पांडेय बेचन शमार् ‘उग्र’ का जन्म उत्तर प्रदेश के मिशार्पुर िाले के चुनार नामक ग्राम में हुआ था। परिवार में अभावांे के कारण उन्हें व्यवस्िथत श्िाक्षा पाने का सुयोग नहीं मिला। मगर अपनी नैसगिर्क प्रतिभा और साधना से उन्होंने अपने समय के अग्रणी गद्य श्िाल्पी के रूप में अपनी पहचान बनाइर्। अपने तेवर और शैली के कारण उग्र जी अपने समय के चचिर्त लेखक रहे। अपने कवि मित्रा निराला की तरह उन्हेें भी पुरातनपंथ्िायों के कठोर विरोध का सामना करना पड़ा। पत्राकारिता से उग्र जी का सिय संबंध था। वे आज, विश्वमित्रा, स्वदेश, वीणा, स्वराज्य और विक्रम के संपादक रहे, लेकिन मतवाला - मंडल के प्रमुख सदस्य के रूप में उनकी विशेष पहचान है। उग्र जी ने शताध्िक कहानियाँ लिखी हैं जो पंजाब की महारानी, रेशमी, पोली इमारत, चित्रा - विचित्रा, वंफचन - सी काया, काल कोठरी, ऐसी होली खेलो लाल, कला का पुरस्कार आदि में संकलित हैं। चंद हसीनों के खतूत, बुधुआ की बेटी, दिल्ली का दलाल, मनुष्यानंद आदि अनेक यथाथर्वादी उपन्यासों की रचना भी उन्होंने की। कहानी और उपन्यास के अतिरिक्त आत्मकथा, संस्मरण, रेखाचित्रा आदि के क्षेत्रों में भी उनकी लेखनी गतिशील रही। उनकी आत्मकथा अपनी खबर साहित्य जगत में बहुच£चत है। उन्होंने महात्मा इर्सा ;नाटकद्ध और ध्रुवधारण ;खंडकाव्यद्ध की भी रचना की है।उग्र जी की कहानियों की भाषा सरल, अलंकृत और व्यावहारिक है, जिसमें उदूर् के व्यावहारिक शब्द भी अनायास ही आ जाते हैं। भावों को मूतिर्मंत करने में इनकी भाषा अत्यध्िक सजीव और सशक्त कही जा सकती है, जो पाठक पांडेय बेचन शमार्‘उग्र’ ;सन् 1900 - 1967द्ध के ममर्स्थल पर सीध प्रहार करती है। भावों के अनुरूप इनकी शैली भी व्यंग्यपरक है। इनकी कहानियों में उसकी माँ, शाप, कला का पुरस्कार, जल्लाद और देशभक्त आदि विशेष प्रसि( हैं।उग्र जी प्रेमचंदयुगीन कहानीकार हैं इसलिए उस समय की मुख्य प्रवृिा μ समाज सुधर इनकी कहानियों में भी मौजूद है। उसकी माँ कहानी देश की दुरवस्था से ¯चतित युवा पीढ़ी के विद्रोह को नए रूप में प्रस्तुत करती है। यह युवा पीढ़ी देश की दुरवस्था का िाम्मेदार शासन - तंत्रा को मानती है तथा इस शासन - तंत्रा को उखाड़ पेंफकना चाहती है। दुष्ट, व्यक्ित - नाशक राष्ट्र के सवर्नाश में अपना योगदान ही इस पीढ़ी का सपना है। यथाथर् के तूपफानों से बेपरवाह यह पीढ़ी जानती है कि़नष्ट हो जाना तो यहाँ का नियम है। जो सँवारा गया है, वह बिगड़ेगा ही। हमें दुबर्लता के डर से अपना काम नहीं रोकना चाहिए। कमर् के समय हमारी भुजाएँ दुबर्ल नहीं,भगवान की सहड्ड भुजाओं की सख्िायाँ हैं।नयी पीढ़ी का यह विद्रोही स्वर जहाँ राजसत्ता से विद्रोह की मशाल लिए खड़ाहै, वहीं पूवर्वतीर् पीढ़ी का बुिजीवी समाज अपनी सुविध के लिए राजसत्ता के तलवे चाटने को तैयार है। इन दोनों के बीच खड़ी है एक माँ, जो अपना बेटा चाहती है, अपना लाल और उसकी खुशहाली। समाज के दो सिरों के बीच खड़ी ममतामयी माँ लाख कोश्िाशों के बावजूद व्यवस्था की चक्की से अपने बेटे को बचा नहीं पाती। पूरी कथा में व्याप्त तत्कालीन जनमानस, स्वाध्ीनता आंदोलन तथा माँ की ममता का सजीव चित्राण पाठक को उद्वेलित करता है। उसकी माँ दोपहर को शरा आराम करके उठा था। अपने पढ़ने - लिखने के कमरे में खड़ा - खड़ा बड़ी - बड़ी अलमारियों में सजे पुस्तकालय की ओर निहार रहा था। किसी महान लेखक की कोइर् वृफति उनमें से निकालकर देखने की बात सोच रहा था। मगर, पुस्तकालय के एक सिरे से लेकर दूसरे तक मुझे महान ही महान नशर आए। कहीं गेटे, कहीं रूसो, कहीं मेिानी, कहीं नीत्शे, कहीं शेक्सपीयर, कहीं टाॅलस्टाय, कहीं ह्यूगो, कहीं मोपासाँ, कहीं डिवेंफस, स्पेेंसर, मैकाले, मिल्टन, मोलियर...