भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म काशी में हुआ था। उनका व्यक्ितत्व देश - प्रेम और क्रांति - चेतना से समृ( था। किशोर वय में ही उन्होंने स्वदेश की दुदर्शा का त्रासद अनुभव कर लिया था। भारतेंदु हरिश्चंद्र पुनजार्गरण की चेतना के अप्रतिम नायक थे। बंगाल के प्रख्यात मनीषी और पुनजार्गरण के विश्िाष्ट नायक इर्श्वरचंद्र विद्यासागर से उनका अंतरंग संबंध था। बंधन - मुक्ित की चेतना और आधुनिकता की रोशनी से ¯हदी क्षेत्रा को आलोकित करने के लिए उनका मानस व्यावुफल रहता था। अपनी अभीप्सा को मूतर् करने के लिए उन्होंने समानधमार् रचनाकारों को प्रेरित - प्रोत्साहित किया, तदीय समाज की स्थापना की, पत्रा - पत्रिाकाएँ प्रकाश्िात कीं, विविध विधाओं में साहित्य - रचना की। उन्होंने कविवचनसुधा नामक पत्रिाका निकाली तथा हरिश्चंद्र मैगशीन का संपादन किया। बाद में यही हरिश्चंद्र चंिक नाम से प्रकाश्िात होने लगी। स्त्राी - श्िाक्षा के लिए उन्होंने बाला बोिानी पत्रिाका का प्रकाशन किया। उन्होंने बांग्ला के नाटकों का अनुवाद भी किया, जिनमें धनंजय विजय, विद्या सुंदर, पाखंड विडंबन, सत्य हरिश्चंद्र तथा मुद्राराक्षस आदि प्रमुख हैं। उनके मौलिक नाटक हैं μ वैदिकि ¯हसा ¯हसा न भवति, श्री चंद्रावली, भारत दुदर्शा, अंधेर नगरी, नील देवी आदि। भारतेंदु हरिश्चंद्र की धारणा के मुताबिक सन्् 1873 में ‘¯हदी नइर् चाल में ढली’। यह ‘चाल’ श्िाल्प और संवेदना की दृष्िट से सवर्था नवीन थी। खड़ी बोली गद्य में ¯हदी की यात्रा जातीय संवेदना से अनुप्राण्िात होकर शुरू हुइर् थी, जिसे भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके समकालीन रचनाकारों ने अपनी साधना से अपेक्ष्िात गति दी। ¯हदी नाटक और निबंध की परंपरा भारतेंदु से शुरू होती है। भारतेंदु हरिश्चंद्र का प्रभाव उनके समकालीनों पर स्पष्ट भारतेंदु हरिश्चंद्र ;सन् 1850 - 1885द्ध देखा जा सकता है। आधुनिक ¯हदी गद्य के विकास में उनका उल्लेखनीय योगदान है। उन्हांेने अपने समकालीन लेखकों का तो नेतृत्व किया ही, साथ ही परवतीर् लेखकों के लिए पथ - प्रदशर्क का कायर् भी किया। यहाँ पाठ्यपुस्तक के लिए उनका बलिया के ददरी मेले में दिया गया व्याख्यान चुना गया है। भारतवषर् की उन्नति वैफसे हो सकती है? भारतेंदु का प्रसि( भाषण है। इसमें एक ओर बि्रटिश शासन की मनमानी पर व्यंग्य है, तो दूसरी ओर अंगे्रशों के परिश्रमी स्वभाव के प्रति आदर भी है। भारतेंदु ने आलसीपन, समय के अपव्यय आदि कमियों को दूर करने की बात करते हुए भारतीय समाज की रूढि़यों और गलतजीवन शैली पर भी प्रहार किया है। जनसंख्या - नियंत्राण, श्रम की महत्ता, आत्मबल और त्याग - भावना को भारतेंदु ने उन्नति के लिए अनिवायर् माना है और अत्यंत प्रेरक ढंग से इसे व्यक्त किया है। भारतवषर् की उन्नति वैफसे हो सकती