास्तविक अनुभूति कराने की पूणर् क्षमता है। सूर ने अपने काव्य में अन्य अनेक अलंकारों के साथ उपमा, उत्पे्रक्षा और रूपक का वुफशल प्रयोग किया है। सूर की भाषा ब्रजभाषा है। साधारण बोलचाल की भाषा कोपरिष्कृत कर उन्होंने उसे साहित्ियक रूप प्रदान किया है। उनके काव्य में ब्रजभाषा का स्वाभाविक, सजीव और भावानुवूफल प्रयोग है। सूर के सभी पद गेय हैं और वे किसी न किसी राग से संबंध्ित हैं। उनके पदों में काव्य और संगीत का अपूवर् संगम है, इसीलिए सूरसागर को राग - सागर भी कहा जाता है। सूरसारावली और साहित्यलहरी सूरदास की अन्य प्रमुख काव्य - कृतियाँ हैं। पाठ्यपुस्तक में उनके दो पद संकलित किए गए हैं। सूरदास ध् 127 पहले पद में कृष्ण की बाल - लीला का वणर्न है। खेल में हार जाने पर कृष्ण अपनी हार को स्वीकार नहीं करना चाहते। यहाँ बाल - मनोविज्ञान का सूक्ष्म चित्राण देखा जा सकता है।दूसरे पद में गोपियाँ आपस में अपनी सख्िायों से कृष्ण की मुरली के प्रति जो रोषप्रकट करती हैं, उससे कृष्ण के प्रति उनका प्रेम ही प्रकट होता है। मुरली कृष्ण के नशदीक ही नहीं है, वह जैसा चाहती है, कृष्ण से वैसा ही करवाती है। इस तरह एकतो वह उनकी आत्मीय बन बैठी है और दूसरे वह गोपियों को कृष्ण का कोप - भाजन भी बनवाती है। इस पद में गोपियों का मुरली के प्रति इर्ष्यार् - भाव प्रकट हुआ है। खेलन में को काको गुसैयाँ। हरि हारे जीते श्रीदामा, बरबस हीं कत करत रिसैयाँ। जाति - पाँति हमतैं बड़ नाहीं, नाहीं बसत तुम्हारी छैयाँ। अति अिाकार जनावत यातै जातैं अिाक तुम्हारै गैयाँ। रूठहि करै तासौं को खेलै, रहे बैठि जहँ - तहँ ग्वैयाँ। सूरदास प्रभु खेल्यौइ चाहत, दाउफँ दियौ करि नंद - दुहैयाँ।। 2 मुरली तऊ गुपाल¯ह भावति। सुनि री सखी जदपि नंदलाल¯ह, नाना भाँति नचावति। राखति एक पाइर् ठाढ़ौ करि, अति अिाकार जनावति। कोमल तन आज्ञा करवावति, कटि टेढ़ौ ह्नै आवति। अति आधीन सुजान कनौड़े, गिरिधर नार नवावति। आपुन पौंढि़ अधर सज्जा पर, कर पल्लव पलुटावति। भुवुफटी वुफटिल, नैन नासा - पुट, हम पर कोप - करावति। सूर प्रसन्न जानि एकौ छिन, धर तैं सीस डुलावति।। सूरदास ध् 129 3.खेल में कृष्ण के रूठने पर उनके साथ्िायों ने उन्हें डाँटते हुए क्या - क्या तवर्फ दिए? 4.कृष्ण ने नंद बाबा की दुहाइर् देकर दाँव क्यों दिया? 5.इस पद से बाल - मनोविज्ञान पर क्या प्रकाश पड़ता है? 6.‘गिरिधर नार नवावति’ से सखी का क्या आशय है? 7.कृष्ण के अधरों की तुलना सेज से क्यों की गइर् है? 8.पठित पदों के आधर पर सूरदास के काव्य की विशेषताएँ बताइए। 9.निम्नलिख्िात पद्यांशों की संदभर् सहित व्याख्या कीजिएμ ;कद्ध जाति - पाँति............तुम्हारै गैयाँ। ;खद्ध सुनि री............नवावति। योग्यता - विस्तार 1.खेल में हारकर भी हार न माननेवाले साथी के साथ आप क्या करेंगे? अपने अनुभव कक्षा में सुनाइए। 2.पुस्तक में संकलित ‘मुरली तउफ गुपाल¯ह भावति’ पद में गोपियों का मुरली के प्रति इर्ष्यार् - भाव व्यक्त हुआ है। गोपियाँ और किस - किस के प्रति इर्ष्यार् - भाव रखती थीं, वुफछ नाम गिनाइए। 130 ध् अंतरा शब्दाथर् और टिप्पणी बरबस - व्यथर् ही गुसैयाँ - गुसाईं, स्वामी रिसैयाँ - क्रोध करना दाउँ दियौ - दाँव देना, पारी देना कटि - कमर सुजान - चतुर कनौड़े - कृपा से दबे हुए गिरिधर - गिरि को धारण करने वाले, श्रीकृष्ण नार - गदर्न, स्त्राी कोप - क्रोध

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