उप़्ाफ! इधर से उधर तक एक - से - एक महान ही तो थे! आख्िार मैं किसके साथ चंद मिनट मनबहलाव करूँ , यह निश्चय ही न हो सका, महानों के नाम ही पढ़ते - पढ़ते परेशान सा हो गया। इतने में मोटर की पों - पों सुनाइर् पड़ी। ख्िाड़की से झाँका तो सुरमइर् रंग की कोइर् ‘पिफएट’ गाड़ी दिखाइर् पड़ी। मैं सोचने लगा μ शायद कोइर् मित्रा पधारे हैं, अच्छा ही है। महानों से जान बची! जब नौकर ने सलाम कर आनेवाले का काडर् दिया, तब मैं वुफछ घबराया। उसपर शहर के पुलिस सुप¯रटेंडेंट का नाम छपा था। ऐसे बेवक्त ये वैफसे आए? पुलिस - पति भीतर आए। मैंने हाथ मिलाकर, चक्कर खानेवाली एक गद्दीदार वुफरसी पर उन्हें आसन दिया। वे व्यापारिक मुसकराहट से लैस होकर बोले, फ्इस अचानक आगमन के लिए आप मुझे क्षमा करें।य् फ्आज्ञा हो!य् मैंने भी नम्रता से कहा। उन्होंने पाॅकेट से डायरी निकाली, डायरी से एक तसवीर। बोले, फ्देख्िाए इसे, शरा बताइए तो, आप पहचानते हैं इसको?य् फ्हाँ, पहचानता तो हूँ,य् शरा सहमते हुए मैंने बताया। फ्इसके बारे में मुझे आपसे वुफछ पूछना है।य् फ्पूछिए।य् फ्इसका नाम क्या है?य् फ्लाल! मैं इसी नाम से बचपन ही से इसे पुकारता आ रहा हूँ। मगर, यह पुकारने का नाम है। एक नाम कोइर् और है, सो मुझे स्मरण नहीं।य् फ्कहाँ रहता है यह?य् सुप¯रटेंडेंट ने मेरी ओर देखकर पूछा। फ्मेरे बँगले के ठीक सामने एक दोमंिाला, कच्चा - पक्का घर है, उसी में वह रहता है। वह है और उसकी बूढ़ी माँ।य् फ्बूढ़ी का नाम क्या है?य् फ्जानकी।य् फ्और कोइर् नहीं है क्या इसके परिवार में? दोनों का पालन - पोषण कौन करता है?य् फ्सात - आठ वषर् हुए, लाल के पिता का देहांत हो गया। अब उस परिवार में वह और उसकी माता ही बचे हैं। उसका पिता जब तक जीवित रहा, बराबर मेरी शमींदारी का मुख्य मैनेजर रहा। उसका नाम रामनाथ था। वही मेरे पास वुफछ हशार रुपए जमा कर गया था, जिससे अब तक उनका खचार् चल रहा है। लड़का काॅलेज में पढ़ रहा है। जानकी को आशा है, वह साल - दो साल बाद कमाने और परिवार को सँभालने लगेगा। मगर क्षमा कीजिए, क्या मैं यह पूछ सकता हूँ कि आप उसके बारे में क्यों इतनी पूछताछ कर रहे हैं?य् फ्यह तो मैं आपको नहीं बता सकता, मगर इतना आप समझ लें, यह सरकारी काम है। इसलिए आज मैंने आपको इतनी तकलीपफ दी है।य़्फ्अजी, इसमें तकलीप़्ाफ की क्या बात है! हम तो सात पुश्त से सरकार के पफरमाबरदार हैं। और वुफछ आज्ञा...य़्फ्एक बात और...य्, पुलिस - पति ने गंभीरतापूवर्क धीरे से कहा, फ्मैं मित्राता से आपसे निवेदन करता हूँ, आप इस परिवार से शरा सावधान और दूर रहें। पिफलहाल इससे अिाक मुझे वुुफछ कहना नहीं।य् फ्लाल की माँ!य् एक दिन जानकी को बुलाकर मैंने समझाया, फ्तुम्हारा लाल आजकल क्या पाजीपन करता है? तुम उसे केवल प्यार ही करती हो न! हूँ! भोगोगी!य् फ्क्या है, बाबू?य् उसने कहा। फ्लाल क्या करता है?य् फ्मैं तो उसे कोइर् भी बुरा काम करते नहीं देखती।य् फ्बिना किए ही तो सरकार किसी के पीछे पड़ती नहीं। हाँ, लाल की माँ! बड़ी धमार्त्मा, विवेकी और न्यायी सरकार है यह। शरूर तुम्हारा लाल वुफछ करता होगा।