है? आज बड़े ही आनंद का दिन है कि इस छोटे - से नगर बलिया में हम इतने मनुष्यों को बड़े उत्साह से एक स्थान पर देखते हैं। इस अभागे आलसी देश में जो कुछ हो जाए वही बहुत वुफछ है। बनारस ऐसे - ऐसे बड़े नगरों में जब वुफछ नहीं होता तो यह हम क्यों न कहेंगे कि बलिया में जो वुफछ हमने देखा, वह बहुत ही प्रशंसा के योग्य है। इस उत्साह का मूल कारण जो हमने खोजा, तो प्रगट हो गया कि इस देश के भाग्य से आजकल यहाँ सारा समाज ही ऐसा एकत्रा है। जहाँ राॅबटर् साहब बहादुर जैसे कलेक्टर हों, वहाँ क्यों न ऐसा समाज हो। जिस देश और काल में इर्श्वर ने अकबर को उत्पन्न किया था, उसी में अबुल पफशल, बीरबल, टोडरमल को भी उत्पन्न किया। यहाँ राॅबटर् साहब अकबर हैं, तो मुंशी चतुभर्ुज सहाय, मुंशी बिहारीलाल साहब आदि अबुल पफशल और टोडरमल हैं। हमारे ¯हदुस्तानी लोग तो रेल की गाड़ी हैं। यद्यपि पफस्टर् क्लास, सेवेंफड क्लास आदि गाड़ी बहुत अच्छी - अच्छी और बड़े - बड़े महसूल की इस ट्रेन में लगी हैं पर बिना इंजिन ये सब नहीं चल सकतीं, वैसे ही ¯हदुस्तानी लोगों को कोइर् चलानेवाला हो, तो ये क्या नहीं कर सकते। इनसे इतना कह दीजिए, ‘‘का चुप सािा रहा बलवाना’’ पिफर देख्िाए कि हनुमान जी को अपना बल वैफसे याद आ जाता है। सो बल कौन याद दिलावे या ¯हदुस्तानी राजे - महाराजे या नवाब रइर्स या हाकिम। राजे - महाराजों को अपनी पूजा, भोजन, झूठी गप से छु‘ी नहीं। हाकिमों को वुफछ तो सरकारी काम घेरे रहता है, वुफछ बाॅल, घुड़दौड़, थ्िाएटर, अखबार में समय गया। वुफछ समय बचा भी तो उनको क्या गरज है कि हम गरीब गंदे काले आदमियों से मिलकर अपना अनमोल समय खोवैं। बस वही मसल हुइर् μ फ्तुम्हें गैरों से कब ़पुफरसत हम अपने गम से कब खाली। चलो, बस हो चुका मिलना न हम खाली नतुम खाली।य् तीन मंेढक एक के ऊपर एक बैठे थे। ऊपरवाले ने कहा ‘शौक शौक’, बीचवाला बोला, ‘गुम सुम’, सबके नीचेवाला पुकारा ‘गए हम’। सो ¯हदुस्तान की साधारण प्रजा की दशा यही है μगए हम। पहले भी जब आयर् लोग ¯हदुस्तान में आकर बसे थे, राजा और ब्राह्मणों ही के िाम्मे यह काम था कि देश में नाना प्रकार की विद्या और नीति पैफलावैं और अब भी ये लोग चाहैं तो ¯हदुस्तान प्रतिदिन कौन कहै, प्रतिछिन बढै़। पर इन्हीं लोगों को सारे संसार के निवफम्मेपन ने घेर रक्खा है। फ्बौ(ारो मत्सरग्रस्ता अभवः स्मरदूष्िाताः।य् हम नहीं समझते कि इनको लाज भी क्यों नहीं आती कि उस समय में जब इनकेपुरुषों के पास कोइर् भी सामान नहीं था तब उन लोगों ने जंगल में पत्ते और मि‘ी की वुफटियों में बैठकर बाँस की नलियों से जो तारा ग्रह आदि वेध करके उनकी गति लिखी है, वह ऐसी ठीक है कि सोलह लाख रुपये के लागत की विलायत में जो दूरबीनें बनी हैं उनसे उन ग्रहों को वेध करने में भी वही गति ठीक आती है और जब आज इस काल में हम लोगों को अंग्रेशी विद्या की