य् फ्माँ! माँ!य् पुकारता हुआ उसी समय लाल भी आया μ लंबा, सुडौल, सुंदर, तेजस्वी। फ्माँ!!य् उसने मुझे नमस्कार कर जानकी से कहा, फ्तू यहाँ भाग आइर् है। चल तो! मेरे कइर् सहपाठी वहाँ खड़े हैं, उन्हें चटपट वुफछ जलपान करा दे, प्िाफर हम घूमने जाएँगे!य् फ्अरे!य् जानकी के चेहरे की झुरिर्याँ चमकने लगीं, काँपने लगीं, उसे देखकर, फ्तू आ गया लाल! चलती हूँ, भैया! पर, देख तो, तेरे चाचा क्या श्िाकायत कर रहे हैं? तू क्या पाजीपना करता है, बेटा?य् फ्क्या है, चाचा जी?य् उसने सविनय, सुमधुर स्वर में मुझसे पूछा, फ्मैंने क्या अपराध किया है?य् फ्मैं तुमसे नाराश हूँ लाल!य् मैंने गंभीर स्वर में कहा। फ्क्यों, चाचा जी?य् फ्तुम बहुत बुरे होते जा रहे हो, जो सरकार के विरु( षड्यंत्रा करनेवाले के साथी हो। हाँ, तुम हो! देखो लाल की माँ, इसके चेहरे का रंग उड़ गया, यह सोचकर कि यह खबर मुझे वैफसे मिली।य् सचमुच एक बार उसका ख्िाला हुआ रंग शरा मुरझा गया, मेरी बातों से! पर तुरंत ही वह सँभला। फ्आपने गलत सुना, चाचा जी। मैं किसी षड्यंत्रा में नहीं। हाँ, मेरे विचार स्वतंत्रा अवश्य हैं, मैं शरूरत - बेशरूरत जिस - तिस के आगे उबल अवश्य उठता हूँ। देश की दुरवस्था पर उबल उठता हूँ, इस पशु - हृदय परतंत्राता पर।य् फ्तुम्हारी ही बात सही, तुम षड्यंत्रा में नहीं, विद्रोह में नहीं, पर यह बक - बक क्यों? इससे पफायदा? तुम्हारी इस बक - बक से न तो देश की दुदर्शा दूर होगी औऱन उसकी पराधीनता। तुम्हारा काम पढ़ना है, पढ़ो। इसके बाद कमर् करना होगा, परिवार और देश की मयार्दा बचानी होगी। तुम पहले अपने घर का उ(ार तो कर लो, तब सरकार के सुधर का विचार करना।य् उसने नम्रता से कहा, फ्चाचा जी, क्षमा कीजिए। इस विषय में मैं आपसे विवाद नहीं करना चाहता।य् फ्चाहना होगा, विवाद करना होगा। मैं केवल चाचा जी नहीं, तुम्हारा बहुत वुफछ हूँ। तुम्हें देखते ही मेरी आँखों के सामने रामनाथ नाचने लगते हैं, तुम्हारी बूढ़ी माँ घूमने लगती है। भला मैं तुम्हें बेहाथ होने दे सकता हूँ! इस भरोसे मत रहना।य् फ्इस पराध्ीनता के विवाद में, चाचा जी, मैं और आप दो भ्िान्न सिरों पर हैं। आप कट्टर राजभक्त, मैं कट्टर राजविद्रोही। आप पहली बात को उचित समझते हैं μ वुफछ कारणों से, मैं दूसरी को μ दूसरे कारणों से। आप अपना पद छोड़ नहीं सकते μ अपनी प्यारी कल्पनाओं के लिए, मैं अपना भी नहीं छोड़ सकता।य् फ्तुम्हारी कल्पनाएँ क्या हैं, सुनूँ तो! शरा मैं भी जान लूँ कि अबके लड़के काॅलेज की गरदन तक पहुँचते - पहुँचते वैफसे - वैफसे हवाइर् किले उठाने के सपने देखने लगते हैं। शरा मैं भी तो सुनूँ, बेटा।य्फ्मेरी कल्पना यह है कि जो व्यक्ित समाज या राष्ट्र के नाश पर जीता हो, उसका सवर्नाश हो जाए!य् जानकी उठकर बाहर चली, फ्अरे! तू तो जमकर चाचा से जूझने लगा। वहाँ चार बच्चे बेचारे दरवाशे पर खड़े होंगे। लड़ तू, मैं जाती हूँ।य् उसने मुझसे कहा, फ्समझा दो बाबू, मैं तो आप ही वुफछ नहीं समझती, पिफर इसे क्या समझाउफँगी!य् उसने पिफर लाल की ओर देखा, फ्चाचा जो कहें, मान जा, बेटा। यह तेरे भले ही की कहेंगे।य् वह बेचारी कमर झुकाए, उस साठ बरस की वय में भी घूँघट सँभाले, चली गइर्। उस दिन उसने मेरी और लाल की बातों की गंभीरता नहीं समझी।फ्मेरी कल्पना यह है कि...य्, उत्तेजित स्वर में लाल ने कहा, फ्ऐसे दुष्ट, व्यक्ित - नाशक राष्ट्र के सवर्नाश में मेरा भी हाथ हो।य् फ्तुम्हारे हाथ दुबर्ल हैं, उनसे जिनसे तुम पंजा लेने जा रहे हो, चरर् - मरर् हो उठेंगे, नष्ट हो जाएँगे।य् फ्चाचा जी, नष्ट हो जाना तो यहाँ का नियम है। जो सँवारा गया है, वह बिगड़ेगा ही। हमें दुबर्लता के डर से अपना काम नहीं रोकना चाहिए। कमर् के समय हमारी भुजाएँ दुबर्ल नहीं, भगवान की सहस्र भुजाओं की सख्िायाँ हैं।य् फ्तो तुम क्या करना चाहते हो?य् फ्जो भी मुझसे हो सकेगा, करूँगा।य् फ्षड्यंत्रा?य् फ्शरूरत पड़ी तो शरूर...य् फ्विद्रोह?य् फ्हाँ, अवश्य!य् फ्हत्या?य् फ्हाँ, हाँ, हाँ!य् फ्बेटा, तुम्हारा माथा न जाने कौन सी किताब पढ़ते - पढ़ते बिगड़ रहा है। सावधन!य् मेरी ध्मर्पत्नी और लाल की माँ एक दिन बैठी हुइर् बातें कर रही थीं कि मैं पहुुँच गया। वुफछ पूछने के लिए कइर् दिनों से मैं उसकी तलाश में था। फ्क्यों लाल की माँ, लाल के साथ किसके लड़के आते हैं तुम्हारे घर में?य् फ्मैं क्या जानूँ, बाबू!य् उसने सरलता से कहा, फ्मगर वे सभी मेरे लाल ही की तरह मुझे प्यारे दिखते हैं। सब लापरवाह! वे इतना हँसते, गाते और हो - हल्ला मचाते हैं कि मैं मुग्ध् हो जाती हूँ।य् मैंने एक ठंडी साँस ली, फ्हूँ, ठीक कहती हो। वे बातें वैफसी करते हैं, वुफछ समझ पाती हो?य् फ्बाबू, वे लाल की बैठक में बैठते हैं। कभी - कभी जब मैं उन्हें वुफछ ख्िालाने - पिलाने जाती हूँ, तब वे बड़े प्रेम से मुझे ‘माँ’ कहते हैं। मेरी छाती पूफल उठती है...मानो वे मेरे ही बच्चे हैं।य् फ्हूँ...य्, मैंने पिफर साँस ली। फ्एक लड़का उनमें बहुत ही हँसोड़ है। खूब तगड़ा और बली दिखता है। लाल कहता था, वह डंडा लड़ने में, दौड़ने में, घूँसेबाशी में, खाने में, छेड़खानी करने और हो - हो, हा - हा कर हँसने में समूचे कालेज में पफस्टर् है। उसी लड़के ने एक दिन,़जब मैं उन्हें हलवा परोस रही थी, मेरे मुँह की ओर देखकर कहा, ‘माँ! तू तो ठीक भारत माता - सी लगती है। तू बूढ़ी, वह बूढ़ी। उसका उजला हिमालय है, तेरे केश। हाँ, नक्शे से साबित करता हूँ...तू भारत माता है। सिर तेरा हिमालय...माथे की दोनों गहरी बड़ी रेखाएँ गंगा और यमुना, यह नाक विंध्याचल, ठोढ़ी कन्यावुफमारी तथा छोटी बड़ी झुरियाँ - रेखाएँ भ्िान्न - भ्िान्न पहाड़ और नदियाँ हैं। शरा पास आ मेरे! तेरे केशों को पीछे से आगे बाएँ वंफध्े पर लहरा दूँ, वह बमार् बन जाएगा। बिना उसके भारत माता का शंृगार शु( न होगा’।य् जानकी उस लड़के की बातें सोच गद्गद हो उठी, फ्बाबू, ऐसा ढीठ लड़का! सारे बच्चे हँसते रहे और उसने मुझे पकड़, मेरे बालों को बाहर कर अपना बमार् तैयार कर लिया!य् उसकी सरलता मेरी आँखों में आँसू बनकर छा गइर्र्। मैंने पूछा, फ्लाल की माँ, और भी वे कुछ बातें करते हैं? लड़ने की, झगड़ने की, गोेला, गोली या बंदूक की?य् फ्अरे, बाबू,य् उसने मुसकराकर कहा, फ्वे सभी बातें करते हैं। उनकी बातों का कोइर् मतलब थोड़े ही होता है। सब जवान हैं, लापरवाह हैं। जो मुँह में आता है, बकते हैं। कभी - कभी तो पागलों - सी बातें करते हैं। महीनाभर पहले एक दिन लड़के बहुत उत्तेजित थे। न जाने कहाँ, लड़कों को सरकार पकड़ रही है। मालूम नहीं, पकड़ती भी है या वे यों ही गप हाँकतेे थे। मगर उस दिन वे यही बक रहे थे, ‘पुलिसवाले केवल संदेह पर भले आदमियों के बच्चों को त्रास देते हैं, मारते हैं, सताते हैं। यह अत्याचारी पुलिस की नीचता है। ऐसी नीच शासन - प्रणाली को स्वीकार करना अपने ध्मर् को, कमर् को, आत्मा को, परमात्मा को भुलाना है। ध्ीरे - ध्ीरे घुलाना - मिटाना है।’