ओर जगत की उन्नतिकी कृपा से लाखों पुस्तवेंफ और हशारों यंत्रा तैयार हैं। तब हम लोग निरी चुंगी की कतवार पेंफकने की गाड़ी बन रहे हैं। यह समय ऐसा है कि उन्नति की मानो घुड़दौड़ हो रही है। अमेरिकन, अंग्रेश प़्ाफरांसीस आदि तुरकी ताजी सब सरप‘ दौड़े जाते हैं। सबके जी में यही है कि पाला हमीं पहले छू लें। उस समय ¯हदू काठियावाड़ी खाली खड़े - खड़े टाप से मि‘ी खोदते हैं। इनको, औरों को जाने दीजिए, जापानी ट‘ओं को हाँपफते हुए दौड़ते देखकर भी लाज नहीं आती। यह समय ऐसा है किुजो पीछे रह जाएगा, पिफर कोटि उपाय किए भी आगे न बढ़ सवैफगा। इस लूट में, इस बरसात में भी जिसके सिर पर कमबख्ती का छाता और आँखों में मूखर्ता की प‘ी बँधी रहे उन पर इर्श्वर का कोप ही कहना चाहिए। मुझको मेरे मित्रों ने कहा था कि तुम इस विषय पर आज वुफछ कहो कि ¯हदुस्तान की वैफसे उन्नति हो सकती है। भला इस विषय पर मैं और क्या कहूंँ ‘भागवत’ में एक श्लोक है μ फ्नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुलर्भं प्लवं सुकल्पं गुरु कणर्धारं। मया{नुकूलेन नभः स्वतेरितुं पुमान् भवाब्िधं न तरेत् स आत्महा।य् भगवान कहते हैं किपहले तो मनुष्य जनम ही बड़ा दुलर्भ है, सो मिला और उस पर गुरफ की कृपा और मेरी अनुकूलता। इतना सामान पाकर भी जो मनुष्य इस संसार - सागर के पार न जाए, उसको आत्महत्यारा कहना चाहिए। वही दशा इस समय ¯हदुस्तान की है। अंग्रेशों के राज्य में सब प्रकार का सामान पाकर, अवसर पाकर भी हम लोग जो इस समय पर उन्नति न करैं तो हमारा केवल अभाग्य और परमेश्वर का कोप ही है। सास के अनुमोदन से एकांत रात में सूने रंगमहल में जाकर भी बहुत दिन से जिस प्रान से प्यारे परदेसी पति से मिलकर छाती ठंडी करने की इच्छा थी, उसका लाज से मुँह भी न देखै और बोलै भी न, तो उसका अभाग्य ही है। वह तो कल पिफर परदेस चला जाएगा। वैसे ही अंग्रेशों के राज्य में भी जो हम वूफँए के मेंढक, काठ के उल्लू, पिंजडे़ के गंगाराम ही रहैं तो हमारी कमबख्त कमबख्ती पिफर कमबख्ती है। बहुत लोग यह कहैंगे कि हमको पेट के धंधे के मारे छु‘ी ही नहीं रहती बाबा, हम क्या उन्नति करैं? तुम्हारा पेट भरा है तुमको दून की सूझती है। यह कहना उनकी बहुत भूल है। इंग्लैंड का पेट भी कभी यों ही खाली था। उसने एक हाथ से अपना पेट भरा, दूसरे हाथ से उन्नति की राह के काँटों को साप़्ाफ किया। क्या इंग्लैंड में किसान, खेतवाले, गाड़ीवान, मशदूर, कोचवान आदि नहीं हैं? किसी देश में भी सभी पेट भरे हुए नहीं होते। विंफतु वे लोग जहाँ खेत जोतते - बोते हैं वहीं उसके साथ यह भी सोचते हैं कि ऐसी और कौन नइर् कल या मसाला बनावैं, जिसमें इस खेती में आगे से दूना अन्न उपजै। विलायत में गाड़ी के कोचवान भी अखबार पढ़ते हैं। जब मालिक उतरकर किसी दोस्त के यहाँ गया उसी समय कोचवान ने गद्दी के नीचे से अखबार निकाला। यहाँ उतनी देर कोचवान हुक्का पिएगा या गप्प करेगा। सो गप्प भी निकम्मी। वहाँ के लोग गप्प ही में देश के प्रबंध छाँटते हैं। सि(ांत यह कि वहाँ के लोगों का यह सि(ांत है कि एक छिन भी व्यथर् न जाए। उसके बदले यहाँ के लोगों में जितना निकम्मापन हो उतना ही वह बड़ा अमीर समझा जाता है। आलस यहाँ इतनी बढ़ गइर् कि मलूकदास ने दोहा ही बना डाला μ फ्अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम। दास मलूका कहि गए, सबके दाता राम।य् चारों ओर आँख उठाकर देख्िाए तो बिना काम करनेवालों की ही चारों ओर बढ़ती है। रोशगार कहीं वुफछ भी नहीं है, अमीरों की मुसाहबी, दल्लाली या अमीरों के नौजवान लड़कों को खराब करना या किसी की जमा मार लेना, इनके सिवा बतलाइए और कौन रोशगार है। जिससे वुफछ रुपया मिलै। चारों ओर दरिद्रता की आग लगी हुइर् है। किसी ने बहुत ठीक कहा है कि दरिद्र वुफटुंबी इस तरह अपनी इश्शत को बचाता पिफरता है, जैसे लाजवंती वुफल की बहू पफटे कपड़ों में अपने अंग को छिपाए जाती है। वही दशा ¯हदुस्तान की है। मदुर्मशुमारी की रिपोटर् देखने से स्पष्ट होता है कि मनुष्य दिन - दिन यहाँ बढ़ते जाते हैं और रुपया दिन - दिन कमती होता जाता है। तो अब बिना ऐसा उपाय किए काम नहीं चलैगा कि रुपया भी बढ़ै और वह रुपया बिना बुि बढ़े न बढ़ैगा। भाइयो, राजा - महाराजों का मुँह मत देखो, मत यह आशा रक्खो कि पंडित जी कथा में कोइर् ऐसा उपाय भी बतलावैंगे कि देश का रुपया और बुि बढ़े। तुम आप ही कमर कसो, आलस छोड़ो। कब तक अपने को जंगली हूस मूखर् बोदे डरपोकने पुकरवाओगे। दौड़ो, इस घोड़दौड़ में जो पीछे पड़े तो पिफर कहीं ठिकाना नहीं है। फ्पिफर कब राम जनकपुर ऐहैं।य् अबकी जो पीछे पड़े तो पिफर रसातल ही पहुंँचोगे। जब पृथ्वीराज को वैफद करके गोरे ले गए तो शहाबुद्दीन के भाइर् गियासुद्दीन से किसी ने कहा कि वह शब्दभेदी बाण बहुत अच्छा मारता है। एक दिन सभा नियत हुइर् और सात लोहे के तावे बाण से पफोड़ने को रखे गए। पृथ्वीराज को लोगों ने पहले ही से अंधा कर दिया था। संकेत यह हुआ कि जब गियासुद्दीन ‘हूंँ’ करे तब वह तावों पर बाण मारे। चंद कवि भी उसके साथ वैफदी था। यह सामान देखकर उसने यह दोहा पढ़ा। फ्अबकी चढ़ी कमान, को जानै पिफर कब चढ़ै। जिनि चुक्के चैहान, इक्के मारय इक्क सर।।य् उसका संकेत समझकर जब गियासुद्दीन ने ‘हूँ’ किया तो पृथ्वीराज ने उसी को बाण मार दिया। वही बात अब है। अबकी चढ़ी, इस समय में सरकार का राज्य पाकर और उन्नति का इतना सामान पाकर भी तुम लोग अपने को न सुधारोे तो तुम्हीं रहो और वह सुधारना भी ऐसा होना चाहिए कि सब बात में उन्नति हो। धमर् में, घर के काम में, बाहर के काम में, रोशगार में, श्िाष्टाचार में, चाल - चलन में, शरीर के बल में, मन के बल में, समाज में, बालक में, युवा में, वृ( में, स्त्राी में, पुरुष में, अमीर में, गरीब में, भारतवषर् की सब अवस्था, सब जाति सब देश में उन्नति करो। सब ऐसी बातों को छोड़ो जो तुम्हारे इस पथ के कंटकहों, चाहे तुम्हैं लोग निकम्मा कहैं या नंगा कहैं, कृस्तान कहैं या भ्रष्ट कहैं। तुम केवल अपने देश की दीनदशा को देखो और उनकी बात मत सुनो।अपमानं पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः।स्वकाÕय± साधयेत् धीमान् काÕयर्ध्वंसो हि मूखर्ता।। जो लोग अपने को देश हितैषी लगाते हों, वह अपने सुख को होम करके, अपने धन और मान का बलिदान करके कमर कस के उठो। देखादेखी थोड़े दिन में सब हो जाएगा। अपनी खराबियों के मूल कारणों को खोजो। कोइर् धमर् की आड़ में, कोइर् देश की चाल की आड़ में, कोइर् सुख की आड़ में छिपे हैं। उन चोरों को वहाँ - वहाँ से पकड़ - पकड़कर लाओ। उनको बाँध - बाँधकर वैफद करो। हम इससे बढ़कर क्या कहें कि जैसे तुम्हारे घर में कोइर् पुरुष व्यभ्िाचार करने आवै तो जिस क्रोध से उसको पकड़कर मारोगे और जहाँ तक तुम्हारे में शक्ित होगी उसका सत्यानाश करोगे। उसी तरह इस समय जो - जो बातैं तुम्हारे उन्नति - पथ में कांँटा हों, उनकी जड़ खोदकर पेंफक दो। वुफछ मत डरो। जब तक सौ - दो सौ मनुष्य बदनाम न होंगे, जात से बाहर न निकाले जाएँगे, दरिद्र न हो जाएँगे, वैफद न होंगे, वरंच जान से न मारे जाएँगे तब तक कोइर् देश भी न सुधरैगा। अब यह प्रश्न होगा कि भाइर्, हम तो जानते ही नहीं कि उन्नति और सुधरना किस चिडि़या का नाम है। किसको अच्छा समझैं? क्या लें, क्या छोड़ैं? तो वुफछ बातैं जो इस शीघ्रता में मेरे ध्यान में आती हैं, उनको मैं कहता हूँ, सुनो μ सब उन्नतियों का मूल धमर् है। इससे सबके पहले धमर् की ही उन्नति करनी उचित है। देखो, अँग्रेशों की धमर्नीति और राजनीति परस्पर मिली है, इससे उनकी दिन - दिन वैफसी उन्नति है। उनको जाने दो, अपने ही यहाँ देखो! तुम्हारे यहाँ धमर् की आड़ में नाना प्रकार की नीति, समाज - गठन, वैद्यक आदि भरे हुए हैं। दो - एक मिसाल सुनो। यही तुम्हारा बलिया का मेला और यहाँ स्नान क्यों बनाया गया है? जिसमें जो लोग कभी आपस में नहीं मिलते, दस - दस, पाँच - पाँच कोस से वे लोग साल में एक जगह एकत्रा होकर आपस में मिलें। एक - दूसरे का दुःख - सुख जानैं। गृहस्थी के काम की वह चीशैं जो गाँव में नहीं मिलती, यहाँ से ले जाएँ। एकादशी का व्रत क्यों रखा है? जिसमें महीने में दो - एक उपवास से शरीर शु( हो जाए। गंगा जी नहाने जाते हो तो पहिले पानी सिर पर चढ़ाकर तब पैर डालने का विधान क्यों है? जिसमें तलुए से गरमी सिर में चढ़कर विकार न उत्पन्न करे। दीवाली इसी हेतु है कि इसी बहाने साल - भर में एक बेर तो सपफाइर् हो जाए। होली इसी हेतु है कि बसंत की बिगड़ी हवा स्थान - स्थान पर अग्िन बलने से स्वच्छ हो जाए। यही तिहवार ही तुम्हारी मानो म्युनिसिपालिटी हैं। ऐसे ही सब पवर्, सब तीथर् व्रत