एक ने उत्तेजित भाव से कहा, ‘अजी, ये परदेसी कौन लगते हैं हमारे, जो बरबस राजभक्ित बनाए रखने के लिए हमारी छाती पर तोप का मुँह लगाए अड़े और खड़े हैं। उप़्ाफ! इस देश के लोगों के हिये की आँखें मुँद गइर् हैं। तभी तो इतने शुल्मों पर भी आदमी आदमी से डरता है। ये लोग शरीर की रक्षा के लिए अपनी - अपनी आत्मा की चिता सँवारते पिफरते हैं। नाश हो इस परतंत्रावाद का!’ दूसरे ने कहा, ‘लोग ज्ञान न पा सवेंफ, इसलिए इस सरकार ने हमारे पढ़ने - लिखने के साध्नों को अज्ञान से भर रखा है। लोग वीर और स्वाध्ीन न हो सवेंफ, इसलिए अपमानजनक और मनुष्यताहीन नीति - मदर्क कानून गढ़े हैं। गरीबों को चूसकर, सेना के नाम पर पले हुए पशुओं को शराब से, कबाब से, मोटा - ताशा रखती है यह सरकार। ध्ीरे - ध्ीरे जोंक की तरह हमारे ध्मर्, प्राण और ध्न चूसती चली जा रही है यह शासन - प्रणाली!’ ‘ऐसे ही अंट - संट ये बातूनी बका करते हैं, बाबू। जभी चार छोकरे जुटे, तभी यही चचार्। लाल के साथ्िायों का मिशाज भी उसी - सा अल्हड़ - बिल्हड़ मुझे मालूम पड़ता है। ये लड़के ज्यों - ज्यों पढ़ते जा रहे हैं, त्यों - त्यों बक - बक में बढ़ते जा रहे हैं।य् फ्यह बुरा है, लाल की माँ!य् मैंने गहरी साँस ली। शमींदारी के वुफछ शरूरी काम से चार - पाँच दिनों के लिए बाहर गया था। लौटने पर बँगले में घुसने के पूवर् लाल के दरवाशे पर नशर पड़ी तो वहाँ एक भयानक सन्नाटा - सा नशर आया μ जैसे घर उदास हो, रोता हो। भीतर आने पर मेरी ध्मर्पत्नी मेरे सामने उदास मुख खड़ी हो गइर्। फ्तुमने सुना?य् फ्नहीं तो, कौन सी बात?य्फ्लाल की माँ पर भयानक विपिा टूट पड़ी है।य् मैं वुफछ - वुफछ समझ गया, पिफर भी विस्तृत विवरण जानने को उत्सुक हो उठा, फ्क्या हुआ? शरा साप़़्ाफ - सापफ बताओ।य्फ्वही हुआ जिसका तुम्हें भय था। कल पुलिस की एक पलटन ने लाल का घर घेर लिया था। बारह घंटे तक तलाशी हुइर्। लाल, उसके बारह - पंद्रह साथी, सभी पकड़ लिए गए हैं। सबके घरों से भयानक - भयानक चीशें निकली हैं।य्फ्लाल के यहाँ?य्फ्उसके यहाँ भी दो पिस्तौल, बहुत से कारतूस और पत्रा पाए गए हैं। सुना है, उन पर हत्या, षड्यंत्रा, सरकारी राज्य उलटने की चेष्टा आदि अपराध् लगाए गए हैं।य्फ्हूँ,य् मैंने ठंडी साँस ली, फ्मैं तो महीनों से चिल्ला रहा था कि वह लौंडा धेखा देगा। अब यह बूढ़ी बेचारी मरी। वह कहाँ है? तलाशी के बाद तुम्हारे पास आइर् थी?य्फ्जानकी मेरे पास कहाँ आइर्! बुलवाने पर भी कल नकार गइर्। नौकर से कहलाया, ‘परांठे बना रही हूँ, हलवा, तरकारी अभी बनाना है, नहीं तो, वे बिल्हड़ बच्चे हवालात में मुरझा न जाएँगे। जेलवाले और उत्साही बच्चों की दुश्मन यह सरकार उन्हें भूखों मार डालेगी। मगर मेरे जीते - जी यह नहीं होने का’।य्फ्वह पागल है, भोगेगी,य् मैं दुख से टूटकर चारपाइर् पर गिर पड़ा। मुझे लाल के कमो± पर घोर खेद हुआ।इसके बाद प्रायः एक वषर् तक वह मुकदमा चला। कोइर् भी अदालत के कागश उलटकर देख सकता है, सी.आइर्.