आदि में कोइर् हिकमत है। उन लोगों ने धमर्नीति और समाजनीति को दूध - पानी की भाँति मिला दिया है। खराबी जो बीच में भइर् है वह यह है कि उन लोगों ने ये धमर् क्यों मानने लिखे थे, इसका लोगों ने मतलब नहीं समझा और इन बातों को वास्तविक धमर् मान लिया। भाइयो, वास्तविक धमर् तो केवल परमेश्वर के चरण कमल का भजन है। ये सब तो समाज धमर् हैं जो देशकाल के अनुसार शोधे और बदले जा सकते हैं। दूसरी खराबी यह हुइर् कि उन्हीं महात्मा बुिमान )ष्िायों के वंश के लोगों ने अपने बाप - दादों का मतलब न समझकर बहुत से नए - नए धमर् बनाकर शास्त्रों में धर दिए। बस सभी तिथ्िा - व्रत और सभी स्थान तीथर् हो गए। सो इन बातों को अब एक बेर आँख खोलकर देख और समझ लीजिए कि पफलानी बात उन बुिमान )ष्िायों ने क्यों बनाइर् और उनमें देश और काल के जो अनुकूल और उपकारी हों, उनको ग्रहण कीजिए। बहुत सी बातैं जो समाज - विरु( मानी हैं, ¯वफतु धमर्शास्त्रों में जिनका विधान है, उनको चलाइए। जैसे जहाश का सप़्ाफर, विधवा - विवाह आदि। लड़कों को छोटेपन ही में ब्याह करके उनका बल, वीयर्, आयुष्य सब मत घटाइए। आप उनके माँ - बाप हैं या उनके शत्राु हैं? वीयर् उनके शरीर में पुष्ट होने दीजिए, विद्या वुफछ पढ़ लेने दीजिएऋ नोन, तेल, लकड़ी की प्िा़फक्र करने की बुि सीख लेने दीजिए μ तब उनका पैर काठ में डालिए। वुफलीन - प्रथा, बहु - विवाह आदि को दूर कीजिए। लड़कियों को भी पढ़ाइए, विंफतु उस चाल से नहीं जैसे आजकल पढ़ाइर् जाती हैं जिससे उपकार के बदले बुराइर् होती है। ऐसी चाल से उनको श्िाक्षा दीजिए कि वह अपना देश और वुफलधमर् सीखें, पति की भक्ित करैं और लड़कों को सहज में श्िाक्षा दें। वैष्णव, शाक्त इत्यादि नाना प्रकार के मत के लोग आपस का वैर छोड़ दें। यह समय इन झगड़ों का नहीं। ¯हदू, जैन, मुसलमान सब आपस में मिलिए।जाति में कोइर् चाहे ऊँचा हो चाहे नीचा हो, सबका आदर कीजिए, जो जिस योग्य हो उसको वैसा मानिए। छोटी जाति के लोगों को तिरस्कार करके उनका जी मत तोडि़ए। सब लोग आपस में मिलिए। मुसलमान भाइयों को भी उचित है कि इस ¯हदुस्तान में बसकर वे लोग ¯हदुओं को नीचा समझना छोड़ दें। ठीक भाइयों की भाँति ¯हदुओं से बरताव करैं। ऐसी बात, जो ¯हदुओं का जी दुखानेवाली हों, न करें। घर में आग लगै, तब जिठानी μ द्यौरानी को आपस का डाह छोड़कर एक साथ वह आग बुझानी चाहिए। जो बात ¯हदुओं को नहीं मयस्सर हैं, वह धमर् के प्रभाव से मुसलमानों को सहज प्राप्त हैं। उनमें जाति नहीं, खाने - पीने में चैका - चूल्हा नहीं, विलायत जाने में रोक - टोक नहीं। पिफर भी बड़े ही सोच की बात है, मुसलमानों ने अभी तक अपनी दशा वुफछ नहीं सुधारी।अभी तक बहुतों को यही ज्ञान है कि दिल्ली, लखनऊ की बादशाहत कायम है। यारो! वे दिन गए। अब आलस, हठधमीर् यह सब छोड़ो। चलो, ¯हदुओं के साथ तुम भी दौड़ो, एक - एक दो होंगे। पुरानी बातैं दूर करो। मीरहसन की ‘मसनवी’ और ‘इंदरसभा’ पढ़ाकर छोटेपन ही से लड़कों को सत्यानाश मत करो। होश सम्हाला नहीं कि प‘ी पार ली, चुस्त कपड़ा पहना और गशल गुनगुनाए। फ्शौक तिफ्ऱली से मुझे गुल की जो दीदार का था। न किया हमने गुलिस्ताँ का सबक याद कभीय्। भला सोचो कि इस हालत में बड़े होने पर वे लड़के क्यों न बिगड़ैंगे। अपने लड़कांे को ऐसी किताबैं छूने भी मत दो। अच्छी - से - अच्छी उनको तालीम दो। पिनश्िान और वशीपफा या नौकरी का भरोसा छोड़ो। लड़कों को रोशगार सिखलाओ। विलायत भेजो। छोटेपन से मिहनत करने की आदत दिलाओ। सौ - सौ महलों के लाड़ - प्यार दुनिया से बेखबर रहने की राह मत दिखलाओ। भाइर् ¯हदुओ! तुम भी मत - मतांतर का आग्रह छोड़ो। आपस में प्रेम बढ़ाओ। इस महामंत्रा का जाप करो। जो ¯हदुस्तान में रहे, चाहे किसी रंग, किसी जाति का क्यों न हो, ¯हदू, ¯हदू की सहायता करो। बंगाली, मराठा, पंजाबी, मदरासी, वैदिक, जैन, ब्रह्मो, मुसलमान सब एक का हाथ एक पकड़ो। कारीगरी जिसमें तुम्हारे यहाँ बढ़ै, तुम्हारा रुपया तुम्हारे ही देश में रहै वह करो। देखो, जैसे हशार धारा होकर गंगा समुद्र में मिली हैं, वैसे ही तुम्हारी लक्ष्मी हशार तरह से इंग्लैंड, पफरांसीस, जमर्नी, अमेरिका को जाती हैं। दीआसलाइर् ऐसी तुच्छ वस्तु भी वहीं से आती है। शरा अपने ही को देखो। तुम जिस मारकीन की धोती पहने हो वह अमेरिका की बिनी है। जिस लंकिलाट का तुम्हारा अंगा है वह इंग्लैंड का है। पफरांसीस की बनी कंघी से तुम सिर झारते हो और जमर्नीकी बनी चरबी की बत्ती तुम्हारे सामने बल रही है। यह तो वही मसल हुइर् कि एक बेप्ि़ाफकरे मँगनी का कपड़ा पहिनकर किसी महपिफल में गए। कपड़े को पहिचानकर एक ने कहा, ‘अजी यह अंगा तो पफलाने का है।’ दूसरा बोला, ‘अजी टोपी भी पफलाने की है।’ तो उन्होंने हँसकर जवाब दिया कि ‘घर की तो मूछैं ही मूछैं हैं।’ हाय अप़्ाफसोस, तुम ऐसे हो गए कि अपने निज के काम की वस्तु भी नहीं बना सकते। भाइयो, अब तो नींद से चैंको, अपने देश की सब प्रकार उन्नति करो। जिसमें तुम्हारी भलाइर् हो वैसी ही किताब पढ़ो, वैसे ही खेल खेलो, वैसी ही बातचीत करो। परदेशी वस्तु और परदेशी भाषा का भरोसा मत रखो। अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो। 2.‘जहाँ राॅबटर् साहब बहादुर जैसे कलेक्टर हों, वहाँ क्यों न ऐसा समाज हो’ वाक्य में लेखक ने किस प्रकार के समाज की कल्पना की है? 3.जिस प्रकार टेªन बिना इंजिन के नहीं चल सकती ठीक उसी प्रकार ‘¯हदुस्तानी लोगों को कोइर् चलानेवाला हो’ से लेखक ने अपने देश की खराबियों के मूल कारण खोजने के लिए क्यों कहा है? 4.देश की सब प्रकार से उन्नति हो, इसके लिए लेखक ने जो उपाय बताए उनमें से किन्हीं चार का उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए। 5.