डी. ने और उनके प्रमुख सरकारी वकील ने उन लड़कों पर बड़े - बड़े दोषारोपण किए। उन्होंने चारों ओर गुप्त समितियाँ कायम की थीं, खचेर् और प्रचार के लिए डाके डाले थे, सरकारी अध्िकारियों के यहाँ रात में छापा मारकर शस्त्रा एकत्रा किए थे। उन्होंने न जाने किस पुलिस के दारोगा को मारा था और न जाने कहाँ, न जाने किस पुलिस सुप¯रटेंडेंट को। ये सभी बातें सरकार की ओर से प्रमाण्िात की गईं। उध्र उन लड़कों की पीठ पर कौन था? प्रायः कोइर् नहीं। सरकार के डर के मारे पहले तो कोइर् वकील ही उन्हें नहीं मिल रहा था, पिफर एक बेचारा मिला भी, तो ‘नहीं’ का भाइर्। हाँ, उनकी पैरवी में सबसे अध्िक परेशान वह बूढ़ी रहा करती। वह लोटा, थाली, शेवर आदि बेच - बेचकर सुबह - शाम उन बच्चों को भोजन पहुँचाती। पिफर वकीलों के यहाँ जाकर दाँत निपोरती, गिड़गिड़ाती, कहती, फ्सब झूठ है। न जाने कहाँ से पुलिसवालों ने ऐसी - ऐसी चीशें हमारे घरों से पैदा कर दी हैं। वे लड़के केवल बातूनी हैं। हाँ, मैं भगवान का चरण छूकर कह सकती हूँ, तुम जेल में जाकर देख आओ, वकील बाबू। भला, पूफल - से बच्चे हत्या कर सवफते हैं?य्उसका तन सूखकर काँटा हो गया, कमर झुककर ध्नुष - सी हो गइर्, आँखें निस्तेज, मगर उन बच्चों के लिए दौड़ना, हाय - हाय करना उसने बंद न किया। कभी - कभी सरकारी नौकर, पुलिस या वाडर्न झुँझलाकर उसे झिड़क देते, धकिया देते।उसको अंत तक यह विश्वास रहा कि यह सब पुलिस की चालबाशी है। अदालत में जब दूध् का दूध् और पानी का पानी किया जाएगा, तब वे बच्चे शरूर बेदाग छूट जाएँगे। वे पिफर उसके घर में लाल के साथ आएँगे। उसे ‘माँ’ कहकर पुकारेंगे।मगर उस दिन उसकी कमर टूट गइर्, जिस दिन ऊँची अदालत ने भी लाल को, उस बंगड़ लठैत को तथा दो और लड़कों को पफाँसी और दस को दस वषर् से सात वषर् तक की कड़ी सशाएँ सुना दीं।वह अदालत के बाहर झुकी खड़ी थी। बच्चे बेडि़याँ बजाते, मस्ती से झूमते बाहर आए। सबसे पहले उस बंगड़ की नशर उसपर पड़ी।फ्माँ!य् वह मुसकराया, फ्अरे, हमें तो हलवा ख्िाला - ख्िालाकर तूने गध्े - सा तगड़ा कर दिया है, ऐसा कि पफाँसी की रस्सी टूट जाए और हम अमर के अमर बने रहें, मगर तू स्वयं सूखकर काँटा हो गइर् है। क्यों पगली, तेरे लिए घर में खाना नहीं है क्या?य् फ्माँ!य् उसके लाल ने कहा, फ्तू भी जल्द वहीं आना जहाँ हम लोग जा रहे हैं। यहाँ से थोड़ी ही देर का रास्ता है, माँ! एक साँस में पहुँचेगी। वहीं हम स्वतंत्राता से मिलेंगे। तेरी गोद में खेलेंगे। तुझे वंफध्े पर उठाकर इध्र से उध्र दौड़ते पिफरेंगे। समझती है? वहाँ बड़ा आनंद है।य् फ्आएगी न, माँ?य् बंगड़ ने पूछा। फ्आएगी न, माँ?य् लाल ने पूछा। फ्आएगी न, माँ?य् पफाँसी - दंड प्राप्त दो दूसरे लड़कों ने भी पूछा। और वह टुवुफर - टुवुफर उनका मुँह ताकती रही μ फ्तुम कहाँ जाओगे पगलो?य् जब से लाल और उसके साथी पकड़े गए, तब से शहर या मुहल्ले का कोइर् भी आदमी लाल की माँ से मिलने से डरता था। उसे रास्ते में देखकर जाने - पहचाने बगलें झाँकने लगते। मेरा स्वयं अपार प्रेम था उस बेचारी बूढ़ी पर, मगर मैं भी बराबर दूर ही रहा। कौन अपनी गदरन मुसीबत में डालता, विद्रोही की माँ से संबंध् रखकर? उस दिन ब्यालू करने के बाद वुुफछ देर के लिए पुस्तकालय वाले कमरे में गया,किसी महान लेखक की कोइर् महान कृति क्षणभर देखने के लालच से। मैंने मेिानी की एक जिल्द निकालकर उसे खोला। पहले ही पन्ने पर पेंसिल की लिखावट देखकर चैंका। ध्यान देने पर पता चला, वे लाल के हस्ताक्षर थे। मुझे याद पड़ गइर्। तीन वषर् पूवर् उस पुस्तक को मुझसे माँगकर उस लड़के ने पढ़ा था। एक बार मेरे मन में बड़ा मोह उत्पन्न हुआ उस लड़के के लिए। उसके पिता रामनाथ की दिव्य और स्वगीर्य तसवीर मेरी आँखों के आगे नाच गइर्। लाल की माँ पर उसके सि(ांतों, विचारों या