लेखक जनता से मत - मतांतर छोड़कर आपसी प्रेम बढ़ाने का आग्रह क्यों करता है? 6.आज देश की आ£थक स्िथति के संदभर् में निम्नलिख्िात वाक्य को एक अनुच्छेद में स्पष्ट कीजिए μ ‘जैसे हशार धारा होकर गंगा समुद्र में मिली हैं, वैसे ही तुम्हारी लक्ष्मी हशार तरह से इंग्लैंड, पफरांसीस, जमर्नी, अमेरिका को जाती हंै।’ 7.;कद्ध पाठ के आधार पर निम्नलिख्िात का कारण स्पष्ट कीजिए μ ऽ बलिया का मेला और स्नान ऽ एकादशी का व्रत ऽ गंगा जी का पानी पहले सिर पर चढ़ाना ऽ दीवाली मनाना ऽ होली मनाना ;खद्ध उक्त संदभर् में क्यों कहा गया है कि ‘यही तिहवार ही तुम्हारी मानो म्युनिसिपालिटी हैं’? 8.आपके विचार से देश की उन्नति किस प्रकार संभव है? कोइर् चार उदारहण तवर्फ सहित दीजिए। 9.भाषण की किन्हीं चार विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। उदाहरण देकर सि( कीजिए कि पाठ ‘भारतवषर् की उन्नति वैफसे हो सकती है?’ एक भाषण है। 10.‘अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो’ से लेखक का क्या तात्पयर् है? वतर्मान संदभो± में इसकी प्रासंगिता पर अपने विचार प्रस्तुत कीजिए। 11.पाठ में कइर् वषर् पुरानी ¯हदी भाषा का प्रयोग है इसलिए चाहैं, पैफलावैं, सवैफगा आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है जो आज की ¯हदी में चाहे, पैफलाएँ, सकेगा आदि लिखे जाते हैं। निम्नलिख्िात शब्दों को आज की ¯हदी में लिख्िाए जैसे μ मिहनत, छिन - प्रतिछिन, तिहवार। इसी प्रकार पाठ में से अन्य दस शब्द छाँटकर लिख्िाए। 12.निम्नलिख्िात पंक्ितयों का आशय स्पष्ट कीजिए μ ;कद्ध राजे - महाराजों को अपनी पूजा, भोजन, झूठी गप से छु‘ी नहीं। ;खद्ध सबके जी में यही है कि पाला हमीं पहले छू लें। ;गद्ध हमको पेट के धंधे के मारे छु‘ी ही नहीं रहती बाबा, हम क्या उन्नति करैं? ;घद्ध यह तो वही मसल हुइर् कि एक बेप्िाफकरे मँगनी का कपड़ा पहिनकर किसी महपिफल ़में गए। 13.निम्नलिख्िात गद्यांशों की व्याख्या कीजिए μ ;कद्ध सास के अनुमोदन से .............पिफर परदेस चला जाएगा। ;खद्ध दरिद्र वुफटंुबी इस तरह .............वही दशा ¯हदुस्तान की है। ;गद्ध वास्तविक धमर् तो .............शोधे और बदले जा सकते हैं।़ योग्यता - विस्तार 1.देश की उन्नति के लिए भारतेंदु ने जो आह्नान किया है उसे विस्तार से लिख्िाए। 2.पंक्ित पूरी कीजिए, अथर् लिख्िाए और इन्हें जिन कवियों - शायरों ने लिखा है, कहा है, उनका नाम लिख्िाए μ ;कद्ध अजगर करै न चाकरी, पंछी करे न काम ............;खद्ध अबकी चढ़ी कमान, को जानै पिफर कब चढ़ै ............;गद्ध शौक तिफ्ऱली से मुझे गुल की जो दीदार का था ............3.भारतंेदु उदूर् में किस उपनाम से कविताएँ लिखते थे? उनकी वुफछ उदूर् कविताएँ ढूँढ़कर लिख्िाए। मदुर्मशुमारी - जनगणना तिफ्रली - बचपन से संबंध्ित

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