आचरणों के कारण जो वज्रपात हुआ था, उसकी एक ठेस मुझे भी, उसके हस्ताक्षर को देखते ही लगी। मेरे मुँह से एक गंभीर, लाचार, दुबर्ल साँस निकलकर रह गइर्। पर, दूसरे ही क्षण पुलिस सुप¯रटेंडेंट का ध्यान आया। उसकी भूरी, डरावनी, अमानवी आँखें मेरी ‘आप सुखी तो जग सुखी’ आँखों में वैसे ही चमक गईं, जैसे ऊजड़ गाँव के सिवान में कभी - कभी भुतही चिनगारी चमक जाया करती है। उसके रूखे पफौलादी हाथ, जिनमें लाल की तसवीर थी, मानो मेरी गरदन चापने लगे। मैं़मेश पर से रबर ;इरेशरद्ध उठाकर उस पुस्तक पर से उसका नाम उध्ेड़ने लगा।उसी समय मेरी पत्नी के साथ लाल की माँ वहाँ आइर्। उसके हाथ में एक पत्रा था। फ्अरे!य् मैं अपने को रोक न सका, फ्लाल की माँ! तुम तो बिलवुफल पीली पड़ गइर् हो। तुम इस तरह मेरी ओर निहारती हो, मानो वुफछ देखती ही नहीं हो। यह हाथ में क्या है?य् उसने चुपचाप पत्रा मेरे हाथ में दे दिया। मैंने देखा, उसपर जेल की मुहर थी। सशा सुनाने के बाद वह वहीं भेज दिया गया था, यह मुझे मालूम था। मैं पत्रा निकालकर पढ़ने लगा। वह उसकी अंतिम चिट्ठी थी। मैंने कलेजा रूखाकर उसे शोर से पढ़ दिया μ फ्माँ! जिस दिन तुम्हें यह पत्रा मिलेगा उसके सवेरे मैं बाल अरुण के किरण - रथ परचढ़कर उस ओर चला जाऊँगा। मैं चाहता तो अंत समय तुमसे मिल सकता था, मगर इससे क्या पफायदा! मुझे विश्वास है, तुम मेरी जन्म - जन्मांतर की जननी ही रहोगी। मैं़तुमसे दूर कहाँ जा सकता हूँ! माँ! जब तक पवन साँस लेता है, सूयर् चमकता है, समुद्र लहराता है, तब तक कौन मुझे तुम्हारी करुणामयी गोद से दूर खींच सकता है?दिवाकर थमा रहेगा, अरुण रथ लिए जमा रहेगा! ंमैं, बंगड़ वह, यह सभी तेरे इंतशार में रहेंगे। हम मिले थे, मिले हैं, मिलेंगे। हाँ, माँ! तेरा..लालय् काँपते हाथ से पढ़ने के बाद पत्रा को मैंने उस भयानक लिप़्ाफापेफ में भर दिया।़मेरी पत्नी की विकलता हिचकियों पर चढ़कर कमरे को करुणा से वँफपाने लगी। मगर, वह जानकी ज्यों - की - त्यों, लकड़ी पर झुकी, पूरी खुली और भावहीन आँखों से मेरी ओर देखती रही, मानो वह उस कमरे में थी ही नहीं। क्षणभर बाद हाथ बढ़ाकर मौन भाषा में उसने पत्रा माँगा। और पिफर, बिना वुफछ कहे कमरे के पफाटक के बाहर हो गइर्, डुगुर - डुगुर लाठी टेकती हुइर्। इसके बाद शून्य - सा होकर मैं ध्म से वुफरसी पर गिर पड़ा। माथा चक्कर खाने लगा। उस पाजी लड़के के लिए नहीं, इस सरकार की क्रूरता के लिए भी नहीं, उस बेचारी भोली, बूढ़ी जानकी μ लाल की माँ के लिए। आह! वह वैफसी स्तब्धथी। उतनी स्तब्धता किसी दिन प्रकृति को मिलती तो आँध्ी आ जाती। समुद्र पाता तो बौखला उठता। जब एक का घंटा बजा, मैं शरा सगबगाया। ऐसा मालूम पड़ने लगा मानो हरारत पैदा हो गइर् है...माथे में, छाती में, रग - रग में। पत्नी ने आकर कहा, फ्बैठे ही रहोगे! सोओगे नहीं?य् मैंने इशारे से उन्हें जाने का कहा।पिफर मेिानी की जिल्द पर नशर गइर्। उसके ऊपर पड़े रबर पर भी। पिफर अपने सुखों की, शमींदारी की, ध्निक जीवन की और उस पुलिस - अध्िकारी की निदर्य, नीरस, निस्सार आँखों की स्मृति कलेजे में वंफपन भर गइर्। पिफर रबर उठाकर मैंने उस पाजी का पेंसिल - खचित नाम पुस्तक की छाती पर से मिटा डालना चाहा। फ्माँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ...य् मुझे सुनाइर् पड़ा। ऐसा लगा, गोया लाल की माँ कराह रही है। मैं रबर हाथ में लिए, दहलते दिल से, ख्िाड़की की ओर बढ़ा। लाल के घर की ओर कान लगाने पर सुनाइर् न पड़ा। मैं सोचने लगा, भ्रम होगा। वह अगर कराहती होती तो एकाध् आवाश और अवश्य सुनाइर् पड़ती। वह कराहनेवाली औरत है भी नहीं। रामनाथ के मरने पर भी उस तरह नहीं घ्िाघ्िायाइर् जैसे साधरण स्ित्रायाँ ऐसे अवसरों पर तड़पा करती हैं। मैं पुनः सोचने लगा। वह उस नालायक के लिए क्या नहीं करती थी! ख्िालौने की तरह, आराध्य की तरह, उसे दुलराती और सँवारती पिफरती थी। पर आह रे छोकरे! फ्माँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ...य् पिफर वही आवाश। शरूर जानकी रो रही है। शरूर वही विकल, व्यथ्िात, विवश बिलख रही है। हाय री माँ! अभागिनी वैसे ही पुकार रही है जैसे वह पाजी गाकर, मचलकर, स्वर को खींचकर उसे पुकारता था। अँध्ेरा ध्ूमिल हुआ, पफीका पड़ा, मिट चला। उषा पीली हुइर्, लाल हुइर्। रवि रथ लेकर वहाँ क्ष्िातिज से उस छोर पर आकर पवित्रा मन से खड़ा हो गया। मुझे लाल के पत्रा की याद आ गइर्। फ्माँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ ।ँ...य् मानो लाल पुकार रहा था, मानो जानकी प्रतिध्वनि की तरह उसी पुकार को गा रही थी। मेरी छाती ध्व्फ - ध्व्फ करने लगी। मैंने नौकर को पुकारकर कहा, फ्देखो तो, लाल की माँ क्या कर रही है?य् जब वह लौटकर आया, तब मैं एक बार पुनः मेश और मेिानी के सामने खड़ा था। हाथ में रबर लिए उसी उद्देश्य से। उसने घबराए स्वर से कहा, फ्हुशूर, उनकी तो अजीब हालत है। घर में ताला पड़ा है और वे दरवाशे पर पाँव पसारे, हाथ में कोइर् चिट्ठी लिए, मुँह खोल, मरी बैठी हैं। हाँ सरकार, विश्वास मानिए, वे मर गइर् हैं। साँस बंद है, आँखें खुलीं...य् उसे वेंफद्र में ही नहीं रखा बल्िक कहानी का शीषर्क बना दिया। क्यों? 3.चाचा जानकी तथा लाल के प्रति सहानुभूति तो रखता है ¯कतु वह डरता है। यह डर किस प्रकार का है और क्यों है? 4.इस कहानी में दो तरह की मानसिकताओं का संघषर् है, एक का प्रतिनिध्ित्व लाल करताहै और दूसरे का उसका चाचा। आपकी नशर में कौन सही है? तवर्फसंगत उत्तर दीजिए। 5.उन लड़कों ने वैफसे सि( किया कि जानकी सिप़्ार्फ माँ नहीं भारतमाता है? कहानी के आधार पर उसका चरित्रा - चित्राण कीजिए। 6.विद्रोही की माँ से संबंध् रखकर कौन अपनी गरदन मुसीबत में डालता? इस कथन के आधार पर उस शासन - तंत्रा और समाज - व्यवस्था पर प्रकाश डालिए। 7.चाचा ने लाल का पेंसिल - खचित नाम पुस्तक की छाती पर से क्यों मिटा डालना चाहा? 8.‘ऐसे दुष्ट, व्यक्ित - नाशक राष्ट्र के सवर्नाश में मेरा भी हाथ हो’ के माध्यम से लाल क्या कहना चाहता है? 9.निम्नलिख्िात का आशय स्पष्ट कीजिए μ ;कद्ध पुलिसवाले केवल.............ध्ीरे - ध्ीरे घुलाना - मिटाना है। ;खद्ध चाचा जी, नष्ट हो जाना............सहस्र भुजाओं की सख्िायाँ हैं। योग्यता - विस्तार 1.पुलिस के साथ दोस्ती की जानी चाहिए या नहीं? अपनी राय लिख्िाए। 2.लाल और उसके साथ्िायों से आपको क्या प्रेरणा मिलती है? 3.‘उसकी माँ’ के आधर पर अपनी माँ के बारे में एक कहानी लिख्िाए। शब्दाथर् और टिप्पणी पुश्त - पीढ़ी प़्ाफरमाबरदार - आज्ञाकारी, सेवक पाजीपन - बदमाशी दुरवस्था - बुरी हालत हँसोड़ - हँसमुख प्रवृिा का नीति - मदर्क कानून - नीति को मिटाने वाला, नष्ट करने वाला कानून बंगड़ - शरारती ब्यालू - रात का भोजन बाल अरुण - सुबह - सुबह का सूयर्, ;लालिमायुक्तद्ध

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